शनिदेव का जन्म कथा | Sahanidev Ka Janm Katha

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मुख पृष्ठपोस्टशनिदेव का जन्म और सूर्यदेव से शत्रुता

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शनिदेव का जन्म और सूर्यदेव से शत्रुता की कथा

शनिदेव का नाम आते ही अधिकांश लोग भयभीत हो जाते हैं। क्योंकि लोगों का मानना है कि शनिदेव अत्यंत ही क्रोधी स्वभाव के हैं और अशुभ फल ही प्रदान करते हैं। जबकि ऐसा कुछ भी नहीं है। ज्योतिष शास्त्र में शनिदेव को न्याय का देवता माना गया है। शनिदेव सेवा व कर्म के कारक है। मान्यता हैं कि शनिदेव हर जातक को उसके कर्मों के हिसाब से ही फल प्रदान करते हैं। तब चलिए आज हम शनिदेव से जुड़ी एक पौराणिक अर्थात उनके जन्म की कथा जानते है।

यह तो अधिकतर सभी लोगो को ज्ञात ही होगा कि शनिदेव के पिता सूर्यदेव और माता का नाम छाया है। उनकी माता को संवर्णा भी कहते हैं लेकिन इसके पीछे भी एक पौराणिक कथा है।

यह स्वंय शिवजी द्वारा माता जगदम्बा से कही गई एक पवित्र कथा है। आप भी विस्तार पूर्वक पढ़े:
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शनिदेव का जन्म

स्कंदपुराण मे काशीखंड के अनुसार राजा दक्ष की कन्या संज्ञा का विवाह सूर्यदेवता के साथ हुआ था। संज्ञा सूर्यदेव के तेज से अत्यंत ही परेशान रहती थी जिस कारण एक दिन वह सूर्य देव की अग्नि को कम करने का सोचने लगी। परन्तु दिन बीतते चले गए और संज्ञा गर्भवती हो गई कुछ समय उपरान्त उन्होंन वैवस्वत मनु, यमराज और यमुना नामक तीन संतानों को जन्म दिया। परन्तु सूर्यदेव का तेज उन्हे परेशान करता रहता था।

एक दिन संज्ञा ने निर्णय लिया कि वे तपस्या कर सूर्यदेव के तेज को किसी भी तरह से कम करेंगी, लेकिन बच्चों के पालन और सूर्यदेव को इसकी भनक न लगे, इसके लिए उन्होंने एक युक्ति निकाली उन्होंने अपने तप से अपनी ही तरह की एक महिला को पैदा किया और उसका नाम संवर्णा रखा। चुकि यह संज्ञा की छाया की तरह थी इसलिए इनका नाम छाया भी हुआ। संज्ञा ने छाया से कहा कि अब से मेरे बच्चों और सूर्यदेव की जिम्मेदारी तुम्हारी रहेगी लेकिन यह राज केवल मेरे और तुम्हारे बीच ही बना रहना चाहिए।

यह कहकर संज्ञा वहाँ से चलकर अपने पिता के घर पंहुची तो पिता ने कहा कि ये तुमने अच्‍छा नहीं किया तुम पुन: अपने पति के पास जाओ। जब पिता ने उन्हे शरण नहीं दी तो संज्ञा वन में चली गई और घोड़ी का रूप धारण करके तपस्या में लीन हो गई। उधर सूर्यदेव को जरा भी आभास नहीं हुआ कि उनके साथ रहने वाली संज्ञा नहीं संवर्णा है। संवर्णा अपने नारीधर्म का निस्वार्थ भाव से पालन करती रही और छाया रूप होने के कारण उन्हें सूर्यदेव के तेज से भी कोई परेशानी नहीं हुई। सूर्यदेव और संवर्णा के संयोग से भी मनु, शनिदेव और भद्रा (तपती) तीन संतानों ने जन्म लिया।

