वाल्मीकि रामायण- AI बालकाण्ड सर्ग- ११-२०

बालकाण्ड सर्ग- ११-२०

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बालकाण्ड सर्ग- ११-२०

॥ श्री गणेशाय नमः ॥
॥ श्री कमलापति नम: ॥
॥ श्री जानकीवल्लभो विजयते ॥
॥ श्री वाल्मीकि रामायण ॥
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बालकाण्ड सर्ग- ११-२०
बालकाण्ड सर्ग- ११-२०

AI वाल्मीकि रामायण
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बालकाण्ड सर्ग- ११-२०

AI बालकाण्ड सर्ग- ११-२०


AI वाल्मीकि रामायण- AI बालकाण्ड सर्ग- ११



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बालकाण्डम्
एकादशः सर्गः (सर्ग 11)

( सुमन्त्र के कहने से राजा दशरथ का सपरिवार अंगराज के यहाँ जाकर वहाँ से शान्ता और ऋष्यश्रृंग को अपने घर ले आना )

श्लोक:
भूय एव हि राजेन्द्र शृणु मे वचनं हितम्।
यथा स देवप्रवरः कथयामास बुद्धिमान्॥१॥

भावार्थ :-
तदनन्तर सुमन्त्र ने फिर कहा- “राजेन्द्र! आप पुनः मुझसे अपने हित की वह बात सुनिये, जिसे देवताओं में श्रेष्ठ बुद्धिमान् सनत्कुमारजी ने ऋषियों को सुनाया था॥१॥

श्लोक:
इक्ष्वाकूणां कुले जातो भविष्यति सुधार्मिकः।
नाम्ना दशरथो राजा श्रीमान् सत्यप्रतिश्रवः॥२॥

भावार्थ :-
उन्होंने कहा था- इक्ष्वाकुवंश में दशरथ नाम से प्रसिद्ध एक परम धार्मिक सत्यप्रतिज्ञ राजा होंगे॥२॥

श्लोक:
अंगराजेन सख्यं च तस्य राज्ञो भविष्यति।
कन्या चास्य महाभागा शान्ता नाम भविष्यति॥३॥

भावार्थ :-
उनकी अंगराज के साथ मित्रता होगी। दशरथ के एक परम सौभाग्यशालिनी कन्या होगी, जिसका नाम होगा ‘शान्ता’॥३॥

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बालकाण्ड सर्ग- ११-२०

वाल्मीकि रामायण- बालकाण्ड सर्ग- १२

बालकाण्डम्
द्वादशः सर्गः (सर्ग 12)

( ऋषियों का दशरथ को और दशरथ का मन्त्रियों को यज्ञ की आवश्यक तैयारी करने के लिये आदेश देना )

श्लोक:
ततः काले बहुतिथे कस्मिंश्चित् सुमनोहरे।
वसन्ते समनुप्राप्ते राज्ञो यष्टुं मनोऽभवत्॥१॥

भावार्थ :-
तदनन्तर बहुत समय बीत जाने के पश्चात् कोई परम मनोहर-दोष रहित समय प्राप्त हुआ। उस समय वसन्त ऋतु का आरम्भ हुआ था। राजा दशरथ ने उसी शुभ समय में यज्ञ आरम्भ करने का विचार किया॥१॥

श्लोक:
ततः प्रणम्य शिरसा तं विप्रं देववर्णिनम्।
यज्ञाय वरयामास संतानार्थं कुलस्य च॥२॥

भावार्थ :-
तत्पश्चात् उन्होंने देवोपम कान्ति वाले विप्रवर ऋष्यशृंग को मस्तक झुकाकर प्रणाम किया और वंशपरम्परा की रक्षा के लिये पुत्र-प्राप्ति के निमित्त यज्ञ कराने के उद्देश्य से उनका वरण किया॥२॥

श्लोक:
तथेति च स राजानमुवाच वसुधाधिपम्।
सम्भाराः सम्भ्रियन्तां ते तुरगश्च विमुच्यताम्॥३॥
सरय्वाश्चोत्तरे तीरे यज्ञभूमिर्विधीयताम्।

