वाल्मीकि रामायण- अयोध्याकाण्ड सर्ग- १-१५

वाल्मीकि रामायण- अयोध्याकाण्ड सर्ग- १-१५

अयोध्याकाण्ड सर्ग- १-१५

॥ श्री गणेशाय नमः ॥
॥ श्री कमलापति नम: ॥
॥ श्री जानकीवल्लभो विजयते ॥
॥ श्री वाल्मीकि रामायण ॥
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1BDC7FFE-1644-4736-AA95-0B3D20B5A06Bवाल्मीकि रामायण
(भावार्थ सहित)
सब एक ही स्थान पर

यह स्वंय शिवजी द्वारा माता जगदम्बा से कही गई एक पवित्र कथा है। आप भी विस्तार पूर्वक पढ़े:
शिव-शक्ति श्रीराम मिलन (संपूर्ण भाग) 🌞

अयोध्याकाण्ड सर्ग- १-१५

अयोध्याकाण्डम्
प्रथमः सर्गः (सर्ग 1)

( श्रीराम के सद्गुणों का वर्णन, राजा दशरथ का श्रीराम को युवराज बनाने का विचार )

गच्छता मातुलकुलं भरतेन तदानघः।
शत्रुघ्नो नित्यशत्रुघ्नो नीतः प्रीतिपुरस्कृतः॥१॥

(पहले यह बताया जा चुका है कि) भरत अपने मामा के यहाँ जाते समय काम आदि शत्रुओं को सदा के लिये नष्ट कर देने वाले निष्पाप शत्रुघ्न को भी प्रेमवश अपने साथ लेते गये थे॥१॥

स तत्र न्यवसद् भ्रात्रा सह सत्कारसत्कृतः।
मातुलेनाश्वपतिना पुत्रस्नेहेन लालितः॥२॥

वहाँ भाई सहित उनका बड़ा आदर-सत्कार हुआ और वे वहाँ सुखपूर्वक रहने लगे। उनके मामा युधाजित् , जो अश्वयूथ के अधिपति थे, उन दोनों पर पुत्र से भी अधिक स्नेह रखते और बड़ा लाड़-प्यार करते थे॥२॥

तत्रापि निवसन्तौ तौ तर्प्यमाणौ च कामतः।
भ्रातरौ स्मरतां वीरौ वृद्धं दशरथं नृपम्॥३॥

यद्यपि मामा के यहाँ उन दोनों वीर भाइयों की सभी इच्छाएँ पूर्ण करके उन्हें पूर्णतः तृप्त किया जाता था,तथापि वहाँ रहते हुए भी उन्हें अपने वृद्ध पिता महाराज दशरथ की याद कभी नहीं भूलती थी॥३॥

राजापि तौ महातेजाः सस्मार प्रोषितौ सुतौ।
उभौ भरतशत्रुघ्नौ महेन्द्रवरुणोपमौ॥४॥

महातेजस्वी राजा दशरथ भी परदेश में गये हुए महेन्द्र और वरुण के समान पराक्रमी अपने उन दोनों पुत्र भरत और शत्रुघ्न का सदा स्मरण किया करते थे॥ ४॥

सर्व एव तु तस्येष्टाश्चत्वारः पुरुषर्षभाः।
स्वशरीराद् विनिर्वृत्ताश्चत्वार इव बाहवः॥५॥

अपने शरीर से प्रकट हुई चारों भुजाओं के समान वे सब चारों ही पुरुषशिरोमणि पुत्र महाराज को बहुत ही प्रिय थे॥५॥

तेषामपि महातेजा रामो रतिकरः पितुः।
स्वयम्भूरिव भूतानां बभूव गुणवत्तरः॥६॥

परंतु उनमें भी महातेजस्वी श्रीराम सबकी अपेक्षा अधिक गुणवान् होने के कारण समस्त प्राणियों के लिये ब्रह्माजी की भाँति पिता के लिये विशेष प्रीतिवर्धक थे॥६॥

स हि देवैरुदीर्णस्य रावणस्य वधार्थिभिः।
अर्थितो मानुषे लोके जज्ञे विष्णुः सनातनः॥७॥

इसका एक कारण और भी था—वे साक्षात् सनातन विष्णु थे और परम प्रचण्ड रावण के वध की अभिलाषा रखने वाले देवताओं की प्रार्थना पर मनुष्यलोक में अवतीर्ण हुए थे॥७॥

कौसल्या शुशुभे तेन पुत्रेणामिततेजसा।
यथा वरेण देवानामदितिर्वज्रपाणिना॥८॥

उन अमित तेजस्वी पुत्र श्रीरामचन्द्रजी से महारानी कौसल्या की वैसी ही शोभा होती थी, जैसे वज्रधारी देवराज इन्द्र से देवमाता अदिति सुशोभित होती हैं। ८॥

स हि रूपोपपन्नश्च वीर्यवाननसूयकः।
भूमावनुपमः सूनुर्गुणैर्दशरथोपमः॥९॥

श्रीराम बड़े ही रूपवान् और पराक्रमी थे। वे किसी के दोष नहीं देखते थे। भूमण्डल में उनकी समता करने वाला कोई नहीं था। वे अपने गुणों से पिता दशरथ के समान एवं योग्य पुत्र थे॥९॥

स च नित्यं प्रशान्तात्मा मृदुपूर्वं च भाषते।
उच्यमानोऽपि परुषं नोत्तरं प्रतिपद्यते॥१०॥

वे सदा शान्त चित्त रहते और सान्त्वनापूर्वक मीठे वचन बोलते थे; यदि उनसे कोई कठोर बात भी कह देता तो वे उसका उत्तर नहीं देते थे॥१०॥

कदाचिदुपकारेण कृतेनैकेन तुष्यति।
न स्मरत्यपकाराणां शतमप्यात्मवत्तया॥११॥

कभी कोई एक बार भी उपकार कर देता तो वे उसके उस एक ही उपकार से सदा संतुष्ट रहते थे और मन को वशमें रखने के कारण किसी के सैकड़ों अपराध करने पर भी उसके अपराधों को याद नहीं रखते थे॥

शीलवृद्धैर्ज्ञानवृद्धैर्वयोवृद्धैश्च सज्जनैः।
कथयन्नास्त वै नित्यमस्त्रयोग्यान्तरेष्वपि॥१२॥

अस्त्र-शस्त्रों के अभ्यास के लिये उपयुक्त समय में भी बीच-बीच में अवसर निकालकर वे उत्तम चरित्र में, ज्ञान में तथा अवस्था में बढ़े-चढ़े सत्पुरुषों के साथ ही सदा बातचीत करते (और उनसे शिक्षा लेते थे) ॥ १२॥

बुद्धिमान् मधुराभाषी पूर्वभाषी प्रियंवदः।
वीर्यवान्न च वीर्येण महता स्वेन विस्मितः॥ १३॥

वे बड़े बुद्धिमान् थे और सदा मीठे वचन बोलते थे। अपने पास आये हुए मनुष्यों से पहले स्वयं ही बात करते और ऐसी बातें मुँह से निकालते जो उन्हें प्रिय लगें; बल और पराक्रम से सम्पन्न होने पर भी अपने महान् पराक्रम के कारण उन्हें कभी गर्व नहीं होता था॥१३॥

न चानृतकथो विद्वान् वृद्धानां प्रतिपूजकः।
अनुरक्तः प्रजाभिश्च प्रजाश्चाप्यनुरज्यते॥१४॥

झूठी बात तो उनके मुखसे कभी निकलती ही नहीं । थी। वे विद्वान् थे और सदा वृद्ध पुरुषोंका सम्मान किया करते थे। प्रजाका श्रीरामके प्रति और श्रीरामका प्रजाके प्रति बड़ा अनुराग था॥ १४ ॥

सानुक्रोशो जितक्रोधो ब्राह्मणप्रतिपूजकः।
दीनानुकम्पी धर्मज्ञो नित्यं प्रग्रहवान् शुचिः॥१५॥

वे परम दयालु क्रोध को जीतने वाले और ब्राह्मणों के पुजारी थे। उनके मन में दीन-दुःखियों के प्रति बड़ी दया थी। वे धर्म के रहस्य को जानने वाले, इन्द्रियों को सदा वश में रखनेवाले और बाहर-भीतर से परम पवित्र थे॥

कुलोचितमतिः क्षात्रं स्वधर्मं बहु मन्यते।
मन्यते परया प्रीत्या महत् स्वर्गफलं ततः॥१६॥

अपने कुलोचित आचार, दया, उदारता और शरणागत रक्षा आदि में ही उनका मन लगता था। वे अपने क्षत्रिय धर्म को अधिक महत्त्व देते और मानते थे। वे उस क्षत्रिय धर्म के पालन से महान् स्वर्ग (परम धाम) की प्राप्ति मानते थे; अतः बड़ी प्रसन्नता के साथ उसमें संलग्न रहते थे॥ १६ ॥

नाश्रेयसि रतो यश्च न विरुद्धकथारुचिः।
उत्तरोत्तरयुक्तीनां वक्ता वाचस्पतिर्यथा॥१७॥

अमङ्गलकारी निषिद्ध कर्म में उनकी कभी प्रवृत्ति नहीं होती थी; शास्त्रविरुद्ध बातों को सुनने में उनकी रुचि नहीं थी; वे अपने न्याययुक्त पक्ष के समर्थन में बृहस्पति के समान एक-से-एक बढ़कर युक्तियाँ देते थे।। १७॥

अरोगस्तरुणो वाग्मी वपुष्मान् देशकालवित्।
लोके पुरुषसारज्ञः साधुरेको विनिर्मितः॥१८॥

उनका शरीर नीरोग था और अवस्था तरुण वे अच्छे वक्ता, सुन्दर शरीर से सुशोभित तथा देशकाल के तत्त्व को समझने वाले थे। उन्हें देखकर ऐसा जान पड़ता था कि विधाता ने संसार में समस्त पुरुषों के सारतत्त्व को समझने वाले साधु पुरुष के रूप में एकमात्र श्रीराम को ही प्रकट किया है॥ १८ ॥

स तु श्रेष्ठैर्गुणैर्युक्तः प्रजानां पार्थिवात्मजः।
बहिश्चर इव प्राणो बभूव गुणतः प्रियः॥१९॥

राजकुमार श्रीराम श्रेष्ठ गुणों से युक्त थे वे अपने सद्गुणों के कारण प्रजाजनों को बाहर विचरने वाले प्राण की भाँति प्रिय थे॥ १९॥

सर्वविद्याव्रतस्नातो यथावत् साङ्गवेदवित्।
इष्वस्त्रे च पितुः श्रेष्ठो बभूव भरताग्रजः॥ २०॥

भरत के बड़े भाई श्रीराम सम्पूर्ण विद्याओं के व्रतमें निष्णात और छहों अङ्गों सहित सम्पूर्ण वेदों के यथार्थ ज्ञाता थे। बाणविद्या में तो वे अपने पिता से भी बढ़कर थे॥२०॥

कल्याणाभिजनः साधुरदीनः सत्यवागृजुः।
वृद्धैरभिविनीतश्च द्विजैर्धर्मार्थदर्शिभिः॥२१॥

वे कल्याण की जन्मभूमि, साधु, दैन्यरहित, सत्यवादी और सरल थे; धर्म और अर्थके ज्ञाता वृद्ध ब्राह्मणों के द्वारा उन्हें उत्तम शिक्षा प्राप्त हुई थी॥ २१॥

धर्मकामार्थतत्त्वज्ञः स्मृतिमान् प्रतिभानवान्।
लौकिके समयाचारे कृतकल्पो विशारदः॥ २२॥

उन्हें धर्म, काम और अर्थ के तत्त्व का सम्यक् ज्ञान था। वे स्मरण शक्ति से सम्पन्न और प्रतिभाशाली थे। वे लोकव्यवहार के सम्पादन में समर्थ और समयोचित धर्माचरण में कुशल थे॥ २२ ॥

निभृतः संवृताकारो गुप्तमन्त्रः सहायवान्।
अमोघक्रोधहर्षश्च त्यागसंयमकालवित्॥२३॥

वे विनयशील, अपने आकार (अभिप्राय)-को छिपाने वाले, मन्त्र को गुप्त रखनेवाले और उत्तम सहायकों से सम्पन्न थे। उनका क्रोध अथवा हर्षधन की आय के उपायों को वे अच्छी तरह जानते थे (अर्थात् फूलों को नष्ट न करके उनसे रस लेने वाले भ्रमरोंकी भाँति वे प्रजाओं को कष्ट दिये बिना ही उनसे न्यायोचित धन का उपार्जन करने में कुशल थे) तथा शास्त्रवर्णित व्यय कर्म का भी उन्हें ठीक-ठीक ज्ञान था* ॥२६॥
* शास्त्र में व्यय का विधान इस प्रकार देखा जाता है
कच्चिदायस्य चार्धेन चतुर्भागेन वा पुनः।
पादभागैस्त्रिभिर्वापि व्ययः संशुद्ध्यते तव॥(महा० सभा० ५।७१)
नारदजी कहते हैं-युधिष्ठिर! क्या तुम्हारी आय के एक चौथाई या आधे अथवा तीन चौथाई भाग से तुम्हारा सारा खर्च चल जाता

श्रेष्ठ्यं चास्त्रसमूहेषु प्राप्तो व्यामिश्रकेषु च।
अर्थधर्मी च संगृह्य सुखतन्त्रो न चालसः॥२७॥

उन्होंने सब प्रकार के अस्त्रसमूहों तथा संस्कृत, प्राकृत आदि भाषाओं से मिश्रित नाटक आदि के ज्ञान में निपुणता प्राप्त की थी। वे अर्थ और धर्म का संग्रह (पालन) करते हुए तदनुकूल काम का सेवन करते थे और कभी आलस्य को पास नहीं फटकने देते थे। २७॥

वैहारिकाणां शिल्पानां विज्ञातार्थविभागवित्।
आरोहे विनये चैव युक्तो वारणवाजिनाम्॥२८॥

विहार (क्रीडा या मनोरञ्जन)-के उपयोग में आने वाले संगीत, वाद्य और चित्रकारी आदि शिल्पों के भी वे विशेषज्ञ थे। अर्थों के विभाजन का भी उन्हें सम्यक् ज्ञान था।* वे हाथियों और घोड़ों पर चढ़ने और उन्हें भाँति-भाँति की चालों की शिक्षा देने में भी निपुण थे॥ २८॥

* नीचे लिखी पाँच वस्तुओं के लिये अर्थका विभाजन करनेवाला मनुष्य इहलोक और परलोकमें भी सुखी होता है। वे वस्तुएँ हैं-धर्म, यश, अर्थ, आत्मा और स्वजन।
यथा धर्माय यशसेऽर्थाय कामाय स्वजनाय च।
पञ्चधा विभजन् वित्तमिहामुत्र च मोदते॥(श्रीमद्भा०८।१९। ३७)

धनुर्वेदविदां श्रेष्ठो लोकेऽतिरथसम्मतः।
अभियाता प्रहर्ता च सेनानयविशारदः॥ २९॥

श्रीरामचन्द्रजी इस लोकमें धनुर्वेद के सभी विद्वानों में श्रेष्ठ थे। अतिरथी वीर भी उनका विशेष सम्मान करते थे। शत्रुसेना पर आक्रमण और प्रहार करने में वे विशेष कुशल थे। सेना-संचालन की नीति में उन्होंने अधिक निपुणता प्राप्त की थी॥ २९ ॥

अप्रधृष्यश्च संग्रामे क्रुद्वैरपि सुरासुरैः।
अनसूयो जितक्रोधो न दृप्तो न च मत्सरी॥३०॥

संग्राम में कुपित होकर आये हुए समस्त देवता और असुर भी उनको परास्त नहीं कर सकते थे। उनमें दोषदृष्टि का सर्वथा अभाव था। वे क्रोध को जीत चुके थे। दर्प और ईर्ष्या का उनमें अत्यन्त अभाव था॥ ३०॥

नावज्ञेयश्च भूतानां न च कालवशानुगः ।
एवं श्रेष्ठैर्गुणैर्युक्तः प्रजानां पार्थिवात्मजः॥३१॥
सम्मतस्त्रिषु लोकेषु वसुधायाः क्षमागुणैः।
बुद्धया बृहस्पतेस्तुल्यो वीर्ये चापि शचीपतेः॥ ३२॥

किसी भी प्राणी के मन में उनके प्रति अवहेलना का भाव नहीं था। वे काल के वश में होकर उसके पीछे पीछे चलने वाले नहीं थे (काल ही उनके पीछे चलता । था)। इस प्रकार उत्तम गुणों से युक्त होने के कारण राजकुमार श्रीराम समस्त प्रजाओं तथा तीनों लोकों के प्राणियों के लिये आदरणीय थे। वे अपने क्षमासम्बन्धी गुणों के द्वारा पृथ्वीकी समानता करते थे। बुद्धि में बृहस्पति और बल-पराक्रम में शचीपति इन्द्रके तुल्य थे॥ ३१-३२॥

तथा सर्वप्रजाकान्तैः प्रीतिसंजननैः पितुः।
गुणैर्विरुरुचे रामो दीप्तः सूर्य इवांशुभिः ॥ ३३॥

जैसे सूर्यदेव अपनी किरणों से प्रकाशित होते हैं। उसी प्रकार श्रीरामचन्द्रजी समस्त प्रजाओं को प्रिय लगने वाले तथा पिता की प्रीति बढ़ाने वाले सद्गुणों से सुशोभित होते थे॥३३॥

तमेवंवृत्तसम्पन्नमप्रधृष्यपराक्रमम्।
लोकनाथोपमं नाथमकामयत मेदिनी॥३४॥

ऐसे सदाचारसम्पन्न, अजेय पराक्रमी और लोकपालों के समान तेजस्वी श्रीरामचन्द्रजी को पृथ्वी (भूदेवी और भूमण्डल की प्रजा) ने अपना स्वामी बनाने की कामना की॥ ३४॥

एतैस्तु बहुभिर्युक्तं गुणैरनुपमैः सुतम्।
दृष्ट्वा दशरथो राजा चक्रे चिन्तां परंतपः॥ ३५॥

अपने पुत्र श्रीराम को अनेक अनुपम गुणों से युक्त देखकर शत्रुओं को संताप देने वाले राजा दशरथ ने मन-ही-मन कुछ विचार करना आरम्भ किया॥ ३५ ॥

अथ राज्ञो बभूवैव वृद्धस्य चिरजीविनः।
प्रीतिरेषा कथं रामो राजा स्यान्मयि जीवति॥ ३६॥

उन चिरञ्जीवी बूढ़े महाराज दशरथ के हृदय में यह चिन्ता हुई कि किस प्रकार मेरे जीते-जी श्रीरामचन्द्र राजा हो जायँ और उनके राज्याभिषेक से प्राप्त होने वाली यह प्रसन्नता मुझे कैसे सुलभ हो॥३६ ।।

एषा ह्यस्य परा प्रीतिर्हृदि सम्परिवर्तते।
कदा नाम सुतं द्रक्ष्याम्यभिषिक्तमहं प्रियम्॥ ३७॥

उनके हृदय में यह उत्तम अभिलाषा बारम्बार चक्कर लगाने लगी कि कब मैं अपने प्रिय पुत्र श्रीराम का राज्याभिषेक देखेंगा॥ ३७॥

वृद्धिकामो हि लोकस्य सर्वभूतानुकम्पकः।
मत्तः प्रियतरो लोके पर्जन्य इव वृष्टिमान्॥३८॥

वे सोचने लगे कि ‘श्रीराम सब लोगों केअभ्युदय की कामना करते और सम्पूर्ण जीवों पर दया रखते हैं। वे लोक में वर्षा करने वाले मेघ की भाँति मुझसे भी बढ़कर प्रिय हो गये हैं॥ ३८॥

यमशक्रसमो वीर्ये बृहस्पतिसमो मतौ।
महीधरसमो धृत्यां मत्तश्च गुणवत्तरः॥३९॥

‘श्रीराम बल-पराक्रम में यम और इन्द्र के समान, बुद्धि में बृहस्पति के समान और धैर् यमें पर्वत के समानहैं। गुणों में तो वे मुझसे सर्वथा बढ़े-चढ़े हैं॥ ३९॥

महीमहमिमां कृत्स्नामधितिष्ठन्तमात्मजम्।
अनेन वयसा दृष्ट्वा यथा स्वर्गमवाप्नुयाम्॥४०॥

‘मैं इसी उम्र में अपने बेटे श्रीराम को इस सारी पृथ्वी का राज्य करते देख यथासमय सुख से स्वर्ग प्राप्त करूँ, यही मेरे जीवन की साध है’ ॥ ४० ।।

इत्येवं विविधैस्तैस्तैरन्यपार्थिवदुर्लभैः।
शिरपरिमेयैश्च लोके लोकोत्तरैर्गुणैः॥४१॥
तं समीक्ष्य तदा राजा युक्तं समुदितैर्गुणैः।
निश्चित्य सचिवैः सार्धं यौवराज्यममन्यत॥ ४२॥

इस प्रकार विचारकर तथा अपने पुत्र श्रीराम को उन-उन नाना प्रकार के विलक्षण, सज्जनोचित, असंख्य तथा लोकोत्तर गुणों से, जो अन्य राजाओं में दुर्लभ हैं, विभूषित देख राजा दशरथ ने मन्त्रियों के साथ सलाह करके उन्हें युवराज बनाने का निश्चय कर लिया॥ ४१-४२॥

दिव्यन्तरिक्षे भूमौ च घोरमुत्पातजं भयम्।
संचचक्षेऽथ मेधावी शरीरे चात्मनो जराम्॥ ४३॥

बुद्धिमान् महाराज दशरथ ने मन्त्री को स्वर्ग, अन्तरिक्ष तथा भूतल में दृष्टिगोचर होने वाले उत्पातों का घोर भय सूचित किया और अपने शरीर में वृद्धावस्था के आगमन की भी बात बतायी॥४३॥

पूर्णचन्द्राननस्याथ शोकापनुदमात्मनः।
लोके रामस्य बुबुधे सम्प्रियत्वं महात्मनः॥४४॥

पूर्ण चन्द्रमा के समान मनोहर मुखवाले महात्मा श्रीराम समस्त प्रजा के प्रिय थे। लोक में उनका सर्वप्रिय होना राजा के अपने आन्तरिक शोक को दूर करनेवाला था, इस बात को राजा ने अच्छी तरह समझा॥४४॥

आत्मनश्च प्रजानां च श्रेयसे च प्रियेण च।
प्राप्ते काले स धर्मात्मा भक्त्या त्वरितवान् नृपः॥ ४५॥

तदनन्तर उपयुक्त समय आने पर धर्मात्मा राजा दशरथ ने अपने और प्रजा के कल्याण के लिये मन्त्रियों को श्रीराम के राज्याभिषेक के लिये शीघ्र तैयारी करने की आज्ञा दी। इस उतावली में उनके हृदय का प्रेम और प्रजा का अनुराग भी कारण था॥ ४५ ॥

नानानगरवास्तव्यान् पृथग्जानपदानपि।
समानिनाय मेदिन्यां प्रधानान् पृथिवीपतिः॥ ४६॥

उन भूपालने भिन्न-भिन्न नगरों में निवास करने वाले प्रधान-प्रधान पुरुषों तथा अन्य जनपदों के सामन्त राजाओं को भी मन्त्रियोंद् वारा अयोध्या में बुलवा लिया॥ ४६॥

तान् वेश्मनानाभरणैर्यथाहँ प्रतिपूजितान्।
ददर्शालंकृतो राजा प्रजापतिरिव प्रजाः॥४७॥

उन सबको ठहरने के लिये घर देकर नानाप्रकार के आभूषणों द्वारा उनका यथायोग्य सत्कार किया। तत्पश्चात् स्वयं भी अलंकृत होकर राजा दशरथ उन सबसे उसी प्रकार मिले, जैसे प्रजापति ब्रह्मा प्रजावर्ग से मिलते हैं।

न तु केकयराजानं जनकं वा नराधिपः।
त्वरया चानयामास पश्चात्तौ श्रोष्यतः प्रियम्॥ ४८॥

जल्दीबाजी के कारण राजा दशरथ ने केकयनरेश को तथा मिथिलापति जनक को भी नहीं बुलवाया।* उन्होंने सोचा वे दोनों सम्बन्धी इस प्रिय समाचार को पीछे सुन लेंगे॥ ४८ ॥
* केकयनरेशके साथ भरत-शत्रुघ्न भी आ जाते। इन सबके तथा राजा जनकके रहनेसे श्रीरामका राज्याभिषेक सम्पन्न हो जाता और वे वनमें नहीं जाने पाते—इसी डरसे देवताओंने राजा दशरथको इन सबको नहीं बुलानेकी बुद्धि दे दी।

अथोपविष्टे नृपतौ तस्मिन् परपुरार्दने।
ततः प्रविविशुः शेषा राजानो लोकसम्मताः॥ ४९॥

तदनन्तर शत्रुनगरी को पीड़ित करने वाले राजा दशरथ जब दरबार में आ बैठे, तब (केकयराज और जनक को छोड़कर) शेष सभी लोकप्रिय नरेशों ने राजसभा में प्रवेश किया॥४९॥

अथ राजवितीर्णेषु विविधेष्वासनेषु च।
राजानमेवाभिमुखा निषेदुर्नियता नृपाः॥५०॥

वे सभी नरेश राजाद्वारा दिये गये नाना प्रकार के सिंहासनों पर उन्हीं की ओर मुँह करके विनीतभाव से  बैठे थे॥५०॥

स लब्धमानैर्विनयान्वितैर्नृपैः पुरालयैर्जानपदैश्च मानवैः।
उपोपविष्टैर्नृपतिर्वृतो बभौ सहस्रचक्षुर्भगवानिवामरैः॥५१॥

राजा से सम्मानित होकर विनीतभाव से उन्हीं के आस-पास बैठे हुए सामन्त नरेशों तथा नगर और जनपद के निवासी मनुष्यों से घिरे हुए महाराज दशरथ उस समय देवताओं के बीच में विराजमान सहस्रनेत्रधारी भगवान् इन्द्र के समान शोभा पा रहे थे। ५१॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये। आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे प्रथमः सर्गः॥१॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में पहला सर्ग पूरा हुआ।१॥

अयोध्याकाण्डम्
द्वितीयः सर्गः (सर्ग 2)

( राजा दशरथ द्वारा श्रीराम के राज्याभिषेक का प्रस्ताव तथा सभासदों द्वारा उक्त प्रस्ताव का सहर्ष युक्तियुक्त समर्थन )

ततः परिषदं सर्वामामन्त्र्य वसुधाधिपः।
हितमुद्धर्षणं चैवमुवाच प्रथितं वचः॥१॥
दुन्दुभिस्वरकल्पेन गम्भीरेणानुनादिना।
स्वरेण महता राजा जीमूत इव नादयन्॥२॥

उस समय राजसभा में बैठे हुए सब लोगों को सम्बोधित करके महाराज दशरथ ने मेघ के समान शब्द करते हुए दुन्दुभि की ध्वनि के सदृश अत्यन्त गम्भीर एवं गूंजते हुए उच्च स्वर से सबके आनन्द को बढ़ाने वाली यह हितकारक बात कही॥ १-२॥

राजलक्षणयुक्तेन कान्तेनानुपमेन च।
उवाच रसयुक्तेन स्वरेण नृपतिर्नुपान्॥३॥

राजा दशरथ का स्वर राजोचित स्निग्धता और गम्भीरता आदि गुणों से युक्त था, अत्यन्त कमनीय और अनुपम था। वे उस अद्भुत रसमय स्वर से समस्त नरेशों को सम्बोधित करके बोले- ॥३॥

विदितं भवतामेतद् यथा मे राज्यमुत्तमम्।
पूर्वकैर्मम राजेन्द्रैः सुतवत् परिपालितम्॥४॥

‘सज्जनो! आपलोगों को यह तो विदित ही है कि मेरे पूर्वज राजाधिराजों ने इस श्रेष्ठ राज्यका (यहाँ की प्रजा का) किस प्रकार पुत्र की भाँति पालन किया था।

सोऽहमिक्ष्वाकुभिः सर्वैर्नरेन्द्रैः प्रतिपालितम्।
श्रेयसा योक्तुमिच्छामि सुखार्हमखिलं जगत्॥

‘समस्त इक्ष्वाकुवंशी नरेशों ने जिसका प्रतिपालन किया है, उस सुख भोगने के योग्य सम्पूर्ण जगत् को अब मैं भी कल्याण का भागी बनाना चाहता हूँ॥५॥

मयाप्याचरितं पूर्वैः पन्थानमनुगच्छता।
प्रजा नित्यमनिद्रेण यथाशक्त्यभिरक्षिताः॥६॥

‘मेरे पूर्वज जिस मार्ग पर चलते आये हैं, उसी का अनुसरण करते हुए मैंने भी सदा जागरूक रहकर समस्त प्रजाजनों की यथाशक्ति रक्षा की है॥६॥

इदं शरीरं कृत्स्नस्य लोकस्य चरता हितम्।
पाण्डुरस्यातपत्रस्य च्छायायां जरितं मया॥७॥

‘समस्त संसार का हित-साधन करते हुए मैंने इस शरीर को श्वेत राजछत्र की छाया में बूढ़ा किया है। ७॥

प्राप्य वर्षसहस्राणि बहून्यायूंषि जीवतः।
जीर्णस्यास्य शरीरस्य विश्रान्तिमभिरोचये॥८॥

‘अनेक सहस्र (साठ हजार) वर्षों की आयु पाकर जीवित रहते हुए अपने इस जराजीर्ण शरीर को अब मैं विश्राम देना चाहता हूँ॥८॥

राजप्रभावजुष्टां च दुर्वहामजितेन्द्रियैः।
परिश्रान्तोऽस्मि लोकस्य गुर्वी धर्मधुरं वहन्॥

‘जगत् के धर्मपूर्वक संरक्षण का भारी भार राजाओं के शौर्य आदि प्रभावों से ही उठाना सम्भव है। अजितेन्द्रिय पुरुषों के लिये इस बोझ को ढोना अत्यन्त कठिन है। मैं दीर्घकाल से इस भारी भार को वहन करते-करते थक गया हूँ॥९॥

सोऽहं विश्राममिच्छामि पुत्रं कृत्वा प्रजाहिते।
संनिकृष्टानिमान् सर्वाननुमान्य द्विजर्षभान्॥१०॥

‘इसलिये यहाँ पास बैठे हुए इन सम्पूर्ण श्रेष्ठ द्विजों की अनुमति लेकर प्रजाजनों के हित के कार्य में अपने पुत्र श्रीराम को नियुक्त करके अब मैं राजकार्य से विश्राम लेना चाहता हूँ॥ १० ॥

अनुजातो हि मां सर्वैर्गुणैः श्रेष्ठो ममात्मजः।
पुरन्दरसमो वीर्ये रामः परपुरंजयः॥११॥

‘मेरे पुत्र श्रीराम मेरी अपेक्षा सभी गुणों में श्रेष्ठ हैं। शत्रुओं की नगरी पर विजय पाने वाले श्रीरामचन्द्र बल पराक्रम में देवराज इन्द्र के समान हैं ॥ ११॥

तं चन्द्रमिव पुष्येण युक्तं धर्मभृतां वरम्।
यौवराज्ये नियोक्तास्मि प्रातः पुरुषपुङ्गवम्॥१२॥

‘पुष्य नक्षत्र से युक्त चन्द्रमा की भाँति समस्त कार्यों के साधन में कुशल तथा धर्मात्माओं में श्रेष्ठ उन पुरुष शिरोमणि श्रीरामचन्द्र को मैं कल प्रातःकाल पुष्यनक्षत्र में युवराज के पदपर नियुक्त करूँगा॥ १२ ॥

