लंकापति रावण कथा

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लंकापति रावण कथा

भारतीय पौराणिक कथाएं साधारण अच्छाई और बुराई से परे है। हिंदू पुराणों में हर कदम पर एक दिलचस्प कहानी है। ऐसी ही एक कहानी रावण की है। कहानियों के अनुसार रावण ने खलनायक की भूमिका निभाई, लेकिन उन्होंने यह भूमिका क्यों निभाई, यह बहुत महत्वपूर्ण प्रश्न है। यह वास्तव में अच्छाई और बुराई के समीकरण में संतुलन लाने के लिए था। कोई आश्चर्य नहीं कि वे अभी भी दुनिया के कुछ हिस्सों में पूजे जाते हैं।

कैसे हुआ था रावण का जन्म..?

यह स्वंय शिवजी द्वारा माता जगदम्बा से कही गई एक पवित्र कथा है। आप भी विस्तार पूर्वक पढ़े:
शिव-शक्ति श्रीराम मिलन (संपूर्ण भाग) 🌞

रावण की पहचान किसी से छिपी नहीं है। लंकापति रावण को अनीति माना गया,अनाचार, दंभ, काम, क्रोध और लोभ से भरा एक अधर्मी के तौर पर जाना गया। बुराई का दूसरा नाम रावण माना जाने लगा, लेकिन इस बात को भी कभी नकारा नहीं गया कि दशानन रावण एक राक्षस तो था साथ ही एक महाज्ञानी भी था। आज हम जानेंगे कि आखिर रावण कैसे हुआ और ऐसा क्या हुआ उसके जन्म के वक्त कि उसके एक ब्राह्मण पुत्र होने के बाद भी उसमें राक्षसत्व आ गए।

रामायण जो हिन्दू धर्म में बेहद पवित्र ग्रन्थ माना गया है। रामायण में राम का सम्पूर्ण बताया गया जिसमें रावण का भी खास तौर पर जिक्र है। रावण सोने की लंका का राजा था जिसके जन्म को लेकर कई कथाओं का वर्णन मिलता है। वाल्मीकि रामायण की माने तो पुलत्स्य मुनि के पुत्र महर्षि विश्रवा का रावण पुत्र था, जिसकी मां राक्षसी कैकसी थी।

वाल्मीकि रामायण के उत्तरकांड में बताया गया है कि पुराने समय में माली, सुमाली और मलेवन बेहद क्रूर दैत्य भाई थे जिन्होंने ब्रह्मा कि कठिन तपस्या की जिससे ब्रह्मा ने उन्हें महाबलशाली होने का वरदान दे दिया। वरदान पाकर स्वर्गलोक, पृथ्वीलोक और पाताललोक में तीनों भाई देवताओं, ऋषि-मुनियों और मनुष्यों पर अत्याचार करना शुरू कर दिया और जब ऐसा काफी ज्यादा होने लगा तो देव और ऋषि-मुनियों ने भगवान विष्णु से अपनी व्यथा सुनाई। जिसके बाद भगवान विष्णु ने कहा कि आप सभी अपने लोक चले जाएं और डरे नहीं, मैं इन दुष्ट राक्षसों का विनाश करूंगा। दूसरी तरफ तीनों अत्याचारी भाइयों को इस बारे में पता चला तो सेना सहित इंद्रलोक के पर तीनों ने आक्रमण कर दिया। ऐसे में इंद्रलोक आकर विष्णु राक्षसों का अंत करने लगे। फिर क्या था, अपनी जान बचा के लिए सेनापति माली समेत सभी राक्षस लंका की ओर भाग निकले। फिर सभी राक्षस सुमाली के साथ लंका छोड़ पाताल चले गए वहीं छुप गए और अपने परिवार के साथ रहने लगा।

एक दिन सुमाली पृथ्वी लोक में घूमने को आया जहां उसकी नजर कुबेर पर पड़ी, लेकिन देवताओं के डर से वो फिर पाताल लोक चला गया और सोचने लगा कि कब तक वो डर से यूं ही छुपा रहेगा। कुछ तो उपाय निकालना ही पड़ेगा। ताकि देवताओं को हराया जा सके।  फिर उसने विचार किया कि क्यों न वो अपनी पुत्री कैकसी का विवाह ऋषि विश्रवा से कराए, जिससे उसे कुबेर जैसा एक तेजस्वी पुत्र हुआ है। ऐसे में एक दिन उसने अपनी बेटी कहा कि राक्षस वंश के कल्याण के लिए तुम परमपराक्रमी महर्षि विश्रवा से विवाह करो और एक पुत्र को जन्म दो जो हम राक्षसों की रक्षा देवताओं से करेगा।

राक्षसी तो थी कैकसी पर उसने धर्म को कभी नहीं थोड़ा। ऐसे में पिता की इच्छा को पूरा करना उसे अपना धर्म लगा तो वो महर्षि विश्रवा से मिलने के लिए पाताल लोक से पृथ्वीलोक आ गई।

पातालालोक से पृथ्वीलोक आने में काफी वक्त लगा कैकसी को और शाम हो गई थी महर्षि विश्रवा के आश्रम पहुंचने में। तब भयंकर आंधी भी चल रही थी और बारिश हो रही थी। कैकसी आश्रम पहुंचकर महर्षि का चरण वंदन कर विवाह करने की इच्छा के बारे में बताया। जिसके बाद महर्षि विश्रवा ने कहा कि हे भद्रे मैं आपकी इच्छी तो पूरी कर सकता हूं, लेकिन तुम कुबेला में यहां आई हो ऐसे में हमारा पुत्र क्रूर कर्म करने वाले और भयानक सूरत वाले राक्षस होंगे। ऐसे में कैकसी ने कहा कि ऐसे ब्राह्मणवादी दौर में दुराचारी पुत्रों की उत्पत्ति मैं नहीं चाहती ऐसे में आप मुझ पर कृपा करिए जिस पर महर्षि विश्रवा ने कहा कि तुम्हारा तीसरा पुत्र मुझ जैसा धर्मात्मा होगा।

