॥ श्री गणेशाय नमः ॥
॥ श्री कमलापति नम: ॥
॥ श्री जानकीवल्लभो विजयते ॥
॥ श्री वाल्मीकि रामायण ॥
(भावार्थ सहित)
सब एक ही स्थान पर
अयोध्याकाण्ड सर्ग- ६१-७५
अयोध्याकाण्डम्
एकषष्टितमः सर्गः (सर्ग 61)
( कौसल्या का विलापपूर्वक राजा दशरथ को उपालम्भ देना )
श्लोक:
वनं गते धर्मरते रामे रमयतां वरे।
कौसल्या रुदती चार्ता भर्तारमिदमब्रवीत्॥१॥
भावार्थ :-
प्रजाजनों को आनन्द प्रदान करने वाले पुरुषों में श्रेष्ठ धर्मपरायण श्रीराम के वन में चले जाने पर आर्त होकर रोती हुई कौसल्या ने अपने पति से इस प्रकार कहा–॥१॥
श्लोक:
यद्यपि त्रिषु लोकेषु प्रथितं ते महद् यशः।
सानुक्रोशो वदान्यश्च प्रियवादी च राघवः॥२॥
भावार्थ :-
‘महाराज! यद्यपि तीनों लोकों में आपका महान् यश फैला हुआ है, सब लोग यही जानते हैं किरघुकुलनरेश दशरथ बड़े दयालु, उदार और प्रिय वचन बोलनेवाले हैं॥२॥
श्लोक:
कथं नरवरश्रेष्ठ पुत्रौ तौ सह सीतया।
दुःखितौ सुखसंवृद्धौ वने दुःखं सहिष्यतः॥३॥
भावार्थ :-
‘नरेशों में श्रेष्ठ आर्यपुत्र! तथापि आपने इस बात का विचार नहीं किया कि सुख में पले हुए आपके वे दोनों पुत्र सीता के साथ वनवास का कष्ट कैसे सहन करेंगे॥३॥
श्लोक:
सा नूनं तरुणी श्यामा सुकुमारी सुखोचिता।
कथमुष्णं च शीतं च मैथिली विसहिष्यते॥४॥
भावार्थ :-
‘वह सोलह-अठारह वर्षों की सुकुमारी तरुणी मिथिलेशकुमारी सीता, जो सुख भोगने के ही योग्य है, वन में सर्दी-गरमी का दुःख कैसे सहेगी?॥४॥
वाल्मीकि रामायण- अयोध्याकाण्ड सर्ग- ६२
अयोध्याकाण्डम्
द्विषष्टितमः सर्गः (सर्ग 62)
( दुःखी हुए राजा दशरथ का कौसल्या को हाथ जोड़कर मनाना और कौसल्या का उनके चरणों में पड़कर क्षमा माँगना )
श्लोक:
एवं तु क्रुद्धया राजा राममात्रा सशोकया।
श्रावितः परुषं वाक्यं चिन्तयामास दुःखितः॥१॥
भावार्थ :-
शोकमग्न हो कुपित हुई श्रीराम माता कौसल्या ने जब राजा दशरथ को इस प्रकार कठोर वचन सुनाया, तब वे दुःखित होकर बड़ी चिन्ता में पड़ गये॥१॥
श्लोक:
चिन्तयित्वा स च नृपो मोहव्याकुलितेन्द्रियः।
अथ दीर्पण कालेन संज्ञामाप परंतपः॥२॥
भावार्थ :-
चिन्तित होने के कारण राजा की सारी इन्द्रियाँ मोह से आच्छन्न हो गयीं। तदनन्तर दीर्घकाल के पश्चात् शत्रुओं को संताप देने वाले राजा दशरथ को चेत हुआ।२॥
श्लोक:
स संज्ञामुपलभ्यैव दीर्घमुष्णं च निःश्वसन्।
कौसल्या पार्श्वतो दृष्ट्वा ततश्चिन्तामुपागमत्॥३॥
भावार्थ :-
होश में आने पर उन्होंने गरम-गरम लंबी साँस ली और कौसल्या को बगल में बैठी हुई देख वे फिर चिन्ता में पड़ गये॥३॥
श्लोक:
तस्य चिन्तयमानस्य प्रत्यभात् कर्म दुष्कृतम्।
यदनेन कृतं पूर्वमज्ञानाच्छब्दवेधिना॥४॥
भावार्थ :-
