गायत्री मन्त्र और महत्ता

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मुख पृष्ठगायत्री मन्त्र और महत्ता

यह स्वंय शिवजी द्वारा माता जगदम्बा से कही गई एक पवित्र कथा है। आप भी विस्तार पूर्वक पढ़े:
शिव-शक्ति श्रीराम मिलन (संपूर्ण भाग) 🌞

गायत्री मन्त्र

गायत्री मन्त्र और इसकी महत्ता

गायत्री महामंत्र

वेदों का एक महत्त्वपूर्ण मंत्र है जिसकी महत्ता ॐ के लगभग बराबर मानी जाती है। यह यजुर्वेद के मन्त्र ‘ॐ भूर्भुवः स्वः’ और ऋग्वेद के छन्द 3.62.10 के मेल से बना है। इस मंत्र में सवितृ देव की उपासना है इसलिए इसे सावित्री भी कहा जाता है। ऐसा माना जाता है कि इस मंत्र के उच्चारण और इसे समझने से ईश्वर की प्राप्ति होती है। तथा इस महान मंत्र की उतपत्ति ब्रह्मा जी ने सृष्टि के निर्माण से पूर्व करी थी. परन्तु कुछ विद्वान कहते है की ब्रह्माण्ड के निर्माण से पहले जब सब कुछ शून्य था तो उस समय केवल गायत्री मन्त्र ही आस्तित्व में था तथा जिसकी शक्ति से एक भयंकर विस्फोट हुआ व ब्रह्मा, विष्णु, महेश तीनो ब्रह्म शक्तियों की उतपत्ति हुई. यह मन्त्र यजुर्वेद तथा ऋग्वेद के छंद से मिलकर बना है, गायत्री मन्त्र को समस्त वेदो की जननी माना जाता है अतः इसे वेद माता के नाम से भी जाना जाता है.

हिन्दू धर्म में गायत्री मन्त्र को माता के नाम से सम्बोधित किया गया है तथा इसे ही सनातन धर्म की जननी भी कहा जाता है. शास्त्रो के अनुसार माँ गायत्री का अवतरण ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष की दशमी को हुआ था. भगवान मनु ने इस मन्त्र की महिमा बताते हुए कहा है की यदि कोई व्यक्ति सिर्फ तीन वर्ष तक इस मन्त्र का जाप करता है तो वह आकश की तरह व्यापक परब्रह्म को प्राप्त कर लेता है. धर्म शास्त्रो में माँ गायत्री को पंचमुखी बताया गया है अर्थात ब्रह्माण्ड के पांचो तत्व आकाश, जल, वायु, अग्नि तथा पृथ्वी पांचो शक्तिया माँ गायत्री में समाहित है. इस पृथ्वी का प्रत्येक प्राणी भी इन पांच तत्वों से मिलकर बना है तथा माँ गायत्री प्रत्येक प्राणी में प्राण शक्ति के रूप में विराजमान है.

महभारत के शांति पर्व के 119 वे अध्याय में माँ गयत्री की महिमा का वर्णन किया गया है इस कथा के अनुसार कौशिक गोत्र में उतपन्न महान ऋषि पिप्लाद के पुत्र एक दिन माँ गायत्री के मन्त्र का जप करने बैठे. उन्हें बिना रुके लगातार एक हजार वर्ष तक गायत्री मन्त्र का जप किया जिस से माँ गायत्री प्रसन्न होकर उनके समक्ष प्रकट हुई. परन्तु वे गायत्री मन्त्र के जाप में इतने लीन थे की उन्हें पता ही नही चला की माँ गायत्री कब से उनके सामने खड़ी है. माँ गायत्री उनकी जप निष्ठा से प्रसन्न हुई तथा उनकी जप निष्ठा की प्रसंसा करते हुए वही खड़ी रही. अचानक जप करते हुए ब्राह्मण ने माँ गायत्री को अपने समीप पाया तो वह उनकी चरणो में जा गिरा. माँ गायत्री ने उनसे वरदान मागने को कहा तो ब्राह्मण बोले की मुझे किसी भी प्रकार के वरदान की इच्छा नही फिर भी यदि आप मुझे वरदान ही देना चाहती है तो मुझे यह वरदान दे की मेरी मन्त्र जाप करने की इच्छा कभी ना खत्म हो. माँ गायत्री ब्राह्मण को वरदान देकर अंतर्ध्यान हो गई तथा ब्राह्मण पुनः देवताओ के 100 वर्षो तक जप करता रहा. जब सृष्टि के तीनो चरण समाप्त हो गए तथा नया चरण आरम्भ हुआ तो स्वयं धर्म देव ने प्रकट होकर ब्राह्मण से स्वर्गलोक मागने को कहा परन्तु ब्राह्मण बोले की मुझे किसी भी प्रकार का लोभ नही है में तो सिर्फ गायत्री मन्त्र के जप से आनंदित हु. इस प्रकार मृत्यु देव व अन्य देव भी उनके समक्ष प्रकट होकर उनके जप की प्रसंसा करने लगे.

एक बार इक्ष्वाकु नाम का राजा तीर्थ यात्रा पर निकला तथा मार्ग में उसकी भेट गायत्री मन्त्र का जप करते हुए ब्राह्मण से हुई. ब्राह्मण के गायत्री जप को देख वे प्रसन्न हुए तथा उनसे स्वर्ण एवं धन मागने को कहा. ब्राह्मण ने कुछ ना मांगते हुए राजा से कहा यदि आप को कुछ चाहिए तो में अपने सिद्ध शक्तियों द्वारा दे सकता हु. राजा ने व्यंग कसते हुए कहा अगर आप मुझे कुछ देना चाहते हो तो अपने समस्त जप का फल मुझे दे दीजिये. ब्राह्मण उसे अपने तप का फल देने के लिए तुरंत तैयार हो गए परन्तु अब राजा उसे लेने में हिचकिचाने लगे. क्योकि राजा क्षत्रिय था अतः वह किसी से कुछ लेने में अपने धर्म की हानि मानता था वही ब्राह्मण उसे अपने तप के समस्त फल देने के हठ में थे. दोनों में विवाद हो गया तथा तभी त्रिदेव उनके समक्ष प्रकट हो गए. विष्णु बोले की जो फल तप से प्राप्त होता है वही फल गायत्री मन्त्र के जप के प्रभाव से भी प्राप्त होता है.त्रिदेवो के आशीर्वाद से ब्राह्मण और राजा दोनों एक तेजप्रकाशीय शक्ति में बदल गए तथा दोनों ब्रह्म को प्राप्त हुए.

