वाल्मीकि रामायण- बालकाण्ड सर्ग- १४

महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण- बालकाण्ड सर्ग- १४ भावार्थ सहित

बालकाण्ड सर्ग- १४

॥ श्री गणेशाय नमः ॥
॥ श्री कमलापति नम: ॥
॥ श्री जानकीवल्लभो विजयते ॥
॥ श्री वाल्मीकि रामायण ॥
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यह स्वंय शिवजी द्वारा माता जगदम्बा से कही गई एक पवित्र कथा है। आप भी विस्तार पूर्वक पढ़े:
शिव-शक्ति श्रीराम मिलन (संपूर्ण भाग) 🌞

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बालकाण्ड सर्ग- १४

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बालकाण्ड सर्ग- १४
बालकाण्ड सर्ग- १४

वाल्मीकि रामायण
(भावार्थ सहित)
सब एक ही स्थान पर

बालकाण्ड सर्ग- १४

बालकाण्डम्
चतुर्दशः सर्गः (सर्ग 14)

( महाराज दशरथ के द्वारा अश्वमेध यज्ञ का सांगोपांग अनुष्ठान )

श्लोक:
अथ संवत्सरे पूर्णे तस्मिन् प्राप्ते तुरंगमे।
सरय्वाश्चोत्तरे तीरे राज्ञो यज्ञोऽभ्यवर्तत॥१॥

भावार्थ :-
इधर वर्ष पूरा होने पर यज्ञसम्बन्धी अश्व भूमण्डल में भ्रमण करके लौट अया। फिर सरयू नदी के उत्तर तट पर राजा का यज्ञ आरम्भ हुआ॥१॥

श्लोक:
ऋष्यशृंगं पुरस्कृत्य कर्म चक्रुर्दिजर्षभाः।
अश्वमेधे महायज्ञे राज्ञोऽस्य सुमहात्मनः॥२॥

भावार्थ :-
महामनस्वी राजा दशरथ के उस अश्वमेध नामक महायज्ञ में ऋष्यशृंग को आगे करके श्रेष्ठ ब्राह्मण यज्ञ सम्बन्धी कर्म करने लगे॥२॥

श्लोक:
कर्म कुर्वन्ति विधिवद् याजका वेदपारगाः।
यथाविधि यथान्यायं परिक्रामन्ति शास्त्रतः॥३॥

भावार्थ :-
यज्ञ कराने वाले सभी ब्राह्मण वेदों के पारंगत विद्वान् थे; अतः वे न्याय तथा विधि के अनुसार सब कर्मों का उचित रीति से सम्पादन करते थे और शास्त्र के अनुसार किस क्रम से किस समय कौन-सी क्रिया करनी चाहिये, इसको स्मरण रखते हुए प्रत्येक कर्म में प्रवृत्त होते थे॥३॥

श्लोक:
प्रवर्दी शास्त्रतः कृत्वा तथैवोपसदं द्विजाः।
चक्रुश्च विधिवत् सर्वमधिकं कर्म शास्त्रतः॥४॥

भावार्थ :-
ब्राह्मणों ने प्रवर्दी (अश्वमेध के अंगभूत कर्म विशेष) का शास्त्र (विधि, मीमांसा और कल्पसूत्र) के अनुसार सम्पादन करके उपसद नामक इष्टि विशेष का भी शास्त्र के अनुसार ही अनुष्ठान किया। तत्पश्चात् शास्त्रीय उपदेश से अधिक जो अतिदेशतः प्राप्त कर्म है, उस सबका भी विधिवत् सम्पादन किया॥४॥

श्लोक:
अभिपूज्य तदा हृष्टाः सर्वे चक्रुर्यथाविधि।
प्रातःसवनपूर्वाणि कर्माणि मुनिपुंगवाः॥५॥

भावार्थ :-
तदनन्तर तत्तत् कर्मो के अंगभूत देवताओं का पूजन करके हर्ष में भरे हुए उन सभी मुनिवरों ने विधिपूर्वक प्रातःसवन आदि (अर्थात् प्रातः सवन, माध्यन्दिनसवन तथा तृतीय सवन) कर्म किये॥५॥

श्लोक:
ऐन्द्रश्च विधिवद् दत्तो राजा चाभिषुतोऽनघः।
माध्यन्दिनं च सवनं प्रावर्तत यथाक्रमम्॥६॥