चिन्ता में पड़े-पड़े ही उन्हें अपने एक दुष्कर्म का स्मरण हो आया, जो इन शब्दवेधी बाण चलाने वाले नरेश के द्वारा पहले अनजान में बन गया था॥४॥
वाल्मीकि रामायण- अयोध्याकाण्ड सर्ग- ६३
अयोध्याकाण्डम्
त्रिषष्टितमः सर्गः (सर्ग 63)
( राजा दशरथ का शोक और उनका कौसल्या से अपने द्वारा मुनिकुमार के मारे जाने का प्रसङ्ग सुनाना )
श्लोक:
प्रतिबुद्धो मुहूर्तेन शोकोपहतचेतनः।
अथ राजा दशरथः स चिन्तामभ्यपद्यत॥१॥
भावार्थ :-
राजा दशरथ दो ही घड़ी के बाद फिर जाग उठे। उस समय उनका हृदय शोक से व्याकुल हो रहा था। वे मन-ही-मन चिन्ता करने लगे॥१॥
श्लोक:
रामलक्ष्मणयोश्चैव विवासाद् वासवोपमम्।
आपेदे उपसर्गस्तं तमः सूर्यमिवासुरम्॥२॥
भावार्थ :-
श्रीराम और लक्ष्मण के वन में चले जाने से इन इन्द्रतुल्य तेजस्वी महाराज दशरथ को शोक ने उसी प्रकार धर दबाया था, जैसे राहु का अन्धकार सूर्य को ढक देता है॥२॥
श्लोक:
सभार्ये हि गते रामे कौसल्यां कोसलेश्वरः।
विवक्षुरसितापाङ्गी स्मृत्वा दुष्कृतमात्मनः॥३॥
भावार्थ :-
पत्नीसहित श्रीराम के वन में चले जाने पर कोसलनरेश दशरथ ने अपने पुरातन पाप का स्मरण करके कजरारे नेत्रों वाली कौसल्या से कहने का विचार किया॥३॥
श्लोक:
स राजा रजनी षष्ठी रामे प्रव्राजिते वनम्।
अर्धरात्रे दशरथः सोऽस्मरद दुष्कृतं कृतम्॥४॥
भावार्थ :-
उस समय श्रीरामचन्द्रजी को वन में गये छठी रात बीत रही थी। जब आधी रात हुई, तब राजा दशरथ को उस पहले के किये हुए दुष्कर्म का स्मरण हुआ॥४॥
वाल्मीकि रामायण- अयोध्याकाण्ड सर्ग- ६४
अयोध्याकाण्डम्
चतुःषष्टितमः सर्गः (सर्ग 64)
( राजा दशरथ का अपने द्वारा मुनिकुमार के वध से दुःखी हुए उनके मातापिता के विलाप और उनके दिये हुए शाप का प्रसंग सुनाकर अपने प्राणों को त्याग देना )
श्लोक:
वधमप्रतिरूपं तु महर्षेस्तस्य राघवः।
विलपन्नेव धर्मात्मा कौसल्यामिदमब्रवीत्॥१॥
भावार्थ :-
उन महिर् षके अनुचित वध का स्मरण करके धर्मात्मा रघुकुलनरेश ने अपने पुत्र के लिये विलाप करते हुए ही रानी कौसल्या से इस प्रकार कहा-॥१॥
श्लोक:
तदज्ञानान्महत्पापं कृत्वा संकुलितेन्द्रियः।
एकस्त्वचिन्तयं बुद्ध्या कथं नु सुकृतं भवेत्॥२॥
भावार्थ :-
‘देवि! अनजान में यह महान् पाप कर डालने के कारण मेरी सारी इन्द्रियाँ व्याकुल हो रही थीं। मैं अकेला ही बुद्धि लगाकर सोचने लगा, अब किस उपाय से मेरा कल्याण हो?॥२॥
श्लोक:
ततस्तं घटमादाय पूर्णं परमवारिणा।
आश्रमं तमहं प्राप्य यथाख्यातपथं गतः॥३॥
भावार्थ :-
‘तदनन्तर उस घड़े को उठाकर मैंने सरयू के उत्तम जल से भरा और उसे लेकर मुनिकुमार के बताये हुए मार्ग से उनके आश्रम पर गया॥३॥
श्लोक:
तत्राहं दुर्बलावन्धौ वृद्धावपरिणायकौ।
अपश्यं तस्य पितरौ लूनपक्षाविव द्विजौ॥४॥
भावार्थ :-