‘गायत्री’ एक छन्द भी है जो ऋग्वेद के सात प्रसिद्ध छंदों में एक है। इन सात छंदों के नाम हैं- गायत्री, उष्णिक्, अनुष्टुप्, बृहती, विराट, त्रिष्टुप् और जगती। गायत्री छन्द में आठ-आठ अक्षरों के तीन चरण होते हैं। ऋग्वेद के मंत्रों में त्रिष्टुप् को छोड़कर सबसे अधिक संख्या गायत्री छंदों की है। गायत्री के तीन पद होते हैं (त्रिपदा वै गायत्री)। अतएव जब छंद या वाक के रूप में सृष्टि के प्रतीक की कल्पना की जाने लगी तब इस विश्व को त्रिपदा गायत्री का स्वरूप माना गया। जब गायत्री के रूप में जीवन की प्रतीकात्मक व्याख्या होने लगी तब गायत्री छंद की बढ़ती हुई महिता के अनुरूप विशेष मंत्र की रचना हुई, जो इस प्रकार है:

तत् सवितुर्वरेण्यं। भर्गोदेवस्य धीमहि। धियो यो न: प्रचोदयात्। (ऋग्वेद ३,६२,१०)

गायत्री मन्त्र :-

ॐ भूर्भुव स्वः, तत् सवितुर्वरेण्यं, भर्गो देवस्य धीमहि, धियो यो नः प्रचोदयात्!

भावार्थ:- उस प्राणस्वरूप, दुःखनाशक, सुखस्वरूप, श्रेष्ठ, तेजस्वी, पापनाशक, देवस्वरूप परमात्मा को हम अन्तःकरण में धारण करें. वह परमात्मा हमारी बुद्धि को सन्मार्ग में प्रेरित करे !

मंत्र जप के लाभ

गायत्री मंत्र का नियमित रुप से सात बार जप करने से व्यक्ति के आसपास नकारात्मक शक्तियाँ बिलकुल नहीं आती।

जप से कई प्रकार के लाभ होते हैं, व्यक्ति का तेज बढ़ता है और मानसिक चिंताओं से मुक्ति मिलती है। बौद्धिक क्षमता और मेधाशक्ति यानी स्मरणशक्ति बढ़ती है।

गायत्री मंत्र में चौबीस अक्षर होते हैं, यह 24 अक्षर चौबीस शक्तियों-सिद्धियों के प्रतीक हैं।

इसी कारण ऋषियों ने गायत्री मंत्र को सभी प्रकार की मनोकामना को पूर्ण करने वाला बताया है।

परिचय

यह मंत्र सर्वप्रथम ऋग्वेद में उद्धृत हुआ है। इसके ऋषि विश्वामित्र हैं और देवता सविता हैं। वैसे तो यह मंत्र विश्वामित्र के इस सूक्त के १८ मंत्रों में केवल एक है, किंतु अर्थ की दृष्टि से इसकी महिमा का अनुभव आरंभ में ही ऋषियों ने कर लिया था और संपूर्ण ऋग्वेद के १० सहस्र मंत्रों में इस मंत्र के अर्थ की गंभीर व्यंजना सबसे अधिक की गई। इस मंत्र में २४ अक्षर हैं। उनमें आठ आठ अक्षरों के तीन चरण हैं। किंतु ब्राह्मण ग्रंथों में और कालांतर के समस्त साहित्य में इन अक्षरों से पहले तीन व्याहृतियाँ और उनसे पूर्व प्रणव या ओंकार को जोड़कर मंत्र का पूरा स्वरूप इस प्रकार स्थिर हुआ:

(१) ॐ
(२) भूर्भव: स्व:
(३) तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्।

मंत्र के इस रूप को मनु ने सप्रणवा, सव्याहृतिका गायत्री कहा है और जप में इसी का विधान किया है।

गायत्री तत्व क्या है और क्यों इस मंत्र की इतनी महिमा है, इस प्रश्न का समाधान आवश्यक है। आर्ष मान्यता के अनुसार गायत्री एक ओर विराट् विश्व और दूसरी ओर मानव जीवन, एक ओर देवतत्व और दूसरी ओर भूततत्त्व, एक ओर मन और दूसरी ओर प्राण, एक ओर ज्ञान और दूसरी ओर कर्म के पारस्परिक संबंधों की पूरी व्याख्या कर देती है। इस मंत्र के देवता सविता हैं, सविता सूर्य की संज्ञा है, सूर्य के नाना रूप हैं, उनमें सविता वह रूप है जो समस्त देवों को प्रेरित करता है। जाग्रत् में सवितारूपी मन ही मानव की महती शक्ति है। जैसे सविता देव है वैसे मन भी देव है (देवं मन: ऋग्वेद, १,१६४,१८)। मन ही प्राण का प्रेरक है। मन और प्राण के इस संबंध की व्याख्या गायत्री मंत्र को इष्ट है। सविता मन प्राणों के रूप में सब कर्मों का अधिष्ठाता है, यह सत्य प्रत्यक्षसिद्ध है। इसे ही गायत्री के तीसरे चरण में कहा गया है। ब्राह्मण ग्रंथों की व्याख्या है-कर्माणि धिय:, अर्थातृ जिसे हम धी या बुद्धि तत्त्व कहते हैं वह केवल मन के द्वारा होनेवाले विचार या कल्पना सविता नहीं किंतु उन विचारों का कर्मरूप में मूर्त होना है। यही उसकी चरितार्थता है। किंतु मन की इस कर्मक्षमशक्ति के लिए मन का सशक्त या बलिष्ठ होना आवश्यक है। उस मन का जो तेज कर्म की प्रेरण के लिए आवश्यक है वही वरेण्य भर्ग है। मन की शक्तियों का तो पारवार नहीं है। उनमें से जितना अंश मनुष्य अपने लिए सक्षम बना पाता है, वहीं उसके लिए उस तेज का वरणीय अंश है। अतएव सविता के भर्ग की प्रार्थना में विशेष ध्वनि यह भी है कि सविता या मन का जो दिव्य अंश है वह पार्थिव या भूतों के धरातल पर अवतीर्ण होकर पार्थिव शरीर में प्रकाशित हो। इस गायत्री मंत्र में अन्य किसी प्रकार की कामना नहीं पाई जाती। यहाँ एक मात्र अभिलाषा यही है कि मानव को ईश्वर की ओर से मन के रूप में जो दिव्य शक्ति प्राप्त हुई है उसके द्वारा वह उसी सविता का ज्ञान करे और कर्मों के द्वारा उसे इस जीवन में सार्थक करे।