भावार्थ :-
इन्द्रदेवता को विधि पूर्वक हविष्य का भाग अर्पित किया गया। पापनिवर्तक राजा सोम (सोमलता)* का रस निकाला गया। फिर क्रमशः माध्यन्दिनसवन का कार्य प्रारम्भ हुआ॥६॥

* इस विषय में सूत्रकार का वचन है- सोमं राजानं दृषदि निधाय… दृषद्भिरभिहन्यात् अर्थात् ‘राजा सोम (सोमलता) को पत्थर पर रखकर पत्थर से कूँचे।

श्लोक:
तृतीयसवनं चैव राज्ञोऽस्य सुमहात्मनः।
चक्रुस्ते शास्त्रतो दृष्ट्वा यथा ब्राह्मणपुंगवाः॥७॥

भावार्थ :-
तत्पश्चात् उन श्रेष्ठ ब्राह्मणों ने शास्त्र से देखभाल कर मनस्वी राजा दशरथ के तृतीय सवनकर्म का भी विधिवत् सम्पादन किया॥७॥

श्लोक:
आह्वयाञ्चक्रिरे तत्र शक्रादीन्विबुधोत्तमान्।
ऋष्यशृंगादयो मन्त्रैः शिक्षाक्षरसमन्वितैः॥८॥

भावार्थ :-
ऋष्यशृंग आदि महर्षियों ने वहाँ अभ्यास काल में सीखे गये अक्षरों से युक्त-स्वर और वर्ण से सम्पन्न मन्त्रों द्वारा इन्द्र आदि श्रेष्ठ देवताओं का आवाहन किया॥८॥

श्लोक:
गीतिभिर्मधुरैः स्निग्धैर्मन्त्राह्वानैर्यथार्हतः।
होतारो ददुरावाह्य हविर्भागान् दिवौकसाम्॥९॥

भावार्थ :-
मधुर एवं मनोरम सामगान के लयमें गाये हुए आह्वान-मन्त्रों द्वारा देवताओं का आवाहन करके होताओं ने उन्हें उनके योग्य हविष्य के भाग समर्पित किये॥९॥

श्लोक:
न चाहुतमभूत् तत्र स्खलितं वा न किंचन।
दृश्यते ब्रह्मवत् सर्वं क्षेमयुक्तं हि चक्रिरे॥१०॥

भावार्थ :-
उस यज्ञ में कोई अयोग्य अथवा विपरीत आहुति नहीं पड़ी। कहीं कोई भूल नहीं हुई अनजान में भी कोई कर्म छूटने नहीं पाया; क्योंकि वहाँ सारा कर्म मन्त्रोच्चारण-पूर्वक सम्पन्न होता दिखायी देता था। महर्षियों ने सब कर्म क्षेमयुक्त एवं निर्विघ्न परिपूर्ण किये॥१०॥

श्लोक:
न तेष्वहःसु श्रान्तो वा क्षुधितो वा न दृश्यते।
नाविद्वान् ब्राह्मणः कश्चिन्नाशतानुचरस्तथा॥११॥

भावार्थ :-
यज्ञ के दिनों में कोई भी ऋत्विज् थका-माँदा या भूखा-प्यासा नहीं दिखायी देता था। उसमें कोई भी ब्राह्मण ऐसा नहीं था, जो विद्वान् न हो अथवा जिसके सौसे कम शिष्य या सेवक रहे हों॥११॥

श्लोक:
ब्राह्मणा भुञ्जते नित्यं नाथवन्तश्च भुञ्जते।
तापसा भुञ्जते चापि श्रमणाश्चैव भुञ्जते॥१२॥

भावार्थ :-
उस यज्ञ में प्रतिदिन ब्राह्मण भोजन करते थे (क्षत्रिय और वैश्य भी भोजन पाते थे) तथा शूद्रों को भी भोजन उपलब्ध होता था। तापस और श्रमण भी भोजन करते थे॥१२॥

श्लोक:
वृद्धाश्च व्याधिताश्चैव स्त्रीबालाश्च तथैव
च। अनिशं भुञ्जमानानां न तृप्तिरुपलभ्यते॥१३॥

भावार्थ :-
बूढ़े, रोगी, स्त्रियाँ तथा बच्चे भी यथेष्ट भोजन पाते थे। भोजन इतना स्वादिष्ट होता था कि निरन्तर खाते रहने पर भी किसी का मन नहीं भरता था॥१३॥