दिन बीते और कैकसी ने दस सिर वाले राक्षस को जन्म दिया जिसका रंग काल आकार पहाड़ के जैसा था। जिसका नाम महर्षि विश्रवा ने दशग्रिव रखा और विश्रवा का जेश्ठ पुत्र रावण के नाम से आगे जाना गया। कैकसी के गर्भ से कुम्भकरण भी हुआ जो लंबा-चौड़ा था। उस समान बड़ा शरीर दूसरा किसी का न था।

रावण पुलस्त्य का पोता था, जो भारतीय पौराणिक कथाओं के सबसे महान संतों में से एक और सप्तर्षियों में से एक थे। उनका जन्म ऋषि विश्रवन और असुर की माता कैकाशी से हुआ था। इसलिए उन्हें आधा असुर (राक्षस) और आधा ब्राह्मण (ऋषि) माना जाता है। रावण को प्राचीन हिंदू महाकाव्य रामायण में सर्वोच्च विरोधी के रूप में जाना जाता है। उन्हें एक राक्षस और लंका के महान राजा के रूप में दर्शाया गया है। उन्हें दस सिर वाले राक्षस के रूप में जाना जाता है, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि वह दस सिर के साथ पैदा नहीं हुए थे।

रावण वास्तव में भगवान शिव का एक महान अनुयायी थे। एक असाधारण विद्वान, एक उत्कृष्ट शासक और वीणा के वादक। उन्होंने दो पुस्तकें लिखी थीं: रावण संहिता (ज्योतिष की एक पुस्तक) और अर्का प्रकाशम (सिद्ध चिकित्सा की पुस्तक)। वह आयुर्वेद और काले जादू की काली प्रथाओं में पारंगत थे। ऐसा कहा जाता है कि वह अपनी इच्छा से ग्रहों की स्थिति को नियंत्रित कर सकते थे। उनके पास पुष्पक विमान था, जिसे उन्होंने अपने सौतेले भाई कुबेर से जीता था। उन्होंने तंत्र विद्या में महारत हासिल की थी, जिसका इस्तेमाल उन्होंने अपने दुश्मनों के खिलाफ लड़ाई में किया था।

एक बार जब रावण ने कैलाश पर्वत को उठाने की कोशिश की, तो भगवान शिव बहुत क्रोधित हो गए और फिर रावण ने भगवान शिव स्तुति करना शुरू कर दिया और क्षमा मांगी। भगवान शिव रावण से इतने प्रसन्न हुए कि उन्होंने पूरे क्रोध और जोश के साथ नृत्य करने की बात कही और इस नृत्य को तांडव कहा जाता है और मंत्रों को शिव तांडव स्तोत्रम के रूप में जाना जाने लगा।

शिक्षा प्राप्त करने के बाद रावण ने नर्मदा नदी के तट पर भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए एक विशाल तपस्या की। भगवान को प्रसन्न करने के लिए, रावण ने अपना शीश भगवान शिव को अर्पण कर दिया और हर बार जब उसने ऐसा किया, तो उनका शीश वापस बढ़ गया और यह दस बार जारी रहा जिससे उन्हें अपनी तपस्या जारी रखने में मदद मिली। इस प्रकार भगवान शिव ने रावण को दस सिर दिए जो उन्होंने बलिदान किए थे। इन दस सिरों के कारण उन्हें “दशमुख” भी कहा जाता है।

रावण के दस सिर छह शास्त्रों (चार श्रेणियों से युक्त हिंदू धर्म के पवित्र ग्रंथ: श्रुति, स्मृति, पुराण और तंत्र) और चार वेदों के प्रतीक हैं, जिसने रावण को एक महान विद्वान और सबसे बुद्धिमान प्राणियों में से एक बना दिया। वे 64 प्रकार के ज्ञान और शस्त्र की सभी कलाओं के ज्ञाता थे। उन्हें प्रासंगिक संगीत स्वर के साथ वेद संकलित करने के लिए जाना जाता है और उनका शिव तांडव स्तोत्र अभी तक भगवान शिव की स्तुति में गाया जाने वाला सबसे लोकप्रिय भजन है।

फिर भी रावण के 10 सिरों की 10 भावनाएँ हैं। वे भावनाएँ हैं: काम (वासना), क्रोध, मोह (भ्रम), लोभ (लालच), माडा (अभिमान), मत्स्य (ईर्ष्या), मानस (मन), बुद्धि, चित (इच्छा), और अहंकार।

एक बार, महान राजा महाबली ने रावण को इन नौ भावनाओं से दूर रहने और केवल बुद्धि रखने की सलाह दी, जिसको सुनकर रावण ने कहा की इन सभी पहलुओं का अधिकार समान रूप से महत्वपूर्ण है और ये सभी उसे एक पूर्ण पुरुष बनाता है। बुद्धि के एक सिर ने उनके भाग्य को नियंत्रित किया और दूसरे सिर ने उनके कार्यों को नियंत्रित किया जो अंततः उनके विनाश का कारण बना। वह अपनी इंद्रियों के गुलाम बन गए और चूंकि वह अपनी इच्छाओं को नियंत्रित नहीं कर सके, उन्होंने न केवल खुद को और अपितु अपने कुल को नष्ट कर दिया और पूरी लंका को राख कर दिया।

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