रक्षाबंधन कथा

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रक्षाबंधन

रक्षाबंधन

रक्षाबंधन का पर्व भाई-बहन के प्यार को दर्शाता है। हिंदू पंचांग के अनुसार, हर साल रक्षाबंधन का पर्व श्रावण महीने की पूर्णिमा को मनाया जाता है। इसे राखी पूर्णिमा भी कहते हैं।

इस दिन बहनें अपने भाइयों की कलाई पर राखी बांधती हैं, जबकि भाई अपनी बहनों की रक्षा का वचन देते हैं। इस दौरान बहन-भाई एक दूसरे को मिठाई खिलाते हैं और उपहार भी देते हैं। ये हिंदुओं के सबसे महत्वपूर्ण त्योहारों में से एक है। लेकिन, क्या आप जानते हैं कि आखिर रक्षाबंधन का त्योहार शुरू कैसे हुआ? इसके पीछे कई पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं। तो, चलिए रक्षाबंधन मनाने के पीछे की पौराणिक कथाएं जानते हैं

यह स्वंय शिवजी द्वारा माता जगदम्बा से कही गई एक पवित्र कथा है। आप भी विस्तार पूर्वक पढ़े:
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यूं तो रक्षाबंधन की कई कथाएं हैं लेकिन हम यहां कुछ चर्चित कथाएं दे रहे हैं। इनमें से पहली कथा का धार्मिक महत्व है, जिसे पूजन के साथ कहा जाता है। बाकी की कथाएं भाई-बहन के प्रेम के प्रतीक इस अनोखे त्योहार की महत्ता से संबंधित हैं।

रक्षाबंधन कथा

रक्षाबंधन कथा- 1

एक बार युधिष्ठिर ने भगवान कृष्ण से पूछा- ‘हे अच्युत! मुझे रक्षाबंधन की वह कथा सुनाइए जिससे मनुष्यों की प्रेतबाधा तथा दुख दूर होता है।’ भगवान कृष्ण ने कहा- हे पांडव श्रेष्ठ! एक बार दैत्यों तथा सुरों में युद्ध छिड़ गया और यह युद्ध लगातार बारह वर्षों तक चलता रहा। असुरों ने देवताओं को पराजित करके उनके प्रतिनिधि इंद्र को भी पराजित कर दिया।

ऐसी दशा में देवताओं सहित इंद्र अमरावती चले गए। उधर विजेता दैत्यराज ने तीनों लोकों को अपने वश में कर लिया। उसने राजपद से घोषित कर दिया कि इंद्रदेव सभा में न आएँ तथा देवता व मनुष्य यज्ञ-कर्म न करें। सभी लोग मेरी पूजा करें।

दैत्यराज की इस आज्ञा से यज्ञ-वेद, पठन-पाठन तथा उत्सव आदि समाप्त हो गए। धर्म के नाश से देवताओं का बल घटने लगा। यह देख इंद्र अपने गुरु वृहस्पति के पास गए तथा उनके चरणों में गिरकर निवेदन करने लगे- गुरुवर! ऐसी दशा में परिस्थितियाँ कहती हैं कि मुझे यहीं प्राण देने होंगे। न तो मैं भाग ही सकता हूँ और न ही युद्धभूमि में टिक सकता हूँ। कोई उपाय बताइए।

वृहस्पति ने इंद्र की वेदना सुनकर उसे रक्षा विधान करने को कहा। श्रावण पूर्णिमा को प्रातःकाल निम्न मंत्र से रक्षा विधान संपन्न किया गया।

‘येन बद्धो बलिर्राजा दानवेन्द्रो महाबलः।
तेन त्वामभिवध्नामि रक्षे मा चल मा चलः॥’

इंद्राणी ने श्रावणी पूर्णिमा के पावन अवसर पर द्विजों से स्वस्तिवाचन करवा कर रक्षा का तंतु लिया और इंद्र की दाहिनी कलाई में बाँधकर युद्धभूमि में लड़ने के लिए भेज दिया। ‘रक्षाबंधन’ के प्रभाव से दैत्य भाग खड़े हुए और इंद्र की विजय हुई। राखी बाँधने की प्रथा का सूत्रपात यहीं से होता है।