श्लोक:
दीयतां दीयतामन्नं वासांसि विविधानि च।
इति संचोदितास्तत्र तथा चक्रुरनेकशः॥१४॥

भावार्थ :-
‘अन्न दो, नाना प्रकार के वस्त्र दो’ अधिकारियों की ऐसी आज्ञा पाकर कार्यकर्ता लोग बारम्बार वैसा ही करते थे॥१४॥

श्लोक:
अन्नकूटाश्च दृश्यन्ते बहवः पर्वतोपमाः।
दिवसे दिवसे तत्र सिद्धस्य विधिवत् तदा॥१५॥

भावार्थ :-
वहाँ अन्न के बहुत से पर्वतों-जैसे ढेर देखे जा सकते हैं और प्रतिदिन विधिवत ब्राह्मणो ने वहाँ अनुष्ठान किया॥१५॥

श्लोक:
नानादेशादनुप्राप्ताः पुरुषाः स्त्रीगणास्तथा।
अन्नपानैः सुविहितास्तस्मिन् यज्ञे महात्मनः॥१६॥

भावार्थ :-
महामनस्वी राजा दशरथ के उस यज्ञ में नाना देशों से आये हुए स्त्री-पुरुष अन्न-पान द्वारा भली-भाँति तृप्त किये गये थे॥१६॥

श्लोक:
अन्नं हि विधिवत्स्वादु प्रशंसन्ति द्विजर्षभाः।
अहो तृप्ताः स्म भद्रं ते इति शुश्राव राघवः॥१७॥

भावार्थ :-
श्रेष्ठ ब्राह्मण ‘भोजन विधिवत् बनाया गया है। बहुत स्वादिष्ट है’- ऐसा कहकर अन्न की प्रशंसा करते थे। भोजन करके उठे हुए लोगों के मुख से राजा सदा यही सुनते थे कि ‘हम लोग खूब तृप्त हुए। आपका कल्याण हो’॥१७॥

श्लोक:
स्वलंकृताश्च पुरुषा ब्राह्मणान् पर्यवेषयन्।
उपासन्ते च तानन्ये सुमृष्टमणिकुण्डलाः॥१८॥

भावार्थ :-
वस्त्र-आभूषणों से अलंकृत हुए पुरुष ब्राह्मणों को भोजन परोसते थे और उन लोगों की जो दूसरे लोग सहायता करते थे, उन्होंने भी विशुद्ध मणिमय कुण्डल धारण कर रखे थे।१८॥

श्लोक:
कर्मान्तरे तदा विप्रा हेतुवादान् बहूनपि।
प्राहुः सुवाग्मिनो धीराः परस्परजिगीषया॥१९॥

भावार्थ :-
एक सवन समाप्त करके दूसरे सवन के आरम्भ होने से पूर्व जो अवकाश मिलता था, उसमें उत्तम वक्ता धीर ब्राह्मण एक-दूसरे को जीतने की इच्छा से बहुतेरे युक्तिवाद उपस्थित करते हुए शास्त्रार्थ करते थे॥१९॥

श्लोक:
दिवसे दिवसे तत्र संस्तरे कुशला द्विजाः।
सर्वकर्माणि चक्रुस्ते यथाशास्त्रं प्रचोदिताः॥२०॥

भावार्थ :-
उस यज्ञ में नियुक्त हुए कर्मकुशल ब्राह्मण प्रतिदिन शास्त्र के अनुसार सब कार्यों का सम्पादन करते थे॥२०॥

श्लोक:
नाषडंगविदत्रासीन्नाव्रतो नाबहुश्रुतः।
सदस्यास्तस्य वै राज्ञो नावादकुशलो द्विजः॥२१॥

भावार्थ :-
राजा के उस यज्ञ में कोई भी सदस्य ऐसा नहीं था, जो व्याकरण आदि छहों अंगों का ज्ञाता न हो, जिसने ब्रह्मचर्यव्रत का पालन न किया हो तथा जो बहुश्रुत न हो। वहाँ कोई ऐसा द्विज नहीं था, जो वाद-विवाद में कुशल न हो॥२१॥

श्लोक:
प्राप्ते यूपोच्छ्रये तस्मिन् षड् बैल्वाःखादिरास्तथा।
तावन्तो बिल्वसहिताः पर्णिनश्च तथा परे॥२२॥

