वाल्मीकि रामायण- बालकाण्ड सर्ग- १६

बालकाण्ड सर्ग- १६ यह महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित संस्कृत का महाकाव्य और स्मृति का एक अंग है। और पापो का नाश कराने वाले श्रीरामचन्द्र जी के जीवन की गाथा है।

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वाल्मीकि रामायण- बालकाण्ड सर्ग- १५

बालकाण्ड सर्ग- १५ यह महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित संस्कृत का महाकाव्य और स्मृति का एक अंग है। और पापो का नाश कराने वाले श्रीरामचन्द्र जी के जीवन की गाथा है।

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वाल्मीकि रामायण- बालकाण्ड सर्ग- १४

बालकाण्ड सर्ग- १४ यह महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित संस्कृत का महाकाव्य और स्मृति का एक अंग है। और पापो का नाश कराने वाले श्रीरामचन्द्र जी के जीवन की गाथा है।

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वाल्मीकि रामायण- बालकाण्ड सर्ग- १३

बालकाण्ड सर्ग- १३ यह महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित संस्कृत का महाकाव्य और स्मृति का एक अंग है। और पापो का नाश कराने वाले श्रीरामचन्द्र जी के जीवन की गाथा है।

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वाल्मीकि रामायण- बालकाण्ड सर्ग- १२

बालकाण्ड सर्ग- १२ यह महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित संस्कृत का महाकाव्य और स्मृति का एक अंग है। और पापो का नाश कराने वाले श्रीरामचन्द्र जी के जीवन की गाथा है।

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वाल्मीकि रामायण- बालकाण्ड सर्ग- ११

बालकाण्ड सर्ग- ११ यह महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित संस्कृत का महाकाव्य और स्मृति का एक अंग है। और पापो का नाश कराने वाले श्रीरामचन्द्र जी के जीवन की गाथा है।

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वाल्मीकि रामायण- बालकाण्ड सर्ग- १०

महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण- बालकाण्ड सर्ग- १० अंगदेश में ऋष्यश्रृंग के आने तथा शान्ता के साथ विवाह होने के प्रसंग का विस्तार के साथ वर्णन।

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वाल्मीकि रामायण- बालकाण्ड सर्ग- ९

महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण- बालकाण्ड सर्ग- ९ सुमन्त्र का दशरथ को ऋष्यशृंग मुनि को बुलाने की सलाह देते हुए उनके अंगदेश जाने और शान्ता से विवाह का प्रसंग सुनाना।

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वाल्मीकि रामायण- बालकाण्ड सर्ग- ८

महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण- बालकाण्ड सर्ग- ८ मे आप पढ़ेंगे राजा दशरथ का पुत्र के लिये अश्वमेध यज्ञ करने का प्रस्ताव और मन्त्रियों तथा ब्राह्मणों द्वारा उनका अनुमोदन।

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वाल्मीकि रामायण- बालकाण्ड सर्ग- ७

महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण- बालकाण्ड सर्ग- ७ मे महर्षि वाल्मीकि ने राजमन्त्रियों के गुण और नीति का वर्णन बड़े ही विस्तार पूर्वक किया है।

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शिव-शक्ति श्रीराम मिलन भाग- 1 (श्रीराम की परीक्षा)

एक बार त्रेता युग में शिवजी अगस्त्य ऋषि के पास गए। उनके साथ जगज्जननी भवानी सतीजी भी थीं। ऋषि ने संपूर्ण जगत्‌ के ईश्वर जानकर उनका पूजन किया। मुनिवर अगस्त्यजी ने रामकथा विस्तार से कही, जिसको महेश्वर ने परम सुख मानकर सुना। फिर ऋषि ने शिवजी से सुंदर हरिभक्ति पूछी और शिवजी ने उनको अधिकारी पाकर (रहस्य सहित) भक्ति का निरूपण किया।

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