कथा- 2

भारतीय इतिहास के अनुसार मुसलमान शासक भी रक्षाबंधन की धर्मभावना पर न्योछावर थे। जहाँगीर ने एक राजपूत स्त्री का रक्षा सूत्रपाकर समाज को विशिष्ट आदर्श प्रदान किया। इस संदर्भ में पन्ना की राखी विशेषतः उल्लेखनीय है।

एक बार राजस्थान की दो रियासतों में गंभीर कलह चल रहा था। एक रियासत पर मुगलों ने आक्रमण कर दिया। अवसर पाकर दूसरी रियासत वाले राजपूत मुगलों का साथ देने के लिए सैन्य सज्जा कर रहे थे। पन्ना भी इन्हीं मुगलों के घेरे में थी। उसने दूसरी रियासत के शासक को, जो मुगलों की सहायतार्थ जा रहा था, राखी भेजी। राखी पाते ही उसने उलटे मुगलों पर आक्रमण कर दिया। मुगल पराजित हुए। इस तरह रक्षाबंधन के कच्चे धागे ने दोनों रियासतों के शासकों को पक्की मैत्री के सूत्र में बाँध दिया।

कथा- 3

चित्तौड़ की रानी कर्णवती ने गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह के आक्रमण से अपने राज्य व अपनी रक्षा के लिए सम्राट हुमायुं को एक पत्र के साथ राखी भेजकर रक्षा का अनुरोध किया था। हुमायुं ने राखी को स्वीकार किया रानी कर्णवती की रक्षा के लिए चित्तौड़ रवाना हो गए. हालांकि, हुमायुं के पहुंचने से पहले ही रानी कर्णवती ने आत्महत्या कर ली थी।

कथा- 4

एक बार भगवान श्रीकृष्ण के हाथ में चोट लग गई तथा खून की धार बह निकली। यह सब द्रौपदी से नहीं देखा गया और उसने तत्काल अपनी साड़ी का पल्लू फाड़कर श्रीकृष्ण के हाथ में बाँध दिया फलस्वरूप खून बहना बंद हो गया। कुछ समय पश्चात जब दुःशासन ने द्रौपदी की चीरहरण किया तब श्रीकृष्ण ने चीर बढ़ाकर इस बंधन का उपकार चुकाया। यह प्रसंग भी रक्षाबंधन की महत्ता प्रतिपादित करता है।

कथा- 5

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, एक बार राजा बलि ने अश्वमेघ यज्ञ कराया था, उस समय भगवान विष्णु ने बौने का रुप धारण किया और राजा बलि से 3 पग भूमि दान में मांगी। राजा बलि इसके लिए तैयार हो गए और जैसे ही उन्होंने हां कहा, वामन रुपधारी भगवान विष्णु ने धरती और आकाश को अपने दो पगों से नाप दिया।

इसके बाद उनका विशाल रुप देखकर राजा बलि ने अपने सिर को उनके चरणों में रख दिया। फिर, भगवान से वरदान मांगा कि जब भी मैं भगवान को देखूं तो आप ही नजर आएं। हर पल सोते-जागते उठते-बैठते आपको देखना चाहता हूं। भगवान ने उन्हें वरदान दिया और उनके साथ रहने लगे।

जिसके बाद माता लक्ष्मी परेशान हो गईं और नारद मुनि को सारी बात बताई। नारद जी ने कहा, कि आप राजा बलि को अपना भाई बनाकर भगवान विष्णु के बारे में पूछो। इसके बाद माता लक्ष्मी राजा बलि के पास रोते हुए पहुंची तो, राजा ने पूछा कि आप क्यों रो रही हैं। मुझे बताइए मैं आपका भाई हूं। ये सुनकर माता लक्ष्मी ने राजा बलि को राखी बांधी और भगवान विष्णु को मुक्त करने का वचन लिया। तभी से रक्षाबंधन का त्योहार मनाया जा रहा है।

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