भावार्थ :-
ऋष्यशृंग ने ‘बहुत अच्छा’ कहकर उनकी प्रार्थना स्वीकार की और उन पृथ्वीपति नरेश से कहा- ’राजन! यज्ञ की सामग्री एकत्र कराइये। भूमण्डल में भ्रमण के लिये आपका यज्ञ सम्बन्धी अश्व छोड़ा जाय और सरयू के उत्तर तट पर यज्ञभूमि का निर्माण किया जाय’॥३ १/२॥

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बालकाण्ड सर्ग- ११-२०

वाल्मीकि रामायण- बालकाण्ड सर्ग- १३

बालकाण्डम्
त्रयोदशः सर्गः (सर्ग 13)

( यज्ञ की तैयारी, राजाओं को बुलाने के आदेश एवं उनका सत्कार तथा पत्नियों सहित राजा दशरथ का यज्ञ की दीक्षा लेना )

श्लोक:
पुनः प्राप्ते वसन्ते तु पूर्णः संवत्सरोऽभवत्।
प्रसवार्थं गतो यष्टुं हयमेधेन वीर्यवान्॥१॥

भावार्थ :-
वर्तमान वसन्त ऋतु के बीतने पर जब पुनः दूसरा वसन्त आया, तब तक एक वर्ष का समय पूरा हो गया। उस समय शक्तिशाली राजा दशरथ संतान के लिये अश्वमेध यज्ञ की दीक्षा लेने के निमित्त वसिष्ठजी के समीप गये॥१॥

श्लोक:
अभिवाद्य वसिष्ठं च न्यायतः प्रतिपूज्य च।
अब्रवीत् प्रश्रितं वाक्यं प्रसवार्थं द्विजोत्तमम्॥२॥

भावार्थ :-
वसिष्ठजी को प्रणाम करके राजा ने न्यायतः उनका पूजन किया और पुत्र-प्राप्ति का उद्देश्य लेकर उन द्विजश्रेष्ठ मुनि से यह विनययुक्त बात कही॥२॥

श्लोक:
यज्ञो मे क्रियतां ब्रह्मन् यथोक्तं मुनिपुंगव।
यथा न विघ्नाः क्रियन्ते यज्ञांगेषु विधीयताम्॥३॥

भावार्थ :-
ब्रह्मन्! मुनिप्रवर! आप शास्त्रविधि के अनुसार मेरा यज्ञ करावें और यज्ञ के अंगभूत अश्वसंचारण आदि में ब्रह्मराक्षस आदि जिस तरह विघ्न न डाल सकें, वैसा उपाय कीजिये॥३॥

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बालकाण्ड सर्ग- ११-२०

वाल्मीकि रामायण- बालकाण्ड सर्ग- १४

बालकाण्डम्
चतुर्दशः सर्गः (सर्ग 14)

( महाराज दशरथ के द्वारा अश्वमेध यज्ञ का सांगोपांग अनुष्ठान )

श्लोक:
अथ संवत्सरे पूर्णे तस्मिन् प्राप्ते तुरंगमे।
सरय्वाश्चोत्तरे तीरे राज्ञो यज्ञोऽभ्यवर्तत॥१॥

भावार्थ :-
इधर वर्ष पूरा होने पर यज्ञ सम्बन्धी अश्व भूमण्डल में भ्रमण करके लौट अया। फिर सरयू नदी के उत्तर तट पर राजा का यज्ञ आरम्भ हुआ॥१॥

श्लोक:
ऋष्यशृंगं पुरस्कृत्य कर्म चक्रुर्दिजर्षभाः।
अश्वमेधे महायज्ञे राज्ञोऽस्य सुमहात्मनः॥२॥

भावार्थ :-
महामनस्वी राजा दशरथ के उस अश्वमेध नामक महायज्ञ में ऋष्यशृंग को आगे करके श्रेष्ठ ब्राह्मण यज्ञ सम्बन्धी कर्म करने लगे॥२॥

श्लोक:
कर्म कुर्वन्ति विधिवद् याजका वेदपारगाः।
यथाविधि यथान्यायं परिक्रामन्ति शास्त्रतः॥३॥