अनुरूपः स वो नाथो लक्ष्मीवॉल्लक्ष्मणाग्रजः।
त्रैलोक्यमपि नाथेन येन स्यान्नाथवत्तरम्॥१३॥

‘लक्ष्मण के बड़े भाई श्रीमान् राम आप लोगों के लिये योग्य स्वामी सिद्ध होंगे; उनके-जैसे स्वामी से सम्पूर्ण त्रिलोकी भी परम सनाथ हो सकती है॥१३॥

अनेन श्रेयसा सद्यः संयोक्ष्येऽहमिमां महीम्।
गतक्लेशो भविष्यामि सुते तस्मिन् निवेश्य वै॥१४॥

‘ये श्रीराम कल्याणस्वरूप हैं; इनका शीघ्र ही अभिषेक करके मैं इस भूमण्डल को तत्काल कल्याण का भागी बनाऊँगा। अपने पुत्र श्रीराम पर राज्य का भार रखकर मैं सर्वथा क्लेशरहित निश्चिन्त हो जाऊँगा॥१४॥

यदिदं मेऽनुरूपार्थं मया साधु सुमन्त्रितम्।
भवन्तो मेऽनुमन्यन्तां कथं वा करवाण्यहम्॥

‘यदि मेरा यह प्रस्ताव आप लोगों को अनुकूल जान पड़े और यदि मैंने यह अच्छी बात सोची हो तो आप लोग इसके लिये मुझे सहर्ष अनुमति दें अथवा यह बतावें कि मैं किस प्रकार से कार्य करूँ ॥ १५ ॥

यद्यप्येषा मम प्रीतिर्हितमन्यद विचिन्त्यताम्।
अन्या मध्यस्थचिन्ता तु विमर्दाभ्यधिकोदया।१६॥

‘यद्यपि यह श्रीराम के राज्याभिषेक का विचार मेरे लिये अधिक प्रसन्नता का विषय है तथापि यदि इसके अतिरिक्त भी कोई सबके लिये हितकर बात हो तो आप लोग उसे सोचें; क्योंकि मध्यस्थ पुरुषों का विचार एकपक्षीय पुरुष की अपेक्षा विलक्षण होता है,कारण कि वह पूर्वपक्ष और अपरपक्ष को लक्ष्य करके किया गया होने के कारण अधिक अभ्युदय करने वाला होता है’ ॥ १६॥

इति ब्रुवन्तं मुदिताः प्रत्यनन्दन् नृपा नृपम्।
वृष्टिमन्तं महामेघं नर्दन्त इव बर्हिणः॥१७॥

राजा दशरथ जब ऐसी बात कह रहे थे, उस समय वहाँ उपस्थित नरेशों ने अत्यन्त प्रसन्न होकर उन महाराज का उसी प्रकार अभिनन्दन किया, जैसे मोर मधुर के कारव फैलाते हुए वर्षा करने वाले महामेघ का अभिनन्दन करते हैं॥ १७॥

स्निग्धोऽनुनादः संजज्ञे ततो हर्षसमीरितः।
जनौघो ष्टसंनादो मेदिनी कम्पयन्निव॥१८॥

तत्पश्चात् समस्त जनसमुदाय की स्नेहमयी हर्षध्वनि सुनायी पड़ी वह इतनी प्रबल थी कि समस्त पृथ्वी को कँपाती हुई-सी जान पड़ी॥ १८॥

तस्य धर्मार्थविदुषो भावमाज्ञाय सर्वशः।
ब्राह्मणा बलमुख्याश्च पौरजानपदैः सह ॥१९॥
समेत्य ते मन्त्रयितुं समतागतबुद्धयः।
ऊचुश्च मनसा ज्ञात्वा वृद्धं दशरथं नृपम्॥२०॥

धर्म और अर्थ के ज्ञाता महाराज दशरथ के अभिप्राय को पूर्णरूप से जानकर सम्पूर्ण ब्राह्मण और सेनापति नगर और जनपद के प्रधान-प्रधान व्यक्तियों के साथ मिलकर परस्पर सलाह करने के लिये बैठे और मन से सब कुछ समझकर जब वे एक निश्चयपर पहुँच गये, तब बूढ़े राजा दशरथ से इस प्रकार बोले- ॥ १९-२०॥

अनेकवर्षसाहस्रो वृद्धस्त्वमसि पार्थिव।
स रामं युवराजानमभिषिञ्चस्व पार्थिवम्॥२१॥

‘पृथ्वीनाथ! आपकी अवस्था कई हजार वर्षों की हो गयी आप बूढ़े हो गये। अतः पृथ्वी के पालन में समर्थ अपने पुत्र श्रीराम का अवश्य ही युवराज के पदपर अभिषेक कीजिये॥ २१॥

इच्छामो हि महाबाहुं रघुवीरं महाबलम्।
गजेन महता यान्तं रामं छत्रावृताननम्॥ २२॥

‘रघुकुल के वीर महाबलवान् महाबाहु श्रीराम महान् गजराज पर बैठकर यात्रा करते हों और उनके ऊपर श्वेत छत्र तना हुआ हो—इस रूप में हम उनकी झाँकी करना चाहते हैं’ ॥ २२ ॥

इति तद्वचनं श्रुत्वा राजा तेषां मनःप्रियम्।
अजानन्निव जिज्ञासुरिदं वचनमब्रवीत्॥२३॥

उनकी यह बात राजा दशरथ के मन को प्रिय लगनेवाली थी; इसे सुनकर राजा दशरथ अनजान-से बनकर उन सबके मनोभाव को जानने की इच्छा से इस प्रकार बोले- ॥ २३॥

श्रुत्वैतद् वचनं यन्मे राघवं पतिमिच्छथ।
राजानः संशयोऽयं मे तदिदं ब्रूत तत्त्वतः॥२४॥

‘राजागण ! मेरी यह बात सुनकर जो आप लोगों ने श्रीराम को राजा बनाने की इच्छा प्रकट की है, इसमें मुझे यह संशय हो रहा है जिसे आपके समक्ष उपस्थित करता हूँ। आप इसे सुनकर इसका यथार्थ उत्तर दें॥२४॥

कथं नु मयि धर्मेण पृथिवीमनुशासति।
भवन्तो द्रष्टुमिच्छन्ति युवराजं महाबलम्॥ २५॥

‘मैं धर्मपूर्वक इस पृथ्वी का निरन्तर पालन कर रहा हूँ, फिर मेरे रहते हुए आप लोग महाबली श्रीराम को युवराज के रूप में क्यों देखना चाहते हैं?’ ॥ २५ ॥

ते तमूचुर्महात्मानः पौरजानपदैः सह।
बहवो नृप कल्याणगुणाः सन्ति सुतस्य ते॥ २६॥

यह सुनकर वे महात्मा नरेश नगर और जनपद के लोगों के साथ राजा दशरथ से  इस प्रकार बोले —’महाराज! आपके पुत्र श्रीराम में बहुत-से कल्याणकारी सद्गुण हैं॥ २६॥

गुणान् गुणवतो देव देवकल्पस्य धीमतः।
प्रियानानन्दनान् कृत्स्नान् प्रवक्ष्यामोऽद्य तान्शृणु॥ २७॥

‘देव! देवताओं के तुल्य बुद्धिमान् और गुणवान् श्रीरामचन्द्रजी के सारे गुण सबको प्रिय लगने वाले और आनन्ददायक हैं, हम इस समय उनका यत्किंचित् वर्णन कर रहे हैं, आप उन्हें सुनिये॥ २७॥

दिव्यैर्गुणैः शक्रसमो रामः सत्यपराक्रमः।
इक्ष्वाकुभ्योऽपि सर्वेभ्यो ह्यतिरिक्तो विशाम्पते॥ २८॥

‘प्रजानाथ! सत्यपराक्रमी श्रीराम देवराज इन्द्रके समान दिव्य गुणों से सम्पन्न हैं, इक्ष्वाकुकुलमें भी ये सबसे श्रेष्ठ हैं ॥ २८॥

रामः सत्पुरुषो लोके सत्यः सत्यपरायणः।
साक्षाद् रामाद् विनिर्वृत्तो धर्मश्चापि श्रिया सह॥ २९॥

‘श्रीराम संसार में सत्यवादी, सत्यपरायण और सत्पुरुष हैं। साक्षात् श्रीराम ने ही अर्थ के साथ धर्म को भी प्रतिष्ठित किया है॥ २९॥

प्रजासुखत्वे चन्द्रस्य वसुधायाः क्षमागुणैः।
बुद्ध्या बृहस्पतेस्तुल्यो वीर्ये साक्षाच्छचीपतेः॥ ३०॥

‘ये प्रजा को सुख देने में चन्द्रमा की और क्षमारूपी गुण में पृथ्वी की समानता करते हैं। बुद्धि में बृहस्पति और बल-पराक्रम में साक्षात् शचीपति इन्द्र के समान हैं।॥ ३०॥

धर्मज्ञः सत्यसंधश्च शीलवाननसूयकः।
क्षान्तः सान्त्वयिता श्लक्ष्णः कृतज्ञो विजितेन्द्रियः॥३१॥
मृदुश्च स्थिरचित्तश्च सदा भव्योऽनसूयकः।
प्रियवादी च भूतानां सत्यवादी च राघवः॥ ३२॥

‘श्रीराम धर्मज्ञ, सत्यप्रतिज्ञ, शीलवान्, अदोषदर्शी,शान्त, दीन-दुःखियों को सान्त्वना प्रदान करनेवाले, मृदुभाषी, कृतज्ञ, जितेन्द्रिय, कोमल स्वभाव वाले, स्थिरबुद्धि, सदा कल्याणकारी, असूयारहित, समस्त प्राणियों के प्रति प्रिय वचन बोलने वाले और सत्यवादी हैं। ३१-३२॥

बहुश्रुतानां वृद्धानां ब्राह्मणानामुपासिता।
तेनास्येहातुला कीर्तिर्यशस्तेजश्च वर्धते॥३३॥

‘वे बहुश्रुत विद्वानों, बड़े-बूढ़ों तथा ब्राह्मणों के उपासक हैं-सदा ही उनका संग किया करते हैं, इसलिये इस जगत् में श्रीराम की अनुपम कीर्ति, यश और तेज का विस्तार हो रहा है। ३३ ।।

देवासुरमनुष्याणां सर्वास्त्रेषु विशारदः।
सम्यग् विद्याव्रतस्नातो यथावत् साङ्गवेदवित्॥ ३४॥

‘देवता, असुर और मनुष्यों के सम्पूर्ण अस्त्रों का उन्हें विशेष रूप से ज्ञान है। वे साङ्ग वेद के यथार्थ विद्वान् और सम्पूर्ण विद्याओं में भलीभाँति निष्णात हैं॥ ३४॥

गान्धर्वे च भुवि श्रेष्ठो बभूव भरताग्रजः।
कल्याणाभिजनः साधुरदीनात्मा महामतिः॥ ३५॥

‘भरत के बड़े भाई श्रीराम गान्धर्ववेद (संगीतशास्त्र) में भी इस भूतलपर सबसे श्रेष्ठ हैं। कल्याण की तो वे जन्मभूमि हैं। उनका स्वभाव साधु पुरुषों के समान है, हृदय उदार और बुद्धि विशाल है॥ ३५॥

द्विजैरभिविनीतश्च श्रेष्ठधर्मार्थनैपुणैः।
यदा व्रजति संग्रामं ग्रामार्थे नगरस्य वा॥३६॥
गत्वा सौमित्रिसहितो नाविजित्य निवर्तते।

‘धर्म और अर्थ के प्रतिपादन में कुशल श्रेष्ठ ब्राह्मणों ने उन्हें उत्तम शिक्षा दी है। वे ग्राम अथवा नगर की रक्षा के लिये लक्ष्मण के साथ जब संग्राम भूमि में जाते हैं, उस समय वहाँ जाकर विजय प्राप्त किये बिना पीछे नहीं लौटते॥३६ १/२ ॥

संग्रामात् पुनरागत्य कुञ्जरेण रथेन वा॥३७॥
पौरान् स्वजनवन्नित्यं कुशलं परिपृच्छति।
पुत्रेष्वग्निषु दारेषु प्रेष्यशिष्यगणेषु च ॥ ३८॥

‘संग्रामभूमि से हाथी अथवा रथ के द्वारा पुनः अयोध्या लौटने पर वे पुरवासियों से स्वजनों की भाँति प्रतिदिन उनके पुत्रों, अग्निहोत्र की अग्नियों, स्त्रियों, सेवकों और शिष्यों का कुशल-समाचार पूछते रहते हैं।

निखिलेनानुपूर्व्या च पिता पुत्रानिवौरसान्।
शुश्रूषन्ते च वः शिष्याः कच्चिद् वर्मसु दंशिताः॥३९॥
इति वः पुरुषव्याघ्रः सदा रामोऽभिभाषते।

‘जैसे पिता अपने और स पुत्रों का कुशल-मङ्गल पूछता है, उसी प्रकार वे समस्त पुरवासियों से क्रमशःउनका सारा समाचार पूछा करते हैं। पुरुष सिंह श्रीराम ब्राह्मणों से सदा पूछते रहते हैं कि ‘आपके शिष्य आप लोगों की सेवा करते हैं न?’ क्षत्रियों से यह जिज्ञासा करते हैं कि ‘आपके सेवक कवच आदि से सुसज्जित हो आपकी सेवा में तत्पर रहते हैं न?’॥ ३९ १/२॥

व्यसनेषु मनुष्याणां भृशं भवति दुःखितः॥४०॥
उत्सवेषु च सर्वेषु पितेव परितुष्यति।

‘नगर के मनुष्यों पर संकट आने पर वे बहुत दुःखी हो जाते हैं और उन सबके घरों में सब प्रकार के उत्सव होने पर उन्हें पिता की भाँति प्रसन्नता होती है। ४० १/२॥

सत्यवादी महेष्वासो वृद्धसेवी जितेन्द्रियः॥४१॥
स्मितपूर्वाभिभाषी च धर्मं सर्वात्मनाश्रितः।
सम्यग्योक्ता श्रेयसां च न विगृह्यकथारुचिः॥ ४२॥

‘वे सत्यवादी, महान् धनुर्धर, वृद्ध पुरुषों के सेवक और जितेन्द्रिय हैं। श्रीराम पहले मुसकराकर वार्तालाप आरम्भ करते हैं, उन्होंने सम्पूर्ण हृदय से धर्म का आश्रय ले रखा है। वे कल्याण का सम्यक् आयोजन करने वाले हैं, निन्दनीय बातों की चर्चा में उनकी कभी रुचि नहीं होती है।

उत्तरोत्तरयुक्तौ च वक्ता वाचस्पतिर्यथा।
सुभ्रूरायतताम्राक्षः साक्षाद् विष्णुरिव स्वयम्॥४३॥

“उत्तरोत्तर उत्तम युक्ति देते हुए वार्तालाप करने में वे साक्षात् बृहस्पति के समान हैं। उनकी भौहें सुन्दर हैं,आँखें विशाल और कुछ लालिमा लिये हुए हैं। वे साक्षात् विष्णु की भाँति शोभा पाते हैं। ४३।।

रामो लोकाभिरामोऽयं शौर्यवीर्यपराक्रमैः।
प्रजापालनसंयुक्तो न रागोपहतेन्द्रियः॥४४॥

‘सम्पूर्ण लोकों को आनन्दित करने वाले ये श्रीराम शूरता, वीरता और पराक्रम आदि के द्वारा सदा प्रजा का पालन करने में लगे रहते हैं। उनकी इन्द्रियाँ राग आदि दोषों से दूषित नहीं होती हैं॥ ४४॥

शक्तस्त्रैलोक्यमप्येष भोक्तुं किं नु महीमिमाम्।
नास्य क्रोधः प्रसादश्च निरर्थोऽस्ति कदाचन। ४५॥

‘इस पृथ्वी की तो बात ही क्या है, वे सम्पूर्ण त्रिलोकी की भी रक्षा कर सकते हैं। उनका क्रोध और प्रसाद कभी व्यर्थ नहीं होता है॥ ४५ ॥

हन्त्येष नियमाद् वध्यानवध्येषु न कुप्यति।
युनक्त्यर्थैः प्रहृष्टश्च तमसौ यत्र तुष्यति॥४६॥

‘जो शास्त्र के अनुसार प्राणदण्ड पाने के अधिकारी हैं, उनका ये नियमपूर्वक वध कर डालते हैं तथा जो शास्त्रदृष्टि से अवध्य हैं, उनपर ये कदापि कुपित नहीं होते हैं। जिस पर ये संतुष्ट होते हैं, उसे हर्ष में भरकर धन से परिपूर्ण कर देते हैं।॥ ४६॥

दान्तैः सर्वप्रजाकान्तैः प्रीतिसंजननैर्नृणाम्।
गुणैर्विरोचते रामो दीप्तः सूर्य इवांशुभिः॥४७॥

‘समस्त प्रजाओं के लिये कमनीय तथा मनुष्यों का आनन्द बढ़ाने वाले मन और इन्द्रियों के संयम आदि सद्गुणों द्वारा श्रीराम वैसे ही शोभा पाते हैं, जैसे तेजस्वी सूर्य अपनी किरणों से सुशोभित होते हैं। ४७॥

तमेवंगुणसम्पन्नं रामं सत्यपराक्रमम्।
लोकपालोपमं नाथमकामयत मेदिनी॥४८॥

‘ऐसे सर्वगुणसम्पन्न, लोकपालों के समान प्रभावशाली एवं सत्यपराक्रमी श्रीराम को इस पृथ्वी की जनता अपना स्वामी बनाना चाहती है। ४८॥

वत्सः श्रेयसि जातस्ते दिष्ट्यासौ तव राघवः।
दिष्टया पुत्रगुणैर्युक्तो मारीच इव कश्यपः॥४९॥

‘हमारे सौभाग्य से आपके वे पुत्र श्रीरघुनाथजी प्रजा का कल्याण करने में समर्थ हो गये हैं तथा आपके सौभाग्यसे  वे मरीचिनन्दन कश्यप की भाँति पुत्रोचित गुणों से सम्पन्न हैं। ४९ ॥

बलमारोग्यमायुश्च रामस्य विदितात्मनः।
देवासुरमनुष्येषु सगन्धर्वोरगेषु च॥५०॥
आशंसते जनः सर्वो राष्ट्र पुरवरे तथा।
आभ्यन्तरश्च बाह्यश्च पौरजानपदो जनः॥५१॥

‘देवताओं, असुरों, मनुष्यों, गन्धर्वो और नागों में से प्रत्येक वर्ग के लोग तथा इस राज्य और राजधानी में भी बाहर-भीतर आने-जाने वाले नगर और जनपद के सभी लोग सुविख्यात शील स्वभाव वाले श्रीरामचन्द्रजी के लिये सदा ही बल, आरोग्य और आयु की शुभ कामना करते हैं।

स्त्रियो वृद्धास्तरुण्यश्च सायं प्रातः समाहिताः।
सर्वा देवान्नमस्यन्ति रामस्यार्थे मनस्विनः।
तेषां तद् याचितं देव त्वत्प्रसादात्समृद्ध्यताम्॥ ५२॥

‘इस नगर की बूढ़ी और युवती–सब तरहकी स्त्रियाँ सबेरे और सायंकाल में एकाग्रचित्त होकर परम उदार श्रीरामचन्द्रजी के युवराज होने के लिये देवताओं से नमस्कार पूर्वक प्रार्थना किया करती हैं। देव! उनकी वह प्रार्थना आपके कृपा-प्रसाद से अब पूर्ण होनी चाहिये॥५२॥

राममिन्दीवरश्याम सर्वशत्रुनिबर्हणम्।
पश्यामो यौवराज्यस्थं तव राजोत्तमात्मजम्॥ ५३॥

‘नृपश्रेष्ठ! जो नीलकमल के समान श्यामकान्ति से सुशोभित तथा समस्त शत्रुओं का संहार करने में समर्थ हैं, आपके उन ज्येष्ठ पुत्र श्रीराम को हम युवराजपद पर विराजमान देखना चाहते हैं॥५३॥

तं देवदेवोपममात्मजं ते सर्वस्य लोकस्य हिते निविष्टम्।
हिताय नः क्षिप्रमुदारजुष्टं मुदाभिषेक्तुं वरद त्वमर्हसि ॥५४॥

‘अतः वरदायक महाराज! आप देवाधिदेव श्रीविष्णु के समान पराक्रमी, सम्पूर्ण लोकों के हित में संलग्न रहने वाले और महापुरुषों द्वारा सेवित अपने पुत्र श्रीरामचन्द्रजी का जितना शीघ्र हो सके प्रसन्नता पूर्वक राज्याभिषेक कीजिये, इसी में हमलोगों का हित है’ ॥ ५४॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे द्वितीयः सर्गः ॥२॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में दूसरा सर्ग पूरा हुआ।२॥

अयोध्याकाण्डम्
तृतीयः सर्गः (सर्ग 3)

( राज्याभिषेक की तैयारी, राजा दशरथ का श्रीराम को राजनीति की बातें बताना )

तेषामञ्जलिपद्मानि प्रगृहीतानि सर्वशः।
प्रतिगृह्याब्रवीद राजा तेभ्यः प्रियहितं वचः॥१॥

सभासदों ने कमलपुष्प की-सी आकृति वाली अपनी अञ्जलियों को सिर से लगाकर सब प्रकार से महाराज के प्रस्ताव का समर्थन किया; उनकी वह पद्माञ्जलि स्वीकार करके राजा दशरथ उन सबसे प्रिय और हितकारी वचन बोले- ॥१॥

अहोऽस्मि परमप्रीतः प्रभावश्चातुलो मम।
यन्मे ज्येष्ठं प्रियं पुत्रं यौवराज्यस्थमिच्छथ॥२॥

‘अहो! आप लोग जो मेरे परमप्रिय ज्येष्ठ पुत्र श्रीराम को युवराज के पदपर प्रतिष्ठित देखना चाहते हैं इससे मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई है तथा मेरा प्रभाव अनुपम हो गया है’ ॥ २॥

इति प्रत्यर्चितान् राजा ब्राह्मणानिदमब्रवीत्।
वसिष्ठं वामदेवं च तेषामेवोपशृण्वताम्॥३॥

इस प्रकार की बातों से पुरवासी तथा अन्यान्य सभासदों का सत्कार करके राजा ने उनके सुनते हुए ही वामदेव और वसिष्ठ आदि ब्राह्मणों से इस प्रकार कहा— ॥३॥

चैत्रः श्रीमानयं मासः पुण्यः पुष्पितकाननः।
यौवराज्याय रामस्य सर्वमेवोपकल्प्यताम्॥४॥

‘यह चैत्रमास बड़ा सुन्दर और पवित्र है, इसमें सारे वन-उपवन खिल उठे हैं; अतः इस समय श्रीराम का युवराजपद पर अभिषेक करने के लिये आपलोग सब सामग्री एकत्र कराइये ॥ ४॥

राज्ञस्तूपरते वाक्ये जनघोषो महानभूत्।
शनैस्तस्मिन् प्रशान्ते च जनघोषे जनाधिपः॥५॥
वसिष्ठं मुनिशार्दूलं राजा वचनमब्रवीत्।

राजा की यह बात समाप्त होने पर सब लोग हर्ष के कारण महान् कोलाहल करने लगे। धीरे-धीरे उस जनरव के शान्त होने पर प्रजापालक नरेश दशरथ ने मुनिप्रवर वसिष्ठ से यह बात कही— ॥ ५ १/२ ॥

अभिषेकाय रामस्य यत् कर्म सपरिच्छदम्॥६॥
तदद्य भगवन् सर्वमाज्ञापयितुमर्हसि।

‘भगवन्! श्रीराम के अभिषेक के लिये जो कर्म आवश्यक हो, उसे साङ्गोपाङ्ग बताइये और आज ही उस सबकी तैयारी करनेके लिये  आज्ञा दीजिये’ ।। ६ १/२॥

तच्छ्रुत्वा भूमिपालस्य वसिष्ठो मुनिसत्तमः॥७॥
आदिदेशाग्रतो राज्ञः स्थितान् युक्तान् कृताञ्जलीन्।

महाराजका यह वचन सुनकर मुनिवर वसिष्ठने राजा के सामने ही हाथ जोड़कर खड़े हुए आज्ञापालन के लिये तैयार रहने वाले सेवकों से कहा – ॥ ७ १/२ ॥

सुवर्णादीनि रत्नानि बलीन् सर्वौषधीरपि॥८॥
शुक्लमाल्यानि लाजांश्च पृथक् च मधुसर्पिषी।
अहतानि च वासांसि रथं सर्वायुधान्यपि॥९॥
चतुरङ्गबलं चैव गजं च शुभलक्षणम्।
चामरव्यजने चोभे ध्वजं छत्रं च पाण्डुरम्॥ १०॥
शतं च शातकुम्भानां कुम्भानामग्निवर्चसाम्।
हिरण्यशृङमृषभं समग्रं व्याघ्रचर्म च॥११॥
यच्चान्यत् किंचिदेष्टव्यं तत् सर्वमुपकल्प्यताम्।
उपस्थापयत प्रातरग्न्यगारे महीपतेः॥१२॥

‘तुम लोग सुवर्ण आदि रत्न, देवपूजन की सामग्री, सब प्रकार की ओषधियाँ, श्वेत पुष्पों की मालाएँ,खील, अलग-अलग पात्रों में शहद और घी, नये वस्त्र, रथ, सब प्रकार के अस्त्र-शस्त्र, चतुरङ्गिणी
सेना, उत्तम लक्षणों से युक्त हाथी, चमरी गाय की पूँछ के बालों से बने हुए दो व्यजन, ध्वज, श्वेत छत्र, अग्नि के समान देदीप्यमान सो नेके सौ कलश, सुवर्ण से मढ़े हुए सींगों वाला एक साँड, समूचा व्याघ्रचर्म तथा और जो कुछ भी वांछनीय वस्तुएँ हैं, उन सबको एकत्र करो और प्रातःकाल महाराज की अग्निशाला में पहुँचा दो॥ ८–१२॥

अन्तःपुरस्य द्वाराणि सर्वस्य नगरस्य च।
चन्दनस्रग्भिरच॑न्तां धूपैश्च घ्राणहारिभिः॥ १३॥

‘अन्तःपुर तथा समस्त नगर के सभी दरवाजों को चन्दन और मालाओं से सजा दो तथा वहाँ ऐसे धूप सुलगा दो जो अपनी सुगन्ध से लोगों को आकर्षित कर लें॥ १३॥

प्रशस्तमन्नं गुणवद् दधिक्षीरोपसेचनम्।
द्विजानां शतसाहस्रं यत्प्रकाममलं भवेत्॥१४॥

‘दही, दूध और घी आदि से संयुक्त अत्यन्त उत्तम एवं गुणकारी अन्न तैयार कराओ, जो एक लाख ब्राह्मणों के भोजन के लिये पर्याप्त हो॥ १४ ॥

सत्कृत्य द्विजमुख्यानां श्वः प्रभाते प्रदीयताम्।
घृतं दधि च लाजाश्च दक्षिणाश्चापि पुष्कलाः॥ १५॥

‘कल प्रातःकाल श्रेष्ठ ब्राह्मणों का सत्कार करके उन्हें वह अन्न प्रदान करो; साथ ही घी, दही, खील और पर्याप्त दक्षिणाएँ भी दो॥ १५ ॥

सूर्येऽभ्युदितमात्रे श्वो भविता स्वस्तिवाचनम्।
ब्राह्मणाश्च निमन्त्र्यन्तां कल्प्यन्तामासनानि च। १६॥

‘कल सूर्योदय होते ही स्वस्तिवाचन होगा, इसके लिये ब्राह्मणों को निमन्त्रित करो और उनके लिये आसनों का प्रबन्ध कर लो॥१६॥

आबध्यन्तां पताकाश्च राजमार्गश्च सिच्यताम्।
सर्वे च तालापचरा गणिकाश्च स्वलंकृताः॥ १७॥
कक्ष्यां द्वितीयामासाद्य तिष्ठन्तु नृपवेश्मनः।

‘नगरमें सब ओर पताकाएँ फहरायी जायँ तथा राजमार्गों पर छिड़काव कराया जाय। समस्त तालजीवी (संगीतनिपुण) पुरुष और सुन्दर वेषभूषा से विभूषित वाराङ्गनाएँ (नर्तकियाँ) राजमहल की दूसरी कक्षा (ड्यौढ़ी) में पहुँचकर खड़ी रहें॥ १७ १/२॥

देवायतनचैत्येषु सान्नभक्ष्याः सदक्षिणाः॥१८॥
उपस्थापयितव्याः स्युर्माल्ययोग्याः पृथक्पृथक्।

‘देव-मन्दिरों में तथा चैत्यवृक्षों के नीचे या चौराहों पर जो पूजनीय देवता हैं, उन्हें पृथक्-पृथक् भक्ष्य-भोज्य पदार्थ एवं दक्षिणा प्रस्तुत करनी चाहिये॥ १८ १/२ ॥

दीर्घासिबद्धगोधाश्च संनद्धा मृष्टवाससः॥१९॥
महाराजाङ्गनं शूराः प्रविशन्तु महोदयम्।

‘लंबी तलवार लिये और गोधाचर्म के बने दस्ताने पहने और कमर कसकर तैयार रहने वाले शूर-वीर योद्धा स्वच्छ वस्त्र धारण किये महाराज के महान् अभ्युदयशाली आँगनमें प्रवेश करें’॥ १९ १/२॥

एवं व्यादिश्य विप्रौ तु क्रियास्तत्र विनिष्ठितौ॥ २०॥
चक्रतश्चैव यच्छेषं पार्थिवाय निवेद्य च।

सेवकों को इस प्रकार कार्य करने का आदेश देकर दोनों ब्राह्मण वसिष्ठ और वामदेव ने पुरोहित द्वारा सम्पादित होने योग्य क्रियाओं को स्वयं पूर्ण किया। राजा के बताये हुए कार्यों के अतिरिक्त भी जो शेष आवश्यक कर्तव्य था उसे भी उन दोनों ने राजा से पूछकर स्वयं ही सम्पन्न किया॥ २० १/२॥

कृतमित्येव चाब्रूतामभिगम्य जगत्पतिम्॥२१॥
यथोक्तवचनं प्रीतौ हर्षयुक्तौ द्विजोत्तमौ।

तदनन्तर महाराज के पास जाकर प्रसन्नता और हर्ष से भरे हुए वे दोनों श्रेष्ठ द्विज बोले—’राजन् ! आपने जैसा कहा था, उसके अनुसार सब कार्य सम्पन्न हो गया’ ॥ २१ १/२॥

ततः सुमन्त्रं द्युतिमान् राजा वचनमब्रवीत्॥२२॥
रामः कृतात्मा भवता शीघ्रमानीयतामिति।

इसके बाद तेजस्वी राजा दशरथ ने सुमन्त्र से कहा – ‘सखे! पवित्रात्मा श्रीराम को तुम शीघ्र यहाँ बुला लाओ’ ।। २२ १/२॥

स तथेति प्रतिज्ञाय सुमन्त्रो राजशासनात्॥२३॥
रामं तत्रानयांचक्रे रथेन रथिनां वरम्।

तब ‘जो आज्ञा’ कहकर सुमन्त्र गये तथा राजा के आदेशानुसार रथियों में श्रेष्ठ श्रीराम को रथपर बिठाकर ले आये॥ २३ १/२॥

अथ तत्र सहासीनास्तदा दशरथं नृपम्॥२४॥
प्राच्योदीच्या प्रतीच्याश्च दाक्षिणात्याश्च भूमिपाः।
म्लेच्छाश्चार्याश्च ये चान्ये वनशैलान्तवासिनः॥
उपासांचक्रिरे सर्वे तं देवा वासवं यथा।

