कालों के काल महाकाल कथा | What Is The Full Story Of Mahakaal

कालों के काल कहे जाने वाले महाकाल की शक्ति से तो सम्पूर्ण विश्व परिचित है।

महाकाल

मुख पृष्ठपोस्टज्योतिर्लिंगशिव के 12 ज्योतिर्लिंग महाकाल कथा

महाकाल

महाकाल की कथ

आप इस लेख मे पढ़ेंगे:

यह स्वंय शिवजी द्वारा माता जगदम्बा से कही गई एक पवित्र कथा है। आप भी विस्तार पूर्वक पढ़े:
शिव-शक्ति श्रीराम मिलन (संपूर्ण भाग) 🌞

शिव के 12 ज्योतिर्लिंगो मे सबसे प्रसिद्ध ज्योतिर्लिंग बाबा महाकाल का माना जाता है। वैसे तो यह शिव का तीसरा ज्योतिर्लिंग है। हिन्दू धर्म शास्त्र के अनुसार भगवान शिव को मृत्यु लोक का देवता माना जाता है, इसलिए वो अवतार न होते हुए स्वयं साक्षात ईश्वर है और कालों के काल होने के कारण उन्हें महाकाल कहा जाता है जिसका न कोई आरम्भ है न ही कोई अंत है। तब आइए शुरू करते है महाकाल कि उत्पति की कथा।

अवन्तिकायां विहि तावतारं,
मुक्ति प्रदानाय च सज्जनानाम्।
अकालमृत्योः परिरक्षणार्थं,
वन्दे महाकाल महासुरेशम॥

भावार्थ:- ‘जिन्होंने अवन्तिका नगरी (उज्जैन) में संतजनों को मोक्ष प्रदान करने के लिए अवतार धारण किया है, अकाल मृत्यु से बचने हेतु मैं उन ‘महाकाल’ नाम से सुप्रतिष्ठित भगवान आशुतोष शिव की आराधना, अर्चना, उपासना, वंदना करता हूँ।

महाकाल की उत्पत्ति

उज्जैन के राजा बाबा महाकाल की उत्पत्ति के संबंध मे पौराणिक कथाओं के अनुसार, प्राचीन काल में उज्जैन पर राजा चंद्रसेन का शासन हुआ करता था। राजा चंद्रसेन भगवान शिव के परम भक्त थे। मणिभद्र नामक गण राजा, उज्जैन के शासक चंद्रसेन के परम मित्र थे। गण राजा मणिभद्र के पास एक चिंतामणि थी। जिसको उन्होंने उज्जैन के राजा चंद्रसेन को भेट स्वरूप दे दिया था।

राजा चंद्रसेन ने मणि को प्रेम स्वरूप स्वीकार कर अपने गले में धारण कर लिया, जिसके बाद राजा चंद्रसेन की कीर्ति और यश मे अत्यंत ही वृद्घि होने लगी। राजा की कीर्ति और यश को बढ़ते देखकर अन्य राजाओं ने उस मणि को प्राप्त करने के लिए उज्जैन के राजा चंद्रसेन पर आक्रमण कर दिया। राजा चंद्रसेन ने आक्रमण से बचने के लिए भगवान शिव की शरण में जाकर ध्यानमग्न हो गए।

जब राजा चंद्रसेन ध्यानमग्न थे, तब एक माता अपने पाँच बर्ष के बच्चे को लेकर दर्शन करने आई। शिवभक्ति मे ध्यानमग्न राजा से प्रेरित होकर वह गोप बालक भी अपने घर में एकांत स्थल में बैठकर और एक पाषाण को शिवलिंग मान भक्तिभाव से भगवान शिव की भक्ति करने लगा और भक्ति में लीन हो गया। कुछ देर पश्चात उसकी माता ने भोजन के लिए उसे बुलाया किन्तु वह नहीं आया। जब माता के बार-बार भोजन के लिए बुलाने पर भी बालक शिवभक्ति मे ही लीन रहता है और माता के पास नहीं जाता है। तब माता क्रोधित हो कर बालक को पीट देती है और पूजन की सारी साम्रागी बाहर फेंक देती है।