गायत्री के पूर्व में जो तीन व्याहृतियाँ हैं, वे भी सहेतुक हैं। भू पृथ्वीलोक, ऋग्वेद, अग्नि, पार्थिव जगत् और जाग्रत् अवस्था का सूचक है। भुव: अंतरिक्षलोक, यजुर्वेद, वायु देवता, प्राणात्मक जगत् और स्वप्नावस्था का सूचक है। स्व: द्युलोक, सामवेद, आदित्यदेवता, मनोमय जगत् और सुषुप्ति अवस्था का सूचक है। इस त्रिक के अन्य अनेक प्रतीक ब्राह्मण, उपनिषद् और पुराणों में कहे गए हैं, किंतु यदि त्रिक के विस्तार में व्याप्त निखिल विश्व को वाक के अक्षरों के संक्षिप्त संकेत में समझना चाहें तो उसके लिए ही यह ॐ संक्षिप्त संकेत गायत्री के आरंभ में रखा गया है। अ, उ, म इन तीनों मात्राओं से ॐ का स्वरूप बना है। अ अग्नि, उ वायु और म आदित्य का प्रतीक है। यह विश्व प्रजापति की वाक है। वाक का अनंत विस्तार है किंतु यदि उसका एक संक्षिप्त नमूना लेकर सारे विश्व का स्वरूप बताना चाहें तो अ, उ, म या ॐ कहने से उस त्रिक का परिचय प्राप्त होगा जिसका स्फुट प्रतीक त्रिपदा गायत्री है।

विविध धर्म-सम्प्रदायों मे गायत्री महामंत्र का भाव

हिन्दू – ईश्वर प्राणाधार, दुःखनाशक तथा सुख स्वरूप है। हम प्रेरक देव के उत्तम तेज का ध्यान करें। जो हमारी बुद्धि को सन्मार्ग पर बढ़ाने के लिए पवित्र प्रेरणा दें।

यहूदी – हे जेहोवा (परमेश्वर) अपने धर्म के मार्ग में मेरा पथ-प्रदर्शन कर, मेरे आगे अपने सीधे मार्ग को दिखा।

शिंतो – हे परमेश्वर, हमारे नेत्र भले ही अभद्र वस्तु देखें परन्तु हमारे हृदय में अभद्र भाव उत्पन्न न हों। हमारे कान चाहे अपवित्र बातें सुनें, तो भी हमारे में अभद्र बातों का अनुभव न हो।

पारसी – वह परमगुरु (अहुरमज्द-परमेश्वर) अपने ऋत तथा सत्य के भंडार के कारण, राजा के समान महान है। ईश्वर के नाम पर किये गये परोपकारों से मनुष्य प्रभु प्रेम का पात्र बनता है।

दाओ (ताओ) – दाओ (ब्रह्म) चिन्तन तथा पकड़ से परे है। केवल उसी के अनुसार आचरण ही उ8ाम धर्म है।

जैन – अर्हन्तों को नमस्कार, सिद्धों को नमस्कार, आचार्यों को नमस्कार, उपाध्यायों को नमस्कार तथा सब साधुओं को नमस्कार।

बौद्ध धर्म – मैं बुद्ध की शरण में जाता हूँ, मैं धर्म की शरण में जाता हूँ, मैं संघ की शरण में जाता हूँ।

कनफ्यूशस – दूसरों के प्रति वैसा व्यवहार न करो, जैसा कि तुम उनसे अपने प्रति नहीं चाहते।

सिख – ओंकार (ईश्वर) एक है। उसका नाम सत्य है। वह सृष्टिकर्ता, समर्थ पुरुष, निर्भय, र्निवैर, जन्मरहित तथा स्वयंभू है। वह गुरु की कृपा से जाना जाता है।

बहाई – हे मेरे ईश्वर, मैं साक्षी देता हूँ कि तुझे पहचानने तथा तेरी ही पूजा करने के लिए तूने मुझे उत्पन्न किया है। तेरे अतिरिक्त अन्य कोई परमात्मा नहीं है। तू ही है भयानक संकटों से तारनहार तथा स्व निर्भर।

गायत्री उपासना का विधि-विधान

गायत्री उपासना कभी भी, किसी भी स्थिति में की जा सकती है। हर स्थिति में यह लाभदायी है, परन्तु विधिपूर्वक भावना से जुड़े न्यूनतम कर्मकाण्डों के साथ की गयी उपासना अति फलदायी मानी गयी है। तीन माला गायत्री मंत्र का जप आवश्यक माना गया है। शौच-स्नान से निवृत्त होकर नियत स्थान, नियत समय पर, सुखासन में बैठकर नित्य गायत्री उपासना की जानी चाहिए।

उपासना का विधि-विधान इस प्रकार है :-

(१) ब्रह्म सन्ध्या – जो शरीर व मन को पवित्र बनाने के लिए की जाती है। इसके अंतर्गत पाँच कृत्य करने होते हैं।

(अ) पवित्रीकरण – बाएँ हाथ में जल लेकर उसे दाहिने हाथ से ढँक लें एवं मंत्रोच्चारण के बाद जल को सिर तथा शरीर पर छिड़क लें।

ॐ अपवित्रः पवित्रो वा, सर्वावस्थांगतोऽपि वा।
यः स्मरेत्पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः॥
ॐ पुनातु पुण्डरीकाक्षः पुनातु पुण्डरीकाक्षः पुनातु।

(ब) आचमन – वाणी, मन व अंतःकरण की शुद्धि के लिए चम्मच से तीन बार जल का आचमन करें। हर मंत्र के साथ एक आचमन किया जाए।

ॐ अमृतोपस्तरणमसि स्वाहा।
ॐ अमृतापिधानमसि स्वाहा।
ॐ सत्यं यशः श्रीर्मयि श्रीः श्रयतां स्वाहा।

(स) शिखा स्पर्श एवं वंदन – शिखा के स्थान को स्पर्श करते हुए भावना करें कि गायत्री के इस प्रतीक के माध्यम से सदा सद्विचार ही यहाँ स्थापित रहेंगे। निम्न मंत्र का उच्चारण करें।

ॐ चिद्रूपिणि महामाये, दिव्यतेजः समन्विते।
तिष्ठ देवि शिखामध्ये, तेजोवृद्धिं कुरुष्व मे॥

(द) प्राणायाम – श्वास को धीमी गति से गहरी खींचकर रोकना व बाहर निकालना प्राणायाम के क्रम में आता है। श्वास खींचने के साथ भावना करें कि प्राण शक्ति, श्रेष्ठता श्वास के द्वारा अंदर खींची जा रही है, छोड़ते समय यह भावना करें कि हमारे दुर्गुण, दुष्प्रवृत्तियाँ, बुरे विचार प्रश्वास के साथ बाहर निकल रहे हैं। प्राणायाम निम्न मंत्र के उच्चारण के साथ किया जाए।

ॐ भूः ॐ भुवः ॐ स्वः ॐ महः, ॐ जनः ॐ तपः ॐ सत्यम्। ॐ तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्। ॐ आपोज्योतीरसोऽमृतं, ब्रह्म भूर्भुवः स्वः ॐ।