उस राजभवन में साथ बैठे हुए पूर्व, उत्तर, पश्चिम और दक्षिण के भूपाल, म्लेच्छ, आर्य तथा वनों और पर्वतों में रहने वाले अन्यान्य मनुष्य सब-के-सब उस समय राजा दशरथ की उसी प्रकार उपासना कर रहे थे जैसे देवता देवराज इन्द्र की॥ २४-२५ १/२ ॥

तेषां मध्ये स राजर्षिर्मरुतामिव वासवः ॥२६॥
प्रासादस्थो दशरथो ददर्शायान्तमात्मजम्।
गन्धर्वराजप्रतिमं लोके विख्यातपौरुषम्॥२७॥

उनके बीच अट्टालिका के भीतर बैठे हुए राजा दशरथ मरुद्गणों के मध्य देवराज इन्द्र की भाँति शोभा पा रहे थे; उन्होंने वहीं से अपने पुत्र श्रीराम को अपने पास आते देखा, जो गन्धर्वराज के समान तेजस्वी थे, उनका पौरुष समस्त संसार में विख्यात था॥ २६-२७॥

दीर्घबाहुं महासत्त्वं मत्तमातङ्गगामिनम्।
चन्द्रकान्ताननं राममतीव प्रियदर्शनम्॥२८॥
रूपौदार्यगुणैः पुंसां दृष्टिचित्तापहारिणम्।
घर्माभितप्ताः पर्जन्यं ह्लादयन्तमिव प्रजाः॥२९॥

उनकी भुजाएँ बड़ी और बल महान् था। वे । मतवाले गजराज के समान बड़ी मस्ती के साथ चल रहे थे। उनका मुख चन्द्रमा से भी अधिक कान्तिमान् था। श्रीराम का दर्शन सबको अत्यन्त प्रिय लगता था।
वे अपने रूप और उदारता आदि गुणों से लोगों की दृष्टि और मन आकर्षित कर लेते थे। जैसे धूप में तपे हुए प्राणियों को मेघ आनन्द प्रदान करता है, उसी प्रकार वे समस्त प्रजा को परम आह्लाद देते रहते थे। २८-२९॥

न ततर्प समायान्तं पश्यमानो नराधिपः।
अवतार्य सुमन्त्रस्तु राघवं स्यन्दनोत्तमात्॥३०॥
पितुः समीपं गच्छन्तं प्राञ्जलिः पृष्ठतोऽन्वगात्।

आते हुए श्रीरामचन्द्र की ओर एकटक देखते हुए राजा दशरथ को तृप्ति नहीं होती थी। सुमन्त्र ने उस श्रेष्ठ रथ से श्रीरामचन्द्रजी को उतारा और जब वे पिता के समीप जाने लगे, तब सुमन्त्र भी उनके पीछे पीछे हाथ जोड़े हुए गये॥ ३० १/२॥

स तं कैलासशृङ्गाभं प्रासादं रघुनन्दनः॥३१॥
आरुरोह नृपं द्रष्टुं सहसा तेन राघवः।

वह राजमहल कैलास शिखर के समान उज्ज्वल और ऊँचा था, रघुकुल को आनन्दित करने वाले श्रीराम महाराज का दर्शन करने के लिये सुमन्त्र के साथ सहसा उस पर चढ़ गये॥ ३१ १/२ ॥

स प्राञ्जलिरभिप्रेत्य प्रणतः पितुरन्तिके॥३२॥
नाम स्वं श्रावयन् रामो ववन्दे चरणौ पितुः।

श्रीराम दोनों हाथ जोड़कर विनीत भाव से पिता के पास गये और अपना नाम सुनाते हुए उन्होंने उनके दोनों चरणों में प्रणाम किया॥ ३२ १/२ ॥

तं दृष्ट्वा प्रणतं पार्वे कृताञ्जलिपुटं नृपः॥ ३३॥
गृह्याञ्जलौ समाकृष्य सस्वजे प्रियमात्मजम्।

श्रीरामको पास आकर हाथ जोड़ प्रणाम करते देख राजाने उनके दोनों हाथ पकड़ लिये और अपने प्रिय पुत्रको पास खींचकर छातीसे लगा लिया। ३३ १/२॥

तस्मै चाभ्युद्यतं सम्यमणिकाञ्चनभूषितम्॥ ३४॥
दिदेश राजा रुचिरं रामाय परमासनम्।

उस समय राजा ने उन श्रीरामचन्द्रजी को मणिजटित सुवर्ण से भूषित एक परम सुन्दर सिंहासन पर बैठने की आज्ञा दी, जो पहले से उन्हीं के लिये वहाँ उपस्थित किया गया था॥ ३४ १/२॥

तथाऽऽसनवरं प्राप्य व्यदीपयत राघवः॥ ३५॥
स्वयैव प्रभया मेरुमदये विमलो रविः।

जैसे निर्मल सूर्य उदयकाल में मेरुपर्वत को अपनी किरणों से उद्भासित कर देते हैं उसी प्रकार श्रीरघुनाथजी उस श्रेष्ठ आसन को ग्रहण करके अपनी ही प्रभा से उसे प्रकाशित करने लगे। ३५ १/२ ।। तेन

विभ्राजिता तत्र सा सभापि व्यरोचत॥३६॥
विमलग्रहनक्षत्रा शारदी द्यौरिवेन्दुना।

उनसे प्रकाशित हुई वह सभा भी बड़ी शोभा पा रही थी। ठीक उसी तरह जैसे निर्मल ग्रह और नक्षत्रों से भरा हुआ शरत्-काल का आकाश चन्द्रमा से उद्भासित हो उठता है॥ ३६ १/२ ॥

तं पश्यमानो नृपतिस्तुतोष प्रियमात्मजम्॥३७॥
अलंकृतमिवात्मानमादर्शतलसंस्थितम्।

जैसे सुन्दर वेश-भूषा से अलंकृत हुए अपने ही प्रतिबिम्ब को दर्पण में देखकर मनुष्य को बड़ा संतोष प्राप्त होता है, उसी प्रकार अपने शोभाशाली प्रिय पुत्र उन श्रीराम को देखकर राजा बड़े प्रसन्न हुए॥ ३७ १/२॥

स तं सुस्थितमाभाष्य पुत्रं पुत्रवतां वरः॥ ३८॥
उवाचेदं वचो राजा देवेन्द्रमिव कश्यपः।

जैसे कश्यप देवराज इन्द्र को पुकारते हैं, उसी प्रकार पुत्रवानों में श्रेष्ठ राजा दशरथ सिंहासन पर बैठे हुए अपने पुत्र श्रीराम को सम्बोधित करके उनसे इस प्रकार बोले

ज्येष्ठायामसि मे पत्न्यां सदृश्यां सदृशः सुतः॥ ३९॥
उत्पन्नस्त्वं गुणज्येष्ठो मम रामात्मजः प्रियः।
त्वया यतः प्रजाश्चेमाः स्वगुणैरनुरञ्जिताः॥ ४०॥
तस्मात् त्वं पुष्ययोगेन यौवराज्यमवाप्नुहि।

‘बेटा! तुम्हारा जन्म मेरी बड़ी महारानी कौसल्या के गर्भसे हुआ है। तुम अपनी माता के अनुरूप ही उत्पन्न हुए हो। श्रीराम! तुम गुणों में मुझसे भी बढ़कर हो, अतः मेरे परम प्रिय पुत्र हो; तुमने अपने गुणों से इन समस्त प्रजाओं को प्रसन्न कर लिया है, इसलिये कल पुष्यनक्षत्र के योग में युवराज का पद ग्रहण करो॥ ३९-४० १/२ ॥

कामतस्त्वं प्रकृत्यैव निर्णीतो गुणवानिति॥४१॥
गुणवत्यपि तु स्नेहात् पुत्र वक्ष्यामि ते हितम्।
भूयो विनयमास्थाय भव नित्यं जितेन्द्रियः॥ ४२॥

‘बेटा! यद्यपि तुम स्वभाव से ही गुणवान् हो और तुम्हारे विषय में यही सबका निर्णय है तथापि मैं स्नेहवश सद्गुणसम्पन्न होने पर भी तुम्हें कुछ हित की बातें बताता हूँ। तुम और भी अधिक विनय का आश्रय लेकर सदा जितेन्द्रिय बने रहो। ४१-४२॥

कामक्रोधसमुत्थानि त्यजस्व व्यसनानि च।
परोक्षया वर्तमानो वृत्त्या प्रत्यक्षया तथा॥४३॥

‘काम और क्रोध से उत्पन्न होने वाले दुर्व्यसनों का सर्वथा त्याग कर दो, परोक्षवृत्ति से (अर्थात् गुप्तचरों द्वारा यथार्थ बातों का पता लगाकर) तथा प्रत्यक्षवृत्ति से (अर्थात् दरबार में सामने आकर कहने वाली जनता के मुख से उसके वृत्तान्तों को प्रत्यक्ष देख-सुनकर) ठीक-ठीक न्यायविचार में तत्पर रहो॥ ४३॥

अमात्यप्रभृतीः सर्वाः प्रजाश्चैवानुरञ्जय।
कोष्ठागारायुधागारैः कृत्वा संनिचयान् बहून्॥ ४४॥
इष्टानुरक्तप्रकृतिर्यः पालयति मेदिनीम्।
तस्य नन्दन्ति मित्राणि लब्ध्वामृतमिवामराः॥ ४५॥

‘मन्त्री, सेनापति आदि समस्त अधिकारियों तथा प्रजाजनों को सदा प्रसन्न रखना। जो राजा कोष्ठागार(भण्डारगृह) तथा शस्त्रागार आदि के द्वारा उपयोगी वस्तुओं का बहुत बड़ा संग्रह करके मन्त्री, सेनापति
और प्रजा आदि समस्त प्रकृतियों को प्रिय मानकर उन्हें अपने प्रति अनुरक्त एवं प्रसन्न रखते हुए पृथ्वी का पालन करता है, उसके मित्र उसी प्रकार आनन्दित होते हैं, जैसे अमृत को पाकर देवता प्रसन्न हुए थे॥ ४४-४५॥

तस्मात् पुत्र त्वमात्मानं नियम्यैवं समाचर।
तच्छ्रुत्वा सुहृदस्तस्य रामस्य प्रियकारिणः॥४६॥
त्वरिताः शीघ्रमागत्य कौसल्यायै न्यवेदयन्।

‘इसलिये बेटा ! तुम अपने चित्त को वश में रखकर इस प्रकार के उत्तम आचरणों का पालन करते रहो।’ राजा की ये बातें सुनकर श्रीरामचन्द्रजी का प्रिय करने वाले सुहृदों ने तुरंत माता कौसल्या के पास जाकर उन्हें यह शुभ समाचार निवेदन कया॥ ४६ १/२॥

सा हिरण्यं च गाश्चैव रत्नानि विविधानि च॥ ४७॥
व्यादिदेश प्रियाख्येभ्यः कौसल्या प्रमदोत्तमा।

नारियों में श्रेष्ठ कौसल्या ने वह प्रिय संवाद सुनाने वाले उन सुहृदों को तरह-तरह के रत्न, सुवर्ण और गौएँ पुरस्कार रूप में दीं॥ ४७ १/२ ॥

अथाभिवाद्य राजानं रथमारुह्य राघवः।
ययौ स्वं द्युतिमद् वेश्म जनौघैः प्रतिपूजितः॥ ४८॥

इसके बाद श्रीरामचन्द्रजी राजा को प्रणाम करके रथ पर बैठे और प्रजाजनों से सम्मानित होते हुए वे अपने शोभाशाली भवन में चले गये॥ ४८॥

ते चापि पौरा नृपतेर्वचस्तच्छ्रुत्वा तदा लाभमिवेष्टमाशु।
नरेन्द्रमामन्त्र्य गृहाणि गत्वा देवान् समान,रभिप्रहृष्टाः॥४९॥

नगरनिवासी मनुष्यों ने राजा की बातें सुनकर मन ही-मन यह अनुभव किया कि हमें शीघ्र ही अभीष्ट वस्तु की प्राप्ति होगी, फिर भी महाराज की आज्ञा लेकर अपने घरों को गये और अत्यन्त हर्ष से भर कर
अभीष्ट-सिद्धि के उपलक्ष्य में देवताओं की पूजा करने लगे॥ ४९॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे तृतीयः सर्गः॥३॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में तीसरा सर्ग पूरा हुआ।३॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
अयोध्याकाण्डम्
चतुर्थः सर्गः (सर्ग 4)

( श्रीराम का माता को समाचार बताना और माता से आशीर्वाद पाकर लक्ष्मण से प्रेमपूर्वक वार्तालाप करना )

गतेष्वथ नृपो भूयः पौरेषु सह मन्त्रिभिः।
मन्त्रयित्वा ततश्चक्रे निश्चयज्ञः स निश्चयम्॥ १॥
श्व एव पुष्यो भविता श्वोऽभिषेच्यस्तु मे सुतः।
रामो राजीवपत्राक्षो युवराज इति प्रभुः॥२॥

राजसभा से पुरवासियों के चले जानेपर कार्य सिद्धि के योग्य देश-काल के नियम को जानने वाले प्रभावशाली नरेश ने पुनः मन्त्रियों के साथ सलाह करके यह निश्चय किया कि ‘कल ही पुष्य नक्षत्र होगा, अतःकल ही मुझे अपने पुत्र कमलनयन श्रीराम का युवराज के पदपर अभिषेक कर देना चाहिये’ ॥ १-२॥

अथान्तर्गृहमाविश्य राजा दशरथस्तदा।
सूतमामन्त्रयामास रामं पुनरिहानय॥३॥

तदनन्तर अन्तःपुर में जाकर महाराज दशरथ ने सूत को बुलाया और आज्ञा दी—’जाओ, श्रीराम को एक बार फिर यहाँ बुला लाओ’ ॥३॥

प्रतिगृह्य तु तद्वाक्यं सूतः पुनरुपाययौ।
रामस्य भवनं शीघ्रं राममानयितुं पुनः॥४॥

उनकी आज्ञा शिरोधार्य करके सुमन्त्र श्रीराम को शीघ्र बुला लाने के लिये पुनः उनके महल में गये॥ ४॥

द्वाःस्थैरावेदितं तस्य रामायागमनं पुनः।
श्रुत्वैव चापि रामस्तं प्राप्तं शङ्कान्वितोऽभवत्॥

द्वारपालों ने श्रीराम को सुमन्त्र के पुनः आगमन की सूचना दी। उनका आगमन सुनते ही श्रीराम के मन में संदेह हो गया॥५॥

प्रवेश्य चैनं त्वरितो रामो वचनमब्रवीत्।
यदागमनकृत्यं ते भूयस्तद्ब्रूह्यशेषतः॥६॥

उन्हें भीतर बुलाकर श्रीराम ने उनसे बड़ी उतावली के साथ पूछा-‘आपको पुनः यहाँ आने की क्या आवश्यकता पड़ी?’ यह पूर्णरूप से बताइये॥ ६॥

तमुवाच ततः सूतो राजा त्वां द्रष्टुमिच्छति।
श्रुत्वा प्रमाणं तत्र त्वं गमनायेतराय वा॥७॥

तब सूत ने उनसे कहा—’महाराज आपसे मिलना चाहते हैं। मेरी इस बात को सुनकर वहाँ जाने या न जाने का निर्णय आप स्वयं करें’॥७॥

इति सूतवचः श्रुत्वा रामोऽपि त्वरयान्वितः।
प्रययौ राजभवनं पुनर्द्रष्टुं नरेश्वरम्॥८॥

सूत का यह वचन सुनकर श्रीरामचन्द्र जी महाराज दशरथ का पुनः दर्शन करने के लिये तुरंत उनके महल की ओर चल दिये॥८॥

तं श्रुत्वा समनुप्राप्तं रामं दशरथो नृपः।
प्रवेशयामास गृहं विवक्षुः प्रियमुत्तमम्॥९॥

श्रीराम को आया हुआ सुनकर राजा दशरथ ने उनसे प्रिय तथा उत्तम बात कहने के लिये उन्हें महल के भीतर बुला लिया॥९॥

प्रविशन्नेव च श्रीमान् राघवो भवनं पितुः।
ददर्श पितरं दूरात् प्रणिपत्य कृताञ्जलिः॥१०॥

पिता के भवन में प्रवेश करते ही श्रीमान् रघुनाथजी ने उन्हें देखा और दूर से ही हाथ जोड़कर वे उनके चरणों में पड़ गये॥ १०॥

प्रणमन्तं तमुत्थाप्य सम्परिष्वज्य भूमिपः।
प्रदिश्य चासनं चास्मै रामं च पुनरब्रवीत्॥११॥

प्रणाम करते हुए श्रीराम को उठाकर महाराज ने छाती से लगा लिया और उन्हें बैठने के लिये आसन देकर पुनः उनसे इस प्रकार कहना आरम्भ किया – ॥११॥

राम वृद्धोऽस्मि दीर्घायुर्भुक्ता भोगा यथेप्सिताः।
अन्नवद्भिः क्रतुशतैर्यथेष्टं भूरिदक्षिणैः॥१२॥

‘श्रीराम! अब मैं बूढ़ा हुआ। मेरी आयु बहुत अधिक हो गयी। मैंने बहुत-से मनोवाञ्छित भोग भोग लिये, अन्न और बहुत-सी दक्षिणाओं से युक्त सैकड़ों यज्ञ भी कर लिये॥ १२॥

जातमिष्टमपत्यं मे त्वमद्यानुपमं भुवि।
दत्तमिष्टमधीतं च मया पुरुषसत्तम॥१३॥

‘पुरुषोत्तम! तुम मेरे परम प्रिय अभीष्ट संतान के रूप में प्राप्त हुए जिसकी इस भूमण्डल में कहीं उपमा नहीं है, मैंने दान, यज्ञ और स्वाध्याय भी कर लिये॥ १३॥

अनुभूतानि चेष्टानि मया वीर सुखान्यपि।
देवर्षिपितृविप्राणामनृणोऽस्मि तथाऽऽत्मनः॥ १४॥

‘वीर! मैंने अभीष्ट सुखों का भी अनुभव कर लिया। मैं देवता, ऋषि, पितर और ब्राह्मणों के तथा अपने ऋण से भी उऋण हो गया।॥ १४॥

न किंचिन्मम कर्तव्यं तवान्यत्राभिषेचनात्।
अतो यत्त्वामहं ब्रूयां तन्मे त्वं कर्तुमर्हसि ॥१५॥

‘अब तुम्हें युवराज-पदपर अभिषिक्त करने के सिवा और कोई कर्तव्य मेरे लिये शेष नहीं रह गया है, अतः मैं तुमसे जो कुछ कहूँ, मेरी उस आज्ञा का तुम्हें पालन करना चाहिये॥ १५॥

अद्य प्रकृतयः सर्वास्त्वामिच्छन्ति नराधिपम्।
अतस्त्वां युवराजानमभिषेक्ष्यामि पुत्रक॥१६॥

‘बेटा! अब सारी प्रजा तुम्हें अपना राजा बनाना चाहती है, अतः मैं तुम्हें युवराज पद पर अभिषिक्त करूँगा॥१६॥

अपि चाद्याशुभान् राम स्वप्नान् पश्यामि राघव।
सनिर्घाता दिवोल्काश्च पतन्ति हि महास्वनाः॥ १७॥

‘रघुकुलनन्दन श्रीराम! आजकल मुझे बड़े बुरे सपने दिखायी देते हैं। दिन में वज्रपात के साथ-साथ बड़ा भयंकर शब्द करने वाली उल्काएँ भी गिर रही हैं।॥ १७॥

अवष्टब्धं च मे राम नक्षत्रं दारुणग्रहैः।
आवेदयन्ति दैवज्ञाः सूर्याङ्गारकराहुभिः॥१८॥

‘श्रीराम! ज्योतिषियों का कहना है कि मेरे जन्मनक्षत्र को सूर्य, मङ्गल और राहु नामक भयंकर ग्रहों ने आक्रान्त कर लिया है॥ १८॥

प्रायेण च निमित्तानामीदृशानां समुद्भवे।
राजा हि मृत्युमाप्नोति घोरां चापदमृच्छति॥ १९॥

‘ऐसे अशुभ लक्षणों का प्राकट्य होने पर प्रायः राजा घोर आपत्ति में पड़ जाता है और अन्ततोगत्वा उसकी मृत्यु भी हो जाती है॥ १९॥

तद् यावदेव मे चेतो न विमुह्यति राघव।
तावदेवाभिषिञ्चस्व चला हि प्राणिनां मतिः॥ २०॥

‘अतः रघुनन्दन! जब तक मेरे चित्त में मोह नहीं छा जाता, तबत क ही तुम युवराज-पदपर अपना अभिषेक करा लो; क्योंकि प्राणियों की बुद्धि चञ्चल होती है।

अद्य चन्द्रोऽभ्युपगमत् पुष्यात् पूर्वं पुनर्वसुम्।
श्वः पुष्ययोगं नियतं वक्ष्यन्ते दैवचिन्तकाः॥ २१॥

‘आज चन्द्रमा पुष्य से एक नक्षत्र पहले पुनर्वसु पर विराजमान हैं, अतः निश्चय ही कल वे पुष्य नक्षत्रपर रहेंगे—ऐसा ज्योतिषी कहते हैं ॥ २१॥

तत्र पुष्येऽभिषिञ्चस्व मनस्त्वरयतीव माम्।
श्वस्त्वाहमभिषेक्ष्यामि यौवराज्ये परंतप॥२२॥

इसलिये उस पुष्यनक्षत्र में ही तुम अपना अभिषेक करा लो। शत्रुओं को संताप देनेवाले वीर! मेरा मन इस कार्य में बहत शीघ्रता करने को कहता है। इस कारण कल अवश्य ही मैं तुम्हारा युवराज पद पर अभिषेक कर दूंगा॥ २२॥

तस्मात् त्वयाद्यप्रभृति निशेयं नियतात्मना।
सह वध्वोपवस्तव्या दर्भप्रस्तरशायिना॥२३॥

‘अतः तुम इस समय से लेकर सारी रात इन्द्रिय संयम पूर्वक रहते हुए वधू सीता के साथ उपवास करो और कुश की शय्या पर सोओ॥ २३॥

सुहृदश्चाप्रमत्तास्त्वां रक्षन्त्वद्य समन्ततः।
भवन्ति बहुविघ्नानि कार्याण्येवंविधानि हि॥ २४॥

‘आज तुम्हारे सुहृद् सावधान रहकर सब ओरसे तुम्हारी रक्षा करें; क्योंकि इस प्रकारके शुभ कार्योंमें बहुत-से विघ्न आनेकी सम्भावना रहती है।॥ २४ ॥

विप्रोषितश्च भरतो यावदेव पुरादितः।
तावदेवाभिषेकस्ते प्राप्तकालो मतो मम॥२५॥

‘जब तक भरत इस नगर से बाहर अपने मामा के यहाँ निवास करते हैं, तब तक ही तुम्हारा अभिषेक हो जाना मुझे उचित प्रतीत होता है।॥ २५॥

कामं खलु सतां वृत्ते भ्राता ते भरतः स्थितः।
ज्येष्ठानुवर्ती धर्मात्मा सानक्रोशो जितेन्द्रियः॥ २६॥
किं नु चित्तं मनुष्याणामनित्यमिति मे मतम्।
सतां च धर्मनित्यानां कृतशोभि च राघव॥ २७॥

‘इसमें संदेह नहीं कि तुम्हारे भाई भरत सत्पुरुषों के आचार-व्यवहार में स्थित हैं, अपने बड़े भाई का अनुसरण करने वाले, धर्मात्मा, दयालु और जितेन्द्रिय हैं तथापि मनुष्यों का चित्त प्रायः स्थिर नहीं रहता ऐसा मेरा मत है। रघुनन्दन! धर्मपरायण सत्पुरुषों का मन भी विभिन्न कारणों से राग-द्वेषादि से संयुक्त हो जाता है’ ॥ २६-२७॥

इत्युक्तः सोऽभ्यनुज्ञातः श्वोभाविन्यभिषेचने।
व्रजेति रामः पितरमभिवाद्याभ्ययाद् गृहम्॥ २८॥

राजा के इस प्रकार कहने और कल होने वाले राज्याभिषेक के निमित्त व्रतपालन के लिये जाने की आज्ञा देनेपर श्रीरामचन्द्रजी पिता को प्रणाम करके अपने महल में गये॥ २८॥

प्रविश्य चात्मनो वेश्म राज्ञाऽऽदिष्टेऽभिषेचने।
तत्क्षणादेव निष्क्रम्य मातुरन्तःपुरं ययौ॥२९॥

राजा ने राज्याभिषेक के लिये व्रतपालन के निमित्त जो आज्ञा दी थी, उसे सीता को बताने के लिये अपने महल के भीतर प्रवेश करके जब श्रीराम ने वहाँ सीता को नहीं देखा, तब वे तत्काल ही वहाँ से निकलकर माता के अन्तःपुर में चले गये॥ २९॥

तत्र तां प्रवणामेव मातरं क्षौमवासिनीम्।
वाग्यतां देवतागारे ददर्शायाचतीं श्रियम्॥३०॥

वहाँ जाकर उन्होंने देखा माता कौसल्या रेशमी वस्त्र पहने मौन हो देवमन्दिर में बैठकर देवता की आराधना में लगी हैं और पुत्र के लिये राजलक्ष्मी की याचना कर रही हैं॥३०॥

प्रागेव चागता तत्र सुमित्रा लक्ष्मणस्तथा।
सीता चानयिता श्रुत्वा प्रियं रामाभिषेचनम्॥

श्रीराम के राज्याभिषेक का प्रिय समाचार सुनकर सुमित्रा और लक्ष्मण वहाँ पहले से ही आ गये थे तथा बाद में सीता वहीं बुला ली गयी थीं॥ ३१ ॥

तस्मिन् कालेऽपि कौसल्या तस्थावामीलितेक्षणा।
सुमित्रयान्वास्यमाना सीतया लक्ष्मणेन च॥३२॥

श्रीरामचन्द्रजी जब वहाँ पहुँचे, उस समय भी कौसल्या नेत्र बंद किये ध्यान लगाये बैठी थीं और सुमित्रा, सीता तथा लक्ष्मण उनकी सेवा में खड़े थे। ३२॥

श्रुत्वा पुष्ये च पुत्रस्य यौवराज्येऽभिषेचनम्।
प्राणायामेन पुरुषं ध्यायमाना जनार्दनम्॥३३॥

पुष्यनक्षत्र के योग में पुत्र के युवराज पद पर अभिषिक्त होने की बात सुनकर वे उसकी मङ्गल कामना से प्राणायाम के द्वारा परमपुरुष नारायण का ध्यान कर रही थीं॥ ३३॥

तथा सनियमामेव सोऽभिगम्याभिवाद्य च।
उवाच वचनं रामो हर्षयंस्तामिदं वरम्॥३४॥

इस प्रकार नियम में लगी हुई माता के निकट उसी अवस्था में जाकर श्रीराम ने उनको प्रणाम किया और उन्हें हर्ष प्रदान करते हुए यह श्रेष्ठ बात कही-॥ ३४॥

अम्ब पित्रा नियुक्तोऽस्मि प्रजापालनकर्मणि।
भविता श्वोऽभिषेको मे यथा मे शासनं पितुः॥ ३५॥
सीतयाप्युपवस्तव्या रजनीयं मया सह।
एवमुक्तमुपाध्यायैः स हि मामुक्तवान् पिता॥ ३६॥

‘माँ! पिताजी ने मुझे प्रजा पालन के कर्म में नियुक्त किया है। कल मेरा अभिषेक होगा। जैसा कि मे रेलिये पिताजी का आदेश है, उसके अनुसार सीता को भी मेरे साथ इस रात में उपवास करना होगा।
उपाध्यायों ने ऐसी ही बात बतायी थी, जिसे पिताजीने मुझसे कहा है॥

यानि यान्यत्र योग्यानि श्वोभाविन्यभिषेचने।
तानि मे मङ्गलान्यद्य वैदेह्याश्चैव कारय॥३७॥

‘अतः कल होने वाले अभिषेक के निमित्त से आज मेरे और सीता के लिये जो-जो मङ्गलकार्य आवश्यक हों, वे सब कराओ’ ॥ ३७॥

एतच्छ्रुत्वा तु कौसल्या चिरकालाभिकांक्षितम्।
हर्षबाष्पाकुलं वाक्यमिदं राममभाषत॥३८॥

चिरकाल से माता के हृदय में जिस बात की अभिलाषा थी, उसकी पूर्ति को सूचित करने वाली यह बात सुनकर माता कौसल्या ने आनन्द के आँसू बहाते हुए गद्गद कण्ठ से इस प्रकार कहा— ॥ ३८॥

वत्स राम चिरं जीव हतास्ते परिपन्थिनः।
ज्ञातीन् मे त्वं श्रिया युक्तः सुमित्रायाश्च नन्दय॥ ३९॥

‘बेटा श्रीराम! चिरञ्जीवी होओ। तुम्हारे मार्ग में विघ्न डालने वाले शत्रु नष्ट हो जायँ। तुम राजलक्ष्मी से युक्त होकर मेरे और सुमित्रा के बन्धु-बान्धवों को आनन्दित करो॥

कल्याणे बत नक्षत्रे मया जातोऽसि पुत्रक।
येन त्वया दशरथो गुणैराराधितः पिता॥४०॥

‘बेटा! तुम मेरे द्वारा किसी मङ्गलमय नक्षत्र में उत्पन्न हुए थे, जिससे तुमने अपने गुणों द्वारा पिता दशरथ को प्रसन्न कर लिया॥ ४०॥

अमोघं बत मे क्षान्तं पुरुषे पुष्करेक्षणे।
येयमिक्ष्वाकुराजश्रीः पुत्र त्वां संश्रयिष्यति॥ ४१॥

‘बड़े हर्ष की बात है कि मैंने कमलनयन भगवान् विष्णु की प्रसन्नता के लिये जो व्रत-उपवास आदि किया था, वह आज सफल हो गया। बेटा ! उसी के फल से यह इक्ष्वाकुकुल की राजलक्ष्मी तुम्हें प्राप्त होने वाली है’॥ ४१॥

इत्येवमुक्तो मात्रा तु रामो भ्रातरमब्रवीत्।
प्राञ्जलिं प्रह्वमासीनमभिवीक्ष्य स्मयन्निव॥ ४२॥

माता के ऐसा कहने पर श्रीराम ने विनीत भाव से हाथ जोड़कर खड़े हुए अपने भाई लक्ष्मण की ओर देखकर मुसकराते हुए-से कहा- ॥ ४२ ॥

लक्ष्मणेमां मया सार्धं प्रशाधि त्वं वसुंधराम्।
द्वितीयं मेऽन्तरात्मानं त्वामियं श्रीरुपस्थिता॥ ४३॥

‘लक्ष्मण! तुम मेरे साथ इस पृथ्वी के राज्य का शासन (पालन) करो। तुम मेरे द्वितीय अन्तरात्मा हो यह राजलक्ष्मी तुम्हीं को प्राप्त हो रही है॥४३॥

सौमित्रे भुक्ष्व भोगांस्त्वमिष्टान् राज्यफलानिच।
जीवितं चापि राज्यं च त्वदर्थमभिकामये॥४४॥

‘सुमित्रानन्दन ! तुम अभीष्ट भोगों और राज्य के श्रेष्ठ  फलों का उपभोग करो। तुम्हारे लिये ही मैं इस जीवन तथा राज्य की अभिलाषा करता हूँ’॥ ४४ ॥

इत्युक्त्वा लक्ष्मणं रामो मातरावभिवाद्य च।
अभ्यनुज्ञाप्य सीतां च ययौ स्वं च निवेशनम्॥ ४५॥

लक्ष्मण से ऐसा कहकर श्रीराम ने दोनों माताओं को प्रणाम किया और सीता को भी साथ चलने की आज्ञा दिलाकर वे उनको लिये हुए अपने महल में चले गये॥४५॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे चतुर्थः सर्गः॥४॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में चौथा सर्ग पूरा हुआ।४॥

