श्री भीमेश्वर कथा| What Is The Full Story Of Shri Bhimeshwar

राक्षस भीम को जलाकर भस्म करने वाले इश्वर, श्री भीमेश्वर कथा

श्री भीमेश्वर

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श्री भीमेश्वर

श्री भीमेश्वर कथा

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यह स्वंय शिवजी द्वारा माता जगदम्बा से कही गई एक पवित्र कथा है। आप भी विस्तार पूर्वक पढ़े:
शिव-शक्ति श्रीराम मिलन (संपूर्ण भाग) 🌞

श्री भीमेश्वर ज्योतिर्लिंग का वर्णन

यह ज्योतिर्लिंग मुंबई-पूना मार्ग से लगभग 100 किलोमीटर दूर सह्याद्रि पर्वत पर स्थित है। यहीं से भीमा नदी भी निकलती है। यह दक्षिण पश्चिम दिशा में बहती हुई रायचूर जिले में कृष्णा नदी से जा मिलती है। यहाँ भगवान शिव का प्रसिद्ध ज्योतिर्लिंग है। इसे भीमाशंकर भी कहते हैं। यह शिव के 12 ज्योतिर्लिंगो मे छठा ज्योतिर्लिंग जो भीमेश्वर ज्योतिर्लिंग के नाम से विख्यात है महाराष्ट्र राज्य ऐसा है जहाँ तीन ज्योतिर्लिंग हैं।

ज्योतिर्लिंग स्थापना कथा

कुंभकर्ण का पुत्र भीभ

श्री भीमेश्वर ज्योतिर्लिंग स्थापना के विषय में शिवपुराण में यह कथा वर्णित है- प्राचीनकाल में भीम नाम का एक महाप्रतापी राक्षस था। वह कामरूप प्रदेश में अपनी माँ के साथ रहता था। वह महाबली राक्षस, राक्षसराज रावण के छोटे भाई कुंभकर्ण का पुत्र था। लेकिन उसने अपने पिता को कभी नही देखा था।

उसके होश संभालने के पूर्व ही भगवान श्रीराम के द्वारा कुंभकर्ण का वध कर दिया गया था। जब वह युवावस्था को प्राप्त हुआ तब उसने अपने पिता के विषय मे जानना चाहा, तब उसकी माता ने उससे सारी बातें बताईं। भगवान विष्णु के अवतार श्रीरामचंद्रजी द्वारा अपने पिता के वध की बात सुनकर वह महाबली राक्षस अत्यंत संतप्त और क्रुद्ध हो उठा। अब वह निरंतर भगवान श्री हरि के वध का उपाय सोचने लगा।

भीम का एक हजार वर्ष तक तपस्या

उसने अपने अभीष्ट की प्राप्ति के लिए ब्रह्माजी की एक हजार वर्षो तक कठिन तपस्या की। उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्माजी ने उसे लोक विजयी होने का वर दे दिया। अब तो वह राक्षस ब्रह्माजी के उस वरदान के प्रभाव से सारे प्राणियों को पीड़ित करने लगा। उसने देवलोक पर आक्रमण करके इंद्र आदि सारे देवताओं को वहॉं से बाहर निकाल दिया।

देवलोक पर भीम का अधिकार करना

पूरे देवलोक पर अब भीम का अधिकार हो गया था। इसके बाद उसने भगवान श्रीहरि को भी युद्ध में परास्त किया। श्रीहरि को पराजित करने के पश्चात उसने कामरूप के परम शिवभक्त राजा सुदक्षिण पर आक्रमण करके उन्हें मंत्रियों- अनुचरों सहित सभी को बंदी बना लिया।

इस प्रकार धीरे-धीरे उसने सारे लोकों पर अपना अधिकार जमा लिया। उसके अत्याचार से वेदों, पुराणों, शास्त्रों और स्मृतियों का सर्वत्र एकदम लोप हो गया। वह किसी को कोई भी धार्मिक कृत्य नहीं करने देता था। इस प्रकार यज्ञ, दान, तप, स्वाध्याय आदि के सारे काम एकदम से रूक गए थे।

ऋषि-मुनि, देवगण का भगवान शिव की शरण में जाना

भीम के अत्याचार की भीषणता से घबराकर ऋषि-मुनि और देवगण भगवान शिव की शरण में गए और उनसे अपना तथा अन्य सारे प्राणियों का दुःख कह सुनाया। उनकी यह प्रार्थना सुनकर भगवान शिव ने कहा, ‘मैं शीघ्र ही उस अत्याचारी राक्षस का संहार करूँगा।

उसने मेरे प्रिय भक्त, कामरूप- नरेश सुदक्षिण को भी सेवकों सहित बंदी बना लिया है। वह अत्याचारी असुर अब और अधिक जीवित रहने का अधिकारी नहीं रह गया है।’ भगवान शिव से यह आश्वासन पाकर ऋषि-मुनि और देवगण अपने-अपने स्थान को वापस लौट गए।