(य) न्यास – इसका प्रयोजन है-शरीर के सभी महत्त्वपूर्ण अंगों में पवित्रता का समावेश तथा अंतः की चेतना को जगाना ताकि देव-पूजन जैसा श्रेष्ठ कृत्य किया जा सके। बाएँ हाथ की हथेली में जल लेकर दाहिने हाथ की पाँचों उँगलियों को उनमें भिगोकर बताए गए स्थान को मंत्रोच्चार के साथ स्पर्श करें।

ॐ वां मे आस्येऽस्तु। (मुख को)
ॐ नसोर्मे प्राणोऽस्तु। (नासिका के दोनों छिद्रों को)
ॐ अक्ष्णोर्मे चक्षुरस्तु। (दोनों नेत्रों को)
ॐ कर्णयोर्मे श्रोत्रमस्तु। (दोनों कानों को)
ॐ बाह्वोर्मे बलमस्तु। (दोनों भुजाओं को)
ॐ ऊर्वोमे ओजोऽस्तु। (दोनों जंघाओं को)
ॐ अरिष्टानि मेऽंगानि, तनूस्तन्वा मे सह सन्तु। (समस्त शरीर पर)

आत्मशोधन की ब्रह्म संध्या के उपरोक्त पाँचों कृत्यों का भाव यह है कि सााधक में पवित्रता एवं प्रखरता की अभिवृद्धि हो तथा मलिनता-अवांछनीयता की निवृत्ति हो। पवित्र-प्रखर व्यक्ति ही भगवान के दरबार में प्रवेश के अधिकारी होते हैं।

(२) देवपूजन – गायत्री उपासना का आधार केन्द्र महाप्रज्ञा-ऋतम्भरा गायत्री है। उनका प्रतीक चित्र सुसज्जित पूजा की वेदी पर स्थापित कर उनका निम्न मंत्र के माध्यम से आवाहन करें। भावना करें कि साधक की प्रार्थना के अनुरूप माँ गायत्री की शक्ति वहाँ अवतरित हो, स्थापित हो रही है।

ॐ आयातु वरदे देवि त्र्यक्षरे ब्रह्मवादिनि।
गायत्रिच्छन्दसां मातः! ब्रह्मयोने नमोऽस्तु ते॥
ॐ श्री गायत्र्यै नमः। आवाहयामि, स्थापयामि, ध्यायामि, ततो नमस्कारं करोमि।

(ख) गुरु – गुरु परमात्मा की दिव्य चेतना का अंश है, जो साधक का मार्गदर्शन करता है। सद्गुरु के रूप में पूज्य गुरुदेव एवं वंदनीया माताजी का अभिवंदन करते हुए उपासना की सफलता हेतु गुरु आवाहन निम्न मंत्रोच्चारण के साथ करें।

ॐ गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः, गुरुरेव महेश्वरः।
गुरुरेव परब्रह्म, तस्मै श्रीगुरवे नमः॥
अखण्डमंडलाकारं, व्याप्तं येन चराचरम्।
तत्पदं दर्शितं येन, तस्मै श्रीगुरवे नमः॥
ॐ श्रीगुरवे नमः, आवाहयामि, स्थापयामि, ध्यायामि।

(ग) माँ गायत्री व गुरु सत्ता के आवाहन व नमन के पश्चात् देवपूजन में घनिष्ठता स्थापित करने हेतु पंचोपचार द्वारा पूजन किया जाता है। इन्हें विधिवत् संपन्न करें। जल, अक्षत, पुष्प, धूप-दीप तथा नैवेद्य प्रतीक के रूप में आराध्य के समक्ष प्रस्तुत किये जाते हैं। एक-एक करके छोटी तश्तरी में इन पाँचों को समर्पित करते चलें। जल का अर्थ है – नम्रता-सहृदयता। अक्षत का अर्थ है – समयदान अंशदान। पुष्प का अर्थ है – प्रसन्नता-आंतरिक उल्लास। धूप-दीप का अर्थ है – सुगंध व प्रकाश का वितरण, पुण्य-परमार्थ तथा नैवेद्य का अर्थ है – स्वभाव व व्यवहार में मधुरता-शालीनता का समावेश।

ये पाँचों उपचार व्यक्तित्व को सत्प्रवृत्तियों से संपन्न करने के लिए किये जाते हैं। कर्मकाण्ड के पीछे भावना महत्त्वपूर्ण है।

(३) जप – गायत्री मंत्र का जप न्यूनतम तीन माला अर्थात् घड़ी से प्रायः पंद्रह मिनट नियमित रूप से किया जाए। अधिक बन पड़े, तो अधिक उत्तम। होठ हिलते रहें, किन्तु आवाज इतनी मंद हो कि पास बैठे व्यक्ति भी सुन न सकें। जप प्रक्रिया कषाय-कल्मषों-कुसंस्कारों को धोने के लिए की जाती है।

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।

इस प्रकार मंत्र का उच्चारण करते हुए माला की जाय एवं भावना की जाय कि हम निरन्तर पवित्र हो रहे हैं। दुर्बुद्धि की जगह सद्बुद्धि की स्थापना हो रही है।

(४) ध्यान – जप तो अंग-अवयव करते हैं, मन को ध्यान में नियोजित करना होता है। साकार ध्यान में गायत्री माता के अंचल की छाया में बैठने तथा उनका दुलार भरा प्यार अनवरत रूप से प्राप्त होने की भावना की जाती है। निराकार ध्यान में गायत्री के देवता सविता की प्रभातकालीन स्वर्णिम किरणों को शरीर पर बरसने व शरीर में श्रद्धा-प्रज्ञा-निष्ठा रूपी अनुदान उतरने की भावना की जाती है, जप और ध्यान के समन्वय से ही चित्त एकाग्र होता है और आत्मसत्ता पर उस क्रिया का महत्त्वपूर्ण प्रभाव भी पड़ता है।

(५) सूर्यार्घ्यदान – विसर्जन-जप समाप्ति के पश्चात् पूजा वेदी पर रखे छोटे कलश का जल सूर्य की दिशा में र्अघ्य रूप में निम्न मंत्र के उच्चारण के साथ चढ़ाया जाता है।

ॐ सूर्यदेव! सहस्रांशो, तेजोराशे जगत्पते।
अनुकम्पय मां भक्त्या गृहाणार्घ्यं दिवाकर॥
ॐ सूर्याय नमः, आदित्याय नमः, भास्कराय नमः॥

भावना यह करें कि जल आत्म सत्ता का प्रतीक है एवं सूर्य विराट् ब्रह्म का तथा हमारी सत्ता-सम्पदा समष्टि के लिए समर्पित-विसर्जित हो रही है।

इतना सब करने के बाद पूजा स्थल पर देवताओं को करबद्ध नतमस्तक हो नमस्कार किया जाए व सब वस्तुओं को समेटकर यथास्थान रख दिया जाए। जप के लिए माला तुलसी या चंदन की ही लेनी चाहिए। सूर्योदय से दो घण्टे पूर्व से सूर्यास्त के एक घंटे बाद तक कभी भी गायत्री उपासना की जा सकती है।[2] मौन-मानसिक जप चौबीस घण्टे किया जा सकता है। माला जपते समय तर्जनी उंगली का उपयोग न करें तथा सुमेरु का उल्लंघन न करें।

