वाल्मीकि रामायण- अयोध्याकाण्ड सर्ग- १६-३०

वाल्मीकि रामायण- अयोध्याकाण्ड सर्ग- १६-३०

अयोध्याकाण्ड सर्ग- १६-३०

॥ श्री गणेशाय नमः ॥
॥ श्री कमलापति नम: ॥
॥ श्री जानकीवल्लभो विजयते ॥
॥ श्री वाल्मीकि रामायण ॥
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अयोध्याकाण्ड सर्ग- १६-३०

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अयोध्याकाण्ड सर्ग- १६-३०

1BDC7FFE-1644-4736-AA95-0B3D20B5A06Bवाल्मीकि रामायण
(भावार्थ सहित)
सब एक ही स्थान पर

यह स्वंय शिवजी द्वारा माता जगदम्बा से कही गई एक पवित्र कथा है। आप भी विस्तार पूर्वक पढ़े:
शिव-शक्ति श्रीराम मिलन (संपूर्ण भाग) 🌞

अयोध्याकाण्ड सर्ग- १६-३०

अयोध्याकाण्डम्
षोडशः सर्गः (सर्ग 16)

( सुमन्त्र का श्रीराम को महाराज का संदेश सुनाना,श्रीराम का मार्ग में स्त्री पुरुषों की बातें सुनते हुए जाना )

स तदन्तःपुरद्वारं समतीत्य जनाकुलम्।
प्रविविक्तां ततः कक्ष्यामाससाद पुराणवित्॥१॥

पुरातन वृत्तान्तों के ज्ञाता सूत सुमन्त्र मनुष्यों की भीड़ से भरे हुए उस अन्तःपुर के द्वार को लाँघकर महल की एकान्त कक्षा में जा पहुँचे, जहाँ भीड़ बिलकुल नहीं थी॥१॥

प्रासकार्मुकबिभ्रद्भिर्युवभिम॒ष्टकुण्डलैः।
अप्रमादिभिरेकाग्रैः स्वानुरक्तैरधिष्ठिताम्॥२॥

वहाँ श्रीराम के चरणों में अनुराग रखने वाले एकाग्रचित्त एवं सावधान युवक प्रास और धनुष आदि लिये डटे हुए थे। उनके कानों में शुद्ध सुवर्ण के बने हुए कुण्डल झलमला रहे थे॥२॥

तत्र काषायिणो वृद्धान् वेत्रपाणीन् स्वलंकृतान्।
ददर्श विष्ठितान् द्वारि स्त्र्यध्यक्षान् सुसमाहितान्॥ ३॥

उस ड्योढ़ी में सुमन्त्र को गेरुआ वस्त्र पहने और हाथ में छड़ी लिये वस्त्राभूषणों से अलंकृत बहुत-से वृद्ध पुरुष बड़ी सावधानी के साथ द्वार पर बैठे दिखायी दिये, जो अन्तःपुर की स्त्रियों के अध्यक्ष (संरक्षक) थे॥३॥

ते समीक्ष्य समायान्तं रामप्रियचिकीर्षवः।
सहसोत्पतिताः सर्वे ह्यासनेभ्यः ससम्भ्रमाः॥४॥

सुमन्त्र को आते देख श्रीराम का प्रिय करने की इच्छा वाले वे सभी पुरुष सहसा वेगपूर्वक आसनों से उठकर खड़े हो गये॥४॥

तानुवाच विनीतात्मा सूतपुत्रः प्रदक्षिणः।
क्षिप्रमाख्यात रामाय सुमन्त्रो द्वारि तिष्ठति ॥५॥

राजसेवा में अत्यन्त कुशल तथा विनीत हृदयवाले सूतपुत्र सुमन्त्र ने उनसे कहा—’आप लोग श्रीरामचन्द्रजी से शीघ्र जाकर कहें, कि सुमन्त्र दरवाजे पर खड़े हैं ॥ ५॥

ते राममुपसङ्गम्य भर्तुः प्रियचिकीर्षवः।
सहभार्याय रामाय क्षिप्रमेवाचचक्षिरे॥६॥

स्वामी का प्रिय करने की इच्छा वाले वे सब सेवक श्रीरामचन्द्रजी के पास जा पहुँचे। उस समय श्रीराम अपनी धर्मपत्नी सीता के साथ विराजमान थे। उन सेवकों ने शीघ्र ही उन्हें सुमन्त्र का संदेश सुना दिया। ६॥

प्रतिवेदितमाज्ञाय सूतमभ्यन्तरं पितुः।
तत्रैवानाययामास राघवः प्रियकाम्यया॥७॥

द्वार रक्षकों द्वारा दी हुई सूचना पाकर श्रीराम ने पिता की प्रसन्नता के लिये उनके अन्तरङ्ग सेवक सुमन्त्र को वहीं अन्तःपुर में बुलवा लिया॥७॥

तं वैश्रवणसंकाशमुपविष्टं स्वलंकृतम्।
ददर्श सूतः पर्यङ्के सौवर्णे सोत्तरच्छदे॥८॥

वहाँ पहुँचकर सुमन्त्र ने देखा श्रीरामचन्द्रजी वस्त्राभूषणों से अलंकृत हो कुबेर के समान जान पड़ते हैं और बिछौनों से युक्त सोने के पलंग पर विराजमानहैं।॥ ८॥

वराहरुधिराभेण शुचिना च सुगन्धिना।
अनुलिप्तं परायेन चन्दनेन परंतपम्॥९॥
स्थितया पार्श्वतश्चापि वालव्यजनहस्तया।
उपेतं सीतया भूयश्चित्रया शशिनं यथा॥१०॥

शत्रुओं को संताप देने वाले रघुनाथजी के श्रीअङ्गों में वाराह के रुधिर की भाँति लाल, पवित्र और सुगन्धित उत्तम चन्दन का लेप लगा हुआ है और देवी सीता उनके पास बैठकर अपने हाथ से चवँर डुला रही हैं। सीता के अत्यन्त समीप बैठे हुए श्रीराम चित्रा से संयुक्त चन्द्रमा की भाँति शोभा पाते हैं। ९-१० ॥

तं तपन्तमिवादित्यमुपपन्नं स्वतेजसा।
ववन्दे वरदं वन्दी विनयज्ञो विनीतवत्॥११॥

विनयके ज्ञाता वन्दी सुमन्त्र ने तपते हुए सूर्य की भाँति अपने नित्य प्रकाश से सम्पन्न रहकर अधिक प्रकाशित होने वाले वरदायक श्रीराम को विनीतभाव से प्रणाम किया॥

प्राञ्जलिः सुमुखं दृष्ट्वा विहारशयनासने।
राजपुत्रमुवाचेदं सुमन्त्रो राजसत्कृतः॥१२॥

विहारकालिक शयन के लिये जो आसन था, उस पलंग पर बैठे हुए प्रसन्न मुखवाले राजकुमारश्रीराम का दर्शन करके राजा दशरथद्वारा सम्मानित सुमन्त्र ने हाथ जोड़कर इस प्रकार कहा— ॥ १२॥

कौसल्या सुप्रजा राम पिता त्वां द्रष्टमिच्छति।
महिष्यापि हि कैकेय्या गम्यतां तत्र मा चिरम्॥ १३॥

‘श्रीराम! आपको पाकर महारानी कौसल्या सर्वश्रेष्ठ संतानवाली हो गयी हैं। इस समय रानी कैकेयी के साथ बैठे हुए आपके पिताजी आपको देखना चाहते हैं, अतः वहाँ चलिये, विलम्ब न कीजिये’॥ १३॥

एवमुक्तस्तु संहृष्टो नरसिंहो महाद्युतिः।
ततः सम्मानयामास सीतामिदमुवाच ह॥१४॥

सुमन्त्र के ऐसा कहने पर महातेजस्वी नरश्रेष्ठ श्रीराम ने सीताजी का सम्मान करते हुए प्रसन्नतापूर्वक उनसे इस प्रकार कहा- ॥ १४ ॥

देवि देवश्च देवी च समागम्य मदन्तरे।
मन्त्रयेते ध्रुवं किंचिदभिषेचनसंहितम्॥१५॥

‘देवि! जान पड़ता है, पिताजी और माता कैकेयी दोनों मिलकर मेरे विषय में ही कुछ विचार कर रहे हैं। निश्चय ही मेरे अभिषेक के सम्बन्ध में ही कोई बात होती होगी॥ १५॥

लक्षयित्वा ह्यभिप्रायं प्रियकामा सुदक्षिणा।
संचोदयति राजानं मदर्थमसितेक्षणा॥१६॥

‘मेरे अभिषेक के विषय में राजा के अभिप्राय को लक्ष्य करके उनका प्रिय करने की इच्छा वाली परम उदार एवं समर्थ कजरारे नेत्रों वाली कैकेयी मेरे अभिषेक के लिये ही राजा को प्रेरित कर रही होंगी। १६॥

सा प्रहृष्टा महाराजं हितकामानुवर्तिनी।
जननी चार्थकामा मे केकयाधिपतेः सुता॥१७॥

‘मेरी माता केकयराजकुमारी इस समाचार से बहुत प्रसन्न हुई होंगी। वे महाराज का हित चाहनेवाली और उनकी अनुगामिनी हैं। साथ ही वे मेरा भी भला चाहती हैं। अतः वे महाराज को अभिषेक करने के लिये जल्दी करने को कह रही होंगी॥ १७ ॥

दिष्ट्या खलु महाराजो महिष्या प्रियया सह।
सुमन्त्रं प्राहिणोद् दूतमर्थकामकरं मम॥१८॥

‘सौभाग्य की बात है कि महाराज अपनी प्यारी रानी के साथ बैठे हैं और उन्होंने मेरे अभीष्ट अर्थ को सिद्ध करने वाले सुमन्त्र को ही दूत बनाकर भेजा है।

यादृशी परिषत् तत्र तादृशो दूत आगतः।
ध्रुवमद्यैव मां राजा यौवराज्येऽभिषेक्ष्यति॥१९॥

‘जैसी वहाँ अन्तरङ्ग परिषद् बैठी है, वैसे ही दूत सुमन्त्रजी यहाँ पधारे हैं। अवश्य आज ही महाराज मुझे युवराज के पद पर अभिषिक्त करेंगे॥ १९ ॥

हन्त शीघ्रमितो गत्वा द्रक्ष्यामि च महीपतिम्।
सह त्वं परिवारेण सुखमास्स्व रमस्व च ॥ २०॥

‘अतः मैं प्रसन्नतापूर्वक यहाँ से शीघ्र जाकर महाराज का दर्शन करूँगा। तुम परिजनों के साथ यहाँ सुखपूर्वक बैठो और आनन्द करो’ ॥ २० ॥

पतिसम्मानिता सीता भर्तारमसितेक्षणा।
आ द्वारमनुवव्राज मङ्गलान्यभिदध्युषी॥२१॥

पति के द्वारा इस प्रकार सम्मानित होकर कजरारे नेत्रों वाली सीतादेवी उनका मङ्गल-चिन्तन करती हुई स्वामी के साथ-साथ द्वार तक उन्हें पहुँचाने के लिये गयीं॥

राज्यं द्विजातिभिर्जुष्टं राजसूयाभिषेचनम्।
कर्तुमर्हति ते राजा वासवस्येव लोककृत्॥२२॥

उस समय वे बोलीं-‘आर्यपुत्र ! ब्राह्मणों के साथ रहकर आपका युवराज पद पर अभिषेक करके महाराज दूसरे समय में राजसूय-यज्ञ में सम्राट् के पद पर आपका अभिषेक करने योग्य हैं। ठीक उसी तरह जैसे लोकस्रष्टा ब्रह्मा ने देवराज इन्द्र का अभिषेक किया था॥ २२॥

दीक्षितं व्रतसम्पन्नं वराजिनधरं शुचिम्।
कुरङ्गशृङ्गपाणिं च पश्यन्ती त्वां भजाम्यहम्॥ २३॥

‘आप राजसूय-यज्ञ में दीक्षित हो तदनुकूल व्रत का पालन करने में तत्पर, श्रेष्ठ मृगचर्मधारी, पवित्र तथा हाथ में मृग का शृङ्ग धारण करने वाले हों और इस रूप में आपका दर्शन करती हुई मैं आपकी सेवा में संलग्न रहँ—यही मेरी शुभ-कामना है॥ २३॥

पूर्वां दिशं वज्रधरो दक्षिणां पातु ते यमः।
वरुणः पश्चिमामाशां धनेशस्तूत्तरां दिशम्॥ २४॥

‘आपकी पूर्व दिशा में वज्रधारी इन्द्र, दक्षिण दिशा में यमराज, पश्चिम दिशा में वरुण और उत्तर दिशा में कुबेर रक्षा करें’॥ २४॥

अथ सीतामनुज्ञाप्य कृतकौतुकमङ्गलः।
निश्चक्राम सुमन्त्रेण सह रामो निवेशनात्॥ २५॥

तदनन्तर सीता की अनुमति ले उत्सवकालिक मङ्गलकृत्य पूर्ण करके श्रीरामचन्द्र जी सुमन्त्र के साथ अपने महल से बाहर निकले॥ २५॥

पर्वतादिव निष्क्रम्य सिंहो गिरिगुहाशयः।
लक्ष्मणं द्वारि सोऽपश्यत् प्रवाञ्जलिपुटं स्थितम्॥२६॥

पर्वत की गुफा में शयन करने वाला सिंह जैसे पर्वत से निकलकर आता है, उसी प्रकार महल से निकलकर श्रीरामचन्द्रजी ने द्वार पर लक्ष्मण को उपस्थित देखा, जो विनीत भाव से हाथ जोड़े खड़े थे॥२६॥

अथ मध्यमकक्ष्यायां समागच्छत् सुहृज्जनैः।
स सर्वानर्थिनो दृष्ट्वा समेत्य प्रतिनन्द्य च॥२७॥
ततः पावकसंकाशमारुरोह रथोत्तमम्।।
वैयाघ्रं पुरुषव्याघ्रो राजितं राजनन्दनः॥२८॥

तदनन्तर मध्यम कक्षा में आकर वे मित्रों से मिले फिर प्रार्थी जनों को उपस्थित देख उन सबसे मिलकर उन्हें संतुष्ट करके पुरुष सिंह राजकुमार श्रीराम व्याघ्रचर्म से आवृत, शोभाशाली तथा अग्नि के समान तेजस्वी उत्तम रथ पर आरूढ़ हुए। २७-२८॥

मेघनादमसम्बाधं मणिहेमविभूषितम्।
मुष्णन्तमिव चढूंषि प्रभया मेरुवर्चसम्॥२९॥

उस रथ की घरघराहट मेघ की गम्भीर गर्जना के समान प्रतीत होती थी। उसमें स्थान की संकीर्णता नहीं थी। वह विस्तृत था और मणि एवं सुवर्ण से विभूषित था। उसकी कान्ति सुवर्णमय मेरुपर्वत के समान जान पड़ती थी। वह रथ अपनी प्रभा से लोगों की आँखों में चकाचौंध-सा पैदा कर देता था॥ २९ ॥

करेणुशिशुकल्पैश्च युक्तं परमवाजिभिः।
हरियुक्तं सहस्राक्षो रथमिन्द्र इवाशुगम्॥३०॥

उसमें उत्तम घोड़े जुते हुए थे, जो अधिक पुष्ट होने के कारण हाथी के बच्चों के समान प्रतीत होते थे। जैसे सहस्र नेत्रधारी इन्द्र हरे रंग के घोड़ों से युक्त शीघ्रगामी रथपर सवार होते हैं, उसी प्रकार श्रीराम अपने उस रथपर आरूढ़ थे॥

प्रययौ तूर्णमास्थाय राघवो ज्वलितः श्रिया।
स पर्जन्य इवाकाशे स्वनवानभिनादयन्॥३१॥
निकेतान्निर्ययौ श्रीमान् महाभ्रादिव चन्द्रमाः।

अपनी सहज शोभा से प्रकाशित श्रीरघुनाथजी उस रथ पर आरूढ़ हो तुरंत वहाँ से चल दिये। वह तेजस्वी रथ आकाश में गरजने वाले मेघ की भाँति अपनी घर्घर ध्वनि से सम्पूर्ण दिशाओं को प्रतिध्वनित करता हुआ महान् मेघखण्ड से निकलने वाले चन्द्रमा के समान श्रीराम के उस भवन से बाहर निकला॥ ३१ ॥

चित्रचामरपाणिस्तु लक्ष्मणो राघवानुजः॥ ३२॥
जुगोप भ्रातरं भ्राता रथमास्थाय पृष्ठतः।

श्रीराम के छोटे भाई लक्ष्मण भी हाथ में विचित्र चवँर लिये उस रथ पर बैठ गये और पीछे से अपने ज्येष्ठ भ्राता श्रीराम की रक्षा करने लगे॥ ३२ १/२॥

ततो हलहलाशब्दस्तुमुलः समजायत॥३३॥
तस्य निष्क्रममाणस्य जनौघस्य समन्ततः।

फिर तो सब ओर से मनुष्यों की भारी भीड़ निकलने लगी। उस समय उस जन-समूह के चलने से सहसा भयंकर कोलाहल मच गया॥ ३३ १/२ ॥

ततो हयवरा मुख्या नागाश्च गिरिसंनिभाः॥ ३४॥
अनुजग्मुस्तथा रामं शतशोऽथ सहस्रशः।

श्रीरामके पीछे-पीछे अच्छे-अच्छे घोड़े और पर्वतों के समान विशालकाय श्रेष्ठ गजराज सैकड़ों और हजारों की संख्या में चलने लगे॥ ३४ १/२॥

अग्रतश्चास्य संनद्धाश्चन्दनागुरुभूषिताः॥ ३५॥
खड्गचापधराः शूरा जग्मुराशंसवो जनाः।

उनके आगे-आगे कवच आदि से सुसज्जित तथा चन्दन और अगुरु से विभूषित हो खड्ग और धनुष धारण किये बहुत-से शूरवीर तथा मङ्गलाशंसी मनुष्य -वन्दी आदि चल रहे थे। ३५ १/२ ।।

ततो वादित्रशब्दाश्च स्तुतिशब्दाश्च वन्दिनाम्॥ ३६॥
सिंहनादाश्च शूराणां ततः शुश्रुविरे पथि।
हर्म्यवातायनस्थाभिभूषिताभिः समन्ततः॥३७॥
कीर्यमाणः सुपुष्पौधैर्ययौ स्त्रीभिररिंदमः।।

तदनन्तर मार्ग में वाद्यों की ध्वनि, वन्दीजनों के स्तुतिपाठ के शब्द तथा शूरवीरों के सिंहनाद सुनायी देने लगे। महलों की खिड़कियों में बैठी हुई वस्त्राभूषणों से विभूषित वनिताएँ सब ओर से शत्रुदमन श्रीराम पर ढेर-के-ढेर सुन्दर पुष्प बिखेर रही थीं। इस अवस्था में श्रीराम आगे बढ़ते चले जा रहे थे। ३६-३७ १/२॥

रामं सर्वानवद्याङ्ग्यो रामपिप्रीषया ततः॥३८॥
वचोभिरग्र्यैर्हर्म्यस्थाः क्षितिस्थाश्च ववन्दिरे।

उस समय अट्टालिकाओं और भूतलपर खड़ी हुई सर्वाङ्गसुन्दरी युवतियाँ श्रीराम का प्रिय करने की इच्छासे श्रेष्ठ वचनों द्वारा उनकी स्तुति गाने लगीं॥ ३८ १/२॥

नूनं नन्दति ते माता कौसल्या मातृनन्दन॥३९॥
पश्यन्ती सिद्धयात्रं त्वां पित्र्यं राज्यमुपस्थितम्।

‘माता को आनन्द प्रदान करने वाले रघुवीर! आपकी यह यात्रा सफल होगी और आपको पैतृक राज्य प्राप्त होगा। इस अवस्था में आपको देखती हुई आपकी माता कौसल्या निश्चय ही आनन्दित हो रही होंगी॥ ३९ १/२॥

सर्वसीमन्तिनीभ्यश्च सीतां सीमन्तिनीं वराम्॥ ४०॥
अमन्यन्त हि ता नार्यो रामस्य हृदयप्रियाम्।
तया सुचरितं देव्या पुरा नूनं महत् तपः॥४१॥
रोहिणीव शशाङ्केन रामसंयोगमाप या।

‘वे नारियाँ श्रीराम की हृदयवल्लभा सीमन्तिनी सीता को संसार की समस्त सौभाग्यवती स्त्रियों से श्रेष्ठ मानती हुई कहने लगीं—’उन देवी सीता ने पूर्वकाल में निश्चय ही बड़ा भारी तप किया होगा, तभी उन्होंने चन्द्रमा से संयुक्त हुई रोहिणी की भाँति श्रीराम का संयोग प्राप्त किया है’॥ ४०-४१ १/२॥

इति प्रासादशृङ्गेषु प्रमदाभिर्नरोत्तमः।
शुश्राव राजमार्गस्थः प्रिया वाच उदाहृताः॥ ४२॥

इस प्रकार राजमार्गपर रथ पर बैठे हुए श्रीरामचन्द्रजी प्रासाद शिखरों पर बैठी हुई युवती स्त्रियों के द्वारा कही गयी ये प्यारी बातें सुन रहे थे। ४२॥

स राघवस्तत्र तदा प्रलापान् शुश्राव लोकस्य समागतस्य।
आत्माधिकारा विविधाश्च वाचः प्रहृष्टरूपस्य पुरे जनस्य॥४३॥

उस समय अयोध्या में आये हुए दूर-दूर के लोग अत्यन्त हर्ष से भरकर वहाँ श्रीरामचन्द्रजी के विषय में जो वार्तालाप और तरह-तरह की बातें करते थे, अपने विषय में कही गयी उन सभी बातों को श्रीरघुनाथजी सुनते जा रहे थे॥ ४३॥

एष श्रियं गच्छति राघवोऽद्य राजप्रसादाद् विपुलां गमिष्यन्।
एते वयं सर्वसमृद्धकामा येषामयं नो भविता प्रशास्ता॥४४॥

वे कहते थे—’इस समय ये श्रीरामचन्द्रजी महाराज दशरथ की कृपा से बहुत बड़ी सम्पत्ति के अधिकारी होने जा रहे हैं। अब हम सब लोगों की समस्त कामनाएँ पूर्ण हो जायँगी, क्योंकि ये श्रीराम हमारे शासक होंगे॥४४॥

लाभो जनस्यास्य यदेष सर्वं प्रपत्स्यते राष्ट्रमिदं चिराय।
न ह्यप्रियं किंचन जातु कश्चित् पश्येन्न दुःखं मनुजाधिपेऽस्मिन्॥४५॥

यदि यह सारा राज्य चिरकाल के लिये इनके हाथ में आ जाय तो इस जगत् की समस्त जनता के लिये यह महान् लाभ होगा। इनके राजा होने पर कभी किसी का अप्रिय नहीं होगा और किसी को कोई दुःख भी नहीं देखना पड़ेगा’॥ ४५ ॥

स घोषवद्भिश्च हयैः सनागैः पुरःसरैः स्वस्तिकसूतमागधैः।
महीयमानः प्रवरैश्च वादकैरभिष्टुतो वैश्रवणो यथा ययौ॥४६॥

हिनहिनाते हुए घोड़ों, चिग्घाड़ते हुए हाथियों, जयजयकार करते हुए आगे-आगे चलने वाले वन्दियों, स्तुतिपाठ करने वाले सूतों, वंश की विरुदावलि बखानने वाले मागधों तथा सर्वश्रेष्ठ गुणगायकों के तुमुल घोष के बीच उन वन्दी आदि से पूजित एवं प्रशंसित होते हुए श्रीरामचन्द्रजी कुबेर के समान चल रहे थे॥ ४६॥

करेणुमातङ्गरथाश्वसंकुलं महाजनौघैः परिपूर्णचत्वरम्।
प्रभूतरत्नं बहुपण्यसंचयं ददर्श रामो विमलं महापथम्॥४७॥

यात्रा करते हुए श्रीराम ने उस विशाल राजमार्ग को देखा, जो हथिनियों, मतवाले हाथियों, रथों और घोड़ों से खचाखच भरा हुआ था। उसके प्रत्येक चौराहे पर मनुष्यों की भारी भीड़ इकट्ठी हो रही थी। उसके दोनों पार्श्वभागों में प्रचुर रत्नों से भरी हुई दुकानें थीं तथा विक्रय के योग्य और भी बहुत-से द्रव्यों के ढेर वहाँ दिखायी देते थे वह राजमार्ग बहुत साफ सुथरा था॥४७॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे षोडशः सर्गः॥१६॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में सोलहवाँ सर्ग पूरा हुआ।१६॥

अयोध्याकाण्ड सर्ग- १६-३०

अयोध्याकाण्डम्
सप्तदशः सर्गः (सर्ग 17)

( श्रीराम का राजपथ की शोभा देखते और सुहृदों की बातें सुनते हुए पिता के भवन में प्रवेश )

स रामो रथमास्थाय सम्प्रहृष्टसुहृज्जनः।
पताकाध्वजसम्पन्नं महागुरुधूपितम्॥१॥
अपश्यन्नगरं श्रीमान् नानाजनसमन्वितम्।
स गृहैरभ्रसंकाशैः पाण्डुरैरुपशोभितम्॥२॥
राजमार्ग ययौ रामो मध्येनागुरुधूपितम्।

इस प्रकार श्रीमान् रामचन्द्रजी अपने सुहृदों को आनन्द प्रदान करते हुए रथ पर बैठे राजमार्ग के बीच से चले जा रहे थे; उन्होंने देखा-सारा नगर ध्वजा और पताकाओं से सुशोभित हो रहा है, चारों ओर बहुमूल्य अगुरु नामक धूप की सुगन्ध छा रही है और सब ओर असंख्य मनुष्यों की भीड़ दिखायी देती है। वह राजमार्ग श्वेत बादलों के समान उज्ज्वल भव्य भवनों से सुशोभित तथा अगुरु की सुगन्ध से व्याप्त हो रहा था॥ २ १/२॥

चन्दनानां च मुख्यानामगुरूणां च संचयैः ॥ ३॥
उत्तमानां च गन्धानां क्षौमकौशाम्बरस्य च।
अविद्धाभिश्च मुक्ताभिरुत्तमैः स्फाटिकैरपि॥ ४॥
शोभमानमसम्बाधं तं राजपथमुत्तमम्।
संवृतं विविधैः पुष्पैर्भक्ष्यैरुच्चावचैरपि॥५॥
ददर्श तं राजपथं दिवि देवपतिर्यथा।
दध्यक्षतहविर्लाजैबूंपैरगुरुचन्दनैः॥६॥
नानामाल्योपगन्धैश्च सदाभ्यर्चितचत्वरम्।

अच्छी श्रेणी के चन्दनों, अगुरु नामक धूपों, उत्तम गन्धद्रव्यों, अलसी या सन आदि के रेशों से बने हुए कपड़ों तथा रेशमी वस्त्रों के ढेर, अनबिंधे मोती और उत्तमोत्तम स्फटिक रत्न उस विस्तृत एवं उत्तम राजमार्ग की शोभा बढ़ा रहे थे। वह नाना प्रकार के पुष्पों तथा भाँति-भाँति के भक्ष्य पदार्थों से भरा हुआ था। उसके चौराहों की दही, अक्षत, हविष्य, लावा, धूप, अगर, चन्दन, नाना प्रकार के पुष्पहार और गन्धद्रव्यों से सदा पूजा की जाती थी। स्वर्गलोक में बैठे हुए देवराज इन्द्र की भाँति रथारूढ़ श्रीराम ने उस राजमार्ग को देखा॥३–६ १/२ ॥

आशीर्वादान् बहून् शृण्वन् सुहृद्भिः समुदीरितान्॥७॥
यथार्हं चापि सम्पूज्य सर्वानेव नरान् ययौ।

वे अपने सुहृदों के मुख से कहे गये बहुत-से आशीर्वादों को सुनते और यथायोग्य उन सब लोगों का सम्मान करते हुए चले जा रहे थे॥ ७ १/२ ॥

पितामहैराचरितं तथैव प्रपितामहैः॥८॥
अद्योपादाय तं मार्गमभिषिक्तोऽनुपालय। ।

(उनके हितैषी सुहृद् कहते थे—) ‘रघुनन्दन ! तुम्हारे पितामह और प्रपितामह (दादे और परदादे) जिस पर चलते आये हैं, आज उसी मार्ग को ग्रहण करके युवराज-पदपर अभिषिक्त हो आप हम सब लोगोंका निरन्तर पालन करें’॥ ८ १/२॥

यथा स्म पोषिताः पित्रा यथा सर्वैः पितामहैः।
ततः सुखतरं सर्वे रामे वत्स्याम राजनि॥९॥

(फिर वे आपस में कहने लगे—) भाइयो! श्रीराम के पिता तथा समस्त पितामहों द्वारा जिस प्रकार हमलोगोंका पालन-पोषण हुआ है, श्रीराम के राजा होने पर हम उससे भी अधिक सुखी रहेंगे॥९॥

अलमद्य हि भुक्तेन परमार्थैरलं च नः।
यदि पश्याम निर्यान्तं रामं राज्ये प्रतिष्ठितम्॥ १०॥

‘यदि हम राज्य पर प्रतिष्ठित हुए श्रीराम को पिता के घर से निकलते हुए देख लें यदि राजा राम का दर्शन कर लें तो अब हमें इहलोक के भोग और परमार्थस्वरूप मोक्ष लेकर क्या करना है।॥ १०॥

ततो हि नः प्रियतरं नान्यत् किंचिद् भविष्यति।
यथाभिषेको रामस्य राज्येनामिततेजसः॥११॥

‘अमित तेजस्वी श्रीराम का यदि राज्यपर अभिषेक हो जाय तो वह हमारे लिये जैसा प्रियतर कार्य होगा, उससे बढ़कर दूसरा कोई परम प्रिय कार्य नहीं होगा’।

एताश्चान्याश्च सुहृदामुदासीनः शुभाः कथाः।
आत्मसम्पूजनीः शृण्वन् ययौ रामो महापथम्॥ १२॥

सुहृदों के मुँह से निकली हुई ये तथा और भी कई तरह की अपनी प्रशंसा से सम्बन्ध रखने वाली सुन्दर बातें सुनते हुए श्रीरामचन्द्रजी राजपथ पर बढ़े चले जा रहे थे॥

न हि तस्मान्मनः कश्चिच्चक्षुषी वा नरोत्तमात्।
नरः शक्नोत्यपाक्रष्टमतिक्रान्तेऽपि राघवे॥१३॥

(जो श्रीराम की ओर एक बार देख लेता, वह उन्हें देखता ही रह जाता था।) श्रीरघुनाथजी के दूर चले जाने पर भी कोई उन पुरुषोत्तम की ओर से अपना मन या दृष्टि नहीं हटा पाता था॥ १३॥

यश्च रामं न पश्येत्तु यं च रामो न पश्यति।
निन्दितः सर्वलोकेष स्वात्माप्येनं विगर्हते॥१४॥

उस समय जो श्रीराम को नहीं देखता और जिसे श्रीराम नहीं देख लेते थे, वह समस्त लोकों में निन्दित समझा जाता था तथा स्वयं उसकी अन्तरात्मा भी उसे धिक्कारती थी॥ १५॥

सर्वेषु स हि धर्मात्मा वर्णानां कुरुते दयाम्।
चतुर्णां हि वयःस्थानां तेन ते तमनुव्रताः॥१६॥

धर्मात्मा श्रीराम चारों वर्गों के सभी मनुष्यों पर उनकी अवस्था के अनुरूप दया करते थे, इसलिये वे सभी उनके भक्त थे॥१६॥

चतुष्पथान् देवपथांश्चैत्यांश्चायतनानि च।
प्रदक्षिणं परिहरज्जगाम नृपतेः सुतः॥१६॥

राजकुमार श्रीराम चौराहों, देवमार्गों, चैत्यवृक्षों तथा देवमन्दिरों को अपने दाहिने छोड़ते हुए आगे बढ़ रहे थे॥

स राजकुलमासाद्य मेघसङ्घोपमैः शुभैः।
प्रासादशृङ्गैर्विविधैः कैलासशिखरोपमैः॥१७॥
आवारयद्भिर्गगनं विमानैरिव पाण्डुरैः।
वर्धमानगृहैश्चापि रत्नजालपरिष्कृतैः॥१८॥
तत् पृथिव्यां गृहवरं महेन्द्रसदनोपमम्।
राजपुत्रः पितुर्वेश्म प्रविवेश श्रिया ज्वलन्॥ १९॥

राजा दशरथ का भवन मेघसमूहों के समान शोभा पाने वाले, सुन्दर अनेक रूप-रंगवाले कैलासशिखर के समान उज्ज्वल प्रासादशिखरों (अट्टालिकाओं) से सुशोभित था। उसमें रत्नों की जाली से विभूषित तथा विमानाकार क्रीड़ागृह भी बने हुए थे, जो अपनी श्वेत आभा से प्रकाशित होते थे। वे अपनी ऊँचाई से आकाश को भी लाँघते हुए-से प्रतीत होते थे; ऐसे । गृहों से युक्त वह श्रेष्ठ भवन इस भूतलपर इन्द्र सदन के समान शोभा पाता था। उस राजभवन के पास पहुँचकर अपनी शोभा से  प्रकाशित होने वाले राजकुमार श्रीराम ने पिता के महल में प्रवेश किया॥ १७ –१९॥

स कक्ष्या धन्विभिर्गुप्तास्तिस्रोऽतिक्रम्य वाजिभिः।
पदातिरपरे कक्ष्ये द्वे जगाम नरोत्तमः॥२०॥

उन्होंने धनुर्धर वीरों द्वारा सुरक्षित महल की तीन ड्यौढ़ियों को तो घोड़े जुते हुए रथ से ही पार किया, फिर दो ड्यौढ़ियों में वे पुरुषोत्तम राम पैदल ही गये॥ २०॥

स सर्वाः समतिक्रम्य कक्ष्या दशरथात्मजः।
संनिवर्त्य जनं सर्वं शुद्धान्तःपुरमत्यगात्॥२१॥

इस प्रकार सारी ड्यौढ़ियों को पार करके दशरथनन्दन श्रीराम साथ आये हुए सब लोगों को लौटाकर स्वयं अन्तःपुर में गये॥२१॥

तस्मिन् प्रविष्टे पितुरन्तिकं तदा जनः स सर्वो मुदितो नृपात्मजे।
प्रतीक्षते तस्य पुनः स्म निर्गमं यथोदयं चन्द्रमसः सरित्पतिः॥२२॥

