श्री घुश्मेश्वर |What Is The Full Story Of Shri Ghushmeshwar

घुश्मा के इश्वर श्री घुश्मेश्वर ज्योर्तिलिंग कथा

श्री घुश्मेश्वर

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श्री घुश्मेश्वर

श्री घुश्मेश्वर कथा

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यह स्वंय शिवजी द्वारा माता जगदम्बा से कही गई एक पवित्र कथा है। आप भी विस्तार पूर्वक पढ़े:
शिव-शक्ति श्रीराम मिलन (संपूर्ण भाग) 🌞

श्री घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग स्तोत्र

इलापुरे रम्यविशालकेऽस्मिन्समुल्लसन्तं च जगद्वरेण्यम्।
वन्दे महोदारतरस्वभावंघृष्णेश्वराख्यं शरणम् प्रपद्ये॥


भावार्थ:- जो इलापुर के सुरम्य मन्दिरमें विराजमान होकर समस्त जगत के आराधनीय हो रहे हैं, जिनका स्वभाव बड़ा ही उदार है, उन घृष्णेश्वर नामक ज्योतिर्मय भगवान शिव की शरण में मैं जाता हूँ॥

श्री घुश्मेश्वर ज्योर्तिलिंग वर्णन

भगवान शिव के 12 ज्योर्तिलिंग देश के अलग-अलग भागों में स्थित हैं। इन्हें द्वादश ज्योर्तिलिंग के नाम से जाना जाता है। इन ज्योर्तिलिंग के दर्शन, पूजन, आराधना से भक्तों के जन्म-जन्मांतर के सारे पाप समाप्त हो जाते हैं। वे भगवान शिव की कृपा के पात्र बनते हैं। ऐसे कल्याणकारी ज्योर्तिलिंगों में श्री घुश्मेश्वर ज्योर्तिलिंग एक प्रमुख ज्योर्तिलिंग माना जाता है। द्वादश ज्योर्तिलिंगों में यह अंतिम ज्योर्तिलिंग है। इसे घुश्मेश्वर, घुसृणेश्वर या घृष्णेश्वर भी कहा जाता है। यह महाराष्ट्र प्रदेश में दौलताबाद से बारह मील दूर वेरुळ गाँव के पास स्थित है।

शिवपुराण में ज्योतिर्लिंग कथा

शिवपुराण के कोटिरुद्रसंहिता खंड के अध्याय 32, 33 में श्री घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग के प्रादुर्भाव की कथा और उसकी महिमा दी गयी है।
सूतजी कहते हैं–
अब मैं घुश्मेश्वर नामक ज्योतिर्लिंग के प्रादुर्भाव का और उसके माहात्म्य का वर्णन करूँगा।

मुनिवरो! ध्यान देकर सुनो- दक्षिण देश में देवगिरिपर्वत के निकट सुधर्मा नामक एक अत्यंत तेजस्वी तपोनिष्ट ब्राह्मण रहता था। उसकी पत्नी का नाम सुदेहा था दोनों में परस्पर बहुत प्रेम था। किसी प्रकार का कोई कष्ट उन्हें नहीं था। लेकिन उन्हें कोई संतान नहीं थी। ज्योतिष गणना से पता चला कि सुदेहा के गर्भ से संतानोत्पत्ति हो ही नहीं सकती। सुदेहा संतान की बहुत ही इच्छुक थी। उसने सुधर्मा से अपनी छोटी बहन से दूसरा विवाह करने का आग्रह किया।

सुधर्मा का घुश्मा से ब्याह

पहले तो सुधर्मा को यह बात नहीं जँची। लेकिन अंत में उन्हें पत्नी की जिद के आगे झुकना ही पड़ा। वे उसका आग्रह टाल नहीं पाए। वे अपनी पत्नी की छोटी बहन घुश्मा को ब्याह कर घर ले आए। घुश्मा अत्यंत विनीत और सदाचारिणी स्त्री थी। वह भगवान्‌ शिव की अनन्य भक्ता थी। प्रतिदिन एक सौ एक पार्थिव शिवलिंग बनाकर हृदय की सच्ची निष्ठा के साथ उनका पूजन करती थी।

सुधर्मा के मन मे कुविचार आना

भगवान शिवजी की कृपा से थोड़े ही दिन बाद उसके गर्भ से अत्यंत सुंदर और स्वस्थ बालक ने जन्म लिया। बच्चे के जन्म से सुदेहा और घुश्मा दोनों के ही आनंद का पार न रहा। दोनों के दिन बड़े आराम से बीत रहे थे। लेकिन न जाने कैसे थोड़े ही दिनों बाद सुदेहा के मन में एक कुविचार ने जन्म ले लिया। वह सोचने लगी, मेरा तो इस घर में कुछ है नहीं। सब कुछ घुश्मा का है।