‘वहाँ पहुँचकर मैंने उनके दुबले, अन्धे और बूढ़े माता-पिता को देखा, जिनका दूसरा कोई सहायक नहीं था। उनकी अवस्था पंख कटे हुए दो पक्षियों के समान थी॥४॥
वाल्मीकि रामायण- अयोध्याकाण्ड सर्ग- ६५
अयोध्याकाण्डम्
पञ्चषष्टितमः सर्गः (सर्ग 65)
( वन्दीजनों का स्तुतिपाठ, राजा दशरथ को दिवंगत हुआ जान उनकी रानियों का करुण-विलाप )
श्लोक:
अथ रात्र्यां व्यतीतायां प्रातरेवापरेऽहनि।
वन्दिनः पर्युपातिष्ठस्तत्पार्थिवनिवेशनम्॥१॥
भावार्थ :-
तदनन्तर रात बीतने पर दूसरे दिन सबेरे ही वन्दीजन (महाराज की स्तुति करने के लिये) राजमहल में उपस्थित हुए॥१॥
श्लोक:
सूताः परमसंस्कारा मागधाश्चोत्तमश्रुताः।
गायकाः श्रुतिशीलाश्च निगदन्तः पृथक्पृथक्॥२॥
भावार्थ :-
व्याकरण-ज्ञान से सम्पन्न (अथवा उत्तम अलङ्कारों से विभूषित) सूत, उत्तम रूप से वंशपरम्परा का श्रवण कराने वाले मागध और सङ्गीतशास्त्र का अनुशीलन करने वाले गायक अपने अपने मार्ग के अनुसार पृथक्-पृथक् यशोगान करते हुए वहाँ आये॥२॥
श्लोक:
राजानं स्तुवतां तेषामुदात्ताभिहिताशिषाम्।
प्रासादाभोगविस्तीर्णः स्तुतिशब्दो ह्यवर्तत॥३॥
भावार्थ :-
उच्चस्वर से आशीर्वाद देते हुए राजा की स्तुति करने वाले उन सूत-मागध आदि का शब्द राजमहलों के भीतरी भाग में फैलकर गूंजने लगा॥३॥
श्लोक:
ततस्तु स्तुवतां तेषां सूतानां पाणिवादकाः।
अपदानान्युदाहृत्य पाणिवादान्यवादयन्॥४॥
भावार्थ :-
वे सूतगण स्तुति कर रहे थे; इतने ही में पाणिवादक (हाथों से ताल देकर गाने वाले) वहाँ आये और राजाओं के बीते हुए अद्भुत कर्मों का बखान करते हुए तालगति के अनुसार तालियाँ बजाने लगे॥४॥
वाल्मीकि रामायण- अयोध्याकाण्ड सर्ग- ६६
अयोध्याकाण्डम्
षट्षष्टितमः सर्गः (सर्ग 66)
( राजा के लिये कौसल्या का विलाप और कैकेयी की भर्त्सना, मन्त्रियों का राजा के शव को तेल से भरे हुए कड़ाह में सुलाना, पुरी की श्रीहीनता और पुरवासियों का शोक )
श्लोक:
तमग्निमिव संशान्तमम्बुहीनमिवार्णवम्।
गतप्रभमिवादित्यं स्वर्गस्थं प्रेक्ष्य भूमिपम्॥१॥
कौसल्या बाष्पपूर्णाक्षी विविधं शोककर्शिता।
उपगृह्य शिरो राज्ञः कैकेयीं प्रत्यभाषत॥२॥
भावार्थ :-
बुझी हुई आग, जलहीन समुद्र तथा प्रभाहीन सूर्य की भाँति शोभाहीन हुए दिवङ्गत राजा का शव देखकर कौसल्या के नेत्रों में आँसू भर आये। वे अनेक प्रकार से शोकाकुल होकर राजा के मस्तक को गोद में ले कैकेयी से इस प्रकार बोलीं-॥१-२॥
श्लोक:
सकामा भव कैकेयी भुक्ष्व राज्यमकण्टकम्।
त्यक्त्वा राजानमेकाना नृशंसे दुष्टचारिणि॥३॥
भावार्थ :-
‘दुराचारिणी क्रूर कैकेयी! ले, तेरी कामना सफल हुई। अब राजा को भी त्यागकर एकाग्रचित्त हो अपना अकण्टक राज्य भोग॥३॥
श्लोक:
विहाय मां गतो रामो भर्ता च स्वर्गतो मम।