मां गायत्री चालीसा…

ह्रीं श्रीं क्लीं मेधा प्रभा जीवन ज्योति प्रचंड ॥ शांति कांति जागृत प्रगति रचना शक्ति अखंड ॥1॥
जगत जननी मंगल करनि गायत्री सुखधाम ।
प्रणवों सावित्री स्वधा स्वाहा पूरन काम ॥२॥
भूर्भुवः स्वः ॐ युत जननी । गायत्री नित कलिमल दहनी ॥॥
अक्षर चौबीस परम पुनीता । इनमें बसें शास्त्र श्रुति गीता ॥॥
शाश्वत सतोगुणी सत रूपा । सत्य सनातन सुधा अनूपा ॥॥
हंसारूढ श्वेतांबर धारी । स्वर्ण कांति शुचि गगन-बिहारी ॥॥
पुस्तक पुष्प कमंडलु माला । शुभ्र वर्ण तनु नयन विशाला ॥॥
ध्यान धरत पुलकित हित होई । सुख उपजत दुख दुर्मति खोई ॥॥
कामधेनु तुम सुर तरु छाया । निराकार की अद्भुत माया ॥॥
तुम्हरी शरण गहै जो कोई । तरै सकल संकट सों सोई ॥॥
सरस्वती लक्ष्मी तुम काली । दिपै तुम्हारी ज्योति निराली ॥॥
तुम्हरी महिमा पार न पावैं । जो शारद शत मुख गुन गावैं ॥॥
चार वेद की मात पुनीता । तुम ब्रह्माणी गौरी सीता ॥॥
महामंत्र जितने जग माहीं । कोउ गायत्री सम नाहीं ॥॥
सुमिरत हिय में ज्ञान प्रकासै । आलस पाप अविद्या नासै ॥॥
सृष्टि बीज जग जननि भवानी । कालरात्रि वरदा कल्याणी ॥॥
ब्रह्मा विष्णु रुद्र सुर जेते । तुम सों पावें सुरता तेते ॥॥
तुम भक्तन की भक्त तुम्हारे । जननिहिं पुत्र प्राण ते प्यारे ॥॥
महिमा अपरम्पार तुम्हारी । जय जय जय त्रिपदा भयहारी ॥॥
पूरित सकल ज्ञान विज्ञाना । तुम सम अधिक न जगमें आना ॥॥
तुमहिं जानि कछु रहै न शेषा । तुमहिं पाय कछु रहै न क्लेसा ॥॥
जानत तुमहिं तुमहिं व्है जाई । पारस परसि कुधातु सुहाई ॥॥
तुम्हरी शक्ति दिपै सब ठाई । माता तुम सब ठौर समाई ॥॥
ग्रह नक्षत्र ब्रह्मांड घनेरे । सब गतिवान तुम्हारे प्रेरे ॥॥
सकल सृष्टि की प्राण विधाता । पालक पोषक नाशक त्राता ॥॥
मातेश्वरी दया व्रत धारी । तुम सन तरे पातकी भारी ॥॥
जापर कृपा तुम्हारी होई । तापर कृपा करें सब कोई ॥॥
मंद बुद्धि ते बुधि बल पावें । रोगी रोग रहित हो जावें ॥॥
दरिद्र मिटै कटै सब पीरा । नाशै दुख हरै भव भीरा ॥॥
गृह क्लेश चित चिंता भारी । नासै गायत्री भय हारी ॥॥
संतति हीन सुसंतति पावें । सुख संपति युत मोद मनावें ॥॥
भूत पिशाच सबै भय खावें । यम के दूत निकट नहिं आवें ॥॥
जो सधवा सुमिरें चित लाई । अछत सुहाग सदा सुखदाई ॥॥
घर वर सुख प्रद लहैं कुमारी । विधवा रहें सत्य व्रत धारी ॥॥
जयति जयति जगदंब भवानी । तुम सम ओर दयालु न दानी ॥॥
जो सतगुरु सो दीक्षा पावे । सो साधन को सफल बनावे ॥॥
सुमिरन करे सुरूचि बडभागी । लहै मनोरथ गृही विरागी ॥॥
अष्ट सिद्धि नवनिधि की दाता । सब समर्थ गायत्री माता ॥॥
ऋषि मुनि यती तपस्वी योगी । आरत अर्थी चिंतित भोगी ॥॥
जो जो शरण तुम्हारी आवें । सो सो मन वांछित फल पावें ॥॥
बल बुधि विद्या शील स्वभाउ । धन वैभव यश तेज उछाउ ॥॥
सकल बढें उपजें सुख नाना । जे यह पाठ करै धरि ध्याना ॥
यह चालीसा भक्ति युत पाठ करै जो कोई । तापर कृपा प्रसन्नता गायत्री की होय ॥

गायत्री मन्त्र साधना एवं स्तुति

यदक्षरैकसंसिद्धेः स्पर्धते ब्राह्मणोंत्तमः।
हरिशंकरकंजोत्थ सूर्यचन्द्रहुतेताशने।। -गायत्री पुर.११

गायत्री के एक अक्षर की सिद्धि मात्र से हरि, शंकर, ब्रह्मा, सूर्य, चन्द्र, अग्नि आदि देवताओं से भी साधक स्पर्धा करने लगता है।

शौनक ऋषि का मत है- अन्य उपासनायें करें या न करें, केवल गायत्री जप से द्विज जीवन मुक्त हो जाता है । सांसारिक और पारलौकिक समस्त सुखों को पाता है । संकट के समय दस हजार जप करने से विपत्ति का निवारण होता है।

गायत्री साधना माता की चरण वंदना के समान है, यह कभी निष्फल नहीं होती । उल्टा परिणाम भी नहीं होता, भूल हो जाने पर अनिष्ठ की कोई आशंका नहीं । इसलिए निर्भय और प्रसन्न होकर चित्त से उपासना करनी चाहिए । अन्य मंत्र अवधिपूर्वक जपे जाने पर अनिष्ठ करते हैं, पर गायत्री में यह बात नहीं है । वह सर्वसुलभ, अत्यंत सुगम और सब प्रकार सुसाध्य है । हाँ, तांत्रिक विधि से की गयी उपासना पूर्ण विधि- विधान के साथ होनी चाहिए, उसमें अंतर पड़ना हानिकारक है।