जब राजकुमार श्रीराम पिता के पास जाने के लिये अन्तःपुर में प्रविष्ट हुए, तब आनन्दमग्न हुए सब लोग बाहर खड़े होकर उनके पुनः निकलने की प्रतीक्षा करने लगे, ठीक उसी तरह जैसे सरिताओं का स्वामी समुद्र चन्द्रोदय की प्रतीक्षा करता रहता है॥ २२ ।।

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे सप्तदशः सर्गः॥१७॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में सत्रहवाँ सर्ग पूरा हुआ। १७॥

अयोध्याकाण्ड सर्ग- १६-३०

अयोध्याकाण्डम्
अष्टादशः सर्गः (सर्ग 18)

( श्रीराम का कैकेयी से पिता के चिन्तित होने का कारण पूछना,कैकेयी का कठोरतापूर्वक अपने माँगे हुए वरों का वृत्तान्त बताना )

स ददर्शासने रामो विषण्णं पितरं शुभे।
कैकेय्या सहितं दीनं मुखेन परिशुष्यता॥१॥

महल में जाकर श्रीराम ने पिता को कैकेयी के साथ एक सुन्दर आसन पर बैठे देखा। वे विषाद में डूबे हुए थे, उनका मुँह सूख गया था और वे बड़े दयनीय दिखायी देते थे॥२॥

स पितुश्चरणौ पूर्वमभिवाद्य विनीतवत।
ततो ववन्दे चरणौ कैकेय्याः सुसमाहितः॥२॥

निकट पहुँचने पर श्रीराम ने विनीत भाव से पहले अपने पिता के चरणों में प्रणाम किया; उसके बाद बड़ी सावधानी के साथ उन्होंने कैकेयी के चरणों में भी मस्तक झुकाया॥२॥

रामेत्युक्त्वा तु वचनं बाष्पपर्याकुलेक्षणः।
शशाक नृपतिर्दीनो नेक्षितुं नाभिभाषितुम्॥३॥

उस समय दीनदशा में पड़े हुए राजा दशरथ एक बार ‘राम!’ ऐसा कहकर चुप हो गये (इससे आगे उनसे बोला नहीं गया)। उनके नेत्रों में आँसू भर आये, अतः वे श्रीराम की ओर न तो देख सके और न उनसे कोई बात ही कर सके॥३॥

तदपूर्वं नरपतेर्दृष्ट्वा रूपं भयावहम्।
रामोऽपि भयमापन्नः पदा स्पृष्ट्वेव पन्नगम्॥४॥

राजा का वह अभूतपूर्व भयंकर रूप देखकर श्रीराम को भी भय हो गया, मानो उन्होंने पैर से किसी सर्प को छू दिया हो॥ ४॥

इन्द्रियैरप्रहृष्टैस्तं शोकसंतापकर्शितम्।
निःश्वसन्तं महाराजं व्यथिताकुलचेतसम्॥५॥
ऊर्मिमालिनमक्षोभ्यं क्षुभ्यन्तमिव सागरम्।
उपप्लुतमिवादित्यमुक्तानृतमृषिं यथा॥६॥

राजा की इन्द्रियों में प्रसन्नता नहीं थी; वे शोक और संताप से दुर्बल हो रहे थे, बारंबार लंबी साँसें भरते थे तथा उनके चित्त में बड़ी व्यथा और व्याकुलता थी। वे ऐसे दीखते थे, मानो तरङ्गमालाओं से उपलक्षित अक्षोभ्य समुद्र क्षुब्ध हो उठा हो, सूर्य को राहु ने ग्रस लिया हो अथवा किसी महर्षि ने झूठ बोल दिया हो। ६॥

अचिन्त्यकल्पं नृपतेस्तं शोकमुपधारयन्।
बभूव संरब्धतरः समुद्र इव पर्वणि॥७॥

राजा का वह शोक सम्भावना से परे था। इस शोक का क्या कारण है—यह सोचते हुए श्रीरामचन्द्रजी पूर्णिमा के समुद्र की भाँति अत्यन्त विक्षुब्ध हो उठे॥ ७॥

चिन्तयामास चतुरो रामः पितृहिते रतः।
किंस्विदद्यैव नृपतिर्न मां प्रत्यभिनन्दति॥८॥

पिता के हित में तत्पर रहने वाले परम चतुर श्रीराम सोचने लगे कि ‘आज ही ऐसी क्या बात हो गयी’ जिससे महाराज मुझसे प्रसन्न होकर बोलते नहीं हैं।८॥

अन्यदा मां पिता दृष्ट्वा कुपितोऽपि प्रसीदति।
तस्य मामद्य सम्प्रेक्ष्य किमायासः प्रवर्तते॥९॥

और दिन तो पिताजी कुपित होने पर भी मुझे देखते ही प्रसन्न हो जाते थे, आज मेरी ओर दृष्टिपात करके इन्हें क्लेश क्यों हो रहा है’ ॥ ९॥

स दीन इव शोका विषण्णवदनद्युतिः।
कैकेयीमभिवाद्यैव रामो वचनमब्रवीत्॥१०॥

यह सब सोचकर श्रीराम दीन-से हो गये, शोक से कातर हो उठे, विषाद के कारण उनके मुख की कान्ति फीकी पड़ गयी। वे कैकेयी को प्रणाम करके उसी से पूछने लगे— ॥ १०॥

कच्चिन्मया नापराद्धमज्ञानाद् येन मे पिता।
कुपितस्तन्ममाचक्ष्व त्वमेवैनं प्रसादय॥११॥

‘मा! मुझसे अनजान में कोई अपराध तो नहीं हो गया, जिससे पिताजी मुझ पर नाराज हो गये हैं। तुम यह बात मुझे बताओ और तुम्हीं इन्हें मना दो॥ ११॥

अप्रसन्नमनाः किं नु सदा मां प्रति वत्सलः।
विषण्णवदनो दीनः नहि मां प्रति भाषते॥१२॥

‘ये तो सदा मुझे प्यार करते थे, आज इनका मन अप्रसन्न क्यों हो गया? देखता हूँ, ये आज मुझसे बोलते तक नहीं हैं, इनके मुख पर विषाद छा रहा है और ये अत्यन्त दुःखी हो रहे हैं ॥ १२ ॥

शारीरो मानसो वापि कच्चिदेनं न बाधते।
संतापो वाभितापो वा दुर्लभं हि सदा सुखम्॥ १३॥

‘कोई शारीरिक व्याधिजनित संताप अथवा मानसिक अभिताप (चिन्ता) तो इन्हें पीड़ित नहीं कर रहा है? क्योंकि मनुष्य को सदा सुख-ही-सुख मिले—ऐसा सुयोग प्रायः दुर्लभ होता है॥१३॥

कच्चिन्न किंचिद् भरते कुमारे प्रियदर्शने।
शत्रुघ्ने वा महासत्त्वे मातृणां वा ममाशुभम्॥ १४॥

‘प्रियदर्शन कुमार भरत, महाबली शत्रुघ्न अथवा मेरी माताओं का तो कोई अमङ्गल नहीं हुआ है ? ॥ १४॥

अतोषयन् महाराजमकुर्वन् वा पितुर्वचः।
मुहर्तमपि नेच्छेयं जीवितुं कुपिते नृपे॥१५॥

‘महाराज को असंतुष्ट करके अथवा इनकी आज्ञा न मानकर इन्हें कुपित कर देने पर मैं दो घड़ी भी जीवित रहना नहीं चाहूँगा॥ १५॥

यतोमूलं नरः पश्येत् प्रादुर्भावमिहात्मनः।
कथं तस्मिन् न वर्तेत प्रत्यक्षे सति दैवते॥१६॥

‘मनुष्य जिसके कारण इस जगत् में अपना प्रादुर्भाव (जन्म) देखता है, उस प्रत्यक्ष देवता पिता के जीते-जी वह उसके अनुकूल बर्ताव क्यों न करेगा? ॥१६॥

कच्चित्ते परुषं किंचिदभिमानात् पिता मम।
उक्तो भवत्या रोषेण येनास्य लुलितं मनः॥१७॥

‘कहीं तुमने तो अभिमान या रोषके कारण मेरे पिताजी से कोई कठोर बात नहीं कह डाली, जिससे इनका मन दुःखी हो गया है? ॥ १७॥

एतदाचक्ष्व मे देवि तत्त्वेन परिपृच्छतः।
किंनिमित्तमपूर्वोऽयं विकारो मनुजाधिपे॥१८॥

‘देवि! मैं सच्ची बात पूछता हूँ, बताओ, किस कारण से महाराज के मन में आज इतना विकार (संताप) है? इनकी ऐसी अवस्था तो पहले कभी नहीं देखी गयी थी’॥ १८॥

एवमुक्ता तु कैकेयी राघवेण महात्मना।
उवाचेदं सुनिर्लज्जा धृष्टमात्महितं वचः॥ १९॥

महात्मा श्रीराम के इस प्रकार पूछने पर अत्यन्त निर्लज्ज कैकेयी बड़ी ढिठाई के साथ अपने मतलब की बात इस प्रकार बोली- ॥ १९॥

न राजा कुपितो राम व्यसनं नास्य किंचन।
किंचिन्मनोगतं त्वस्य त्वद्भयान्नानुभाषते॥२०॥

‘राम! महाराज कुपित नहीं हैं और न इन्हें कोई कष्ट ही हुआ है। इनके मन में कोई बात है, जिसे तुम्हारे डर से ये कह नहीं पा रहे हैं ॥ २० ॥

प्रियं त्वामप्रियं वक्तुं वाणी नास्य प्रवर्तते।
तदवश्यं त्वया कार्यं यदनेनाश्रुतं मम॥२१॥

‘तुम इनके प्रिय हो, तुमसे कोई अप्रिय बात कहने के लिये इनकी जबान नहीं खुलती; किंतु इन्होंने जिस कार्य के लिये मेरे सामने प्रतिज्ञा की है, उसका तुम्हें अवश्य पालन करना चाहिये॥ २१॥

एष मह्यं वरं दत्त्वा पुरा मामभिपूज्य च।
स पश्चात् तप्यते राजा यथान्यः प्राकृतस्तथा। २२॥

‘इन्होंने पहले तो मेरा सत्कार करते हुए मुझे मुँहमाँगा वरदान दे दिया और अब ये दूसरे गँवार मनुष्यों की भाँति उसके लिये पश्चात्ताप करते हैं। २२॥

अतिसृज्य ददानीति वरं मम विशाम्पतिः।
स निरर्थं गतजले सेतुं बन्धितुमिच्छति॥२३॥

‘ये प्रजानाथ पहले ‘मैं दूंगा’—ऐसी प्रतिज्ञा करके मुझे वर दे चुके हैं और अब उसके निवारण के लिये व्यर्थ प्रयत्न कर रहे हैं, पानी निकल जाने पर उसे रोकने के लिये बाँध बाँधने की निरर्थक चेष्टा करते हैं। २३॥

धर्ममूलमिदं राम विदितं च सतामपि।
तत् सत्यं न त्यजेद् राजा कुपितस्त्वत्कृते यथा॥ २४॥

‘राम! सत्य ही धर्म की जड़ है, यह सत्पुरुषों का भी निश्चय है। कहीं ऐसा न हो कि ये महाराज तुम्हारे कारण मुझपर कुपित होकर अपने उस सत्य को ही छोड़ बैठे। जैसे भी इनके सत्य का पालन हो, वैसा तुम्हें करना चाहिये॥ २४॥

यदि तद् वक्ष्यते राजा शुभं वा यदि वाशुभम्।
करिष्यसि ततः सर्वमाख्यास्यामि पुनस्त्वहम्॥ २५॥

यदि राजा जिस बात को कहना चाहते हैं, वह शुभ हो या अशुभ, तुम सर्वथा उसका पालन करो तो मैं सारी बात पुनः तुमसे कहूँगी॥ २५ ॥

यदि त्वभिहितं राज्ञा त्वयि तन्न विपत्स्यते।
ततोऽहमभिधास्यामि न ह्येष त्वयि वक्ष्यति॥२६॥

‘यदि राजा की कही हुई बात तुम्हारे कानों में पड़कर वहीं नष्ट न हो जाय—यदि तुम उनकी प्रत्येक आज्ञा का पालन कर सको तो मैं तुमसे सब कुछ खोलकर बता दूँगी, ये स्वयं तुमसे कुछ नहीं कहेंगे’।

एतत् तु वचनं श्रुत्वा कैकेय्या समुदाहृतम्।
उवाच व्यथितो रामस्तां देवीं नृपसंनिधौ॥ २७॥

कैकेयी की कही हुई यह बात सुनकर श्रीराम के मन में बड़ी व्यथा हुई। उन्होंने राजा के समीप ही देवी कैकेयी से इस प्रकार कहा- ॥२७॥

अहो धिङ् नार्हसे देवि वक्तुं मामीदृशं वचः।
अहं हि वचनाद् राज्ञः पतेयमपि पावके॥२८॥
भक्षयेयं विषं तीक्ष्णं पतेयमपि चार्णवे।
नियुक्तो गुरुणा पित्रा नृपेण च हितेन च॥२९॥
तद् ब्रूहि वचनं देवि राज्ञो यदभिकांक्षितम्।
करिष्ये प्रतिजाने च रामो दिर्नाभिभाषते॥३०॥

‘अहो! धिक्कार है! देवि! तुम्हें मेरे प्रति ऐसी बात मुँह से नहीं निकालनी चाहिये। मैं महाराज के कहने से आग में भी कूद सकता हूँ, तीव्र विष का भी भक्षण कर सकता हूँ और समुद्र में भी गिर सकता हूँ! महाराज मेरे गुरु, पिता और हितैषी हैं, मैं उनकी आज्ञा पाकर क्या नहीं कर सकता? इसलिये देवि! राजा को जो अभीष्ट है, वह बात मुझे बताओ! मैं प्रतिज्ञा करता हूँ, उसे पूर्ण करूँगा। राम दो तरह की बात नहीं करता है’ ॥ २८–३०॥

तमार्जवसमायुक्तमनार्या सत्यवादिनम्।
उवाच रामं कैकेयी वचनं भृशदारुणम्॥३१॥

श्रीराम सरल स्वभाव से युक्त और सत्यवादी थे, उनकी बात सुनकर अनार्या कैकेयी ने अत्यन्त दारुण वचन कहना आरम्भ किया— ॥३१॥

पुरा देवासुरे युद्धे पित्रा ते मम राघव।
रक्षितेन वरौ दत्तौ सशल्येन महारणे॥३२॥

‘रघुनन्दन! पहले की बात है, देवासुर संग्राम में तुम्हारे पिता शत्रुओं के बाणों से बिंध गये थे, उस महासमर में मैंने इनकी रक्षा की थी, उससे प्रसन्न होकर इन्होंने मुझे दो वर दिये थे॥ ३२॥

तत्र मे याचितो राजा भरतस्याभिषेचनम्।
गमनं दण्डकारण्ये तव चाद्यैव राघव॥ ३३॥

‘राघव! उन्हीं में से एक वर के द्वारा तो मैंने महाराज से यह याचना की है कि भरत का राज्याभिषेक हो और दूसरा वर यह माँगा है कि तुम्हें आज ही दण्डकारण्य में भेज दिया जाय॥ ३३॥

यदि सत्यप्रतिज्ञं त्वं पितरं कर्तुमिच्छसि।
आत्मानं च नरश्रेष्ठ मम वाक्यमिदं शृणु॥३४॥

‘नरश्रेष्ठ! यदि तुम अपने पिता को सत्यप्रतिज्ञ बनाना चाहते हो और अपने को भी सत्यवादी सिद्ध करने की इच्छा रखते हो तो मेरी यह बात सुनो। ३४॥

संनिदेशे पितुस्तिष्ठ यथानेन प्रतिश्रुतम्।
त्वयारण्यं प्रवेष्टव्यं नव वर्षाणि पञ्च च॥ ३५॥

‘तुम पिता की आज्ञा के अधीन रहो, जैसी इन्होंने प्रतिज्ञा की है, उसके अनुसार तुम्हें चौदह वर्षों के लिये वन में प्रवेश करना चाहिये॥ ३५॥

भरतश्चाभिषिच्येत यदेतदभिषेचनम्।
त्वदर्थे विहितं राज्ञा तेन सर्वेण राघव॥३६॥

‘रघुनन्दन! राजा ने तुम्हारे लिये जो यह अभिषेक का सामान जुटाया है, उस सबके द्वारा यहाँ भरत का अभिषेक किया जाय॥ ३६॥

सप्त सप्त च वर्षाणि दण्डकारण्यमाश्रितः।
अभिषेकमिदं त्यक्त्वा जटाचीरधरो भव॥३७॥

‘और तुम इस अभिषेक को त्यागकर चौदहवर्षों तक दण्डकारण्य में रहते हुए जटा और चीर धारण करो॥

भरतः कोसलपतेः प्रशास्तु वसुधामिमाम्।
नानारत्नसमाकीर्णां सवाजिरथसंकुलाम्॥३८॥

‘कोसलनरेश की इस वसुधा का, जो नाना प्रकार के रत्नों से भरी-पूरी और घोड़े तथा रथों से व्याप्त है, भरत शासन करें॥ ३८॥

एतेन त्वां नरेन्द्रोऽयं कारुण्येन समाप्लुतः।
शोकैः संक्लिष्टवदनो न शक्नोति निरीक्षितुम्॥ ३९॥

‘बस इतनी ही बात है, ऐसा करने से तुम्हारे वियोग का कष्ट सहन करना पड़ेगा, यह सोचकर महाराज करुणा में डूब रहे हैं। इसी शोक से इनका मुख सूख गया है और इन्हें तुम्हारी ओर देखने का साहस नहीं होता॥

एतत् कुरु नरेन्द्रस्य वचनं रघुनन्दन।
सत्येन महता राम तारयस्व नरेश्वरम्॥४०॥

‘रघुनन्दन राम! तुम राजा की इस आज्ञा का पालन करो और इनके महान् सत्य की रक्षा करके इन नरेश को संकट से उबार लो’ ॥ ४० ॥

इतीव तस्यां परुषं वदन्त्यां न चैव रामः प्रविवेश शोकम्।
प्रविव्यथे चापि महानुभावो राजा च पुत्रव्यसनाभितप्तः॥४१॥

कैकेयी के इस प्रकार कठोर वचन कहने पर भी श्रीराम के हृदय में शोक नहीं हुआ, परंतु महानुभाव राजा दशरथ पुत्र के भावी वियोगजनित दुःख से संतप्त एवं व्यथित हो उठे॥४१॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डेऽष्टादशः सर्गः॥१८॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में अठारहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १८॥


अयोध्याकाण्डम्
एकोनविंशः सर्गः (सर्ग 19)

( श्रीराम का वन में जाना स्वीकार करके उनका माता कौसल्या के पास आज्ञा लेने के लिये जाना )

तदप्रियममित्रघ्नो वचनं मरणोपमम।
श्रुत्वा न विव्यथे रामः कैकेयीं चेदमब्रवीत्॥१॥

वह अप्रिय तथा मृत्यु के समान कष्टदायक वचन सुनकर भी शत्रुसूदन श्रीराम व्यथित नहीं हुए उन्होंने कैकेयी से इस प्रकार कहा- ॥१॥

एवमस्तु गमिष्यामि वनं वस्तुमहं त्वितः।
जटाचीरधरो राज्ञः प्रतिज्ञामनुपालयन्॥२॥

‘मा! बहुत अच्छा! ऐसा ही हो। मैं महाराज की प्रतिज्ञा का पालन करने के लिये जटा और चीर धारण करके वन में रहने के निमित्त अवश्य यहाँ से चला जाऊँगा॥२॥

इदं तु ज्ञातुमिच्छामि किमर्थं मां महीपतिः।
नाभिनन्दति दर्धर्षो यथापूर्वमरिंदमः॥३॥

‘परंतु मैं यह जानना चाहता हूँ कि आज दुर्जय तथा शत्रुओं का दमन करने वाले महाराज मुझसे पहले की तरह प्रसन्नतापूर्वक बोलते क्यों नहीं हैं? ॥

मन्युर्न च त्वया कार्यो देवि ब्रूमि तवाग्रतः।
यास्यामि भव सुप्रीता वनं चीरजटाधरः॥४॥

‘देवि! मैं तुम्हारे सामने ऐसी बात पूछ रहा हूँ, इसलिये तुम्हें क्रोध नहीं करना चाहिये। निश्चय चीर और जटा धारण करके मैं वन को चला जाऊँगा, तुम प्रसन्न रहो॥४॥

हितेन गुरुणा पित्रा कृतज्ञेन नृपेण च।
नियुज्यमानो विस्रब्धः किं न कुर्यामहं प्रियम्॥

‘राजा मेरे हितैषी, गुरु, पिता और कृतज्ञ हैं। इनकी आज्ञा होने पर मैं इनका कौन-सा ऐसा प्रिय कार्य है, जिसे निःशङ्क होकर न कर सकूँ? ॥ ५॥

अलीकं मानसं त्वेकं हृदयं दहते मम।
स्वयं यन्नाह मां राजा भरतस्याभिषेचनम्॥६॥

‘किंतु मेरे मन को एक ही हार्दिक दुःख अधिक जला रहा है कि स्वयं महाराज ने मुझसे भरत के अभिषेक की बात नहीं कही॥६॥

अहं हि सीतां राज्यं च प्राणानिष्टान् धनानि च।
हृष्टो भ्रात्रे स्वयं दद्यां भरतायाप्रचोदितः॥७॥

‘मैं केवल तुम्हारे कहने से भी अपने भाई भरत के लिये इस राज्य को, सीता को, प्यारे प्राणों को तथा सारी सम्पत्ति को भी प्रसन्नतापूर्वक स्वयं ही दे सकता

किं पुनर्मनुजेन्द्रेण स्वयं पित्रा प्रचोदितः।
तव च प्रियकामार्थं प्रतिज्ञामनुपालयन्॥८॥

‘फिर यदि स्वयं महाराज—मेरे पिताजी आज्ञा दें और वह भी तुम्हारा प्रिय कार्य करने के लिये, तो मैं प्रतिज्ञा का पालन करते हुए उस कार्य को क्यों नहीं करूँगा? ॥ ८॥

तथाश्वासय ह्रीमन्तं किं त्विदं यन्महीपतिः।
वसुधासक्तनयनो मन्दमश्रूणि मुञ्चति॥९॥

‘तुम मेरी ओर से विश्वास दिलाकर इन लज्जाशील महाराज को आश्वासन दो। ये पृथ्वीनाथ पृथ्वी की ओर दृष्टि किये धीरे-धीरे आँसू क्यों बहा रहे हैं? ॥

गच्छन्तु चैवानयितुं दूताः शीघ्रजवैर्हयैः।
भरतं मातुलकुलादद्यैव नृपशासनात्॥१०॥

‘आज ही महाराज की आज्ञा से दूत शीघ्रगामी घोड़ों पर सवार होकर भरत को मामा के यहाँ से बुलाने के लिये चले जायँ॥ १०॥

दण्डकारण्यमेषोऽहं गच्छाम्येव हि सत्वरः।
अविचार्य पितुर्वाक्यं समा वस्तुं चतुर्दश॥११॥

‘मैं अभी पिता की बात पर कोई विचार न करके चौदह वर्षों तक वन में रहने के लिये तुरंत दण्डकारण्य को चला ही जाता हूँ॥ ११॥

सा हृष्टा तस्य तद् वाक्यं श्रुत्वा रामस्य कैकयी।
प्रस्थानं श्रद्दधाना सा त्वरयामास राघवम्॥१२॥

श्रीराम की वह बात सुनकर कैकेयी बहुत प्रसन्न हुई। उसे विश्वास हो गया कि ये वन को चले जायेंगे। अतः श्रीराम को जल्दी जाने की प्रेरणा देती हुई वह बोली- ॥ १२॥

एवं भवतु यास्यन्ति दूताः शीघ्रजवैर्हयैः।
भरतं मातुलकुलादिहावर्तयितुं नराः॥१३॥

‘तुम ठीक कहते हो, ऐसा ही होना चाहिये। भरतको मामाके यहाँसे बुला लानेके लिये दूतलोग शीघ्रगामी घोड़ोंपर सवार होकर अवश्य जायँगे॥ १३॥

तव त्वहं क्षमं मन्ये नोत्सुकस्य विलम्बनम्।
राम तस्मादितः शीघ्रं वनं त्वं गन्तुमर्हसि ॥१४॥

‘परंतु राम! तुम वन में जाने के लिये स्वयं ही उत्सुक जान पड़ते हो; अतः तुम्हारा विलम्ब करना मैं ठीक नहीं समझती। जितना शीघ्र सम्भव हो, तुम्हें यहाँ से वन को चल देना चाहिये॥ १४ ॥

व्रीडान्वितः स्वयं यच्च नृपस्त्वां नाभिभाषते।
नैतत् किंचिन्नरश्रेष्ठ मन्युरेषोऽपनीयताम्॥१५॥

‘नरश्रेष्ठ! राजा लज्जित होने के कारण जो स्वयं तुमसे नहीं कहते हैं, यह कोई विचारणीय बात नहीं है। अतः इसका दुःख तुम अपने मन से निकाल दो॥ १५॥

यावत्त्वं न वनं यातः पुरादस्मादतित्वरम्।
पिता तावन्न ते राम स्नास्यते भोक्ष्यतेऽपि वा। १६॥

‘श्रीराम! तुम जब तक अत्यन्त उतावली के साथ इस नगर से वन को नहीं चले जाते, तबतक तुम्हारे पिता स्नान अथवा भोजन नहीं करेंगे’॥ १६ ॥

धिक्कष्टमिति निःश्वस्य राजा शोकपरिप्लुतः।
मूर्च्छितो न्यपतत् तस्मिन् पर्यङ्के हेमभूषिते॥ १७॥

कैकेयी की यह बात सुनकर शोक में डूबे हुए राजा दशरथ लंबी साँस खींचकर बोले—’धिक्कार है! हाय ! बड़ा कष्ट हुआ!’ इतना कहकर वे मूर्च्छित हो उस सुवर्णभूषित पलंग पर गिर पड़े॥ १७ ॥

रामोऽप्युत्थाप्य राजानं कैकेय्याभिप्रचोदितः।
कशयेव हतो वाजी वनं गन्तुं कृतत्वरः॥१८॥

उस समय श्रीराम ने राजा को उठाकर बैठा दिया और कैकेयी से प्रेरित हो कोड़े की चोट खाये हुए घोड़े की भाँति वे शीघ्रतापूर्वक वन को जाने के लिये उतावले हो उठे॥ १८॥

तदप्रियमनार्याया वचनं दारुणोदयम्।
श्रुत्वा गतव्यथो रामः कैकेयीं वाक्यमब्रवीत्॥ १९॥

अनार्या कैकेयी के उस अप्रिय एवं दारुण वचन को सुनकर भी श्रीराम के मनमें व्यथा नहीं हुई। वे कैकेयी से बोले- ॥ १९॥

नाहमर्थपरो देवि लोकमावस्तुमुत्सहे।
विद्धि मामृषिभिस्तुल्यं विमलं धर्ममास्थितम्॥ २०॥

‘देवि! मैं धन का उपासक होकर संसार में नहीं रहना चाहता। तुम विश्वास रखो! मैंने भी ऋषियों की ही भाँति निर्मल धर्म का आश्रय ले रखा है।॥ २० ॥

यत् तत्रभवतः किंचिच्छक्यं कर्तुं प्रियं मया।
प्राणानपि परित्यज्य सर्वथा कृतमेव तत्॥२१॥

‘पूज्य पिताजी का जो भी प्रिय कार्य मैं कर सकता हूँ, उसे प्राण देकर भी करूँगा। तुम उसे सर्वथा मेरे द्वारा हुआ ही समझो॥२१॥

न ह्यतो धर्मचरणं किंचिदस्ति महत्तरम्।
यथा पितरि शुश्रूषा तस्य वा वचनक्रिया॥२२॥

‘पिता की सेवा अथवा उनकी आज्ञा का पालन करना, जैसा महत्त्वपूर्ण धर्म है, उससे बढ़कर संसार में दूसरा कोई धर्माचरण नहीं है।॥ २२ ॥

अनुक्तोऽप्यत्रभवता भवत्या वचनादहम्।
वने वत्स्यामि विजने वर्षाणीह चतुर्दश॥ २३॥

‘यद्यपि पूज्य पिताजी ने स्वयं मुझसे नहीं कहा है, तथापि मैं तुम्हारे ही कहने से चौदह वर्षों तक इस भूतल पर निर्जन वन में निवास करूँगा॥ २३॥

न नूनं मयि कैकेयि किंचिदाशंससे गुणान्।
यद् राजानमवोचस्त्वं ममेश्वरतरा सती॥२४॥

‘कैकेयि! तुम्हारा मुझ पर पूरा अधिकार है। मैं तुम्हारी प्रत्येक आज्ञा का पालन कर सकता हूँ; फिर भी तुमने स्वयं मुझसे न कहकर इस कार्य के लिये महाराज से कहा—इनको कष्ट दिया। इससे जान पड़ता है कि तुम मुझमें कोई गुण नहीं देखती हो॥ २४॥

यावन्मातरमापृच्छे सीतां चानुनयाम्यहम्।
ततोऽद्यैव गमिष्यामि दण्डकानां महद् वनम्॥ २५॥

‘अच्छा! अब मैं माता कौसल्या से आज्ञा ले लूँ और सीता को भी समझा-बुझा लूँ, इसके बाद आज ही विशाल दण्डकवन की यात्रा करूँगा॥ २५ ॥

भरतः पालयेद् राज्यं शुश्रूषेच्च पितुर्यथा।
तथा भवत्या कर्तव्यं स हि धर्मः सनातनः॥ २६॥

‘तुम ऐसा प्रयत्न करना, जिससे भरत इस राज्य का पालन और पिताजी की सेवा करते रहें; क्योंकि यही सनातन धर्म है’ ॥ २६॥

रामस्य तु वचः श्रुत्वा भृशं दुःखगतः पिता।
शोकादशक्नुवन् वक्तुं प्ररुरोद महास्वनम्॥२७॥

श्रीराम का यह वचन सुनकर पिता को बहुत दुःख हुआ। वे शोक के आवेग से कुछ बोल न सके, केवल फूट-फूटकर रोने लगे॥२७॥

वन्दित्वा चरणौ राज्ञो विसंज्ञस्य पितुस्तदा।
कैकेय्याश्चाप्यनार्याया निष्पपात महाद्युतिः॥ २८॥

महातेजस्वी श्रीराम उस समय अचेत पड़े हुए पिता महाराज दशरथ तथा अनार्या कैकेयी के भी चरणों में प्रणाम करके उस भवन से निकले॥ २८॥

स रामः पितरं कृत्वा कैकेयीं च प्रदक्षिणम्।
निष्क्रम्यान्तःपुरात् तस्मात् स्वं ददर्श सुहृज्जनम्॥ २९॥

पिता दशरथ और माता कैकेयी की परिक्रमा करके उस अन्तःपुर से बाहर निकलकर श्रीराम अपने सुहृदों से मिले॥ २९॥

तं बाष्पपरिपूर्णाक्षः पृष्ठतोऽनुजगाम ह।
लक्ष्मणः परमक्रुद्धः सुमित्रानन्दवर्धनः॥३०॥

सुमित्रा का आनन्द बढ़ाने वाले लक्ष्मण उस अन्याय को देखकर अत्यन्त कुपित हो उठे थे, तथापि दोनों नेत्रों में आँसू भरकर वे चुपचाप श्रीरामचन्द्रजी के पीछे-पीछे चले गये॥ ३०॥

आभिषेचनिकं भाण्डं कृत्वा रामः प्रदक्षिणम्।
शनैर्जगाम सापेक्षो दृष्टिं तत्राविचालयन्॥३१॥

श्रीरामचन्द्रजी के मन में अब वन जाने की आकांक्षा का उदय हो गया था, अतः अभिषेक के लिये एकत्र की हुई सामग्रियों की प्रदक्षिणा करते हुए वे धीरे-धीरे आगे बढ़ गये। उनकी ओर उन्होंने दृष्टिपात नहीं किया॥३१॥

न चास्य महतीं लक्ष्मी राज्यनाशोऽपकर्षति।
लोककान्तस्य कान्तत्वाच्छीतरश्मेरिव क्षयः॥ ३२॥

श्रीराम अविनाशी कान्ति से युक्त थे, इसलिये उस समय राज्य का न मिलना उन लोककमनीय श्रीराम की महती शोभा में कोई अन्तर न डाल सका; जैसे चन्द्रमा का क्षीण होना उसकी सहज शोभा का अपकर्ष नहीं कर पाता है।॥ ३२॥

न वनं गन्तुकामस्य त्यजतश्च वसुंधराम्।
सर्वलोकातिगस्येव लक्ष्यते चित्तविक्रिया॥३३॥

वे वन में जाने को उत्सुक थे और सारी पृथ्वी का राज्य छोड़ रहे थे; फिर भी उनके चित्त में सर्वलोकातीत जीवन्मुक्त महात्मा की भाँति कोई विकार नहीं देखा गया॥ ३३॥

प्रतिषिध्य शुभं छत्रं व्यजने च स्वलंकृते।
विसर्जयित्वा स्वजनं रथं पौरांस्तथा जनान्॥ ३४॥
धारयन् मनसा दुःखमिन्द्रियाणि निगृह्य च।
प्रविवेशात्मवान् वेश्म मातुरप्रियशंसिवान्॥ ३५॥

श्रीराम ने अपने ऊपर सुन्दर छत्र लगाने की मनाही कर दी। डुलाये जाने वाले सुसज्जित चँवर भी रोक दिये। वे रथ को लौटाकर स्वजनों तथा पुरवासी मनुष्यों को भी बिदा करके (आत्मीय जनों के दुःख से
होने वाले) दुःख को मन में ही दबाकर इन्द्रियों को काबू में करके यह अप्रिय समाचार सुनाने के लिये माता कौसल्या के महल में गये। उस समय उन्होंने मन को पूर्णतः वश में कर रखा था॥ ३४-३५ ॥

सर्वोऽप्यभिजनः श्रीमान् श्रीमतः सत्यवादिनः।
नालक्षयत रामस्य कंचिदाकारमानने॥३६॥

जो शोभाशाली मनुष्य सदा सत्यवादी श्रीमान् राम के निकट रहा करते थे, उन्होंने भी उनके मुखपर कोई विकार नहीं देखा ॥ ३६॥

उचितं च महाबाहुर्न जहौ हर्षमात्मवान्।
शारदः समुदीर्णांशुश्चन्द्रस्तेज इवात्मजम्॥३७॥

मन को वश में रखने वाले महाबाहु श्रीराम ने अपनी स्वाभाविक प्रसन्नता उसी तरह नहीं छोड़ी थी, जैसे शरद्-काल का उद्दीप्त किरणों वाला चन्द्रमा अपने सहज तेज का परित्याग नहीं करता है॥ ३७॥

