छठ पूजा विधि, मंत्र, आरती और कथा | Chhath Puja

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छठ पूजा

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छठ पूजा 2022 खरना मुहूर्त

शास्त्रों मे कार्तिक माह की पंचमी तिथि का दिन ही खरना कहलाता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार इसे लोहंडा के नाम से भी जाना जाता है। एवं खरना के दिन के विन से ही महिलाएं शाम को मीठा भोजन कर व्रत की शुरूआत करती हैं।

यह स्वंय शिवजी द्वारा माता जगदम्बा से कही गई एक पवित्र कथा है। आप भी विस्तार पूर्वक पढ़े:
शिव-शक्ति श्रीराम मिलन (संपूर्ण भाग) 🌞

  • खरना मुहूर्त– सूर्योदय – प्रात: 06 बजकर 31 मिनट पर
  • खरना मुहूर्त– सूर्योस्त – शाम 05 बजकर 38 मिनट पर

खरना 2022 शुभ योग

खरना इस बार अत्यन्त शुभ योग में मनाया जाएगा। इस दिन रवि और सुकर्मा योग एक साथ बन रहे हैं जिससे इस दिन का महत्व और भी बढ़ गया है। शास्त्रों मे वर्णित है कि यदि रवि योग में सूर्य की विधि-विधान से पूजा की जाए तो जातक की कुंडली से सूर्य का दुष्प्रभाव दूर हो जाता है।

  • रवि योग- प्रातः 06.31 से – 09.06 मिनट तक
  • सुकर्मा योग– शाम 10.23 से – 07.16 मिनट तक, अक्टूबर 30

खरना महत्व

खरना का शास्त्रों मे अर्थ है खरा अर्थात कि शुद्धिकरण। नहाए खाए में जातक जहाँ बाहरी यानी कि अपने तन की स्वच्छता करते हैं तो वहीं खरना में आंतरिक यानी कि मन की स्वच्छता पर जोर दिया जाता है। खरना के दिन महिलाएं शाम के समय चूल्हे पर गुड़ी की खीर और साठी के चावल का का भोग बनाती हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार खरना पूजा के साथ ही छठी मइया घर में प्रवेश करती हैं और महिलाओं का 36 घंटे का निर्जला उपवास इसी दिन से ही शुरू हो जाता है।

खरना विधि

  • खरना पूजन के दिन छठ व्रती सूर्योदय से पूर्व स्नान कर सबसे पहले सूर्य देवता को अर्घ्य दें। एवं शाम के समय मिट्टी के चूल्हे पर आम की लकड़ी लगाकर साठी के चावल, गुड़ और दूध की खीर बनाई जाती है। इस दिन एक समय ही भोजन किया जाता है।
  • प्रसाद सबसे पहले छठी मईया को अर्पण करें और फिर व्रती यही भोजन खाएं और फिर घर के अन्य सदस्य यही खाना खाएं।
  • इसके बाद से अन्न, जल का 36 घंटे के लिए त्याग कर निर्जला व्रत किया जाता है। इस उपवास का समापन छठ पूजा के चौथे दिन भोर अर्घ्य के साथ खत्म होगा।

छठ पूजा विवरण

एकमात्र ऐसा त्यौहार जो भगवान को श्रद्धांजलि देता है जो पृथ्वी पर प्रकाश और ऊर्जा लाता है, छठ पूजा में कई अनुष्ठान शामिल हैं जिसमे वैदिक देवता-सूर्य की पूजा कार्तिकेय के महीने में 4 दिनों तक की जाती है जो आमतौर पर अक्टूबर या नवंबर में पड़ता है। महीने के छठवें दिन से ही उपवास (भोजन और पानी का सेवन न करना), सूर्यास्त को अर्घ्य देना और उगते सूरज को लंबे समय तक नदी में खड़े रह कर पूजा करना तथा तृप्ति और उत्साह के साथ पवित्र स्नान करना जैसे अनुष्ठान होते हैं। यह एक ऐसा त्यौहार है जो भलाई और समृद्धि को बढ़ावा देता है, छठ पूजा अपनी जड़ें प्रारम्भिक वैदिक काल में उस समय तक ले जाती है जब ऋषियों ने खुद को सीधे सूर्य के प्रकाश में उजागर करके अनुष्ठान किया था और खुद को खाने से भी परहेज किया था।

पौराणिक मान्यता है कि छठ व्रत रखने से छठी मइया सभी मनोकामनाए पूरी करती हैं। इस व्रत में सूर्य देवता की विधि-विधान के साथ पूजन-अर्चना किया जाता है। कुल 36 घंटे का यह निर्जला व्रत रखने के बाद तथा उगते सूरज को अर्घ्य देने के बाद ही सूर्य भगवान की पूजा की जाती है। जानिए पूजा के दौरान किन-किन मंत्रों का करें जाप और पढ़ें छठ मइया की आरती।