गायत्री साधना…

जगत पिता ब्रह्मा को आकाशवाणी से गायत्री मंत्र की प्राप्ति हुई थी। इस मंत्र की साधना के बाद उन्हें सृष्टि निर्माण की शक्ति प्राप्त हुई थी।
गायत्री की विवेचना के रूप में ब्रह्मा जी ने चार वेदों की रचना करी। तभी तो देवी गायत्री को वेदमाता कह कर संबोधित किया जाता है।
गायत्री सबसे बड़ा मंत्र है। उससे बड़ा और कोई मंत्र नहीं है। गायत्री का एक-एक अक्षर एक-एक धर्म शास्त्र है। इन अक्षरों की व्याख्या स्वरुप ब्रह्मा जी ने चारों वेदों की रचना की और उनका अर्थ बताने के लिए ऋषियों ने अन्य धर्म-ग्रंथ बनाए। संसार में जितना भी ज्ञान-विज्ञान है वह बीज रूप में इन अक्षरों में भरा हुआ है।
गायत्री के अक्षरों का आपसी गुंथन, स्वर-विज्ञान और शब्द शास्त्र ऐसे रहस्यमय आधार पर हुआ है कि उसके उच्चारण मात्र से सूक्ष्म शरीर में छिपे हुए अनेक शक्ति-केन्द्र अपने आप जागृत होते हैं।
सूक्ष्म देह के अंग-प्रत्यंगों में अनेक चक्र-उपचक्र , ग्रंथियां, मातृकाएं, उपत्यकाएं, भ्रमर मेरु आदि ऐसे गुप्त संस्थान होते हैं जिनका विकास होने से साधारण सा मनुष्य प्राणी अनंत शक्तियों का स्वामी बन सकता है।

गायत्री स्तुति…

ॐ स्तुता मया वरदा वेदमाता प्रचोदयंताम् पावमानी द्विजानाम्।।
आयुः प्राणम् प्रजाम् पशुम् कीर्तिम् द्रविड़म्।।
ब्रह्मवर्चसम् मह्यम् दत्वा ब्रजत ब्रह्मलोकम्।। -अथर्ववेद

अर्थात्:- गायत्री वेदों की माता हैं। वह अपने उपासकों को आयु, प्राण (शक्ति), प्रजा , पशु, कीर्ति (यश), धन, ब्रह्मतेज तथा अंत में आत्मज्ञान प्रदान करती हुईं ब्रह्मलोक को ले जाती हैं।

गायत्री मन्त्र के चमत्कारी चौबीस अक्षर!

मंत्र जप एक ऐसा उपाय है, जिससे सभी समस्याएं दूर हो सकती हैं। शास्त्रों में मंत्रों को बहुत शक्तिशाली और चमत्कारी बताया गया है। सबसे ज्यादा प्रभावी मंत्रों में से एक मंत्र है गायत्री मंत्र। इसके जप से बहुत जल्दी शुभ फल प्राप्त हो सकते हैं।

गायत्री वेदजननी गायत्री पापनाशिनी।
गायत्र्या: परमं नास्ति दिवि चेह च पावनम्।। -शंखस्मृति

अर्थात्:- ‘गायत्री वेदों की जननी है। गायत्री पापों का नाश करने वाली है। गायत्री से अन्य कोई पवित्र करने वाला मन्त्र स्वर्ग और पृथिवी पर नहीं है।’

सृष्टिकर्ता ब्रह्मा से लेकर आधुनिक काल तक ऋषि-मुनियों, साधु-महात्माओं और अपना कल्याण चाहने वाले मनुष्यों ने गायत्री मन्त्र का आश्रय लिया है। यह मन्त्र यजुर्वेद व सामवेद में आया है लेकिन सभी वेदों में किसी-न-किसी संदर्भ में इसका बार-बार उल्लेख है। स्वामी करपात्रीजी के शब्दों में गायत्री मन्त्र का जो अभिप्राय है वही वेदों का अर्थ है।

गायत्री का शाब्दिक अर्थ है– ’गायत् त्रायते’ अर्थात् गाने वाले का त्राण करने वाली। गायत्री मन्त्र गायत्री छन्द में रचा गया अत्यन्त प्रसिद्ध मन्त्र है। इसके देवता सविता हैं और ऋषि विश्वामित्र हैं। मन्त्र है–

ॐ भुर्भुवःतत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि।
धियो यो न: प्रचोदयात्।।

ॐ व भू: भुव: स्व: का अर्थ,गायत्री मन्त्र से पहले ॐ लगाने का विधान है। इसे प्रणव कहा जाता है। प्रणव परब्रह्म परमात्मा का नाम है। ‘ओम’ के अ+उ+म् इन तीन अक्षरों को ब्रह्मा, विष्णु और शिव का रूप माना गया है। गायत्री मन्त्र से पहले ॐ के बाद भू: भुव: स्व: लगाकर ही मन्त्र का जप करना चाहिए। ये गायत्री मन्त्र के बीज हैं। बीजमन्त्र का जप करने से ही साधना सफल होती है। अत: ॐ और बीजमन्त्रों सहित गायत्री मन्त्र इस प्रकार है–

ॐ भू: भुव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि। धियो यो न: प्रचोदयात्।।

भावार्थ:- ‘पृथ्वीलोक, भुवर्लोक और स्वर्लोक में व्याप्त उस श्रेष्ठ परमात्मा (सूर्यदेव) का हम ध्यान करते हैं, जो हमारी बुद्धि को श्रेष्ठ कर्मों की ओर प्रेरित करे।’

प्रात: काल गायत्री मन्त्र का जप खड़े होकर तब तक करें जब तक सूर्य भगवान के दर्शन न हो जाएं। संध्याकाल में गायत्री का जप बैठकर तब तक करें जब तक तारे न दीख जाएं। गायत्री मन्त्र का एक हजार बार जाप सबसे उत्तम माना गया है।

गायत्री मन्त्र में चौबीस अक्षर हैं। ऋषियों ने इन अक्षरों में बीजरूप में विद्यमान उन शक्तियों को पहचाना जिन्हें चौबीस अवतार, चौबीस ऋषि, चौबीस शक्तियां तथा चौबीस सिद्धियां कहा जाता है। गायन्त्री मन्त्र के चौबीस अक्षरों के चौबीस देवता हैं। उनकी चौबीस चैतन्य शक्तियां हैं। गायत्री मन्त्र के चौबीस अक्षर २४ शक्ति बीज हैं। गायत्री मन्त्र की उपासना करने से उन २४ शक्तियों का लाभ और सिद्धियां मिलती हैं। उन शक्तियों के द्वारा क्या-क्या लाभ मिल सकते हैं, उनका वर्णन इस प्रकार हैं–

१. तत्…
देवता– गणेश, सफलता शक्ति।
फल– कठिन कामों में सफलता, विघ्नों का नाश, बुद्धि की वृद्धि।

२. स…
देवता– नरसिंह, पराक्रम शक्ति।
फल– पुरुषार्थ, पराक्रम, वीरता, शत्रुनाश, आतंक-आक्रमण से रक्षा।