अयोध्याकाण्डम्
पञ्चमः सर्गः (सर्ग 5)

( वसिष्ठजी का सीता सहित श्रीराम को उपवास व्रत की दीक्षा देना,राजा दशरथ का अन्तःपुर में प्रवेश )

संदिश्य रामं नृपतिः श्वोभाविन्यभिषेचने।
पुरोहितं समाहूय वसिष्ठमिदमब्रवीत्॥१॥

उधर महाराज दशरथ जब श्रीरामचन्द्रजी को दूसरे दिन होने वाले अभिषेक के विषय में आवश्यक संदेश दे चुके, तब अपने पुरोहित वसिष्ठ जीको बुलाकर । बोले- ॥१॥

गच्छोपवासं काकुत्स्थं कारयाद्य तपोधन।
श्रेयसे राज्यलाभाय वध्वा सह यतव्रत॥२॥

‘नियमपूर्वक व्रत का पालन करने वाले तपोधन ! आप जाइये और विघ्न निवारण रूप कल्याण की सिद्धि तथा राज्य की प्राप्ति के लिये बहू सहित श्रीराम से उपवास व्रत का पालन कराइये ॥२॥

तथेति च स राजानमुक्त्वा वेदविदां वरः।
स्वयं वसिष्ठो भगवान् ययौ रामनिवेशनम्॥३॥
उपवासयितुं वीरं मन्त्रविन्मन्त्रकोविदम्।
ब्राह्मं रथवरं युक्तमास्थाय सुधृतव्रतः॥४॥

तब राजा से ‘तथास्तु’ कहकर वेदवेत्ता विद्वानों में श्रेष्ठ तथा उत्तम व्रतधारी स्वयं भगवान् वसिष्ठ मन्त्रवेत्ता वीर श्रीराम को उपवास-व्रत की दीक्षा देने के लिये ब्राह्मण के चढ़ने योग्य जुते-जुताये श्रेष्ठ रथ पर आरूढ़ हो श्रीराम के महल की ओर चल दिये। ३-४॥

स रामभवनं प्राप्य पाण्डुराभ्रघनप्रभम्।
तिस्रः कक्ष्या रथेनैव विवेश मुनिसत्तमः॥५॥

श्रीराम का भवन श्वेत बादलों के समान उज्ज्वल था, उसके पास पहुँचकर मुनिवर वसिष्ठ ने उसकी तीन ड्योढ़ियों में रथ के द्वारा ही प्रवेश किया॥ ५ ॥

तमागतमृषिं रामस्त्वरन्निव ससम्भ्रमम्।
मानयिष्यन् स मानाहँ निश्चक्राम निवेशनात्॥

वहाँ पधारे हुए उन सम्माननीय महर्षि का सम्मान करनेके लिये श्रीरामचन्द्रजी बड़ी उतावली के साथ वेगपूर्वक घर से बाहर निकले॥६॥

अभ्येत्य त्वरमाणोऽथ रथाभ्याशं मनीषिणः।
ततोऽवतारयामास परिगृह्य रथात् स्वयम्॥७॥

उन मनीषी महर्षि के रथ के समीप शीघ्रतापूर्वक जाकर श्रीराम ने स्वयं उनका हाथ पकड़कर उन्हें रथ से नीचे उतारा॥७॥

स चैनं प्रश्रितं दृष्ट्वा सम्भाष्याभिप्रसाद्य च।
प्रियाहँ हर्षयन् राममित्युवाच पुरोहितः॥८॥

श्रीराम प्रिय वचन सुनने के योग्य थे। उन्हें इतना विनीत देखकर पुरोहितजी ने ‘वत्स!’ कहकर पुकारा और उन्हें प्रसन्न करके उनका हर्ष बढ़ाते हुए इस प्रकार कहा- ॥८॥

प्रसन्नस्ते पिता राम यत्त्वं राज्यमवाप्स्यसि।
उपवासं भवानद्य करोतु सह सीतया॥९॥

‘श्रीराम! तुम्हारे पिता तुम पर बहुत प्रसन्न हैं, क्योंकि तुम्हें उनसे राज्य प्राप्त होगा; अतः आज की रात में तुम वधू सीता के साथ उपवास करो॥९॥

प्रातस्त्वामभिषेक्ता हि यौवराज्ये नराधिपः।
पिता दशरथः प्रीत्या ययातिं नहुषो यथा॥१०॥

‘रघुनन्दन! जैसे नहुष ने ययाति का अभिषेक किया था, उसी प्रकार तुम्हारे पिता महाराज दशरथ कल प्रातःकाल बड़े प्रेम से तुम्हारा युवराज-पद पर अभिषेक करेंगे’ ॥ १०॥

इत्युक्त्वा स तदा राममुपवासं यतव्रतः।
मन्त्रवत् कारयामास वैदेह्या सहितं शुचिः॥ ११॥

ऐसा कहकर उन व्रतधारी एवं पवित्र महर्षि ने मन्त्रोच्चारणपूर्वक सीता सहित श्रीराम को उस समय उपवास-व्रत की दीक्षा दी॥ ११॥

ततो यथावद् रामेण स राज्ञो गुरुरर्चितः।
अभ्यनुज्ञाप्य काकुत्स्थं ययौ रामनिवेशनात्॥ १२॥

तदनन्तर श्रीरामचन्द्रजी ने महाराज के भी गुरु वसिष्ठ का यथावत् पूजन किया; फिर वे मुनि श्रीराम की अनुमति ले उनके महल से बाहर निकले।१२॥

सुहृद्भिस्तत्र रामोऽपि सहासीनः प्रियंवदैः।
सभाजितो विवेशाथ ताननुज्ञाप्य सर्वशः॥१३॥

श्रीराम भी वहाँ प्रियवचन बोलने वाले सुहृदों के साथ कुछ देर तक बैठे रहे; फिर उनसे सम्मानित हो उन सबकी अनुमति ले पुनः अपने महल के भीतर चले गये॥ १३॥

हृष्टनारीनरयुतं रामवेश्म तदा बभौ।
यथा मत्तद्विजगणं प्रफुल्लनलिनं सरः॥१४॥

उस समय श्रीराम का भवन हर्षोत्फुल्ल नर नारियों से भरा हुआ था और मतवाले पक्षियों के कलरवों से युक्त खिले हए कमल वाले तालाब के समान शोभा पा रहा था॥ १४ ॥

स राजभवनप्रख्यात् तस्माद् रामनिवेशनात्।
निर्गत्य ददृशे मार्ग वसिष्ठो जनसंवृतम्॥१५॥

राजभवनों में श्रेष्ठ श्रीराम के महल से बाहर आकर वसिष्ठजी ने सारे मार्ग मनुष्यों की भीड़ से भरे हुए देखे॥ १५॥

वृन्दवृन्दैरयोध्यायां राजमार्गाः समन्ततः।
बभूवुरभिसम्बाधाः कुतूहलजनैर्वृताः॥१६॥

अयोध्या की सड़कों पर सब ओर झुंड-के-झुंड मनुष्य, जो श्रीराम का राज्याभिषेक देखने के लिये उत्सुक थे, खचाखच भरे हुए थे; सारे राजमार्ग उनसे घिरे हुए थे।

जनवृन्दोर्मिसंघर्षहर्षस्वनवृतस्तदा।
बभूव राजमार्गस्य सागरस्येव निःस्वनः॥१७॥

जनसमुदायरूपी लहरों के परस्पर टकराने से उस समय जो हर्षध्वनि प्रकट होती थी, उससे व्याप्त हुआ राजमार्ग का कोलाहल समुद्र की गर्जना की भाँति सुनायी देता था॥ १७॥

सिक्तसम्मृष्टरथ्या हि तथा च वनमालिनी।
आसीदयोध्या तदहः समुच्छ्रितगृहध्वजा॥१८॥

उस दिन वन और उपवनोंकी पंक्तियोंसे सुशोभित हुई अयोध्यापुरीके घर-घरमें ऊँची-ऊँची ध्वजाएँ फहरा रही थीं; वहाँकी सभी गलियों और सड़कोंको झाड़-बुहारकर वहाँ छिड़काव किया गया था॥ १८ ॥

तदा ह्ययोध्यानिलयः सस्त्रीबालाकुलो जनः।
रामाभिषेकमाकांक्षन्नाकांक्षन्नुदयं रवेः॥१९॥

स्त्रियों और बालकों सहित अयोध्यावासी जनसमुदाय श्रीराम के राज्याभिषेक को देखने की इच्छा से उस समय शीघ्र सूर्योदय होने की कामना कर रहा था॥ १९॥

प्रजालंकारभूतं च जनस्यानन्दवर्धनम्।
उत्सुकोऽभूज्जनो द्रष्टुं तमयोध्यामहोत्सवम्॥ २०॥

अयोध्या का वह महान् उत्सव प्रजाओं के लिये अलंकार रूप और सब लोगों के आनन्द को बढ़ाने वाला था; वहाँ के सभी मनुष्य उसे देखने के लिये उत्कण्ठित हो रहे थे॥२०॥

एवं तज्जनसम्बाधं राजमार्ग पुरोहितः।
व्यूहन्निव जनौघं तं शनै राजकुलं ययौ॥२१॥

इस प्रकार मनुष्यों की भीड़ से भरे हुए राजमार्गपर पहुँचकर पुरोहित जी उस जनसमूह को एक ओर करते हए-से धीरे-धीरे राजमहल की ओर गये।। २१॥

सिताभ्रशिखरप्रख्यं प्रासादमधिरुह्य च।
समीयाय नरेन्द्रेण शक्रेणेव बृहस्पतिः॥२२॥

श्वेत जलद-खण्ड के समान सुशोभित होने वाले महल के ऊपर चढ़कर वसिष्ठजी राजा दशरथ से उसी प्रकार मिले, जैसे बृहस्पति देवराज इन्द्र से मिल रहे हों॥ २२॥

तमागतमभिप्रेक्ष्य हित्वा राजासनं नृपः।
पप्रच्छ स्वमतं तस्मै कृतमित्यभिवेदयत्॥२३॥

उन्हें आया देख राजा सिंहासन छोड़कर खड़े हो गये और पूछने लगे—’मुने! क्या आपने मेरा अभिप्राय सिद्ध किया।’ वसिष्ठजी ने उत्तर दिया-‘हाँ! कर दिया’॥ २३॥

तेन चैव तदा तुल्यं सहासीनाः सभासदः।
आसनेभ्यः समुत्तस्थुः पूजयन्तः पुरोहितम्॥ २४॥

उनके साथ ही उस समय वहाँ बैठे हुए अन्य सभासद् भी पुरोहित का समादर करते हुए अपने अपने आसनों से उठकर खड़े हो गये॥२४॥

गुरुणा त्वभ्यनुज्ञातो मनुजौघं विसृज्य तम्।
विवेशान्तःपुरं राजा सिंहो गिरिगुहामिव ॥२५॥

तदनन्तर गुरुजी की आज्ञा ले राजा दशरथ ने उस जनसमुदाय को विदा करके पर्वत की कन्दरा में घुसने वाले सिंह के समान अपने अन्तःपुर में प्रवेश किया॥ २५॥

तदग्र्यवेषप्रमदाजनाकुलं महेन्द्रवेश्मप्रतिमं निवेशनम्।
व्यदीपयंश्चारु विवेश पार्थिवःशशीव तारागणसंकुलं नभः॥२६॥

सुन्दर वेश-भूषा धारण करने वाली सुन्दरियों से भरे हुए इन्द्र सदन के समान उस मनोहर राजभवन को अपनी शोभा से प्रकाशित करते हुए राजा दशरथ ने उसके भीतर उसी प्रकार प्रवेश किया, जैसे चन्द्रमा ताराओं से भरे हुए आकाश में पदार्पण करते हैं ॥ २६ ॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे पञ्चमः सर्गः॥५॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में पाँचवाँ सर्ग पूरा हुआ।५॥

अयोध्याकाण्डम्
षष्ठः सर्गः (सर्ग 6)

( सीता सहित श्रीराम का नियम परायण होना, हर्ष में भरे पुरवासियों द्वारा नगर की सजावट )

गते पुरोहिते रामः स्नातो नियतमानसः।
सह पत्न्या विशालाक्ष्या नारायणमुपागमत्॥१॥

पुरोहितजी के चले जाने पर मन को संयम में रखने वाले श्रीराम ने स्नान करके अपनी विशाललोचना पत्नी के साथ श्रीनारायण की* उपासना आरम्भ की॥१॥
* ऐसा माना जाता है कि यहाँ नारायण शब्द से श्रीरङ्गनाथजी की वह अर्चा-मूर्ति अभिप्रेत है; जो कि पूर्वजों के समय से ही दीर्घकाल तक अयोध्या में उपास्य देवता के रूपमें  रही। बाद में श्रीरामजी ने वह मूर्ति विभीषण को दे दी थी, जिससे वह वर्तमान श्रीरंगक्षेत्र में पहुँची। इसकी विस्तृत कथा पद्मपुराणमें है।

प्रगृह्य शिरसा पात्री हविषो विधिवत् ततः।
महते दैवतायाज्यं जुहाव ज्वलितानले ॥२॥

उन्होंने हविष्य-पात्रको सिर झुकाकर नमस्कार किया और प्रज्वलित अग्निमें महान् देवता (शेषशायी नारायण) की प्रसन्नताके लिये विधिपूर्वक उस हविष्यकी आहुति दी॥२॥

शेषं च हविषस्तस्य प्राश्याशास्यात्मनः प्रियम्।
ध्यायन्नारायणं देवं स्वास्तीर्णे कुशसंस्तरे॥३॥
वाग्यतः सह वैदेह्या भूत्वा नियतमानसः।।
श्रीमत्यायतने विष्णोः शिश्ये नरवरात्मजः॥४॥

तत्पश्चात् अपने प्रिय मनोरथ की सिद्धिका संकल्प लेकर उन्होंने उस यज्ञशेष हविष्य का भक्षण किया और मन को संयम में रखकर मौन हो वे राजकुमार श्रीराम विदेहनन्दिनी सीता के साथ भगवान् विष्णु के सुन्दर मन्दिर में श्रीनारायण देव का ध्यान करते हुए वहाँ अच्छी तरह बिछी हुई कुश की चटाईपर सोये॥ ३-४॥

एकयामावशिष्टायां रात्र्यां प्रतिविबुध्य सः।
अलंकारविधिं सम्यक् कारयामास वेश्मनः॥५॥

जब तीन पहर बीतकर एक ही पहर रात शेष रह गयी, तब वे शयन से उठ बैठे। उस समय उन्होंने सभामण्डप को सजाने के लिये सेवकों को आज्ञा दी॥

तत्र शृण्वन् सुखा वाचः सूतमागधवन्दिनाम्।
पूर्वां संध्यामुपासीनो जजाप सुसमाहितः॥६॥

वहाँ सूत, मागध और बंदियों की श्रवणसुखद वाणी सुनते हुए श्रीराम ने प्रातःकालिक संध्योपासना की; फिर एकाग्रचित्त होकर वे जप करने लगे॥६॥

तुष्टाव प्रणतश्चैव शिरसा मधुसूदनम्।
विमलक्षौमसंवीतो वाचयामास स द्विजान्॥७॥

तदनन्तर रेशमी वस्त्र धारण किये हुए श्रीराम ने मस्तक झुकाकर भगवान् मधुसूदन को प्रणाम और उनका स्तवन किया; इसके बाद ब्राह्मणों से स्वस्तिवाचन कराया॥७॥

तेषां पुण्याहघोषोऽथ गम्भीरमधुरस्तथा।
अयोध्यां पूरयामास तूर्यघोषानुनादितः॥८॥

उन ब्राह्मणों का पुण्याहवाचन सम्बन्धी गम्भीर एवं मधुर घोष नाना प्रकार के वाद्यों की ध्वनि से व्याप्त होकर सारी अयोध्यापुरी में फैल गया॥८॥

कृतोपवासं तु तदा वैदेह्या सह राघवम्।
अयोध्यानिलयः श्रुत्वा सर्वः प्रमुदितो जनः॥९॥

उस समय अयोध्यावासी मनुष्यों ने जब यह सुना कि श्रीरामचन्द्रजी ने सीताके साथ उपवास-व्रत आरम्भ कर दिया है, तब उन सबको बड़ी प्रसन्नता हुई॥९॥

ततः पौरजनः सर्वः श्रुत्वा रामाभिषेचनम्।
प्रभातां रजनीं दृष्ट्वा चक्रे शोभयितुं पुरीम्॥ १०॥

सबेरा होने पर श्रीराम के राज्याभिषेक का समाचार सुनकर समस्त पुरवासी अयोध्यापुरी को सजाने में लग गये॥ १० ॥

सिताभ्रशिखराभेषु देवतायतनेषु च।
चतुष्पथेषु रथ्यासु चैत्येष्वट्टालकेषु च ॥११॥
नानापण्यसमृद्धेषु वणिजामापणेषु च।
कुटुम्बिनां समृद्धेषु श्रीमत्सु भवनेषु च ॥१२॥
सभासु चैव सर्वासु वृक्षेष्वालक्षितेषु च।
ध्वजाः समुच्छ्रिताः साधु पताकाश्चाभवंस्तथा॥ १३॥

जिनके शिखरों पर श्वेत बादल विश्राम करते हैं, उन पर्वतों के समान गगनचुम्बी देवमन्दिरों, चौराहों, गलियों, देववृक्षों, समस्त सभाओं, अट्टालिकाओं, नाना प्रकार की बेचने योग्य वस्तुओं से भरी हुई व्यापारियों की बड़ी-बड़ी दूकानों तथा कुटुम्बी गृहस्थों के सुन्दर समृद्धिशाली भवनों में और दर से दिखायी देने वाले वृक्षों पर भी ऊँची ध्वजाएँ लगायी गयीं और उनमें पताकाएँ फहरायी गयीं॥ ११–१३॥

नटनर्तकसङ्घानां गायकानां च गायताम्।
मनःकर्णसुखा वाचः शुश्राव जनता ततः॥१४॥

उस समय वहाँ की जनता सब ओर नटों और नर्तकों के समूहों तथा गाने वाले गायकों की मन और कानों को सुख देने वाली वाणी सुनती थी॥ १४ ॥

रामाभिषेकयुक्ताश्च कथाश्चक्रुर्मिथो जनाः।
रामाभिषेके सम्प्राप्ते चत्वरेषु गृहेषु च ॥१५॥

श्रीराम के राज्याभिषेक का शुभ अवसर प्राप्त होने पर प्रायः सब लोग चौराहों पर और घरों में भी आपस में श्रीराम के राज्याभिषेक की ही चर्चा करते थे॥ १५॥

बाला अपि क्रीडमाना गृहद्वारेषु सङ्घशः।
रामाभिषवसंयुक्ताश्चक्रुरेव कथा मिथः॥१६॥

घरों के दरवाजों पर खेलते हुए झुंड-के-झुंड बालक भी आपस में श्रीराम के राज्याभिषेक की ही बातें करते थे॥१६॥

कृतपुष्पोपहारश्च धूपगन्धाधिवासितः।
राजमार्गः कृतः श्रीमान् पौरै रामाभिषेचने॥ १७॥

पुरवासियों ने श्रीराम के राज्याभिषेक के समय राजमार्ग पर फूलों की भेंट चढ़ाकर वहाँ सब ओर धूप की सुगन्ध फैला दी; ऐसा करके उन्होंने राजमार्ग को बहुत सुन्दर बना दिया॥ १७ ॥

प्रकाशकरणार्थं च निशागमनशङ्कया।
दीपवृक्षांस्तथा चक्रुरनुरथ्यासु सर्वशः॥१८॥

राज्याभिषेक होते-होते रात हो जाने की आशङ्का से प्रकाश की व्यवस्था करने के लिये पुरवासियों ने सब ओर सड़कों के दोनों तरफ वृक्ष की भाँति अनेक शाखाओं से युक्त दीपस्तम्भ खड़े कर दिये॥ १८॥

अलंकारं पुरस्यैवं कृत्वा तत् पुरवासिनः।
आकांक्षमाणा रामस्य यौवराज्याभिषेचनम्॥ १९॥
समेत्य सङ्घशः सर्वे चत्वरेषु सभासु च।
कथयन्तो मिथस्तत्र प्रशशंसुर्जनाधिपम्॥२०॥

इस प्रकार नगर को सजाकर श्रीराम के युवराज पद पर अभिषेक की अभिलाषा रखने वाले समस्त पुरवासी चौराहों और सभाओं में झुंड-के-झुंड एकत्र हो वहाँ परस्पर बातें करते हुए महाराज दशरथ की प्रशंसा करने लगे—॥

अहो महात्मा राजायमिक्ष्वाकुकुलनन्दनः।
ज्ञात्वा वृद्धं स्वमात्मानं रामं राज्येऽभिषेक्ष्यति॥ २१॥

‘अहो! इक्ष्वाकुकुल को आनन्दित करने वाले ये राजा दशरथ बड़े महात्मा हैं, जो कि अपने-आपको बूढ़ा हुआ जानकर श्रीराम का राज्याभिषेक करने जा रहे हैं।

सर्वे ह्यनुगृहीताः स्म यन्नो रामो महीपतिः।
चिराय भविता गोप्ता दृष्टलोकपरावरः॥२२॥

‘भगवान् का हम सब लोगों पर बड़ा अनुग्रह है कि श्रीरामचन्द्रजी हमारे राजा होंगे और चिरकाल तक हमारी रक्षा करते रहेंगे; क्योंकि वे समस्त लोकों के निवासियों में जो भलाई या बुराई है, उसे अच्छी तरह देख चुके हैं।

अनुद्धतमना विद्वान् धर्मात्मा भ्रातृवत्सलः।
यथा च भ्रातृषु स्निग्धस्तथास्मास्वपि राघवः॥ २३॥

‘श्रीराम का मन कभी उद्धत नहीं होता। वे विद्वान्, धर्मात्मा और अपने भाइयों पर स्नेह रखने वाले हैं। उनका अपने भाइयों पर जैसा स्नेह है, वैसा ही हम लोगों पर भी है।

चिरं जीवतु धर्मात्मा राजा दशरथोऽनघः।
यत्प्रसादेनाभिषिक्तं रामं द्रक्ष्यामहे वयम्॥२४॥

‘धर्मात्मा एवं निष्पाप राजा दशरथ चिरकालतक जीवित रहें, जिनके प्रसाद से हमें श्रीराम के राज्याभिषेक का दर्शन सुलभ होगा’ ॥ २४॥

एवंविधं कथयतां पौराणां शुश्रुवुः परे।
दिग्भ्यो विश्रुतवृत्तान्ताः प्राप्ता जानपदा जनाः॥ २५॥

अभिषेक का वृत्तान्त सुनकर नाना दिशाओं से उस जनपद के लोग भी वहाँ पहुँचे थे, उन्होंने उपर्युक्त बातें कहने वाले पुरवासियों की सभी बातें सुनीं ॥ २५ ॥

ते तु दिग्भ्यः पुरीं प्राप्ता द्रष्टुं रामाभिषेचनम्।
रामस्य पूरयामासुः पुरीं जानपदा जनाः॥२६॥

वे सब-के-सब श्रीराम का राज्याभिषेक देखने के लिये अनेक दिशाओं से अयोध्यापुरी में आये थे। उनजनपद निवासी मनुष्यों ने श्रीरामपुरी को अपनी उपस्थिति से भर दिया था॥ २६ ॥

जनौघैस्तैर्विसर्पद्भिः शुश्रुवे तत्र निःस्वनः।
पर्वसूदीर्णवेगस्य सागरस्येव निःस्वनः॥२७॥

वहाँ मनुष्यों की भीड़-भाड़ बढ़ने से जो जनरव सुनायी देता था, वह पर्वो के दिन बढ़े हुए वेग वाले महासागर की गर्जना के समान जान पड़ता था॥ २७॥

ततस्तदिन्द्रक्षयसंनिभं पुरं दिदृक्षुभिर्जानपदैरुपाहितैः।
समन्ततः सस्वनमाकुलं बभौ समुद्रयादोभिरिवार्णवोदकम्॥२८॥

उस समय श्रीराम के अभिषेक का उत्सव देखने के लिये पधारे हुए जनपदवासी मनुष्यों द्वारा सब ओर से भरा हुआ वह इन्द्रपुरी के समान नगर अत्यन्त कोलाहलपूर्ण होने के कारण मकर, नक्र, तिमिङ्गल आदि विशाल जल-जन्तुओं से परिपूर्ण महासागर के समान प्रतीत होता था॥ २८॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे षष्ठः सर्गः॥६॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में छठा सर्ग पूरा हुआ।६॥

अयोध्याकाण्डम्
सप्तमः सर्गः (सर्ग 7)

( मन्थरा का कैकेयी को उभाड़ना, कैकेयी का उसे पुरस्कार  में आभूषण देना और वर माँगने के लिये प्रेरित करना )

ज्ञातिदासी यतो जाता कैकेय्या तु सहोषिता।
प्रासादं चन्द्रसंकाशमारुरोह यदृच्छया॥१॥

रानी कैकेयी के पास एक दासी थी, जो उसके मायके से आयी हुई थी। वह सदा कैकेयी के ही साथ रहा करती थी। उसका जन्म कहाँ हुआ था? उसके देश और माता-पिता कौन थे? इसका पता किसी को नहीं था। अभिषेक से एक दिन पहले वह स्वेच्छा से ही कैकेयी के चन्द्रमा के समान कान्तिमान् महल की छत पर जा चढ़ी ॥१॥

सिक्तराजपथां कृत्स्ना प्रकीर्णकमलोत्पलाम्।
अयोध्यां मन्थरा तस्मात् प्रासादादन्ववैक्षत ॥२॥

उस दासी का नाम था-मन्थरा। उसने उस महल की छत से देखा-अयोध्या की सड़कों पर छिड़काव किया गया है और सारी पुरी में यत्र-तत्र खिले हुए कमल और उत्पल बिखेरे गये हैं॥२॥

पताकाभिर्वरारंभिर्ध्वजैश्च समलंकृताम्।
सिक्तां चन्दनतोयैश्च शिरःस्नातजनैर्युताम्॥३॥

सब ओर बहुमूल्य पताकाएँ फहरा रही हैं। ध्वजाओं से इस पुरी की अपूर्व शोभा हो रही है। राज मार्गों पर चन्दन मिश्रित जल का छिड़काव किया गया है तथा अयोध्यापुरी के सब लोग उबटन लगाकर सिर के ऊपर से स्नान किये हुए हैं॥३॥

माल्यमोदकहस्तैश्च द्विजेन्द्रैरभिनादिताम्।
शुक्लदेवगृहद्वारां सर्ववादित्रनादिताम्॥४॥
सम्प्रहृष्टजनाकीर्णां ब्रह्मघोषनिनादिताम्।
प्रहृष्टवरहस्त्यश्वां सम्प्रणर्दितगोवृषाम्॥५॥

श्रीराम के दिये हुए माल्य और मोदक हाथ में लिये श्रेष्ठ ब्राह्मण हर्षनाद कर रहे हैं, देवमन्दिरों के दरवाजे चूने और चन्दन आदि से लीपकर सफेद एवं सुन्दर बनाये गये हैं, सब प्रकार के बाजों की मनोहर ध्वनि हो रही है, अत्यन्त हर्ष में भरे हुए मनुष्यों से सारा नगरपरिपूर्ण है और चारों ओर वेदपाठकों की ध्वनि गँज रही है, श्रेष्ठ हाथी और घोड़े हर् षसे उत्फुल्ल दिखायी देते हैं तथा गाय-बैल प्रसन्न होकर रँभा रहे हैं। ४-५॥

हृष्टप्रमुदितैः पौरैरुच्छ्रितध्वजमालिनीम्।
अयोध्यां मन्थरा दृष्ट्वा परं विस्मयमागता॥६॥

सारे नगर निवासी हर्षजनित रोमाञ्च से युक्त और आनन्द मग्न हैं तथा नगर में सब ओर श्रेणी बद्ध ऊँचे ऊँचे ध्वज फहरा रहे हैं। अयोध्या की ऐसी शोभा को देखकर मन्थरा को बड़ा आश्चर्य हुआ॥६॥

सा हर्षोत्फुल्लनयनां पाण्डुरक्षौमवासिनीम्।
अविदूरे स्थितां दृष्ट्वा धात्री पप्रच्छ मन्थरा॥७॥

उसने पास के ही कोठे पर राम की धाय को खड़ी देखा, उसके नेत्र प्रसन्नता से खिले हुए थे और शरीर पर पीले रंग की रेशमी साड़ी शोभा पा रही थी। उसे देखकर मन्थरा ने उससे पूछा- ॥७॥

उत्तमेनाभिसंयुक्ता हर्षेणार्थपरा सती।
राममाता धनं किं नु जनेभ्यः सम्प्रयच्छति॥८॥
अतिमात्रं प्रहर्षः किं जनस्यास्य च शंस मे।
कारयिष्यति किं वापि सम्प्रहृष्टो महीपतिः॥९॥

‘धाय! आज श्रीरामचन्द्रजी की माता अपने किसी अभीष्ट मनोरथ के साधन में तत्पर हो अत्यन्त हर्ष में भरकर लोगों को धन क्यों बाँट रही हैं? आज यहाँ के सभी मनुष्यों को इतनी अधिक प्रसन्नता क्यों है? इसका कारण मुझे बताओ! आज महाराज दशरथ अत्यन्त प्रसन्न होकर कौन-सा कर्म करायेंगे’। ८-९॥

विदीर्यमाणा हर्षेण धात्री तु परया मुदा।
आचचक्षेऽथ कुब्जायै भूयसीं राघवे श्रियम्॥ १०॥
श्वः पुष्येण जितक्रोधं यौवराज्येन चानघम्।
राजा दशरथो राममभिषेक्ता हि राघवम्॥११॥

श्रीराम की धाय तो हर्ष से फूली नहीं समाती थी, उसने कुब्जा के पूछने पर बड़े आनन्द के साथ उसे बताया—’कुब्जे! रघुनाथजी को बहुत बड़ी सम्पत्ति प्राप्त होने वाली है। कल महाराज दशरथ पुष्य नक्षत्र के योग में क्रोध को जीतने वाले, पापरहित, रघुकुलनन्दन श्रीराम को युवराज के पद पर अभिषिक्त करेंगे’। १०-११॥

धात्र्यास्तु वचनं श्रुत्वा कुब्जा क्षिप्रममर्षितः।
कैलासशिखराकारात् प्रासादादवरोहत॥१२॥

धाय का यह वचन सुनकर कुब्जा मन-ही-मन कुढ़ गयी और उस कैलास-शिखर की भाँति उज्ज्वल एवं गगनचुम्बी प्रासाद से तुरंत ही नीचे उतर गयी।॥ १२ ॥

सा दह्यमाना क्रोधेन मन्थरा पापदर्शिनी।
शयानामेव कैकेयीमिदं वचनमब्रवीत्॥१३॥

मन्थरा को इसमें कैकेयी का अनिष्ट दिखायी देता था, वह क्रोध से जल रही थी। उसने महल में लेटी हुई कैकेयी के पास जाकर इस प्रकार कहा- ॥ १३ ॥

उत्तिष्ठ मूढे किं शेषे भयं त्वामभिवर्तते।
उपप्लुतमघौघेन नात्मानमवबुध्यसे॥१४॥

‘मूर्खे! उठ। क्या सो रही है? तुझपर बड़ा भारी भय आ रहा है। अरी! तेरे ऊपर विपत्ति का पहाड़ टूट पड़ा है, फिर भी तुझे अपनी इस दुरवस्था का बोध नहीं होता?’ ॥१४॥

अनिष्टे सुभगाकारे सौभाग्येन विकत्थसे।
चलं हि तव सौभाग्यं नद्याः स्रोत इवोष्णगे॥ १५॥