अर्घ्य देते समय पढ़ें यह सूर्य मंत्र-

ऊँ ऐही सूर्यदेव सहस्त्रांशो तेजो राशि जगत्पते।
अनुकम्पय मां भक्त्या गृहणार्ध्य दिवाकर:।।
ऊँ सूर्याय नम:, ऊँ आदित्याय नम:, ऊँ नमो भास्कराय नम:। अर्घ्य समर्पयामि।।

सूर्यदेव मंत्र-

आदिदेव नमस्तुभ्यं प्रसीदमम् भास्कर।
दिवाकर नमस्तुभ्यं प्रभाकर नमोऽस्तु ते।।

छठ मइया की आरती-

जय छठी मैया ऊ जे केरवा जे फरेला खबद से, ओह पर सुगा मंडराए।
मारबो रे सुगवा धनुख से, सुगा गिरे मुरझाए।। जय।।
ऊ जे सुगनी जे रोएली वियोग से, आदिति होई ना सहाय।
ऊ जे नारियर जे फरेला खबद से, ओह पर सुगा मंडराए।। जय।।
मारबो रे सुगवा धनुख से, सुगा गिरे मुरझाए।
ऊ जे सुगनी जे रोएली वियोग से, आदित होई ना सहाय।। जय।।
अमरुदवा जे फरेला खबद से, ओह पर सुगा मंडरराए।
मारबो रे सुगवा धनुख से, सुगा गिरे मुरझाए।।जय।।
ऊ जे सुहनी जे रोएली वियोग से, आदित होई ना सहाय।
शरीफवा जे फरेला खबद से, ओह पर सुगा मंडराए।। जय।।
मारबो रे सुगवा धनुख से, सुगा गिरे मुरझाए।
ऊ जे सुगनी जे रोएली वियोग से, आदित होई ना सहाय।।जय।।
ऊ जे सेववा जे फरेला खबद से, ओह पर सुगा मंडराए।
मारबो रे सुगवा धनुख से, सुगा गिरे मुरझाए।।जय।।
ऊ जे सुगनी जे रोएली वियोग से, आदित होई ना सहाय।
सभे फलवा जे फरेला खबद से, ओह पर सुगा मंडराए।।जय।।
मारबो रे सुगवा धनुख से, सुगा गिरे मुरझाए।
ऊ जे सुगनी जे रोएली वियोग से, आदित होई ना सहाय।।जय।। 

छठ पूजा कथा

शास्त्रों और पुराणों के अनुसार, ऐतिहासिक नगरी मुंगेर के सीता चरण में कभी मां सीता ने छह दिनों तक रह कर छठ पूजा की थी। पौराणिक कथाओं के अनुसार 14 वर्ष वनवास के बाद जब भगवान श्रीराम अयोध्या लौटे थे तो उन्होंने रावण वध के पाप से मुक्त होने के लिए ऋषि-मुनियों के आदेश पर राजसूय यज्ञ कराने का फैसला लिया था। इसके लिए मुग्दल ऋषि को आमंत्रण दिया गया था, परन्तु मुग्दल ऋषि ने भगवान राम एवं सीता को अपने ही आश्रम में आने का आदेश दिया।

ऋषि की आज्ञा पर भगवान राम एवं सीता माता स्वयं यहां आए और उन्हें इसकी पूजा के बारे में बताया गया। मुग्दल ऋषि ने मां सीता को गंगा जल छिड़क कर पवित्र किया एवं कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष षष्ठी तिथि को सूर्यदेव की उपासना करने का आदेश दिया। तब यहीं रह कर माता सीता ने छह दिनों तक सूर्यदेव भगवान की पूजा की थी।

लोकआस्था और सूर्य उपासना का यह महान पर्व छठ की तभी से शुरुआत हो गई थी। इस चार दिवसीय त्यौहार की शुरुआत नहाय-खाय की परम्परा से होती है। यह त्यौहार पूरी तरह से श्रद्धा और शुद्धता का पर्व है। इस व्रत को महिलाओं के साथ-साथ पुरुष भी रखते हैं। कुल चार दिनों तक चलने वाले लोकआस्था के इस महापर्व में व्रती को लगभग तीन दिन का व्रत रखना होता है जिसमें से दो दिन तो पुर्णतः निर्जला व्रत रखा जाता है।