३. वि…
देवता– विष्णु, पालन शक्ति।
फल– प्राणियों का पालन, आश्रितों की रक्षा, योग्यताओं की वृद्धि।

४. तु:…
देवता– शिव, कल्याण शक्ति।
फल– अनिष्ट का विनाश, कल्याण की वृद्धि, निश्चयता, आत्मपरायणता।

५. व…
देवता– श्रीकृष्ण, योग शक्ति।
फल– क्रियाशीलता, कर्मयोग, सौन्दर्य, सरसता, अनासक्ति, आत्मनिष्ठा।

६. रे…
देवता– राधा, प्रेम शक्ति।
फल– प्रेम-दृष्टि, द्वेषभाव की समाप्ति।

७. णि…
देवता- लक्ष्मी, धन शक्ति।
फल- धन, पद, यश और भोग्य पदार्थों की प्राप्ति।

८. यं…
देवता- अग्नि, तेज शक्ति।
फल –उष्णता, प्रकाश, शक्ति और सामर्थ्य की वृद्धि, प्रतिभाशाली और तेजस्वी होना।

९. भ…
देवता- इन्द्र, रक्षा शक्ति।
फल- रोग, हिंसक चोर, शत्रु, भूत-प्रेतादि के आक्रमणों से रक्षा।

१०. र्गो…
देवता- सरस्वती, बुद्धि शक्ति।
फल– मेधा की वृद्धि, बुद्धि में पवित्रता, दूरदर्शिता, चतुराई, विवेकशीलता।

११. दे…
देवता- दुर्गा, दमन शक्ति।
*फल- विघ्नों पर विजय, दुष्टों का दमन, शत्रुओं का संहार।

१२. व…
देवता- हनुमान, निष्ठा शक्ति।
फल- कर्तव्यपरायणता, निष्ठावान, विश्वासी, निर्भयता एवं ब्रह्मचर्य-निष्ठा।

१३. स्य…
देवता- पृथिवी, धारण शक्ति।
फल- गम्भीरता, क्षमाशीलता, भार वहन करने की क्षमता, सहिष्णुता, दृढ़ता, धैर्य।

१४. धी…
देवता- सूर्य, प्राण शक्ति।
फल- आरोग्य-वृद्धि, दीर्घ जीवन, विकास, वृद्धि, उष्णता, विचारों का शोधन।

१५. म…
देवता- श्रीराम, मर्यादा शक्ति।
फल- तितिक्षा, कष्ट में विचलित न होना, मर्यादापालन, मैत्री, सौम्यता, संयम।

१६. हि…
देवता- श्रीसीता, तप शक्ति।
फल- निर्विकारता, पवित्रता, शील, मधुरता, नम्रता, सात्विकता।

१७. धि…
देवता- चन्द्र, शान्ति शक्ति।
फल- उद्विग्नता का नाश, काम, क्रोध, लोभ, मोह, चिन्ता का निवारण, निराशा के स्थान पर आशा का संचार।

१८. यो…
देवता- यम, काल शक्ति।
फल- मृत्यु से निर्भयता, समय का सदुपयोग, स्फूर्ति, जागरुकता।

१९. यो…
देवता- ब्रह्मा, उत्पादक शक्ति।
फल- संतानवृद्धि, उत्पादन शक्ति की वृद्धि।

२०. न:..
देवता– वरुण, रस शक्ति।
फल- भावुकता, सरलता, कला से प्रेम, दूसरों के लिए दयाभावना, कोमलता, प्रसन्नता, आर्द्रता, माधुर्य, सौन्दर्य।

२१. प्र…
देवता- नारायण, आदर्श शक्ति।
फल- महत्वकांक्षा-वृद्धि, दिव्य गुण-स्वभाव, उज्जवल चरित्र, पथ-प्रदर्शक कार्यशैली।

२२. चो…
देवता- हयग्रीव, साहस शक्ति।
फल– उत्साह, वीरता, निर्भयता, शूरता, विपदाओं से जूझने की शक्ति, पुरुषार्थ।

२३. द…
देवता- हंस, विवेक शक्ति।
फल- उज्जवल कीर्ति, आत्म-सन्तोष, दूरदर्शिता, सत्संगति, सत्-असत् का निर्णय लेने की क्षमता, उत्तम आहार-विहार।

२४. यात्…
देवता- तुलसी, सेवा शक्ति।
फल- लोकसेवा में रुचि, सत्यनिष्ठा, पातिव्रत्यनिष्ठा, आत्म-शान्ति, परदु:ख-निवारण।

गायत्री मन्त्र छोटा सा है, पर इतने थोड़े से अक्षरों में ही अनन्त ज्ञान का समुद्र भरा पड़ा है। महर्षि व्यास कहते है–जिस प्रकार पुष्पों का सार शहद, दूध का सार घृत है, उसी प्रकार समस्त वेदों का सार गायत्री मन्त्र है।

अथर्ववेद में वेदमाता गायत्री की स्तुति की गयी है, जिसमें उसे आयु, प्राण, शक्ति, पशु, कीर्ति, धन और ब्रह्मतेज प्रदान करने वाली कहा गया है।

गांधीजी के शब्दों में– ‘गायत्री मन्त्र का निरन्तर जप रोगियों को अच्छा करने और आत्मा की उन्नति करने के लिए उपयोगी है। गायत्री मन्त्र का स्थिर चित्त और शान्त हृदय से किया हुआ जप आपत्तिकाल के संकटों को दूर करने का प्रभाव रखता है।’

रवीन्द्रनाथ टैगोर के शब्दों में–‘भारतवर्ष को जगाने वाला जो मन्त्र है, वह इतना सरल है कि एक श्वांस में उसका उच्चारण किया जा सकता है। वह है–गायत्री मन्त्र। उस पुनीत मन्त्र का अभ्यास करने में किसी प्रकार के तार्किक ऊहापोह, किसी प्रकार के मतभेद अथवा किसी प्रकार के बखेड़े की गुंजायश नहीं है।’

स्वामी रामकृष्ण परमहंस कहते हैं–‘इस छोटी-सी गायत्री की साधना करके देखो। गायत्री का जप करने से बड़ी-बड़ी सिद्धियां मिल जाती हैं। यह मन्त्र छोटा है पर इसकी शक्ति बड़ी भारी है।’

स्वामी विवेकानन्द का कथन है–‘परमात्मा से मांगने योग्य वस्तु सद्बुद्धि (अच्छी बुद्धि) है। गायत्री सद्बुद्धि का मन्त्र है। इसलिए इसे मन्त्रों का मुकुटमणि कहा है।’

स्वामी शिवानन्दजी कहते हैं–‘ब्रह्ममुहुर्त में गायत्री मन्त्र का जप करने से चित्त शुद्ध होता है और हृदय में निर्मलता आती है। शरीर निरोग रहता है, स्वभाव में नम्रता आती है, बुद्धि सूक्ष्म होने से दूरदर्शिता बढ़ती है और स्मरणशक्ति का विकास होता है। कठिन स्थितियों में गायत्री मन्त्र द्वारा दैवी सहायता मिलती है।’

गायत्री मन्त्र का दूसरा नाम ‘तारक मन्त्र’ भी है। तारक अर्थात् तैराकर पार निकाल देने वाला।

गायत्री मन्त्र जप का महात्म्य…

1. एक बाबा थे जो वृन्दावन में रहेते थे. गायत्री मंत्र का अनुष्ठान किया साल, 2साल, 3साल, 12साल बीत गये बाबा ने देखा की कोई फ़ायदा नही हुआ चमत्कार नही हुआ कोई विशेषता का अनुभव नही हुआ अब क्या करे?