भावार्थ :-
यज्ञ कराने वाले सभी ब्राह्मण वेदों के पारंगत विद्वान् थे; अतः वे न्याय तथा विधि के अनुसार सब कर्मों का उचित रीति से सम्पादन करते थे और शास्त्र के अनुसार किस क्रम से किस समय कौन-सी क्रिया करनी चाहिये, इसको स्मरण रखते हुए प्रत्येक कर्म में प्रवृत्त होते थे॥३॥

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बालकाण्ड सर्ग- ११-२०

वाल्मीकि रामायण- बालकाण्ड सर्ग- १५

बालकाण्डम्
पञ्चदशः सर्गः (सर्ग 15)

( ऋष्यशृंग द्वारा राजा दशरथ के पुत्रेष्टि यज्ञ का आरम्भ, ब्रह्माजी का रावण के वध का उपाय ढूँढ़ निकालना तथा भगवान् विष्णु का देवताओं को आश्वासन देना )

श्लोक:
मेधावी तु ततो ध्यात्वा स किञ्चिदिदमुत्तरम्।
लब्धसंज्ञस्ततस्तं तु वेदज्ञो नृपमब्रवीत्॥१॥

भावार्थ :-
महात्मा ऋष्यशृंग बड़े मेधावी और वेदों के ज्ञाता थे। उन्होंने थोड़ी देर तक ध्यान लगाकर अपने भावी कर्तव्य का निश्चय किया। फिर ध्यान से विरत हो वे राजा से इस प्रकार बोले-॥१॥

श्लोक:
इष्टिं तेऽहं करिष्यामि पुत्रीयां पुत्रकारणात्।
अथर्वशिरसि प्रोक्तैर्मन्त्रैः सिद्धां विधानतः॥२॥

भावार्थ :-
महाराज! मैं आपको पुत्र की प्राप्ति कराने के लिये अथर्ववेद के मन्त्रों से पुत्रेष्टि नामक यज्ञ करूँगा। वेदोक्त विधि के अनुसार अनुष्ठान करने पर वह यज्ञ अवश्य सफल होगा’॥२॥

श्लोक:
ततः प्राक्रमदिष्टिं तां पुत्रीयां पुत्रकारणात्।
जुहावाग्नौ च तेजस्वी मन्त्रदृष्टेन कर्मणा॥३॥

भावार्थ :-
यह कहकर उन तेजस्वी ऋषि ने पुत्र प्राप्ति के उद्देश्य से पुत्रेष्टि नामक यज्ञ प्रारम्भ किया और श्रौत विधि के अनुसार अग्नि में आहुति डाली॥३॥

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बालकाण्ड सर्ग- ११-२०

वाल्मीकि रामायण- बालकाण्ड सर्ग- १६

बालकाण्डम्
षोडशः सर्गः (सर्ग 16)

( देवताओं का श्रीहरि से रावणवध के लिये अवतीर्ण होने को कहना, पुत्रेष्टि यज्ञ में अग्निकुण्ड से प्राजापत्य पुरुष का प्रकट हो खीर अर्पण करना और रानियों का गर्भवती होना )

श्लोक:
ततो नारायणो विष्णुर्नियुक्तः सुरसत्तमैः।
जानन्नपि सुरानेवं श्लक्ष्णं वचनमब्रवीत्॥१॥

भावार्थ :-
तदनन्तर उन श्रेष्ठ देवताओंद्वारा इस प्रकार रावणवधके लिये नियुक्त होनेपर सर्वव्यापी नारायणने रावणवधके उपायको जानते हुए भी देवताओंसे यह मधुर वचन कहा-॥१॥

श्लोक:
उपायः को वधे तस्य राक्षसाधिपतेः सुराः।
यमहं तं समास्थाय निहन्यामृषिकण्टकम्॥२॥

भावार्थ :-
‘देवगण! राक्षसराज रावणके वधके लिये कौन-सा उपाय है, जिसका आश्रय लेकर मैं महर्षियोंके लिये कण्टकरूप उस निशाचरका वध करूँ?’॥२॥