वाचा मधुरया रामः सर्वं सम्मानयञ्जनम्।
मातुः समीपं धर्मात्मा प्रविवेश महायशाः॥३८॥

महायशस्वी धर्मात्मा श्रीराम मधुर वाणी से सबलोगों का सम्मान करते हुए अपनी माता के समीप गये॥ ३८॥

तं गुणैः समतां प्राप्तो भ्राता विपुलविक्रमः।
सौमित्रिरनुवव्राज धारयन् दुःखमात्मजम्॥३९॥

उस समय गुणों में श्रीराम की ही समानता करने वाले महापराक्रमी भ्राता सुमित्रा कुमार लक्ष्मण भी अपने मानसिक दुःख को मन में ही धारण किये हुए श्रीराम के पीछे-पीछे गये॥३९॥

प्रविश्य वेश्मातिभृशं मुदा युतं समीक्ष्य तां चार्थविपत्तिमागताम्।
न चैव रामोऽत्र जगाम विक्रियां सुहृज्जनस्यात्मविपत्तिशङ्कया॥४०॥

अत्यन्त आनन्द से भरे हुए उस भवन में प्रवेश करके लौकिक दृष्टि से अपने अभीष्ट अर्थ का विनाश हुआ देखकर भी हितैषी सुहृदों के प्राणों पर संकट आ जाने की आशङ्का से श्रीराम ने यहाँ अपने मुखपर कोई विकार नहीं प्रकट होने दिया॥ ४०॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे एकोनविंशः सर्गः॥१९॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में उन्नीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥१९॥


अयोध्याकाण्डम्
विंशः सर्गः (सर्ग 20)

( राजा दशरथ की अन्य रानियों का विलाप, श्रीराम का कौसल्याजी को अपने वनवास की बात बताना )

तस्मिंस्तु पुरुषव्याघ्र निष्क्रामति कृताञ्जलौ।
आर्तशब्दो महान् जज्ञे स्त्रीणामन्तःपुरे तदा॥१॥

उधर पुरुष सिंह श्रीराम हाथ जोड़े हुए ज्यों ही कैकेयी के महल से बाहर निकलने लगे, त्यों ही अन्तःपुर में रहने वाली राजमहिलाओं का महान् आर्तनाद प्रकट हुआ॥

कृत्येष्वचोदितः पित्रा सर्वस्यान्तःपुरस्य च।
गतिश्च शरणं चासीत् स रामोऽद्य प्रवत्स्यति॥ २॥

वे कह रही थीं—’हाय! जो पिता के आज्ञा न देने पर भी समस्त अन्तःपुर के आवश्यक कार्यों में स्वतः संलग्न रहते थे, जो हमलोगों के सहारे और रक्षक थे, वे श्रीराम आज वन को चले जायेंगे॥२॥

कौसल्यायां यथा युक्तो जनन्यां वर्तते सदा।
तथैव वर्ततेऽस्मासु जन्मप्रभृति राघवः ॥३॥

‘वे रघुनाथजी जन्मसे ही अपनी माता कौसल्याके प्रति सदा जैसा बर्ताव करते थे, वैसा ही हमारे साथ भी करते थे॥३॥

न क्रुध्यत्यभिशप्तोऽपि क्रोधनीयानि वर्जयन्।
क्रुद्धान् प्रसादयन् सर्वान् स इतोऽद्य प्रवत्स्यति॥ ४॥

‘जो कठोर बात कह देने पर भी कुपित नहीं होते थे, दूसरों के मन में क्रोध उत्पन्न करने वाली बातें नहीं बोलते थे तथा जो सभी रूठे हुए व्यक्तियों को मना लिया करते थे, वे ही श्रीराम आज यहाँ से वन को चले जायँगे॥

अबुद्धिर्बत नो राजा जीवलोकं चरत्ययम्।
यो गतिं सर्वभूतानां परित्यजति राघवम्॥५॥

‘बड़े खेद की बात है कि हमारे महाराज की बुद्धि मारी गयी। ये इस समय सम्पूर्ण जीव-जगत् का विनाश करने पर तुले हुए हैं, तभी तो ये समस्त प्राणियों के जीवनाधार श्रीराम का परित्याग कर रहे हैं’॥५॥

इति सर्वा महिष्यस्ता विवत्सा इव धेनवः।
पतिमाचुक्रुशुश्चापि सस्वनं चापि चुक्रुशुः॥६॥

इस प्रकार समस्त रानियाँ अपने पति को कोसने लगीं और बछड़ों से बिछुड़ी हुई गौओं की तरह उच्च स्वर से क्रन्दन करने लगीं ॥ ६॥

स हि चान्तःपुरे घोरमार्तशब्दं महीपतिः।
पुत्रशोकाभिसंतप्तः श्रुत्वा व्यालीयतासने॥७॥

अन्तःपुर का वह भयङ्कर आर्तनाद सुनकर महाराज दशरथ ने पुत्रशोक से संतप्त हो लज्जा के मारे बिछौने में ही अपने को छिपा लिया॥७॥

रामस्तु भृशमायस्तो निःश्वसन्निव कुञ्जरः।
जगाम सहितो भ्रात्रा मातुरन्तःपुरं वशी॥८॥

इधर जितेन्द्रिय श्रीरामचन्द्रजी स्वजनों के दुःख से अधिक खिन्न होकर हाथी के समान लंबी साँस खींचते हुए भाई लक्ष्मण के साथ माता के अन्तःपुरमें गये॥ ८॥

सोऽपश्यत् पुरुषं तत्र वृद्धं परमपूजितम्।
उपविष्टं गृहद्वारि तिष्ठतश्चापरान् बहून्॥९॥

वहाँ उन्होंने उस घर के दरवाजे पर एक परम पूजित वृद्ध पुरुष को बैठा हुआ देखा और दूसरे भी बहुत-से मनुष्य वहाँ खड़े दिखायी दिये॥९॥

दृष्ट्वैव तु तदा रामं ते सर्वे समुपस्थिताः।
जयेन जयतां श्रेष्ठं वर्धयन्ति स्म राघवम्॥१०॥

वे सब-के-सब विजयी वीरों में श्रेष्ठ रघुनन्दन श्रीराम को देखते ही जय-जयकार करते हुए उनकी सेवा में उपस्थित हुए और उन्हें बधाई देने लगे॥१०॥

प्रविश्य प्रथमां कक्ष्यां द्वितीयायां ददर्श सः।
ब्राह्मणान् वेदसम्पन्नान् वृद्धान् राज्ञाभिसत्कृतान्॥११॥

पहली ड्योढ़ी पार करके जब वे दूसरी में पहुँचे, तब वहाँ उन्हें राजा के द्वारा सम्मानित बहुत-से वेदज्ञ ब्राह्मण दिखायी दिये॥ ११॥

प्रणम्य रामस्तान् वृद्धांस्तृतीयायां ददर्श सः।
स्त्रियो बालाश्च वृद्धाश्च द्वाररक्षणतत्पराः॥ १२॥

उन वृद्ध ब्राह्मणों को प्रणाम करके श्रीरामचन्द्रजी जब तीसरी ड्योढ़ी में पहुँचे, तब वहाँ उन्हें द्वाररक्षा के कार्य में लगी हुई बहुत-सी नववयस्का एवं वृद्ध अवस्था वाली स्त्रियाँ दिखायी दीं ॥ १२ ॥

वर्धयित्वा प्रहृष्टास्ताः प्रविश्य च गृहं स्त्रियः।
न्यवेदयन्त त्वरितं राममातुः प्रियं तदा ॥१३॥

उन्हें देखकर उन स्त्रियों को बड़ा हर्ष हुआ। श्रीराम को बधाई देकर उन स्त्रियों ने तत्काल महल के भीतर प्रवेश किया और तुरंत ही श्रीरामचन्द्रजी की माता को उनके आगमन का प्रिय समाचार सुनाया। १३॥

कौसल्यापि तदा देवी रात्रिं स्थित्वा समाहिता।
प्रभाते चाकरोत् पूजां विष्णोः पुत्रहितैषिणी॥ १४॥

उस समय देवी कौसल्या पुत्र की मङ्गलकामना से रातभर जागकर सबेरे एकाग्रचित्त हो भगवान् विष्णु की पूजा कर रही थीं॥ १४ ॥

सा क्षौमवसना हृष्टा नित्यं व्रतपरायणा।
अग्निं जुहोति स्म तदा मन्त्रवत् कृतमङ्गला॥ १५॥

वे रेशमी वस्त्र पहनकर बड़ी प्रसन्नता के साथ निरन्तर व्रतपरायण होकर मङ्गलकृत्य पूर्ण करने के पश्चात् मन्त्रोच्चारणपूर्वक उस समय अग्नि में आहुति दे रही थीं॥ १५ ॥

प्रविश्य तु तदा रामो मातुरन्तःपुरं शुभम्।
ददर्श मातरं तत्र हावयन्तीं हुताशनम्॥१६॥

उसी समय श्रीराम ने माता के शुभ अन्तःपुर में प्रवेश करके वहाँ माता को देखा। वे अग्नि में हवन करा रही थीं॥१६॥

देवकार्यनिमित्तं च तत्रापश्यत् समुद्यतम्।
दध्यक्षतघृतं चैव मोदकान् हविषस्तथा ॥१७॥
लाजान् माल्यानि शुक्लानि पायसं कृसरं तथा।
समिधः पूर्णकुम्भांश्च ददर्श रघुनन्दनः॥१८॥

रघुनन्दन ने देखा तो वहाँ देव-कार्य के लिये बहुत सी सामग्री संग्रह करके रखी हुई है। दही, अक्षत, घी, मोदक, हविष्य, धान का लावा, सफेद माला, खीर, खिचड़ी, समिधा और भरे हुए कलश ये सब वहाँ दृष्टिगोचर हुए॥ १७-१८॥

तां शुक्लक्षौमसंवीतां व्रतयोगेन कर्शिताम्।
तर्पयन्तीं ददर्शाद्भिर्देवतां वरवर्णिनीम्॥१९॥

उत्तम कान्तिवाली माता कौसल्या सफेद रंग की रेशमी साड़ी पहने हुए थीं। वे व्रत के अनुष्ठान से दुर्बल हो गयी थीं और इष्टदेवता का तर्पण कर रही थीं। इस अवस्थामें श्रीराम ने उन्हें देखा॥ १९॥

सा चिरस्यात्मजं दृष्ट्वा मातृनन्दनमागतम्।
अभिचक्राम संहृष्टा किशोरं वडवा यथा॥२०॥

माता का आनन्द बढ़ाने वाले प्रिय पुत्र को बहुत देर के बाद सामने उपस्थित देख कौसल्यादेवी बड़े हर्ष में भरकर उसकी ओर चलीं, मानो कोई घोड़ी अपने बछेड़े को देखकर बड़े हर्ष से उसके पास आयी हो॥२०॥

स मातरमुपक्रान्तामुपसंगृह्य राघवः।
परिष्वक्तश्च बाहुभ्यामवघ्रातश्च मूर्धनि॥२१॥

श्रीरघुनाथजी ने निकट आयी हुई माता के चरणों में प्रणाम किया और माता कौसल्या ने उन्हें दोनों भुजाओं से कसकर छाती से लगा लिया तथा बड़े प्यार से उनका मस्तक सूंघा ॥ २१ ॥

तमुवाच दुराधर्षं राघवं सुतमात्मनः।
कौसल्या पुत्रवात्सल्यादिदं प्रियहितं वचः॥ २२॥

उस समय कौसल्यादेवी ने अपने दुर्जय पुत्र श्रीरामचन्द्रजी से पुत्रस्नेहवश यह प्रिय एवं हितकर बात कही- ॥ २२॥

वृद्धानां धर्मशीलानां राजर्षीणां महात्मनाम्।
प्राप्नुह्यायुश्च कीर्तिं च धर्मं चाप्युचितं कुले॥ २३॥

‘बेटा ! तुम धर्मशील, वृद्ध एवं महात्मा राजर्षियों के समान आयु, कीर्ति और कुलोचित धर्म प्राप्त करो। २३॥

सत्यप्रतिज्ञं पितरं राजानं पश्य राघव।
अद्यैव त्वां स धर्मात्मा यौवराज्येऽभिषेक्ष्यति॥ २४॥

‘रघुनन्दन ! अब तुम जाकर अपने सत्यप्रतिज्ञ पिता राजा का दर्शन करो। वे धर्मात्मा नरेश आज ही तुम्हारा युवराज के पद पर अभिषेक करेंगे’॥ २४॥

दत्तमासनमालभ्य भोजनेन निमन्त्रितः।
मातरं राघवः किंचित् प्रसार्याञ्जलिमब्रवीत्॥ २५॥

यह कहकर माता ने उन्हें बैठने के लिये आसन दिया और भोजन करने को कहा। भोजन के लिये निमन्त्रित होकर श्रीराम ने उस आसन का स्पर्श मात्र कर लिया। फिर वे अञ्जलि फैलाकर माता से कुछ कहने को उद्यत हुए।

स स्वभावविनीतश्च गौरवाच्च तथानतः।
प्रस्थितो दण्डकारण्यमाप्रष्टमुपचक्रमे॥२६॥

वे स्वभाव से ही विनयशील थे तथा माता के गौरव से भी उनके सामने नतमस्तक हो गये थे। उन्हें दण्डकारण्य को प्रस्थान करना था, अतः वे उसके लिये आज्ञा लेने का उपक्रम करने लगे॥ २६॥

देवि नूनं न जानीषे महद् भयमुपस्थितम्।
इदं तव च दुःखाय वैदेह्या लक्ष्मणस्य च॥२७॥

उन्होंने कहा—’देवि! निश्चय ही तुम्हें मालूम नहीं है, तुम्हारे ऊपर महान् भय उपस्थित हो गया है। इस समय मैं जो बात कहने जा रहा हूँ, उसे सुनकर तुमको, सीता को और लक्ष्मण को भी दुःख होगा; तथापि कहूँगा॥

गमिष्ये दण्डकारण्यं किमनेनासनेन मे।
विष्टरासनयोग्यो हि कालोऽयं मामुपस्थितः॥ २८॥

‘अब तो मैं दण्डकारण्य में जाऊँगा, अतः ऐसे बहुमूल्य आसन की मुझे क्या आवश्यकता है? अब मेरे लिये यह कुश की चटाई पर बैठने का समय आया है।

चतर्दश हि वर्षाणि वत्स्याम विजने वने।
कन्दमूलफलैर्जीवन् हित्वा मुनिवदामिषम्॥२९॥

‘मैं राजभोग्य वस्तु का त्याग करके मुनि की भाँति कन्द, मूल और फलों से जीवन-निर्वाह करता हुआ चौदह वर्षों तक निर्जन वन में निवास करूँगा॥ २९॥

भरताय महाराजो यौवराज्यं प्रयच्छति।।
मां पुनर्दण्डकारण्यं विवासयति तापसम्॥३०॥

‘महाराज युवराज का पद भरत को दे रहे हैं और मुझे तपस्वी बनाकर दण्डकारण्य में भेज रहे हैं। ३०॥

स षट् चाष्टौ च वर्षाणि वत्स्यामि विजने वने।
आसेवमानो वन्यानि फलमूलैश्च वर्तयन्॥ ३१॥

‘अतः चौदह वर्षों तक निर्जन वन में रहूँगा और जंगल में सुलभ होने वाले वल्कल आदि को धारण करके फल-मूल के आहार से ही जीवन-निर्वाह करता रहूँगा’।

सा निकृत्तेव सालस्य यष्टिः परशुना वने।
पपात सहसा देवी देवतेव दिवश्च्युता॥३२॥

यह अप्रिय बात सुनकर वन में फरसे से काटी हुई शालवृक्ष की शाखा के समान कौसल्या देवी सहसा पृथ्वी पर गिर पड़ीं, मानो स्वर्ग से कोई देवाङ्गना भूतल पर आ गिरी हो॥ ३२॥

तामदुःखोचितां दृष्ट्वा पतितां कदलीमिव।
रामस्तूत्थापयामास मातरं गतचेतसम्॥३३॥

जिन्होंने जीवन में कभी दुःख नहीं देखा था—जो दुःख भोगने के योग्य थीं ही नहीं, उन्हीं माता कौसल्या को कटी हुई कदली की भाँति अचेतअवस्था में भूमिपर पड़ी देख श्रीराम ने हाथ का सहारा देकर उठाया॥ ३३॥

उपावृत्योत्थितां दीनां वडवामिव वाहिताम्।
पांसगण्ठितसर्वाङ्गी विममर्श च पाणिना॥३४॥

जैसे कोई घोड़ी पहले बड़ा भारी बोझ ढो चुकी हो और थकावट दूर करने के लिये धरती पर लोटपोटकर उठी हो, उसी तरह उठी हुई कौसल्याजी के समस्त अङ्गों में धूल लिपट गयी थी और वे अत्यन्त दीन दशा को पहुँच गयी थीं। उस अवस्था में श्रीराम ने अपने हाथ से उनके अङ्गों की धूल पोंछी॥ ३४ ॥

सा राघवमुपासीनमसुखार्ता सुखोचिता।
उवाच पुरुषव्याघ्रमुपशृण्वति लक्ष्मणे॥३५॥

कौसल्याजी ने जीवन में पहले सदा सुख ही देखा था और उसी के योग्य थीं, परंतु उस समय वे दुःख से कातर हो उठी थीं। उन्होंने लक्ष्मण के सुनते हुए अपने पास बैठे पुरुषसिंह श्रीराम से इस प्रकार कहा- ॥ ३५॥

यदि पुत्र न जायेथा मम शोकाय राघव।
न स्म दुःखमतो भूयः पश्येयमहमप्रजाः॥३६॥

‘बेटा रघुनन्दन! यदि तुम्हारा जन्म न हुआ होता तो मुझे इस एक ही बात का शोक रहता। आज जो मुझपर इतना भारी दुःख आ पड़ा है, इसे वन्ध्या होने पर मुझे नहीं देखना पड़ता॥ ३६॥

एक एव हि वन्ध्यायाः शोको भवति मानसः।
अप्रजास्मीति संतापो न ह्यन्यः पुत्र विद्यते॥ ३७॥

‘बेटा! वन्ध्या को एक मानसिक शोक होता है। उसके मन में यह संताप बना रहता है कि मुझे कोई संतान नहीं है, इसके सिवा दूसरा कोई दुःख उसे नहीं होता।

न दृष्टपूर्वं कल्याणं सुखं वा पतिपौरुषे।
अपि पुत्रे विपश्येयमिति रामास्थितं मया॥३८॥

‘बेटा राम! पति के प्रभुत्वकाल में एक ज्येष्ठ पत्नी को जो कल्याण या सुख प्राप्त होना चाहिये, वह मुझे पहले कभी नहीं देखने को मिला। सोचतीथी, पुत्र के राज्य में मैं सब सुख देख लूँगी और इसी आशा से मैं अब तक जीती रही॥ ३८॥

सा बहून्यमनोज्ञानि वाक्यानि हृदयच्छिदाम्।
अहं श्रोष्ये सपत्नीनामवराणां परा सती॥३९॥

‘बड़ी रानी होकर भी मुझे अपनी बातों से हृदय को विदीर्ण कर देने वाली छोटी सौतों के बहुत-से अप्रिय वचन सुनने पड़ेंगे॥ ३९॥

अतो दुःखतरं किं नु प्रमदानां भविष्यति।
मम शोको विलापश्च यादृशोऽयमनन्तकः॥ ४०॥

‘स्त्रियों के लिये इससे बढ़कर महान् दुःख और क्या होगा; अतः मेरा शोक और विलाप जैसा है, उसका कभी अन्त नहीं है॥ ४० ॥

त्वयि संनिहितेऽप्येवमहमासं निराकृता।
किं पुनः प्रोषिते तात ध्रुवं मरणमेव हि॥४१॥

‘तात! तुम्हारे निकट रहने पर भी मैं इस प्रकार सौतों से तिरस्कृत रही हूँ, फिर तुम्हारे परदेश चले जाने पर मेरी क्या दशा होगी? उस दशा में तो मेरा मरण ही निश्चित है॥ ४१॥

अत्यन्तं निगृहीतास्मि भर्तुर्नित्यमसम्मता।
परिवारेण कैकेय्याः समा वाप्यथवावरा॥४२॥

‘पति की ओर से मुझे सदा अत्यन्त तिरस्कार अथवा कड़ी फटकार ही मिली है, कभी प्यार और सम्मान नहीं प्राप्त हुआ है। मैं कैकेयी की दासियों के बराबर अथवा उनसे भी गयी-बीती समझी जाती हूँ।

यो हि मां सेवते कश्चिदपि वाप्यनुवर्तते।
कैकेय्याः पुत्रमन्वीक्ष्य स जनो नाभिभाषते॥ ४३॥

‘जो कोई मेरी सेवा में रहता या मेरा अनुसरण करता है, वह भी कैकेयी के बेटे को देखकर चुप होजाता है, मुझसे बात नहीं करता है। ४३॥

नित्यक्रोधतया तस्याः कथं नु खरवादि तत्।
कैकेय्या वदनं द्रष्टं पुत्र शक्ष्यामि दुर्गता॥४४॥

‘बेटा! इस दुर्गति में पड़कर मैं सदा क्रोधी स्वभाव के कारण कटुवचन बोलने वाले उस कैकेयी के मुख को कैसे देख सकूँगी॥४४॥

दश सप्त च वर्षाणि जातस्य तव राघव।
अतीतानि प्रकांक्षन्त्या मया दुःखपरिक्षयम्॥ ४५॥

‘रघुनन्दन ! तुम्हारे उपनयनरूप द्वितीय जन्म लिये सत्रह वर्ष बीत गये (अर्थात् तुम अब सत्ताईस वर्ष के हो गये)। अबतक मैं यही आशा लगाये चली आ रही थी कि अब मेरा दुःख दूर हो जायगा॥ ४५ ॥

तदक्षयं महद्दुःखं नोत्सहे सहितुं चिरात्।
विप्रकारं सपत्नीनामेवं जीर्णापि राघव॥४६॥

‘राघव! अब इस बुढ़ापे में इस तरह सौतों का तिरस्कार और उससे होने वाले महान् अक्षय दुःख को मैं अधिक काल तक नहीं सह सकती॥ ४६॥

अपश्यन्ती तव मुखं परिपूर्णशशिप्रभम्।
कृपणा वर्तयिष्यामि कथं कृपणजीविका॥४७॥

पूर्ण चन्द्रमा के समान तुम्हारे मनोहर मुख को देखे बिना मैं दुःखिनी दयनीय जीवनवृत्ति से रहकर कैसे निर्वाह करूँगी॥४७॥

उपवासैश्च योगैश्च बहभिश्च परिश्रमैः।
दुःखसंवर्धितो मोघं त्वं हि दुर्गतया मया॥४८॥

‘बेटा! (यदि तुझे इस देश से निकल ही जाना है तो) मुझ भाग्यहीना ने बारंबार उपवास, देवताओं का ध्यान तथा बहुत-से परिश्रमजनक उपाय करके व्यर्थ ही तुम्हारा इतने कष्ट से पालन-पोषण किया है॥४८॥

स्थिरं नु हृदयं मन्ये ममेदं यन्न दीर्यते।
प्रावृषीव महानद्याः स्पृष्टं कूलं नवाम्भसा॥४९॥

‘मैं समझती हूँ कि निश्चय ही यह मेरा हृदय बड़ा कठोर है, जो तुम्हारे बिछोह की बात सुनकर भी वर्षाकाल के नूतन जल के प्रवाह से टकराये हुए महानदी के कगार की भाँति फट नहीं जाता है॥ ४९॥

ममैव नूनं मरणं न विद्यते न चावकाशोऽस्ति यमक्षये मम।
यदन्तकोऽद्यैव न मां जिहीर्षति प्रसह्य सिंहो रुदतीं मृगीमिव॥५०॥

निश्चय ही मेरे लिये कहीं मौत नहीं है, यमराज के घर में भी मेरे लिये जगह नहीं है, तभी तो जैसे किसी रोती हुई मृगी को सिंह जबरदस्ती उठा ले जाता है, उसी प्रकार यमराज मुझे आज ही उठा ले जाना नहीं चाहता है॥ ५० ॥

स्थिरं हि नूनं हृदयं ममायसं न भिद्यते यद् भुवि नो विदीर्यते।
अनेन दुःखेन च देहमर्पितं ध्रुवं ह्यकाले मरणं न विद्यते॥५१॥

‘अवश्य ही मेरा कठोर हृदय लोहे का बना हुआ है, जो पृथिवी पर पड़ने पर भी न तो फटता है और न टूक-टूक हो जाता है। इसी दुःख से व्याप्त हुए इस शरीर के भी टुकड़े-टुकड़े नहीं हो जाते हैं। निश्चय ही, मृत्युकाल आये बिना किसी का मरण नहीं होता है॥

इदं तु दुःखं यदनर्थकानि मे व्रतानि दानानि च संयमाश्च हि।
तपश्च तप्तं यदपत्यकाम्यया सुनिष्फलं बीजमिवोप्तमूषरे॥५२॥

सबसे अधिक दुःख की बात तो यह है कि पुत्र के सुख के लिये मेरे द्वारा किये गये व्रत, दान और संयम सब व्यर्थ हो गये। मैंने संतान की हित-कामना से जो तप किया है, वह भी ऊसर में बोये हुए बीज की भाँति निष्फल हो गया। ५२॥

यदि ह्यकाले मरणं यदृच्छया लभेत कश्चिद् गुरुदुःखकर्शितः।
गताहमयैव परेतसंसदं विना त्वया धेनुरिवात्मजेन वै॥५३॥

‘यदि कोई मनुष्य भारी दुःखसे पीड़ित हो असमयमें भी अपनी इच्छाके अनुसार मृत्यु पा सके तो मैं तुम्हारे बिना अपने बछड़ेसे बिछुड़ी हुई गायकी भाँति आज ही यमराजकी सभामें चली जाऊँ॥ ५३॥

अथापि किं जीवितमद्य मे वृथा त्वया विना चन्द्रनिभाननप्रभ।
अनुव्रजिष्यामि वनं त्वयैव गौः सदुर्बला वत्समिवाभिकांक्षया॥५४॥

‘चन्द्रमा के समान मनोहर मुख-कान्ति वाले श्रीराम ! यदि मेरी मृत्यु नहीं होती है तो तुम्हारे बिना यहाँ व्यर्थ कुत्सित जीवन क्यों बिताऊँ ? बेटा ! जैसे गौ दुर्बल होने पर भी अपने बछडे के लोभ से उसके पीछे-पीछे चली जाती है, उसी प्रकार मैं भी तुम्हारे साथ ही वन को चली चलूँगी’॥

भृशमसुखममर्षिता तदा बहु विललाप समीक्ष्य राघवम्।
व्यसनमुपनिशाम्य सा महत् सुतमिव बद्धमवेक्ष्य किंनरी॥५५॥

आने वाले भारी दुःख को सहने में असमर्थ हो महान् संकट का विचार करके सत्य के ध्यान में बँधे हुए अपने पुत्र श्रीरघुनाथजी की ओर देखकर माता कौसल्या उस समय बहुत विलाप करने लगीं, मानो कोई किन्नरी अपने पुत्र को बन्धन में पड़ा हुआ देखकर बिलख रही हो॥५५॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे विंशः सर्गः ॥२०॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में बीसवाँ सर्ग पूरा हुआ। २०॥


अयोध्याकाण्डम्
एकविंशः सर्गः (सर्ग 21)

( लक्ष्मण का श्रीराम को बलपूर्वक राज्य पर अधिकार कर लेने के लिये प्रेरित करना तथा श्रीराम का पिता की आज्ञा के पालन को ही धर्म बताना )

तथा त विलपन्तीं तां कौसल्यां राममातरम्।
उवाच लक्ष्मणो दीनस्तत्कालसदृशं वचः॥१॥

इस प्रकार विलाप करती हुई श्रीराम माता कौसल्या से अत्यन्त दुःखी हुए लक्ष्मण ने उस समय के योग्य बात कही— ॥१॥

न रोचते ममाप्येतदार्ये यद् राघवो वनम्।
त्यक्त्वा राज्यश्रियं गच्छेत् स्त्रिया वाक्यवशंगतः॥२॥
विपरीतश्च वृद्धश्च विषयैश्च प्रधर्षितः।
नृपः किमिव न ब्रूयाच्चोद्यमानः समन्मथः॥३॥

‘बड़ी माँ! मुझे भी यह अच्छा नहीं लगता कि श्रीराम राज्यलक्ष्मी का परित्याग करके वन में जायँ। महाराज तो इस समय स्त्री की बात में आ गये हैं, इसलिये उनकी प्रकृति विपरीत हो गयी है। एक तो वे बूढ़े हैं, दूसरे विषयों ने उन्हें वश में कर लिया है; अतः कामदेव के वशीभूत हुए वे नरेश कैकेयी-जैसी स्त्री की प्रेरणा से क्या नहीं कह सकते हैं? ।। २-३॥

नास्यापराधं पश्यामि नापि दोषं तथाविधम्।
येन निर्वास्यते राष्ट्राद् वनवासाय राघवः॥४॥

‘मैं श्रीरघुनाथजी का ऐसा कोई अपराध या दोष नहीं देखता, जिससे इन्हें राज्य से निकाला जाय और वन में रहने के लिये विवश किया जाय॥४॥

न तं पश्याम्यहं लोके परोक्षमपि यो नरः।
स्वमित्रोऽपि निरस्तोऽपि योऽस्य दोषमुदाहरेत्॥

‘मैं संसार में एक मनुष्य को भी ऐसा नहीं देखता, जो अत्यन्त शत्रु एवं तिरस्कृत होने पर भी परोक्ष में भी इनका कोई दोष बता सके॥५॥

देवकल्पमृगँ दान्तं रिपूणामपि वत्सलम्।
अवेक्षमाणः को धर्मं त्यजेत् पुत्रमकारणात्॥

‘धर्मपर दृष्टि रखने वाला कौन ऐसा राजा होगा, जो देवता के समान शुद्ध, सरल, जितेन्द्रिय और शत्रुओं पर भी स्नेह रखने वाले (श्रीराम-जैसे) पुत्र का अकारण परित्याग करेगा? ॥ ६॥

तदिदं वचनं राज्ञः पुनर्बाल्यमुपेयुषः।
पुत्रः को हृदये कुर्याद् राजवृत्तमनुस्मरन्॥७॥

‘जो पुनः बालभाव (विवेक शून्यता) को प्राप्त हो गये हैं, ऐसे राजा के इस वचन को राजनीति का ध्यान रखने वाला कौन पुत्र अपने हृदय में स्थान दे सकता है?॥

यावदेव न जानाति कश्चिदर्थमिमं नरः।
तावदेव मया सार्धमात्मस्थं कुरु शासनम्॥८॥

‘रघुनन्दन! जबतक कोई भी मनुष्य आपके वनवास की बात को नहीं जानता है, तब तक ही, आप मेरी सहायता से इस राज्य के शासन की बागडोर अपने हाथ में ले लीजिये॥८॥

मया पार्श्वे सधनुषा तव गुप्तस्य राघव।
कः समर्थोऽधिकं कर्तुं कृतान्तस्येव तिष्ठतः॥९॥

रघुवीर ! जब मैं धनुष लिये आपके पास रहकर आपकी रक्षा करता रहूँ और आप काल के समान युद्ध के लिये डट जायँ, उस समय आपसे अधिक पौरुष प्रकट करने में कौन समर्थ हो सकता है? ॥

निर्मनुष्यामिमां सर्वामयोध्यां मनुजर्षभ।
करिष्यामि शरैस्तीक्ष्णैर्यदि स्थास्यति विप्रिये॥ १०॥

‘नरश्रेष्ठ! यदि नगर के लोग विरोध में खड़े होंगे तो मैं अपने तीखे बाणों से सारी अयोध्या को मनुष्यों से सूनी कर दूंगा॥१०॥

भरतस्याथ पक्ष्यो वा यो वास्य हितमिच्छति।
सर्वांस्तांश्च वधिष्यामि मृदुर्हि परिभूयते॥११॥

‘जो-जो भरतका पक्ष लेगा अथवा केवल जो उन्हींका हित चाहेगा, उन सबका मैं वध कर डालूँगा; क्योंकि जो कोमल या नम्र होता है, उसका सभी तिरस्कार करते हैं।॥ ११॥

प्रोत्साहितोऽयं कैकेय्या संतुष्टो यदि नः पिता।
अमित्रभूतो निःसङ्गं वध्यतां वध्यतामपि॥१२॥

‘यदि कैकेयी के प्रोत्साहन देने पर उसके ऊपर – संतुष्ट हो पिताजी हमारे शत्रु बन रहे हैं तो हमें भी मोह-ममता छोड़कर इन्हें कैद कर लेना या मार डालना चाहिये॥ १२॥

गुरोरप्यवलिप्तस्य कार्याकार्यमजानतः।
उत्पथं प्रतिपन्नस्य कार्यं भवति शासनम्॥१३॥

‘क्योंकि यदि गुरु भी घमंड में आकर कर्तव्याकर्तव्य का ज्ञान खो बैठे और कुमार्ग पर चलने लगे तो उसे भी दण्ड देना आवश्यक हो जाता है। १३॥

बलमेष किमाश्रित्य हेतुं वा पुरुषोत्तम।
दातुमिच्छति कैकेय्यै उपस्थितमिदं तव॥१४॥

‘पुरुषोत्तम! राजा किस बल का सहारा लेकर अथवा किस कारण को सामने रखकर आपको न्यायतः प्राप्त हुआ यह राज्य अब कैकेयी को देना चाहते हैं?॥

त्वया चैव मया चैव कृत्वा वैरमनुत्तमम्।
कास्य शक्तिः श्रियं दातुं भरतायारिशासन॥ १५॥

‘शत्रुदमन श्रीराम! आपके और मेरे साथ भारी वैर बाँधकर इनकी क्या शक्ति है कि यह राज्यलक्ष्मी ये भरत को दे दें? ॥ १५॥

अनुरक्तोऽस्मि भावेन भ्रातरं देवि तत्त्वतः।
सत्येन धनुषा चैव दत्तेनेष्टेन ते शपे॥१६॥

‘देवि! (बड़ी माँ!) मैं सत्य, धनुष, दान तथा यज्ञ आदि की शपथ खाकर तुमसे सच्ची बात कहता हूँ कि मेरा अपने पूज्य भ्राता श्रीराम में हार्दिक अनुराग है॥१६॥

दीप्तमग्निमरण्यं वा यदि रामः प्रवेक्ष्यति।
प्रविष्टं तत्र मां देवि त्वं पूर्वमवधारय॥१७॥

‘देवि! आप विश्वास रखें, यदि श्रीराम जलती हुई आग में या घोर वन में प्रवेश करने वाले होंगे तो मैं इनसे भी पहले उसमें प्रविष्ट हो जाऊँगा॥ १७॥