घुश्मा के युवा पुत्र को मार डालना

मेरे पति पर भी उसने अधिकार जमा लिया। संतान भी उसी की है। यह कुविचार धीरे-धीरे उसके मन में बढ़ने लगा। इधर घुश्मा का वह बालक भी बड़ा हो रहा था। धीरे-धीरे वह जवान हो गया। उसका विवाह भी हो गया। अब तक सुधर्मा के मन का कुविचार रूपी अंकुर एक विशाल वृक्ष का रूप ले चुका था। अंततः एक दिन उसने घुश्मा के युवा पुत्र को रात में सोते समय मार डाला। उसके शव को ले जाकर उसने उसी तालाब में फेंक दिया जिसमें घुश्मा प्रतिदिन पार्थिव शिवलिंगों को फेंका करती थी।

जब सुबह हुई तो पूरे घर में कोहराम मच गया। घुश्मा और उसकी बहू फूट-फूटकर रोने लगे। लेकिन घुश्मा ने शिव में अपनी आस्था नहीं छोड़ी। उसने हर दिन की तरह ही इस दिन भी शिव की भक्ति की। पूजा समाप्त होने के बाद जब वो पार्थिव शिवलिंगों को फेंकने तालाब पर गई तो उसका बेटा तालाब के अंदर से निकलकर आता हुआ दिखाई पड़ा। बाहर आकर वो हमेशा की तरह घुश्मा के चरणों पर गिर पड़ा।

भगवान शिव का प्रकट होना

जैसे कहीं आस-पास से ही घूमकर आ रहा हो। इसी समय भगवान्‌ शिव भी वहां प्रकट होकर घुश्मा से वर मांगने को कहने लगे। वह सुदेहा की घनौनी करतूत से अत्यंत क्रुद्ध हो उठे थे। अपने त्रिशूल द्वारा उसका गला काटने को उद्यत दिखलाई दे रहे थे। घुश्मा ने हाथ जोड़कर भगवान्‌ शिव से कहा- ‘प्रभो! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो मेरी उस अभागिन बहन को क्षमा कर दें। निश्चित ही उसने अत्यंत जघन्य पाप किया है किंतु आपकी दया से मुझे मेरा पुत्र वापस मिल गया। अब आप उसे क्षमा करें और प्रभो!

शिव का ज्योतिर्लिंग के रूप में स्थापित होना

मेरी एक प्रार्थना और है, लोक-कल्याण के लिए आप इस स्थान पर सर्वदा के लिए निवास करें।’ भगवान्‌ शिव ने उसकी ये दोनों बातें स्वीकार कर लीं। ज्योतिर्लिंग के रूप में स्थापित होकर वह वहीं निवास करने लगे। सती शिवभक्त घुश्मा के इश्वर (आराध्य) होने के कारण वे यहाँ घुश्मेश्वर महादेव के नाम से विख्यात हुए।

श्री घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग की महिमा

मुनीश्वरो! इस प्रकार वह घुश्मेश्वर लिंग प्रकट हुआ। घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग की महिमा पुराणों में बहुत विस्तार से वर्णित की गई है। उसका दर्शन और पूजन करने से सदा सुख की वृद्धि होती है।

ब्राह्मणो! इस तरह मैंने तुमसे बारह ज्योतिर्लिंगों की महिमा बतायी। ये सभी लिंग सम्पूर्ण कामनाओं के पूरक तथा भोग और मोक्ष देने वाले हैं। जो इन ज्योतिर्लिंगों की कथा को पढ़ता और सुनता है, वह सब पापों से मुक्त हो जाता तथा भोग और मोक्ष पाता है। इनका दर्शन लोक-परलोक दोनों के लिए अमोघ फलदाई है।

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श्री घुश्मेश्वर FAQ?

घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग कहाँ स्थित है?

12 ज्योर्तिलिंगों में श्री घुश्मेश्वर ज्योर्तिलिंग एक प्रमुख ज्योर्तिलिंग माना जाता है। द्वादश ज्योर्तिलिंगों में यह अंतिम ज्योर्तिलिंग है। इसे घुश्मेश्वर, घुसृणेश्वर या घृष्णेश्वर भी कहा जाता है। यह महाराष्ट्र प्रदेश में दौलताबाद से बारह मील दूर वेरुळ गाँव के पास स्थित है। विस्तार पूर्वक पढ़े..

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घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग की क्या महिमा है?

घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग की महिमा पुराणों में बहुत विस्तार से वर्णित की गई है। उसका दर्शन और पूजन करने से सदा सुख की वृद्धि होती है। सब पापों से मुक्त हो जाता तथा भोग और मोक्ष पाता है। इनका दर्शन लोक-परलोक दोनों के लिए अमोघ फलदाई है। विस्तार पूर्वक पढ़े..

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घुश्मेश्वर का अर्थ क्या है?

सती शिवभक्त घुश्मा के इश्वर (आराध्य) होने के कारण वे यहाँ घुश्मेश्वर महादेव के नाम से विख्यात हुए। विस्तार पूर्वक पढ़े..

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बारहवाँ ज्योतिर्लिंग कौन सा है?

श्री घुश्मेश्वर ज्योर्तिलिंग एक प्रमुख ज्योर्तिलिंग माना जाता है। द्वादश (बारहवाँ) ज्योर्तिलिंगों में यह अंतिम ज्योर्तिलिंग है। इसे घुश्मेश्वर, घुसृणेश्वर या घृष्णेश्वर भी कहा जाता है। विस्तार पूर्वक पढ़े..

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