विपथे सार्थहीनेव नाहं जीवितुमुत्सहे॥४॥
भावार्थ :-
‘राम मुझे छोड़कर वन में चले गये और मेरे स्वामी स्वर्ग सिधारे। अब मैं दुर्गम मार्ग में साथियों से बिछुड़कर असहाय हुई अबला की भाँति जीवित नहीं रह सकती॥४॥
वाल्मीकि रामायण- अयोध्याकाण्ड सर्ग- ६७
अयोध्याकाण्डम्
सप्तषष्टितमः सर्गः (सर्ग 67)
( मार्कण्डेय आदि मुनियों तथा मन्त्रियों का राजा के बिना होने वाली देश की दुरवस्था का वर्णन करके वसिष्ठजी से किसी को राजा बनाने के लिये अनुरोध )
श्लोक:
आक्रन्दिता निरानन्दा सास्रकण्ठजनाविला।
अयोध्यायामवतता सा व्यतीयाय शर्वरी॥१॥
भावार्थ :-
अयोध्या में लोगों की वह रात रोते-कलपते ही बीती। उसमें आनन्द का नाम भी नहीं था। आँसुओं से सब लोगों के कण्ठ भरे हुए थे। दुःख के कारण वह रात सबको बड़ी लम्बी प्रतीत हुई थी॥१॥
श्लोक:
व्यतीतायां तु शर्वर्यामादित्यस्योदये ततः।
समेत्य राजकर्तारः सभामीयुर्द्विजातयः॥२॥
भावार्थ :-
जब रात बीत गयी और सूर्योदय हुआ, तब राज्य का प्रबन्ध करने वाले ब्राह्मणलोग एकत्र हो दरबार में आये॥२॥
श्लोक:
मार्कण्डेयोऽथ मौद्गल्यो वामदेवश्च कश्यपः।
कात्यायनो गौतमश्च जाबालिश्च महायशाः॥३॥
एते द्विजाः सहामात्यैः पृथग्वाचमुदीरयन्।
वसिष्ठमेवाभिमुखाः श्रेष्ठं राजपुरोहितम्॥४॥
भावार्थ :-
मार्कण्डेय, मौद्गल्य, वामदेव, कश्यप, कात्यायन, गौतम और महायशस्वी जाबालि—ये सभी ब्राह्मणश्रेष्ठ राजपुरोहित वसिष्ठजी के सामने बैठकर मन्त्रियों के साथ अपनी अलग-अलग राय देने लगे॥३-४॥
श्लोक:
अतीता शर्वरी दुःखं या नो वर्षशतोपमा।
अस्मिन् पञ्चत्वमापन्ने पुत्रशोकेन पार्थिवे॥५॥
भावार्थ :-
वे बोले—’पुत्रशोक से इन महाराज के स्वर्गवासी होने के कारण यह रात बड़े दुःख से बीती है, जो हमारे लिये सौ वर्षों के समान प्रतीत हुई थी॥५॥
वाल्मीकि रामायण- अयोध्याकाण्ड सर्ग- ६८
अयोध्याकाण्डम्
अष्टषष्टितमः सर्गः (सर्ग 68)
( वसिष्ठजी की आज्ञा से पाँच दूतों का अयोध्या से केकयदेश के राजगृह नगर में जाना )
श्लोक:
तेषां तद् वचनं श्रुत्वा वसिष्ठः प्रत्युवाच ह।
मित्रामात्यजनान् सर्वान् ब्राह्मणांस्तानिदं वचः॥१॥
भावार्थ :-
मार्कण्डेय आदि के ऐसे वचन सुनकर महर्षि वसिष्ठ ने मित्रों, मन्त्रियों और उन समस्त ब्राह्मणों को इस प्रकार उत्तर दिया-॥१॥
श्लोक:
यदसौ मातुलकुले दत्तराज्यः परं सुखी।
भरतो वसति भ्रात्रा शत्रुघ्नेन मुदान्वितः॥२॥
भावार्थ :-
‘राजा दशरथ ने जिनको राज्य दिया है, वे भरत इस समय अपने भाई शत्रुघ्न के साथ मामा के यहाँ बड़े सुख और प्रसन्नता के साथ निवास करते हैं॥२॥
श्लोक:
तच्छीघ्रं जवना दूता गच्छन्तु त्वरितं हयैः।
आनेतुं भ्रातरौ वीरौ किं समीक्षामहे वयम्॥३॥
भावार्थ :-