हरामि वीर्याद् दुःखं ते तमः सूर्य इवोदितः।
देवी पश्यतु मे वीर्यं राघवश्चैव पश्यतु॥१८॥

‘इस समय आप, रघुनाथ जी तथा अन्य सब लोग भी मेरे पराक्रम को देखें। जैसे सूर्य उदित होकर अन्धकार का नाश कर देता है, उसी प्रकार मैं भी अपनी शक्ति से आपके सब दुःख दूर कर दूंगा। १८॥

हनिष्ये पितरं वृद्धं कैकेय्यासक्तमानसम्।
कृपणं च स्थितं बाल्ये वृद्धभावेन गर्हितम्॥ १९॥

‘जो कैकेयी में आसक्तचित्त होकर दीन बन गये हैं, बालभाव (अविवेक) में स्थित हैं और अधिक बुढ़ापे के कारण निन्दित हो रहे हैं, उन वृद्ध पिता को मैं अवश्य मार डालूँगा’ ॥ १९ ॥

एतत् तु वचनं श्रुत्वा लक्ष्मणस्य महात्मनः।
उवाच रामं कौसल्या रुदती शोकलालसा॥ २०॥

महामनस्वी लक्ष्मण के ये ओजस्वी वचन सुनकर शोकमग्न कौसल्या श्रीराम से रोती हुई बोलीं-॥ २०॥

भ्रातुस्ते वदतः पुत्र लक्ष्मणस्य श्रुतं त्वया।
यदत्रानन्तरं तत्त्वं कुरुष्व यदि रोचते॥२१॥

‘बेटा ! तुमने अपने भाई लक्ष्मण की कही हुई सारी बातें सुन लीं, यदि झुंचे तो अब इसके बाद तुम जो कुछ करना उचित समझो, उसे करो॥ २१ ॥

न चाधर्म्यं वचः श्रुत्वा सपत्न्या मम भाषितम्।
विहाय शोकसंतप्तां गन्तुमर्हसि मामितः॥२२॥

‘मेरी सौत की कही हुई अधर्मयुक्त बात सुनकर मुझ शोक से संतप्त हुई माता को छोड़कर तुम्हें यहाँ से नहीं जाना चाहिये॥ २२॥

धर्मज्ञ इति धर्मिष्ठ धर्मं चरितुमिच्छसि।
शुश्रूष मामिहस्थस्त्वं चर धर्ममनुत्तमम्॥ २३॥

“धर्मिष्ठ! तुम धर्म को जानने वाले हो, इसलिये यदि धर्म का पालन करना चाहो तो यहीं रहकर मेरी सेवा करो और इस प्रकार परम उत्तम धर्म का आचरण करो॥

शुश्रूषुर्जननीं पुत्र स्वगृहे नियतो वसन्।
परेण तपसा युक्तः काश्यपस्त्रिदिवं गतः॥२४॥

‘वत्स! अपने घर में नियम पूर्वक रहकर माता की सेवा करने वाले काश्यप उत्तम तपस्या से युक्त हो स्वर्गलोक में चले गये थे॥ २४॥

यथैव राजा पूज्यस्ते गौरवेण तथा ह्यहम्।
त्वां साहं नानुजानामि न गन्तव्यमितो वनम्॥ २५॥

‘जैसे गौरव के कारण राजा तुम्हारे पूज्य हैं, उसी प्रकार मैं भी हूँ। मैं तुम्हें वन जाने की आज्ञा नहीं देती, अतः तुम्हें यहाँ से वन को नहीं जाना चाहिये॥ २५ ॥

त्वद्वियोगान्न मे कार्यं जीवितेन सुखेन च।
त्वया सह मम श्रेयस्तृणानामपि भक्षणम्॥२६॥

‘तुम्हारे साथ तिनके चबाकर रहना भी मेरे लिये श्रेयस्कर है, परंतु तुमसे विलग हो जाने पर न मुझे इस जीवन से कोई प्रयोजन है और न सुख से॥२६॥

यदि त्वं यास्यसि वनं त्यक्त्वा मां शोकलालसाम्।
अहं प्रायमिहासिष्ये न च शक्ष्यामि जीवितुम्॥ २७॥

‘यदि तुम मुझे शोक में डूबी हुई छोड़कर वन को चले जाओगे तो मैं उपवास करके प्राण त्याग दूंगी, जीवित नहीं रह सकूँगी॥ २७॥

ततस्त्वं प्राप्स्यसे पुत्र निरयं लोकविश्रुतम्।
ब्रह्महत्यामिवाधर्मात् समुद्रः सरितां पतिः॥२८॥

‘बेटा! ऐसा होने पर तुम संसार प्रसिद्ध वह नरकतुल्य कष्ट पाओगे, जो ब्रह्महत्या के समान है और जिसे सरिताओं के स्वामी समुद्र ने अपने अधर्म के फलरूप से प्राप्त किया था’* ॥ २८॥
* किसी कल्प में समुद्र ने अपनी माता को दुःख दिया था, उससे पिप्पलाद नामक ब्रह्मर्षि ने उस अधर्म का दण्ड देने के लिये उसके ऊपर एक कृत्या का प्रयोग किया। इससे समुद्र को नरकवासतुल्य महान् दुःख भोगना पड़ा था।

विलपन्तीं तथा दीनां कौसल्यां जननीं ततः।
उवाच रामो धर्मात्मा वचनं धर्मसंहितम्॥२९॥

माता कौसल्या को इस प्रकार दीन होकर विलाप करती देख धर्मात्मा श्रीरामचन्द्र ने यह धर्मयुक्त वचन कहा- ॥२९॥

नास्ति शक्तिः पितुर्वाक्यं समतिक्रमितुं मम।
प्रसादये त्वां शिरसा गन्तुमिच्छाम्यहं वनम्॥ ३०॥

‘माता! मैं तुम्हारे चरणों में सिर झुकाकर तुम्हें प्रसन्न करना चाहता हूँ। मुझमें पिताजी की आज्ञा का उल्लङ्घन करने की शक्ति नहीं है, अतः मैं वन को ही जाना चाहता हूँ॥ ३०॥

ऋषिणा च पितुर्वाक्यं कुर्वता वनचारिणा।
गौर्हता जानताधर्मं कण्डुना च विपश्चिता॥ ३१॥

‘वनवासी विद्वान् कण्डु मुनि ने पिता की आज्ञा का पालन करने के लिये अधर्म समझते हुए भी गौ का वध कर डाला था॥ ३१॥

अस्माकं तु कुले पूर्वं सगरस्याज्ञया पितुः।
खनद्भिः सागरैर्भूमिमवाप्तः सुमहान् वधः॥३२॥

‘हमारे कुल में भी पहले राजा सगर के पुत्र ऐसे हो गये हैं, जो पिता की आज्ञा से पृथ्वी खोदते हुए बुरी तरह से मारे गये॥ ३२॥

जामदग्न्येन रामेण रेणुका जननी स्वयम्।
कृत्ता परशुनारण्ये पितुर्वचनकारणात्॥ ३३॥

‘जमदग्नि के  पुत्र परशुराम ने पिता की आज्ञा का पालन करने के लिये ही वन में फरसे से अपनी माता रेणुका का गला काट डाला था॥ ३३॥

एतैरन्यैश्च बहुभिर्देवि देवसमैः कृतम्।
पितर्वचनमक्लीबं करिष्यामि पितुर्हितम्॥३४॥

‘देवि! इन्होंने तथा और भी बहुत-से देवतुल्य मनुष्यों ने उत्साह के साथ पिता के आदेश का पालन किया है। अतः मैं भी कायरता छोड़कर पिता का हित-साधन करूँगा॥ ३४॥

न खल्वेतन्मयैकेन क्रियते पितृशासनम्।
एतैरपि कृतं देवि ये मया परिकीर्तिताः॥ ३५॥

‘देवि! केवल मैं ही इस प्रकार पिता के आदेश का पालन नहीं कर रहा हूँ। जिनकी मैंने अभी चर्चा की है, उन सबने भी पिता के आदेश का पालन किया है।

नाहं धर्ममपूर्वं ते प्रतिकूलं प्रवर्तये।
पूर्वैरयमभिप्रेतो गतो मार्गोऽनुगम्यते॥३६॥

‘मा! मैं तुम्हारे प्रतिकूल किसी नवीन धर्म का प्रचार नहीं कर रहा हूँ। पूर्वकाल के धर्मात्मा पुरुषों को भी यह अभीष्ट था। मैं तो उनके चले हुए मार्ग का ही अनुसरण करता हूँ॥ ३६॥

तदेतत् तु मया कार्यं क्रियते भुवि नान्यथा।
पितुर्हि वचनं कुर्वन् न कश्चिन्नाम हीयते॥ ३७॥

‘इस भूमण्डल पर जो सबके लिये करने योग्य है, वही मैं भी करने जा रहा हूँ। इसके विपरीत कोई न करने योग्य काम नहीं कर रहा हूँ। पिता की आज्ञा का पालन करने वाला कोई भी पुरुष धर्म से भ्रष्ट नहीं होता’॥

तामेवमुक्त्वा जननी लक्ष्मणं पुनरब्रवीत्।
वाक्यं वाक्यविदां श्रेष्ठः श्रेष्ठः सर्वधनुष्मताम्॥ ३८॥

अपनी माता से ऐसा कहकर वाक्यवेत्ताओं में श्रेष्ठ समस्त धनुर्धरशिरोमणि श्रीराम ने पुनः लक्ष्मण से कहा – ॥ ३८॥

तव लक्ष्मण जानामि मयि स्नेहमनुत्तमम्।
विक्रमं चैव सत्त्वं च तेजश्च सुदुरासदम्॥३९॥

‘लक्ष्मण ! मेरे प्रति तुम्हारा जो परम उत्तम स्नेह है, उसे मैं जानता हूँ। तुम्हारे पराक्रम, धैर्य और दुर्धर्ष तेज का भी मुझे ज्ञान है॥ ३९॥

मम मातुर्महद् दुःखमतुलं शुभलक्षण।
अभिप्रायं न विज्ञाय सत्यस्य च शमस्य च॥ ४०॥

‘शुभलक्षण लक्ष्मण ! मेरी माता को जो अनुपम एवं महान् दुःख हो रहा है, वह सत्य और शम के विषय में मेरे अभिप्राय को न समझने के कारण है।॥ ४० ॥

धर्मो हि परमो लोके धर्मे सत्यं प्रतिष्ठितम्।
धर्मसंश्रितमप्येतत् पितुर्वचनमुत्तमम्॥४१॥

‘संसार में धर्म ही सबसे श्रेष्ठ है। धर्म में ही सत्य की प्रतिष्ठा है। पिताजी का यह वचन भी धर्म के आश्रित होने के कारण परम उत्तम है॥ ४१॥

संश्रुत्य च पितुर्वाक्यं मातुर्वा ब्राह्मणस्य वा।
न कर्तव्यं वृथा वीर धर्ममाश्रित्य तिष्ठता॥४२॥

‘वीर! धर्म का आश्रय लेकर रहने वाले पुरुष को पिता, माता अथवा ब्राह्मण के वचनों का पालन करने की प्रतिज्ञा करके उसे मिथ्या नहीं करना चाहिये॥ ४२ ॥

सोऽहं न शक्ष्यामि पुनर्नियोगमतिवर्तितुम्।
पितुर्हि वचनाद् वीर कैकेय्याह प्रचोदितः॥४३॥

‘वीर! अतः मैं पिताजी की आज्ञा का उल्लङ्घन नहीं कर सकता; क्योंकि पिताजी के कहने से ही कैकेयी ने मुझे वन में जाने की आज्ञा दी है॥ ४३॥

तदेतां विसृजानार्यां क्षत्रधर्माश्रितां मतिम्।
धर्ममाश्रय मा तैक्ष्ण्यं मबुद्धिरनुगम्यताम्॥ ४४॥

‘इसलिये केवल क्षात्रधर्म का अवलम्बन करने वाली इस ओछी बुद्धि का त्याग करो, धर्म का आश्रय लो, कठोरता छोड़ो और मेरे विचार के अनुसार चलो’ ॥ ४४॥

तमेवमुक्त्वा सौहार्दाद् भ्रातरं लक्ष्मणाग्रजः।
उवाच भूयः कौसल्यां प्राञ्जलिः शिरसा नतः॥ ४५॥

अपने भाई लक्ष्मण से सौहार्दवश ऐसी बात कहकर उनके बड़े भ्राता श्रीराम ने पुनः कौसल्या के चरणों में मस्तक झुकाया और हाथ जोड़कर कहा- ॥ ४५ ॥

अनुमन्यस्व मां देवि गमिष्यन्तमितो वनम्।
शापितासि मम प्राणैः कुरु स्वस्त्ययनानि मे॥ ४६॥

‘देवि! मैं यहाँ से वन को जाऊँगा। तुम मुझे आज्ञा दो और स्वस्तिवाचन कराओ। यह बात मैं अपने प्राणों की शपथ दिलाकर कहता हूँ॥ ४६॥

तीर्णप्रतिज्ञश्च वनात् पुनरेष्याम्यहं पुरीम्।
ययातिरिव राजर्षिः पुरा हित्वा पुनर्दिवम्॥४७॥

‘जैसे पूर्वकाल में राजर्षि ययाति स्वर्गलोक का त्याग करके पुनः भूतल पर उतर आये थे, उसी प्रकार मैं भी प्रतिज्ञा पूर्ण करके पुनः वन से अयोध्यापुरी को लौट आऊँगा॥ ४७॥

शोकः संधार्यतां मातर्हृदये साधु मा शुचः।
वनवासादिहैष्यामि पुनः कृत्वा पितुर्वचः॥४८॥

‘मा! शोक को अपने हृदय में ही अच्छी तरह दबाये रखो। शोक न करो। पिता की आज्ञा का पालन करके मैं फिर वनवास से यहाँ लौट आऊँगा॥४८॥

त्वया मया च वैदेह्या लक्ष्मणेन सुमित्रया।
पितर्नियोगे स्थातव्यमेष धर्मः सनातनः॥४९॥

‘तुमको, मुझको, सीता को, लक्ष्मण को और माता सुमित्रा को भी पिताजी की आज्ञा में ही रहना चाहिये। यही सनातन धर्म है॥ ४९॥

अम्ब सम्भृत्य सम्भारान् दुःखं हृदि निगृह्य च।
वनवासकृता बुद्धिर्मम धानुवर्त्यताम्॥५०॥

‘मा! यह अभिषेक की सामग्री ले जाकर रख दो। अपने मन का दुःख मन में ही दबा लो और वनवास के सम्बन्ध में जो मेरा धर्मानुकूल विचार है, उसका अनुसरण करो—मुझे जाने की आज्ञा दो’ ॥ ५० ॥

एतद् वचस्तस्य निशम्य माता सुधर्म्यमव्यग्रमविक्लवं च।
मृतेव संज्ञां प्रतिलभ्य देवी समीक्ष्य रामं पुनरित्युवाच॥५१॥

श्रीरामचन्द्रजी की यह धर्मानुकूल तथा व्यग्रता और आकुलता से रहित बात सुनकर जैसे मरे हुए मनुष्य में प्राण आ जाय, उसी प्रकार देवी कौसल्या मर्छा त्यागकर होश में आ गयीं तथा अपने पुत्र श्रीराम की ओर देखकर इस प्रकार कहने लगीं- ॥५१॥

यथैव ते पुत्र पिता तथाहं गुरुः स्वधर्मेण सुहृत्तया च।
न त्वानुजानामि न मां विहाय सुदुःखितामर्हसि पुत्र गन्तुम्॥५२॥

‘बेटा! धर्म और सौहार्द के नाते जैसे पिता तुम्हारे लिये आदरणीय गुरुजन हैं, वैसी ही मैं भी हूँ। मैं तुम्हें वन में जाने की आज्ञा नहीं देती। वत्स! मुझ दुःखिया को छोड़कर तुम्हें कहीं नहीं जाना चाहिये। ५२॥

किं जीवितेनेह विना त्वया मे लोकेन वा किं स्वधयामृतेन।
श्रेयो मुहर्तं तव संनिधानं ममैव कृत्स्नादपि जीवलोकात्॥५३॥

‘तुम्हारे बिना मुझे यहाँ इस जीवन से क्या लाभ है ? इन स्वजनों से, देवता तथा पितरों की पूजा से और अमृत से भी क्या लेना है? तुम दो घड़ी भी मेरे पास रहो तो वही मेरे लिये सम्पूर्ण संसार के राज्य से भी बढ़कर सुख देनेवाला है’ ।। ५३ ।।

नरैरिवोल्काभिरपोह्यमानो महागजो ध्वान्तमभिप्रविष्टः।
भूयः प्रजज्वाल विलापमेवं निशम्य रामः करुणं जनन्याः॥५४॥

जैसे कोई विशाल गजराज किसी अन्धकूप में पड़ जाय और लोग उसे जलते लुआठों से मार-मारकर पीडित करने लगें, उस दशा में वह क्रोध से जल उठे; उसी प्रकार श्रीराम भी माता का बारंबार करुण विलाप सुनकर (इसे स्वधर्मपालन में बाधा मानकर) आवेश में भर गये। (वन में जाने का ही दृढ़ निश्चय कर लिया) ॥५४॥

स मातरं चैव विसंज्ञकल्पामार्तं च सौमित्रिमभिप्रतप्तम्।
धर्मे स्थितो धर्म्यमुवाच वाक्यं यथा स एवार्हति तत्र वक्तुम्॥५५॥

उन्होंने धर्म में ही दृढ़तापूर्वक स्थित रहकर अचेत सी हो रही माता से और आर्त एवं संतप्त हुए सुमित्रा कुमार लक्ष्मण से भी ऐसी धर्मानुकूल बात कही, जैसी उस अवसर पर वे ही कह सकते थे। ५५॥

अहं हि ते लक्ष्मण नित्यमेव जानामि भक्तिं च पराक्रमं च।
मम त्वभिप्रायमसंनिरीक्ष्य मात्रा सहाभ्यर्दसि मा सुदुःखम्॥५६॥

‘लक्ष्मण ! मैं जानता हूँ, तुम सदा ही मुझमें भक्ति रखते हो और तुम्हारा पराक्रम कितना महान् है, यह भी मुझसे छिपा नहीं है; तथापि तुम मेरे अभिप्राय की ओर ध्यान न देकर माताजी के साथ स्वयं भी मुझे पीड़ा दे रहे हो। इस तरह मुझे अत्यन्त दुःख में न डालो॥५६॥

धर्मार्थकामाः खलु जीवलोके समीक्षिता धर्मफलोदयेषु।
ये तत्र सर्वे स्युरसंशयं मे भार्येव वश्याभिमता सपुत्रा॥५७॥

‘इस जीवजगत् में पूर्वकृत धर्म के फल की प्राप्ति के अवसरों पर जो धर्म, अर्थ और काम तीनों देखे गये हैं, वे सब-के-सब जहाँ धर्म है, वहाँ अवश्य प्राप्त होते हैं—इसमें संशय नहीं है; ठीक उसी तरह जैसे भार्या धर्म, अर्थ और काम तीनों की साधन होती है। वह पति के वशीभूत या अनुकूल रहकर अतिथिसत्कार आदि धर् के पालन में सहायक होती है। प्रेयसीरूप से काम का साधन बनती है और पुत्रवती होकर उत्तम लोक की प्राप्तिरूप अर्थ की साधिका होती है।। ५७॥

यस्मिंस्तु सर्वे स्युरसंनिविष्टा धर्मो यतः स्यात् तदुपक्रमेत।
द्वेष्यो भवत्यर्थपरो हि लोके कामात्मता खल्वपि न प्रशस्ता॥५८॥

‘जिस कर्ममें धर्म आदि सब पुरुषार्थोंका समावेश । न हो, उसको नहीं करना चाहिये। जिससे धर्मकी सिद्धि होती हो, उसीका आरम्भ करना चाहिये। जो केवल अर्थपरायण होता है, वह लोकमें सबके द्वेषका पात्र बन जाता है तथा धर्मविरुद्ध काममें अत्यन्त आसक्त होना प्रशंसा नहीं, निन्दाकी बात है। ५८॥

गुरुश्च राजा च पिता च वृद्धः क्रोधात् प्रहर्षादथवापि कामात्।
यद् व्यादिशेत् कार्यमवेक्ष्य धर्म कस्तं न कुर्यादनृशंसवृत्तिः॥५९॥

‘महाराज हमलोगों के गुरु, राजा और पिता होने के साथ ही बड़े-बूढ़े माननीय पुरुष हैं। वे क्रोध से, हर्ष से अथवा काम से प्रेरित होकर भी यदि किसी कार्य के लिये आज्ञा दें तो हमें धर्म समझकर उसका पालन करना चाहिये। जिसके आचरणों में क्रूरता नहीं है, ऐसा कौन पुरुष पिता की आज्ञा के पालन रूप धर्म का आचरण नहीं करेगा॥ ५९॥

न तेन शक्नोमि पितुः प्रतिज्ञामिमां न कर्तुं सकलां यथावत्।
स ह्यावयोस्तात गुरुर्नियोगे देव्याश्च भर्ता स गतिश्च धर्मः॥६०॥

‘इसलिये मैं पिता की इस सम्पूर्ण प्रतिज्ञा का यथावत् पालन करने से मुँह नहीं मोड़ सकता। तात लक्ष्मण! वे हम दोनों को आज्ञा देने में समर्थ गुरु हैं और माताजी के तो वे ही पति, गति तथा धर्म हैं। ६०॥

तस्मिन् पुनर्जीवति धर्मराजे विशेषतः स्वे पथि वर्तमाने।
देवी मया सार्धमितोऽभिगच्छेत् कथंस्विदन्या विधवेव नारी॥६१॥

‘वे धर्म के प्रवर्तक महाराज अभी जीवित हैं और विशेषतः अपने धर्ममय मार्गपर स्थित हैं, ऐसी दशा में माताजी, जैसे दूसरी कोई विधवा स्त्री बेटे के साथ रहती है, उस प्रकार मेरे साथ यहाँ से वन में कैसे चल सकती हैं? ॥ ६१॥

सा मानुमन्यस्व वनं व्रजन्तं कुरुष्व नः स्वस्त्ययनानि देवि।
यथा समाप्ते पुनराव्रजेयं यथा हि सत्येन पुनर्ययातिः॥६२॥

‘अतः देवि! तुम मुझे वन में जाने की आज्ञा दो और हमारे मङ्गल के लिये स्वस्तिवाचन कराओ, जिससे वनवास की अवधि समाप्त होने पर मैं फिर तुम्हारी सेवा में आ जाऊँ। जैसे राजा ययाति सत्य के प्रभाव से फिर स्वर्गमें लौट आये थे॥६२॥

यशो ह्यहं केवलराज्यकारणान्न पृष्ठतः कर्तुमलं महोदयम्।
अदीर्घकालेन तु देवि जीविते वृणेऽवरामद्य महीमधर्मतः॥६३॥

केवल धर्महीन राज्य के लिये मैं महान् फलदायक धर्मपालनरूप सुयश को पीछे नहीं ढकेल सकता। मा! जीवन अधिक कालतक रहने वाला नहीं है; इसके लिये मैं आज अधर्मपूर्वक इस तुच्छ पृथ्वी का राज्य लेना नहीं चाहता’ ॥ ६३॥

प्रसादयन्नरवृषभः स मातरं पराक्रमाज्जिगमिषुरेव दण्डकान्।
अथानुजं भृशमनुशास्य दर्शनं चकार तां हृदि जननीं प्रदक्षिणम्॥६४॥

इस प्रकार नरश्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजी ने धैर्यपूर्वक दण्डकारण्य में जाने की इच्छा से माता को प्रसन्न करने का प्रयत्न किया तथा अपने छोटे भाई लक्ष्मण को भी अपने विचार के अनुसार भलीभाँति धर्म का रहस्य समझाकर मन-ही-मन माता की परिक्रमा करने का संकल्प किया।

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे एकविंशः सर्गः ॥२१॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में इक्कीसवाँ सर्ग पूरा हुआ। २१॥


अयोध्याकाण्डम्
द्वाविंशः सर्गः (सर्ग 22)

( श्रीराम का लक्ष्मण को समझाते हुए अपने वनवास में दैव को ही कारण बताना और अभिषेक की सामग्री को हटा लेने का आदेश देना )

अथ तं व्यथया दीनं सविशेषममर्षितम्।
सरोषमिव नागेन्द्रं रोषविस्फारितेक्षणम्॥१॥
आसाद्य रामः सौमित्रिं सुहृदं भ्रातरं प्रियम्।
उवाचेदं स धैर्येण धारयन् सत्त्वमात्मवान्॥२॥

(श्रीराम के राज्याभिषेक में विघ्न पड़ने के कारण) सुमित्राकुमार लक्ष्मण मानसिक व्यथा से बहुत दुःखी थे। उनके मन में विशेष अमर्ष भरा हुआ था। वे रोष से भरे हए गजराज की भाँति क्रोध से आँखें फाड़फाड़कर देख रहे थे। अपने मन को वश में रखने वाले श्रीराम धैर्यपूर्वक चित्त को निर्विकाररूप से काबू में रखते हुए अपने हितैषी सुहृद् प्रिय भाई लक्ष्मण के पास जाकर इस प्रकार बोले- ॥ १-२॥

निगृह्य रोषं शोकं च धैर्यमाश्रित्य केवलम्।
अवमानं निरस्यैनं गृहीत्वा हर्षमुत्तमम्॥३॥
उपक्लुप्तं यदैतन्मे अभिषेकार्थमुत्तमम्।
सर्वं निवर्तय क्षिप्रं कुरु कार्यं निरव्ययम्॥४॥

‘लक्ष्मण! केवल धैर्य का आश्रय लेकर अपने मन के क्रोध और शोक को दूर करो, चित्त से अपमान की भावना निकाल दो और हृदय में भलीभाँति हर्ष भरकर मेरे अभिषेक के लिये यह जो उत्तम सामग्री एकत्र की गयी है, इसे शीघ्र हटा दो और ऐसा कार्य करो, जिससे मेरे वनगमन में बाधा उपस्थित न हो॥३-४॥

सौमित्रे योऽभिषेकार्थे मम सम्भारसम्भ्रमः।
अभिषेकनिवृत्त्यर्थे सोऽस्तु सम्भारसम्भ्रमः॥५॥

‘सुमित्रानन्दन! अबतक अभिषेक के लिये सामग्री जुटाने में जो तुम्हारा उत्साह था, वह इसे रोकने और मेरे वन जाने की तैयारी करने में होना चाहिये॥५॥

यस्या मदभिषेकार्थे मानसं परितप्यते।
माता नः सा यथा न स्यात् सविशङ्का तथा कुरु॥ ६ ॥

मेरे अभिषेक के कारण जिसके चित्त में संताप हो रहा है, उस हमारी माता कैकेयी को जिससे किसी तरह की शङ्का न रह जाय, वही काम करो॥६॥

तस्याः शङ्कामयं दुःखं मुहूर्तमपि नोत्सहे।
मनसि प्रतिसंजातं सौमित्रेऽहमुपेक्षितुम्॥७॥

‘लक्ष्मण! उसके मन में संदेह के कारण दुःख उत्पन्न हो, इस बात को मैं दो घड़ी के लिये भी नहीं सह सकता और न इसकी उपेक्षा ही कर सकता हूँ।

न बुद्धिपूर्वं नाबुद्धं स्मरामीह कदाचन।
मातृणां वा पितुहिं कृतमल्पं च विप्रियम्॥८॥

‘मैंने यहाँ कभी जान-बूझकर या अनजान में माताओं का अथवा पिताजी का कोई छोटा-सा भी अपराध किया हो, ऐसा याद नहीं आता॥ ८॥

सत्यः सत्याभिसंधश्च नित्यं सत्यपराक्रमः।
परलोकभयाद् भीतो निर्भयोऽस्तु पिता मम॥९॥

‘पिताजी सदा सत्यवादी और सत्यपराक्रमी रहे हैं।वे परलोक के भय से सदा डरते रहते हैं; इसलिये मुझे वही काम करना चाहिये, जिससे मेरे पिताजी का पारलौकिक भय दूर हो जाय॥९॥

तस्यापि हि भवेदस्मिन् कर्मण्यप्रतिसंहृते।
सत्यं नेति मनस्तापस्तस्य तापस्तपेच्च माम्॥ १०॥

‘यदि इस अभिषेकसम्बन्धी कार्य को रोक नहीं दिया गया तो पिताजी को भी मन-ही-मन यह सोचकर संताप होगा कि मेरी बात सच्ची नहीं हुई और उनका वह मनस्ताप मुझे सदा संतप्त करता रहेगा॥ १० ॥
अभिषेकविधानं तु तस्मात् संहृत्य लक्ष्मण।
अन्वगेवाहमिच्छामि वनं गन्तुमितः पुरः॥११॥

“लक्ष्मण! इन्हीं सब कारणों से मैं अपने अभिषेक का कार्य रोककर शीघ्र ही इस नगर से वन को चला जाना चाहता हूँ॥ ११॥

मम प्रव्राजनादद्य कृतकृत्या नृपात्मजा।
सुतं भरतमव्यग्रमभिषेचयतां ततः॥१२॥

‘आज मेरे चले जाने से कृतकृत्य हुई राजकुमारी कैकेयी अपने पुत्र भरत का निर्भय एवं निश्चिन्त होकर अभिषेक करावे॥ १२॥

मयि चीराजिनधरे जटामण्डलधारिणि।
गतेऽरण्यं च कैकेय्या भविष्यति मनः सुखम्॥ १३॥

‘मैं वल्कल और मृगचर्म धारण करके सिर पर जटाजूट बाँधे जब वन को चला जाऊँगा, तभी कैकेयी के मन को सुख प्राप्त होगा॥ १३॥ ।

बुद्धिः प्रणीता येनेयं मनश्च सुसमाहितम्।
तं नु नार्हामि संक्लेष्टुं प्रव्रजिष्यामि मा चिरम्॥ १४॥

‘जिस विधाता ने कैकेयी को ऐसी बुद्धि प्रदान की है तथा जिसकी प्रेरणा से उसका मन मुझे वन भेजने में अत्यन्त दृढ़ हो गया है, उसे विफल मनोरथ करके कष्ट देना मेरे लिये उचित नहीं है।॥ १४ ॥

कृतान्त एव सौमित्रे द्रष्टव्यो मत्प्रवासने।
राज्यस्य च वितीर्णस्य पुनरेव निवर्तने॥ १५॥

‘सुमित्राकुमार! मेरे इस प्रवास में तथा पिताद्वारा दिये हुए राज्य के फिर हाथ से निकल जाने में दैव को ही कारण समझना चाहिये॥ १५ ॥

कैकेय्याः प्रतिपत्तिर्हि कथं स्यान्मम वेदने।
यदि तस्या न भावोऽयं कृतान्तविहितो भवेत्॥ १६॥

‘मेरी समझसे कैकेयी का यह विपरीत मनोभाव दैव का ही विधान है। यदि ऐसा न होता तो वह मुझे वन में भेजकर पीड़ा देने का विचार क्यों करती॥ १६ ॥

जानासि हि यथा सौम्य न मातृषु ममान्तरम्।
भूतपूर्वं विशेषो वा तस्या मयि सुतेऽपि वा॥ १७॥

‘सौम्य! तुम तो जानते ही हो कि मेरे मन में पहले भी कभी माताओं के प्रति भेदभाव नहीं हुआ और कैकेयी भी पहले मुझमें या अपने पुत्र में कोई अन्तर नहीं समझती थी॥ १७॥

सोऽभिषेकनिवृत्त्यर्थैः प्रवासाथैश्च दुर्वचैः।
उग्रैर्वाक्यैरहं तस्या नान्यद् दैवात् समर्थये ॥१८॥

‘मेरे अभिषेक को रोकने और मुझे वन में भेजने के लिये उसने राजा को प्रेरित करने के निमित्त जिन भयंकर और कटुवचनों का प्रयोग किया है, उन्हें साधारण मनुष्यों के लिये भी मुँह से निकालना कठिन है। उसकी ऐसी चेष्टा में मैं दैव के सिवा दूसरे किसी कारण का समर्थन नहीं करता॥ १८॥

कथं प्रकृतिसम्पन्ना राजपुत्री तथागुणा।
ब्रूयात् सा प्राकृतेव स्त्री मत्पीड्यं भर्तृसंनिधौ॥ १९॥

‘यदि ऐसी बात न होती तो वैसे उत्तम स्वभाव और श्रेष्ठ गुणों से युक्त राजकुमारी कैकेयी एक साधारण स्त्री की भाँति अपने पति के समीप मुझे पीड़ा देनेवाली बात कैसे कहती—मुझे कष्ट देने के लिये राम को वन में भेजने का प्रस्ताव कैसे उपस्थित करती। १९॥

यदचिन्त्यं तु तद् दैवं भूतेष्वपि न हन्यते।
व्यक्तं मयि च तस्यां च पतितो हि विपर्ययः॥ २०॥

‘जिसके विषय में कभी कुछ सोचा न गया हो, वही दैव का विधान है। प्राणियों में अथवा उनके अधिष्ठाता देवताओं में भी कोई ऐसा नहीं है, जो उस दैव के विधान को मेट सके अतः निश्चय ही उसी की प्रेरणा से मुझमें और कैकेयी में यह भारी उलट-फेर हुआ है (मेरे हाथ में आया हुआ राज्य चला गया और कैकेयी की बुद्धि बदल गयी) ॥ २० ॥

कश्च दैवेन सौमित्रे योद्धमुत्सहते पुमान्।
यस्य नु ग्रहणं किंचित् कर्मणोऽन्यन्न दृश्यते॥ २१॥

सुमित्रानन्दन! कर्मों के सुख-दुःखादि रूप फल प्राप्त होने पर ही जिसका ज्ञान होता है, कर्मफल से अन्यत्र कहीं भी जिसका पता नहीं चलता, उस दैव के साथ कौन पुरुष युद्ध कर सकता है ? ॥ २१॥

सुखदुःखे भयक्रोधौ लाभालाभौ भवाभवौ।
यस्य किंचित् तथाभूतं ननु दैवस्य कर्म तत्॥ २२॥

‘सुख-दुःख, भय-क्रोध (क्षोभ), लाभ-हानि, उत्पत्ति और विनाश तथा इस प्रकार के और भी जितने परिणाम प्राप्त होते हैं, जिनका कोई कारण समझ में नहीं आता, वे सब दैव के ही कर्म हैं ॥ २२ ॥

ऋषयोऽप्युग्रतपसो दैवेनाभिप्रचोदिताः।
उत्सृज्य नियमांस्तीव्रान् भ्रश्यन्ते काममन्युभिः॥ २३॥