भावार्थ :-
जब यूप खड़ा करने का समय आया, तब बेल की लकड़ी के छः यूप गाड़े गये। उतने ही खैर के यूप खड़े किये गये तथा पलाश के भी उतने ही यूप थे, जो बिल्व निर्मित यूपों के साथ खड़े किये गये थे॥२२॥

श्लोक:
श्लेष्मातकमयो दिष्टो देवदारुमयस्तथा।
द्वावेव तत्र विहितौ बाहुव्यस्तपरिग्रहौ॥२३॥

भावार्थ :-
बहेड़े के वृक्ष का एक यूप अश्वमेध यज्ञ के लिये विहित है। देवदारु के बने हुए यूप का भी विधान है; परंतु उसकी संख्या न एक है न छः। देवदारु के दो ही यूप विहित हैं। दोनों बाँहें फैला देने पर जितनी दूरी होती है, उतनी ही दूर पर वे दोनों स्थापित किये गये थे॥२३॥

श्लोक:
कारिताः सर्व एवैते शास्त्रज्ञैर्यज्ञकोविदैः।
शोभार्थं तस्य यज्ञस्य काञ्चनालंकृता भवन्॥२४॥

भावार्थ :-
यज्ञ कुशल शास्त्रज्ञ ब्राह्मणों ने ही इन सब यूपों का निर्माण कराया था। उस यज्ञ की शोभा को बढ़ाने के लिये उन सब में सोमा जड़ा गया था। २४॥

श्लोक:
एकविंशतियूपास्ते एकविंशत्यरत्नयः।
वासोभिरेकविंशद्भिरेकैकं समलंकृताः॥२५॥

भावार्थ :-
पूर्वोक्त इक्कीस यूप इक्कीस-इक्कीस अरनि* (पाँचसौ चार अंगुल) ऊँचे बनाये गये थे। उन सबको पृथक्-पृथक् इक्कीस कपड़ों से अलंकृत किया गया था॥२५॥

* तथा च सूत्रम्- ’चतुर्विंशत्यङ्गलयोऽरत्निः’ अर्थात् एक अरनि चौबीस अङ्गल के बराबर होता है।

श्लोक:
विन्यस्ता विधिवत् सर्वे शिल्पिभिः सुकृता दृढाः।
अष्टास्रयः सर्व एव श्लक्ष्णरूपसमन्विताः॥२६॥

भावार्थ :-
कारीगरों द्वारा अच्छी तरह बनाये गये वे सभी सुदृढ़ यूप विधिपूर्वक स्थापित किये गये थे। वे सब-के-सब आठ कोणों से सुशोभित थे। उनकी आकृति सुन्दर एवं चिकनी थी॥२६॥

श्लोक:
आच्छादितास्ते वासोभिः पुष्पैर्गन्धैश्च पूजिताः।
सप्तर्षयो दीप्तिमन्तो विराजन्ते यथा दिवि॥२७॥

भावार्थ :-
उन्हें वस्त्रों से ढक दिया गया था और पुष्पचन्दन से उनकी पूजा की गयी थी। जैसे आकाश में तेजस्वी सप्तर्षियों की शोभा होती है, उसी प्रकार यज्ञमण्डप में वे दीप्तिमान् यूप सुशोभित होते थे॥२७॥

श्लोक:
इष्टकाश्च यथान्यायं कारिताश्च प्रमाणतः।
चितोऽग्निर्ब्राह्मणैस्तत्र कुशलैः शिल्पकर्मणि॥२८॥

भावार्थ :-
सूत्र ग्रन्थों में बताये अनुसार ठीक माप से ईंटें तैयार करायी गयी थीं। उन ईंटों के द्वारा यज्ञ सम्बन्धी शिल्पि कर्म में कुशल ब्राह्मणों ने अग्नि का चयन किया था॥२८॥

श्लोक:
स चित्यो राजसिंहस्य संचितः कुशलैर्द्विजैः।
गरुडो रुक्मपक्षो वै त्रिगुणोऽष्टादशात्मकः॥२९॥

भावार्थ :-
राजसिंह महाराज दशरथ के यज्ञ में चयन द्वारा सम्पादित अग्नि की कर्मकाण्ड कुशल ब्राह्मणों द्वारा शास्त्र विधि के अनुसार स्थापना की गयी। उस अग्नि की आकृति दोनों पंख और पुच्छ फैलाकर नीचे देखते हुए पूर्वाभिमुख खड़े हुए गरुड़ की-सी प्रतीत होती थी। सोने की ईंटों से पंख का निर्माण होने से उस गरुड़ के पंख सुवर्णमय दिखायी देते थे। प्रकृत-अवस्था में चित्य-अग्नि के छः प्रस्तार होते हैं; किंतु अश्वमेध यज्ञ में उसका प्रस्तार तीन गुना हो जाता है। इसलिये वह गरुड़ाकृति अग्नि अठारह प्रस्तारों। से युक्त थी॥२९॥