पृथ्वी के गर्भ से महाकाल का प्रकट होना

अपनी माता का क्रोध देख गोप बालक जोर-जोर से रोने लगा और भगवान शिव का नाम पुकारते हुए वही पर बेहोश हो गया। मात्र पांच वर्ष के गोप बालक की श्रद्धा-भक्ति देख कर भगवान शिव प्रसन्न होते है। और उसी क्षण एक भयंकर विस्फोट के साथ पृथ्वी के गर्भ से महाकाल प्रकट होते है। तभी उस गोप बालक को होश आता है, और वह बालक देखता है कि, उसके सामने एक विशालकाय स्वर्ण और रत्नों से जणित मंदिर खड़ा था। जिसमें अत्यधिक प्रकाशवान ज्योतिर्लिंग स्थापित था। यह देख बालक बहुत खुश होता है और भगवान शिव की भक्ति में मगन हो जाता है।

श्री हनुमानजी का अवतरित होना

यह सब देख कर माता को अपने किये पर पश्चाताप होता है और अपनी गलती की क्षमा मांगते हुए बालक को गले से लगा लेती है। राजा चंद्रसेन को जब शिवजी की अनन्य कृपा से घटित इस घटना की जानकारी मिली तो वह भी उस शिवभक्त बालक से मिलने पहुँचा। अन्य राजा जो मणि हेतु युद्ध पर उतारू थे, वह भी वहॉं पहुँचे। सभी ने राजा चंद्रसेन से अपने अपराध की क्षमा माँगी और सब मिलकर भगवान महाकाल का पूजन-अर्चन करने लगे। तभी वहाँ रामभक्त श्री हनुमानजी अवतरित हुए और उन्होंने गोप बालक को गोद में बैठाकर सभी राजाओं और उपस्थित जनसमुदाय को संबोधित किया। 

ऋते शिवं नान्यतमा गतिरस्ति शरीरिणाम्।
एवं गोप सुतो दिष्टया शिवपूजां विलोक्य च,
अमन्त्रेणापि सम्पूज्य शिवं शिवम् वाप्तवान्॥
एष भक्तवरः शम्भोर्गोपानां कीर्तिवर्द्धनः।
इह भुक्तवा खिलान् भोगानन्ते मोक्षमवाप्स्यति॥
अस्य वंशेऽष्टमभावी नंदो नाम महायशाः।
प्राप्स्यते तस्यस पुत्रत्वं कृष्णो नारायणः स्वयम्॥

भावार्थ:- ‘शिव के अतिरिक्त प्राणियों की कोई गति नहीं है। इस गोप बालक ने अन्यत्र शिव पूजा को मात्र देखकर ही, बिना किसी मंत्र अथवा विधि-विधान के शिव आराधना कर शिवत्व-सर्वविध, मंगल को प्राप्त किया है। यह शिव का परम श्रेष्ठ भक्त समस्त गोपजनों की कीर्ति बढ़ाने वाला है। इस लोक में यह अखिल अनंत सुखों को प्राप्त करेगा व मृत्योपरांत मोक्ष को प्राप्त होगा। इसी के वंश का आठवाँ पुरुष महायशस्वी ‘नंद’ होगा जिसके पुत्र के रूप में स्वयं नारायण ‘कृष्ण’ नाम से प्रतिष्ठित होंगे। 

वही जैसे-जैसे यह बात लोगों को पता चली तो मंदिर के दर्शन के लिए लोगों की भीड़ उमड़ आई है जो आज तक बाबा महाकाल के मंदिर मे बनी हुई है।

अवंतिकावासियों का महाकाल से अनुरोध

पौराणिक कथा और बाबा महाकाल की उत्पत्ति के संबंध मे शिवपुराण की कोटि-रुद्र संहिता के 16वें अध्याय में तृतीय ज्योतिर्लिंग बाबा महाकाल के संबंध मे सूतजी द्वारा महाकाल की उत्पत्ति के संबंध मे एक कथा का विस्तार पूर्वक वर्णन किया गया है।