‘उग्र तपस्वी ऋषि भी दैव से प्रेरित होकर अपने तीव्र नियमों को छोड़ बैठते और काम-क्रोध के द्वारा विवश हो मर्यादा से भ्रष्ट हो जाते हैं।। २३॥

असंकल्पितमेवेह यदकस्मात् प्रवर्तते।
निवारब्धमारम्भैर्ननु दैवस्य कर्म तत्॥२४॥

‘जो बात बिना सोचे-विचारे अकस्मात् सिर पर आ पड़ती है और प्रयत्नों द्वारा आरम्भ किये हुए कार्य को रोककर एक नया ही काण्ड उपस्थित कर देती है, अवश्य वह दैव का ही विधान है॥२४॥

एतया तत्त्वया बुद्ध्या संस्तभ्यात्मानमात्मना।
व्याहतेऽप्यभिषेके मे परितापो न विद्यते॥ २५॥

‘इस तात्त्विक बुद्धि के द्वारा स्वयं ही मन को स्थिर कर लेने के कारण मुझे अपने अभिषेक में विघ्न पड़ जाने पर भी दुःख या संताप नहीं हो रहा है॥ २५ ॥

तस्मादपरितापः संस्त्वमप्यनविधाय माम्।
प्रतिसंहारय क्षिप्रमाभिषेचनिकी क्रियाम्॥२६॥

‘इसी प्रकार तुम भी मेरे विचार का अनुसरण करके संताप शून्य हो राज्याभिषेक के इस आयोजन को शीघ्र बंद करा दो॥ २६॥

एभिरेव घटैः सर्वैरभिषेचनसम्भृतैः।
मम लक्ष्मण तापस्ये व्रतस्नानं भविष्यति॥२७॥

‘लक्ष्मण! राज्याभिषेक के लिये सँजोकर रखे गये इन्हीं सब कलशों द्वारा मेरा तापस-व्रत के संकल्प के लिये आवश्यक स्नान होगा॥ २७॥

अथवा किं मयैतेन राज्यद्रव्यमयेन तु।
उद्धृतं मे स्वयं तोयं व्रतादेशं करिष्यति ॥२८॥

‘अथवा राज्याभिषेक सम्बन्धी मङ्गल द्रव्यमय इस कलश जल की मुझे क्या आवश्यकता है? स्वयं मेरे द्वारा अपने हाथ से निकाला हुआ जल ही मेरे व्रतादेश का साधक होगा।॥ २८॥

मा च लक्ष्मण संतापं कार्षीर्लक्ष्या विपर्यये।
राज्यं वा वनवासो वा वनवासो महोदयः॥२९॥

‘लक्ष्मण! लक्ष्मी के इस उलट-फेर के विषय में तुम कोई चिन्ता न करो। मेरे लिये राज्य अथवा वनवास दोनों समान हैं, बल्कि विशेष विचार करने पर वनवास ही महान् अभ्युदयकारी प्रतीत होता है।
२९॥

न लक्ष्मणास्मिन् मम राज्यविघ्ने माता यवीयस्यभिशङ्कितव्या।
दैवाभिपन्ना न पिता कथंचिज्जानासि दैवं हि तथाप्रभावम्॥३०॥

‘लक्ष्मण! मेरे राज्याभिषेक में जो विघ्न आया है, इसमें मेरी सबसे छोटी माता कारण है, ऐसी शङ्का नहीं करनी चाहिये; क्योंकि वह दैव के अधीन थी। इसी प्रकार पिताजी भी किसी तरह इसमें कारण नहीं हैं। तुम तो दैव और उसके अद्भुत प्रभाव को जानते ही हो, वही कारण है ॥३०॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे द्वाविंशः सर्गः॥ २२॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्डमें बाईसवाँ सर्ग पूरा हुआ।२२॥


अयोध्याकाण्डम्
त्रयोविंशः सर्गः (सर्ग 23)

( लक्ष्मण की ओज भरी बातें, उनके द्वारा दैव का खण्डन और पुरुषार्थ का प्रतिपादन )

इति ब्रुवति रामे तु लक्ष्मणोऽवाक् शिरा इव।
ध्यात्वा मध्यं जगामाशु सहसा दैन्यहर्षयोः॥१॥

श्रीरामचन्द्रजी जब इस प्रकार कह रहे थे, उस समय लक्ष्मण सिर झुकाये कुछ सोचते रहे; फिर सहसा शीघ्रतापूर्वक वे दुःख और हर्ष के बीच की स्थिति में आ गये (श्रीराम के राज्याभिषेक में विघ्न पड़ने के कारण उन्हें दुःख हुआ और उनकी धर्म में दृढ़ता देखकर प्रसन्नता हुई)॥

तदा तु बद्ध्वा भ्रुकुटी ध्रुवोर्मध्ये नरर्षभः।
निशश्वास महासर्पो बिलस्थ इव रोषितः॥२॥

नरश्रेष्ठ लक्ष्मण ने उस समय ललाट में भौंहों को चढ़ाकर लंबी साँस खींचना आरम्भ किया, मानो बिल में बैठा हुआ महान् सर्प रोष में भरकर फुकार मार रहा हो॥

तस्य दुष्प्रतिवीक्ष्यं तद् भृकुटीसहितं तदा।
बभौ क्रुद्धस्य सिंहस्य मुखस्य सदृशं मुखम्॥३॥

तनी हुई भौंहों के साथ उस समय उनका मुख कुपित हुए सिंह के मुख के समान जान पड़ता था, उसकी ओर देखना कठिन हो रहा था॥३॥

अग्रहस्तं विधुन्वंस्तु हस्ती हस्तमिवात्मनः।
तिर्यगूर्ध्वं शरीरे च पातयित्वा शिरोधराम्॥४॥
अग्राक्ष्णा वीक्षमाणस्तु तिर्यग्भ्रातरमब्रवीत्।

जैसे हाथी अपनी सूंड हिलाया करता है, उसी प्रकार वे अपने दाहिने हाथ को हिलाते और गर्दन को शरीर में ऊपर-नीचे और अगल-बगल सब ओर घुमाते हुए नेत्रों के अग्रभाग से टेढ़ी नजरों द्वारा अपने भाई श्रीराम को देखकर उनसे बोले- ॥ ४ १/२॥

अस्थाने सम्भ्रमो यस्य जातो वै सुमहानयम्॥५॥
धर्मदोषप्रसङ्गेन लोकस्यानतिशङ्कया।
कथं ह्येतदसम्भ्रान्तस्त्वद्विधो वक्तुमर्हति॥६॥
यथा ह्येवमशौण्डीरं शौण्डीरः क्षत्रियर्षभः।
किं नाम कृपणं दैवमशक्तमभिशंससि॥७॥

‘भैया! आप समझते हैं कि यदि पिता की इस आज्ञा का पालन करने के लिये मैं वन को न जाऊँ तो धर्म के विरोध का प्रसङ्ग उपस्थित होता है, इसके सिवा लोगों के मन में यह बड़ी भारी शङ्का उठ खड़ी होगी कि जो पिता की आज्ञा का उल्लङ्घन करता है, वह यदि राजा ही हो जाय तो हमारा धर्मपूर्वक पालन कैसे करेगा? साथ ही आप यह भी सोचते हैं कि यदि मैं पिता की इस आज्ञा का पालन नहीं करूँ तो दूसरे लोग भी नहीं करेंगे। इस प्रकार धर्म की अवहेलना होने से जगत् के विनाश का भय उपस्थित होगा। इन सब दोषों और शङ्काओं का निराकरण करने के लिये आपके मन में वनगमन के प्रति जो यह बड़ा भारी सम्भ्रम (उतावलापन) आ गया है, यह सर्वथा अनुचित एवं भ्रममूलक ही है; क्योंकि आप असमर्थ ‘दैव’ नामक तुच्छ वस्तु को प्रबल बता रहे हैं। दैव का निराकरण करने में समर्थ आप-जैसा क्षत्रियशिरोमणि वीर यदि भ्रम में नहीं पड़ गया होता तो ऐसी बात कैसे कह सकता था? अतः असमर्थ पुरुषों द्वारा ही अपनाये जाने योग्य और पौरुष के निकट कुछ भी करनेमें असमर्थ ‘दैव’ की आप साधारण मनुष्य के समान इतनी स्तुति या प्रशंसा क्यों कर रहे हैं? ॥ ५-७॥

पापयोस्ते कथं नाम तयोः शङ्का न विद्यते।
सन्ति धर्मोपधासक्ता धर्मात्मन् किं न बुध्यसे॥ ८॥

‘धर्मात्मन् ! आपको उन दोनों पापियों पर संदेह क्यों नहीं होता? संसार में कितने ही ऐसे पापासक्त मनुष्य हैं, जो दूसरों को ठगने के लिये धर्म का ढोंग बनाये रहते हैं, क्या आप उन्हें नहीं जानते हैं? ॥ ८॥

तयोः सुचरितं स्वार्थं शाठ्यात् परिजिहीर्षतोः।
यदि नैवं व्यवसितं स्याद्धि प्रागेव राघव।
तयोः प्रागेव दत्तश्च स्याद् वरः प्रकृतश्च सः॥ ९॥

‘रघुनन्दन! वे दोनों अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिये शठतावश धर्म के बहाने आप-जैसे सच्चरित्र पुरुष का परित्याग करना चाहते हैं। यदि उनका ऐसा विचार न होता तो जो कार्य आज हुआ है, वह पहले ही हो गया होता। यदि वरदान वाली बात सच्ची होती तो आपके अभिषेक का कार्य प्रारम्भ होने से पहले ही इस तरह का वर दे दिया गया होता॥९॥

लोकविदिष्टमारब्धं त्वदन्यस्याभिषेचनम्।
नोत्सहे सहितुं वीर तत्र मे क्षन्तुमर्हसि॥१०॥

(गुणवान् ज्येष्ठ पुत्र के रहते हुए छोटे का अभिषेक करना) यह लोकविरुद्ध कार्य है, जिसका आज आरम्भ किया गया है। आपके सिवा दूसरे किसी का राज्याभिषेक हो, यह मुझसे सहन नहीं होग। इसके लिये आप मुझे क्षमा करेंगे॥ १० ॥

येनैवमागता द्वैधं तव बुद्धिर्महामते।
सोऽपि धर्मो मम द्वेष्यो यत्प्रसङ्गाद् विमुह्यसि॥ ११॥

‘महामते! पिता के जिस वचन को मानकर आप मोह में पड़े हुए हैं और जिसके कारण आपकी बुद्धि में दुविधा उत्पन्न हो गयी है, मैं उसे धर्म मानने का पक्षपाती नहीं हूँ; ऐसे धर्म का तो मैं घोर विरोध करता हूँ॥ ११॥

कथं त्वं कर्मणा शक्तः कैकेयीवशवर्तिनः।
करिष्यसि पितर्वाक्यमधर्मिष्ठं विगर्हितम्॥१२॥

‘आप अपने पराक्रमसे सब कुछ करनेमें समर्थ होकर भी कैकेयीके वशमें रहनेवाले पिताके अधर्मपूर्ण एवं निन्दित वचनका पालन कैसे करेंगे? ॥ १२॥

यदयं किल्बिषाद् भेदः कृतोऽप्येवं न गृह्यते।
जायते तत्र मे दुःखं धर्मसङ्गश्च गर्हितः॥१३॥

‘वरदान की झूठी कल्पना का पाप करके आपके अभिषेक में रोड़ा अटकाया गया है, फिर भी आप इस रूप में नहीं ग्रहण करते हैं। इसके लिये मेरे मन में बड़ा दुःख होता है। ऐसे कपटपूर्ण धर्म के प्रति होने वाली आसक्ति निन्दित है॥ १३॥

तवायं धर्मसंयोगो लोकस्यास्य विगर्हितः।
मनसापि कथं कामं कुर्यात् त्वां कामवृत्तयोः।
तयोस्त्वहितयोर्नित्यं शञ्चोः पित्रभिधानयोः॥ १४॥

‘ऐसे पाखण्डपूर्ण धर्म के पालन में जो आपकी प्रवृत्ति हो रही है, वह यहाँ के जनसमुदाय की दृष्टि में निन्दित है। आपके सिवा दूसरा कोई पुरुष सदा पुत्र का अहित करने वाले, पिता-माता नामधारी उन कामाचारी शत्रुओं के मनोरथ को मन से भी कैसे पूर्ण कर सकता है (उसकी पूर्ति का विचार भी मन में कैसे ला सकता है?) ॥ १४॥

यद्यपि प्रतिपत्तिस्ते दैवी चापि तयोर्मतम।
तथाप्युपेक्षणीयं ते न मे तदपि रोचते॥१५॥

‘माता-पिता के इस विचार को कि–’आपका राज्याभिषेक न हो’ जो आप दैव की प्रेरणा का फल मानते हैं, यह भी मुझे अच्छा नहीं लगता। यद्यपि वह आपका मत है, तथापि आपको उसकी उपेक्षा कर देनी चाहिये॥ १५ ॥

विक्लवो वीर्यहीनो यः स दैवमनुवर्तते।
वीराः सम्भावितात्मानो न दैवं पर्युपासते॥१६॥

‘जो कायर है, जिसमें पराक्रम का नाम नहीं है, वही दैव का भरोसा करता है। सारा संसार जिन्हें आदर की दृष्टि से देखता है, वे शक्तिशाली वीर पुरुष दैव की उपासना नहीं करते हैं॥ १६

दैवं पुरुषकारेण यः समर्थः प्रबाधितुम्।
न दैवेन विपन्नार्थः पुरुषः सोऽवसीदति ॥१७॥

‘जो अपने पुरुषार्थ से  दैव को दबाने में समर्थ है, वह पुरुष दैव के द्वारा अपने कार्य में बाधा पड़ने पर खेद नहीं करता—शिथिल होकर नहीं बैठता॥ १७ ॥

द्रक्ष्यन्ति त्वद्य दैवस्य पौरुषं पुरुषस्य च।
दैवमानुषयोरद्य व्यक्ता व्यक्तिर्भविष्यति॥१८॥

आज संसार के लोग देखेंगे कि दैव की शक्ति बड़ी है या पुरुष का पुरुषार्थ। आज दैव और मनुष्य में कौन बलवान् है और कौन दुर्बल—इसका स्पष्ट निर्णय हो जायगा॥१८॥

अद्य मे पौरुषहतं दैवं द्रक्ष्यन्ति वै जनाः।
यैर्दैवादाहतं तेऽद्य दृष्टं राज्याभिषेचनम्॥१९॥

‘जिन लोगों ने दैव के बलसे आज आपके राज्याभिषेक को नष्ट हुआ देखा है, वे ही आज मेरे पुरुषार्थ से अवश्य ही दैव का भी विनाश देख लेंगे। १९॥

अत्यङ्कशमिवोद्दामं गजं मदजलोद्धतम्।
प्रधावितमहं दैवं पौरुषेण निवर्तये॥२०॥

‘जो अङ्कश की परवा नहीं करता और रस्से या साँकल को भी तोड़ देता है, मद की धारा बहाने वाले उस मत्त गजराज की भाँति वेग पूर्वक दौड़ने वाले दैव को भी आज मैं अपने पुरुषार्थ से पीछे लौटा दूंगा। २०॥

लोकपालाः समस्तास्ते नाद्य रामाभिषेचनम्।
न च कृत्स्नास्त्रयो लोका विहन्युः किं पुनःपिता॥२१॥

समस्त लोकपाल और तीनों लोकों के सम्पर्ण प्राणी आज श्रीराम के राज्याभिषेक को नहीं रोक सकते, फिर केवल पिताजी की तो बात ही क्या है ? ॥ २१॥

यैर्विवासस्तवारण्ये मिथो राजन् समर्थितः।
अरण्ये ते विवत्स्यन्ति चतुर्दश समास्तथा ॥ २२॥

‘राजन् ! जिन लोगों ने आपस में आपके वनवास का समर्थन किया है, वे स्वयं चौदह वर्षों तक वन में जाकर छिपे रहेंगे॥ २२॥

अहं तदाशां धक्ष्यामि पितुस्तस्याश्च या तव।
अभिषेकविघातेन पुत्रराज्याय वर्तते॥२३॥

‘मैं पिता की और जो आपके अभिषेक में विघ्न डालकर अपने पुत्र को राज्य देने के प्रयत्न में लगी हुई है, उस कैकेयी की भी उस आशा को जलाकर भस्म कर डालूँगा ।। २३॥

मबलेन विरुद्धाय न स्याद् दैवबलं तथा।
प्रभविष्यति दुःखाय यथोग्रं पौरुषं मम॥२४॥

‘जो मेरे बल के विरोध में खड़ा होगा, उसे मेरा भयंकर पुरुषार्थ जैसा दुःख देने में समर्थ होगा, वैसा दैव बल उसे सुख नहीं पहुँचा सकेगा॥ २४ ॥

ऊर्ध्वं वर्षसहस्रान्ते प्रजापाल्यमनन्तरम्।
आर्यपुत्राः करिष्यन्ति वनवासं गते त्वयि ॥२५॥

‘सहस्रों वर्ष बीतने के पश्चात् जब आप अवस्था क्रम से वन में निवास करने के लिये जायेंगे, उस समय आपके बाद आपके पुत्र प्रजापालनरूप कार्य करेंगे (अर्थात् उस समय भी दूसरों को इस राज्य में दखल देने का अवसर नहीं प्राप्त होगा) ॥ २५॥

पूर्वराजर्षिवृत्त्या हि वनवासोऽभिधीयते।
प्रजा निक्षिप्य पुत्रेषु पुत्रवत् परिपालने॥२६॥

‘पुरातन राजर्षियों की आचारपरम्परा के अनुसार प्रजा का पुत्रवत् पालन करने के निमित्त प्रजावर्ग को पुत्रों के हाथ में सौंपकर वृद्ध राजा का वन में निवास करना उचित बताया जाता है॥२६॥

स चेद् राजन्यनेकाग्रे राज्यविभ्रमशङ्कया।
नैवमिच्छसि धर्मात्मन् राज्यं राम त्वमात्मनि॥२७॥

‘धर्मात्मा श्रीराम! हमारे महाराज वानप्रस्थधर्म के पालन में चित्त को एकाग्र नहीं कर रहे हैं, इसीलिये यदि आप यह समझते हों कि उनकी आज्ञा के विरुद्ध राज्य ग्रहण कर लेने पर समस्त जनता विद्रोही हो
जायगी, अतः राज्य अपने हाथ में नहीं रह सकेगा और इसी शङ्का से यदि आप अपने ऊपर राज्यकाभार नहीं लेना चाहते हैं अथवा वन में चले जाना चाहते हैं तो इस शङ्का को छोड़ दीजिये॥२७॥

प्रतिजाने च ते वीर मा भूवं वीरलोकभाक्।
राज्यं च तव रक्षेयमहं वेलेव सागरम्॥२८॥

‘वीर! मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि जैसे तटभूमि समुद्र को रोके रहती है, उसी प्रकार मैं आपकी और आपके राज्य की रक्षा करूँगा। यदि ऐसा न करूँ तो वीरलोक का भागी न होऊँ॥ २८॥

मङ्गलैरभिषिञ्चस्व तत्र त्वं व्याप्तो भव।
अहमेको महीपालानलं वारयितुं बलात्॥२९॥

‘इसलिये आप मङ्गलमयी अभिषेक-सामग्री से अपना अभिषेक होने दीजिये। इस अभिषेक के कार्य में आप तत्पर हो जाइये। मैं अकेला ही बलपूर्वक समस्त विरोधी भूपालों को रोक रखनेमें समर्थ हूँ॥ २९॥

न शोभार्थाविमौ बाहू न धनुर्भूषणाय मे।
नासिराबन्धनार्थाय न शराः स्तम्भहेतवः॥३०॥

‘ये मेरी दोनों भुजाएँ केवल शोभा के लिये नहीं हैं। मेरे इस धनुष का आभूषण नहीं बनेगा। यह तलवार केवल कमर में बाँधे रखने के लिये नहीं है तथा इन बाणों के खम्भे नहीं बनेंगे॥ ३० ॥

अमित्रमथनार्थाय सर्वमेतच्चतुष्टयम्।
न चाहं कामयेऽत्यर्थं यः स्याच्छत्रुर्मतो मम॥

‘ये सब चारों वस्तुएँ शत्रुओं का दमन करने के लिये ही हैं। जिसे मैं अपना शत्रु समझता हूँ, उसे कदापि जीवित रहने देना नहीं चाहता।। ३१॥

असिना तीक्ष्णधारेण विद्युच्चलितवर्चसा।
प्रगृहीतेन वै शत्रु वज्रिणं वा न कल्पये॥३२॥

‘जिस समय मैं इस तीखी धारवाली तलवार को हाथ में लेता हूँ, यह बिजली की तरह चञ्चल प्रभा से चमक उठती है। इसके द्वारा अपने किसी भी शत्रु को, वह वज्रधारी इन्द्र ही क्यों न हो, मैं कुछ नहीं समझता ॥ ३२॥

खड्गनिष्पेषनिष्पिष्टैर्गहना दुश्चरा च मे।
हस्त्यश्वरथिहस्तोरुशिरोभिर्भविता मही॥ ३३॥

आज मेरे खड्ग के प्रहार से पीस डाले गये हाथी,घोड़े और रथियों के हाथ, जाँघ और मस्तकों द्वारा पटी हुई यह पृथ्वी ऐसी गहन हो जायगी कि इस पर चलना-फिरना कठिन हो जायगा॥ ३३॥

खड्गधाराहता मेऽद्य दीप्यमाना इवाग्नयः।
पतिष्यन्ति द्विषो भूमौ मेघा इव सविद्युतः॥ ३४॥

‘मेरी तलवार की धार से कटकर रक्त से लथपथ हुए शत्रु जलती हुई आग के समान जान पड़ेंगे और बिजली सहित मेघों के समान आज पृथ्वी पर गिरेंगे। ३४॥

बद्धगोधाङ्गलित्राणे प्रगृहीतशरासने।
कथं पुरुषमानी स्यात् पुरुषाणां मयि स्थिते॥ ३५॥

अपने हाथों में गोह के चर्म से बने हुए दस्ताने को बाँधकर जब हाथ में धनुष ले मैं युद्ध के लिये खड़ा हो जाऊँगा, उस समय पुरुषों से कोई भी मेरे सामने कैसे अपने पौरुष पर अभिमान कर सकेगा? ॥ ३५ ॥

बहुभिश्चैकमत्यस्यन्नेकेन च बहूञ्जनान्।
विनियोक्ष्याम्यहं बाणान्नृवाजिगजमर्मसु॥३६॥

मैं बहुत-से बाणों द्वारा एक को और एक ही बाण से बहुत-से योद्धाओं को धराशायी करता हुआ मनुष्यों, घोड़ों और हाथियों के मर्मस्थानों पर बाण मारूँगा॥३६॥

अद्य मेऽस्त्रप्रभावस्य प्रभावः प्रभविष्यति।
राज्ञश्चाप्रभुतां कर्तुं प्रभुत्वं च तव प्रभो॥३७॥

‘प्रभो! आज राजा दशरथ की प्रभुता को मिटाने और आपके प्रभुत्व की स्थापना करने के लिये अस्त्रबल से सम्पन्न मुझ लक्ष्मण का प्रभाव प्रकट होगा॥ ३७॥

अद्य चन्दनसारस्य केयूरामोक्षणस्य च।
वसूनां च विमोक्षस्य सुहृदां पालनस्य च॥ ३८॥
अनुरूपाविमौ बाहू राम कर्म करिष्यतः।
अभिषेचनविघ्नस्य कर्तृणां ते निवारणे॥३९॥

‘श्रीराम! आज मेरी ये दोनों भुजाएँ, जो चन्दन का लेप लगाने, बाजूबंद पहनने, धन का दान करने और सुहृदों के पालन में संलग्न रहने के योग्य हैं, आपके राज्याभिषेक में विघ्न डालने वालों को रोकने के लिये अपने अनुरूप पराक्रम प्रकट करेंगी॥ ३८-३९ ॥

ब्रवीहि कोऽद्यैव मया वियुज्यतां तवासुहृत् प्राणयशःसुहृज्जनैः।
यथा तवेयं वसुधा वशा भवेत् तथैव मां शाधि तवास्मि किंकरः॥४०॥

‘प्रभो! बतलाइये, मैं आपके किस शत्रुको अभी प्राण, यश और सुहृज्जनों से सदा के लिये बिलग कर दूं। जिस उपाय से भी यह पृथ्वी आपके अधिकार में आ जाय, उसके लिये मुझे आज्ञा दीजिये, मैं आपका दास हूँ’॥

विमृज्य बाष्पं परिसान्त्व्य चासकृत् स लक्ष्मणं राघववंशवर्धनः।
उवाच पित्रोर्वचने व्यवस्थितं निबोध मामेष हि सौम्य सत्पथः॥४१॥

रघुवंश की वृद्धि करने वाले श्रीराम ने लक्ष्मण की ये बातें सुनकर उनके आँसू पोंछे और उन्हें बारंबार सान्त्वना देते हुए कहा—’सौम्य! मुझे तो तुम माता पिता की आज्ञा के पालन में ही दृढ़तापूर्वक स्थित समझो यही सत्पुरुषों का मार्ग है’ ॥ ४१॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे त्रयोविंशः सर्गः ॥२३॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में तेईसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥२३॥


अयोध्याकाण्डम्
चतुर्विंशः सर्गः (सर्ग 24)

( कौसल्या का श्रीराम से अपने को भी साथ ले चलने के लिये आग्रह करना, श्रीराम का उन्हें रोकना और वन जाने के लिये उनकी अनुमति प्राप्त करना )

तं समीक्ष्य व्यवसितं पितुर्निर्देशपालने।
कौसल्या बाष्पसंरुद्धा वचो धर्मिष्ठमब्रवीत्॥१॥

कौसल्या ने जब देखा कि श्रीराम ने पिता की आज्ञा के पालन का ही दृढ़ निश्चय कर लिया है, तब वे आँसुओं से सैंधी हुई गद्गद वाणी में धर्मात्मा श्रीराम से इस प्रकार बोलीं- ॥१॥

अदृष्टदुःखो धर्मात्मा सर्वभूतप्रियंवदः।
मयि जातो दशरथात् कथमुञ्छेन वर्तयेत्॥२॥

‘हाय! जिसने जीवन में कभी दुःख नहीं देखा है, जो समस्त प्राणियों से सदा प्रिय वचन बोलता है, जिसका जन्म महाराज दशरथ से मेरे द्वारा हुआ है,वह मेरा धर्मात्मा पुत्र उञ्छवृत्ति से-खेत में गिरे हुए अनाज के एक-एक दाने को बीनकर कैसे जीवन निर्वाह कर सकेगा? ॥ २॥

यस्य भृत्याश्च दासाश्च मृष्टान्यन्नानि भुञ्जते।
कथं स भोक्ष्यते रामो वने मूलफलान्ययम्॥३॥

‘जिनके भृत्य और दास भी शुद्ध, स्वादिष्ट अन्न खाते हैं, वे ही श्रीराम वन में फल-मूल का आहार कैसे करेंगे? ॥ ३॥

क एतच्छ्रद्दधेच्छ्रत्वा कस्य वा न भवेद् भयम्।
गुणवान् दयितो राज्ञः काकुत्स्थो यद् विवास्यते॥४॥

‘जो सद्गुणसम्पन्न और महाराज दशरथ के प्रिय हैं, उन्हीं ककुत्स्थ-कुल-भूषण श्रीराम को जो वनवास दिया जा रहा है, इसे सुनकर कौन इस पर विश्वास करेगा? अथवा ऐसी बात सुनकर किसको भय नहीं होगा? ॥ ४॥

नूनं तु बलवाँल्लोके कृतान्तः सर्वमादिशन्।
लोके रामाभिरामस्त्वं वनं यत्र गमिष्यसि॥५॥

श्रीराम! निश्चय ही इस जगत् में दैव सबसे बड़ा बलवान् है। उसकी आज्ञा सबके ऊपर चलती है वही सबको सुख-दुःख से संयुक्त करता है; क्योंकि उसी के प्रभाव में आकर तुम्हारे-जैसा लोकप्रिय मनुष्य भी वन में जाने को उद्यत है॥५॥

अयं तु मामात्मभवस्तवादर्शनमारुतः।
विलापदुःखसमिधो रुदिताश्रुहुताहुतिः॥६॥
चिन्ताबाष्पमहाधूमस्तवागमनचिन्तजः।।
कर्शयित्वाधिकं पुत्र निःश्वासायाससम्भवः॥७॥
त्वया विहीनामिह मां शोकाग्निरतुलो महान्।
प्रधक्ष्यति यथा कक्ष्यं चित्रभानुर्हिमात्यये॥८॥

‘परंतु बेटा! तुमसे बिछुड़ जाने पर यहाँ मुझे शोक की अनुपम एवं बहुत बढ़ी हुई आग उसी तरह जलाकर भस्म कर डालेगी, जैसे ग्रीष्मऋतु में दावानल सूखी लकड़ियों और घास-फूस को जला डालता है। शोक की यह आग मेरे अपने ही मन में प्रकट हुई है। तुम्हें न देख पाने की सम्भावना ही वायु बनकर इस अग्नि को उद्दीप्त कर रही है। विलाप जनित दुःख ही इसमें ईंधन का काम कर रहे। हैं। रोने से जो अश्रुपात होते हैं, वे ही मानो इसमें दी हुई घी की आहुति हैं। चिन्ता के कारण जो गरम-गरम उच्छ्वास उठ रहा है, वही इसका महान् धूम है। तुम दूर देश में जाकर फिर किस तरह आओगे इस प्रकार की चिंता ही इस शोकाग्नि को जन्म दे रही है। साँस लेने का जो प्रयत्न है, उसी से इस आग की प्रतिक्षण वृद्धि हो रही है। तुम्हीं इसे बुझाने के लिये जल हो तुम्हारे बिना यह आग मुझे अधिक सुखाकर जला डालेगी॥६-८॥

कथं हि धेनुः स्वं वत्सं गच्छन्तमनुगच्छति।
अहं त्वानुगमिष्यामि यत्र वत्स गमिष्यसि ॥९॥

‘वत्स! धेनु आगे जाते हुए अपने बछड़े के पीछे पीछे कैसे चली जाती है, उसी प्रकार मैं भी तुम जहाँ भी जाओगे, तुम्हारे पीछे-पीछे चली चलूँगी’ ॥९॥

यथा निगदितं मात्रा तद् वाक्यं पुरुषर्षभः।
श्रुत्वा रामोऽब्रवीद् वाक्यं मातरं भृशदुःखिताम्॥ १०॥

माता कौसल्या ने जैसे जो कुछ कहा, उस वचन को सुनकर पुरुषोत्तम श्रीराम ने अत्यन्त दुःख में डूबी हुई अपनी माँ से पुनः इस प्रकार कहा- ॥ १० ॥

कैकेय्या वञ्चितो राजा मयि चारण्यमाश्रिते।
भवत्या च परित्यक्तो न ननं वर्तयिष्यति॥११॥

‘माँ! कैकेयी ने राजा के साथ धोखा किया है। इधर मैं वन को चला जा रहा हूँ। इस दशा में यदि तुम भी उनका परित्याग कर दोगी तो निश्चय ही वे जीवित नहीं रह सकेंगे॥११॥

भर्तः किल परित्यागो नृशंसः केवलं स्त्रियाः।
स भवत्या न कर्तव्यो मनसापि विगर्हितः॥१२॥

‘पति का परित्याग नारी के लिये बड़ा ही क्रूरतापूर्ण कर्म है। सत्पुरुषों ने इसकी बड़ी निन्दा की है; अतः तुम्हें तो ऐसी बात कभी मन में भी नहीं लानी चाहिये। १२॥

यावज्जीवति काकुत्स्थः पिता मे जगतीपतिः।
शुश्रूषा क्रियतां तावत् स हि धर्मः सनातनः॥ १३॥

‘मेरे पिता ककुत्स्थकुल-भूषण महाराज दशरथ जबतक जीवित हैं, तबतक तुम उन्हीं की सेवा करो। पति की सेवा ही स्त्री के लिये सनातन धर्म है’ ॥ १३ ॥

एवमुक्ता तु रामेण कौसल्या शुभदर्शना।
तथेत्युवाच सुप्रीता राममक्लिष्टकारिणम्॥१४॥

श्रीराम के ऐसा कहने पर शुभ कर्मो पर दृष्टि रखने वाली देवी कौसल्या ने अत्यन्त प्रसन्न होकर अनायास ही महान् कर्म करने वाले श्रीराम से कहा —’अच्छा बेटा ! ऐसा ही करूँगी’ ॥ १४ ॥

एवमुक्तस्तु वचनं रामो धर्मभृतां वरः।
भूयस्तामब्रवीद् वाक्यं मातरं भृशदुःखिताम्॥ १५॥

माँ के इस प्रकार स्वीकृतिसूचक बात कहने पर धर्मात्माओं में श्रेष्ठ श्रीराम ने अत्यन्त दुःख में पड़ी हुई अपनी माता से पुनः इस प्रकार कहा- ॥ १५ ॥

मया चैव भवत्या च कर्तव्यं वचनं पितुः।
राजा भर्ता गुरुः श्रेष्ठः सर्वेषामीश्वरः प्रभुः॥ १६॥

‘माँ! पिताजी की आज्ञा का पालन करना मेरा और तुम्हारा—दोनों का कर्तव्य है; क्योंकि राजा हम सब लोगों के स्वामी, श्रेष्ठ गुरु, ईश्वर एवं प्रभु हैं॥ १६॥

इमानि तु महारण्ये विहृत्य नव पञ्च च।
वर्षाणि परमप्रीत्या स्थास्यामि वचने तव॥१७॥

‘इन चौदह वर्षों तक मैं विशाल वन में घूम-फिरकर लौट आऊँगा और बड़े प्रेम से तुम्हारी आज्ञा का पालन करता रहूँगा’॥ १७॥

एवमुक्ता प्रियं पुत्रं बाष्पपूर्णानना तदा।
उवाच परमार्ता तु कौसल्या सुतवत्सला॥१८॥

उनके ऐसा कहने पर पुत्रवत्सला कौसल्या के मुखपर पुनः आँसुओं की धारा बह चली। वे उस समय अत्यन्त आर्त होकर अपने प्रिय पुत्र से बोलीं – ॥१८॥

आसां राम सपत्नीनां वस्तुं मध्ये न मे क्षमम्।
नय मामपि काकुत्स्थ वनं वन्यां मृगीमिव॥ १९॥
यदि ते गमने बुद्धिः कृता पितरपेक्षया।

‘बेटा राम! अब मुझसे इन सौतों के बीच में नहीं रहा जायगा। काकुत्स्थ! यदि पिता की आज्ञा का पालन करने की इच्छा से तुमने वन में जाने का ही निश्चय किया है तो मुझे भी वनवासिनी हरिणी की भाँति वन में ही ले चलो’ ॥ १९ १/२॥

