श्री गणेश की जन्म कथा | The Birth Story Of The Shri Ganesh

श्री गणेश का जन्म कथा और त्रिदेवो के साथ युद्ध

श्री गणेश की जन्म कथा

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यह स्वंय शिवजी द्वारा माता जगदम्बा से कही गई एक पवित्र कथा है। आप भी विस्तार पूर्वक पढ़े:
शिव-शक्ति श्रीराम मिलन (संपूर्ण भाग) 🌞

एक समय था जब सृष्टि की रचना, ब्रह्मा विष्णु और महेश ने की थी। सृष्टि, कुदरत या प्रकृति कुछ भी कहिए। एक बार सृष्टि ने घोर तपस्या कर भगवान शिव को प्रसन्न किया। तब शिवजी ने प्रसन्न होकर सृष्टि को वरदान मांगने को कहा। सृष्टि ने कहा, हे ईश्वर! हे शंभू, मैं चाहती हूं कि सृष्टि में कुछ मेरे अनुसार भी बदलाव हो। मेरे अनुसार ही जन्म और मृत्यु हो।

तब शिव जी ने सृष्टि से कहा जिस प्रकार ब्रह्मा के पास निर्माण का, विष्णु के पास पालनहार का और रूद्र (महेश) के पास संहार का दायित्व है अब तुम्हे अपनी शक्तियों का विस्तार कर अपने अन्दर त्रिदेवो के दायित्व को धारण करना होगा, परन्तु स्मरण रहे केवल तुम्हारी इच्छा होगी और कर्म का दायित्व सदैव त्रिदेव का ही होगा। यह वरदान देकर शिव जी अन्तर्ध्यान हो गए।

धीरे-धीरे समय बीतता गया और सृष्टि ने भी अपने शक्तियों का विस्तार करना प्रारंभ कर दिया। उसी क्रम मे आता है एक हाथी का जो महा तेजस्वी और महा पराक्रमी था सृष्टि उसका अस्तित्व भी बचाना चाहती थी और उसका अभिमान भी खंडित करना चाहती थी। तब सृष्टि ने माता पार्वती के द्वारा और संपूर्ण शक्तियों से युक्त एक पार्वती पुत्र की कामना की और जिसका कारण बनाया जया और विजया नामक पार्वती की सखियों को। आइये विस्तार पूर्वक पढ़ते है।

श्री गणेश का जन्म

गणेश जी के जन्म का कारण पार्वती जी की दो सखियाँ थीं। जिनका नाम जया और विजया था। गणेश जी के अस्तित्व में आने के पीछे यही दोनों थीं। उन्होंने स्नानागार के बाहर एक ऐसा पहरेदार लगाने की सलाह दी थी जो स्नानागार में शिव जी को भी ना जाने दे।

बात कुछ ऐसी हुयी की पार्वती जी जब भी स्नानागार में स्नान करने जाती तो बाहर किसी शिवगण को पहरे पर बैठा दिया जाता। लेकिन दुविधा ये थी कि पहरेदार होने के बाद भी शिव जी स्नानागार में चले जाते थे। किसी भी शिवगण में इतनी हिम्मत न थी की वो शिव जी की आज्ञा का उल्लंघन कर सके। और ऐसा एक बार हुआ भी।

उस समय पार्वती जी को यह अहसास हुआ कि द्वार पर कोई ऐसा पहरेदार होना चाहिए जो किसी को भी अन्दर ना आने दे। बस इसी विचार से पार्वती जी ने अपनी सखियों की बात को मानते हुए मैल से एक इन्सान रूपी पुतला बनाया और उसमे जान डाल दी।

उसे आशीर्वाद देते हुए पार्वती जी ने उसे बताया कि तुम मेरे पुत्र हो। तुम्हें वहाँ द्वार पर खड़े हो कर पहरा देना है और जब तक मेरी आज्ञा न हो किसी को भी अन्दर मत आने देना। इतना कहकर माता पार्वती जी ने उसे एक छड़ी दी और द्वार पर नियुक्त कर स्नानागार में चली गयीं।