कथा के अनुसार, प्राचीन काल मे एक अवंतिका नामक एक रमणीय नगर था। इसी नगर मे एक बहुत ही ज्ञानी ब्राह्मण रहते थे। जो वेदों के ज्ञाता होने के कारण उन्हें वेदप्रिय के नाम से भी जाना जाता था। वेदप्रिय एक ज्ञानी और कर्मकांडी ब्राह्मण था और उनके चार पुत्र थे। वेदप्रिय भगवान शिव के परम भक्त थे। वह प्रति दिन भगवान शंकर के पार्थिक शिवलिंग का निर्माण कर के उनकी आरधना किया करते थे।

उन दिनों रत्नमाल पर्वत पर दूषण नामक एक राक्षस रहता था। उसने ब्राहाजी से वरदान प्राप्त कर समस्त मनुष्यो के धार्मिक कार्यो मे विघ्न डालने की कोशिश किया करता था। दूषण ने अवंतिकावासियो को धार्मिक कार्यो को न करने की बात कही परन्तु अवंतिकावासियो ने उसकी आज्ञा का उल्लंघन किया। जिससे क्रोधित होकर अवंतिकावासियो पर दूषण ने अपनी सेना के साथ आक्रमण कर दिया। तब वेदप्रिय ने भगवान शंकर के पार्थिक शिवलिंग की शरण मे जा कर। समस्त अवंतिकावासियो की रक्षा के लिए प्रार्थना किया। 

भगवान शिव का महाकाल रूप

तब पार्थिव शिवलिंग काल के गर्भ अर्थात् पृथ्वी के गर्भ मे समा गया और वहीं पृथ्वी के गर्भ से महाकाल का उदय हुआ। विकट रूप धारी भगवान शिव ने अवंतिकावासियो को आश्वस्त किया और एक गगनभेदी हुंकार भरी, ‘मैं दुष्टों का संहारक महाकाल हूँ।’ और ऐसा कहकर उन्होंने उसी क्षण दूषण व उसकी हिंसक सेना को भस्म कर दिया। तत्पश्चात भगवान शिव ने अवंतिकावासियो को वरदान मांगने को कहा, तब अवंतिकावासियो ने भगवान से सदैव रक्षा का वरदान मागा। और ने प्रार्थना किया-

‘महाकाल, महादेव! दुष्ट दंड कर प्रभो,
मुक्ति प्रयच्छ नः शम्भो संसाराम्बुधितः शिव।
अत्रैव् लोक रक्षार्थं स्थातव्यं हि त्वया शिव,
स्वदर्श कान् नरांछम्भो तारय त्वं सदा प्रभो॥

भावार्थ:- हे महाकाल, महादेव, दुष्टों को दंडित करने वाले प्रभु! आप हमें संसार रूपी सागर से मुक्ति प्रदान कीजिए, जनकल्याण एवं जनरक्षा हेतु इसी स्थान पर निवास कीजिए एवं अपने (इस स्वयं स्थापित स्वरूप के) दर्शन करने वाले मनुष्यों को अक्षय पुण्य प्रदान कर उनका उद्धार कीजिए।

महाकाल का विराजमान होना

तब भगवान शिव अवंतिकावासियो के अनुरोध पर सदा के लिए अवंतिका मे बाबा महाकाल के सुंदर स्वरुप मे विराजमान हो गए। हमारे प्राचीन ग्रंथों में महाकाल की असीम महिमा का वर्णन मिलता है। महाकाल साक्षात राजाधिराज देवता माने गए हैं। महाशिवरात्रि के दिन समूचा शहर शिवमय हो जाता है। चारों ओर बस शिव जी का ही गुंजन सुनाई देता है। सारा शहर बाराती बन शिवविवाह में शामिल होता है। अगले दिन अमावस्या को सेहरे के अत्यंत आकर्षक दर्शन होते हैं। नयनाभिराम साजसज्जा के बीच एक उत्सव धूमधाम से संपन्न होता है। भगवान शिव की यह नगरी भक्ति रस में आकंठ डूबी नजर आती है।

महाकाल

मुख पृष्ठ

महाकाल

बाबा महाकाल की कथा FAQ?