तां तथा रुदतीं रामो रुदन् वचनमब्रवीत्॥२०॥
जीवन्त्या हि स्त्रिया भर्ता दैवतं प्रभुरेव च।
भवत्या मम चैवाद्य राजा प्रभवति प्रभुः ॥२१॥

यह कहकर माता कौसल्या रोने लगीं। उन्हें उस तरह रोती देख श्रीराम भी रो पड़े और उन्हें सान्त्वना देते हुए बोले—’माँ! स्त्री के जीते-जी उसका पति ही उसके लिये देवता और ईश्वर के समान है। महाराज तुम्हारे और मेरे दोनों के प्रभु हैं। २०-२१॥

न ह्यनाथा वयं राज्ञा लोकनाथेन धीमता।
भरतश्चापि धर्मात्मा सर्वभूतप्रियंवदः॥ २२॥
भवतीमनुवर्तेत स हि धर्मरतः सदा।

‘जबतक बुद्धिमान् जगदीश्वर महाराज दशरथ जीवित हैं, तब तक हमें अपने को अनाथ नहीं समझना चाहिये। भरत भी बड़े धर्मात्मा हैं। वे समस्त प्राणियों के प्रति प्रिय वचन बोलने वाले और सदा ही धर्म में तत्पर रहने वाले हैं; अतः वे तुम्हारा अनुसरण -तुम्हारी सेवा करेंगे॥ २२ १/२ ॥

यथा मयि तु निष्क्रान्ते पुत्रशोकेन पार्थिवः ॥२३॥
श्रमं नावाप्नुयात् किंचिदप्रमत्ता तथा कुरु।

‘मेरे चले जाने पर जिस तरह भी महाराज को पुत्रशोक के कारण कोई विशेष कष्ट न हो, तुम सावधानी के साथ वैसा ही प्रयत्न करना॥ २३ १/२ ॥

दारुणश्चाप्ययं शोको यथैनं न विनाशयेत॥२४॥
 राज्ञो वृद्धस्य सततं हितं चर समाहिता।

‘कहीं ऐसा न हो कि यह दारुण शोक इनकी जीवनलीला ही समाप्त कर डाले। जैसे भी सम्भव हो, तुम सदा सावधान रहकर बूढ़े महाराज के हितसाधन में लगी रहना ॥ २४ १/२ ।।
व्रतोपवासनिरता या नारी परमोत्तमा॥२५॥
भर्तारं नानुवर्तेत सा च पापगतिर्भवेत्।

‘उत्कृष्ट गुण और जाति आदि की दृष्टि से परम उत्तम तथा व्रत-उपवास में तत्पर होकर भी जो नारी पति की सेवा नहीं करती है, उसे पापियों को मिलने वाली गति (नरक आदि)- की प्राप्ति होती है। २५ १/२॥

भर्तुः शुश्रूषया नारी लभते स्वर्गमुत्तमम्॥२६॥
अपि या निर्नमस्कारा निवृत्ता देवपूजनात्।

‘जो अन्यान्य देवताओं की वन्दना और पूजा से दूर रहती है, वह नारी भी केवल पति की सेवामात्र से उत्तम स्वर्गलोक को प्राप्त कर लेती है।। २६ १/२॥

शुश्रूषामेव कुर्वीत भर्तुः प्रियहिते रता॥ २७॥
एष धर्मः स्त्रिया नित्यो वेदे लोके श्रुतः स्मृतः।

‘अतः नारी को चाहिये कि वह पति के प्रिय एवं हितसाधन में तत्पर रहकर सदा उसकी सेवा ही करे, यही स्त्री का वेद और लोक में प्रसिद्ध नित्य (सनातन) धर्म है। इसी का श्रुतियों और स्मृतियों में भी वर्णन है॥ २७ १/२ ॥

अग्निकार्येषु च सदा सुमनोभिश्च देवताः॥ २८॥
पूज्यास्ते मत्कृते देवि ब्राह्मणाश्चैव सत्कृताः।

‘देवि! तुम्हें मेरी मङ्गल-कामना से सदा अग्निहोत्र के अवसरों पर पुष्पों से देवताओं का तथा सत्कारपूर्वक ब्राह्मणों का भी पूजन करते रहना चाहिये॥ २८ १/२॥

एवं कालं प्रतीक्षस्व ममागमनकांक्षिणी॥२९॥
नियता नियताहारा भर्तृशुश्रूषणे रता।

‘इस प्रकार तुम नियमित आहार करके नियमों का पालन करती हुई स्वामी की सेवा में लगी रहो और मेरे आगमन की इच्छा रखकर समय की प्रतीक्षा करो॥२९ १/२॥

प्राप्स्यसे परमं कामं मयि पर्यागते सति ॥ ३०॥
यदि धर्मभृतां श्रेष्ठो धारयिष्यति जीवितम्।

‘यदि धर्मात्माओं में श्रेष्ठ महाराज जीवित रहेंगे तो मेरे लौट आने पर तुम्हारी भी शुभ कामना पूर्ण होगी’।

एवमुक्ता तु रामेण बाष्पपर्याकुलेक्षणा॥३१॥
कौसल्या पुत्रशोकार्ता रामं वचनमब्रवीत्।

श्रीराम के ऐसा कहने पर कौसल्या के नेत्रों में आँसू छलक आये। वे पुत्रशोक से पीड़ित होकर श्रीरामचन्द्रजी से बोलीं- ॥३१ १/२॥

गमने सुकृतां बुद्धिं न ते शक्नोमि पुत्रक॥३२॥
विनिवर्तयितुं वीर नूनं कालो दुरत्ययः।

‘बेटा! मैं तुम्हारे वन में जाने के निश्चित विचार को नहीं पलट सकती। वीर! निश्चय ही काल की आज्ञा का उल्लङ्घन करना अत्यन्त कठिन है॥ ३२ १/२॥

गच्छ पुत्र त्वमेकाग्रो भद्रं तेऽस्तु सदा विभो॥ ३३॥
पुनस्त्वयि निवृत्ते तु भविष्यामि गतक्लमा।

‘सामर्थ्यशाली पुत्र! अब तुम निश्चिन्त होकर वन को जाओ, तुम्हारा सदा ही कल्याण हो। जब फिर तुम वन से लौट आओगे, उस समय मेरे सारे क्लेश-सब संताप दूर हो जायेंगे॥ ३३ १/२ ॥

प्रत्यागते महाभागे कृतार्थे चरितव्रते।
पितुरानृण्यतां प्राप्ते स्वपिष्ये परमं सुखम्॥३४॥

‘बेटा! जब तुम वनवास का महान् व्रत पूर्ण करके कृतार्थ एवं महान् सौभाग्यशाली होकर लौट आओगे और ऐसा करके पिता के ऋण से उऋण हो जाओगे, तभी मैं उत्तम सुख की नींद सो सकूँगी॥ ३४ ॥

कृतान्तस्य गतिः पुत्र दुर्विभाव्या सदा भुवि।
यस्त्वां संचोदयति मे वच आविध्य राघव॥

‘बेटा रघुनन्दन! इस भूतल पर दैव की गति को समझना बहुत ही कठिन है, जो मेरी बात काटकर तुम्हें वन जाने के लिये प्रेरित कर रहा है।॥ ३५ ॥

गच्छेदानीं महाबाहो क्षेमेण पुनरागतः।
नन्दयिष्यसि मां पुत्र साम्ना श्लक्ष्णेन चारुणा॥ ३६॥

‘बेटा! महाबाहो! इस समय जाओ, फिर कुशलपूर्वक लौटकर सान्त्वना भरे मधुर एवं मनोहर वचनोंसे मुझे आनन्दित करना।। ३६ ॥

अपीदानीं स कालः स्याद् वनात् प्रत्यागतं पुनः।
यत् त्वां पुत्रक पश्येयं जटावल्कलधारिणम्॥ ३७॥

‘वत्स! क्या वह समय अभी आ सकता है, जब कि जटा-वल्कल धारण किये वन से लौटकर आये हुए तुमको फिर देख सकूँगी’ ॥ ३७॥

तथा हि रामं वनवासनिश्चितं ददर्श देवी परमेण चेतसा।
उवाच रामं शुभलक्षणं वचो बभूव च स्वस्त्ययनाभिकांक्षिणी॥३८॥

देवी कौसल्या ने जब देखा कि इस प्रकार श्रीराम वनवास का दृढ़ निश्चय कर चुके हैं, तब वे परम आदरयुक्त हृदय से उनको शुभसूचक आशीर्वाद देने और उनके लिये स्वस्तिवाचन कराने की इच्छा करने लगीं ॥ ३८॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे चतुर्विंशः सर्गः॥२४॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में चौबीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥२४॥


अयोध्याकाण्डम्
पञ्चविंशः सर्गः (सर्ग 25)

( कौसल्या का श्रीराम की वनयात्रा के लिये मङ्गलकामनापूर्वक स्वस्तिवाचन करना और श्रीराम का उन्हें प्रणाम करके सीता के भवन की ओर जाना )

सा विनीय तमायासमुपस्पृश्य जलं शुचि।
चकार माता रामस्य मङ्गलानि मनस्विनी॥१॥

तदनन्तर उस क्लेशजनक शोक को मन से निकालकर श्रीराम की मनस्विनी माता कौसल्या ने पवित्र जल से आचमन किया, फिर वे यात्राकालिक मङ्गलकृत्यों का अनुष्ठान करने लगीं॥ १॥

न शक्यसे वारयितुं गच्छेदानीं रघूत्तम।
शीघ्रं च विनिवर्तस्व वर्तस्व च सतां क्रमे॥२॥

(इसके बाद वे आशीर्वाद देती हुई बोलीं-) ‘रघुकुलभूषण! अब मैं तुम्हें रोक नहीं सकती, इस समय जाओ, सत्पुरुषों के मार्ग पर स्थिर रहो और शीघ्र ही वन से लौट आओ॥२॥

यं पालयसि धर्मं त्वं प्रीत्या च नियमेन च।
स वै राघवशार्दूल धर्मस्त्वामभिरक्षतु॥३॥

‘रघुकुलसिंह! तुम नियमपूर्वक प्रसन्नता के साथ जिस धर्म का पालन करते हो, वही सब ओर से तुम्हारी रक्षा करे॥३॥

येभ्यः प्रणमसे पुत्र देवेष्वायतनेषु च।
ते च त्वामभिरक्षन्तु वने सह महर्षिभिः॥४॥

‘बेटा! देवस्थानों और मन्दिरों में जाकर तुम जिनको प्रणाम करते हो, वे सब देवता महर्षियों के साथ वन में तुम्हारी रक्षा करें॥४॥

यानि दत्तानि तेऽस्त्राणि विश्वामित्रेण धीमता।
तानि त्वामभिरक्षन्तु गुणैः समुदितं सदा॥५॥

“तुम सद्गुणों से प्रकाशित हो, बुद्धिमान् विश्वामित्रजी ने तुम्हें जो-जो अस्त्र दिये हैं, वे सबके-सब सदा सब ओर से तुम्हारी रक्षा करें॥ ५॥

पितृशुश्रूषया पुत्र मातृशुश्रूषया तथा।
सत्येन च महाबाहो चिरं जीवाभिरक्षितः॥६॥

‘महाबाहु पुत्र! तुम पिता की शुश्रूषा, माता की सेवा तथा सत्य के पालन से सुरक्षित होकर चिरंजीवी बने रहो॥

समित्कुशपवित्राणि वेद्यश्चायतनानि च।
स्थण्डिलानि च विप्राणां शैला वृक्षाः क्षुपा ह्रदाः।
पतङ्गाः पन्नगाः सिंहास्त्वां रक्षन्तु नरोत्तम॥७॥

‘नरश्रेष्ठ! समिधा, कुशा, पवित्री, वेदियाँ, मन्दिर, ब्राह्मणोंके देवपूजन सम्बन्धी स्थान, पर्वत, वृक्ष, क्षुप (छोटी शाखा वाले वृक्ष), जलाशय, पक्षी, सर्प और सिंह वन में तुम्हारी रक्षा करें॥ ७॥

स्वस्ति साध्याश्च विश्वे च मरुतश्च महर्षिभिः।
स्वस्ति धाता विधाता च स्वस्ति पूषा भगोय॑मा॥८॥

‘साध्य, विश्वेदेव तथा महर्षियों सहित मरुद्गण तुम्हारा कल्याण करें; धाता और विधाता तुम्हारे लिये मङ्गलकारी हों; पूषा, भग और अर्यमा तुम्हारा कल्याण करें॥८॥

लोकपालाश्च ते सर्वे वासवप्रमुखास्तथा।
ऋतवः षट् च ते सर्वे मासाः संवत्सराः क्षपाः॥
दिनानि च मुहूर्ताश्च स्वस्ति कुर्वन्तु ते सदा।
श्रुतिः स्मृतिश्च धर्मश्च पातु त्वां पुत्र सर्वतः॥ १०॥

‘वे इन्द्र आदि समस्त लोकपाल, छहों ऋतुएँ, सभी मास, संवत्सर, रात्रि, दिन और मुहूर्त सदा तुम्हारा मङ्गल करें। बेटा ! श्रुति, स्मृति और धर्म भी सब ओर से तुम्हारी रक्षा करें। ९-१०॥

स्कन्दश्च भगवान् देवः सोमश्च सबृहस्पतिः।
सप्तर्षयो नारदश्च ते त्वां रक्षन्तु सर्वतः॥११॥

‘भगवान् स्कन्ददेव, सोम, बृहस्पति, सप्तर्षिगण और नारद-ये सभी सब ओर से तुम्हारी रक्षा करें। ११॥

ते चापि सर्वतः सिद्धा दिशश्च सदिगीश्वराः।
स्तुता मया वने तस्मिन् पान्तु त्वां पुत्र नित्यशः॥ १२॥

‘बेटा! वे प्रसिद्ध सिद्धगण, दिशाएँ और दिक्पाल मेरी की हुई स्तुति से संतुष्ट हो उस वन में सदा सब ओर से तुम्हारी रक्षा करें॥ १२ ॥

शैलाः सर्वे समुद्राश्च राजा वरुण एव च।
द्यौरन्तरिक्षं पृथिवी वायुश्च सचराचरः॥१३॥
नक्षत्राणि च सर्वाणि ग्रहाश्च सह दैवतैः।
अहोरात्रे तथा संध्ये पान्तु त्वां वनमाश्रितम्॥ १४॥

‘समस्त पर्वत, समुद्र, राजा वरुण, धुलोक, अन्तरिक्ष, पृथिवी, वायु, चराचर प्राणी, समस्त नक्षत्र, देवताओं सहित ग्रह, दिन और रात तथा दोनों संध्याएँ—ये सब-के-सब वन में जाने पर सदा तुम्हारी रक्षा करें॥ १३-१४॥

ऋतवश्चापि षट् चान्ये मासाः संवत्सरास्तथा।
कलाश्च काष्ठाश्च तथा तव शर्म दिशन्तु ते॥ १५॥

‘छः ऋतुएँ, अन्यान्य मास, संवत्सर, कला और काष्ठा—ये सब तुम्हें कल्याण प्रदान करें॥ १५ ॥

महावनेऽपि चरतो मुनिवेषस्य धीमतः।
तथा देवाश्च दैत्याश्च भवन्तु सुखदाः सदा॥ १६॥

‘मुनि का वेष धारण करके उस विशाल वन में विचरते हुए तुझ बुद्धिमान् पुत्र के लिये समस्त देवता और दैत्य सदा सुखदायक हों॥ १६॥

राक्षसानां पिशाचानां रौद्राणां क्रूरकर्मणाम्।
क्रव्यादानां च सर्वेषां मा भूत् पुत्रक ते भयम्॥ १७॥

‘बेटा! तुम्हें भयंकर राक्षसों, क्रूरकर्मा पिशाचों तथा समस्त मांसभक्षी जन्तुओं से कभी भय न हो। १७॥

प्लवगा वृश्चिका दंशा मशकाश्चैव कानने।
सरीसृपाश्च कीटाश्च मा भूवन् गहने तव॥ १८॥

‘वन में जो मेढक या वानर, बिच्छू, डाँस, मच्छर, पर्वतीय सर्प और कीड़े होते हैं, वे उस गहन वन में तुम्हारे लिये हिंसक न हों॥ १८॥

महाद्विपाश्च सिंहाश्च व्याघ्रा ऋक्षाश्च दंष्ट्रिणः।
महिषाः शृङ्गिणो रौद्रा न ते द्रुह्यन्तु पुत्रक॥१९॥

‘पुत्र! बड़े-बड़े हाथी, सिंह, व्याघ्र, रीछ, दाढ़ वाले अन्य जीव तथा विशाल सींगवाले भयंकर भैंसे वन में तुमसे द्रोह न करें॥ १९॥

नृमांसभोजना रौद्रा ये चान्ये सर्वजातयः।
मा च त्वां हिंसिषुः पुत्र मया सम्पूजितास्त्विह॥ २०॥

वत्स! इनके सिवा जो सभी जातियों में नरमांसभक्षी भयंकर प्राणी हैं, वे मेरे द्वारा यहाँ पूजित होकर वन में तुम्हारी हिंसा न करें॥ २०॥

आगमास्ते शिवाः सन्तु सिध्यन्तु च पराक्रमाः।
सर्वसम्पत्तयो राम स्वस्तिमान् गच्छ पुत्रक॥ २१॥

‘बेटा राम! सभी मार्ग तुम्हारे लिये मङ्गलकारी हों। तुम्हारे पराक्रम सफल हों तथा तुम्हें सब सम्पत्तियाँ प्राप्त होती रहें। तुम सकुशल यात्रा करो ॥ २१॥

स्वस्ति तेऽस्त्वान्तरिक्षेभ्यः पार्थिवेभ्यः पुनः पुनः
सर्वेभ्यश्चैव देवेभ्यो ये च ते परिपन्थिनः॥ २२॥

‘तुम्हें आकाशचारी प्राणियों से, भूतल के जीवजन्तुओं से, समस्त देवताओं से तथा जो तुम्हारे शत्रु हैं, उनसे भी सदा कल्याण प्राप्त होता रहे ॥ २२॥

शुक्रः सोमश्च सूर्यश्च धनदोऽथ यमस्तथा।
पान्तु त्वामर्चिता राम दण्डकारण्यवासिनम॥ २३॥

‘श्रीराम! शुक्र, सोम, सूर्य, कुबेर तथा यम—ये मुझसे पूजित हो दण्डकारण्य में निवास करते समय सदा तुम्हारी रक्षा करें॥ २३॥

अग्निर्वायुस्तथा धूमो मन्त्राश्चर्षिमुखच्युताः।
उपस्पर्शनकाले तु पान्तु त्वां रघुनन्दन॥२४॥

‘रघुनन्दन! स्नान और आचमन के समय अग्नि, वायु, धूम तथा ऋषियों के मुख से निकले हुए मन्त्र तुम्हारी रक्षा करें॥२४॥

सर्वलोकप्रभुर्ब्रह्मा भूतकर्तृ तथर्षयः।
ये च शेषाः सुरास्ते तु रक्षन्तु वनवासिनम्॥ २५॥

‘समस्त लोकों के स्वामी ब्रह्मा, जगत् के कारणभूत परब्रह्म, ऋषिगण तथा उनके अतिरिक्त जो देवता हैं, वे सब-के-सब वनवास के समय तुम्हारी रक्षा करें’। २५॥

इति माल्यैः सुरगणान् गन्धैश्चापि यशस्विनी।
स्तुतिभिश्चानुरूपाभिरान यतलोचना॥२६॥

ऐसा कहकर विशाललोचना यशस्विनी रानी कौसल्या ने पुष्पमाला और गन्ध आदि उपचारों से तथा अनुरूप स्तुतियों द्वारा देवताओं का पूजन किया।२६॥

ज्वलनं समुपादाय ब्राह्मणेन महात्मना।
हावयामास विधिना राममङ्गलकारणात्॥२७॥

उन्होंने श्रीरामकी मङ्गलकामना से अग्नि को लाकर एक महात्मा ब्राह्मण के द्वारा उसमें विधिपूर्वक होम करवाया।

घृतं श्वेतानि माल्यानि समिधश्चैव सर्षपान्।
उपसम्पादयामास कौसल्या परमाङ्गना॥२८॥

श्रेष्ठ नारी महारानी कौसल्या ने घी, श्वेत पुष्प और माला, समिधा तथा सरसों आदि वस्तुएँ ब्राह्मण के समीप रखवा दीं॥ २८॥

उपाध्यायः स विधिना हुत्वा शान्तिमनामयम्।
हतहव्यावशेषेण बाह्यं बलिमकल्पयत्॥२९॥

पुरोहितजी ने समस्त उपद्रवों की शान्ति और आरोग्य के उद्देश्यसे विधिपूर्वक अग्नि में होम करके हवन से बचे हुए हविष्य के द्वारा होम की वेदी से बाहर दसों दिशाओं में इन्द्र आदि लोकपालों के लिये बलि अर्पित की॥ २९॥

मधुदध्यक्षतघृतैः स्वस्तिवाच्यं द्विजांस्ततः।
वाचयामास रामस्य वने स्वस्त्ययनक्रियाम्॥ ३०॥

तदनन्तर स्वस्तिवाचन के उद्देश्य से ब्राह्मणों को मधु, दही, अक्षत और घृत अर्पित करके ‘वन में श्रीराम का सदा मङ्गल हो’ इस कामना से कौसल्याजी ने उन सबसे स्वस्त्ययनसम्बन्धी मन्त्रों का पाठ करवाया। ३०॥

ततस्तस्मै द्विजेन्द्राय राममाता यशस्विनी।
दक्षिणां प्रददौ काम्यां राघवं चेदमब्रवीत्॥३१॥

इसके बाद यशश्विनी श्रीराममाता ने उन विप्रवर पुरोहितजी को उनकी इच्छा के अनुसार दक्षिणा दी और श्रीरघुनाथजी से इस प्रकार कहा— ॥३१॥

यन्मङ्गलं सहस्राक्षे सर्वदेवनमस्कृते।
वृत्रनाशे समभवत् तत् ते भवतु मङ्गलम्॥३२॥

‘वृत्रासुर का नाश करने के निमित्त सर्वदेववन्दित सहस्रनेत्रधारी इन्द्र को जो मङ्गलमय आशीर्वाद प्राप्त हुआ था, वही मङ्गल तुम्हारे लिये भी हो॥३२॥

यन्मङ्गलं सुपर्णस्य विनताकल्पयत् पुरा।
अमृतं प्रार्थयानस्य तत् ते भवतु मङ्गलम्॥३३॥

‘पूर्वकाल में विनतादेवी ने अमृत लाने की इच्छा वाले अपने पुत्र गरुड़ के लिये जो मङ्गलकृत्य किया था, वही मङ्गल तुम्हें भी प्राप्त हो॥ ३३॥

अमृतोत्पादने दैत्यान् नतो वज्रधरस्य यत्।
अदितिर्मङ्गलं प्रादात् तत् ते भवतु मङ्गलम्॥ ३४॥

‘अमृतकी उत्पत्ति के समय दैत्यों का संहार करने वाले वज्रधारी इन्द्र के लिये माता अदिति ने जो मङ्गलमय आशीर्वाद दिया था, वही मङ्गल तुम्हारे लिये भी सुलभ हो॥ ३४॥

त्रिविक्रमान प्रक्रमतो विष्णोरतलतेजसः।
यदासीन्मङ्गलं राम तत् ते भवतु मङ्गलम्॥३५॥

‘श्रीराम! तीन पगों को बढ़ाते हुए अनुपम तेजस्वी भगवान् विष्णु के लिये जो मङ्गलाशंसा की गयी थी, वही मङ्गल तुम्हारे लिये भी प्राप्त हो॥ ३५ ॥

ऋषयः सागरा दीपा वेदा लोका दिशश्च ते।
मङ्गलानि महाबाहो दिशन्तु शुभमङ्गलम्॥३६॥

‘महाबाहो! ऋषि, समुद्र, द्वीप, वेद, समस्त लोक और दिशाएँ तुम्हें मङ्गल प्रदान करें। तुम्हारा सदा शुभ मङ्गल हो’ ॥ ३६॥

इति पुत्रस्य शेषाश्च कृत्वा शिरसि भामिनी।
गन्धैश्चापि समालभ्य राममायतलोचना॥ ३७॥
औषधीं च सुसिद्धार्थां विशल्यकरणीं शुभाम्।
चकार रक्षां कौसल्या मन्त्रैरभिजजाप च॥३८॥

इस प्रकार आशीर्वाद देकर विशाललोचना भामिनी कौसल्या ने पुत्र के मस्तक पर अक्षत रखकर चन्दन और रोली लगायी तथा सब मनोरथों को सिद्ध करने वाली विशल्यकरणी नामक शुभ ओषधि लेकर रक्षा के उद्देश्य से मन्त्र पढ़ते हुए उसको श्रीराम के हाथ में बाँध दिया; फिर उसमें उत्कर्ष लाने के लिये मन्त्र का जप भी किया।

उवाचापि प्रहृष्टेव सा दुःखवशवर्तिनी।
वामात्रेण न भावेन वाचा संसज्जमानया॥३९॥

तदनन्तर दुःख के अधीन हुई कौसल्या ने ऊपर से प्रसन्न-सी होकर मन्त्रों का स्पष्ट उच्चारण भी किया। उस समय वे वाणीमात्र से ही मन्त्रोच्चारण कर सकीं, हृदय से नहीं (क्योंकि हृदय श्रीराम के वियोग की सम्भावनासे व्यथित था, इसीलिये) वे खेद से गद्गद, लड़खड़ाती हुई वाणी से मन्त्र बोल रही थीं॥ ३९॥

आनम्य मूर्ध्नि चाघ्राय परिष्वज्य यशस्विनी।
अवदत् पुत्रमिष्टार्थो गच्छ राम यथासुखम्॥ ४०॥
अरोगं सर्वसिद्धार्थमयोध्यां पुनरागतम्।
पश्यामि त्वां सुखं वत्स संधितं राजवर्त्मसु॥ ४१॥

इसके बाद उनके मस्तक को कुछ झुकाकर यशस्विनी माता ने सूंघा और बेटे को हृदय से लगाकर कहा—’वत्स राम! तुम सफलमनोरथ होकर सुखपूर्वक वन को जाओ। जब पूर्णकाम होकर रोगरहित सकुशल अयोध्या लौटोगे, उस समय तुम्हें राजमार्ग पर स्थित देखकर सुखी होऊँगी। ४०-४१॥

प्रणष्टदुःखसंकल्पा हर्षविद्योतितानना।
द्रक्ष्यामि त्वां वनात् प्राप्तं पूर्णचन्द्रमिवोदितम्॥ ४२॥

‘उस समय मेरे दुःखपूर्ण संकल्प मिट जायँगे, मुखपर हर्षजनित उल्लास छा जायगा और मैं वन से आये हुए तुमको पूर्णिमा की रातमें उदित हुए पूर्ण चन्द्रमा की भाँति देलूँगी॥ ४३॥

भद्रासनगतं राम वनवासादिहागतम्।
द्रक्ष्यामि च पुनस्त्वां तु तीर्णवन्तं पितुर्वचः॥ ४३॥

‘श्रीराम ! वनवास से यहाँ आकर पिता की प्रतिज्ञा को पूर्ण करके जब तुम राजसिंहासन पर बैठोगे, उस समय मैं पुनः प्रसन्नतापूर्वक तुम्हारा दर्शन करूँगी॥ ४३॥

मङ्गलैरुपसम्पन्नो वनवासादिहागतः।
वध्वाश्च मम नित्यं त्वं कामान् संवर्ध याहि भोः॥४४॥

‘अब जाओ और वनवास से यहाँ लौटकर राजोचित मङ्गलमय वस्त्राभूषणों से विभूषित हो तुम सदा मेरी बहू सीता की समस्त कामनाएँ पूर्ण करते रहो॥४४॥

मयार्चिता देवगणाः शिवादयो महर्षयो भूतगणाः सुरोरगाः।
अभिप्रयातस्य वनं चिराय ते हितानि कांक्षन्तु दिशश्च राघव॥४५॥

‘रघुनन्दन ! मैंने सदा जिनका पूजन और सम्मान किया है, वे शिव आदि देवता, महर्षि, भूतगण, देवोपम नाग और सम्पूर्ण दिशाएँ—ये सब-के-सब वन में जानेपर चिरकालतक तुम्हारे हितसाधन की कामना करते रहें’॥ ४५ ॥

अतीव चाश्रुप्रतिपूर्णलोचना समाप्य च स्वस्त्ययनं यथाविधि।
प्रदक्षिणं चापि चकार राघवं पुनः पुनश्चापि निरीक्ष्य सस्वजे॥४६॥

इस प्रकार माता ने नेत्रों में अत्यन्त आँसू भरकर विधिपूर्वक वह स्वस्तिवाचन कर्म पूर्ण किया। फिर श्रीराम की परिक्रमा की और बारंबार उनकी ओर देखकर उन्हें छाती से लगाया॥ ४६॥

तया हि देव्या च कृतप्रदक्षिणो निपीड्य मातुश्चरणौ पुनः पुनः।
जगाम सीतानिलयं महायशाः स राघवः प्रज्वलितस्तया श्रिया॥४७॥

देवी कौसल्या ने जब श्रीराम की प्रदक्षिणा कर ली, तब महायशस्वी रघुनाथजी बारंबार माता के चरणोंको दबाकर प्रणाम करके माता की मङ्गलकामना-जनित उत्कृष्ट शोभा से सम्पन्न हो सीताजी के महल की ओर चल दिये॥ ४७॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे पञ्चविंशः सर्गः ॥२५॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में पचीसवाँ सर्ग पूरा हुआ।२५॥


अयोध्याकाण्डम्
षड्विंशः सर्गः (सर्ग 26)

( श्रीराम को उदास देखकर सीता का उनसे इसका कारण पूछना और श्रीराम का वन में जाने का निश्चय बताते हुए सीता को घर में रहने के लिये समझाना )

अभिवाद्य तु कौसल्यां रामः सम्प्रस्थितो वनम्।
कृतस्वस्त्ययनो मात्रा धर्मिष्ठे वर्त्मनि स्थितः॥१॥

धर्मिष्ठ मार्ग पर स्थित हुए श्रीराम माता द्वारा स्वस्तिवाचन-कर्म सम्पन्न हो जाने पर कौसल्या को प्रणाम करके वहाँ से वन के लिये प्रस्थित हुए॥१॥

विराजयन् राजसुतो राजमार्ग नरैर्वृतम्।
हृदयान्याममन्थेव जनस्य गुणवत्तया॥२॥

उस समय मनुष्यों की भीड़ से भरे हुए राजमार्ग को प्रकाशित करते हुए राजकुमार श्रीराम अपने सद्गुणों के कारण लोगों के मन  को मथने-से लगे (ऐसे गुणवान् श्रीराम को वनवास दिया जा रहा है, यह सोचकर वहाँ के लोगों का जी कचोटने लगा) ॥२॥

वैदेही चापि तत् सर्वं न शुश्राव तपस्विनी।
तदेव हृदि तस्याश्च यौवराज्याभिषेचनम्॥३॥

तपस्विनी विदेहनन्दिनी सीता ने अभी तक वह सारा हाल नहीं सुना था। उनके हृदय में यही बात समायी हुई थी कि मेरे पति का युवराज पद पर अभिषेक हो रहा होगा।

देवकार्यं स्म सा कृत्वा कृतज्ञा हृष्टचेतना।
अभिज्ञा राजधर्माणां राजपुत्री प्रतीक्षति॥४॥

विदेहराजकुमारी सीता सामयिक कर्तव्यों तथा राजधर्मो को जानती थीं, अतः देवताओं की पूजा करके प्रसन्नचित्त से श्रीराम के आगमन की प्रतीक्षा कर रही थीं।

प्रविवेशाथ रामस्तु स्ववेश्म सुविभूषितम्।
प्रहृष्टजनसम्पूर्ण ह्रिया किंचिदवाङ्मखः॥५॥

इतने में ही श्रीराम ने अपने भलीभाँति सजे-सजाये अन्तःपुर में, जो प्रसन्न मनुष्यों से भरा हुआ था, प्रवेश किया। उस समय लज्जा से उनका मुख कुछ नीचा हो रहा था।

अथ सीता समुत्पत्य वेपमाना च तं पतिम्।
अपश्यच्छोकसंतप्तं चिन्ताव्याकुलितेन्द्रियम्॥

सीता उन्हें देखते ही आसन से उठकर खड़ी हो गयीं। उनकी अवस्था देखकर काँपने लगीं और चिन्ता से व्याकुल इन्द्रियों वाले अपने उन शोकसंतप्त पति को निहारने लगीं॥६॥

तां दृष्ट्वा स हि धर्मात्मा न शशाक मनोगतम्।
तं शोकं राघवः सोढुं ततो विवृततां गतः॥७॥

धर्मात्मा श्रीराम सीता को देखकर अपने मानसिक शोक का वेग सहन न कर सके, अतः उनका वह शोक प्रकट हो गया॥७॥

विवर्णवदनं दृष्ट्वा तं प्रस्विन्नममर्षणम्।
आह दुःखाभिसंतप्ता किमिदानीमिदं प्रभो॥८॥

उनका मुख उदास हो गया था। उनके अङ्गों से पसीना निकल रहा था। वे अपने शोक को दबाये रखने में असमर्थ हो गये थे। उन्हें इस अवस्था में देखकर सीता दुःख से संतप्त हो उठी और बोलीं —’प्रभो! इस समय यह आपकी कैसी दशा है? ॥ ८॥

अद्य बार्हस्पतः श्रीमान् युक्तः पुष्येण राघव।
प्रोच्यते ब्राह्मणैः प्राज्ञैः केन त्वमसि दुर्मनाः॥९॥

‘रघुनन्दन! आज बृहस्पति देवता-सम्बन्धी मङ्गलमय पुष्यनक्षत्र है, जो अभिषेक के योग्य है। उस पुष्यनक्षत्र के योग में विद्वान् ब्राह्मणों ने आपका अभिषेक बताया है। ऐसे समय में जब कि आपको प्रसन्न होना चाहिये था, आपका मन इतना उदास क्यों है? ॥९॥

न ते शतशलाकेन जलफेननिभेन च।
आवृतं वदनं वल्गु च्छत्रेणाभिविराजते॥१०॥

‘मैं देखती हूँ, इस समय आपका मनोहर मुख जल के फेन के समान उज्ज्वल तथा सौ तीलियों वाले श्वेत छत्र से आच्छादित नहीं है, अतएव अधिक शोभा नहीं पा रहा है॥ १० ॥