श्लोक:
नियुक्तास्तत्र पशवस्तत्तदुद्दिश्य दैवतम्।
उरगाः पक्षिणश्चैव यथाशास्त्रं प्रचोदिताः॥३०॥

भावार्थ :-
वहाँ पूर्वोक्त यूपों में शास्त्र विहित पशु, सर्प और पक्षी विभिन्न देवताओं के उद्देश्य से बाँधे गये थे॥३०॥

श्लोक:
शामित्रे तु हयस्तत्र तथा जलचराश्च ये।
ऋषिभिः सर्वमेवैतन्नियुक्तं शास्त्रतस्तदा॥३१॥

भावार्थ :-
शामित्र कर्म में यज्ञिय अश्व तथा कूर्म आदि जलचर जन्तु जो वहाँ लाये गये थे, ऋषियों ने उन सबको शास्त्र विधि के अनुसार पूर्वोक्त यूपों में बाँध दिया॥३१॥

श्लोक:
पशूनां त्रिशतं तत्र यूपेषु नियतं तदा।
अश्वरत्नोत्तमं तत्र राज्ञो दशरथस्य ह॥३२॥

भावार्थ :-
उस समय उन यूपों में तीन सौ पशु बँधे हुए थे तथा राजा दशरथ का वह उत्तम अश्वरत्न भी वहीं बाँधा गया था॥३२॥

श्लोक:
कौसल्या तं हयं तत्र परिचर्य समन्ततः।
कृपाणैर्विशशारैनं त्रिभिः परमया मदा॥३३॥

भावार्थ :-
रानी कौसल्या ने वहाँ प्रोक्षण आदि के द्वारा सब ओर से उस अश्व का संस्कार करके बड़ी प्रसन्नता के साथ तीन तलवारों से उसका स्पर्श किया॥३३॥

श्लोक:
पतत्त्रिणा तदा सार्धं सुस्थितेन च चेतसा।
अवसद् रजनीमेकां कौसल्या धर्मकाम्यया॥३४॥

भावार्थ :-
तदनन्तर कौसल्या देवी ने सुस्थिर चित्त से धर्मपालन की इच्छा रखकर उस अश्व के निकट एक रात निवास किया॥३४॥

श्लोक:
होताध्वर्युस्तथोद्गाता हस्तेन समयोजयन्।
महिष्या परिवृत्त्यार्थं वावातामपरां तथा॥३५॥

भावार्थ :-
तत्पश्चात् होता, अध्वर्यु और उद्गाता ने राजा की (क्षत्रियजातीय) महिषी ‘कौसल्या’, (वैश्यजातीय स्त्री) ‘वावाता’ तथा (शूद्रजातीय स्त्री) ‘परिवृत्ति’- इन सबके हाथ से उस अश्वका स्पर्श कराया*॥३५॥

* जाति के अनुसार नाम अलग-अलग होते हैं। दशरथ के तो कौसल्या, कैकेयी और सुमित्रा तीनों क्षत्रिय जाति की ही थीं।

श्लोक:
पतत्त्रिणस्तस्य वपामुद्धृत्य नियतेन्द्रियः।
ऋत्विक्परमसम्पन्नः श्रपयामास शास्त्रतः॥३६॥

भावार्थ :-
इसके बाद परम चतुर जितेन्द्रिय ऋत्विक्ने विधि पूर्वक अश्वकन्द के गूदे को निकाल कर शास्त्रोक्त रीति से पकाया॥३६॥

श्लोक:
धूमगन्धं वपायास्तु जिघ्रति स्म नराधिपः।
यथाकालं यथान्यायं निर्णदन् पापमात्मनः॥३७॥

भावार्थ :-
तत्पश्चात् उस गूदे की आहुति दी गयी। राजा दशरथ ने अपने पाप को दूर करने के लिये ठीक समय पर आकर विधि पूर्वक उसके धूएँ की गन्ध को सूंघा॥३७॥