‘तेरे प्रियतम तेरे सामने ऐसा आकार बनाये आते हैं मानो सारा सौभाग्य तुझे ही अर्पित कर देते हों, परंतु पीठ-पीछे वे तेरा अनिष्ट करते हैं। तू उन्हें अपने में अनुरक्त जानकर सौभाग्य की डींग हाँका करती है, परंतु जैसे ग्रीष्म ऋतु में नदी का प्रवाह सूखता चला जाता है, उसी प्रकार तेरा वह सौभाग्य अब अस्थिर हो गया है तेरे हाथ से चला जाना चाहता है!’॥ १५॥

एवमुक्ता तु कैकेयी रुष्टया परुषं वचः।
कुब्जया पापदर्शिन्या विषादमगमत् परम्॥१६॥

इष्टमें भी अनिष्टका दर्शन करानेवाली रोषभरी कुब्जाके इस प्रकार कठोर वचन कहनेपर कैकेयीके मनमें बड़ा दुःख हुआ॥ १६॥

कैकेयी त्वब्रवीत् कुब्जां कच्चित् क्षेमं न मन्थरे।
विषण्णवदनां हि त्वां लक्षये भृशदुःखिताम्॥ १७॥

उस समय केकयराजकुमारी ने कुब्जा से पूछा —’मन्थरे ! कोई अमङ्गल की बात तो नहीं हो गयी; क्योंकि तेरे मुख पर विषाद छा रहा है और तू मुझे बहुत दुःखी दिखायी देती है’ ॥ १७ ॥

मन्थरा तु वचः श्रुत्वा कैकेय्या मधुराक्षरम्।
उवाच क्रोधसंयुक्ता वाक्यं वाक्यविशारदा॥ १८॥
सा विषण्णतरा भूत्वा कुब्जा तस्यां हितैषिणी।
विषादयन्ती प्रोवाच भेदयन्ती च राघवम्॥१९॥

मन्थरा बातचीत करने में बड़ी कुशल थी, वह कैकेयी के मीठे वचन सुनकर और भी खिन्न हो गयी, उसके प्रति अपनी हितैषिता प्रकट करती हुई कुपित हो उठी और कैकेयी के मन में श्रीराम के प्रति भेदभाव और विषाद उत्पन्न करती हुई इस प्रकार बोली- ॥

अक्षयं सुमहद् देवि प्रवृत्तं त्वद्विनाशनम्।
रामं दशरथो राजा यौवराज्येऽभिषेक्ष्यति॥२०॥

‘देवि! तुम्हारे सौभाग्य के महान् विनाश का कार्य आरम्भ हो गया है, जिसका कोई प्रतीकार नहीं है। कल महाराज दशरथ श्रीराम को युवराज के पद पर अभिषिक्त कर देंगे॥२०॥

सासम्यगाधे भये मग्ना दुःखशोकसमन्विता।
दह्यमानानलेनेव त्वद्धितार्थमिहागता॥२१॥

‘यह समाचार पाकर मैं दुःख और शोक से व्याकुल हो अगाध भय के समुद्र में डूब गयी हूँ, चिन्ता की आग से मानो जली जा रही हूँ और तुम्हारे हित की बात बताने के लिये यहाँ आयी हूँ’॥२१॥

तव दुःखेन कैकेयि मम दुःखं महद् भवेत्।
त्ववृद्धौ मम वृद्धिश्च भवेदिह न संशयः॥ २२॥

‘केकयनन्दिनि! यदि तुम पर कोई दुःख आया तो उससे मुझे भी बड़े भारी दुःख में पड़ना होगा। तुम्हारी उन्नति में ही मेरी भी उन्नति है, इसमें संशय नहीं है। २२॥

नराधिपकुले जाता महिषी त्वं महीपतेः।
उग्रत्वं राजधर्माणां कथं देवि न बुध्यसे॥२३॥

‘देवि! तुम राजाओं के कुल में उत्पन्न हुई हो और एक महाराज की महारानी हो, फिर भी राजधर्मो की उग्रता को कैसे नहीं समझ रही हो? ॥ २३॥

धर्मवादी शठो भर्ता श्लक्ष्णवादी च दारुणः।
शुद्धभावेन जानीषे तेनैवमतिसंधिता॥२४॥

‘तुम्हारे स्वामी धर्म की बातें तो बहुत करते हैं, परंतु हैं बड़े शठ मुँह से चिकनी-चुपड़ी बातें करते हैं, परंतु हृदय के बड़े क्रूर हैं। तुम समझती हो कि वे सारी बातें शुद्ध भाव से ही कहते हैं, इसीलिये आज उनके द्वारा तुम बेतरह ठगी गयी॥ २४ ॥

उपस्थितः प्रयुञ्जानस्त्वयि सान्त्वमनर्थकम्।
अर्थेनैवाद्य ते भर्ता कौसल्यां योजयिष्यति॥ २५॥

‘तुम्हारे पति तुम्हें व्यर्थ सान्त्वना देने के लिये यहाँ उपस्थित होते हैं, वे ही अब रानी कौसल्या को अर्थ से सम्पन्न करने जा रहे हैं।॥ २५॥

अपवाह्य तु दुष्टात्मा भरतं तव बन्धुषु।
काल्ये स्थापयिता रामं राज्ये निहतकण्टके। २६॥

‘उनका हृदय इतना दूषित है कि भरत को तो उन्होंने तुम्हारे मायके भेज दिया और कल सबेरे ही अवध के निष्कण्टक राज्यपर वे श्रीराम का अभिषेक करेंगे॥२६॥

शत्रुः पतिप्रवादेन मात्रेव हितकाम्यया।
आशीविष इवाङ्गेन बाले परिधृतस्त्वया॥२७॥

‘बाले! जैसे माता हित की कामना से पुत्र का पोषण करती है, उसी प्रकार ‘पति’ कहलाने वाले जिस व्यक्ति का तुमने पोषण किया है, वह वास्तव में शत्रुनिकला जैसे कोई अज्ञानवश सर्प को अपनी गोद में लेकर उसका लालन करे, उसी प्रकार तुमने उन सर्पवत् बर्ताव करने वाले महाराज को अपने अङ्क में स्थान दिया है।॥ २७॥

यथा हि कुर्याच्छत्रुर्वा सो वा प्रत्युपेक्षितः।
राज्ञा दशरथेनाद्य सपुत्रा त्वं तथा कृता॥२८॥

‘उपेक्षित शत्रु अथवा सर्प जैसा बर्ताव कर सकता है, राजा दशरथ ने आज पुत्र सहित तुझ कैकेयी के प्रति वैसा ही बर्ताव किया है॥२८॥

पापेनानृतसान्त्वेन बाले नित्यं सुखोचिता।
रामं स्थापयता राज्ये सानुबन्धा हता ह्यसि॥ २९॥

‘बाले! तुम सदा सुख भोगने के योग्य हो, परंतु मन में पाप (दुर्भावना) रखकर ऊपर से झूठी सान्त्वना देने वाले महाराज ने अपने राज्य पर श्रीराम को स्थापित करने का विचार करके आज सगे-सम्बन्धियों सहित तुमको मानो मौत के मुखमें डाल दिया है।। २९ ॥

सा प्राप्तकालं कैकेयि क्षिप्रं कुरु हितं तव।
त्रायस्व पुत्रमात्मानं मां च विस्मयदर्शने॥३०॥

‘केकयराजकुमारी! तुम दुःख जनक बात सुनकर भी मेरी ओर इस तरह देख रही हो, मानो तुम्हें प्रसन्नता हुई हो और मेरी बातों से तुम्हें विस्मय हो रहा हो, परंतु यह विस्मय छोड़ो और जिसे करने का समय आ गया है, अपने उस हितकर कार्य को शीघ्र करो तथा ऐसा करके अपनी, अपने पुत्र की और मेरी भी रक्षा करो’ ॥ ३०॥

मन्थराया वचः श्रुत्वा शयनात् सा शुभानना।
उत्तस्थौ हर्षसम्पूर्णा चन्द्रलेखेव शारदी॥३१॥

मन्थरा की यह बात सुनकर सुन्दर मुखवाली कैकेयी सहसा शय्या से उठ बैठी। उसका हृदय हर्ष से भर गया। वह शरत्पूर्णिमा के चन्द्रमण्डल की भाँति उद्दीप्त हो उठी॥ ३१॥

अतीव सा तु संतुष्टा कैकेयी विस्मयान्विता।
दिव्यमाभरणं तस्यै कुब्जायै प्रददौ शुभम्॥ ३२॥

कैकेयी मन-ही-मन अत्यन्त संतुष्ट हुई। विस्मयविमुग्ध हो मुसकराते हुए उसने कुब्जा को पुरस्कार के रूप में एक बहुत सुन्दर दिव्य आभूषण प्रदान किया॥ ३२॥

दत्त्वा त्वाभरणं तस्यै कुब्जायै प्रमदोत्तमा।
कैकेयी मन्थरां हृष्टा पुनरेवाब्रवीदिदम्॥३३॥
इदं तु मन्थरे मामाख्यातं परमं प्रियम्।
एतन्मे प्रियमाख्यातं किं वा भूयः करोमि ते॥ ३४॥

कुब्जा को वह आभूषण देकर हर्ष से भरी हुई रमणीशिरोमणि कैकेयी ने पुनः मन्थरा से इस प्रकार कहा—’मन्थरे! यह तूने मुझे बड़ा ही प्रिय समाचार सुनाया। तूने मेरे लिये जो यह प्रिय संवाद सुनाया, इसके लिये मैं तेरा और कौन-सा उपकार करूँ॥ ३३-३४॥

रामे वा भरते वाहं विशेषं नोपलक्षये।
तस्मात् तुष्टास्मि यद् राजा रामं राज्येऽभिषेक्ष्यति॥ ३५॥

‘मैं भी राम और भरत में कोई भेद नहीं समझती। अतः यह जानकर कि राजा श्रीराम का अभिषेक करनेवाले हैं, मुझे बड़ी खुशी हुई है ॥ ३५ ॥

न मे परं किंचिदितो वरं पुनः प्रियं प्रिया सुवचं वचोऽमृतम्।
तथा ह्यवोचस्त्वमतः प्रियोत्तरंवरं परं ते प्रददामि तं वृणु॥३६॥

‘मन्थरे ! तू मुझसे प्रिय वस्तु पाने के योग्य है। मेरे लिये श्रीराम के अभिषेक सम्बन्धी इस समाचार से बढ़कर दूसरा कोई प्रिय एवं अमृत के समान मधुर वचन नहीं कहा जा सकता। ऐसी परम प्रिय बात तुमने कही है; अतः अब यह प्रिय संवाद सुनाने के बाद तू कोई श्रेष्ठ वर माँग ले, मैं उसे अवश्य दूंगी’। ३६॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे सप्तमः सर्गः॥७॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में सातवाँ सर्ग पूरा हुआ।७॥

अयोध्याकाण्डम्
अष्टमः सर्गः (सर्ग 8)

( मन्थरा का पुनः राज्याभिषेक को कैकेयी के लिये अनिष्टकारी बताना, कुब्जा का पुनः श्रीराम राज्य को भरत के लिये भयजनक बताकर कैकेयी को भड़काना )

मन्थरा त्वभ्यसूय्यैनामुत्सृज्याभरणं हि तत्।
उवाचेदं ततो वाक्यं कोपदुःखसमन्विता॥१॥

यह सुनकर मन्थरा ने कैकेयी की निन्दा करके उसके दिये हुए आभूषण को उठाकर फेंक दिया और कोप तथा दुःख से भरकर वह इस प्रकार बोली-॥ १॥

हर्षं किमर्थमस्थाने कृतवत्यसि बालिशे।
शोकसागरमध्यस्थं नात्मानमवबुध्यसे॥२॥

‘रानी! तुम बड़ी नादान हो। अहो! तुमने यह बेमौके हर्ष किसलिये प्रकट किया? तुम्हें शोक के स्थान पर प्रसन्नता कैसे हो रही है? अरी! तुम शोक के समुद्रमें डूबी हुई हो, तो भी तुम्हें अपनी इस विपन्नावस्था का बोध नहीं हो रहा है॥२॥

मनसा प्रसहामि त्वां देवि दुःखार्दिता सती।
यच्छोचितव्ये हृष्टासि प्राप्य त्वं व्यसनं महत्॥ ३॥

‘देवि! महान् संकट में पड़ने पर जहाँ तुम्हें शोक होना चाहिये, वहीं हर्ष हो रहा है। तुम्हारी यह अवस्था देखकर मुझे मन-ही-मन बड़ा क्लेश सहन करना पड़ता है, मैं दुःख से व्याकुल हुई जाती हूँ। ३॥

शोचामि दुर्मतित्वं ते का हि प्राज्ञा प्रहर्षयेत्।
अरेः सपत्नीपुत्रस्य वृद्धिं मृत्योरिवागताम्॥४॥

‘मुझे तुम्हारी दुर्बुद्धि के लिये ही अधिक शोक होता है। अरी! सौत का बेटा शत्रु होता है। वह सौतेली माँ के लिये साक्षात् मृत्यु के समान है। भला, उसके अभ्युदय का अवसर आया देख कौन बुद्धिमती स्त्री अपने मन में हर्ष मानेगी॥ ४॥

भरतादेव रामस्य राज्यसाधारणाद् भयम्।
तद् विचिन्त्य विषण्णास्मि भयं भीताद्धि जायते॥५॥

‘यह राज्य भरत और राम दोनों के लिये साधारण भोग्यवस्तु है, इसपर दोनों का समान अधिकार है, इसलिये श्रीराम को भरतसे ही भय है। यही सोचकर मैं विषाद में डूबी जाती हूँ; क्योंकि भयभीत से ही भय प्राप्त होता है अर्थात् आज जिसे भय है, वही राज्य प्राप्त कर लेने पर जब सबल हो जायगा, तब अपने भय के हेतु को उखाड़ फेंकेगा॥ ५॥

लक्ष्मणो हि महाबाहू रामं सर्वात्मना गतः।
शत्रुघ्नश्चापि भरतं काकुत्स्थं लक्ष्मणो यथा॥

‘महाबाहु लक्ष्मण सम्पूर्ण हृदय से श्रीरामचन्द्रजी के अनुगत हैं। जैसे लक्ष्मण श्रीराम के अनुगत हैं, उसी तरह शत्रुघ्न भी भरत का अनुसरण करने वाले हैं॥६॥

प्रत्यासन्नक्रमेणापि भरतस्यैव भामिनि।
राज्यक्रमो विसृष्टस्तु तयोस्तावद्यवीयसोः॥७॥

‘भामिनि! उत्पत्ति के क्रम से श्रीराम के बाद भरत का ही पहले राज्य पर अधिकार हो सकता है (अतः भरत से भय होना स्वाभाविक है)। लक्ष्मण और शत्रुघ्न तो छोटे हैं; अतः उनके लिये राज्यप्राप्ति की सम्भावना दूर है॥

विदुषः क्षत्रचारित्रे प्राज्ञस्य प्राप्तकारिणः।
भयात् प्रवेपे रामस्य चिन्तयन्ती तवात्मजम्॥८॥

‘श्रीराम समस्त शास्त्रों के ज्ञाता हैं, विशेषतः क्षत्रियचरित्र (राजनीति) के पण्डित हैं तथा समयोचित कर्तव्य का पालन करनेवाले हैं; अतः उनका तुम्हारे पुत्र के प्रति जो क्रूरतापूर्ण बर्ताव होगा, उसे सोचकर मैं भय से काँप उठती हूँ॥८॥

सुभगा किल कौसल्या यस्याः पुत्रोऽभिषेक्ष्यते।
यौवराज्येन महता श्वः पुष्येण द्विजोत्तमैः॥९॥

‘वास्तव में कौसल्या ही सौभाग्यवती हैं, जिनके पुत्र का कल पुष्यनक्षत्र के योग में श्रेष्ठ ब्राह्मणों द्वारा युवराज के महान् पदपर अभिषेक होने जा रहा है। ९॥

प्राप्तां वसुमती प्रीतिं प्रतीतां हतविद्विषम्।
उपस्थास्यसि कौसल्यां दासीवत् त्वं कृताञ्जलिः॥१०॥

‘वे भूमण्डल का निष्कण्टक राज्य पाकर प्रसन्न होंगी; क्योंकि वे राजा की विश्वासपात्र हैं और तुम दासी की भाँति हाथ जोड़कर उनकी सेवा में उपस्थित होओगी॥१०॥

एवं च त्वं सहास्माभिस्तस्याः प्रेष्या भविष्यसि।
पुत्रश्च तव रामस्य प्रेष्यत्वं हि गमिष्यति॥११॥

‘इस प्रकार हमलोगों के साथ तुम भी कौसल्या की दासी बनोगी और तुम्हारे पुत्र भरत को भी श्रीरामचन्द्रजी की गुलामी करनी पड़ेगी॥ ११॥

हृष्टाः खलु भविष्यन्ति रामस्य परमाः स्त्रियः।
अप्रहृष्टा भविष्यन्ति स्नुषास्ते भरतक्षये॥१२॥

‘श्रीरामचन्द्रजी के अन्तःपुर की परम सुन्दरी स्त्रियाँ – सीतादेवी और उनकी सखियाँ निश्चय ही बहुत प्रसन्न होंगी और भरत के प्रभुत्व का नाश होने से तुम्हारी बहुएँ शोकमग्न हो जायँगी’ ॥ १२॥

तां दृष्ट्वा परमप्रीतां ब्रुवन्ती मन्थरां ततः।
रामस्यैव गुणान् देवी कैकेयी प्रशशंस ह॥१३॥

मन्थरा को अत्यन्त अप्रसन्नता के कारण इस प्रकार बहकी-बहकी बातें करती देख देवी कैकेयी ने श्रीराम के गुणों की ही प्रशंसा करते हुए कहा- ॥ १३॥

धमर्को गुणवान् दान्तः कृतज्ञः सत्यवान् शुचिः।
रामो राजसुतो ज्येष्ठो यौवराज्यमतोऽर्हति ॥१४॥

‘कुब्जे! श्रीराम धर्म के ज्ञाता, गुणवान्, जितेन्द्रिय, कृतज्ञ, सत्यवादी और पवित्र होने के साथ ही महाराज के ज्येष्ठ पुत्र हैं; अतः युवराज होने के योग्य वे ही हैं।

भ्रातॄन् भृत्यांश्च दीर्घायुः पितृवत् पालयिष्यति।
संतप्यसे कथं कुब्जे श्रुत्वा रामाभिषेचनम्॥

‘वे दीर्घजीवी होकर अपने भाइयों और भृत्यों का पिता की भाँति पालन करेंगे। कुब्जे! उनके अभिषेक की बात सुनकर तू इतनी जल क्यों रही है? ॥ १५॥

भरतश्चापि रामस्य ध्रुवं वर्षशतात् परम।
पितृपैतामहं राज्यमवाप्स्यति नरर्षभः॥१६॥

‘श्रीराम की राज्यप्राप्ति के सौ वर्ष बाद नरश्रेष्ठ भरत को भी निश्चय ही अपने पिता-पितामहों का राज्य मिलेगा॥ १६॥

सा त्वमभ्युदये प्राप्ते दह्यमानेव मन्थरे।
भविष्यति च कल्याणे किमिदं परितप्यसे॥ १७॥

‘मन्थरे ! ऐसे अभ्युदय की प्राप्ति के समय, जब कि भविष्य में कल्याण-ही-कल्याण दिखायी दे रहा है, तू इस प्रकार जलती हुई-सी संतप्त क्यों हो रही है ? ॥ १७॥

यथा वै भरतो मान्यस्तथा भूयोऽपि राघवः।
कौसल्यातोऽतिरिक्तं च मम शुश्रूषते बहु॥१८॥

‘मेरे लिये जैसे भरत आदर के पात्र हैं, वैसे ही बल्कि उनसे भी बढ़कर श्रीराम हैं; क्योंकि वे कौसल्या से भी बढ़कर मेरी बहुत सेवा किया करते हैं।॥ १८॥

राज्यं यदि हि रामस्य भरतस्यापि तत् तदा।
मन्यते हि यथाऽऽत्मानं यथा भ्रातृ॑स्तु राघवः॥ १९॥

‘यदि श्रीराम को राज्य मिल रहा है तो उसे भरत को मिला हुआ समझ; क्योंकि श्रीरामचन्द्र अपने भाइयों को भी अपने ही समान समझते हैं’ ॥ १९॥

कैकेय्या वचनं श्रुत्वा मन्थरा भृशदुःखिता।
दीर्घमुष्णं विनिःश्वस्य कैकेयीमिदमब्रवीत्॥ २०॥

कैकेयी की यह बात सुनकर मन्थरा को बड़ा दुःख हुआ। वह लंबी और गरम साँस खींचकर कैकेयी से बोली- ॥२०॥

अनर्थदर्शिनी मौान्नात्मानमवबुध्यसे।
शोकव्यसनविस्तीर्णे मज्जन्ती दुःखसागरे॥२१॥

‘रानी! तुम मूर्खतावश अनर्थ को ही अर्थ समझ रही हो। तुम्हें अपनी स्थिति का पता नहीं है। तुम दुःख के उस महासागर में डूब रही हो, जो शोक (इष्ट से वियोग की चिन्ता) और व्यसन (अनिष्ट की प्राप्ति के दुःख) से महान् विस्तार को प्राप्त हो रहा है॥२१॥

भविता राघवो राजा राघवस्य च यः सुतः।
राजवंशात्तु भरतः कैकेयि परिहास्यते॥२२॥

‘केकयराजकुमारी! जब श्रीरामचन्द्र राजा हो जायँगे, तब उनके बाद उनका जो पुत्र होगा, उसी को राज्य मिलेगा। भरत तो राजपरम्परा से अलग हो जायँगे॥२२॥

नहि राज्ञः सुताः सर्वे राज्ये तिष्ठन्ति भामिनि।
स्थाप्यमानेषु सर्वेषु सुमहाननयो भवेत्॥२३॥

‘भामिनि! राजा के सभी पुत्र राज्यसिंहासन पर नहीं बैठते हैं; यदि सबको बिठा दिया जाय तो बड़ा भारी अनर्थ हो जाय॥ २३॥

तस्माज्ज्येष्ठे हि कैकेयि राज्यतन्त्राणि पार्थिवाः।
स्थापयन्त्यनवद्याङ्गि गुणवत्स्वितरेष्वपि॥२४॥

‘परमसुन्दरी केकयनन्दिनि! इसीलिये राजा लोग राजकाज का भार ज्येष्ठ पुत्र पर ही रखते हैं। यदि ज्येष्ठ पुत्र गुणवान् न हो तो दूसरे गुणवान् पुत्रों को भी राज्य सौंप देते हैं॥२४॥

असावत्यन्तनिर्भग्नस्तव पुत्रो भविष्यति।
अनाथवत् सुखेभ्यश्च राजवंशाच्च वत्सले॥ २५॥

‘पुत्रवत्सले! तुम्हारा पुत्र राज्य के अधिकार से तो बहुत दूर हटा ही दिया जायगा, वह अनाथ की भाँति समस्त सुखों से भी वञ्चित हो जायगा॥ २५ ॥

साहं त्वदर्थे सम्प्राप्ता त्वं तु मां नावबुद्ध्यसे।
सपत्निवृद्धौ या मे त्वं प्रदेयं दातुमर्हसि ॥२६॥

‘इसलिये मैं तुम्हारे ही हित की बात सुझाने के लिये यहाँ आयी हूँ; परंतु तुम मेरा अभिप्राय तो समझती नहीं. उलटे सौत का अभ्युदय सुनकर मुझे पारितोषिक देने चली हो॥२६॥

ध्रुवं तु भरतं रामः प्राप्य राज्यमकण्टकम्।
देशान्तरं नाययिता लोकान्तरमथापि वा॥२७॥

‘याद रखो, यदि श्रीराम को निष्कण्टक राज्य मिल गया तो वे भरत को अवश्य ही इस देश से बाहर निकाल देंगे अथवा उन्हें परलोक में भी पहँचा सकते हैं।॥ २७॥

बाल एव तु मातुल्यं भरतो नायितस्त्वया।
संनिकर्षाच्च सौहार्द जायते स्थावरेष्विव॥२८॥

‘छोटी अवस्था में ही तुमने भरत को मामा के घर भेज दिया। निकट रहने से सौहार्द उत्पन्न होता है। यह बात स्थावर योनियों में भी देखी जाती है (लता और वृक्ष आदि एक-दूसरे के निकट होने पर परस्पर आलिङ्गन-पाश में बद्ध हो जाते हैं। यदि भरत यहाँ होते तो राजा का उनमें भी समान रूप से स्नेह बढ़ता; अतः वे उन्हें भी आधा राज्य दे देते) ॥ २८॥

भरतानुवशात् सोऽपि शत्रुघ्नस्तत्समं गतः।
लक्ष्मणो हि यथा रामं तथायं भरतं गतः॥२९॥

‘भरत के अनुरोध से शत्रुघ्न भी उनके साथ ही चले गये (यदि वे यहाँ होते तो भरत का काम बिगड़ने नहीं पाता। क्योंकि-) जैसे लक्ष्मण राम के अनुगामी हैं, उसी प्रकार शत्रुघ्न भरत का अनुसरण करनेवाले हैं।॥ २९॥

श्रूयते हि द्रुमः कश्चिच्छेत्तव्यो वनजीवनैः।
संनिकर्षादिषीकाभिर्मोचितः परमाद् भयात्॥ ३०॥

‘सुना जाता है, जंगल की लकड़ी बेचकर जीविका चलाने वाले कुछ लोगों ने किसी वृक्ष को काटने का निश्चय किया, परंतु वह वृक्ष कँटीली झाड़ियों से घिरा हुआ था; इसलिये वे उसे काट नहीं सके। इस प्रकार उन कँटीली झाड़ियों ने निकट रहने के कारण उस वृक्ष को महान् भय से बचा लिया॥३०॥

गोप्ता हि रामं सौमित्रिर्लक्ष्मणं चापि राघवः।
अश्विनोरिव सौभ्रात्रं तयोर्लोकेषु विश्रुतम्॥ ३१॥

‘सुमित्राकुमार लक्ष्मण श्रीराम की रक्षा करते हैं और श्रीराम उनकी उन दोनों का उत्तम भ्रातृ-प्रेम दोनों अश्विनीकुमारों की भाँति तीनों लोकों में प्रसिद्ध है।॥ ३१॥

तस्मान्न लक्ष्मणे रामः पापं किंचित् करिष्यति।
रामस्तु भरते पापं कुर्यादेव न संशयः॥३२॥

‘इसलिये श्रीराम लक्ष्मण का तो किञ्चित् भी अनिष्ट नहीं करेंगे, परंतु भरत का अनिष्ट किये बिना वे रह नहीं सकते; इसमें संशय नहीं है॥ ३२॥

तस्माद् राजगृहादेव वनं गच्छतु राघवः।
एतद्धि रोचते मह्यं भृशं चापि हितं तव॥३३॥

‘अतः श्रीरामचन्द्र महाराज के महल से ही सीधे वन को चले जायँ—मुझे तो यही अच्छा जान पड़ता है और इसी में तुम्हारा परम हित है॥ ३३॥

एवं ते ज्ञातिपक्षस्य श्रेयश्चैव भविष्यति।
यदि चेद् भरतो धर्मात् पित्र्यं राज्यमवाप्स्यति॥ ३४॥

‘यदि भरत धर्मानुसार अपने पिता का राज्य प्राप्त कर लेंगे तो तुम्हारा और तुम्हारे पक्ष के अन्य सब लोगों का भी कल्याण होगा॥ ३४॥

स ते सुखोचितो बालो रामस्य सहजो रिपुः।
समृद्धार्थस्य नष्टार्थो जीविष्यति कथं वशे ॥ ३५॥

‘सौतेला भाई होने के कारण जो श्रीराम का सहज शत्रु है, वह सुख भोगने के योग्य तुम्हारा बालक भरत राज्य और धन से वञ्चित हो राज्य पाकर समृद्धिशाली बने हुए श्रीराम के वश में पड़कर कैसे जीवित रहेगा॥ ३५ ॥

अभिद्रुतमिवारण्ये सिंहेन गजयूथपम्।
प्रच्छाद्यमानं रामेण भरतं त्रातुमर्हसि ॥ ३६॥

‘जैसे वन में सिंह हाथियों के यूथपति पर आक्रमण करता है और वह भागा फिरता है, उसी प्रकार राजा राम भरत का तिरस्कार करेंगे; अतः उस तिरस्कार से तुम भरत की रक्षा करो॥३६॥

दन्निराकृता पूर्वं त्वया सौभाग्यवत्तया।
राममाता सपत्नी ते कथं वैरं न यापयेत्॥ ३७॥

‘तुमने पहले पति का अत्यन्त प्रेम प्राप्त होने के कारण घमंड में आकर जिनका अनादर किया था, वे ही तुम्हारी सौत श्रीराम माता कौसल्या पुत्र की राज्य प्राप्ति से परम सौभाग्यशालिनी हो उठी हैं; अब वे तुमसे अपने वैर का बदला क्यों नहीं लेंगी॥ ३७॥

यदा च रामः पृथिवीमवाप्स्यते प्रभूतरत्नाकरशैलसंयुताम्।
तदा गमिष्यस्यशुभं पराभवंसहैव दीना भरतेन भामिनि॥३८॥

‘भामिनि! जब श्रीराम अनेक समुद्रों और पर्वतों से युक्त समस्त भूमण्डल का राज्य प्राप्त कर लेंगे, तब तुम अपने पुत्र भरत के साथ ही दीन-हीन होकर अशुभ पराभव का पात्र बन जाओगी॥ ३८ ॥

यदा हि रामः पृथिवीमवाप्स्यते ध्रुवं प्रणष्टो भरतो भविष्यति।
अतो हि संचिन्तय राज्यमात्मजे परस्य चैवास्य विवासकारणम्॥३९॥

‘याद रखो, जब श्रीराम इस पृथ्वी पर अधिकार प्राप्त कर लेंगे, तब निश्चय ही तुम्हारे पुत्र भरत नष्टप्राय हो जायँगे। अतः ऐसा कोई उपाय सोचो, जिससे तुम्हारे पुत्र को तो राज्य मिले और शत्रुभूत श्रीराम का वनवास हो जाय’॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डेऽष्टमः सर्गः॥८॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में आठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ८ ॥

अयोध्याकाण्डम्
नवमः सर्गः (सर्ग 9)

( कुब्जा के कुचक्र से कैकेयी का कोप भवन में प्रवेश )

एवमुक्ता तु कैकेयी क्रोधेन ज्वलितानना।
दीर्घमुष्णं विनिःश्वस्य मन्थरामिदमब्रवीत्॥१॥

मन्थरा के ऐसा कहने पर कैकेयी का मुख क्रोध से तमतमा उठा। वह लंबी और गरम साँस खींचकर उससे इस प्रकार बोली- ॥१॥

अद्य राममितः क्षिप्रं वनं प्रस्थापयाम्यहम्।
यौवराज्येन भरतं क्षिप्रमद्याभिषेचये॥२॥

‘कुब्जे ! मैं श्रीराम को शीघ्र ही यहाँ से वन में भेजूंगी और तुरंत ही युवराज के पदपर भरत का अभिषेक कराऊँगी॥२॥

इदं त्विदानीं सम्पश्य केनोपायेन साधये।
भरतः प्राप्नुयाद् राज्यं न तु रामः कथंचन॥३॥

‘परंतु इस समय यह तो सोचो कि किस उपाय से अपना अभीष्ट साधन करूँ? भरत को राज्य प्राप्त हो जाय और श्रीराम उसे किसी तरह भी न पा सकें यह काम कैसे बने?’॥३॥