उन दोनों वीर बन्धुओं को बुलाने के लिये शीघ्र ही तेज चलने वाले दूत घोड़ों पर सवार होकर यहाँ से जायँ, इसके सिवा हमलोग और क्या विचार कर सकते हैं?’॥३॥
श्लोक:
गच्छन्त्विति ततः सर्वे वसिष्ठं वाक्यमब्रुवन्।
तेषां तद् वचनं श्रुत्वा वसिष्ठो वाक्यमब्रवीत्॥४॥
भावार्थ :-
इस पर सबने वसिष्ठजी से कहा—’हाँ, दूत अवश्य भेजे जायँ।’ उनका वह कथन सुनकर वसिष्ठजी ने दूतों को सम्बोधित करके कहा—॥४॥
वाल्मीकि रामायण- अयोध्याकाण्ड सर्ग- ६९
अयोध्याकाण्डम्
एकोनसप्ततितमः सर्गः (सर्ग 69)
( भरत की चिन्ता, मित्रों द्वारा उन्हें प्रसन्न करने का प्रयास तथा उनके पूछने पर भरत का मित्रों के समक्ष अपने देखे हुए भयंकर दुःस्वप्न का वर्णन करना )
श्लोक:
यामेव रात्रिं ते दताः प्रविशन्ति स्म तां पुरीम्।
भरतेनापि तां रात्रिं स्वप्नो दृष्टोऽयमप्रियः॥१॥
भावार्थ :-
जिस रात में दूतों ने उस नगर में प्रवेश किया था, उससे पहली रात में भरत ने भी एक अप्रिय स्वप्न देखा था॥१॥
श्लोक:
व्युष्टामेव तु तां रात्रिं दृष्ट्वा तं स्वप्नमप्रियम्।
पुत्रो राजाधिराजस्य सुभृशं पर्यतप्यत॥२॥
भावार्थ :-
रात बीतकर प्रायः सबेरा हो चला था तभी उस अप्रिय स्वप्न को देखकर राजाधिराज दशरथ के पुत्र भरत मन-ही-मन बहुत संतप्त हुए॥२॥
श्लोक:
तप्यमानं तमाज्ञाय वयस्याः प्रियवादिनः।
आयासं विनयिष्यन्तः सभायां चक्रिरे कथाः॥३॥
भावार्थ :-
उन्हें चिन्तित जान उनके अनेक प्रियवादी मित्रों ने उनका मानसिक क्लेश दूर करने की इच्छा से एक गोष्ठी की और उसमें अनेक प्रकार की बातें करने लगे॥३॥
श्लोक:
वादयन्ति तदा शान्तिं लासयन्त्यपि चापरे।
नाटकान्यपरे स्माहुर्हास्यानि विविधानि च॥४॥
भावार्थ :-
कुछ लोग वीणा आदि बजाने लगे। दूसरे लोग उनके खेद की शान्ति के लिये नृत्य कराने लगे। दूसरे मित्रों ने नाना प्रकार के नाटकों का आयोजन किया, जिनमें हास्य रस की प्रधानता थी॥४॥
वाल्मीकि रामायण- अयोध्याकाण्ड सर्ग- ७०
अयोध्याकाण्डम्
सप्ततितमः सर्गः (सर्ग 70)
( दूतों का भरत को वसिष्ठजी का संदेश सुनाना, भरत का पिता आदि की कुशल पूछना, शत्रुघ्न के साथ अयोध्या की ओर प्रस्थान करना )
श्लोक:
भरते ब्रुवति स्वप्नं दूतास्ते क्लान्तवाहनाः।
प्रविश्यासह्यपरिखं रम्यं राजगृहं पुरम्॥१॥
भावार्थ :-
इस प्रकार भरत जब अपने मित्रों को स्वप्न का वृत्तान्त बता रहे थे, उसी समय थके हुए वाहनों वाले वे दूत उस रमणीय राजगृहपुर में प्रविष्ट हुए, जिसकी खाई को लाँघने का कष्ट शत्रुओं के लिये असह्य था॥१॥
श्लोक:
समागम्य च राज्ञा ते राजपुत्रेण चार्चिताः।
राज्ञः पादौ गृहीत्वा च तमूचुर्भरतं वचः॥२॥
भावार्थ :-
नगर में आकर वे दूत केकयदेश के राजा और राजकुमार से मिले तथा उन दोनों ने भी उनका सत्कार किया। फिर वे भावी राजा भरत के चरणों का स्पर्श करके उनसे इस प्रकार बोले-॥२॥