श्लोक:
हयस्य यानि चांगानि तानि सर्वाणि ब्राह्मणाः।
अग्नौ प्रास्यन्ति विधिवत् समस्ताः षोडशर्विजः॥३८॥

भावार्थ :-
उस अश्वमेध यज्ञ के अंगभूत जो-जो हवनीय पदार्थ थे, उन सबको लेकर समस्त सोलह ऋत्विज् ब्राह्मण अग्नि में विधिवत् आहुति देने लगे॥३८॥

श्लोक:
प्लक्षशाखासु यज्ञानामन्येषां क्रियते हविः।
अश्वमेधस्य यज्ञस्य वैतसो भाग इष्यते॥३९॥

भावार्थ :-
अश्वमेध के अतिरिक्त अन्य यज्ञों में जो हवि दी जाती है, वह पाकर की शाखाओं में रखकर दी जाती है; परंतु अश्वमेध यज्ञ का हविष्य बेंत की चटाई में रखकर देने का नियम है॥३९॥

श्लोक:
त्र्यहोऽश्वमेधः संख्यातः कल्पसूत्रेण ब्राह्मणैः।
चतुष्टोममहस्तस्य प्रथमं परिकल्पितम्॥४०॥
उक्थ्यं द्वितीयं संख्यातमतिरानं तथोत्तरम्।
कारितास्तत्र बहवो विहिताः शास्त्रदर्शनात्॥४१॥

भावार्थ :-
कल्पसूत्र और ब्राह्मण ग्रन्थों के द्वारा अश्वमेध के तीन सवनीय दिन बताये गये हैं। उनमें से प्रथम दिन जो सवन होता है, उसे चतुष्टोम (‘अग्निष्टोम’) कहा गया है। द्वितीय दिवस साध्य सवन को ‘उक्थ्य’ नाम दिया गया है तथा तीसरे दिन जिस सवन का अनुष्ठान होता है, उसे ‘अतिरात्र’ कहते हैं। उसमें शास्त्रीय दृष्टि से विहित बहुत-से दूसरे-दूसरे क्रतु भी सम्पन्न किये गये॥४०-४१॥

श्लोक:
ज्योतिष्टोमायुषी चैवमतिरात्रौ च निर्मितौ।
अभिजिद्विश्वजिच्चैवमाप्तोर्यामौ महाक्रतुः॥४२॥

भावार्थ :-
ज्योतिष्टोम, आयुष्टोम यज्ञ, दो बार अतिरात्र यज्ञ, पाँचवाँ अभिजित् , छठा विश्वजित् तथा सातवें-आठवें आप्तोर्याम- ये सब-के-सब महाक्रतु माने गये हैं, जो अश्वमेध के उत्तर काल में सम्पादित हुए॥४२॥

श्लोक:
प्राचीं होने ददौ राजा दिशं स्वकुलवर्धनः।
अध्वर्यवे प्रतीची तु ब्रह्मणे दक्षिणां दिशम्॥४३॥

भावार्थ :-
अपने कुल की वृद्धि करने वाले राजा दशरथ ने यज्ञ पूर्ण होने पर होता को दक्षिणा रूप में अयोध्या से पूर्व दिशा का सारा राज्य सौंप दिया, अध्वर्यु को पश्चिम दिशा तथा ब्रह्मणों को दक्षिण दिशा का राज्य दे दिया॥४३॥

श्लोक:
उद्गात्रे तु तथोदीची दक्षिणैषा विनिर्मिता।
अश्वमेधे महायज्ञे स्वयंभूविहिते पुरा॥४४॥

भावार्थ :-
इसी तरह उद्गाता को उत्तर दिशा की सारी भूमि दे दी। पूर्वकाल में भगवान् ब्रह्माजी ने जिसका अनुष्ठान किया था, उस अश्वमेध नामक महायज्ञ में ऐसी ही दक्षिणा का विधान किया गया है*॥४४॥

* ‘प्रजापतिरश्वमेधमसृजत (प्रजापति ने अश्वमेध यज्ञ का अनुष्ठान किया।)’ इस श्रुति के द्वारा यह सूचित होता है कि पूर्वकाल में ब्रह्माजी ने इस महायज्ञ का अनुष्ठान किया था। इसमें दक्षिणा रूप से प्रत्येक दिशा के दान का विधान कल्पसूत्र द्वारा किया गया है। यथा- ’प्रतिदिशं दक्षिणां ददाति प्राची दिग्धोतुर्दक्षिणा प्रतीच्यध्वर्योरुदीच्युद्गातुः॥