एवमुक्ता तु सा देव्या मन्थरा पापदर्शिनी।
रामार्थमुपहिंसन्ती कैकेयीमिदमब्रवीत्॥४॥

देवी कैकेयी के ऐसा कहने पर पाप का मार्ग दिखाने वाली मन्थरा श्रीराम के स्वार्थ पर कुठाराघात करती हुई वहाँ कैकेयी से इस प्रकार बोली- ॥ ४॥

हन्तेदानीं प्रपश्य त्वं कैकेयि श्रूयतां वचः।
यथा ते भरतो राज्यं पुत्रः प्राप्स्यति केवलम्॥

‘केकयनन्दिनि! अच्छा, अब देखो कि मैं क्या करती हूँ ? तुम मेरी बात सुनो, जिससे केवल तुम्हारे पुत्र भरत ही राज्य प्राप्त करेंगे (श्रीराम नहीं)॥ ५ ॥

किं न स्मरसि कैकेयि स्मरन्ती वा निगृहसे।
यदुच्यमानमात्मार्थं मत्तस्त्वं श्रोतुमिच्छसि॥६॥

‘कैकेयि! क्या तुम्हें स्मरण नहीं है? या स्मरण होने पर भी मुझसे छिपा रही हो? जिसकी तुम मुझसे अनेक बार चर्चा करती रहती हो, अपने उसी प्रयोजन को तुम मुझसे सुनना चाहती हो? इसका क्या कारण है? ॥

मयोच्यमानं यदि ते श्रोतुं छन्दो विलासिनि।

‘विलासिनि! यदि मेरे ही मुँह से सुनने के लिये तुम्हारा आग्रह है तो बताती हूँ, सुनो और सुनकर इसी के अनुसार कार्य करो’ ॥ ७॥

श्रुत्वैवं वचनं तस्या मन्थरायास्तु कैकयी।
किंचिदुत्थाय शयनात् स्वास्तीर्णादिदमब्रवीत्॥ ८ ॥

मन्थरा का यह वचन सुनकर कैकेयी अच्छी तरह से बिछे हुए उस पलंग से कुछ उठकर उससे यों बोली -॥८॥

कथयस्व ममोपायं केनोपायेन मन्थरे।
भरतः प्राप्नुयाद् राज्यं न तु रामः कथंचन॥९॥

मन्थरे! मुझसे वह उपाय बताओ। किस उपायसे भरत को तो राज्य मिल जायगा, किंतु श्रीराम उसे किसी तरह नहीं पा सकेंगे’॥ ९॥

एवमुक्ता तदा देव्या मन्थरा पापदर्शिनी।
रामार्थमुपहिंसन्ती कैकेयीमिदमब्रवीत्॥१०॥

देवी कैकेयी के ऐसा कहने पर पाप का मार्ग दिखाने वाली मन्थरा श्रीराम के स्वार्थ पर कुठारा घात करती हुई उस समय कैकेयी से इस प्रकार बोली- ॥ १०॥

पुरा देवासुरे युद्धे सह राजर्षिभिः पतिः।
अगच्छत् त्वामुपादाय देवराजस्य साह्यकृत्॥ ११॥

‘देवि! पूर्वकालकी बात है कि देवासुर-संग्राम के अवसर पर राजर्षियों के साथ तुम्हारे पतिदेव तुम्हें साथ लेकर देवराज की सहायता करनेके लिये गये थे॥ ११॥

दिशमास्थाय कैकेयि दक्षिणां दण्डकान् प्रति।
वैजयन्तमिति ख्यातं पुरं यत्र तिमिध्वजः॥१२॥
स शम्बर इति ख्यातः शतमायो महासुरः।
ददौ शक्रस्य संग्रामं देवसङ्घरनिर्जितः॥१३॥

‘केकयराजकुमारी! दक्षिण दिशा में दण्डकारण्य के भीतर वैजयन्त नाम से विख्यात एक नगर है, जहाँ शम्बर नाम से प्रसिद्ध एक महान् असुर रहता था। वह अपनी ध्वजा में तिमि (वेल मछली) का चिह्न धारण करता था और सैकड़ों मायाओं का जानकार था। देवताओं के समूह भी उसे पराजित नहीं कर पाते थे। एक बार उसने इन्द्र के साथ युद्ध छेड़ दिया। १२-१३॥

तस्मिन् महति संग्रामे पुरुषान् क्षतविक्षतान्।
रात्रौ प्रसुप्तान् जन्ति स्म तरसापास्य राक्षसाः॥ १४॥

‘उस महान् संग्राम में क्षत-विक्षत हुए पुरुष जब रात में थककर सो जाते, उस समय राक्षस उन्हें उन के बिस्तर से खींच ले जाते और मार डालते थे॥ १४ ॥

तत्राकरोन्महायुद्धं राजा दशरथस्तदा।
असुरैश्च महाबाहुः शस्त्रैश्च शकलीकृतः॥ १५॥

‘उन दिनों महाबाहु राजा दशरथ ने भी वहाँ असुरों के साथ बड़ा भारी युद्ध किया। उस युद्ध में असुरों ने अपने अस्त्र-शस्त्रोंद् वारा उनके शरीर को जर्जर कर दिया॥ १५॥

अपवाह्य त्वया देवि संग्रामान्नष्टचेतनः।
तत्रापि विक्षतः शस्त्रैः पतिस्ते रक्षितस्त्वया॥ १६॥

‘देवि! जब राजा की चेतना लुप्त-सी हो गयी, उस समय सारथि का काम करती हुई तुमने अपने पतिकोरण भूमि से दूर हटाकर उनकी रक्षा की। जब वहाँ भी राक्षसों के शस्त्रों से वे घायल हो गये, तब तुमने पुनः वहाँ से अन्यत्र ले जाकर उनकी रक्षा की॥१६॥

तुष्टेन तेन दत्तौ ते द्वौ वरौ शुभदर्शने।
स त्वयोक्तः पतिर्देवि यदेच्छेयं तदा वरम्॥१७॥
गृह्णीयां तु तदा भर्तस्तथेत्युक्तं महात्मना।
अनभिज्ञा ह्यहं देवि त्वयैव कथितं पुरा॥१८॥

‘शुभदर्शने! इससे संतुष्ट होकर महाराज ने तुम्हें दो वरदान देने को कहा—देवि! उस समय तुमने अपने पति से कहा—’प्राणनाथ! जब मेरी इच्छा होगी, तब मैं इन वरों को माँग लूंगी।’ उस समय उन महात्मा नरेश ने ‘तथास्तु’ कहकर तुम्हारी बात मान ली थी। देवि! मैं इस कथा को नहीं जानती थी। पूर्वकालमें तुम्हींने मुझसे यह वृत्तान्त कहा था॥ १७-१८॥

कथैषा तव तु स्नेहान्मनसा धार्यते मया।
रामाभिषेकसम्भारान्निगृह्य विनिवर्तय॥१९॥

‘तबसे तुम्हारे स्नेहवश मैं इस बात को मन-ही-मन । सदा याद रखती आयी हूँ। तुम इन वरों के प्रभाव से स्वामी को वश में करके श्रीराम के अभिषेक के आयोजन को पलट दो॥ १९ ॥

तौ च याचस्व भर्तारं भरतस्याभिषेचनम्।
प्रव्राजनं च रामस्य वर्षाणि च चतुर्दश॥२०॥

‘तुम उन दोनों वरों को अपने स्वामी से माँगो। एक वरके द्वारा भरत का राज्याभिषेक और दूसरे के द्वारा श्रीराम का चौदह वर्ष तक का वनवास माँग लो॥ २० ॥

चतुर्दश हि वर्षाणि रामे प्रव्राजिते वनम्।
प्रजाभावगतस्नेहः स्थिरः पुत्रो भविष्यति॥२१॥

‘जब श्रीराम चौदह वर्षों के लिये वन में चले जायँगे।’ तब उतने समय में तुम्हारे पुत्र भरत समस्त प्रजा के हृदय में अपने लिये स्नेह पैदा कर लेंगे और इस राज्यपर स्थिर हो जायँगे॥ २१॥

क्रोधागारं प्रविश्याद्य क्रुद्धवाश्वपतेः सुते।
शेष्वानन्तर्हितायां त्वं भूमौ मलिनवासिनी॥२२॥

‘अश्वपतिकुमारी! तुम इस समय मैले वस्त्र पहन लो और कोपभवन में प्रवेश करके कुपित-सी होकर बिना बिस्तर के ही भूमिपर लेट जाओ॥ २२ ॥

मा स्मैनं प्रत्युदीक्षेथा मा चैनमभिभाषथाः।
रुदन्ती पार्थिवं दृष्ट्वा जगत्यां शोकलालसा॥ २३॥

‘राजा आवे तो उनकी ओर आँखें उठाकर न देखो और न उनसे कोई बात ही करो। महाराजको देखते ही रोती हुई शोकमग्न हो धरतीपर लोटने लगो॥ २३॥

दयिता त्वं सदा भर्तुरत्र मे नास्ति संशयः।
त्वत्कृते च महाराजो विशेदपि हुताशनम्॥२४॥

‘इसमें तनिक भी संदेह नहीं कि तुम अपने पतिको सदा ही बड़ी प्यारी रही हो। तुम्हारे लिये महाराज आग में भी प्रवेश कर सकते हैं ॥ २४ ॥

न त्वां क्रोधयितुं शक्तो न क्रुद्धां प्रत्युदीक्षितुम्।
तव प्रियार्थं राजा तु प्राणानपि परित्यजेत्॥२५॥

वे न तो तुम्हें कुपित कर सकते हैं और न कुपित अवस्था में तुम्हें देख ही सकते हैं। राजा दशरथ तुम्हारा प्रिय करने के लिये अपने प्राणों का भी त्याग कर सकते हैं ॥ २५॥

न ह्यतिक्रमितुं शक्तस्तव वाक्यं महीपतिः।
मन्दस्वभावे बुध्यस्व सौभाग्यबलमात्मनः॥ २६॥

‘महाराज तुम्हारी बात किसी तरह टाल नहीं सकते। मुग्धे! तुम अपने सौभाग्य के बल का स्मरण करो॥ २६॥

मणिमुक्तासुवर्णानि रत्नानि विविधानि च।
दद्याद् दशरथो राजा मा स्म तेषु मनः कृथाः॥ २७॥

‘राजा दशरथ तुम्हें भुलावे में डालने के लिये मणि, मोती, सुवर्ण तथा भाँति-भाँति के रत्न देने की चेष्टा करेंगे; किंतु तुम उनकी ओर मन न चलाना ॥ २७॥

यौ तौ देवासुरे युद्धे वरौ दशरथो ददौ।
तौ स्मारय महाभागे सोऽर्थो न त्वा क्रमेदति॥ २८॥

‘महाभागे! देवासुर-संग्राम के अवसर पर राजा दशरथ ने वे जो दो वर दिये थे, उनका उन्हें स्मरण दिलाना। वरदान के रूप में माँगा गया वह तुम्हारा अभीष्ट मनोरथ सिद्ध हुए बिना नहीं रह सकता। २८॥

यदा तु ते वरं दद्यात् स्वयमुत्थाप्य राघवः।
व्यवस्थाप्य महाराजं त्वमिमं वृणुया वरम्॥२९॥

‘रघुकुलनन्दन राजा दशरथ जब स्वयं तुम्हें धरती से उठाकर वर देने को उद्यत हो जायँ, तब उन महाराज को सत्य की शपथ दिलाकर खूब पक्का करके उनसे वर माँगना॥ २९॥

रामप्रव्रजनं दूरं नव वर्षाणि पञ्च च।
भरतः क्रियतां राजा पृथिव्यां पार्थिवर्षभ॥३०॥

‘वर माँगते समय कहना कि नृपश्रेष्ठ! आप श्रीराम को चौदह वर्षों के लिये बहुत दूर वन में भेज दीजिये और भरत को भूमण्डल का राजा बनाइये॥ ३०॥

चतुर्दश हि वर्षाणि रामे प्रव्राजिते वनम्।
रूढश्च कृतमूलश्च शेषं स्थास्यति ते सुतः॥३१॥

‘श्रीराम के चौदह वर्षों के लिये वनमें चले जाने पर तुम्हारे पुत्र भरत का राज्य सुदृढ़ हो जायगा और प्रजा आदि को वश में कर लेने से यहाँ उनकी जड़ जम जायगी। फिर चौदह वर्षों के बाद भी वे आजीवन स्थिर बने रहेंगे॥३१॥

रामप्रव्राजनं चैव देवि याचस्व तं वरम्।
एवं सेत्स्यन्ति पुत्रस्य सर्वार्थास्तव कामिनि॥ ३२॥

‘देवि! तुम राजा से श्रीराम के वनवास का वर अवश्य माँगो। पुत्र के लिये राज्य की कामना करने वाली कैकेयि! ऐसा करने से तुम्हारे पुत्र के सभी मनोरथ सिद्ध हो जायेंगे॥ ३२ ॥

एवं प्रव्राजितश्चैव रामोऽरामो भविष्यति।
भरतश्च गतामित्रस्तव राजा भविष्यति॥३३॥

‘इस प्रकार वनवास मिल जानेपर ये राम राम नहीं रह जायँगे (इनका आज जो प्रभाव है वह भविष्य में नहीं रह सकेगा) और तुम्हारे भरत भी शत्रुहीन राजा होंगे॥

येन कालेन रामश्च वनात् प्रत्यागमिष्यति।
अन्तर्बहिश्च पुत्रस्ते कृतमूलो भविष्यति॥३४॥

‘जिस समय श्रीराम वनसे लौटेंगे, उस समयतक तुम्हारे पुत्र भरत भीतर और बाहरसे भी दृढमूल हो जायँगे॥

संगृहीतमनुष्यश्च सुहृद्भिः साकमात्मवान्।
प्राप्तकालं नु मन्येऽहं राजानं वीतसाध्वसा॥ ३५॥
रामाभिषेकसंकल्पान्निगृह्य विनिवर्तय।

‘उनके पास सैनिक-बल का भी संग्रह हो जायगा; जितेन्द्रिय तो वे हैं ही; अपने सुहृदों के साथ रहकर दृढमूल हो जायँगे। इस समय मेरी मान्यता के अनुसार राजा को श्रीराम के राज्याभिषेक के संकल्प से हटा देने का समय आ गया है; अतः तुम निर्भय होकर राजा को अपने वचनों में बाँध लो और उन्हें श्रीराम के अभिषेक के संकल्प से हटा दो’ ॥ ३५ १/२॥

अनर्थमर्थरूपेण ग्राहिता सा ततस्तया॥३६॥
हृष्टा प्रतीता कैकेयी मन्थरामिदमब्रवीत्।।
सा हि वाक्येन कुब्जायाः किशोरीवोत्पथं गता॥ ३७॥
कैकेयी विस्मयं प्राप्य परं परमदर्शना।

ऐसी बातें कहकर मन्थरा ने कैकेयी की बुद्धि में अनर्थ को ही अर्थ रूप में ऊँचा दिया। कैकेयी को उसकी बातपर विश्वास हो गया और वह मन-ही-मन बहुत प्रसन्न हुई। यद्यपि वह बहुत समझदार थी, तो  भी कुबरी के कहने से नादान बालिका की तरह कुमार्ग पर चली गयी-अनुचित काम करने को तैयार हो गयी। उसे मन्थरा की बुद्धि पर बड़ा आश्चर्य हुआ और वह उससे इस प्रकार बोली- ॥ ३६-३७ १/२॥

प्रज्ञां ते नावजानामि श्रेष्ठे श्रेष्ठाभिधायिनि॥३८॥
पृथिव्यामसि कुब्जानामुत्तमा बुद्धिनिश्चये।
त्वमेव तु ममार्थेषु नित्ययुक्ता हितैषिणी॥ ३९॥

‘हित की बात बताने में कुशल कुब्जे! तू एक श्रेष्ठ स्त्री है; मैं तेरी बुद्धि की अवहेलना नहीं करूँगी।बुद्धि के द्वारा किसी कार्य का निश्चय करने में तू इस पृथ्वी पर सभी कुब्जाओं में उत्तम है। केवल तू ही मेरी हितैषिणी है और सदा सावधान रहकर मेरा कार्य सिद्ध करने में लगी रहती है॥ ३८-३९ ।।

नाहं समवबुद्ध्येयं कुब्जे राज्ञश्चिकीर्षितम्।
सन्ति दुःसंस्थिताः कुब्जाः वक्राः परमपापिकाः॥ ४०॥

‘कुब्जे! यदि तू न होती तो राजा जो षडयन्त्र रचना चाहते हैं, वह कदापि मेरी समझमें नहीं आता। तेरे सिवा जितनी कुब्जाएँ हैं, वे बेडौल शरीर वाली, टेढ़ी-मेढ़ी और बड़ी पापिनी होती हैं॥ ४० ॥

त्वं पद्ममिव वातेन संनता प्रियदर्शना।
उरस्तेऽभिनिविष्टं वै यावत् स्कन्धात् समुन्नतम्॥४१॥

‘तू तो वायु के द्वारा झुकायी हुई कमलिनी की भाँति कुछ झुकी हुई होने पर भी देखने में प्रिय (सुन्दर) है। तेरा वक्षःस्थल कुब्जता के दोष से व्याप्त है, अत एव कंधों तक ऊँचा दिखायी देता है॥४१॥

अधस्ताच्चोदरं शान्तं सुनाभमिव लज्जितम्।
प्रतिपूर्णं च जघनं सुपीनौ च पयोधरौ॥४२॥

‘वक्षःस्थल से नीचे सुन्दर नाभि से युक्त जो उदर है, वह मानो वक्षःस्थल की ऊँचाई देखकर लज्जित-सा हो गया है, इसीलिये शान्त—कृश प्रतीत होता है। तेरा जघन विस्तृत है और दोनों स्तन सुन्दर एवं स्थूल हैं।

विमलेन्दुसमं वक्त्रमहो राजसि मन्थरे।
जघनं तव निर्मष्टं रशनादामभूषितम्॥४३॥

‘मन्थरे! तेरा मुख निर्मल चन्द्रमा के समान अद्भुत शोभा पा रहा है। करधनी की लड़ियों से विभूषित तेरी कटि का अग्रभाग बहुत ही स्वच्छ—रोमादि से रहित है॥४३॥

जङ्के भृशमुपन्यस्ते पादौ च व्यायतावुभौ।
त्वमायताभ्यां सक्थिभ्यां मन्थरे क्षौमवासिनी॥ ४४॥
अग्रतो मम गच्छन्ती राजसेऽतीव शोभने।

‘मन्थरे ! तेरी पिण्डलियाँ परस्पर अधिक सटी हुई हैं और दोनों पैर बड़े-बड़े हैं। तू विशाल ऊरुओं (जाँघों) से सुशोभित होती है। शोभने! जब तू रेशमी साड़ी पहनकर मेरे आगे-आगे चलती है, तब तेरी बड़ी शोभा होती है॥ ४४ १/२ ।।

आसन् याः शम्बरे मायाः सहस्रमसुराधिपे॥ ४५॥
हृदये ते निविष्टास्ता भूयश्चान्याः सहस्रशः।
तदेव स्थगु यद दीर्घ रथघोणमिवायतम्॥४६॥
मतयः क्षत्रविद्याश्च मायाश्चात्र वसन्ति ते।

‘असुरराज शम्बर को जिन सहस्रों मायाओं का ज्ञान है, वे सब तेरे हृदय में स्थित हैं; इनके अलावे भी तू हजारों प्रकार की मायाएँ जानती है। इन मायाओं का समुदाय ही तेरा यह बड़ा-सा कुब्बड़ है, जो रथ के नकुए (अग्रभाग) के समान बड़ा है। इसी में तेरी मति, स्मृति और बुद्धि, क्षत्रविद्या (राजनीति) तथा नाना प्रकारकी मायाएँ निवास करती हैं। ४५-४६१/२॥

अत्र तेऽहं प्रमोक्ष्यामि मालां कुब्जे हिरण्मयीम्॥ ४७॥
अभिषिक्ते च भरते राघवे च वनं गते।
जात्येन च सुवर्णेन सुनिष्टप्तेन सुन्दरि॥४८॥
लब्धार्था च प्रतीता च लेपयिष्यामि ते स्थगु।

‘सुन्दरी कुब्जे! यदि भरत का राज्याभिषेक हुआ और श्रीराम वन को चले गये तो मैं सफल मनोरथ एवं संतुष्ट होकर अच्छी जाति के खूब तपाये हुए सोने की बनी हुई सुन्दर स्वर्णमाला तेरे इस कुब्बड़ को पहनाऊँगी और इसपर चन्दनका लेप लगवाऊँगी॥ ४७-४८ १/२॥

मुखे च तिलकं चित्रं जातरूपमयं शुभम्॥४९॥
कारयिष्यामि ते कुब्जे शुभान्याभरणानि च।
परिधाय शुभे वस्त्रे देवतेव चरिष्यसि ॥५०॥

‘कुब्जे! तेरे मुख (ललाट) पर सुन्दर और विचित्र सोने का टीका लगवा दूंगी और तू बहुत-से सुन्दर आभूषण एवं दो उत्तम वस्त्र (लहँगा और दुपट्टा) धारण करके देवाङ्गना के समान विचरण करेगी॥ ४९-५०॥

चन्द्रमाह्वयमानेन मुखेनाप्रतिमानना।
गमिष्यसि गतिं मुख्यां गर्वयन्ती द्विषज्जने॥५१॥

‘चन्द्रमासे होड़ लगानेवाले अपने मनोहर मुखद्वारा तू ऐसी सुन्दर लगेगी कि तेरे मुखकी कहीं समता । नहीं रह जायगी तथा शत्रुओंके बीचमें अपनेसौभाग्यपर गर्व प्रकट करती हुई तू सर्वश्रेष्ठ स्थान प्राप्त कर लेगी॥५१॥

तवापि कुब्जाः कुब्जायाः सर्वाभरणभूषिताः।
पादौ परिचरिष्यन्ति यथैव त्वं सदा मम॥५२॥

‘जैसे तू सदा मेरे चरणों की सेवा किया करती है, उसी प्रकार समस्त आभूषणों से विभूषित बहुत-सी कुब्जाएँ तुझ कुब्जा के भी चरणों की सदा परिचर्या किया करेंगी’॥

इति प्रशस्यमाना सा कैकेयीमिदमब्रवीत्।
शयानां शयने शुभ्रे वेद्यामग्निशिखामिव॥५३॥

जब इस प्रकार कुब्जा की प्रशंसा की गयी, तब उसने वेदी पर प्रज्वलित अग्नि-शिखा के समान शुभ्रशय्या पर शयन करने वाली कैकेयी से इस प्रकार कहा- ॥५३॥

गतोदके सेतुबन्धो न कल्याणि विधीयते।
उत्तिष्ठ कुरु कल्याणं राजानमनुदर्शय॥५४॥

‘कल्याणि! नदी का पानी निकल जाने पर उसके लिये बाँध नहीं बाँधा जाता, (यदि राम का अभिषेक हो गया तो तुम्हारा वर माँगना व्यर्थ होगा; अतः बातों में समय न बिताओ) जल्दी उठो और अपना कल्याण करो। कोप भवन में जाकर राजा को अपनी अवस्था का परिचय दो’ ॥ ५४॥

तथा प्रोत्साहिता देवी गत्वा मन्थरया सह।
क्रोधागारं विशालाक्षी सौभाग्यमदगर्विता ॥५५॥
अनेकशतसाहस्रं मुक्ताहारं वराङ्गना।।
अवमुच्य वराहा॑णि शुभान्याभरणानि च ॥५६॥

मन्थरा के इस प्रकार प्रोत्साहन देने पर सौभाग्य के मद से गर्व करने वाली विशाल लोचना सुन्दरी कैकेयी देवी उसके साथ ही कोप भवन में जाकर लाखों की लागत के मोतियों के हार तथा दूसरे-दूसरे सुन्दर बहुमूल्य आभूषणों को अपने शरीर से उतार उतारकर फेंकने लगी।। ५५-५६॥

तदा हेमोपमा तत्र कुब्जावाक्यवशंगता।
संविश्य भूमौ कैकेयी मन्थरामिदमब्रवीत्॥५७॥

सोने के समान सुन्दर कान्तिवाली कैकेयी कुब्जा की बातों के वशीभूत हो गयी थी, अतः वह धरती पर लेटकर मन्थरा से इस प्रकार बोली- ॥ ५७॥

इह वा मां मृतां कुब्जे नृपायावेदयिष्यसि।
वनं तु राघवे प्राप्ते भरतः प्राप्स्यते क्षितिम्॥ ५८॥
सुवर्णेन न मे ह्यर्थो न रत्नैर्न च भोजनैः।
एष मे जीवितस्यान्तो रामो यद्यभिषिच्यते॥५९॥

‘कुब्जे! मुझे न तो सुवर्ण से, न रत्नों से और न भाँति-भाँति के भोजनों से ही कोई प्रयोजन है; यदि श्रीराम का राज्याभिषेक हुआ तो यह मेरे जीवन का अन्त होगा। अब या तो श्रीराम के वन में चले जाने पर भरत को इस भूतल का राज्य प्राप्त होगा अथवा तू यहाँ महाराज को मेरी मृत्यु का समाचार सुनायेगी’। ५८-५९॥

ततः पुनस्तां महिषीं महीक्षितो वचोभिरत्यर्थमहापराक्रमैः।
उवाच कुब्जा भरतस्य मातरं हितं वचो राममुपेत्य चाहितम्॥६०॥

तदनन्तर कुब्जा महाराज दशरथ की रानी और भरत की माता कैकेयी से अत्यन्त क्रूर वचनों द्वारा पुनः ऐसी बात कहने लगी, जो लौकिक दृष्टि से भरत के लिये हितकर और श्रीराम के लिये अहितकर थी— ॥६०॥

प्रपत्स्यते राज्यमिदं हि राघवो यदि ध्रुवं त्वं ससुता च तप्स्यसे।
ततो हि कल्याणि यतस्व तत् तथा यथा सुतस्ते भरतोऽभिषेक्ष्यते॥६१॥

‘कल्याणि! यदि श्रीराम इस राज्य को प्राप्त कर लेंगे तो निश्चय ही अपने पुत्र भरत सहित तुम भारी संताप में पड़ जाओगी; अतः ऐसा प्रयत्न करो, जिससे तुम्हारे पुत्र भरत का राज्याभिषेक हो जाय’। ६१॥

तथातिविद्धा महिषीति कुब्जया समाहता वागिषुभिर्मुहर्मुहुः।
विधाय हस्तौ हृदयेऽतिविस्मिता शशंस कुब्जां कुपिता पुनः पुनः॥ ६२॥

इस प्रकार कुब्जा ने अपने वचन रूपी बाणों का बारंबार प्रहार करके जब रानी कैकेयी को अत्यन्त घायल कर दिया, तब वह अत्यन्त विस्मित और कुपित हो अपने हृदय पर दोनों हाथ रखकर कुब्जासे । बारंबार इस प्रकार कहने लगी- ॥ ६२॥

यमस्य वा मां विषयं गतामितो निशम्य कुब्जे प्रतिवेदयिष्यसि।
वनं गते वा सुचिराय राघवे समृद्धकामो भरतो भविष्यति॥६३॥

‘कुब्जे! अब या तो रामचन्द्र के अधिक काल के लिये वन में चले जाने पर भरत का मनोरथ सफल होगा या तू मुझे यहाँ से यमलोक में चली गयी सुनकर महाराज से यह समाचार निवेदन करेगी॥ ६३॥

अहं हि नैवास्तरणानि न स्रजो न चन्दनं नाञ्जनपानभोजनम्।
न किंचिदिच्छामि न चेह जीवनं न चेदितो गच्छति राघवो वनम्॥६४॥

‘यदि राम यहाँ से वन को नहीं गये तो मैं न तो भाँति-भाँति के बिछौने, न फूलों के हार, न चन्दन, न अञ्जन, न पान, न भोजन और न दूसरी ही कोई वस्तु लेना चाहूँगी। उस दशा में तो मैं यहाँ इस जीवन को भी नहीं रखना चाहूँगी’॥ ६४॥

अथैवमुक्त्वा वचनं सुदारुणं निधाय सर्वाभरणानि भामिनी।
असंस्कृतामास्तरणेन मेदिनी तदाधिशिश्ये पतितेव किंनरी॥६५॥

ऐसे अत्यन्त कठोर वचन कहकर कैकेयी ने सारे आभूषण उतार दिये और बिना बिस्तर के ही वह खाली जमीन पर लेट गयी। उस समय वह स्वर्ग से भूतल पर गिरी हुई किसी किन्नरी के समान जान पड़ती थी॥६५॥

उदीर्णसंरम्भतमोवृतानना तदावमुक्तोत्तममाल्यभूषणा।
नरेन्द्रपत्नी विमना बभूव सा तमोवृता द्यौरिव मग्नतारका॥६६॥

उसका मुख बढ़े हुए अमर्षरूपी अन्धकार से आच्छादित हो रहा था। उसके अङ्गों से उत्तम पुष्पहार और आभूषण उतर चुके थे। उस दशा में उदास मनवाली राजरानी कैकेयी जिसके तारे डूब गये हों, उस अन्धकाराच्छन्न आकाशके समान प्रतीत होती थी॥६६॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे नवमः सर्गः॥९॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में नवाँ सर्ग पूरा हुआ॥९॥

अयोध्याकाण्डम्
दशमः सर्गः (सर्ग 10)

( राजा दशरथ का कैकेयी के भवन में जाना, उसे कोपभवन में स्थित देखकर दुःखी होना और उसको अनेक प्रकार से सान्त्वना देना )

 विदर्शिता यदा देवी कुब्जया पापया भृशम्।
तदा शेते स्म सा भूमौ दिग्धविद्धेव किंनरी॥१॥

पापिनी कुब्जा ने जब देवी कैकेयी को बहुत उलटी बातें समझा दीं, तब वह विषाक्त बाण से विद्ध हुई किन्नरी के समान धरती पर लोटने लगी॥१॥

निश्चित्य मनसा कृत्यं सा सम्यगिति भामिनी।
मन्थरायै शनैः सर्वमाचचक्षे विचक्षणा॥२॥

मन्थरा के बताये हुए समस्त कार्य को यह बहुत उत्तम है—ऐसा मन-ही-मन निश्चय करके बातचीत में कुशल भामिनी कैकेयी ने मन्थरा से धीरे-धीरे अपना सारा मन्तव्य बता दिया॥२॥

सा दीना निश्चयं कृत्वा मन्थरावाक्यमोहिता।
नागकन्येव निःश्वस्य दीर्घमुष्णं च भामिनी॥ ३॥
मुहूर्तं चिन्तयामास मार्गमात्मसुखावहम्।

मन्थरा के वचनों से मोहित एवं दीन हुई भामिनी कैकेयी पूर्वोक्त निश्चय करके नागकन्या की भाँति गरम और लंबी साँस खींचने लगी और दो घड़ी तक अपने लिये सुखदायक मार्ग का विचार करती रही॥३ १/२॥

सा सुहृच्चार्थकामा च तं निशम्य विनिश्चयम्॥ ४॥
बभूव परमप्रीता सिद्धिं प्राप्येव मन्थरा।

और वह मन्थरा जो कैकेयी का हित चाहने वाली सुहृद् थी और उसी के मनोरथ को सिद्ध करने की अभिलाषा रखती थी, कैकेयी के उस निश्चय को सुनकर बहुत प्रसन्न हुई; मानो उसे कोई बहुत बड़ी सिद्धि मिल गयी हो॥

अथ सा रुषिता देवी सम्यक् कृत्वा विनिश्चयम्॥५॥
संविवेशाबला भूमौ निवेश्य भ्रुकुटिं मुखे।

तदनन्तर रोष में भरी हुई देवी कैकेयी अपने कर्तव्य का भलीभाँति निश्चय कर मुखमण्डल में स्थित भौंहों को टेढ़ी करके धरती पर सो गयी और क्या करती अबला ही तो थी॥ ५ १/२ ।।