व्यजनाभ्यां च मुख्याभ्यां शतपत्रनिभेक्षणम्।
चन्द्रहंसप्रकाशाभ्यां वीज्यते न तवाननम्॥११॥

‘कमल-जैसे सुन्दर नेत्र धारण करनेवाले आपके इस मुखपर चन्द्रमा और हंसके समान श्वेत वर्णवाले दो श्रेष्ठ चँवरोंद्वारा हवा नहीं की जा रही है॥ ११॥

वाग्मिनो वन्दिनश्चापि प्रहृष्टास्त्वां नरर्षभ।
स्तुवन्तो नाद्य दृश्यन्ते मङ्गलैः सूतमागधाः॥ १२॥

‘नरश्रेष्ठ! प्रवचनकुशल वन्दी, सूत और मागधजन आज अत्यन्त प्रसन्न हो अपने माङ्गलिक वचनोंद्वारा आपकी स्तुति करते नहीं दिखायी देते हैं।१२ ॥

न ते क्षौद्रं च दधि च ब्राह्मणा वेदपारगाः।
मूर्ध्नि मूर्धाभिषिक्तस्य ददति स्म विधानतः॥

‘वेदों के पारङ्गत विद्वान् ब्राह्मणों ने आज मूर्धाभिषिक्त हुए आपके मस्तक पर तीर्थोदकमिश्रित मधु और दधि का विधिपूर्वक अभिषेक नहीं किया। १३॥

न त्वां प्रकृतयः सर्वाः श्रेणीमुख्याश्च भूषिताः।
अनुव्रजितुमिच्छन्ति पौरजानपदास्तथा ॥१४॥

‘मन्त्री-सेनापति आदि सारी प्रकृतियाँ, वस्त्राभूषणों से विभूषित मुख्य-मुख्य सेठ-साहूकार तथा नगर और जनपद के लोग आज आपके पीछे पीछे चलने की इच्छा नहीं कर रहे हैं! (इसका क्या कारण है?) ॥१४॥

चतुर्भिर्वेगसम्पन्नैर्हयैः काञ्चनभूषणैः ।
मुख्यः पुष्परथो युक्तः किं न गच्छति तेऽग्रतः॥ १५॥

‘सुनहरे साज-बाज से सजे हुए चार वेगशाली घोड़ों से जुता हुआ श्रेष्ठ पुष्परथ (पुष्पभूषित केवल भ्रमणोपयोगी रथ) आज आपके आगे-आगे क्यों नहीं चल रहा है? ॥ १५ ॥

न हस्ती चाग्रतः श्रीमान् सर्वलक्षणपूजितः।
प्रयाणे लक्ष्यते वीर कृष्णमेघगिरिप्रभः॥१६॥

‘वीर! आपकी यात्रा के समय समस्त शुभ लक्षणों से प्रशंसित तथा काले मेघवाले पर्वत के समान विशालकाय तेजस्वी गजराज आज आपके आगे क्यों नहीं दिखायी देता है ? ॥ १६॥

न च काञ्चनचित्रं ते पश्यामि प्रियदर्शन।
भद्रासनं पुरस्कृत्य यान्तं वीर पुरःसरम्॥१७॥

‘प्रियदर्शन वीर! आज आपके सुवर्णजटित भद्रासन को सादर हाथ में लेकर अग्रगामी सेवक आगे जाता क्यों नहीं दिखायी देता है ? ।। १७॥

अभिषेको यदा सज्जः किमिदानीमिदं तव।
अपूर्वो मुखवर्णश्च न प्रहर्षश्च लक्ष्यते॥१८॥

‘जब अभिषेककी सारी तैयारी हो चुकी है, ऐसे समयमें आपकी यह क्या दशा हो रही है? आपके मुखकी कान्ति उड़ गयी है। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था। आपके चेहरेपर प्रसन्नताका कोई चिह्न नहीं दिखायी देता है। इसका क्या कारण है?’। १८॥

इतीव विलपन्तीं तां प्रोवाच रघुनन्दनः।
सीते तत्रभवांस्तातः प्रव्राजयति मां वनम्॥१९॥

इस प्रकार विलाप करती हुई सीतासे रघुनन्दन श्रीरामने कहा—’सीते! आज पूज्य पिताजी मुझे वनमें भेज रहे हैं॥१९॥

कुले महति सम्भूते धर्मज्ञे धर्मचारिणि।
शृणु जानकि येनेदं क्रमेणाद्यागतं मम॥२०॥

‘महान् कुलमें उत्पन्न, धर्मको जाननेवाली तथा धर्मपरायणे जनकनन्दिनि! जिस कारण यह वनवास आज मुझे प्राप्त हुआ है, वह क्रमशः बताता हूँ, सुनो॥

राज्ञा सत्यप्रतिज्ञेन पित्रा दशरथेन वै।
कैकेय्यै मम मात्रे तु पुरा दत्तौ महावरौ॥२१॥

मेरे सत्यप्रतिज्ञ पिता महाराज दशरथ ने माता कैकेयी को पहले कभी दो महान् वर दिये थे॥ २१॥

तयाद्य मम सज्जेऽस्मिन्नभिषेके नृपोद्यते।
प्रचोदितः स समयो धर्मेण प्रतिनिर्जितः॥२२॥

‘इधर जब महाराज के उद्योग से मेरे राज्याभिषेक की तैयारी होने लगी, तब कैकेयी ने उस वरदान की प्रतिज्ञा को याद दिलाया और महाराज  को धर्मतः अपने काबू में कर लिया॥ २२॥

चतुर्दश हि वर्षाणि वस्तव्यं दण्डके मया।
पित्रा मे भरतश्चापि यौवराज्ये नियोजितः॥ २३॥

‘इससे विवश होकर पिताजी ने भरत को तो युवराज के पदपर नियुक्त किया और मेरे लिये दूसरा वर स्वीकार किया, जिसके अनुसार मुझे चौदह वर्षों तक दण्डकारण्य में निवास करना होगा॥२३॥

सोऽहं त्वामागतो द्रष्टुं प्रस्थितो विजनं वनम्।
भरतस्य समीपे ते नाहं कथ्यः कदाचन ॥२४॥
ऋद्धियुक्ता हि पुरुषा न सहन्ते परस्तवम्।
तस्मान्न ते गुणाः कथ्या भरतस्याग्रतो मम॥ २५॥

‘इस समय मैं निर्जन वन में जाने के लिये प्रस्थान कर चुका हूँ और तुमसे मिलने के लिये यहाँ आया हूँ। तुम भरत के समीप कभी मेरी प्रशंसा न करना; क्योंकि समृद्धिशाली पुरुष दूसरे की स्तुति नहीं सहन कर पाते हैं। इसीलिये कहता हूँ कि तुम भरत के सामने मेरे गुणों की प्रशंसा न करना॥ २४-२५ ॥

अहं ते नानुवक्तव्यो विशेषेण कदाचन।
अनुकूलतया शक्यं समीपे तस्य वर्तितुम्॥२६॥

‘विशेषतः तुम्हें भरत के समक्ष अपनी सखियों के साथ भी बारंबार मेरी चर्चा नहीं करनी चाहिये; क्योंकि उनके मन के अनुकूल बर्ताव करके ही तुम उनके निकट रह सकती हो॥२६॥

तस्मै दत्तं नृपतिना यौवराज्यं सनातनम्।
स प्रसाद्यस्त्वया सीते नृपतिश्च विशेषतः॥२७॥

‘सीते! राजा ने उन्हें सदा के लिये युवराज पद दे दिया है, इसलिये तुम्हें विशेष प्रयत्नपूर्वक उन्हें प्रसन्न रखना चाहिये; क्योंकि अब वे ही राजा होंगे। २७॥

अहं चापि प्रतिज्ञां तां गुरोः समनुपालयन्।
वनमद्यैव यास्यामि स्थिरीभव मनस्विनि॥२८॥

मैं भी पिताजी की उस प्रतिज्ञा का पालन करने के लिये आज ही वन को चला जाऊँगा। मनस्विनि ! तुम धैर्य धारण करके रहना॥२८॥

याते च मयि कल्याणि वनं मुनिनिषेवितम्।
व्रतोपवासपरया भवितव्यं त्वयानघे॥२९॥

‘कल्याणि! निष्पाप सीते! मेरे मुनिजन सेवित वन को चले जाने पर तुम्हें प्रायः व्रत और उपवास में संलग्न रहना चाहिये॥ २९॥

कल्यमुत्थाय देवानां कृत्वा पूजां यथाविधि।
वन्दितव्यो दशरथः पिता मम जनेश्वरः॥३०॥

‘प्रतिदिन सबेरे उठकर देवताओंकी विधिपूर्वक पूजा करके तुम्हें मेरे पिता महाराज दशरथकी वन्दना करनी चाहिये॥३०॥

माता च मम कौसल्या वृद्धा संतापकर्शिता।
धर्ममेवाग्रतः कृत्वा त्वत्तः सम्मानमर्हति॥३१॥

‘मेरी माता कौसल्या को भी प्रणाम करना चाहिये। एक तो वे बूढ़ी हुईं, दूसरे दुःख और संताप ने उन्हें दुर्बल कर दिया है; अतः धर्म को ही सामने रखकर तुमसे वे विशेष सम्मान पाने के योग्य हैं॥ ३१॥

वन्दितव्याश्च ते नित्यं याः शेषा मम मातरः।
स्नेहप्रणयसम्भोगैः समा हि मम मातरः॥३२॥

‘जो मेरी शेष माताएँ हैं, उनके चरणों में भी तुम्हें प्रतिदिन प्रणाम करना चाहिये; क्योंकि स्नेह, उत्कृष्ट प्रेम और पालन-पोषण की दृष्टि से सभी माताएँ मेरे लिये समान हैं॥ ३२॥

भ्रातृपुत्रसमौ चापि द्रष्टव्यौ च विशेषतः।
त्वया भरतशत्रुघ्नौ प्राणैः प्रियतरौ मम॥३३॥

‘भरत और शत्रुघ्न मुझे प्राणों से भी बढ़कर प्रिय हैं, अतः तुम्हें उन दोनोंको विशेषतः अपने भाई और पुत्र के समान देखना और मानना चाहिये।। ३३॥

विप्रियं च न कर्तव्यं भरतस्य कदाचन।
स हि राजा च वैदेहि देशस्य च कुलस्य च॥ ३४॥

‘विदेहनन्दिनि! तुम्हें भरत की इच्छाके विरुद्ध कोई काम नहीं करना चाहिये; क्योंकि इस समय वे मेरे देश और कुल के राजा हैं॥ ३४॥

आराधिता हि शीलेन प्रयत्नैश्चोपसेविताः।
राजानः सम्प्रसीदन्ति प्रकुप्यन्ति विपर्यये॥ ३५॥

‘अनुकूल आचरण के द्वारा आराधना और प्रयत्नपूर्वक सेवा करने पर राजा लोग प्रसन्न होते हैं तथा विपरीत बर्ताव करने पर वे कुपित हो जाते हैं। ३५॥

औरस्यानपि पुत्रान् हि त्यजन्त्यहितकारिणः।
समर्थान् सम्प्रगृह्णन्ति जनानपि नराधिपाः॥ ३६॥

‘जो अहित करने वाले हैं, वे अपने औरस पुत्र ही क्यों न हों, राजा उन्हें त्याग देते हैं और आत्मीय न होने पर भी जो सामर्थ्यवान् होते हैं, उन्हें वे अपना बना लेते हैं॥ ३६॥

सा त्वं वसेह कल्याणि राज्ञः समनुवर्तिनी।
भरतस्य रता धर्मे सत्यव्रतपरायणा॥३७॥

‘अतः कल्याणि! तुम राजा भरत के अनुकूल बर्ताव करती हुई धर्म एवं सत्यव्रत में तत्पर रहकर यहाँ निवास करो॥ ३७॥

अहं गमिष्यामि महावनं प्रिये त्वया हि वस्तव्यमिहैव भामिनि।
यथा व्यलीकं कुरुषे न कस्यचित् तथा त्वया कार्यमिदं वचो मम॥३८॥

‘प्रिये! अब मैं उस विशाल वन में चला जाऊँगा,भामिनि! तुम्हें यहीं निवास करना होगा। तुम्हारे बर्ताव से किसी को कष्ट न हो, इसका ध्यान रखते हुए तुम्हें यहाँ मेरी इस आज्ञा का पालन करते रहना चाहिये’॥ ३८॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे षड्विंशः सर्गः ॥२६॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में छब्बीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥२६॥


अयोध्याकाण्डम्
सप्तविंशः सर्गः (सर्ग 27)

( सीता की श्रीराम से अपने को भी साथ ले चलने के लिये प्रार्थना )

एवमुक्ता तु वैदेही प्रियाय प्रियवादिनी।
प्रणयादेव संक्रुद्धा भर्तारमिदमब्रवीत्॥१॥

श्रीराम के ऐसा कहने पर प्रियवादिनी विदेहकुमारी सीताजी, जो सब प्रकार से अपने स्वामी का प्यार पाने योग्य थीं, प्रेम से ही कुछ कुपित होकर पति से इस प्रकार बोलीं- ॥ १॥

किमिदं भाषसे राम वाक्यं लघुतया ध्रुवम्।
त्वया यदपहास्यं मे श्रुत्वा नरवरोत्तम ॥२॥

‘नरश्रेष्ठ श्रीराम! आप मुझे ओछी समझकर यह क्या कह रहे हैं? आपकी ये बातें सुनकर मुझे बहुत हँसी आती है॥२॥

वीराणां राजपुत्राणां शस्त्रास्त्रविदुषां नृप।
अनर्हमयशस्यं च न श्रोतव्यं त्वयेरितम्॥३॥

‘नरेश्वर! आपने जो कुछ कहा है, वह अस्त्रशस्त्रों के ज्ञाता वीर राजकुमारों के योग्य नहीं है। वह अपयश का टीका लगानेवाला होने के कारण सुनने योग्य भी नहीं है॥३॥

आर्यपुत्र पिता माता भ्राता पुत्रस्तथा स्नुषा।
स्वानि पुण्यानि भुञ्जानाः स्वं स्वं भाग्यमुपासते॥४॥

‘आर्यपुत्र ! पिता, माता, भाई, पुत्र और पुत्रवधू-ये सब पुण्यादि कर्मों का फल भोगते हुए अपने-अपने भाग्य (शुभाशुभ कर्म) के अनुसार जीवन-निर्वाह करते हैं॥४॥

भर्तुर्भाग्यं तु नार्येका प्राप्नोति पुरुषर्षभ।
अतश्चैवाहमादिष्टा वने वस्तव्यमित्यपि॥५॥

‘पुरुषप्रवर! केवल पत्नी ही अपने पति के भाग्य का अनुसरण करती है, अतः आपके साथ ही मुझे भी वन में रहने की आज्ञा मिल गयी है॥५॥

न पिता नात्मजो वात्मा न माता न सखीजनः।
इह प्रेत्य च नारीणां पतिरेको गतिः सदा॥६॥

‘नारियों के लिये इस लोक और परलोक में एकमात्र पति ही सदा आश्रय देनेवाला है। पिता, पुत्र, माता, सखियाँ तथा अपना यह शरीर भी उसका सच्चा सहायक नहीं है।

यदि त्वं प्रस्थितो दुर्गं वनमद्यैव राघव।
अग्रतस्ते गमिष्यामि मृदुनन्ती कुशकण्टकान्॥ ७॥

‘रघुनन्दन! यदि आप आज ही दुर्गम वन की ओर प्रस्थान कर रहे हैं तो मैं रास्ते के कुश और काँटों को कुचलती हुई आपके आगे-आगे चलूँगी॥७॥

ईर्ष्या रोषं बहिष्कृत्य भुक्तशेषमिवोदकम्।
नय मां वीर विस्रब्धः पापं मयि न विद्यते॥८॥

‘अतः वीर! आप ईर्ष्या और रोष को दूर करके पीने से बचे हुए जल की भाँति मुझे निःशङ्क होकर साथ ले चलिये। मुझमें ऐसा कोई पाप-अपराध नहीं है, जिसके कारण आप मुझे यहाँ त्याग दें॥८॥
१. स्त्री होकर यह वनमें जानेका साहस कैसे करती है ? इस विचारसे ईर्ष्या होती है।
२. यह मेरी बात नहीं मान रही है, यह सोचकर रोष प्रकट होता है। इन दोनों का त्याग अपेक्षित है।
३. जैसे किसी जलहीन बीहड़ पथ में लोग अपने पीने से बचे हुए पानी को साथ ले चलते हैं, उसी प्रकार मुझे भी आप साथ ले चलें—यह सीता का अनुरोध है।

प्रासादाग्रे विमानैर्वा वैहायसगतेन वा।
सर्वावस्थागता भर्तुः पादच्छाया विशिष्यते॥९॥

‘ऊँचे-ऊँचे महलों में रहना, विमानों पर चढ़कर घूमना अथवा अणिमा आदि सिद्धियों के द्वारा आकाश में विचरना—इन सबकी अपेक्षा स्त्री के लिये सभी अवस्थाओं में पति के चरणों की छाया में रहना विशेष महत्त्व रखता है॥९॥

अनुशिष्टास्मि मात्रा च पित्रा च विविधाश्रयम्।
नास्मि सम्प्रति वक्तव्या वर्तितव्यं यथा मया॥ १०॥

‘मुझे किसके साथ कैसा बर्ताव करना चाहिये, इस विषय में मेरी माता और पिता ने मुझे अनेक प्रकार से शिक्षा दी है। इस समय इसके विषय में मुझे कोई उपदेश देने की आवश्यकता नहीं है॥ १०॥

अहं दुर्गं गमिष्यामि वनं पुरुषवर्जितम्।
नानामृगगणाकीर्णं शार्दूलगणसेवितम्॥११॥

‘अतः नाना प्रकारके वन्य पशुओंसे व्याप्त तथा सिंहों और व्याघ्रोंसे सेवित उस निर्जन एवं दुर्गम | वनमें मैं अवश्य चलूँगी॥११॥

सुखं वने निवत्स्यामि यथैव भवने पितुः।
अचिन्तयन्ती त्रील्लोकांश्चिन्तयन्ती पतिव्रतम्॥

‘मैं तो जैसे अपने पिता के घर में रहती थी, उसी प्रकार उस वन में भी सुखपूर्वक निवास करूँगी। वहाँ तीनों लोकों के ऐश्वर्य को भी कुछ न समझती हुई मैं सदा पतिव्रत-धर्म का चिन्तन करती हुई आपकी सेवा में लगी रहूँगी॥ १२ ॥

शुश्रूषमाणा ते नित्यं नियता ब्रह्मचारिणी।
सह रंस्ये त्वया वीर वनेषु मधुगन्धिषु॥१३॥

‘वीर! नियमपूर्वक रहकर ब्रह्मचर्यव्रत का पालन करूँगी और सदा आपकी सेवा में तत्पर रहकर आपही के साथ मीठी-मीठी सुगन्ध से भरे हुए वनों में विचरूँगी॥ १३॥

त्वं हि कर्तुं वने शक्तो राम सम्परिपालनम्।
अन्यस्यापि जनस्येह किं पुनर्मम मानद ॥१४॥

‘दूसरों को मान देने वाले श्रीराम! आप तो वन में रहकर दूसरे लोगों की भी रक्षा कर सकते हैं, फिर मेरी रक्षा करना आपके लिये कौन बड़ी बात है?॥ १४॥

साहं त्वया गमिष्यामि वनमद्य न संशयः।
नाहं शक्या महाभाग निवर्तयितुमुद्यता॥१५॥

‘महाभाग! अतः मैं आपके साथ आज अवश्य वनमें चलूँगी। इसमें संशय नहीं है। मैं हर तरह चलनेको तैयार हूँ। मुझे किसी तरह भी रोका नहीं जा सकता ॥ १५॥

फलमूलाशना नित्यं भविष्यामि न संशयः।
न ते दुःखं करिष्यामि निवसन्ती त्वया सदा॥ १६॥

‘वहाँ चलकर मैं आपको कोई कष्ट नहीं दूंगी, सदा आपके साथ रहूँगी और प्रतिदिन फल-मूल खाकर ही निर्वाह करूँगी। मेरे इस कथनमें किसी प्रकारके संदेहके लिये स्थान नहीं है॥१६॥

अग्रतस्ते गमिष्यामि भोक्ष्ये भुक्तवति त्वयि।
इच्छामि परतः शैलान् पल्वलानि सरांसि च॥ १७॥
द्रष्टुं सर्वत्र निर्मीता त्वया नाथेन धीमता।

‘आपके आगे-आगे चलूँगी और आपके भोजन कर लेने पर जो कुछ बचेगा, उसे ही खाकर रहूँगी।प्रभो! मेरी बड़ी इच्छा है कि मैं आप बुद्धिमान् प्राणनाथ के साथ निर्भय हो वन में सर्वत्र घूमकर पर्वतों, छोटे-छोटे तालाबों और सरोवरों को देखू॥ १७ १/२॥

हंसकारण्डवाकीर्णाः पद्मिनीः साधुपुष्पिताः॥ १८॥
इच्छेयं सुखिनी द्रष्टुं त्वया वीरेण संगता।

‘आप मेरे वीर स्वामी हैं। मैं आपके साथ रहकर सुखपूर्वक उन सुन्दर सरोवरों की शोभा देखना चाहती हूँ, जो श्रेष्ठ कमलपुष्पों से सुशोभित हैं तथा जिनमें हंस और कारण्डव आदि पक्षी भरे रहते हैं॥ १८ १/२॥

अभिषेकं करिष्यामि तासु नित्यमनुव्रता॥१९॥
सह त्वया विशालाक्ष रंस्ये परमनन्दिनी।

‘विशाल नेत्रोंवाले आर्यपुत्र! आपके चरणों में अनुरक्त रहकर मैं प्रतिदिन उन सरोवरों में स्नान करूँगी और आपके साथ वहाँ सब ओर विचरूँगी, इससे मुझे परम आनन्द का अनुभव होगा॥ १९ १/२ ॥

एवं वर्षसहस्राणि शतं वापि त्वया सह ॥२०॥
व्यतिक्रमं न वेत्स्यामि स्वर्गोऽपि हि न मे मतः।

‘इस तरह सैकड़ों या हजारों वर्षों तक भी यदि आपके साथ रहने का सौभाग्य मिले तो मुझे कभी कष्ट का अनुभव नहीं होगा। यदि आप साथ न हों तो मुझे स्वर्गलोक की प्राप्ति भी अभीष्ट नहीं है॥ २० १/२॥

स्वर्गेऽपि च विना वासो भविता यदि राघव।
त्वया विना नरव्याघ्र नाहं तदपि रोचये॥२१॥

‘पुरुषसिंह रघुनन्दन! आपके बिना यदि मुझे स्वर्गलोक का निवास भी मिल रहा हो तो वह मेरे लिये रुचिकर नहीं हो सकता—मैं उसे लेना नहीं चाहूँगी॥ २१॥

अहं गमिष्यामि वनं सदर्गमं मृगायुतं वानरवारणैश्च।
वने निवत्स्यामि यथा पितुर्गृहे तवैव पादावुपगृह्य सम्मता॥२२॥

‘प्राणनाथ! अतः उस अत्यन्त दुर्गम वन में, जहाँ सहस्रों मृग, वानर और हाथी निवास करते हैं, मैं अवश्य चलूँगी और आपके ही चरणों की सेवा में रहकर आपके अनुकूल चलती हुई उस वन में उसी तरह सुख से रहूँगी, जैसे पिता के घर में रहा करती थी॥ २२॥

अनन्यभावामनुरक्तचेतसं त्वया वियुक्तां मरणाय निश्चिताम्।
नयस्व मां साधु कुरुष्व याचना नातो मया ते गुरुता भविष्यति ॥२३॥

‘मेरे हृदय का सम्पूर्ण प्रेम एकमात्र आपको ही अर्पित है, आपके सिवा और कहीं मेरा मन नहीं जाता, यदि आपसे वियोग हुआ तो निश्चय ही मेरी मृत्यु हो जायगी। इसलिये आप मेरी याचना सफल करें, मुझे साथ ले चलें, यही अच्छा होगा; मेरे रहने से आपपर कोई भार नहीं पड़ेगा’ ॥ २३॥

तथा ब्रुवाणामपि धर्मवत्सलां न च स्म सीतां नृवरो निनीषति।
उवाच चैनां बहु संनिवर्तने वने निवासस्य च दुःखितां प्रति॥२४॥

धर्म में अनुरक्त रहने वाली सीता के इस प्रकार प्रार्थना करने पर भी नरश्रेष्ठ श्रीराम को उन्हें साथ ले जाने की इच्छा नहीं हुई। वे उन्हें वनवास के विचार से निवृत्त करने के लिये वहाँ के कष्टों का अनेक प्रकार से विस्तारपूर्वक वर्णन करने लगे॥ २४॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे सप्तविंशः सर्गः ॥२७॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में सत्ताईसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ २७॥


अयोध्याकाण्डम्
अष्टाविंशः सर्गः (सर्ग 28)

( श्रीराम का वनवास के कष्ट का वर्णन करते हुए सीता को वहाँ चलने से मना करना )

स एवं ब्रुवतीं सीतां धर्मज्ञां धर्मवत्सलः।
न नेतुं कुरुते बुद्धिं वने दुःखानि चिन्तयन्॥१॥

धर्म को जानने वाली सीता के इस प्रकार कहने पर भी धर्मवत्सल श्रीराम ने वन में होने वाले दुःखों को सोचकर उन्हें साथ ले जाने का विचार नहीं किया॥१॥

सान्त्वयित्वा ततस्तां तु बाष्पदूषितलोचनाम्।
निवर्तनार्थे धर्मात्मा वाक्यमेतदुवाच ह॥२॥

सीता के नेत्रों में आँसू भरे हुए थे। धर्मात्मा श्रीराम उन्हें वनवास के विचार से निवृत्त करने के लिये सान्त्वना देते हुए इस प्रकार बोले- ॥२॥

सीते महाकुलीनासि धर्मे च निरता सदा।
इहाचरस्व धर्मं त्वं यथा मे मनसः सुखम्॥॥

‘सीते! तुम अत्यन्त उत्तम कुल में उत्पन्न हुई हो और सदा धर्म के आचरण में ही लगी रहती हो; अतःयहीं रहकर धर्म का पालन करो, जिससे मेरे मन को संतोष हो॥

सीते यथा त्वां वक्ष्यामि तथा कार्यं त्वयाबले।
वने दोषा हि बहवो वसतस्तान् निबोध मे॥४॥

‘सीते! मैं तुमसे जैसा कहूँ, वैसा ही करना तुम्हारा कर्तव्य है। तुम अबला हो, वन में निवास करने वाले मनुष्य को बहुत-से दोष प्राप्त होते हैं; उन्हें बता रहा हूँ, मुझसे सुनो॥४॥

सीते विमुच्यतामेषा वनवासकृता मतिः।
बहुदोषं हि कान्तारं वनमित्यभिधीयते॥५॥

‘सीते! वनवास के लिये चलने का यह विचार छोड़ दो, वन को अनेक प्रकार के दोषों से व्याप्त और दुर्गम बताया जाता है॥५॥

हितबुद्ध्या खलु वचो मयैतदभिधीयते।
सदा सुखं न जानामि दुःखमेव सदा वनम्॥६॥

‘तुम्हारे हित की भावना से ही मैं ये सब बातें कह रहा हूँ। जहाँ तक मेरी जानकारी है, वन में सदा सुख नहीं मिलता। वहाँ तो सदा दुःख ही मिला करता है। ६॥

गिरिनिर्झरसम्भूता गिरिनिर्दरिवासिनाम्।
सिंहानां निनदा दुःखाः श्रोतुं दुःखमतो वनम्॥ ७॥

‘पर्वतों से गिरने वाले झरनों के शब्द को सुनकर उन पर्वतों की कन्दराओं में रहने वाले सिंह दहाड़ने लगते हैं। उनकी वह गर्जना सुनने में बड़ी दुःखदायिनी प्रतीत होती है, इसलिये वन दुःखमय ही है॥ ७॥

क्रीडमानाश्च विस्रब्धा मत्ताः शून्ये तथा मृगाः।
दृष्ट्वा समभिवर्तन्ते सीते दुःखमतो वनम्॥८॥

‘सीते! सूने वन में निर्भय होकर क्रीड़ा करने वाले मतवाले जंगली पशु मनुष्य को देखते ही उस पर चारों ओर से टूट पड़ते हैं; अतः वन दुःख से भरा हुआ है।

सग्राहाः सरितश्चैव पङ्कवत्यस्तु दुस्तराः।
मत्तैरपि गजैर्नित्यमतो दुःखतरं वनम्॥९॥

‘वन में जो नदियाँ होती हैं, उनके भीतर ग्राह निवास करते हैं, उनमें कीचड़ अधिक होने के कारण उन्हें पार करना अत्यन्त कठिन होता है। इसके सिवा वन में मतवाले हाथी सदा घूमते रहते हैं। इस सब कारणों से वन बहुत ही दुःखदायक होता है॥९॥

लताकण्टकसंकीर्णाः कृकवाकूपनादिताः।
निरपाश्च सुदुःखाश्च मार्गा दुःखमतो वनम्॥ १०॥

‘वन के मार्ग लताओं और काँटों से भरे रहते हैं। वहाँ जंगली मुर्गे बोला करते हैं, उन मार्गों पर चलने में बड़ा कष्ट होता है तथा वहाँ आस-पास जल नहीं मिलता, इससे वन में दुःख-ही-दुःख है॥ १० ॥

सुप्यते पर्णशय्यासु स्वयंभग्नासु भूतले।
रात्रिषु श्रमखिन्नेन तस्माद् दुःखमतो वनम्॥ ११॥

‘दिनभर के परिश्रम से थके-माँदे मनुष्य को रात में जमीन के ऊपर अपने-आप गिरे हुए सूखे पत्तों के बिछौने पर सोना पड़ता है, अतः वन दुःख से भरा हुआ है॥ ११॥

अहोरात्रं च संतोषः कर्तव्यो नियतात्मना।
फलैर्वृक्षावपतितैः सीते दुःखमतो वनम्॥१२॥

‘सीते! वहाँ मन को वश में रखकर वृक्षों से स्वतः गिरे हुए फलों के आहार पर ही दिन-रात संतोष करना पड़ता है, अतः वन दुःख देने वाला ही है॥ १२ ॥

उपवासश्च कर्तव्यो यथा प्राणेन मैथिलि।
जटाभारश्च कर्तव्यो वल्कलाम्बरधारणम्॥ १३॥

‘मिथिलेशकुमारी! अपनी शक्तिके अनुसार उपवास करना, सिरपर जटाका भार ढोना और वल्कल वस्त्र धारण करना—यही वहाँकी जीवनशैली है॥ १३ ॥

देवतानां पितॄणां च कर्तव्यं विधिपूर्वकम्।
प्राप्तानामतिथीनां च नित्यशः प्रतिपूजनम्॥ १४॥

‘देवताओं का, पितरों का तथा आये हुए अतिथियों का प्रतिदिन शास्त्रोक्तविधि के अनुसार पूजन करना—यह वनवासी का प्रधान कर्तव्य है॥ १४ ॥

कार्यस्त्रिरभिषेकश्च काले काले च नित्यशः।
चरतां नियमेनैव तस्माद् दुःखतरं वनम्॥१५॥

‘वनवासी को प्रतिदिन नियमपूर्वक तीनों समय स्नान करना होता है। इसलिये वन बहुत ही कष्ट देनेवाला है।

उपहारश्च कर्तव्यः कुसुमैः स्वयमाहृतैः।
आर्षेण विधिना वेद्यां सीते दुःखमतो वनम्॥ १६॥

‘सीते! वहाँ स्वयं चुनकर लाये हुए फूलों द्वारा वेदोक्त विधि से वेदी पर देवताओं की पूजा करनी पड़ती है। इसलिये वन को कष्टप्रद कहा गया है।॥ १६॥

यथालब्धेन कर्तव्यः संतोषस्तेन मैथिलि।
यताहारैर्वनचरैः सीते दुःखमतो वनम्॥१७॥

‘मिथिलेशकुमारी जानकी! वनवासियों को जबजैसा आहार मिल जाय उसी पर संतोष करना पड़ता है; अतः वन दुःखरूप ही है॥ १७॥

अतीव वातस्तिमिरं बुभुक्षा चाति नित्यशः।
भयानि च महान्त्यत्र ततो दुःखतरं वनम्॥१८॥

‘वन में प्रचण्ड आँधी, घोर अन्धकार, प्रतिदिन भूख का कष्ट तथा और भी बड़े-बड़े भय प्राप्त होते हैं, अतः वन अत्यन्त कष्टप्रद है॥ १८॥

सरीसृपाश्च बहवो बहुरूपाश्च भामिनि।
चरन्ति पथि ते दर्पात् ततो दुःखतरं वनम्॥१९॥

‘भामिनि! वहाँ बहुत-से पहाड़ी सर्प, जो अनेक प्रकार के रूपवाले होते हैं, दर्पवश बीच रास्ते में विचरते रहते हैं; अतः वन अत्यन्त कष्टदायक है। १९॥

नदीनिलयनाः सर्पा नदीकुटिलगामिनः।
तिष्ठन्त्यावृत्य पन्थानमतो दुःखतरं वनम्॥२०॥

‘जो नदियों में निवास करते और नदियों के समान ही कुटिल गति से चलते हैं, ऐसे बहुसंख्यक सर्प वन में रास्ते को घेरकर पड़े रहते हैं; इसलिये वन बहुत ही कष्टदायक है॥ २०॥

पतङ्गा वृश्चिकाः कीटा दंशाश्च मशकैः सह।
बाधन्ते नित्यमबले सर्वं दुःखमतो वनम्॥ २१॥

‘अबले! पतंगे, बिच्छू, कीड़े, डाँस और मच्छर वहाँ सदा कष्ट पहुँचाते रहते हैं; अतः सारा वन दुःखरूप ही है॥ २१॥

द्रुमाः कण्टकिनश्चैव कुशाः काशाश्च भामिनि।
वने व्याकुलशाखाग्रास्तेन दुःखमतो वनम्॥ २२॥

‘भामिनि! वन में काँटेदार वृक्ष, कुश और कास होते हैं, जिनकी शाखाओं के अग्रभाग सब ओर फैले हुए होते हैं; इसलिये वन विशेष कष्टदायक होता है। २२॥

कायक्लेशाश्च बहवो भयानि विविधानि च।
अरण्यवासे वसतो दुःखमेव सदा वनम्॥२३॥

‘वनमें निवास करने वाले मनुष्य को बहुत-से शारीरिक क्लेशों और नाना प्रकार के भयों का सामना करना पड़ता है, अतः वन सदा दुःखरूप ही होता है।॥ २३॥