श्लोक:
एवमुक्ताः सुराः सर्वे प्रत्यूचुर्विष्णुमव्ययम्।
मानुषं रूपमास्थाय रावणं जहि संयुगे॥३॥

भावार्थ :-
उनके इस तरह पूछनेपर सब देवता उन अविनाशी भगवान् विष्णुसे बोले-’प्रभो! आप मनुष्यका रूप धारण करके युद्ध में रावणको मार डालिये॥३॥

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बालकाण्ड सर्ग- ११-२०

वाल्मीकि रामायण- बालकाण्ड सर्ग- १७

बालकाण्डम्
सप्तदशः सर्गः (सर्ग 17)

( ब्रह्माजी की प्रेरणा से देवता आदि के द्वारा विभिन्न वानरयूथपतियों की उत्पत्ति )

श्लोक:
पत्रत्वं त् गते विष्णौ राज्ञस्तस्य महात्मनः।
उवाच देवताः सर्वाः स्वयम्भूर्भगवानिदम्॥१॥

भावार्थ :-
जब भगवान् विष्णु महामनस्वी राजा दशरथ के पुत्रभाव को प्राप्त हो गये, तब भगवान् ब्रह्माजी ने सम्पूर्ण देवताओं से इस प्रकार कहा-॥१॥

श्लोक:
सत्यसंधस्य वीरस्य सर्वेषां नो हितैषिणः।
विष्णोः सहायान् बलिनः सृजध्वंकामरूपिणः॥२॥
मायाविदश्च शूरांश्च वायुवेगसमान् जवे।
नयज्ञान् बुद्धिसम्पन्नान् विष्णुतुल्यपराक्रमान्॥३॥
असंहार्यानुपायज्ञान् दिव्यसंहननान्वितान्।
सर्वास्त्रगुणसम्पन्नानमृतप्राशनानिव॥४॥

भावार्थ :-
‘देवगण! भगवान् विष्णु सत्यप्रतिज्ञ, वीर और हम सब लोगों के हितैषी हैं। तुमलोग उनके सहायक रूप से ऐसे पुत्रों की सृष्टि करो, जो बलवान्, इच्छानुसार रूप धारण करने में समर्थ, माया जानने वाले, शूरवीर, वायु के समान वेगशाली, नीतिज्ञ, बुद्धिमान्, विष्णुतुल्य पराक्रमी, किसी से परास्त न होने वाले, तरह-तरह के उपायों के जानकार, दिव्य शरीरधारी तथा अमृतभोजी देवताओं के समान सब प्रकार की अस्त्रविद्या के गुणों से सम्पन्न हों॥२-४॥

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बालकाण्ड सर्ग- ११-२०

वाल्मीकि रामायण- बालकाण्ड सर्ग- १८

बालकाण्डम्
अष्टादशः सर्गः (सर्ग 18)

( श्रीराम, भरत, लक्ष्मण तथा शत्रुघ्न के जन्म, संस्कार, शीलस्वभाव एवं सद्गुण, राजा के दरबार में विश्वामित्र का आगमन और उनका सत्कार )

श्लोक:
निर्वृत्ते तु क्रतौ तस्मिन् हयमेधे महात्मनः।
प्रतिगृह्यामरा भागान् प्रतिजग्मुर्यथागतम्॥१॥

भावार्थ :-
महामना राजा दशरथ का यज्ञ समाप्त होने पर देवता लोग अपना-अपना भाग ले जैसे आये थे, वैसे लौट गये॥१॥

श्लोक:
समाप्तदीक्षानियमः पत्नीगणसमन्वितः।
प्रविवेश पुरीं राजा सभृत्यबलवाहनः॥२॥

भावार्थ :-
दीक्षा का नियम समाप्त होने पर राजा अपनी पत्नियों को साथ ले सेवक, सैनिक और सवारियों सहित पुरी में प्रविष्ट हुए॥२॥

श्लोक:
यथार्ह पूजितास्तेन राज्ञा च पृथिवीश्वराः।
मुदिताः प्रययुर्देशान् प्रणम्य मुनिपुंगवम्॥३॥