ततश्चित्राणि माल्यानि दिव्यान्याभरणानि च॥ ६॥
अपविद्धानि कैकेय्या तानि भूमिं प्रपेदिरे।

तदनन्तर उस केकयराजकुमारी ने अपने विचित्र पुष्पहारों और दिव्य आभूषणों को उतारकर फेंक दिया। वे सारे आभूषण धरती पर यत्र-तत्र पड़े थे॥६ १/२॥

तया तान्यपविद्धानि माल्यान्याभरणानि च॥७॥
अशोभयन्त वसुधां नक्षत्राणि यथा नभः।

जैसे छिटके हुए तारे आकाश की शोभा बढ़ाते हैं, उसी प्रकार फेंके हुए वे पुष्पहार और आभूषण वहाँ भूमि की शोभा बढ़ा रहे थे॥ ७ १/२ ॥

क्रोधागारे च पतिता सा बभौ मलिनाम्बरा॥८॥
एकवेणी दृढां बद्ध्वा गतसत्त्वेव किंनरी।

मलिन वस्त्र पहनकर और सारे केशों को दृढ़ता। पूर्वक एक ही वेणी में बाँधकर कोपभवन में पड़ी हुई कैकेयी बलहीन अथवा अचेत हुई किन्नरी के समान जान पड़ती थी॥ ८ १/२ ॥

आज्ञाप्य तु महाराजो राघवस्याभिषेचनम्॥९॥
उपस्थानमनुज्ञाप्य प्रविवेश निवेशनम्।

उधर महाराज दशरथ मन्त्री आदि को श्रीराम के राज्याभिषेक की तैयारी के लिये आज्ञा दे सबको यथासमय उपस्थित होने के लिये कहकर रनिवास में गये॥ ९ १/२॥

अद्य रामाभिषेको वै प्रसिद्ध इति जज्ञिवान्॥ १०॥
प्रियाहाँ प्रियमाख्यातुं विवेशान्तःपुरं वशी।

उन्होंने सोचा आज ही श्रीराम के अभिषेक की बात प्रसिद्ध की गयी है, इसलिये यह समाचार अभी किसी रानी को नहीं मालूम हुआ होगा; ऐसा विचारकर जितेन्द्रिय राजा दशरथ ने अपनी प्यारी रानी को यह प्रिय संवाद सुनाने के लिये अन्तःपुर में प्रवेश किया॥ १० १/२॥

स कैकेय्या गृहं श्रेष्ठं प्रविवेश महायशाः॥११॥
पाण्डुराभ्रमिवाकाशं राहयुक्तं निशाकरः।

उन महायशस्वी नरेश ने पहले कैकेयी के श्रेष्ठ भवन में प्रवेश किया, मानो श्वेत बादलों से युक्त राहयुक्त आकाश में चन्द्रमा ने पदार्पण किया हो॥ ११ १/२॥

शुकबर्हिसमायुक्तं क्रौञ्चहंसरुतायुतम्॥१२॥
वादित्ररवसंघुष्टं कुब्जावामनिकायुतम्।
लतागृहैश्चित्रगृहैश्चम्पकाशोकशोभितैः॥१३॥

उस भवन में तोते, मोर, क्रौञ्च और हंस आदि पक्षी कलरव कर रहे थे, वहाँ वाद्यों का मधुर घोष गूंज रहा था, बहुत-सी कुब्जा और बौनी दासियाँ भरी हुई थीं, चम्पा और अशोक से सुशोभित बहुत-से लताभवन और चित्रमन्दिर उस महल की शोभा बढ़ा रहे थे॥ १२-१३॥

दान्तराजतसौवर्णवेदिकाभिः समायुतम्।
नित्यपुष्पफलैर्वक्षैर्वापीभिरुपशोभितम्॥१४॥

हाथीदाँत, चाँदी और सोने की बनी हुई वेदियोंसे संयुक्त उस भवन को नित्य फूलने-फलने वाले वृक्ष और बहुत-सी बावड़ियाँ सुशोभित कर रही थीं। १४॥

दान्तराजतसौवर्णैः संवृतं परमासनैः।
विविधैरन्नपानैश्च भक्ष्यैश्च विविधैरपि॥१५॥
उपपन्नं महाहँश्च भूषणैस्त्रिदिवोपमम्।

उसमें हाथी दाँत, चाँदी और सोने के बने हुए उत्तम सिंहासन रखे गये थे। नाना प्रकार के अन्न, पान और भाँति-भाँति के भक्ष्य-भोज्य पदार्थों से वह भवन भरापूरा था। बहुमूल्य आभूषणों से सम्पन्न कैकेयी का वह भवन स्वर्ग के समान शोभा पा रहा था। १५ १/२॥

स प्रविश्य महाराजः स्वमन्तःपुरमृद्धिमत्॥१६॥
न ददर्श स्त्रियं राजा कैकेयीं शयनोत्तमे।

अपने उस समृद्धिशाली अन्तःपुर में प्रवेश करके महाराज राजा दशरथ ने वहाँ की उत्तम शय्यापर रानी कैकेयी को नहीं देखा॥ १६ १/२॥

स कामबलसंयुक्तो रत्यर्थी मनुजाधिपः॥१७॥
अपश्यन् दयितां भार्यां पप्रच्छ विषसाद च।

कामबल से संयुक्त वे नरेश रानी की प्रसन्नता बढ़ाने की अभिलाषा से भीतर गये थे। वहाँ अपनी प्यारी पत्नी को न देखकर उनके मन में बड़ा विषाद हुआ और वे उनके विषय में पूछ-ताछ करने लगे। १७ १/२॥

नहि तस्य पुरा देवी तां वेलामत्यवर्तत॥१८॥
न च राजा गृहं शून्यं प्रविवेश कदाचन।
ततो गृहगतो राजा कैकेयीं पर्यपृच्छत॥१९॥
यथापुरमविज्ञाय स्वार्थलिप्सुमपण्डिताम्।

इससे पहले रानी कैकेयी राजा के आगमन की उस बेला में कहीं अन्यत्र नहीं जाती थीं, राजा ने कभी सूने भवन में प्रवेश नहीं किया था, इसीलिये वे घर में आकर कैकेयी के बारे में पूछने लगे। उन्हें यह मालूम नहीं था कि वह मूर्खा कोई स्वार्थ सिद्ध करना चाहती है, अतः उन्होंने पहले की ही भाँति प्रतिहारी से उसके विषयमें पूछा ॥ १८-१९ १/२ ॥

प्रतिहारी त्वथोवाच संत्रस्ता तु कृताञ्जलिः॥ २०॥
देव देवी भृशं क्रुद्धा क्रोधागारमभिद्रुता।

प्रतिहारी बहुत डरी हुई थी। उसने हाथ जोड़कर कहा—’देव! देवी कैकेयी अत्यन्त कुपित हो कोपभवन की ओर दौड़ी गयी हैं’॥ २० १/२॥

प्रतीहार्या वचः श्रुत्वा राजा परमदुर्मनाः॥२१॥
विषसाद पुनर्भूयो लुलितव्याकुलेन्द्रियः।

प्रतिहारी की यह बात सुनकर राजा का मन बहुत उदास हो गया, उनकी इन्द्रियाँ चञ्चल एवं व्याकुल हो उठीं और वे पुनः अधिक विषाद करने लगे॥ २१ १/२॥

तत्र तां पतितां भूमौ शयानामतथोचिताम्॥२२॥
प्रतप्त इव दुःखेन सोऽपश्यज्जगतीपतिः।

कोपभवन में वह भूमि पर पड़ी थी और इस तरह लेटी हुई थी, जो उसके लिये योग्य नहीं था। राजा ने दुःख के कारण संतप्त-से होकर उसे इस अवस्था में देखा ॥ २२ १/२॥

स वृद्धस्तरुणीं भार्यां प्राणेभ्योऽपि गरीयसीम्॥ २३॥
अपापः पापसंकल्पां ददर्श धरणीतले।
लतामिव विनिष्कृत्तां पतितां देवतामिव॥२४॥

राजा बूढ़े थे और उनकी वह पत्नी तरुणी थी, अतः वे उसे अपने प्राणों से भी बढ़कर मानते थे। राजा के मन में कोई पाप नहीं था; परंतु कैकेयी अपने मन में पाप पूर्ण संकल्प लिये हुए थी। उन्होंने उसे
कटी हुई लता की भाँति पृथ्वी पर पड़ी देखा—मानो कोई देवाङ्गना स्वर्ग से भूतल पर गिर पड़ी हो ॥ २३-२४॥

किन्नरीमिव निर्धूतां च्युतामप्सरसं यथा।
मायामिव परिभ्रष्टां हरिणीमिव संयताम् ॥२५॥

वह स्वर्गभ्रष्ट किन्नरी, देवलोक से च्युत हुई अप्सरा, लक्ष्यभ्रष्ट माया और जाल में बँधी हुई हरिणी के समान जान पड़ती थी॥ २५॥ ।

करेणुमिव दिग्धेन विद्धां मृगयुना वने।
महागज इवारण्ये स्नेहात् परमदुःखिताम्॥२६॥
परिमृज्य च पाणिभ्यामभिसंत्रस्तचेतनः।
कामी कमलपत्राक्षीमुवाच वनितामिदम्॥२७॥

जैसे कोई महान् गजराज वन में व्याध के द्वारा विषलिप्त बाण से विद्ध होकर गिरी हई अत्यन्त दुःखित हथिनी का स्नेहवश स्पर्श करता है, उसी प्रकार कामी राजा दशरथ ने महान् दुःख में पड़ी हुई कमलनयनी भार्या कैकेयी का स्नेहपूर्वक दोनों हाथों से स्पर्श किया। उस समय उनके मन में सब ओर से यह भय समा गया था कि न जाने यह क्या कहेगी और क्या करेगी? वे उसके अङ्गों पर हाथ फेरते हुए उससे इस प्रकार बोले- ॥ २६-२७॥

न तेऽहमभिजानामि क्रोधमात्मनि संश्रितम्।
देवि केनाभियुक्तासि केन वासि विमानिता॥ २८॥

‘देवि! तुम्हारा क्रोध मुझ पर है, ऐसा तो मुझे विश्वास नहीं होता। फिर किसने तुम्हारा तिरस्कार किया है ? किसके द्वारा तुम्हारी निन्दा की गयी है ? ॥

यदिदं मम दुःखाय शेषे कल्याणि पांसुषु।
भूमौ शेषे किमर्थं त्वं मयि कल्याणचेतसि॥ २९॥
भूतोपहतचित्तेव मम चित्तप्रमाथिनि।

‘कल्याणि! तुम जो इस तरह मुझे दुःख देने के लिये धूल में लोट रही हो, इसका क्या कारण है? मेरे चित्त को मथ डालने वाली सुन्दरी ! मेरे मन में तो सदा तुम्हारे कल्याण की ही भावना रहती है। फिर मेरे रहते हए तुम किसलिये धरती पर सो रही हो? जान पड़ता है तुम्हारे चित्तपर किसी पिशाच ने अधिकार कर लिया है॥ २९ १/२॥

सन्ति मे कुशला वैद्यास्त्वभितुष्टाश्च सर्वशः॥ ३०॥
सुखितां त्वां करिष्यन्ति व्याधिमाचक्ष्व भामिनि।

‘भामिनि ! तुम अपना रोग बताओ। मेरे यहाँ बहुतसे चिकित्साकुशल वैद्य हैं, जिन्हें मैंने सब प्रकारसे संतुष्ट कर रखा है, वे तुम्हें सुखी कर देंगे॥ ३० १/२ ॥

कस्य वापि प्रियं कार्यं केन वा विप्रियं कृतम्॥ ३१॥
कः प्रियं लभतामद्य को वा सुमहदप्रियम्।

‘अथवा कहो, आज किसका प्रिय करना है? या किसने तुम्हारा अप्रिय किया है? तुम्हारे किस उपकारी को आज प्रिय मनोरथ प्राप्त हो अथवा किस अपकारी को अत्यन्त अप्रिय–कठोर दण्ड दिया जाय? ।। ३१ १/२॥

मा रौत्सीर्मा च कार्षीस्त्वं देवि सम्परिशोषणम्॥ ३२॥
अवध्यो वध्यतां को वा वध्यः को वा विमुच्यताम्।
दरिद्रः को भवेदाढ्यो द्रव्यवान् वाप्यकिंचनः॥ ३३॥

‘देवि! तुम न रोओ, अपनी देह को न सुखाओ; आज तुम्हारी इच्छा के अनुसार किस अवध्य का वध किया जाय? अथवा किस प्राणदण्ड पाने योग्य अपराधी को भी मुक्त कर दिया जाय? किस दरिद्र को धनवान् और किस धनवान्को कंगाल बना दिया जाय? ॥ ३२-३३॥

अहं च हि मदीयाश्च सर्वे तव वशानुगाः।
न ते कंचिदभिप्रायं व्याहन्तुमहमुत्सहे ॥ ३४॥
आत्मनो जीवितेनापि ब्रूहि यन्मनसि स्थितम्।

‘मैं और मेरे सभी सेवक तुम्हारी आज्ञा के अधीन हैं। तुम्हारे किसी भी मनोरथ को मैं भंग नहीं कर सकता–उसे पूरा करके ही रहूँगा, चाहे उसके लिये मुझे अपने प्राण ही क्यों न देने पड़ें; अतः तुम्हारे मन में जो कुछ हो, उसे स्पष्ट कहो॥ ३४ १/२ ॥

बलमात्मनि जानन्ती न मां शङ्कितुमर्हसि ॥३५॥
करिष्यामि तव प्रीतिं सुकृतेनापि ते शपे।

‘अपने बल को जानते हुए भी तुम्हें मुझ पर संदेह नहीं करना चाहिये। मैं अपने सत्कर्मों की शपथ खाकर कहता हूँ, जिससे तुम्हें प्रसन्नता हो, वही करूँगा॥३५ १/२॥

यावदावर्तते चक्रं तावती मे वसुंधरा ॥३६॥
द्राविडाः सिन्धुसौवीराः सौराष्ट्रा दक्षिणापथाः।
वङ्गाङ्गमगधा मत्स्याः समृद्धाः काशिकोसलाः॥ ३७॥

‘जहाँ तक सूर्य का चक्र घूमता है, वहाँ तक सारी पृथ्वी मेरे अधिकार में है। द्रविड़, सिन्धु-सौवीर, सौराष्ट्र, दक्षिण भारत के सारे प्रदेश तथा अङ्ग, वङ्ग, मगध, मत्स्य, काशी और कोसल-इन सभी समृद्धिशाली देशों पर मेरा आधिपत्य है॥ ३६-३७॥

तत्र जातं बहु द्रव्यं धनधान्यमजाविकम्।
ततो वृणीष्व कैकेयि यद् यत् त्वं मनसेच्छसि॥ ३८॥

‘केकयराजनन्दिनि! उनमें पैदा होने वाले भाँतिभाँति के द्रव्य, धन-धान्य और बकरी-भेंड आदि जो भी तुम मन से लेना चाहती हो, वह मुझसे माँग लो॥

किमायासेन ते भीरु उत्तिष्ठोत्तिष्ठ शोभने।
तत्त्वं मे ब्रूहि कैकेयि यतस्ते भयमागतम्।
तत ते व्यपनयिष्यामि नीहारमिव रश्मिवान्॥ ३९॥

‘भीरु ! इतना क्लेश उठाने प्रयास करने की क्या आवश्यकता है? शोभने! उठो, उठो। कैकेयि! ठीक-ठीक बताओ, तुम्हें किससे कौन-सा भय प्राप्त हुआ है? जैसे अंशुमाली सूर्य कुहरा दूर कर देते हैं, । उसी प्रकार मैं तुम्हारे भय का सर्वथा निवारण करदूंगा’ ॥ ३९॥

तथोक्ता सा समाश्वस्ता वक्तुकामा तदप्रियम्।
परिपीडयितुं भूयो भर्तारमुपचक्रमे॥४०॥

राजा के ऐसा कहने पर कैकेयी को कुछ सान्त्वना मिली। अब उसे अपने स्वामी से वह अप्रिय बात कहने की इच्छा हुई। उसने पति को और अधिक पीड़ा देने की तैयारी की॥ ४०॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे दशमः सर्गः ॥१०॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में दसवाँ सर्ग पूरा हुआ।१०॥

अयोध्याकाण्डम्
एकादशः सर्गः (सर्ग 11)

( कैकेयी का राजा को दो वरों का स्मरण दिलाकर भरत के लिये अभिषेक और राम के लिये चौदह वर्षों का वनवास माँगना )

तं मन्मथशरैर्विद्धं कामवेगवशानुगम्।
उवाच पृथिवीपालं कैकेयी दारुणं वचः॥१॥

भूपाल दशरथ कामदेव के बाणों से पीड़ित तथा कामवेग के वशीभूत हो उसी का अनुसरण कर रहे थे। उनसे कैकेयी ने यह कठोर वचन कहा- ॥१॥

नास्मि विप्रकृता देव केनचिन्नावमानिता।
अभिप्रायस्तु मे कश्चित् तमिच्छामि त्वया कृतम्॥२॥

‘देव! न तो किसी ने मेरा अपकार किया है और न किसी के द्वारा मैं अपमानित या निन्दित ही हुई हूँ। मेरा कोई एक अभिप्राय (मनोरथ) है और मैं आपके द्वारा उसकी पूर्ति चाहती हूँ॥२॥

प्रतिज्ञा प्रतिजानीष्व यदि त्वं कर्तुमिच्छसि।
अथ ते व्याहरिष्यामि यथाभिप्रार्थितं मया॥३॥

‘यदि आप उसे पूर्ण करना चाहते हों तो प्रतिज्ञा कीजिये। इसके बाद मैं अपना वास्तविक अभिप्राय आपसे कहूँगी’॥३॥

तामुवाच महाराजः कैकेयीमीषदुत्स्मयः।
कामी हस्तेन संगृह्य मूर्धजेषु भुवि स्थिताम्॥४॥

महाराज दशरथ काम के अधीन हो रहे थे। वे कैकेयी की बात सुनकर किंचित् मुस्कराये और पृथ्वी पर पड़ी हुई उस देवी के केशों को हाथ से पकड़कर उसके सिर को अपनी गोद में रखकर उससे इस प्रकार बोले- ॥४॥

अवलिप्ते न जानासि त्वत्तः प्रियतरो मम।
मनुजो मनुजव्याघ्राद् रामादन्यो न विद्यते॥५॥

‘अपने सौभाग्य पर गर्व करने वाली कैकेयी! क्या तुम्हें मालूम नहीं है कि नरश्रेष्ठ श्रीराम के अतिरिक्त दूसरा कोई ऐसा मनुष्य नहीं है, जो मुझे तुमसे अधिक प्रिय हो॥

तेनाजय्येन मुख्येन राघवेण महात्मना।
शपे ते जीवनाण ब्रूहि यन्मनसेप्सितम्॥६॥

‘जो प्राणों के द्वारा भी आराधनीय हैं और जिन्हें जीतना किसी के लिये भी असम्भव है, उन प्रमुख वीर महात्मा श्रीराम की शपथ खाकर कहता हूँ कि तुम्हारी कामना पूर्ण होगी; अतः तुम्हारे मन की जो इच्छा हो उसे बताओ॥६॥

यं मुहूर्तमपश्यंस्तु न जीवे तमहं ध्रुवम्।
तेन रामेण कैकेयि शपे ते वचनक्रियाम्॥७॥

‘कैकेयि! जिन्हें दो घड़ी भी न देखनेपर निश्चय ही मैं जीवित नहीं रह सकता, उन श्रीरामकी शपथ खाकर कहता हूँ कि तुम जो कहोगी, उसे पूर्ण करूँगा॥७॥

आत्मना चात्मजैश्चान्यैर्वृणे यं मन्जर्षभम्।
तेन रामेण कैकेयि शपे ते वचनक्रियाम्॥८॥

‘केकयनन्दिनि! अपने तथा अपने दूसरे पुत्रों को निछावर करके भी मैं जिन नरश्रेष्ठ श्रीराम का वरण करने को उद्यत हूँ, उन्हीं की शपथ खाकर कहता हूँ कि तुम्हारी कही हुई बात पूरी करूँगा॥ ८॥

भद्रे हृदयमप्येतदनुमृश्योद्धरस्व मे।
एतत् समीक्ष्य कैकेयि ब्रूहि यत् साधु मन्यसे॥

‘भद्रे ! केकयराजकुमारी! मेरा यह हृदय भी तुम्हारे वचनों की पूर्ति के लिये तत्पर है। ऐसा सोचकर तुम अपनी इच्छा व्यक्त करके इस दुःख से मेरा उद्धार करो। श्रीराम सबको अधिक प्रिय हैं—इस बातपर दृष्टिपात करके तुम्हें जो अच्छा जान पड़े, वह कहो॥ ९॥

बलमात्मनि पश्यन्ती न विशङ्कितुमर्हसि।
करिष्यामि तव प्रीतिं सुकृतेनापि ते शपे॥१०॥

‘अपने बलको देखते हुए भी तुम्हें मुझ पर शङ्का नहीं करनी चाहिये। मैं अपने सत्कर्मो की शपथ खाकर प्रतिज्ञा करता हूँ कि तुम्हारा प्रिय कार्य अवश्य सिद्ध करूँगा’ ॥ १०॥

सा तदर्थमना देवी तमभिप्रायमागतम्।
निर्माध्यस्थ्याच्च हर्षाच्च बभाषे दुर्वचं वचः॥ ११॥

रानी कैकेयी का मन स्वार्थ की सिद्धि में ही लगा हुआ था। उसके हृदय में भरत के प्रति पक्षपात था और राजा को अपने वश में देखकर हर्ष हो रहा था; अतः यह सोचकर कि अब मेरे लिये अपना मतलब साधने का अवसर आ गया है, वह राजासे ऐसी बात बोली, जिसे मुँह से निकालना (शत्रु के लिये भी) कठिन है॥ ११॥

तेन वाक्येन संहृष्टा तमभिप्रायमात्मनः।
व्याजहार महाघोरमभ्यागतमिवान्तकम्॥१२॥

राजा के उस शपथयुक्त वचन से उसको बड़ा हर्ष हुआ था। उसने अपने उस अभिप्राय को जो पास आये हुए यमराज के समान अत्यन्त भयंकर था, इन शब्दों में व्यक्त किया— ॥ १२॥

यथा क्रमेण शपसे वरं मम ददासि च।
तच्छृण्वन्तु त्रयस्त्रिंशद् देवाः सेन्द्रपुरोगमाः॥ १३॥

‘राजन्! आप जिस तरह क्रमशः शपथ खाकर मुझे वर देने को उद्यत हुए हैं, उसे इन्द्र आदि तैंतीस देवता सुन लें॥ १३॥

चन्द्रादित्यौ नभश्चैव ग्रहा रात्र्यहनी दिशः।
जगच्च पृथिवी चेयं सगन्धर्वाः सराक्षसाः॥ १४॥
निशाचराणि भूतानि गृहेषु गृहदेवताः।
यानि चान्यानि भूतानि जानीयुर्भाषितं तव॥ १५॥

‘चन्द्रमा, सूर्य, आकाश, ग्रह, रात, दिन, दिशा, जगत् , यह पृथ्वी, गन्धर्व, राक्षस, रात में विचरने वाले प्राणी, घरों में रहने वाले गृहदेवता तथा इनके अतिरिक्त भी जितने प्राणी हों, वे सब आपके कथन को जान लें -आपकी बातों के साक्षी बनें॥ १४-१५ ॥

सत्यसंधो महातेजा धर्मज्ञः सत्यवाक्शुचिः।
वरं मम ददात्येष सर्वे शृण्वन्तु दैवताः॥१६॥

‘सब देवता सुनें! महातेजस्वी, सत्यप्रतिज्ञ, धर्मके ज्ञाता, सत्यवादी तथा शुद्ध आचार-विचार वाले ये महाराज मुझे वर दे रहे हैं’ ॥ १६॥

इति देवी महेष्वासं परिगृह्याभिशस्य च।
ततः परमुवाचेदं वरदं काममोहितम्॥१७॥

इस प्रकार काम मोहित होकर वर देने को उद्यत हुए । महाधनुर्धर राजा दशरथ को अपनी मुट्ठी में करके देवीकैकेयी ने पहले उनकी प्रशंसा की; फिर इस प्रकार कहा- ॥ १७॥

स्मर राजन् पुरा वृत्तं तस्मिन् देवासुरे रणे।
तत्र त्वां च्यावयच्छत्रुस्तव जीवितमन्तरा॥१८॥

‘राजन् ! उस पुरानी बात को याद कीजिये, जब कि देवासुरसंग्राम हो रहा था। वहाँ शत्रु ने आपको घायल करके गिरा दिया था, केवल प्राण नहीं लिये थे॥ १८॥

तत्र चापि मया देव यत् त्वं समभिरक्षितः।
जाग्रत्या यतमानायास्ततो मे प्रददौ वरौ॥१९॥

‘देव! उस युद्धस्थल में सारी रात जागकर अनेक प्रकार के प्रयत्न करके जो मैंने आपके जीवन की रक्षा की थी उससे संतुष्ट होकर आपने मुझे दो वर दिये थे॥ १९॥

तौ दत्तौ च वरौ देव निक्षेपौ मृगयाम्यहम्।
तवैव पृथिवीपाल सकाशे रघुनन्दन ॥२०॥

‘देव! पृथ्वीपाल रघुनन्दन! आपके दिये हुए वे दोनों वर मैंने धरोहर के रूप में आपके ही पास रख दिये थे। आज इस समय उन्हीं की मैं खोज करती हूँ॥२०॥

तत् प्रतिश्रुत्य धर्मेण न चेद् दास्यसि मे वरम्।
अद्यैव हि प्रहास्यामि जीवितं त्वद्विमानिता॥ २१॥

‘इस प्रकार धर्मतः प्रतिज्ञा करके यदि आप मेरे उन वरों को नहीं देंगे तो मैं अपनेको आपके द्वारा” अपमानित हुई समझकर आज ही प्राणों का परित्याग कर दूंगी’ ॥ २१॥

वाङ्मात्रेण तदा राजा कैकेय्या स्ववशे कृतः।
प्रचस्कन्द विनाशाय पाशं मृग इवात्मनः॥२२॥

जैसे मृग बहेलिये की वाणीमात्र से अपने ही विनाश के लिये उसके जाल में फँस जाता है, उसी प्रकार कैकेयी के वशीभूत हुए राजा दशरथ उस समयपूर्वकाल के वरदान-वाक्य का स्मरण कराने मात्र से अपने ही विनाशके लिये प्रतिज्ञा के बन्धन में बँध गये। २२॥

ततः परमुवाचेदं वरदं काममोहितम्।
वरौ देयौ त्वया देव तदा दत्तौ महीपते॥२३॥
तौ तावदहमद्यैव वक्ष्यामि शृणु मे वचः।।
अभिषेकसमारम्भो राघवस्योपकल्पितः॥२४॥
अनेनैवाभिषेकेण भरतो मेऽभिषिच्यताम्।

तदनन्तर कैकेयी ने काममोहित होकर वर देने के लिये उद्यत हुए राजा से इस प्रकार कहा—’देव! पृथ्वीनाथ! उन दिनों आपने जो दो वर देने की प्रतिज्ञा की थी, उन्हें अब मुझे देना चाहिये। उन दोनों वरों को मैं अभी बताऊँगी-आप मेरी बात सुनिये—यह जो श्रीराम के राज्याभिषेक की तैयारी की गयी है, इसी अभिषेक-सामग्रीद् वारा मेरे पुत्र भरत का अभिषेक किया जाय॥

यो द्वितीयो वरो देव दत्तः प्रीतेन मे त्वया॥२५॥
तदा देवासुरे युद्धे तस्य कालोऽयमागतः।

‘देव! आपने उस समय देवासुर संग्राम में प्रसन्न होकर मेरे लिये जो दूसरा वर दिया था, उसे प्राप्त करनेका यह समय भी अभी आया है॥२५ १/२॥

नव पञ्च च वर्षाणि दण्डकारण्यमाश्रितः॥
चीराजिनधरो धीरो रामो भवतु तापसः।
भरतो भजतामद्य यौवराज्यमकण्टकम्॥२७॥

‘धीर स्वभाव वाले श्रीराम तपस्वी के वेश में वल्कल तथा मृगचर्म धारण करके चौदह वर्षों तक दण्डकारण्य में जाकर रहें। भरत को आज निष्कण्टक युवराज पद प्राप्त हो जाय॥ २६-२७॥

एष मे परमः कामो दत्तमेव वरं वृणे।
अद्य चैव हि पश्येयं प्रयान्तं राघवं वने ॥२८॥

‘यही मेरी सर्वश्रेष्ठ कामना है। मैं आपसे पहले का दिया हुआ वर ही माँगती हूँ। आप ऐसी व्यवस्था करें, जिससे मैं आज ही श्रीराम को वन की ओर जाते देखें।

स राजराजो भव सत्यसंगरः कुलं च शीलं च हि जन्म रक्ष च।
परत्र वासे हि वदन्त्यनुत्तमं तपोधनाः सत्यवचो हितं नृणाम्॥२९॥

‘आप राजाओं के राजा हैं; अतः सत्यप्रतिज्ञ बनिये और उस सत्य के द्वारा अपने कुल, शील तथा जन्म की रक्षा कीजिये। तपस्वी पुरुष कहते हैं कि सत्य बोलना सबसे श्रेष्ठ धर्म है। वह परलोक में निवास होने पर मनुष्यों के लिये परम कल्याणकारी होता है॥ २९॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे एकादशः सर्गः॥११॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में ग्यारहवाँ सर्ग पूरा हुआ।११॥

अयोध्याकाण्डम्
दादशः सर्गः (सर्ग 12)

( महाराज दशरथ की चिन्ता, विलाप, कैकेयी को फटकारना, समझाना और उससे वैसा वर न माँगने के लिये अनुरोध करना )

ततः श्रुत्वा महाराजः कैकेय्या दारुणं वचः।
चिन्तामभिसमापेदे मुहर्तं प्रतताप च॥१॥

कैकेयीcका यह कठोर वचन सुनकर महाराज दशरथcको बड़ी चिन्ता हुई वे एक मुहूर्त तक अत्यन्त संताप करते रहे॥१॥

किं नु मेऽयं दिवास्वप्नश्चित्तमोहोऽपि वा मम।
अनुभूतोपसर्गो वा मनसो वाप्युपद्रवः॥२॥

उन्होंने सोचा–’क्या दिन में ही यह मुझे स्वप्न दिखायी दे रहा है ? अथवा मेरे चित्त का मोह है ? या किसी भूत (ग्रह आदि) के आवेश से चित्त में विकलता आ गयी है? या आधि-व्याधि के कारण यह कोई मन का ही उपद्रव है’ ॥ २॥

इति संचिन्त्य तद् राजा नाध्यगच्छत् तदासुखम्।
प्रतिलभ्य ततः संज्ञां कैकेयीवाक्यतापितः॥३॥

यही सोचते हुए उन्हें अपने भ्रम के कारण का पता नहीं लगा। उस समय राजा को मूर्च्छित कर देने वाला महान् दुःख प्राप्त हुआ। तत्पश्चात् होश में आने पर कैकेयी की बात को याद करके उन्हें पुनः संताप होने लगा॥३॥

व्यथितो विक्लवश्चैव व्याघ्रीं दृष्ट्वा यथा मृगः।
असंवृतायामासीनो जगत्यां दीर्घमुच्छ्वसन्॥४॥
मण्डले पन्नगो रुद्वो मन्त्रैरिव महाविषः।