महाकाल का जन्म कब हुआ था?

महाकाल की उत्पत्ति द्वापर युग में हुई थी क्योंकि रामभक्त श्री हनुमानजी स्वयं कहॉं था कि गोप बालक के वंश का आठवाँ पुरुष महायशस्वी ‘नंद’ होगा जिसके पुत्र के रूप में स्वयं नारायण ‘कृष्ण’ नाम से प्रतिष्ठित होंगे। इसी कारण महाकाल की उत्पत्ति के संबंध मे कहा जाता है कि महाकाल की उत्पत्ति द्वापर युग में नंद जी की आठ पीढ़ी पहले हुई थी। विस्तार पूर्वक पढ़े..

कालों के काल महाकाल कथा | What Is The Full Story Of Mahakaal

महाकाल की कथा क्या है?

उज्जैन के राजा बाबा महाकाल की उत्पत्ति के संबंध मे पौराणिक कथाओं के अनुसार, प्राचीन काल में उज्जैन पर राजा चंद्रसेन का शासन हुआ करता था। राजा चंद्रसेन भगवान शिव के परम भक्त थे। विस्तार पूर्वक पढ़े..

कालों के काल महाकाल कथा | What Is The Full Story Of Mahakaal

महाकाल कौन से देवता है?

हिन्दू धर्म के अनुसार भगवान शिव को मृत्यु लोक के देवता माना जाता है, इसलिए वो अवतार न होते हुए स्वयं साक्षात ईश्वर है और कालों के काल होने के कारण उन्हें महाकाल कहा जाता है जिसका न आरम्भ है न ही अंत है। विस्तार पूर्वक पढ़े..

कालों के काल महाकाल कथा | What Is The Full Story Of Mahakaal

महाकाल कैसे प्रकट हुए?

राक्षस के अत्याचारों से पीड़ित होकर अवंतिकावासियो ने भगवान शिव का आह्वान किया, तब उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव धरती फाड़कर महाकाल के रूप में प्रकट हुए और एक गगनभेदी हुंकार भरी, ‘मैं दुष्टों का संहारक महाकाल हूँ।’ और ऐसा कहकर उन्होंने उसी क्षण दूषण व उसकी हिंसक सेना को भस्म कर दिया। कहते हैं प्रजा की भक्ति और उनके अनुरोध को देखते हुए भगवान शिव हमेशा के लिए ज्योतिर्लिंग के रूप में उज्जैन में विराजमान हो गए। विस्तार पूर्वक पढे..

कालों के काल महाकाल कथा | What Is The Full Story Of Mahakaal

तीसरा ज्योतिर्लिंग कौन सा है?

शिव के 12 ज्योतिर्लिंगो मे सबसे प्रसिद्ध ज्योतिर्लिंग बाबा महाकाल का माना जाता है। वैसे तो यह शिव का तीसरा ज्योतिर्लिंग है। हिन्दू धर्म शास्त्र के अनुसार भगवान शिव को मृत्यु लोक का देवता माना जाता है। विस्तार पूर्वक पढ़े..

कालों के काल महाकाल कथा | What Is The Full Story Of Mahakaal

महाकाल का अर्थ क्या है?

हिन्दू धर्म शास्त्र के अनुसार भगवान शिव को मृत्यु लोक का देवता माना जाता है, इसलिए वो अवतार न होते हुए स्वयं साक्षात ईश्वर है और कालों के काल होने के कारण उन्हें महाकाल कहा जाता है जिसका न कोई आरम्भ है न ही कोई अंत है। विस्तार पूर्वक पढ़े..

कालों के काल महाकाल कथा | What Is The Full Story Of Mahakaal

MNSPandit

चलो चले संस्कृति और संस्कार के साथ

4 thoughts on “कालों के काल महाकाल कथा | What Is The Full Story Of Mahakaal

अपना बिचार व्यक्त करें।

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.