श्लोक:
क्रतुं समाप्य तु तदा न्यायतः पुरुषर्षभः।
ऋत्विग्भ्यो हि ददौ राजा धरां तां कुलवर्धनः॥४५॥

भावार्थ :-
इस प्रकार विधि पूर्वक यज्ञ समाप्त करके अपने कुल की वृद्धि करने वाले पुरुषशिरो मणि राजा दशरथ ने ऋत्विजों को सारी पृथ्वी दान कर दी॥४५॥

श्लोक:
एवं दत्त्वा प्रहृष्टोऽभूच्छीमानिक्ष्वाकुनन्दनः।
ब्रह्मणः ऋत्विजस्त्वब्रुवन् सर्वे राजानं गतकिल्बिषम्॥४६॥

भावार्थ :-
यों दान देकर इक्ष्वाकु कुलनन्दन श्रीमान् महाराज दशरथ के हर्ष की सीमा न रही, परंतु समस्त ऋत्विज् उन निष्पाप नरेश से इस प्रकार बोले-॥४६॥

श्लोक:
भवानेव महीं कृत्स्नामेको रक्षितुमर्हति।
न भूम्या कार्यमस्माकं नहि शक्ताः स्म पालने॥४७॥

भावार्थ :-
महाराज! अकेले आप ही इस सम्पूर्ण पृथ्वी की रक्षा करने में समर्थ हैं। हममें इसके पालन की शक्ति नहीं है; अतः भूमि से हमारा कोई प्रयोजन नहीं है॥४७॥

श्लोक:
रताः स्वाध्यायकरणे वयं नित्यं हि भूमिप।
निष्क्रयं किञ्चिदेवेह प्रयच्छतु भवानिति॥४८॥

भावार्थ :-
भूमिपाल! हम तो सदा वेदों के स्वाध्याय में ही लगे रहते हैं (इस भूमिका पालन हमसे नहीं हो सकता); अतः आप हमें यहाँ इस भूमि का कुछ निष्क्रय (मूल्य) ही दे दें॥४८॥

श्लोक:
मणिरत्नं सुवर्णं वा गावो यद्वा समुद्यतम्।
तत् प्रयच्छ नृपश्रेष्ठ धरण्या न प्रयोजनम्॥४९॥

भावार्थ :-
‘नृपश्रेष्ठ! मणि, रत्न, सुवर्ण, गौ अथवा जो भी वस्तु यहाँ उपस्थित हो, वही हमें दक्षिणा रूप से दे दीजिये। इस धरती से हमें कोई प्रयोजन नहीं है’॥४९॥

श्लोक:
एवमुक्तो नरपतिर्ब्राह्मणैर्वेदपारगैः।
गवां शतसहस्राणि दश तेभ्यो ददौ नृपः॥५०॥
दशकोटिं सुवर्णस्य रजतस्य चतुर्गुणम्।

भावार्थ :-
वेदों के पारगामी विद्वान् ब्राह्मणों के ऐसा कहने पर राजा ने उन्हें दस लाख गौएँ प्रदान की। दस करोड़ स्वर्ण मुद्रा तथा उससे चौगुनी रजत मुद्रा अर्पित की॥५० १/२॥

श्लोक:
ऋत्विजस्तु ततः सर्वे प्रददुः सहिता वसु॥५१॥
ऋष्यशृंगाय मुनये वसिष्ठाय च धीमते।

भावार्थ :-
तब उस समस्त ऋत्विजों ने एक साथ होकर वह सारा धन मुनिवर ऋष्यशृंग तथा बुद्धिमान् वसिष्ठ को सौंप दिया॥५१ १/२॥

श्लोक:
ततस्ते न्यायतः कृत्वा प्रविभागं द्विजोत्तमाः॥५२॥
सुप्रीतमनसः सर्वे प्रत्यूचुर्मुदिता भृशम्।

भावार्थ :-
तदनन्तर उन दोनों महर्षियों के सहयोग से उस धन का न्याय पूर्वक बँटवारा करके वे सभी श्रेष्ठ ब्राह्मण मन-ही-मन बड़े प्रसन्न हुए और बोले महाराज! इस दक्षिणा से हम-लोग बहुत संतुष्ट हैं’॥५२ १/२॥