छठ पर्व को पहले केवल बिहार, झारखंड और उत्तर भारत में ही मनाया जाता था, परन्तु अब धीरे-धीरे पूरे देश ने इसके महत्व को स्वीकार कर लिया गया है। छठ पर्व षष्ठी का अपभ्रंश है। इस कारण से इस व्रत का नामकरण छठ व्रत हो गया। छठ पर्व वर्ष में दो बार मनाया जाता है। पहली बार चैत्र माह में और दूसरी बार कार्तिक माह में। चैत्र शुक्ल पक्ष षष्ठी पर मनाए जाने वाले छठ पर्व को चैती छठ एवं कार्तिक शुक्ल पक्ष षष्ठी पर मनाए जाने वाले पर्व को कार्तिकी छठ कहा जाता है।

इस पूजा के लिए कुल चार दिन महत्वपूर्ण हैं:
नहाय-खाय, खरना या लोहंडा, सांझा अर्घ्य और सूर्योदय अर्घ्य।
छठ की पूजा में गन्ना, फल, डाला और सूप आदि का प्रयोग किया जाता है।

पौराणिक मान्यताऐ

मान्यताओं और शास्त्रों के अनुसार छठी मइया को भगवान सूर्य की बहन बताया गया हैं। इस पर्व के दौरान छठी मइया के अलावा भगवान सूर्य की पूजा-आराधना होती है। शास्त्रों मे कहा जाता है कि जो व्यक्ति इन दोनों की पुजा-अर्चना करता है उनकी संतानों की छठी माता सदैव रक्षा करती हैं। कहते हैं कि भगवान की शक्ति से ही चार दिनों का यह कठिन व्रत संपन्न हो पाता है।

छठ वास्तव में सूर्योपासना का ही पर्व है। इसलिए पुराणों मे इसे सूर्य षष्ठी व्रत के नाम से भी जाना जाता है। इसमें सूर्य भगवान की उपासना उनकी कृपा प्राप्त करने के लिए की जाती है। ऐसा मान्यता है कि इस दिन सूर्यदेव की आराधना करने से व्रती को सुख, सौभाग्य और समृद्धि की प्राप्ति होती है और उसकी सभी मनोकामनाएं की पूर्ति होती हैं। इस पर्व के आयोजन का उल्लेख प्राचीन ग्रंथों में भी पाया जाता है। इस दिन पुण्यसलिला नदियों, तालाब या फिर किसी पोखर के किनारे पर पानी में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, कार्तिक शुक्ल पक्ष की षष्ठी के सूर्यास्त और सप्तमी के सूर्योदय के मध्य वेदमाता गायत्री का जन्म हुआ था। प्रकृति के षष्ठ अंश से उत्पन्न षष्ठी माता बालकों की रक्षा करने वाले श्रीविष्णु भगवान द्वारा रची माया हैं। मान्यता है कि बालक के जन्म के छठे दिन छठी मैया की पूजा-अर्चना की जाती है, जिससे बच्चे के ग्रह-गोचर शांत हो जाएं और उसे जीवन में किसी प्रकार का कष्ट नहीं आए। इस मान्यता के आधार पर ही इस तिथि को षष्ठी देवी का व्रत होने लगा।

छठ पूजा की धार्मिक मान्यताएं भी हैं और सामाजिक महत्व भी है। परन्तु इस पर्व की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें धार्मिक भेदभाव, ऊँच-नीच, जात-पात को भूलकर सभी एक साथ इस पर्व को मनाते हैं। किसी भी लोक परंपरा में ऐसा नहीं है। सूर्यदेव, जो रोशनी और जीवन के प्रमुख स्रोत हैं और ईश्वर के रूप में जो प्रतिदिन सुबह दिखाई देते हैं उनकी उपासना की जाती है। इस महापर्व में शुद्धता और स्वच्छता का विशेष रूप से ख्याल रखा जाता है और कहते हैं कि इस पूजा में कोई गलती हो तो तुरंत क्षमा याचना करनी चाहिए अन्यथा तुरंत दण्ड भी मिल जाता है।

सबसे बड़ी बात यह है कि यह पर्व सबको एक सूत्र में पिरोने का कार्य करता है। इस पर्व में अमीर-गरीब, बड़े-छोटे का भेद मिट जाता है। सब एक समान एक ही विधि से भगवान की पूजा करते हैं। अमीर हो तो वह भी मिट्टी के चूल्हे पर ही प्रसाद बनाता है और गरीब भी, सभी एक साथ गंगा तट पर एक जैसे दिखते हैं। बांस के बने सूप में ही अर्घ्य दिया जाता है। प्रसाद भी एक जैसा ही और गंगा और भगवान भास्कर सबके लिए एक जैसे हैं।

#जयछठीमैया🚩 #जयसुर्यदेव🚩

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