बाबा का नाम था माधवाचार्य स्वामी 13 वर्ष गायत्री मंत्र के अनुष्ठान करने के बाद भी कोई विशेष अनुभव नही हुआ तो किसी ने कहा की तुम वाराणसी चले जाओ.

तो बाबा वाराणसी आए. माधवाचार्य स्वामी इधर उधर साधु संतों में घूमते हुए एक अघोरी बाबा के पास जा पहुँचे.

अघोरी बाबा ने कहा, तुम जो गायत्री वायत्री करते हो, छोड़ दो मैं तुम को मंत्र देता हूँ.

शिव महिम्न स्त्रोत्र में आता है की:

महिशानाम परो देवों महिमानम परास्तुति.
अघोरानाम परो मंत्रो नास्ति तत्वों गुरु परम.

तो अघोरी ने कहा की मैं तुम को मंत्र देता हूँ एक महीने में चमत्कार हो जाएगा. माधवाचार्य स्वामी ने अघोरी का मंत्र ले लिया. 1 महीना पूरा हुआ. आवाज़ आई: मैं प्रसन्न हूँ प्रसन्न हूँ वरदान माँग लो!

माधवाचार्य स्वामी बोले: आप कौन है सामने प्रगट होने की कृपा करे तब मैं वरदान माँगूंगा.

बोले: तुम ने 13 साल जप किया है. जो भी भगवन नाम जप करते उन के मुख मंडल पे अध्यात्मिक आभा ऐसी छा जाती है की लौकिक ढंग से नही दिखती है. लेकिन आधीदैविक जगत में उस का प्रभाव पड़ता है. तो उस के प्रभाव में हम सामने प्रगट नही हो सकते.

माधवाचार्य स्वामी बोले: मैं ने गायत्री मंत्र का जप किया है, उस के प्रभाव से तुम प्रगट नही हो सकते तो अब तुम से हम ये पुछते है की हम ने गायत्री जप किया तो हम को कुछ चमत्कार क्यूँ अनुभव नही हुआ?. ये बताने की कृपा करो.

बोले: तुम जब तक गायत्री मंत्र का जप कर रहे थे वो तुम्हारे पूर्व के प्रारब्ध को काट रहा था.

आप जप ध्यान करते और कोई अनुभव ना होता तब भी जप ध्यान चालू रखना चाहिए क्योकी ये जप ध्यान तुम्हारे पूर्व के दुष्कृतों को हारते हुए, अंतकरण की मलिनता मिटाते हुए, पाप राशि दोष मिटाते हुए जब शुध्दी होती है तब उस मंत्र का देवता, मंत्र की दिव्यता प्रगट होती है. तो अब आप वृंदावन में जा कर जप चालू करोगे तो कुछ ही समय में आप को मंत्र शक्ति का प्रकाश, ज्ञान, दिव्य प्रेरणा होगी.

वो बाबा वाराणसी छोड़ के वापस वृंदावन चले गये. और उन को अंतर प्रेरणा हुई जड़ी बूटियों का ज्ञान होने लगा. और उन्हों ने एक ग्रंथ लिखा: “माधव निदानम्” यह आयुर्वेद में बहुत प्रसिध्द ग्रंथ है.

2. ऐसे ही एक महाराज थे आयु के २४ साल तक वाराणसी में रहे विद्यार्जन किए फिर अपने गुजरात गये माँ बाप शादी के लिए कन्या खोजते लेकिन दरिद्र माँ-बाप दरिद्र कन्या खोजे कब और कब शादी होगी? महाराज ने कहा की मैं गायत्री देवी का पुरशचरण करता हूँ ६ महीने का. माँ गायत्री प्रगट होगी संपत्तिवान होने का वरदान ले लूँगा.
एक अनुष्ठान, २ अनुष्ठान ऐसे करते करते कई अनुष्ठान हो गये. माताजी तो प्रगट नही हुई. १२ साल में बाबा ने २३ अनुष्ठान कर डाले. अब वो २४ साल के विद्यार्थी ३६ साल के हो गये. अब उन को वैराग्य आ गया. की अब ३६ साल के बाद माताजी आ भी गयी, वरदान भी दे दिया तो क्या करूँगा?. उस महाराज ने संन्यास ले लिया. बाबा ने संन्यास ले लिया और ज्यूँ ही पूर्वाभिमुख हो कर अर्घ्य देने गये तो सामने प्रकाश प्रकाश छा गया. वरम बृहयात!

महाराज बोले: माँ! अब वरदान की क्या ज़रूरत ? अब तो हम संन्यासी हो गये. अब तो भिक्षा कही भी मिल जाएगी. निवास कही भी मिल जाएगा. जब हम ने इतने २३ अनुष्ठान किए तब क्यूँ नही प्रगट हुई माँ ?

माँ बोली: विदयारण्य पिछे मूड कर देखो!

पिछे मूड कर देखा तो बड़े बड़े काले काले भयंकर अकराल विकराल पहाड़ जैसी २३ आकृतियाँ देखी.

माँ बोली की २३ ब्रम्‍ह हत्यायें तुम्हारे एक एक पुरशचरण से समाप्त हुई. जब तुम ने संन्यास लिया तो अब तुम्हारा पुण्य शुरू हुआ. इसलिए मैं आ गयी.

विदयारण्य महाराज बोले: मैय्या मुझे तो अब शादी वादी नही करनी.

माँ बोली: तो तुम्हारी विद्या तुम्हे फलेगी.

विदयारण्य स्वामी इतने प्रसिध्द विद्वान हुए की उन्होने पंचदशी नाम का ग्रंथ लिखा..उस में १५ अध्याय है।

चाहते यदि अपना कल्याण।
करो मां गायत्री का ध्यान।

करेंगी दूर सभी दु:ख व्याधि।
हरण कर कठिन पाप अभिशाप।।

मुदित हो देंगी ज्ञान सुबुद्धि।
कीर्ति वैभव सुख अडिग प्रताप।।

वेद मां की है शक्ति महान।
सहज ही हर लेती अज्ञान।।

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