श्लोक:
पुरोहितस्त्वां कुशलं प्राह सर्वे च मन्त्रिणः।
त्वरमाणश्च निर्याहि कृत्यमात्ययिकं त्वया॥३॥
भावार्थ :-
‘कुमार! पुरोहितजी तथा समस्त मन्त्रियों ने आपसे कुशल-मङ्गल कहा है। अब आप यहाँ से शीघ्र चलिये। अयोध्या में आपसे अत्यन्त आवश्यक कार्य है॥३॥
श्लोक:
इमानि च महार्हाणि वस्त्राण्याभरणानि च।
प्रतिगृह्य विशालाक्ष मातुलस्य च दापय॥४॥
भावार्थ :-
‘विशाल नेत्रों वाले राजकुमार! ये बहुमूल्य वस्त्र और आभूषण आप स्वयं भी ग्रहण कीजिये और अपने मामा को भी दीजिये॥४॥
वाल्मीकि रामायण- अयोध्याकाण्ड सर्ग- ७१
अयोध्याकाण्डम्
एकसप्ततितमः सर्गः (सर्ग 71)
( रथ और सेनासहित भरत की यात्रा, अयोध्या की दुरवस्था देखते हुए सारथि से अपना दुःखपूर्ण उद्गार प्रकट करते हुए राजभवन में प्रवेश )
श्लोक:
स प्राङ्मुखो राजगृहादभिनिर्याय वीर्यवान्।
ततः सुदामां द्युतिमान् संतीर्यावेक्ष्य तां नदीम्॥१॥
ह्रादिनीं दूरपारां च प्रत्यक्स्रोतस्तरङ्गिणीम्।
शतद्रुमतरच्छ्रीमान् नदीमिक्ष्वाकुनन्दनः॥२॥
भावार्थ :-
राजगृह से निकलकर पराक्रमी भरत पूर्वदिशा की ओर चले।* उन तेजस्वी राजकुमार ने मार्ग में सुदामा नदी का दर्शन करके उसे पार किया। तत्पश्चात् इक्ष्वाकुनन्दन श्रीमान् भरत ने, जिसका पाट दूर तक फैला हुआ था, उस ह्रादिनी नदी को लाँघकर पश्चिमाभिमुख बहने वाली शतगु नदी (सतलज) को पार किया॥१-२॥
श्लोक:
ऐलधाने नदीं तीप्राप्य चापरपर्वतान्।
शिलामाकुर्वतीं ती आग्नेयं शल्यकर्षणम्॥३॥
भावार्थ :-
वहाँ से ऐलधान नामक गाँव में जाकर वहाँ बहने वाली नदी को पार किया। तत्पश्चात् वे अपरपर्वत नामक जनपद में गये। वहाँ शिला नाम की नदी बहती थी, जो अपने भीतर पड़ी हुई वस्तु को शिलास्वरूप बना देती थी। उसे पार करके भरत वहाँ से आग्नेय कोण में स्थित शल्यकर्षण नामक देश में गये, जहाँ शरीर से काँटे को निकालने में सहायता करने वाली ओषधि उपलब्ध होती थी॥३॥
श्लोक:
सत्यसंधः शुचिर्भूत्वा प्रेक्षमाणः शिलावहाम्।
अभ्यगात् स महाशैलान् वनं चैत्ररथं प्रति॥४॥
भावार्थ :-
तदनन्तर सत्यप्रतिज्ञ भरत ने पवित्र होकर शिलावहा नामक नदी का दर्शन किया (जो अपनी प्रखर धारा से शिलाखण्डों-बड़ी-बड़ी चट्टानों को भी बहा ले जाने के कारण उक्त नाम से प्रसिद्ध थी)। उस नदी का दर्शन करके वे आगे बढ़ गये और बड़े-बड़े पर्वतों को लाँघते हुए चैत्ररथ नामक वन में जा पहुँचे॥४॥
श्लोक:
सरस्वतीं च गङ्गां च युग्मेन प्रतिपद्य च।
उत्तरान् वीरमत्स्यानां भारुण्डं प्राविशद् वनम्॥५॥
भावार्थ :-
तत्पश्चात् पश्चिमवाहिनी सरस्वती तथा गङ्गा की धारा-विशेष के सङ्गम से होते हुए उन्होंने वीरमत्स्य देश के उत्तरवर्ती देशों में पदार्पण किया और वहाँ से आगे बढ़कर वे भारुण्ड वन के भीतर गये॥५॥