क्रोधलोभौ विमोक्तव्यौ कर्तव्या तपसे मतिः।
न भेतव्यं च भेतव्ये दुःखं नित्यमतो वनम्॥ २४॥

‘वहाँ क्रोध और लोभ को त्याग देना होता है, तपस्या में मन लगाना पड़ता है और जहाँ भय का स्थान है, वहाँ भी भयभीत न होने की आवश्यकता होती है; अतः वन में सदा दुःख-ही-दुःख है॥ २४॥

तदलं ते वनं गत्वा क्षेमं नहि वनं तव।।
विमृशन्निव पश्यामि बहुदोषकरं वनम्॥२५॥

‘इसलिये तुम्हारा वन में जाना ठीक नहीं है। वहाँ जाकर तुम सकुशल नहीं रह सकती। मैं बहुत सोच विचारकर देखता और समझता हूँ कि वन में रहना अनेक दोषों का उत्पादक बहुत ही कष्टदायक है। २५॥

वनं तु नेतुं न कृता मतिर्यदा बभूव रामेण तदा महात्मना।
न तस्य सीता वचनं चकार तं ततोऽब्रवीद् राममिदं सुदुःखिता॥२६॥

जब महात्मा श्रीराम ने उस समय सीता को वन में ले जाने का विचार नहीं किया, तब सीता ने भी उनकी उस बात को नहीं माना। वे अत्यन्त दुःखी होकर श्रीराम से इस प्रकार बोलीं॥२६॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डेऽष्टाविंशः सर्गः ॥२८॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में अट्ठाईसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥२८॥


अयोध्याकाण्डम्
एकोनत्रिंशः सर्गः (सर्ग 29)

( सीता का श्रीराम के समक्ष उनके साथ अपने वनगमन का औचित्य बताना )

एतत् तु वचनं श्रुत्वा सीता रामस्य दुःखिता।
प्रसक्ताश्रुमुखी मन्दमिदं वचनमब्रवीत्॥१॥

श्रीरामचन्द्रजी की यह बात सुनकर सीता को बड़ा दुःख हुआ, उनके मुख पर आँसुओं की धारा बह चली और वे धीरे-धीरे इस प्रकार कहने लगीं- ॥१॥

ये त्वया कीर्तिता दोषा वने वस्तव्यतां प्रति।
गुणानित्येव तान् विद्धि तव स्नेहपुरस्कृता॥२॥

‘प्राणनाथ! आपने वन में रहने के जो-जो दोष बताये हैं, वे सब आपका स्नेह पाकर मेरे लिये गुणरूप हो जायँगे। इस बात को आप अच्छी तरह समझ लें॥

मृगाः सिंहा गजाश्चैव शार्दूलाः शरभास्तथा।
चमराः सृमराश्चैव ये चान्ये वनचारिणः॥३॥
अदृष्टपूर्वरूपत्वात् सर्वे ते तव राघव।
रूपं दृष्ट्वापसपैयुस्तव सर्वे हि बिभ्यति॥४॥

‘रघुनन्दन! मृग, सिंह, हाथी, शेर, शरभ. चमरी गाय, नीलगाय तथा जो अन्य जंगली जीव हैं, वे सब-के-सब आपका रूप देखकर भाग जायँगे; क्योंकि ऐसा प्रभावशाली स्वरूप उन्होंने पहले कभी नहीं देखा होगा। आपसे तो सभी डरते हैं; फिर वे पशु क्यों नहीं डरेंगे? ॥ ३-४॥

त्वया च सह गन्तव्यं मया गुरुजनाज्ञया।
त्वद्वियोगेन मे राम त्यक्तव्यमिह जीवितम्॥५॥

‘श्रीराम! मुझे गुरुजनों की आज्ञा से निश्चय ही आपके साथ चलना है; क्योंकि आपका वियोग हो जाने पर मैं यहाँ अपने जीवन का परित्याग कर दूँगी॥

नहि मां त्वत्समीपस्थामपि शक्रोऽपि राघव।
सुराणामीश्वरः शक्तः प्रधर्षयितुमोजसा॥६॥

‘रघुनाथजी! आपके समीप रहने पर देवताओं के राजा इन्द्र भी बलपूर्वक मेरा तिरस्कार नहीं कर सकते॥६॥

पतिहीना तु या नारी न सा शक्ष्यति जीवितुम्।
काममेवंविधं राम त्वया मम निदर्शितम्॥७॥

श्रीराम ! पतिव्रता स्त्री अपने पति से वियोग होने पर जीवित नहीं रह सकेगी; ऐसी बात आपने भी मुझे भलीभाँति दर्शायी है॥७॥

अथापि च महाप्राज्ञ ब्राह्मणानां मया श्रुतम्।
पुरा पितृगृहे सत्यं वस्तव्यं किल मे वने॥८॥

‘महाप्राज्ञ! यद्यपि वन में दोष और दुःख ही भरे हैं, तथापि अपने पिता के घर पर रहते समय मैं ब्राह्मणों के मुख से पहले यह बात सुन चुकी हूँ कि ‘मुझे अवश्य ही वन में रहना पड़ेगा’ यह बात मेरे जीवन में सत्य होकर रहेगी॥८॥

लक्षणिभ्यो द्विजातिभ्यः श्रुत्वाहं वचनं गृहे।
वनवासकृतोत्साहा नित्यमेव महाबल॥९॥

‘महाबली वीर! हस्तरेखा देखकर भविष्य की बातें जान लेने वाले ब्राह्मणों के मुख से अपने घर पर ऐसी बात सुनकर मैं सदा ही वनवास के लिये उत्साहित रहती हूँ॥

आदेशो वनवासस्य प्राप्तव्यः स मया किल।
सा त्वया सह भाहं यास्यामि प्रिय नान्यथा॥ १०॥

‘प्रियतम! ब्राह्मण से ज्ञात हुआ वन में रहने का आदेश एक-न-एक दिन मुझे पूरा करना ही पड़ेगा, यह किसी तरह पलट नहीं सकता। अतः मैं अपने स्वामी आपके साथ वन में अवश्य चलूँगी॥ १० ॥

कृतादेशा भविष्यामि गमिष्यामि त्वया सह।
कालश्चायं समुत्पन्नः सत्यवान् भवतु द्विजः॥ ११॥

‘ऐसा होने से मैं उस भाग्य के विधान को भोग लूंगी। उसके लिये यह समय आ गया है, अतः आपके साथ मुझे चलना ही है; इससे उस ब्राह्मण की बात भी सच्ची हो जायगी॥ ११॥

वनवासे हि जानामि दुःखानि बहुधा किल।
प्राप्यन्ते नियतं वीर पुरुषैरकृतात्मभिः॥१२॥

‘वीर! मैं जानती हूँ कि वनवास में अवश्य ही बहुत-से दुःख प्राप्त होते हैं; परंतु वे उन्हीं को दुःख जान पड़ते हैं, जिनकी इन्द्रियाँ और मन अपने वश में नहीं हैं ॥ १२॥

कन्यया च पितुर्गेहे वनवासः श्रुतो मया।
भिक्षिण्याः शमवृत्ताया मम मातुरिहाग्रतः॥१३॥

‘पिता के घर पर कुमारी अवस्था में एक शान्तिपरायणा भिक्षुकी के मुख से भी मैंने अपने वनवास की बात सुनी थी। उसने मेरी माता के सामने ही ऐसी बात कही थी॥

प्रसादितश्च वै पूर्वं त्वं मे बहुतिथं प्रभो।
गमनं वनवासस्य कांक्षितं हि सह त्वया॥१४॥

‘प्रभो! यहाँ आने पर भी मैंने पहले ही कई बार आपसे कुछ कालतक वन में रहने के लिये प्रार्थना की थी और आपको राजी भी कर लिया था। इससे आप निश्चितरूप से जान लें कि आपके साथ वन को चलना मुझे पहले से ही अभीष्ट है॥ १४ ॥

कृतक्षणाहं भद्रं ते गमनं प्रति राघव।
वनवासस्य शूरस्य मम चर्या हि रोचते॥१५॥

‘रघुनन्दन! आपका भला हो। मैं वहाँ चलने के लिये पहले से ही आपकी अनुमति प्राप्त कर चुकी हूँ। अपने शूरवीर वनवासी पति की सेवा करना मेरे लिये अधिक रुचिकर है॥ १५ ॥

शुद्धात्मन् प्रेमभावाद्धि भविष्यामि विकल्मषा।
भर्तारमनुगच्छन्ती भर्ता हि परदैवतम्॥१६॥

‘शुद्धात्मन्! आप मेरे स्वामी हैं, आपके पीछे प्रेमभाव से वन में जाने पर मेरे पाप दूर हो जायेंगे; क्योंकि स्वामी ही स्त्री के लिये सबसे बड़ा देवता है॥ १६॥

प्रेत्यभावे हि कल्याणः संगमो मे सदा त्वया।
श्रुतिर्हि श्रूयते पुण्या ब्राह्मणानां यशस्विनाम्॥ १७॥

‘आपके अनुगमन से परलोक में भी मेरा कल्याण होगा और सदा आपके साथ मेरा संयोग बना रहेगा। इस विषय में यशस्वी ब्राह्मणों के मुख से एक पवित्र – श्रुति सुनी जाती है (जो इस प्रकार है-)॥१७॥

इहलोके च पितृभिर्या स्त्री यस्य महाबल।
अद्भिर्दत्ता स्वधर्मेण प्रेत्यभावेऽपि तस्य सा॥ १८॥

‘महाबली वीर! इस लोक में पिता आदि के द्वारा जो कन्या जिस पुरुष को अपने धर्म के अनुसार जल से संकल्प करके दे दी जाती है, वह मरने के बाद परलोक में भी उसी की स्त्री होती है॥ १८॥

एवमस्मात् स्वकां नारी सुवृत्तां हि पतिव्रताम्।
नाभिरोचयसे नेतुं त्वं मां केनेह हेतुना ॥१९॥

‘मैं आपकी धर्मपत्नी हूँ, उत्तम व्रत का पालन करने वाली और पतिव्रता हूँ, फिर क्या कारण है कि आप मुझे यहाँ से अपने साथ ले चलना नहीं चाहतेहैं।॥ १९॥

भक्तां पतिव्रतां दीनां मां समां सुखदुःखयोः।
नेतुमर्हसि काकुत्स्थ समानसुखदुःखिनीम्॥२०॥

‘ककुत्स्थकुलभूषण! मैं आपकी भक्त हूँ, पातिव्रत्य का पालन करती हूँ, आपके बिछोह के भय से दीन हो रही हूँ तथा आपके सुख-दुःख में समान रूप से हाथ बँटाने वाली हूँ। मुझे सुख मिले या दुःख, मैं दोनों अवस्थाओं में सम रहूँगी हर्ष या शोक के वशीभूत नहीं होऊँगी। अतः आप अवश्य ही मुझे साथ ले चलने की कृपा करें॥ २०॥

यदि मां दुःखितामेवं वनं नेतुं न चेच्छसि।
विषमग्निं जलं वाहमास्थास्ये मृत्युकारणात्॥ २१॥

‘यदि आप इस प्रकार दुःख में पड़ी हुई मुझ सेविका को अपने साथ वन में ले जाना नहीं चाहते हैं तो मैं मृत्यु के लिये विष खा लूँगी, आगमें कूद पडूंगी अथवा जल में डूब जाऊँगी’ ॥ २१॥

एवं बहुविधं तं सा याचते गमनं प्रति।
नानुमेने महाबाहुस्तां नेतुं विजनं वनम्॥ २२॥

इस तरह अनेक प्रकार से सीताजी वन में जाने के लिये याचना कर रही थीं तथापि महाबाहु श्रीराम ने उन्हें अपने साथ निर्जन वन में ले जाने की अनुमति नहीं दी।

एवमुक्ता तु सा चिन्तां मैथिली समुपागता।
स्नापयन्तीव गामुष्णैरश्रुभिर्नयनच्युतैः॥२३॥

इस प्रकार उनके अस्वीकार कर देने पर मिथिलेशकुमारी सीता को बड़ी चिन्ता हुई और वे अपने नेत्रों से गरम-गरम आँसू बहाकर धरती को भिगोने-सी लगीं॥ २३॥

चिन्तयन्तीं तदा तां तु निवर्तयितुमात्मवान्।
क्रोधाविष्टां तु वैदेहीं काकुत्स्थो बह्वसान्त्वयत्॥ २४॥

उस समय विदेहनन्दिनी जानकी को चिन्तित और कुपित देख मन को वश में रखने वाले श्रीरामचन्द्रजी ने उन्हें वनवास के विचार से निवृत्त करने के लिये भाँति
भाँति की बातें कहकर समझाया॥ २४ ॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे एकोनत्रिंशः सर्गः ॥२९॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में उनतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥२९॥


अयोध्याकाण्डम्
त्रिंशः सर्गः (सर्ग 30)

( सीता का वन में चलने के लिये अधिकआग्रह, विलाप और घबराहट देखकर श्रीराम का उन्हें साथ ले चलने की स्वीकृति देना )

सान्त्व्यमाना तु रामेण मैथिली जनकात्मजा।
वनवासनिमित्तार्थं भर्तारमिदमब्रवीत्॥१॥

श्रीराम के समझाने पर मिथिलेशकुमारी जानकी वनवास की आज्ञा प्राप्त करने के लिये अपने पति से फिर इस प्रकार बोलीं॥१॥

सा तमुत्तमसंविग्ना सीता विपुलवक्षसम्।
प्रणयाच्चाभिमानाच्च परिचिक्षेप राघवम्॥२॥

सीता अत्यन्त डरी हुई थीं। वे प्रेम और स्वाभिमान के कारण विशाल वक्षःस्थलवाले श्रीरामचन्द्रजी पर आक्षेप-सा करती हुई कहने लगीं – ॥२॥

किं त्वामन्यत वैदेहः पिता मे मिथिलाधिपः।
राम जामातरं प्राप्य स्त्रियं पुरुषविग्रहम्॥३॥

‘श्रीराम! क्या मेरे पिता मिथिलानरेश विदेहराज जनक ने आपको जामाता के रूप में पाकर कभी यह भी समझा था कि आप केवल शरीर से ही पुरुष हैं; कार्यकलाप से तो स्त्री ही हैं॥३॥

अनृतं बत लोकोऽयमज्ञानाद् यदि वक्ष्यति।
तेजो नास्ति परं रामे तपतीव दिवाकरे॥४॥

‘नाथ! आपके मुझे छोड़कर चले जानेपर संसारके लोग अज्ञानवश यदि यह कहने लगें कि सूर्यके समान तपनेवाले श्रीरामचन्द्रमें तेज और पराक्रमका अभाव है तो उनकी यह असत्य धारणा मेरे लिये कितने दुःखकी बात होगी॥ ४॥

किं हि कृत्वा विषण्णस्त्वं कुतो वा भयमस्ति ते।
यत् परित्यक्तुकामस्त्वं मामनन्यपरायणाम्॥५॥

‘आप क्या सोचकर विषादमें पड़े हुए हैं अथवा किससे आपको भय हो रहा है, जिसके कारण आप अपनी पत्नी मुझ सीताका, जो एकमात्र आपके ही आश्रित है, परित्याग करना चाहते हैं॥ ५॥

धुमत्सेनसुतं वीरं सत्यवन्तमनुव्रताम्।
सावित्रीमिव मां विद्धि त्वमात्मवशवर्तिनीम्॥ ६॥

‘जैसे सावित्री धुमत्सेनकुमार वीरवर सत्यवान् की ही अनुगामिनी थी, उसी प्रकार आप मुझे भी अपनी ही आज्ञा के अधीन समझिये॥६॥

न त्वहं मनसा त्वन्यं द्रष्टास्मि त्वदृतेऽनघ।
त्वया राघव गच्छेयं यथान्या कुलपांसनी॥७॥

‘निष्पाप रघुनन्दन! जैसी दूसरी कोई कुलकलङ्किनी स्त्री परपुरुष पर दृष्टि रखती है, वैसी मैं नहीं हूँ। मैं तो आपके सिवा किसी दूसरे पुरुष को मन से भी नहीं देख सकती। इसलिये आपके साथ ही चलूँगी (आपके बिना अकेली यहाँ नहीं रहूँगी)॥ ७॥

स्वयं तु भार्यां कौमारी चिरमध्युषितां सतीम्।
शैलूष इव मां राम परेभ्यो दातुमिच्छसि॥८॥

‘श्रीराम! जिसका कुमारावस्था में ही आपके साथ विवाह हुआ है और जो चिरकाल तक आपके साथ रह चुकी है, उसी मुझ अपनी सती-साध्वी पत्नी को आप औरत की कमाई खाने वाले नट की भाँति दूसरों के हाथ में सौंपना चाहते हैं? ॥ ८॥

यस्य पथ्यंचरामात्थ यस्य चार्थेऽवरुध्यसे।
त्वं तस्य भव वश्यश्च विधेयश्च सदानघ॥९॥

‘निष्पाप रघुनन्दन! आप मुझे जिसके अनुकूल चलने की शिक्षा दे रहे हैं और जिसके लिये आपका राज्याभिषेक रोक दिया गया है, उस भरत के सदा ही वशवर्ती और आज्ञापालक बनकर आप ही रहिये, मैं नहीं रहूँगी॥९॥

स मामनादाय वनं न त्वं प्रस्थितमर्हसि।
तपो वा यदि वारण्यं स्वर्गो वा स्यात् त्वया सह॥ १०॥

‘इसलिये आपका मुझे अपने साथ लिये बिना वन की ओर प्रस्थान करना उचित नहीं है। यदि तपस्या करनी हो, वन में रहना हो अथवा स्वर्ग में जाना हो तो सभी जगह मैं आपके साथ रहना चाहती हूँ॥ १०॥

न च मे भविता तत्र कश्चित् पथि परिश्रमः।
पृष्ठतस्तव गच्छन्त्या विहारशयनेष्विव॥११॥

‘जैसे बगीचे में घूमने और पलंग पर सोने में कोई कष्ट नहीं होता, उसी प्रकार आपके पीछे-पीछे वन के मार्ग पर चलने में भी मुझे कोई परिश्रम नहीं जान पड़ेगा।

कुशकाशशरेषीका ये च कण्टकिनो द्रुमाः।
तूलाजिनसमस्पर्शा मार्गे मम सह त्वया॥१२॥

‘रास्ते में जो कुश-कास, सरकंडे, सींक और काँटेदार वृक्ष मिलेंगे, उनका स्पर्श मुझे आपके साथ रहने से रूई और मृगचर्म के समान सुखद प्रतीत होगा॥

महावातसमुद्भूतं यन्मामवकरिष्यति।
रजो रमण तन्मन्ये परार्घ्यमिव चन्दनम्॥१३॥

‘प्राणवल्लभ! प्रचण्ड आँधी से उड़कर मेरे शरीर पर जो धूल पड़ेगी, उसे मैं उत्तम चन्दन के समान समशृंगी॥

शाद्रलेषु यदा शिश्ये वनान्तर्वनगोचरा।
कुथास्तरणयुक्तेषु किं स्यात् सुखतरं ततः॥१४॥

‘जब वन के भीतर रहँगी, तब आपके साथ घासों पर भी सो लूँगी। रंग-बिरंगे कालीनों और मुलायम बिछौनों से युक्त पलंगों पर क्या उससे अधिक सुख हो सकता है ? ॥ १४॥

पत्रं मूलं फलं यत्तु अल्पं वा यदि वा बहु।
दास्यसे स्वयमाहृत्य तन्मेऽमृतरसोपमम्॥१५॥

‘आप अपने हाथ से लाकर थोड़ा या बहुत फल, मूल या पत्ता, जो कुछ दे देंगे, वही मेरे लिये अमृत रस के समान होगा॥ १५ ॥

न मातुर्न पितुस्तत्र स्मरिष्यामि न वेश्मनः।
आर्तवान्युपभुजाना पुष्पाणि च फलानि च। १६॥

‘ऋतु के अनुकूल जो भी फल-फूल प्राप्त होंगे, उन्हें खाकर रहँगी और माता-पिता अथवा महल को कभी याद नहीं करूँगी॥१६॥

न च तत्र ततः किंचिद् द्रष्टमर्हसि विप्रियम्।
मत्कृते न च ते शोको न भविष्यामि दुर्भरा॥ १७॥

‘वहाँ रहते समय मेरा कोई भी प्रतिकूल व्यवहार आप नहीं देख सकेंगे। मेरे लिये आपको कोई कष्ट नहीं उठाना पड़ेगा। मेरा निर्वाह आपके लिये दूभर नहीं होगा॥ १७ ॥

यस्त्वया सह स स्वर्गो निरयो यस्त्वया विना।
इति जानन् परां प्रीतिं गच्छ राम मया सह ॥ १८॥

‘आपके साथ जहाँ भी रहना पड़े, वही मेरे लिये स्वर्ग है और आपके बिना जो कोई भी स्थान हो, वह मेरे लिये नरक के समान है। श्रीराम! मेरे इस निश्चय को जानकर आप मेरे साथ अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक वनको चलें॥ १८॥

अथ मामेवमव्यग्रां वनं नैव नयिष्यसे।
विषमद्यैव पास्यामि मा वशं द्विषतां गमम्॥ १९॥

‘मुझे वनवास के कष्ट से कोई घबराहट नहीं है। यदि इस दशा में भी आप अपने साथ मुझे वन में नहीं ले चलेंगे तो मैं आज ही विष पी लूँगी, परंतु शत्रुओं के अधीन होकर नहीं रहूँगी॥ १९॥

पश्चादपि हि दुःखेन मम नैवास्ति जीवितम्।
उज्झितायास्त्वया नाथ तदैव मरणं वरम्॥२०॥

नाथ! यदि आप मुझे त्यागकर वन को चले जायँगे तो पीछे भी इस भारी दुःख के कारण मेरा जीवित रहना सम्भव नहीं है; ऐसी दशा में मैं इसी समय आपके जाते ही अपना प्राण त्याग देना अच्छा समझती हूँ॥ २०॥

इमं हि सहितुं शोकं मुहूर्तमपि नोत्सहे।
किं पुनर्दश वर्षाणि त्रीणि चैकं च दुःखिता॥ २१॥

‘आपके विरह का यह शोक मैं दो घड़ी भी नहीं सह सकूँगी। फिर मुझ दुःखिया से यह चौदह वर्षों तक कैसे सहा जायगा?’ ॥ २१॥

इति सा शोकसंतप्ता विलप्य करुणं बह।
चुक्रोश पतिमायस्ता भृशमालिङ्ग्य सस्वरम्॥ २२॥

इस प्रकार बहुत देरतक करुणाजनक विलाप करके शोक से संतप्त हुई सीता शिथिल हो अपने पति को जोर से पकड़कर उनका गाढ़ आलिङ्गन करके फूट-फूटकर रोने लगीं ॥ २२ ॥

सा विद्धा बहुभिर्वाक्यैर्दिग्धैरिव गजाङ्गना।
चिरसंनियतं बाष्पं मुमोचाग्निमिवारणिः॥२३॥

जैसे कोई हथिनी विष में बुझे हुए बहुसंख्यक बाणों द्वारा घायल कर दी गयी हो, उसी प्रकार सीता श्रीरामचन्द्रजी के पूर्वोक्त अनेकानेक वचनों द्वारा मर्माहत हो उठी थीं; अतः जैसे अरणी आग प्रकट करती है, उसी प्रकार वे बहुत देर से रोके हुए आँसुओं को बरसाने लगीं॥ २३॥

तस्याः स्फटिकसंकाशं वारि संतापसम्भवम्।
नेत्राभ्यां परिसुस्राव पङ्कजाभ्यामिवोदकम्॥ २४॥

उनके दोनों नेत्रों से स्फटिक के समान निर्मल संतापजनित अश्रुजल झर रहा था, मानो दो कमलों से जलकी धारा गिर रही हो॥२४॥

तत्सितामलचन्द्राभं मुखमायतलोचनम्।
पर्यशुष्यत बाष्पेण जलोद्धृतमिवाम्बुजम्॥२५॥

बड़े-बड़े नेत्रों से सुशोभित और पूर्णिमा के निर्मल चन्द्रमा के समान कान्तिमान् उनका वह मनोहर मुख संतापजनित ताप के कारण पानी से बाहर निकाले हुए कमल के समान सूख-सा गया था॥ २५ ॥

तां परिष्वज्य बाहुभ्यां विसंज्ञामिव दुःखिताम्।
उवाच वचनं रामः परिविश्वासयंस्तदा ॥२६॥

सीताजी दुःख के मारे अचेत-सी हो रही थीं। श्रीरामचन्द्रजी ने उन्हें दोनों हाथों से सँभालकर हृदय से लगा लिया और उस समय उन्हें सान्त्वना देते हुए कहा- ॥२६॥

न देवि बत दुःखेन स्वर्गमप्यभिरोचये।
नहि मेऽस्ति भयं किंचित् स्वयम्भोरिव सर्वतः॥ २७॥

‘देवि! तुम्हें दुःख देकर मुझे स्वर्ग का सुख मिलताहो तो मैं उसे भी लेना नहीं चाहूँगा। स्वयम्भू ब्रह्माजी की भाँति मुझे किसी से किञ्चित् भी भय नहीं है॥ २७॥

तव सर्वमभिप्रायमविज्ञाय शुभानने।
वासं न रोचयेऽरण्ये शक्तिमानपि रक्षणे॥२८॥

‘शुभानने! यद्यपि वन में तुम्हारी रक्षा करने के लिये मैं सर्वथा समर्थ हूँ तो भी तुम्हारे हार्दिक अभिप्राय को पूर्णरूप से जाने बिना तुमको वनवासिनी बनाना मैं उचित नहीं समझता था॥२८॥

यत् सृष्टासि मया सार्धं वनवासाय मैथिलि।
न विहातुं मया शक्या प्रीतिरात्मवता यथा॥ २९॥

‘मिथिलेशकुमारी! जब तुम मेरे साथ वन में रहने के लिये ही उत्पन्न हुई हो तो मैं तुम्हें छोड़ नहीं सकता, ठीक उसी तरह जैसे आत्मज्ञानी पुरुष अपनी स्वाभाविक प्रसन्नता का त्याग नहीं करते ॥ २९ ॥

धर्मस्तु गजनासोरु सद्भिराचरितः पुरा।
तं चाहमनुवर्तिष्ये यथा सूर्यं सुवर्चला ॥ ३०॥

‘हाथी की ढूँड़ के समान जाँघ वाली जनककिशोरी! पूर्वकाल के सत्पुरुषों ने अपनी पत्नी के साथ रहकर जिस धर्म का आचरण किया था, उसीका मैं भी तुम्हारे साथ रहकर अनुसरण करूँगा तथा जैसे सुवर्चला (संज्ञा) अपने पति सूर्य का अनुगमन करती है, उसी प्रकार तुम भी मेरा अनुसरण करो॥३०॥

न खल्वहं न गच्छेयं वनं जनकनन्दिनि।
वचनं तन्नयति मां पितुः सत्योपबृंहितम्॥३१॥

‘जनकनन्दिनि! यह तो किसी प्रकार सम्भव ही नहीं है कि मैं वन को न जाऊँ; क्योंकि पिताजी का वह सत्ययुक्त वचन ही मुझे वन की ओर ले जा रहा है।

एष धर्मश्च सुश्रोणि पितुर्मातुश्च वश्यता।
आज्ञां चाहं व्यतिक्रम्य नाहं जीवितुमुत्सहे॥ ३२॥

‘सुश्रोणि! पिता और माता की आज्ञा के अधीन रहना पुत् रका धर्म है, इसलिये मैं उनकी आज्ञाका उल्लङ्घन करके जीवित नहीं रह सकता॥ ३२ ॥

अस्वाधीनं कथं दैवं प्रकारैरभिराध्यते।
स्वाधीनं समतिक्रम्य मातरं पितरं गुरुम्॥३३॥

‘जो अपनी सेवा के अधीन हैं, उन प्रत्यक्ष देवता माता, पिता एवं गुरु का उल्लङ्घन करके जो सेवा के अधीन नहीं है, उस अप्रत्यक्ष देवता दैव की विभिन्न प्रकार से किस तरह आराधना की जा सकती है। ३३॥

यत्र त्रयं त्रयो लोकाः पवित्रं तत्समं भुवि।
नान्यदस्ति शुभापाले तेनेदमभिराध्यते॥३४॥

‘सुन्दर नेत्रप्रान्तवाली सीते! जिनकी आराधना करने पर धर्म, अर्थ और काम तीनों प्राप्त होते हैं तथा तीनों लोकों की आराधना सम्पन्न हो जाती है, उन माता, पिता और गुरु के समान दूसरा कोई पवित्र देवता इस भूतल पर नहीं है। इसीलिये भूतल के निवासी इन तीनों देवताओं की आराधना करते हैं। ३४॥

न सत्यं दानमानौ वा यज्ञो वाप्याप्तदक्षिणाः।
तथा बलकराः सीते यथा सेवा पितुर्मता॥ ३५॥

‘सीते! पिताकी सेवा करना कल्याण की प्राप्ति का जैसा प्रबल साधन माना गया है, वैसा न सत्य है, न दान है, न मान है और न पर्याप्त दक्षिणा वाले यज्ञ ही हैं॥ ३५॥

स्वर्गो धनं वा धान्यं वा विद्या पुत्राः सुखानि च।
गुरुवृत्त्यनुरोधेन न किंचिदपि दुर्लभम्॥३६॥

‘गुरुजनों की सेवा का अनुसरण करने से स्वर्ग, धनधान्य, विद्या, पुत्र और सुख-कुछ भी दुर्लभ नहीं है॥ ३६॥

देवगन्धर्वगोलोकान् ब्रह्मलोकांस्तथापरान्।
प्राप्नुवन्ति महात्मानो मातापितृपरायणाः॥३७॥

‘माता-पिता की सेवा में लगे रहने वाले महात्मा पुरुष देवलोक, गन्धर्वलोक, ब्रह्मलोक, गोलोक तथा अन्य लोकों को भी प्राप्त कर लेते हैं॥ ३७॥

स मा पिता यथा शास्ति सत्यधर्मपथे स्थितः।
तथा वर्तितुमिच्छामि स हि धर्मः सनातनः॥ ३८॥

‘इसीलिये सत्य और धर्म के मार्ग पर स्थित रहने वाले पूज्य पिताजी मुझे जैसी आज्ञा दे रहे हैं, मैं वैसा ही बर्ताव करना चाहता हूँ; क्योंकि वह सनातन धर्म है॥

मम सन्ना मतिः सीते नेतुं त्वां दण्डकावनम्।
वसिष्यामीति सा त्वं मामनुयातुं सुनिश्चिता॥ ३९॥

‘सीते! ‘मैं आपके साथ वन में निवास करूँगी’ऐसा कहकर तुमने मेरे साथ चलने का दृढ़ निश्चय कर लिया है, इसलिये तुम्हें दण्डकारण्य ले चलने के सम्बन्ध में जो मेरा पहला विचार था, वह अब बदल गया है॥ ३९॥

सा हि दिष्टानवद्याङ्गि वनाय मदिरेक्षणे।
अनुगच्छस्व मां भीरु सहधर्मचरी भव॥४०॥

‘मदभरे नेत्रोंवाली सुन्दरी! अब मैं तुम्हें वन में चलने के लिये आज्ञा देता हूँ। भीरु! तुम मेरी अनुगामिनी बनो और मेरे साथ रहकर धर्म का आचरण करो॥ ४०॥

सर्वथा सदृशं सीते मम स्वस्य कुलस्य च।
व्यवसायमनुक्रान्ता कान्ते त्वमतिशोभनम्॥ ४१॥

‘प्राणवल्लभे सीते! तुमने मेरे साथ चलने का जो यह परम सुन्दर निश्चय किया है, यह तुम्हारे और मेरे कुल के सर्वथा योग्य ही है॥ ४१॥

आरभस्व शुभश्रोणि वनवासक्षमाः क्रियाः।
नेदानीं त्वदते सीते स्वर्गोऽपि मम रोचते॥४२॥

‘सुश्रोणि! अब तुम वनवास के योग्य दान आदि कर्म प्रारम्भ करो। सीते! इस समय तुम्हारे इस प्रकार दृढ़ निश्चय कर लेने पर तुम्हारे बिना स्वर्ग भी मुझे अच्छा नहीं लगता है॥ ४२ ॥

ब्राह्मणेभ्यश्च रत्नानि भिक्षुकेभ्यश्च भोजनम्।
देहि चाशंसमानेभ्यः संत्वरस्व च मा चिरम्॥ ४३॥

‘ब्राह्मणों को रत्नस्वरूप उत्तम वस्तुएँ दान करो और भोजन माँगने वाले भिक्षकों को भोजन दो। शीघ्रता करो, विलम्ब नहीं होना चाहिये॥४३॥

भूषणानि महार्हाणि वरवस्त्राणि यानि च।
रमणीयाश्च ये केचित् क्रीडार्थाश्चाप्युपस्कराः॥ ४४॥
शयनीयानि यानानि मम चान्यानि यानि च।
देहि स्वभृत्यवर्गस्य ब्राह्मणानामनन्तरम्॥४५॥

तुम्हारे पास जितने बहुमूल्य आभूषण हों, जो-जो अच्छे-अच्छे वस्त्र हों, जो कोई भी रमणीय पदार्थ हों तथा मनोरञ्जनकी जो-जो सुन्दर सामग्रियाँ हों, मेरे और तुम्हारे उपयोग में आने वाली जो उत्तमोत्तम शय्याएँ, सवारियाँ तथा अन्य वस्तुएँ हों, उनमें से ब्राह्मणों को दान करनेके पश्चात् जो बचें उन सबको अपने सेवकों को बाँट दो’ ॥ ४४-४५ ॥

अनुकूलं तु सा भर्तुर्ज्ञात्वा गमनमात्मनः।
क्षिप्रं प्रमुदिता देवी दातुमेव प्रचक्रमे॥४६॥

‘स्वामी ने वन में मेरा जाना स्वीकार कर लिया मेरा वनगमन उनके मन के अनुकूल हो गया’ यह जानकर देवी सीता बहुत प्रसन्न हुईं और शीघ्रतापूर्वक सब वस्तुओं का दान करने में जुट गयीं। ४६॥

ततः प्रहृष्टा प्रतिपूर्णमानसा यशस्विनी भर्तुरवेक्ष्य भाषितम्।
धनानि रत्नानि च दातुमङ्गना प्रचक्रमे धर्मभृतां मनस्विनी॥४७॥

तदनन्तर अपना मनोरथ पूर्ण हो जाने से अत्यन्त हर्ष में भरी हुई यशस्विनी एवं मनस्विनी सीता देवी स्वामी के आदेश पर विचार करके धर्मात्मा ब्राह्मणों को धन और रत्नों का दान करने के लिये उद्यत हो गयीं।

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे त्रिंशः सर्गः॥३०॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ। ३०॥


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