🪔 स्वर्गीय श्री कमलापति चतुर्वेदी


॥ श्री गणेशाय नमः ॥
॥ श्री कमलापति नम: ॥
॥ श्री जानकीवल्लभो विजयते ॥
॥ श्री गुरूदेवाय नमः ॥
दान करें 🗳



मुख पृष्ठ🪔 स्वर्गीय श्री कमलापति चतुर्वेदी

हमारे पूजनीय गुरु जी “स्व श्री कमलापति चतुर्वेदी”

नमस्कार दोस्तों! मै मनीष कुमार चतुर्वेदी। आज अपने पूजनीय गुरु जी के जीवन के कुछ महत्वपूर्ण पलों को आप के समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ। मित्रों स्व गुरु जी एक महान और देवीय शक्ति थे।

मित्रों स्व गुरु जी सदैव जरुरत मन्द लोगों की सहायता करते ही रहते थे। वह सभी प्राणियों को समान अधिकार देते और श्रीराम जी की भक्ति मे लीन रहने वाले थे।

मित्रों यदि मैं उनके दिनचर्या कि बात करूँ तो सदैव ब्रह्म– मुहूर्त्त मे उठकर प्रातः कृत्य करते थे।

श्री दुर्गा सप्तशती जिसमें माँ दुर्गा की महिमा, शक्ति और महासागरी शक्ति का वर्णन किया गया है। यहाँ पढ़े:-
श्री दुर्गा सप्तशती पाठ (संपूर्ण भाग) 🐅

ब्रह्म– मुहूर्त्त:- सूर्योदय से प्रायः दो घण्टे पूर्व ब्रह्म– मुहूर्त्त होता है। इस समय सोना (निद्रालीन होना) सर्वथा निषिद्ध है। इस कारण वह ब्रह्म– मुहूर्त्त में उठकर निम्न मंत्र को बोलते हुए अपने हाथों (हथेलियों) को देखा करते थे।

कराग्रे वसते लक्ष्मी करमध्ये सरस्वती।
करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते कर-दर्शनम्॥

अर्थात हाथों के अग्रभाग में लक्ष्मी, मध्य में सरस्वती और मूल में ब्रह्मा स्थित हैं (ऐसा शास्त्रों में कहा गया है)। इसलिए प्रातः उठते ही हाथों का दर्शन करना चाहिए।

उसके पश्चात् नीचे लिखी प्रार्थना को बोलकर ही वह भूमि पर पैर रखते थे।

समुद्रवसने देवी! पर्वतस्तनमण्डले।
विष्णुपत्नि ! नमस्तुभ्यं पादस्पर्श क्षमस्व मे॥

अर्थात:- हे विष्णु पत्नी! हे समुद्ररुपी वस्त्रों को धारण करने वाली तथा पर्वतरुप स्तनों से युक्त पृथ्वी देवी! तुम्हें नमस्कार है, तुम मेरे पादस्पर्श को क्षमा करो।

इस कृत्य के पश्चात् मुख को धोना, कुल्ला करना और फिर प्रातः स्मरण करके श्री गणेश, लक्ष्मी, सूर्य, तुलसी, गाय, गुरु, को सादर प्रणाम करते थे।

प्रातः स्मरण-

उमा उषा च वैदेही रमा गंगेति पंचकम्।
प्रातरेव स्मरेन्नित्यं सौभाग्यं वर्द्धते सदा॥
सर्वमंगल मांगल्ये! शिवे! सर्वार्थसाधिके।
शरण्ये! त्र्यंबक! गौरि नारायणि! नमोऽस्तुते ॥
हे जिह्वेरससराज्ञे! सर्वदा मधुरप्रिये!।
नारायणाख्यपीयूषं पिब जिह्वे! निरंतरम्॥

उसके पश्चात शौच विधि करने के लिए चले जाते थे।

शौच करने के उपरांत दंतो और मुख को साफ करने के लिए चले जाते थे।

(क्योंकि मुखशुद्धि किए बिना कोई भी मंत्र कभी फलदायक नहीं होता। अतः सूर्योदय से पहले और बाद में उत्तर अथवा दोनों समय पूर्वोत्तर कोण ( ईशान ) में मुंह करके दतुअन करें। मध्यमा, अनामिका अथवा अंगुष्ठ से दांत साफ करें। तर्जनी उंगली का कभी प्रयोग न करें।)

तत्पश्चात् प्रार्थना करें–

आयुर्बलं यशो वर्चः प्रजाः पशुवसूनि च। ब्रह्म प्रज्ञां च मेधां च त्वन्नो देहि वनस्पते॥

दुग्धवाले वृक्ष का बारह अंगुल का दतुअन (दातौन) धोकर उपर्युक्त प्रार्थना करें। फिर दतुअन को चीरकर जीभी करें और धोकर बायीं ओर फेंक दें।

स्नान विधि-

मानव– शरीर में नौ छिद्र प्रमुख होते हैं। रात्रि में शयन करने से वे अपवित्र हो जाते हैं। अतः प्रातः स्नान अवश्य करना चाहिए। गंगा आदि नदी में कभी दतुअन नहीं करना चाहिए। स्नानोपरांत गंगा आदि जलाशय में भीगे वस्त्र बदलने अथवा निचोड़ने नहीं चाहिए। निम्नलिखित मंत्र से वरुण की प्रार्थना करें–

अपामधिपतिस्त्वं च तीर्थेषु वसतिस्तव।
वरुणाय नमस्तुभ्यं स्नानानुज्ञां प्रयच्छ मे॥

इसके पश्चात् ही वह संध्या– वंदना करते थे।- संध्यावंदन

अपना बिचार व्यक्त करें।

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.