वाल्मीकि रामायण- अयोध्याकाण्ड सर्ग- ७२
अयोध्याकाण्डम्
द्विसप्ततितमः सर्गः (सर्ग 72)
( भरत का कैकेयी से पिता के परलोकवास का समाचार पा दुःखी हो विलाप करना,कैकेयी द्वारा उनका श्रीराम के वनगमन के वृत्तान्त से अवगत होना )
श्लोक:
अपश्यंस्तु ततस्तत्र पितरं पितरालये।
जगाम भरतो द्रष्टुं मातरं मातुरालये॥१॥
भावार्थ :-
तदनन्तर पिता के घर में पिता को न देखकर भरत माता का दर्शन करने के लिये अपनी माता के महल में गये॥१॥
श्लोक:
अनुप्राप्तं तु तं दृष्ट्वा कैकेयी प्रोषितं सुतम्।
उत्पपात तदा हृष्टा त्यक्त्वा सौवर्णमासनम्॥२॥
भावार्थ :-
अपने परदेश गये हुए पुत्र को घर आया देख उस समय कैकेयी हर्ष से भर गयी और अपने सुवर्णमय आसन को छोड़ उछलकर खड़ी हो गयी॥२॥
श्लोक:
स प्रविश्यैव धर्मात्मा स्वगृहं श्रीविवर्जितम्।
भरतः प्रेक्ष्य जग्राह जनन्याश्चरणौ शुभौ॥३॥
भावार्थ :-
धर्मात्मा भरत ने अपने उस घर में प्रवेश करके देखा कि सारा घर श्रीहीन हो रहा है, फिर उन्होंने माता के शुभ चरणों का स्पर्श किया॥३॥
श्लोक:
तं मूर्ध्नि समुपाघ्राय परिष्वज्य यशस्विनम्।
अङ्के भरतमारोप्य प्रष्टुं समुपचक्रमे॥४॥
भावार्थ :-
अपने यशस्वी पुत्र भरत को छाती से लगाकर कैकेयी ने उनका मस्तक सँघा और उन्हें गोद में बिठाकर पूछना आरम्भ किया—॥४॥
वाल्मीकि रामायण- अयोध्याकाण्ड सर्ग- ७३
अयोध्याकाण्डम्
त्रिसप्ततितमः सर्गः (सर्ग 73)
( भरत का कैकेयी को धिक्कारना और उसके प्रति महान् रोष प्रकट करना )
श्लोक:
श्रुत्वा च स पितुर्वृत्तं भ्रातरौ च विवासितौ।
भरतो दुःखसंतप्त इदं वचनमब्रवीत्॥१॥
भावार्थ :-
पिता के परलोकवास और दोनों भाइयों के वनवास का समाचार सुनकर भरत दुःख से संतप्त हो उठे और इस प्रकार बोले-॥१॥
श्लोक:
किं नु कार्यं हतस्येह मम राज्येन शोचतः।
विहीनस्याथ पित्रा च भ्रात्रा पितृसमेन च॥२॥
भावार्थ :-
‘हाय! तूने मुझे मार डाला। मैं पिता से सदा के लिये बिछुड़ गया और पितृतुल्य बड़े भाई से भी बिलग हो गया। अब तो मैं शोक में डूब रहा हूँ, मुझे यहाँ राज्य लेकर क्या करना है?॥२॥
श्लोक:
दुःखे मे दुःखमकरोणे क्षारमिवाददाः।
राजानं प्रेतभावस्थं कृत्वा रामं च तापसम्॥३॥
भावार्थ :-
‘तूने राजा को परलोकवासी तथा श्रीराम को तपस्वी बनाकर मुझे दुःख-पर-दुःख दिया है, घाव पर नमक सा छिड़क दिया है॥३॥
श्लोक:
कुलस्य त्वमभावाय कालरात्रिरिवागता।
अङ्गारमुपगृह्य स्म पिता मे नावबुद्धवान्॥४॥
भावार्थ :-
‘तू इस कुल का विनाश करने के लिये कालरात्रि बनकर आयी थी। मेरे पिता ने तुझे अपनी पत्नी क्या बनाया, दहकते हुए अङ्गार को हृदय से लगा लिया था; किंतु उस समय यह बात उनकी समझ में नहीं आयी थी॥४॥