भीम का तलवार से शिवलिंग पर प्रहार

इधर राक्षस भीम के बंदीगृह में पड़े हुए राजा सदक्षिण ने भगवान शिव का ध्यान किया। वे अपने सामने पार्थिव शिवलिंग रखकर अर्चना कर रहे थे। उन्हें ऐसा करते देख क्रोधोन्मत्त होकर राक्षस भीम ने अपनी तलवार से उस पार्थिव शिवलिंग पर प्रहार किया। किंतु उसकी तलवार का स्पर्श उस लिंग से हो भी नहीं पाया कि उसके भीतर से एक भयंकर विस्फोट हुआ और साक्षात्‌ शिवजी वहाँ प्रकट हो गए। उन्होंने अपनी हुंकारमात्र से उस राक्षस को वहीं जलाकर भस्म कर दिया।

लोक-कल्याणार्थ हेतु ज्योतिर्लिंग का स्थापित होना

भगवान शिवजी का यह अद्भुत कृत्य देखकर सारे ऋषि-मुनि और देवगण वहाँ एक होकर उनकी स्तुति करने लगे। उन लोगों ने भगवान शिव से प्रार्थना की, कि हे महादेव! आप लोक-कल्याणार्थ अब सदा के लिए यहीं निवास करें। यह क्षेत्र शास्त्रों में अपवित्र बताया गया है। आपके निवास से यह परम पवित्र पुण्य क्षेत्र बन जाएगा। तब भगवान शिव ने सबकी यह प्रार्थना स्वीकार कर ली। और वहाँ वह ज्योतिर्लिंग के रूप में सदा के लिए निवास करने लगे। उनका यह ज्योतिर्लिंग भीमेश्वर के नाम से विख्यात हुआ।

श्री भीमेश्वर ज्योतिर्लिंग की मान्यता

शिवपुराण में ऐसी मान्यता है कि जो भक्त श्रद्वा से इस मंदिर के प्रतिदिन सुबह सूर्य निकलने के बाद 12 ज्योतिर्लिगों का नाम जापते हुए इस मंदिर के दर्शन करता है, उसके सात जन्मों के पाप दूर होते हैं तथा उसके लिए स्वर्ग के मार्ग खुल जाते हैं। इस ज्योतिर्लिंग की महिमा अमोघ है। इसके दर्शन का फल कभी व्यर्थ नहीं जाता। भक्तों की सभी मनोकामनाएं यहां आकर पूर्ण हो जाती हैं।

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श्री भीमेश्वर ज्योतिर्लिंग FAQ?

श्री भीमेश्वर ज्योतिर्लिंग कहाँ स्थापित है?

यह ज्योतिर्लिंग मुंबई-पूना मार्ग से लगभग 100 किलोमीटर दूर सह्याद्रि पर्वत पर स्थित है। यहीं से भीमा नदी भी निकलती है। यह दक्षिण पश्चिम दिशा में बहती हुई रायचूर जिले में कृष्णा नदी से जा मिलती है। यहाँ भगवान शिव का प्रसिद्ध ज्योतिर्लिंग है। इसे भीमाशंकर भी कहते हैं। महाराष्ट्र राज्य ऐसा है जहाँ तीन ज्योतिर्लिंग हैं। विस्तार पूर्वक पढ़े..

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कुंभकर्ण का पुत्र कौन था?

प्राचीनकाल में भीम नामक एक महाप्रतापी राक्षस था। वह कामरूप प्रदेश में अपनी मां के साथ रहता था। वह महाबली राक्षस, राक्षसराज रावण के छोटे भाई कुंभकर्ण का पुत्र था। विस्तार पूर्वक पढ़े..

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भीम ने तलवार से शिवलिंग पर क्यों प्रहार किया?

भीम के बंदीगृह में पड़े हुए राजा सदक्षिण ने भगवान शिव का ध्यान किया। वे अपने सामने पार्थिव शिवलिंग रखकर अर्चना कर रहे थे। उन्हें ऐसा करते देख क्रोधोन्मत्त होकर राक्षस भीम ने अपनी तलवार से उस पार्थिव शिवलिंग पर प्रहार किया। किंतु उसकी तलवार का स्पर्श उस लिंग से हो भी नहीं पाया कि उसके भीतर से साक्षात्‌ शिवजी वहाँ प्रकट हो गए। विस्तार पूर्वक पढ़े..

श्री भीमेश्वर कथा| What Is The Full Story Of Shri Bhimeshwar

श्री भीमेश्वर ज्योतिर्लिंग की क्या मान्यता है?

शिवपुराण में ऐसी मान्यता है कि जो भक्त श्रद्वा से इस मंदिर के प्रतिदिन सुबह सूर्य निकलने के बाद 12 ज्योतिर्लिगों का नाम जापते हुए इस मंदिर के दर्शन करता है, उसके सात जन्मों के पाप दूर होते हैं तथा उसके लिए स्वर्ग के मार्ग खुल जाते हैं। इस ज्योतिर्लिंग की महिमा अमोघ है। इसके दर्शन का फल कभी व्यर्थ नहीं जाता। भक्तों की सभी मनोकामनाएं यहाँ आकर पूर्ण हो जाती हैं। विस्तार पूर्वक पढ़े..

श्री भीमेश्वर कथा| What Is The Full Story Of Shri Bhimeshwar

छठा ज्योतिर्लिंग कौन सा है?

यह भगवान शिव का प्रसिद्ध ज्योतिर्लिंग है। इसे भीमाशंकर भी कहते हैं। यह शिव के 12 ज्योतिर्लिंगो मे छठा ज्योतिर्लिंग जो भीमेश्वर ज्योतिर्लिंग के नाम से विख्यात है। विस्तार पूर्वक पढ़े..

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