श्लोक:
ततः प्रसर्पकेभ्यस्तु हिरण्यं सुसमाहितः॥५३॥
जाम्बूनदं कोटिसंख्यं ब्राह्मणेभ्यो ददौ तदा।

भावार्थ :-
इसके बाद एकाग्रचित्त होकर राजा दशरथ ने अभ्यागत ब्राह्मणों को एक करोड़ जाम्बूनद सुवर्ण की मुद्राएँ बाँटीं॥५३ १/२॥

श्लोक:
दरिद्राय द्विजायाथ हस्ताभरणमुत्तमम्॥५४॥
कस्मैचिद याचमानाय ददौ राघवनन्दनः।

भावार्थ :-
सारा धन दे देने के बाद जब कुछ नहीं बच रहा, तब एक दरिद्र ब्राह्मण ने आकर राजा से धनकी याचना की। उस समय उन रघुकुलनन्दन नरेश ने उसे अपने हाथ का उत्तम आभूषण उतारकर दे दिया॥५४ १/२॥

श्लोक:
ततः प्रीतेषु विधिवद् द्विजेषु द्विजवत्सलः॥५५॥
प्रणाममकरोत् तेषां हर्षव्याकुलितेन्द्रियः।

भावार्थ :-
तत्पश्चात् जब सभी ब्राह्मण विधिवत् संतुष्ट हो गये, उस समय उन पर स्नेह रखने वाले नरेश ने उन सबको प्रणाम किया। प्रणाम करते समय उनकी सारी इन्द्रियाँ हर्ष से विह्वल हो रही थीं॥५५ १/२॥

श्लोक:
तस्याशिषोऽथ विविधा ब्राह्मणैः समुदाहृताः॥५६॥
उदारस्य नृवीरस्य धरण्यां पतितस्य च।

भावार्थ :-
पृथ्वी पर पड़े हुए उन उदार नरवीर को ब्राह्मणों ने नाना प्रकार के आशीर्वाद दिये॥५६ १/२॥

श्लोक:
ततः प्रीतमना राजा प्राप्य यज्ञमनुत्तमम्॥५७॥
पापापहं स्वर्नयनं दुस्तरं पार्थिवर्षभैः।

भावार्थ :-
तदनन्तर उस परम उत्तम यज्ञ का पुण्य फल पाकर राजा दशरथ के मन में बड़ी प्रसन्नता हुई। वह यज्ञ उनके सब पापों का नाश करने वाला तथा उन्हें स्वर्गलोक में पहुँचाने वाला था। साधारण राजाओं के लिये उस यज्ञ को आदि से अन्त तक पूर्ण कर लेना बहुत ही कठिन था॥५७ १/२॥

श्लोक:
ततोऽब्रवीदृष्यश्रृंगं राजा दशरथस्तदा॥५८॥
कुलस्य वर्धनं तत् तु कर्तुमर्हसि सुव्रत।

भावार्थ :-
यज्ञ समाप्त होने पर राजा दशरथ ने ऋष्यशृंग से कहा- ’उत्तम व्रत का पालन करने वाले मुनीश्वर! अब जो कर्म मेरी कुल परम्परा को बढ़ाने वाला हो, उसका सम्पादन आपको करना चाहिये’॥५८ १/२॥

श्लोक:
तथेति च स राजानमुवाच द्विजसत्तमः।
भविष्यन्ति सुता राजश्चत्वारस्ते कुलोद्रहाः॥५९॥

भावार्थ :-
तब द्विजश्रेष्ठ ऋष्यशृंग ‘तथास्तु’ कहकर राजा से बोले- ‘राजन्! आपके चार पुत्र होंगे, जो इस कुल के भार को वहन करने में समर्थ होंगे’॥५९॥

श्लोक:
स तस्य वाक्यं मधुरं निशम्य प्रणम्य तस्मै प्रयतो नृपेन्द्रः।
जगाम हर्षं परमं महात्मा तमृष्यश्रृंगं पुनरप्युवाच॥६०॥

भावार्थ :-
उनका यह मधुर वचन सुनकर मन और इन्द्रियों को संयम में रखने वाले महामना महाराज दशरथ उन्हें प्रणाम करके बड़े हर्ष को प्राप्त हुए तथा उन्होंने ऋष्यशृंग को पुनः पुत्र-प्राप्ति कराने वाले कर्म का अनुष्ठान करने के लिये प्रेरित किया॥६०॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे चतुर्दशः सर्गः॥१४॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में चौदहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥१४॥

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