थोड़ी देर बाद शंकर जी वहां पहुंचे तो गणेश जी ने उन्हें अन्दर जाने से रोक लिया। भगवान् शंकर ने गणेश को बहुत समझाया की उन्हें अन्दर जाने दें। लेकिन गणेश जी ने माँ की आज्ञा का पालन करते हुए शंकर जी को अन्दर न जाने दिया।

श्री गणेश का त्रिदेवो के साथ युद्ध

यहाँ से बात इतनी बढ़ी पहले गणेश को मारने शिवगण आये जब उनसे बात न बनी तो सब देवता आये और उसके बाद स्वयं ब्रह्मा जी और विष्णु जी आये। अंत में सब हार मान गए। फिर शंकर जी को बुलाया गया। बहुत घनघोर युद्ध हुआ लेकिन गणेश जी को कोई हरा नहीं पाया। तब शंकर जी और विष्णु जी ने देखा की इसे ऐसे कोई भी नहीं हरा सकता इसलिए कोइ चाल चलनी पड़ेगी। तब जब गणेश जी विष्णु के साथ लडाई में व्यस्त थे। तब शिवजी ने मौके का फ़ायदा उठा कर गणेश का सिर धड़ से अलग कर दिया।

इस बात का पता जब माता पार्वती को चला तो माता पार्वती ने कुपित होकर कई शक्तियों को निकाला और सबको संसार ख़त्म करने का आदेश दे दिया। ऐसे में चारों ओर हाहाकार मच गया। किसी को कुछ समझ नहीं आ रहा था की ये सब कैसे रोका जाए। सबने माँ को मनाने की कोशिश की। परन्तु सब व्यर्थ। अंत में नारद जी ने ये उपाय दिया की माता उमा की स्तुति की जाए। जिससे उनका क्रोध शांत होगा और ये सब रुकेगा। सब ने ऐसा ही किया और पार्वती जी इस बात पर मानी की उनके पुत्र को दुबारा जीवित किया जाएगा।

शिवजी को जाकर सब देवताओं ने यह बात बाताई तो उन्होंने कहा कि उत्तर दिशा में जाओ और वहाँ जो भी प्राणी अपनी माता के विपरीत दिशा मे सोता हुआ मिले उसका सिर लाकर गणेश के धड़ से जोड़ दिया जाए। जब देवता उत्तर दिशा में गए तो उन्हें सबसे पहले एक हाथी मिला जिसकी माता का मुख उससे विपरीत दिशा मे था। तो शिव की आज्ञा अनुसार वो उस हाथी के मस्तक को ले आये और उसे गणेश के धड़ के ऊपर लगा दिया।

गणेश जी के पुनर्जीवित होने के बाद भगवान् शिव व वहा उपस्थित सभी देवों ने उन्हें आशीर्वाद दिया कि आज के बाद जब भी कही किसी भी प्रकार की पूजा की जायेगी तो अन्य देवी व देवता से पहले तुम्हारी पूजा की जाएगी। तुम्हारा जन्म भाद्रप्रद की चतुर्थी को शुभ चंद्रोदय में हुआ है। इसलिए उस दिन तुम्हारा व्रत रखना अत्यंत ही कल्याणकारी होगा। गणेश चतुर्थी का यह व्रत महिला और पुरुष दोनो के लिए ही लाभाकरी सिद्ध होगा। तुम्हारा व्रत रख के मनुष्य जिस-जिस भी चीज की कामना करेगा। उसे वह प्राप्त हो जाएगा।

गणेश भगवान को हाथी का ही मस्तक क्यों लगा.?