भावार्थ :-
भिन्न-भिन्न देशों के राजा भी (जो उनके यज्ञ में सम्मिलित होने के लिये आये थे) महाराज दशरथ द्वारा यथावत् सम्मानित हो मुनिवर वसिष्ठ तथा ऋष्यशृंग को प्रणाम करके प्रसन्नतापूर्वक अपने-अपने देश को चले गये॥३॥

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बालकाण्ड सर्ग- ११-२०

वाल्मीकि रामायण- बालकाण्ड सर्ग- १९

बालकाण्डम्
एकोनविंशः सर्गः (19)

( विश्वामित्र के मुख से श्रीराम को साथ ले जाने की माँग सुनकर राजा दशरथ का दुःखित एवं मूर्च्छित होना )

श्लोक:
तच्छ्रुत्वा राजसिंहस्य वाक्यमद्भुतविस्तरम्।
हृष्टरोमा महातेजा विश्वामित्रोऽभ्यभाषत॥

भावार्थ :-
नृपश्रेष्ठ महाराज दशरथ का यह अद्भुत विस्तार से युक्त वचन सुनकर महातेजस्वी विश्वामित्र पुलकित हो उठे और इस प्रकार बोले॥१॥

श्लोक:
सदृशं राजशार्दूल तवैव भुवि नान्यतः।
महावंशप्रसूतस्य वसिष्ठव्यपदेशिनः॥२॥

भावार्थ :-
राजसिंह! ये बातें आपके ही योग्य हैं। इस पृथ्वी पर दूसरे के मुख से ऐसे उदार वचन निकलने की सम्भावना नहीं है। क्यों न हो, आपमहान् कुल में उत्पन्न हैं और वसिष्ठ-जैसे ब्रह्मर्षि आपके उपदेशक हैं॥२॥

श्लोक:
यत् तु मे हृद्गतं वाक्यं तस्य कार्यस्य निश्चयम्।
कुरुष्व राजशार्दूल भव सत्यप्रतिश्रवः॥३॥

भावार्थ :-
‘अच्छा, अब जो बात मेरे हृदय में है, उसे सुनिये। नृपश्रेष्ठ! सुनकर उस कार्य को अवश्य पूर्ण करने का निश्चय कीजिये। आपने मेरा कार्य सिद्ध करने की प्रतिज्ञा की है। इस प्रतिज्ञा को सत्य कर दिखाइये॥३॥

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बालकाण्ड सर्ग- ११-२०

वाल्मीकि रामायण- बालकाण्ड सर्ग- २०

बालकाण्डम्
विंशः सर्गः (सर्ग 20)

( राजा दशरथ का विश्वामित्र को अपना पुत्र देने से इनकार करना और विश्वामित्र का कुपित होना )

श्लोक:
तच्छ्रुत्वा राजशार्दूलो विश्वामित्रस्य भाषितम्।
मुहर्तमिव निःसंज्ञः संज्ञावानिदमब्रवीत्॥१॥

भावार्थ :-
विश्वामित्रजी का वचन सुनकर नृपश्रेष्ठ दशरथ दो घड़ी के लिये संज्ञाशून्य से हो गये। फिर सचेत होकर इस प्रकार बोले-॥१॥

श्लोक:
ऊनषोडशवर्षो मे रामो राजीवलोचनः।
न युद्धयोग्यतामस्य पश्यामि सह राक्षसैः॥२॥

भावार्थ :-
‘महर्षे! मेरा कमलनयन राम अभी पूरे सोलह वर्ष का भी नहीं हुआ है। मैं इसमें राक्षसों के साथ युद्ध करने की योग्यता नहीं देखता॥२॥

श्लोक:
इयमक्षौहिणी सेना यस्याहं पतिरीश्वरः।
अनया सहितो गत्वा योद्धाहं तैर्निशाचरैः॥३॥

भावार्थ :-
‘यह मेरी अक्षौहिणी सेना है, जिसका मैं पालक और स्वामी भी हूँ। इस सेना के साथ मैं स्वयं ही चलकर उन निशाचरों के साथ युद्ध करूँगा॥३॥

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बालकाण्ड सर्ग- ११-२०

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बालकाण्ड सर्ग- ११-२०

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