वाल्मीकि रामायण- अयोध्याकाण्ड सर्ग- ७४
अयोध्याकाण्डम्
चतुःसप्ततितमः सर्गः (सर्ग 74)
( भरत का कैकेयी को कड़ी फटकार देना )
श्लोक:
तां तथा गर्हयित्वा तु मातरं भरतस्तदा।
रोषेण महताविष्टः पुनरेवाब्रवीद् वचः॥१॥
भावार्थ :-
इस प्रकार माता की निन्दा करके भरत उस समय महान् रोषावेश से भर गये और फिर कठोर वाणी में कहने लगे-॥१॥
श्लोक:
राज्याद भ्रंशस्व कैकेयि नृशंसे दुष्टचारिणि।
परित्यक्तासि धर्मेण मा मृतं रुदती भव॥२॥
भावार्थ :-
‘दृष्टतापूर्ण बर्ताव करने वाली क्रूरहृदया कैकेयि! तू राज्य से भ्रष्ट हो जा। धर्म ने तेरा परित्याग कर दिया है, अतः अब तू मरे हुए महाराज के लिये रोना मत, (क्योंकि तू पत्नीधर्म से गिर चुकी है) अथवा मुझे मरा हुआ समझकर तू जन्मभर पुत्र के लिये रोया कर॥२॥
श्लोक:
किं नु तेऽदूषयद् रामो राजा वा भृशधार्मिकः।
ययोर्मृत्युर्विवासश्च त्वत्कृते तुल्यमागतौ॥३॥
भावार्थ :-
‘श्रीराम ने अथवा अत्यन्त धर्मात्मा महाराज (पिताजी) ने तेरा क्या बिगाड़ा था, जिससे एक साथ ही उन्हें तुम्हारे कारण वनवास और मृत्यु का कष्ट भोगना पड़ा?॥३॥
श्लोक:
भ्रूणहत्यामसि प्राप्ता कुलस्यास्य विनाशनात्।
कैकेयि नरकं गच्छ मा च तातसलोकताम्॥४॥
भावार्थ :-
कैकेयि! तूने इस कुल का विनाश करने के कारण भ्रूणहत्या का पाप अपने सिर पर लिया है, इसलिये तू नरक में जा और पिताजी का लोक तुझे न मिले॥४॥
वाल्मीकि रामायण- अयोध्याकाण्ड सर्ग- ७५
अयोध्याकाण्डम्
पञ्चसप्ततितमः सर्गः (सर्ग 75)
( कौसल्या के सामने भरत का शपथ खाना )
श्लोक:
दीर्घकालात् समुत्थाय संज्ञां लब्ध्वा स वीर्यवान्।
नेत्राभ्यामश्रुपूर्णाभ्यां दीनामुद्रीक्ष्य मातरम्॥१॥
सोऽमात्यमध्ये भरतो जननीमभ्यकुत्सयत्।
भावार्थ :-
बहुत देर के बाद होश में आने पर जब पराक्रमी भरत उठे, तब आँसू भरे नेत्रों से दीन बनी बैठी हुई माता की ओर देखकर मन्त्रियों के बीच में उसकी निन्दा करते हुए बोले-॥१ १/२॥
श्लोक:
राज्यं न कामये जातु मन्त्रये नापि मातरम्॥२॥
अभिषेकं न जानामि योऽभूद् राज्ञा समीक्षितः।
विप्रकृष्ट ह्यहं देशे शत्रुघ्नसहितोऽभवम्॥३॥
भावार्थ :-
‘मन्त्रिवरो! मैं राज्य नहीं चाहता और न मैंने कभी माता से इसके लिये बातचीत ही की है। महाराज ने जिस अभिषेक का निश्चय किया था, उसका भी मुझे पता नहीं था; क्योंकि उस समय मैं शत्रुघ्न के साथ दूर देश में था॥२-३॥
श्लोक:
वनवासं न जानामि रामस्याहं महात्मनः।
विवासनं च सौमित्रेः सीतायाश्च यथाभवत्॥४॥
भावार्थ :-
‘महात्मा श्रीराम के वनवास और सीता तथा लक्ष्मण के निर्वासन का भी मुझे ज्ञान नहीं है कि वह कब और कैसे हुआ?’॥४॥
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