एक बार देवराज इंद्र किसी कार्य बस पुष्पभद्रा नदी के निकट ठहरे हुए थे। वहाँ चारों और दूर-दूर तक कोई मनुष्य नही रहता था। कुछ था तो बस सुन्दर-सुन्दर फूल और हरे-भरे वृक्ष। इन्द्रदेव वहीँ घूम रहे थे। कि तभी महर्षि दुर्वासा अपने शिष्यों के साथ वहाँ से जा रहे थे। इंद्रा देव उन्हें देखते ही नतमस्तक हो गए।

ये देखकर महर्षि दुर्वासा अत्यंत ही प्रसन्न हुए। उस समय महर्षि दुर्वासा भगवान् विष्णु से मिल कर वापस आ रहे थे। प्रभु नारायण ने महर्षि दुर्वासा को एक फूल दिया था। वही फूल उन्होंने इंद्रदेव को दे दिया और उन्हें बताया की यह फूल जिसके भी माथे पर सुशोभित होगा वह हर जगह विजयी रहेगा। संसार उसकी सबसे पहले पूजा करेगा। उसकी बुद्धि सारे संसार में सबसे तीव्र होगी। लक्ष्मी जी सदैव उनके साथ रहेंगी और उनका पराक्रम भगवान् हरी के समान ही हो जाएगा। इतना कहकर महर्षि दुर्वासा अपने शिष्यों के साथ कैलाश की और चल दिए।

उनके जाने के बाद इंद्रदेव ने वह पुष्प अपने मस्तक पर न रख अनजाने में एक बालक हाथी के ऊपर रख दिया। तभी उन्हें अपनी भुल का आभास हुआ। उसके बाद इंद्र जब स्वर्ग वापस जाने के लिए तैयार हुए तो उन्होंने उस हाथी बालक को साथ ले जाना चाहा। इंद्रदेव ने बहुत प्रयास किया उस हाथी को साथ ले जाने का परन्तु विफल रहे। क्योंकि अब वह हाथी महातेजस्वी हो चुका था। उसने इंद्र को वहीं छोड़ दिया और जंगल में आगे चला गया। उसके बाद वह जंगल के सभी जानवरों को तंग करने लगा और पेड़-पौधे उखाड़ कर फैंकने लगा।

उस पर भगवान् का आशीर्वाद आ जाने के कारण प्रभु का उसके अभिमान को खंडित करना आवश्यक था। अब जबकि वह हाथी महा तेजस्वी और महा पराक्रमी बन चुका था। ऐसे समय में उसका अस्तित्व भी बचा रहना और उसका अभिमान भी खंडित होना चाहिए था। इसलिए प्रभु श्री हरी ने उस हाथी का मस्तक उसके धड़ से अलग कर दिया। इस प्रकार उस हाथी का अभिमान खंडित हो गया। वह सिर गौरी पुत्र गणेश के धड़ पर लगा दिया गया। जिससे उसका अस्तित्व भी बचा रहा।

कैसे हुए गणपति एकदंत

एक बार परशुराम जी भगवान शंकर के दर्शन हेतु कैलाश पहुंचे। परन्तु भगवान निंद्रा में थे और द्वार पर गणेश जी थे। गणेश जी ने उन्हें रोकने का बहुत प्रयास किया। लेकिन परशुराम कुछ भी सुनने को तैयार नहीं थे। अंत में फैसला ये हुआ कि क्यों न युद्ध कर लिया जाए। जो जीतेगा वो अपनी मर्जी करेगा।

तब खूब घमासान युद्ध हुआ। अंत में कोई राह न देख परशुराम जी ने अपना परशु गणेश जी की और फेंका। ये परशु भगवान शिव से वरदान स्वरुप परशुराम को प्राप्त हुआ था। तब अपने पिता जी के कारण उस परशु का सम्मान करते हेतु गणेश जी ने वो परशु अपने बाएं दांत से पकड़ लिया।

जैसे ही उन्होंने दांत से परशु पकड़ा। उनका दांत मूल से ही उखड़ गया। तभी चारों तरफ बड़ी भारी गर्जना हुयी। शंकर जी जाग गए और पार्वती जी भी बाहर आ गयीं। जब पार्वती जी ने अपने पुत्र गणेश की हालत देखि तो वो परशुराम पर बरस पड़ीं। इस से पहले कि और कुछ होता। परशुराम जी ने गणेश जी को एकदंत लेने का और राक्षस मदासुर को मारने का वरदान देकर तथा मन ही मन भगवान् शंकर को प्रणाम किया और वहाँ से चल पड़े।