शनिदेव का शत्रुवत भाव

शास्त्रों और स्कंदपुराण मे काशीखंड के अनुसार कहते हैं कि जब शनिदेव छाया के गर्भ में थे तो छाया ने भगवान शिव का कठोर तपस्या किया था। भूख-प्यास, धूप-गर्मी सहने के कारण उसका प्रभाव छाया के गर्भ में पल रही संतान यानि शनिदेव पर भी पड़ा। फिर जब शनिदेव का जन्म हुआ तो उनका रंग काला निकला। एक बार जब भगवान सूर्यदेव पत्नी छाया से मिलने गए तब शनिदेव ने उनके तेज के कारण अपने नेत्र बंद कर लिए।

सूर्य ने अपनी दिव्य दृष्टि से इसे देखा व पाया कि उनका पुत्र तो काला है। उनका यह रंग देखकर सूर्यदेव को लगा कि यह तो मेरा पुत्र नहीं हो सकता। सूर्य ने छाया से अपना यह संदेह व्यक्त भी कर दिया। और उन्होंने छाया पर संदेह करते हुए उन्हें अपमानित किया। शनि के जन्म के बाद पिता ने कभी उनके साथ पुत्रवत प्रेम प्रदर्शित नहीं किया। इस कारण शनि के मन में अपने पिता के प्रति शत्रुवत भाव पैदा हो गए।

सूर्यदेव का पश्चाताप

शास्त्रों के अनुसार माँ के तप की शक्ति शनिदेव में भी आ गई थी जब उन्होंने क्रोधित होकर अपने पिता सूर्यदेव को देखा तो सूर्यदेव उनकी शक्ति से काले पड़ गए और उनको कुष्ठ रोग हो गया। सूर्यदेव ने अपनी यह दशा देखकर और घबराए हुए भगवान शिव की शरण में पहुंचे तब भगवान शिव ने सूर्यदेव को उनकी गलती का अहसास करवाया। तब कही जाकर सूर्यदेव को अपने किए का पश्चाताप हुआ, उन्होंने शनिदेव से क्षमा मांगी तब कहीं उन्हें फिर से अपना असली रूप वापस मिला। लेकिन इस घटना के चलते पिता और पुत्र का संबंध हमेशा के लिए खराब हो गया।

शनिदेव की कठोर तपस्या

इस घटना के चलते शनिदेव अत्यंत ही विचलित रहने लगे, उन्‍हें सदैव अपनी माता का अपमान और अपने प्रति घृणा का भाव कचोटता रहता धा। इस पर शनि ने भगवान शिव की कठोर तपस्या कर उन्हें प्रसन्न किया। जब भगवान शिव ने उनसे वरदान मांगने को कहा तो शनि ने कहा कि पिता सूर्यदेव ने मेरी माता का अनादर कर उसे प्रताड़ित किया है। मेरी माता हमेशा अपमानित व पराजित होती रही है।

इसलिए आप मुझे सूर्यदेव से अधिक शक्तिशाली व पूज्य होने का वरदान प्रदान करें। तब भगवान आशुतोष ने वर दिया कि तुम नौ ग्रहों में श्रेष्ठ स्थान पाने के साथ ही सर्वोच्च न्यायाधीश व दंडाधिकारी रहोगे। साधारण मानव तो क्या देवता, असुर, सिद्ध, विद्याधर, गंधर्व व नाग सभी तुम्हारे नाम से सदैव भयभीत होंगे।

शनिदेव की क्यों है टेढ़ी दृष्टि

ब्रह्म पुराण के अनुसार, शनिदेव भगवान श्रीकृष्ण के परम भक्त थे। शनिदेव जब युवा हुए तो उनका विवाह चित्ररथ की पुत्री से हो गया। शनिदेव भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति में इतने लीन रहते थे कि वह अपनी पत्नी पर भी ध्यान नहीं दे पाते थे। उनकी पत्नी इस बात से अत्यन्त गुस्सा हो गईं और तब उन्होंने शनिदेव को श्राप दे दिया कि जिस पर भी उनकी दृष्टि पड़ेगी वह नष्ट हो जाएगा।

शनिदेव ने उन्हें मनाने का अत्यधिक प्रयास किया। अंततः उनकी पत्नी को भी अपनी इस करनी पर अफसोस हुआ लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी और वो अपना श्राप वापस नहीं ले सकती थीं। इस कारण माना जाता है कि शनिदेव की टेढ़ी दृष्टि किसी का भी विनाश कर सकती है।

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