गणेश जी के आठ प्रमुख अवतार

1- वक्रतुंड

भगवान् गणेश ने ‘ वक्रतुंड ‘ अवतार में मत्ससुर का संहार किया था।

2- एकदंत

एकदंत का अवतार गणेश जी ने राक्षस मदासुर को मारने के लिया था।

3- महोदर

भगवान गणेश ने महोदर अवतार राक्षस मोहासुर का वध करने के लिए लिया था।

4- गजानन

गजानन अवतार उन्होंने सिन्दुरासुर और लोभासुर के अंत के लिए लिया था।

5- लम्बोदर

इस अवतार में उन्होंने राक्षस क्रोधासुरे को मारा था।

6- विकट

यह अवतार उन्होंने कामासुर का वध करने के लिए लिया था।

7- विघ्नराज

इस अवतार में वे माम्तासुर के संहारक बन कर आये थे।

8- धुम्रवर्ण

धुम्रवर्ण अवतार लेकर गणेश जी ने अभिमान नामक असुर का नाश किया था।

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श्री गणेश का जन्म FAQ

श्री गणेश का जन्म कैसे हुआ?

एक समय पार्वती जी को यह अहसास हुआ कि द्वार पर कोई ऐसा पहरेदार होना चाहिए जो किसी को भी अन्दर ना आने दे। बस इसी विचार से पार्वती जी ने अपनी सखियों की बात को मानते हुए मैल से एक इन्सान रूपी पुतला बनाया और उसमे जान डाल दी। विस्तार पूर्वक पढ़ें

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श्री गणेश का जन्म क्यो हुआ?

एक बार सृष्टि ने माता पार्वती के द्वारा और संपूर्ण शक्तियों से युक्त एक पार्वती पुत्र की कामना की और जिसका कारण बनाया जया और विजया नामक पार्वती की सखियों को। विस्तार पूर्वक पढ़े

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श्री गणेश और त्रिदेवो का युद्ध क्यो हुआ?

एक बार गणेश जी ने शिव जी को अन्दर जाने से रोक दिया। भगवान् शंकर ने गणेश को बहुत समझाया की उन्हें अन्दर जाने दें। लेकिन गणेश जी ने माँ की आज्ञा का पालन करते हुए शंकर जी को अन्दर न जाने दिया। यहाँ से बात इतनी बढ़ी की गणेश को मारने शिवगण और अन्य देवता आये और उसके बाद स्वयं ब्रह्मा जी और विष्णु जी आये। अंत में सब हार मान गए। फिर शंकर जी को बुलाया गया। बहुत घनघोर युद्ध हुआ लेकिन गणेश जी को कोई हरा नहीं पाया।

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गणेश जी को हाथी का ही सिर क्यो लगाया?

भगवान विष्णु ने महर्षि दुर्वासा को एक फूल दिया था। वही फूल उन्होंने इंद्रदेव को दे दिया और उन्हें बताया की यह फूल जिसके भी माथे पर सुशोभित होगा वह हर जगह विजयी रहेगा। संसार उसकी सबसे पहले पूजा करेगा। उसकी बुद्धि सारे संसार में सबसे तीव्र होगी। इंद्रदेव ने वह पुष्प अपने मस्तक पर न रख अनजाने में एक बालक हाथी के ऊपर रख दिया था। विस्तार पूर्वक पढ़ें

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कैसे हुए गणेश जी एकदंत?

एक बार परशुराम जी भगवान शंकर के दर्शन हेतु कैलाश पहुंचे। परन्तु भगवान निंद्रा में थे और द्वार पर गणेश जी थे। गणेश जी ने उन्हें रोकने का बहुत प्रयास किया। लेकिन परशुराम कुछ भी सुनने को तैयार नहीं थे। अंत में फैसला ये हुआ कि क्यों न युद्ध कर लिया जाए। उस युद्ध के दौरान गणेश जी ने परशु अपने बाएं दांत से पकड़ लिया। उनका दांत मूल से ही उखड़ गया। विस्तार पूर्वक पढ़ें

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