जैसे किसी बाघिन को देखकर मृग व्यथित हो जाता है, उसी प्रकार वे नरेश कैकेयी को देखकर पीड़ित एवं व्याकुल हो उठे। बिस्तररहित खाली भूमि पर बैठे हुए राजा लंबी साँस खींचने लगे मानो कोई महा विषैला सर्प किसी मण्डल में मन्त्रों द्वारा अवरुद्ध हो गया हो॥ ४ १/२॥

अहो धिगिति सामर्षो वाचमुक्त्वा नराधिपः॥
मोहमापेदिवान् भूयः शोकोपहतचेतनः।

राजा दशरथ रोष में भरकर ‘अहो! धिक्कार है’ यह कहकर पुनः मूर्च्छित हो गये। शोक के कारण उनकी चेतना लुप्त-सी हो गयी।॥ ५ १/२॥

चिरेण तु नृपः संज्ञां प्रतिलभ्य सुदुःखितः॥६॥
कैकेयीमब्रवीत् क्रुद्धो निर्दहन्निव तेजसा।

बहुत देर के बाद जब उन्हें फिर चेत हुआ, तब वे नरेश अत्यन्त दुःखी होकर कैकेयी को अपने तेज से दग्ध-सी करते हुए क्रोधपूर्वक उससे बोले- ॥ ६ १/२॥

नृशंसे दुष्टचारित्रे कुलस्यास्य विनाशिनि॥७॥
किं कृतं तव रामेण पापे पापं मयापि वा

‘दयाहीन दुराचारिणी कैकेयि! तू इस कुल का विनाश करने वाली डाइन है। पापिनि! बता, मैंने अथवा श्रीराम ने तेरा क्या बिगाड़ा है? ॥ ७ १/२॥

सदा ते जननीतुल्यां वृत्तिं वहति राघवः॥८॥
तस्यैवं त्वमनर्थाय किंनिमित्तमिहोद्यता।

‘श्रीरामचन्द्र तो तेरे साथ सदा सगी माता का-सा बर्ताव करते आये हैं; फिर तू किसलिये उनका इस तरह अनिष्ट करने पर उतारू हो गयी है॥ ८ १/२॥

त्वं मयाऽऽत्मविनाशाय भवनं स्वं निवेशिता॥ ९॥
अविज्ञानान्नृपसुता व्याला तीक्ष्णविषा यथा।

‘मालूम होता है-मैंने अपने विनाश के लिये ही तुझे अपने घर में लाकर रखा था। मैं नहीं जानता था कि तू राजकन्या के रूप में तीखे विषवाली नागिन है॥ ९१/२॥

जीवलोको यदा सर्वो रामस्याह गुणस्तवम्॥ १०॥
अपराधं कमुद्दिश्य त्यक्ष्यामीष्टमहं सुतम्।

‘जब सारा जीव-जगत् श्रीराम के गुणों की प्रशंसा करता है, तब मैं किस अपराध के कारण अपने उस प्यारे पुत् रको त्याग दूं? ॥ १० १/२ ॥

कौसल्यां च सुमित्रां च त्यजेयमपि वा श्रियम्॥ ११॥
जीवितं चात्मनो रामं न त्वेव पितृवत्सलम्।

‘मैं कौसल्या और सुमित्रा को भी छोड़ सकता हूँ, राजलक्ष्मी का भी परित्याग कर सकता हूँ, परंतु अपने प्राणस्वरूप पितृभक्त श्रीराम को नहीं छोड़ सकता॥ ११ १/२॥

परा भवति मे प्रीतिर्दृष्ट्वा तनयमग्रजम्॥ १२॥
अपश्यतस्तु मे रामं नष्टं भवति चेतनम्।

‘अपने ज्येष्ठ पुत्र श्रीराम को देखते ही मेरे हृदय में परमप्रेम उमड़ आता है; परंतु जब मैं श्रीराम को नहीं देखता हूँ, तब मेरी चेतना नष्ट होने लगती है॥ १२ १/२॥

तिष्ठेल्लोको विना सूर्यं सस्यं वा सलिलं विना॥ १३॥
न तु रामं विना देहे तिष्ठेत्तु मम जीवितम्।

‘सम्भव है सूर्य के बिना यह संसार टिक सके अथवा पानी के बिना खेती उपज सके, परंतु श्रीराम के बिना मेरे शरीर में प्राण नहीं रह सकते॥ १३ १/२॥

तदलं त्यज्यतामेष निश्चयः पापनिश्चये॥१४॥
अपि ते चरणौ मूर्ना स्पृशाम्येष प्रसीद मे।
किमर्थं चिन्तितं पापे त्वया परमदारुणम्॥१५॥

‘अतः ऐसा वर माँगने से कोई लाभ नहीं। पापपूर्ण निश्चयवाली कैकेयि! तू इस निश्चय अथवा दुराग्रह को त्याग दे। यह लो, मैं तेरे पैरों पर अपना मस्तक रखता हूँ, मुझ पर प्रसन्न हो जा। पापिनि! तूने ऐसी परम क्रूरतापूर्ण बात किसलिये सोची है?॥ १४-१५॥

अथ जिज्ञाससे मां त्वं भरतस्य प्रियाप्रिये।
अस्तु यत्तत्त्वया पूर्वं व्याहृतं राघवं प्रति॥१६॥

‘यदि यह जानना चाहती है कि भरत मुझे प्रिय हैं या अप्रिय तो रघुनन्दन भरत के सम्बन्ध में तू पहले जो कुछ कह चुकी है, वह पूर्ण हो अर्थात् तेरे प्रथम वर के अनुसार मैं भरत का राज्याभिषेक स्वीकार करता हूँ॥१६॥

स मे ज्येष्ठसुतः श्रीमान् धर्मज्येष्ठ इतीव मे।
तत् त्वया प्रियवादिन्या सेवार्थं कथितं भवेत्॥ १७॥

‘तू पहले कहा करती थी कि ‘श्रीराम मेरे बड़े बेटे हैं, वे धर्माचरण में भी सबसे बड़े हैं!’ परंतु अब मालूम हुआ कि तू ऊपर-ऊपर से चिकनी-चुपड़ी बातें किया करती थी और वह बात तूने श्रीराम से अपनी सेवा कराने के लिये ही कही होगी॥ १७॥

तच्छ्रुत्वा शोकसंतप्ता संतापयसि मां भृशम्।
आविष्टासि गृहे शून्ये सा त्वं परवशं गता॥१८॥

‘आज श्रीराम के अभिषेक की बात सुनकर तू शोक से संतप्त हो उठी है और मुझे भी बहुत संताप दे रही है; इससे जान पड़ता है कि इस सूने घर में तुझपर भूत आदि का आवेश हो गया है, अतः तू परवश होकर ऐसी बातें कह रही है।॥ १८॥

इक्ष्वाकूणां कुले देवि सम्प्राप्तः सुमहानयम्।
अनयो नयसम्पन्ने यत्र ते विकृता मतिः॥१९॥

‘देवि! न्यायशील इक्ष्वाकुवंशमें यह बड़ा भारी अन्याय आकर उपस्थित हुआ है, जहाँ तेरी बुद्धि इस प्रकार विकृत हो गयी है॥ १९॥

नहि किंचिदयुक्तं वा विप्रियं वा पुरा मम।
अकरोस्त्वं विशालाक्षि तेन न श्रद्दधामि ते॥ २०॥

‘विशाललोचने! आज से पहले तूने कभी कोई ऐसा आचरण नहीं किया है, जो अनुचित अथवा मेरे लिये अप्रिय हो; इसीलिये तेरी आजकी बात पर भी मुझे विश्वास नहीं होता है॥ २०॥

ननु ते राघवस्तुल्यो भरतेन महात्मना।
बहुशो हि स्म बाले त्वं कथाः कथयसे मम॥ २१॥

‘तेरे लिये तो श्रीराम भी महात्मा भरत के ही तुल्य हैं। बाले! तू बहुत बार बातचीत के प्रसंग में स्वयं ही यह बात मुझसे कहती रही है॥२१॥

तस्य धर्मात्मनो देवि वने वासं यशस्विनः।
कथं रोचयसे भीरु नव वर्षाणि पञ्च च॥२२॥

‘भीरु स्वभाववाली देवि! उन्हीं धर्मात्मा और यशस्वी श्रीराम का चौदह वर्षों के लिये वनवास तुझे कैसे अच्छा लगता है ? ॥ २२ ॥

अत्यन्तसुकुमारस्य तस्य धर्मे कृतात्मनः।
कथं रोचयसे वासमरण्ये भृशदारुणे॥२३॥

‘जो अत्यन्त सुकुमार और धर्म में दृढ़तापूर्वक मन लगाये रखने वाले हैं, उन्हीं श्रीराम को वनवास देना तुझे कैसे रुचिकर जान पड़ता है ? अहो! तेरा हृदय बड़ा कठोर है॥ २३॥

रोचयस्यभिरामस्य रामस्य शुभलोचने।
तव शुश्रूषमाणस्य किमर्थं विप्रवासनम्॥२४॥

‘सुन्दर नेत्रों वाली कैकेयि! जो सदा तेरी सेवा। शुश्रूषा में लगे रहते हैं, उन नयनाभिराम श्रीराम को देश निकाला दे देने की इच्छा तुझे किसलिये हो रही है ? ॥

रामो हि भरताद् भूयस्तव शुश्रूषते सदा।
विशेषं त्वयि तस्मात् तु भरतस्य न लक्षये॥ २५॥

‘मैं देखता हूँ, भरत से अधिक श्रीराम ही सदा तेरी सेवा करते हैं। भरत उनसे अधिक तेरी सेवा में रहते हों, ऐसा मैंने कभी नहीं देखा है॥ २५ ॥

शुश्रूषां गौरवं चैव प्रमाणं वचनक्रियाम्।
कस्तु भूयस्तरं कुर्यादन्यत्र पुरुषर्षभात्॥ २६॥

‘नरश्रेष्ठ श्रीराम से बढ़कर दूसरा कौन है, जो गुरुजनों की सेवा करने, उन्हें गौरव देने, उनकी बातों को मान्यता देने और उनकी आज्ञा का तुरंत पालन करने में अधिक तत्परता दिखाता हो॥२६॥

बहूनां स्त्रीसहस्राणां बहूनां चोपजीविनाम्।
परिवादोऽपवादो वा राघवे नोपपद्यते॥२७॥

‘मेरे यहाँ कई सहस्र स्त्रियाँ हैं और बहुत-से उपजीवी भृत्यजन हैं, परंतु किसी के मुँह से श्रीराम के सम्बन्ध में सच्ची या झूठी किसी प्रकार की शिकायत नहीं सुनी जाती॥२७॥

सान्त्वयन् सर्वभूतानि रामः शुद्धेन चेतसा।
गृह्णाति मनुजव्याघ्रः प्रियैर्विषयवासिनः ॥२८॥

‘पुरुषसिंह श्रीराम समस्त प्राणियोंको शुद्ध हृदयसे सान्त्वना देते हुए प्रिय आचरणोंद्वारा राज्यकी समस्त प्रजाओंको अपने वशमें किये रहते हैं।॥ २८॥

सत्येन लोकाञ्जयति द्विजान् दानेन राघवः ।
गुरूञ्छुश्रूषया वीरो धनुषा युधि शात्रवान्॥ २९॥

‘वीर श्रीरामचन्द्र अपने सात्त्विक भाव से समस्त लोकों को, दानके द्वारा द्विजों को, सेवा से गुरुजनों को और धनुष-बाणद्वारा युद्ध स्थल में शत्रु-सैनिकों को जीतकर अपने अधीन कर लेते हैं॥ २९ ॥

सत्यं दानं तपस्त्यागो मित्रता शौचमार्जवम्।
विद्या च गुरुशुश्रूषा ध्रुवाण्येतानि राघवे॥३०॥

‘सत्य, दान, तप, त्याग, मित्रता, पवित्रता, सरलता, विद्या और गुरु-शुश्रूषा—ये सभी सद्गुण श्रीराम में स्थिररूप से रहते हैं॥ ३० ॥

तस्मिन्नार्जवसम्पन्ने देवि देवोपमे कथम्।
पापमाशंससे रामे महर्षिसमतेजसि॥३१॥

‘देवि! महर्षियों के समान तेजस्वी उन सीधे-सादे देवतुल्य श्रीराम का तू क्यों अनिष्ट करना चाहती है ? ॥

न स्मराम्यप्रियं वाक्यं लोकस्य प्रियवादिनः।
“स कथं त्वत्कृते रामं वक्ष्यामि प्रियमप्रियम्॥ ३२॥

‘श्रीराम सब लोगों से प्रिय बोलते हैं उन्होंने कभी किसी को अप्रिय वचन कहा हो, ऐसा मुझे याद नहीं पड़ता। ऐसे सर्वप्रिय राम से मैं तेरे लिये अप्रिय बात कैसे कहूँगा? ॥ ३२॥

क्षमा यस्मिंस्तपस्त्यागः सत्यं धर्मः कृतज्ञता।
अप्यहिंसा च भूतानां तमृते का गतिर्मम॥३३॥

‘जिनमें क्षमा, तप, त्याग, सत्य, धर्म, कृतज्ञता और समस्त जीवों के प्रति दया भरी हुई है, उन श्रीराम के बिना मेरी क्या गति होगी? ॥ ३३॥

मम वृद्धस्य कैकेयि गतान्तस्य तपस्विनः।
दीनं लालप्यमानस्य कारुण्यं कर्तुमर्हसि ॥३४॥

‘कैकेयि! मैं बूढ़ा हूँ। मौत के किनारे बैठा हूँ। मेरी अवस्था शोचनीय हो रही है और मैं दीनभाव से तेरे सामने गिड़गिड़ा रहा हूँ। तुझे मुझ पर दया करनी चाहिये॥

पृथिव्यां सागरान्तायां यत् किंचिदधिगम्यते।
तत् सर्वं तव दास्यामि मा च त्वं मन्युमाविश॥ ३५॥

‘समुद्रपर्यन्त पृथ्वी पर जो कुछ मिल सकता है, वह सब मैं तुझे दे दूंगा, परंतु तू ऐसे दुराग्रह में न पड़, जो मुझे मौत के मुँह में ढकेलने वाला हो॥ ३५ ॥

अञ्जलिं कुर्मि कैकेयि पादौ चापि स्पृशामि ते।
शरणं भव रामस्य माधर्मो मामिह स्पृशेत्॥३६॥

‘केकयनन्दिनि! मैं हाथ जोड़ता हूँ और तेरे पैरों पड़ता हूँ। तू श्रीराम को शरण दे, जिससे यहाँ मुझे पाप न लगे’ ॥ ३६॥

इति दुःखाभिसंतप्तं विलपन्तमचेतनम्।
घूर्णमानं महाराजं शोकेन समभिप्लुतम्॥३७॥
पारं शोकार्णवस्याशु प्रार्थयन्तं पुनः पुनः।
प्रत्युवाचाथ कैकेयी रौद्रा रौद्रतरं वचः॥ ३८॥

महाराज दशरथ इस प्रकार दुःख से संतप्त होकर विलाप कर रहे थे। उनकी चेतना बार-बार लुप्त हो जाती थी। उनके मस्तिष्क में चक्कर आ रहा था और वे शोकमग्न हो उस शोक सागर से शीघ्र पार होने के लिये बारंबार अनुनय-विनय कर रहे थे, तो भी कैकेयी का हृदय नहीं पिघला। वह और भी भीषण रूप धारण करके अत्यन्त कठोर वाणी में उन्हें इस प्रकार उत्तर देने लगी- ॥ ३७-३८॥

यदि दत्त्वा वरौ राजन् पुनः प्रत्यनुतप्यसे।
धार्मिकत्वं कथं वीर पृथिव्यां कथयिष्यसि॥ ३९॥

‘राजन्! यदि दो वरदान देकर आप फिर उनके लिये पश्चात्ताप करते हैं तो वीर नरेश्वर! इस भूमण्डल में आप अपनी धार्मिकता का ढिंढोरा कैसे पीट सकेंगे?॥

यदा समेता बहवस्त्वया राजर्षयः सह।
कथयिष्यन्ति धर्मज्ञ तत्र किं प्रतिवक्ष्यसि ॥४०॥

‘धर्मके ज्ञाता महाराज! जब बहुत-से राजर्षि एकत्र होकर आपके साथ मुझे दिये हुए वरदान के विषय में बातचीत करेंगे, उस समय वहाँ आप उन्हें क्या उत्तर देंगे?॥ ४०॥

यस्याः प्रसादे जीवामि या च मामभ्यपालयत्।
तस्याः कृता मया मिथ्या कैकेय्या इति वक्ष्यसि॥ ४१॥

‘यही कहेंगे न, कि जिसके प्रसाद से मैं जीवित हूँ, । जिसने (बहुत बड़े संकट से) मेरी रक्षा की, उसी कैकेयी को वर देने के लिये की हुई प्रतिज्ञा मैंने झूठी कर दी॥ ४१॥

किल्बिषं त्वं नरेन्द्राणां करिष्यसि नराधिप।
यो दत्त्वा वरमद्यैव पुनरन्यानि भाषसे॥४२॥

‘महाराज! आज ही वरदान देकर यदि आप फिर उससे विपरीत बात कहेंगे तो अपने कुल के राजाओं के माथे कलंक का टीका लगायेंगे॥ ४२ ॥

शैब्यः श्येनकपोतीये स्वमांसं पक्षिणे ददौ।
अलर्कश्चक्षुषी दत्त्वा जगाम गतिमुत्तमाम्॥ ४३॥

‘राजा शैब्य ने बाज और कबूतर के झगड़े में (कबूतर के प्राण बचाने की प्रतिज्ञा को पूर्ण करने के लिये) बाज नामक पक्षी को अपने शरीर का मांस काटकर दे दिया था। इसी तरह राजा अलर्क ने (एक अंधे ब्राह्मण को) अपने दोनों नेत्रों का दान करके परम उत्तम गति प्राप्त की थी॥४३॥

सागरः समयं कृत्वा न वेलामतिवर्तते।
समयं मानृतं कार्षीः पूर्ववृत्तमनुस्मरन्॥४४॥

‘समुद्रने (देवताओंके समक्ष) अपनी नियत सीमा को न लाँघने की प्रतिज्ञा की थी, सो अब तक वह उसका उल्लङ्घन नहीं करता है। आप भी पूर्ववर्ती महापुरुषों के बर्ताव को सदा ध्यान में रखकर अपनी प्रतिज्ञा झूठी न करें। ४४॥

स त्वं धर्मं परित्यज्य रामं राज्येऽभिषिच्य च।
सह कौसल्यया नित्यं रन्तुमिच्छसि दर्मते॥४५॥

(परंतु आप मेरी बात क्यों सुनेंगे?) दुर्बुद्धि नरेश! आप तो धर्मको तिलाञ्जलि देकर श्रीराम को राज्यपर अभिषिक्त करके रानी कौसल्या के साथ सदा मौज उड़ाना चाहते हैं॥ ४५ ॥

भवत्वधर्मो धर्मो वा सत्यं वा यदि वानृतम्।
यत्त्वया संश्रुतं मह्यं तस्य नास्ति व्यतिक्रमः॥ ४६॥

‘अब धर्म हो या अधर्म, झूठ हो या सच, जिस बात के लिये आपने मुझसे प्रतिज्ञा कर ली है, उसमें कोई परिवर्तन नहीं हो सकता॥ ४६॥

अहं हि विषमद्यैव पीत्वा बहु तवाग्रतः।
पश्यतस्ते मरिष्यामि रामो यद्यभिषिच्यते॥४७॥

‘यदि श्रीराम का राज्याभिषेक होगा तो मैं आपके सामने आपके देखते-देखते आज ही बहुत-सा विष पीकर मर जाऊँगी॥४७॥

एकाहमपि पश्येयं यद्यहं राममातरम्।
“अञ्जलिं प्रतिगृह्णन्तीं श्रेयो ननु मृतिर्मम॥४८॥

‘यदि मैं एक दिन भी राम माता कौसल्या को राजमाता होने के नाते दूसरे लोगों से अपने को हाथ जोड़वाती देख लूँगी तो उस समय मैं अपने लिये मर जाना ही अच्छा समझूगी॥ ४८॥

भरतेनात्मना चाहं शपे ते मनुजाधिप।
यथा नान्येन तुष्येयमृते रामविवासनात्॥४९॥

‘नरेश्वर! मैं आपके सामने अपनी और भरत की शपथ खाकर कहती हूँ कि श्रीराम को इस देश से निकाल देने के सिवा दूसरे किसी वर से मुझे संतोष नहीं होगा’॥

एतावदुक्त्वा वचनं कैकेयी विरराम ह।
विलपन्तं च राजानं न प्रतिव्याजहार सा॥५०॥

इतना कहकर कैकेयी चुप हो गयी। राजा बहुत रोये-गिड़गिड़ाये; किंतु उसने उनकी किसी बातका जवाब नहीं दिया॥५०॥

श्रुत्वा तु राजा कैकेय्या वाक्यं परमशोभनम्।
रामस्य च वने वासमैश्वर्यं भरतस्य च॥५१॥
नाभ्यभाषत कैकेयीं मुहूर्तं व्याकुलेन्द्रियः।
प्रेक्षतानिमिषो देवीं प्रियामप्रियवादिनीम्॥५२॥

‘श्रीराम का वनवास हो और भरत का राज्याभिषेक’ कैकेयी के मुख से यह परम अमङ्गलकारी वचन सुनकर राजा की सारी इन्द्रियाँ व्याकुल हो उठीं। वे एक मुहूर्त तक कैकेयी से कुछ न बोले। उस अप्रिय वचन बोलने वाली प्यारी रानी की ओर केवल एकटक दृष्टि से देखते रहे।

तां हि वज्रसमां वाचमाकर्ण्य हृदयाप्रियाम्।
दुःखशोकमयीं श्रुत्वा राजा न सुखितोऽभवत्॥

मन को अप्रिय लगने वाली कैकेयी की वह वज्र के समान कठोर तथा दुःख-शोकमयी वाणी सुनकर राजा को बड़ा दुःख हुआ उनकी सुख-शान्ति छिन गयी॥

स देव्या व्यवसायं च घोरं च शपथं कृतम्।
ध्यात्वा रामेति निःश्वस्य च्छिन्नस्तरुरिवापतत्॥ ५४॥

देवी कैकेयी के उस घोर निश्चय और किये हुए शपथ की ओर ध्यान जाते ही वे ‘हा राम!’ कहकर लंबी साँस खींचते हुए कटे वृक्षकी भाँति गिर पड़े। ५४॥

नष्टचित्तो यथोन्मत्तो विपरीतो यथातुरः।
हृततेजा यथा सर्पो बभूव जगतीपतिः॥५५॥

उनकी चेतना लुप्त-सी हो गयी। वे उन्मादग्रस्त-से प्रतीत होने लगे। उनकी प्रकृति विपरीत-सी हो गयी। वे रोगी-से जान पड़ते थे। इस प्रकार भूपाल दशरथ मन्त्रसे जिसका तेज हर लिया गया हो उस सर्प के समान निश्चेष्ट हो गये॥ ५५॥

दीनयाऽऽतुरया वाचा इति होवाच कैकयीम्।
अनर्थमिममर्थाभं केन त्वम्पदेशिता॥५६॥

तदनन्तर उन्होंने दीन और आतुर वाणी में कैकेयी से इस प्रकार कहा—’अरी! तुझे अनर्थ ही अर्थ-सा प्रतीत हो रहा है, किसने तुझे इसका उपदेश दिया है? ॥ ५६॥

भूतोपहतचित्तेव ब्रुवन्ती मां न लज्जसे।
शीलव्यसनमेतत् ते नाभिजानाम्यहं पुरा॥५७॥

‘जान पड़ता है, तेरा चित्त किसी भूत के आवेशसेदूषित हो गया है। पिशाचग्रस्त नारी की भाँति मेरे सामने ऐसी बातें कहती हुई तू लज्जित क्यों नहीं होती? मुझे पहले इस बात का पता नहीं था कि तेरा यह कुलाङ्गनोचित शील इस तरह नष्ट हो गया है। ५७॥

बालायास्तत् त्विदानीं ते लक्षये विपरीतवत्।
कुतो वा ते भयं जातं या त्वमेवंविधं वरम्॥ ५८॥
राष्ट्र भरतमासीनं वृणीषे राघवं वने।
विरमैतेन भावेन त्वमेतेनानृतेन च॥५९॥

‘बालावस्था में जो तेरा शील था, उसे इस समय मैं विपरीत-सा देख रहा हूँ। तुझे किस बात का भय हो गया है जो इस तरह का वर माँगती है ? भरत राज्य सिंहासन पर बैठें और श्रीराम वन में रहें—यही तू माँग रही है। यह बड़ा असत्य तथा ओछा विचार है। तू अब भी इससे विरत हो जा॥ ५८-५९ ॥

यदि भर्तुः प्रियं कार्यं लोकस्य भरतस्य च।
नृशंसे पापसंकल्पे क्षुद्रे दुष्कृतकारिणि॥६०॥

‘क्रूर स्वभाव और पापपूर्ण विचार वाली नीच दुराचारिणि! यदि अपने पति का, सारे जगत् का और भरत का भी प्रिय करना चाहती है तो इस दूषित संकल्प को त्याग दे॥६०॥

किं नु दुःखमलीकं वा मयि रामे च पश्यसि।
“न कथंचिदृते रामाद् भरतो राज्यमावसेत्॥६१॥

‘तू मुझमें या श्रीराम में कौन-सा दुःखदायक या अप्रिय बर्ताव देख रही है (कि ऐसा नीच कर्म करने पर उतारू हो गयी है); श्रीराम के बिना भरत किसी तरह राज्य लेना स्वीकार नहीं करेंगे॥ ६१॥

रामादपि हि तं मन्ये धर्मतो बलवत्तरम्।
कथं द्रक्ष्यामि रामस्य वनं गच्छेति भाषिते॥ ६२॥
मुखवर्णं विवर्णं तु यथैवेन्दम्पप्लुतम्।

‘क्योंकि मेरी समझ में धर्मपालन की दृष्टि से भरत श्रीराम से भी बढ़े-चढ़े हैं। श्रीराम से यह कह देने पर कि तुम वन को जाओ; जब उनके मुख की कान्ति राहुग्रस्त चन्द्रमा की भाँति फीकी पड़ जायगी, उस समय मैं कैसे उनके उस उदास मुख की ओर देख सकूँगा? ॥ ६२ १/२॥

तां तु मे सुकृतां बुद्धिं सुहृद्भिः सह निश्चिताम्॥ ६३॥
कथं द्रक्ष्याम्यपावृत्तां परैरिव हतां चमूम्।

‘मैंने श्रीराम के अभिषेक का निश्चय सुहृदों के साथ विचार करके किया है, मेरी यह बुद्धि शुभ कर्म में प्रवृत्त हुई है; अब मैं इसे शत्रुओं द्वारा पराजित हुई सेना की भाँति पलटी हुई कैसे देखुंगा? ॥ ६३ १/२॥

किं मां वक्ष्यन्ति राजानो नानादिग्भ्यः समागताः॥६४॥
बालो बतायमैक्ष्वाकश्चिरं राज्यमकारयत्।

‘नाना दिशाओं से आये हुए राजालोग मुझे लक्ष्य करके खेदपूर्वक कहेंगे कि इस मूढ इक्ष्वाकुवंशी राजा ने कैसे दीर्घकाल तक इस राज्य का पालन किया है? ॥ ६४ १/२॥

यदा हि बहवो वृद्धा गुणवन्तो बहुश्रुताः॥६५॥
परिप्रक्ष्यन्ति काकुत्स्थं वक्ष्यामीह कथं तदा।
कैकेय्या क्लिश्यमानेन पुत्रः प्रव्राजितो मया॥ ६६॥

‘जब बहुत-से बहुश्रुत गुणवान् एवं वृद्ध पुरुष आकर मुझसे पूछेगे कि श्रीराम कहाँ हैं? तब मैं उनसे कैसे यह कहूँगा कि कैकेयी के दबाव देने पर मैंने अपने बेटे को घर से निकाल दिया॥ ६५-६६॥

यदि सत्यं ब्रवीम्येतत् तदसत्यं भविष्यति।
किं मां वक्ष्यति कौसल्या राघवे वनमास्थिते॥ ६७॥
“किं चैनां प्रतिवक्ष्यामि कृत्वा विप्रियमीदृशम्

‘यदि कहूँ कि श्रीराम को वनवास देकर मैंने सत्य का पालन किया है तो इसके पहले जो उन्हें राज्य देने की बात कह चुका हूँ, वह असत्य हो जायगी। यदि राम वन को चले गये तो कौसल्या मुझे क्या कहेगी? उसका ऐसा महान् अपकार करके मैं उसे क्या उत्तर दूंगा॥ ६७ १/२ ॥

यदा यदा च कौसल्या दासीव च सखीव च॥ ६८॥
भार्यावद् भगिनीवच्च मातृवच्चोपतिष्ठति।
सततं प्रियकामा मे प्रियपुत्रा प्रियंवदा॥६९॥
न मया सत्कृता देवी सत्कारार्हा कृते तव।

‘हाय! जिसका पुत्र मुझे सबसे अधिक प्रिय है, वह प्रिय वचन बोलने वाली कौसल्या जब-जब दासी, सखी, पत्नी, बहिन और माता की भाँति मेरा प्रिय करने की इच्छा से मेरी सेवा में उपस्थित होती थी, तब तब उस सत्कार पाने योग्य देवी का भी मैंने तेरे ही कारण कभी सत्कार नहीं किया॥ ६८-६९ १/२ ।।

इदानीं तत्तपति मां यन्मया सुकृतं त्वयि॥७०॥
अपथ्यव्यञ्जनोपेतं भुक्तमन्नमिवातुरम्

‘तेरे साथ जो मैंने इतना अच्छा बर्ताव किया, वह याद आकर इस समय मुझे उसी प्रकार संताप दे रहा है, जैसे अपथ्य (हानिकारक) व्यञ्जनों से युक्त खाया हुआ अन्न किसी रोगी को कष्ट देता है॥ ७० १/२॥

विप्रकारं च रामस्य सम्प्रयाणं वनस्य च॥७१॥
सुमित्रा प्रेक्ष्य वै भीता कथं मे विश्वसिष्यति।

‘श्रीराम के अभिषेक का निवारण और उनका वन की ओर प्रस्थान देखकर निश्चय ही सुमित्रा भयभीत हो जायगी, फिर वह कैसे मेरा विश्वास करेगी? ॥ ७१ १/२॥

कृपणं बत वैदेही श्रोष्यति द्वयमप्रियम्॥७२॥
मां च पञ्चत्वमापन्नं रामं च वनमाश्रितम्।

‘हाय! बेचारी सीता को एक ही साथ दो दुःखद एवं अप्रिय समाचार सुनने पड़ेंगे-श्रीराम का वनवास और मेरी मृत्यु॥ ७२ १/२॥

वैदेही बत मे प्राणान् शोचन्ती क्षपयिष्यति॥ ७३॥
हीना हिमवतः पार्वे किंनरेणेव किंनरी।

‘जब वह श्रीराम के लिये शोक करने लगेगी, उस समय मेरे प्राणों का नाश कर डालेगी उसका शोक देखकर मेरे प्राण इस शरीर में नहीं रह सकेंगे। उसकी दशा हिमालय के पार्श्व भाग में अपने स्वामी किन्नर से बिछुड़ी हुई किन्नरी के समान हो जायगी॥ ७३ १/२॥

नहि राममहं दृष्ट्वा प्रवसन्तं महावने॥७४॥
चिरं जीवितुमाशंसे रुदन्तीं चापि मैथिलीम्।
सा नूनं विधवा राज्यं सपुत्रा कारयिष्यसि॥ ७५॥

‘मैं श्रीराम को विशाल वन में निवास करते और मिथिलेशकुमारी सीता को रोती देख अधिक काल तक जीवित रहना नहीं चाहता। ऐसी दशा में तू निश्चय ही विधवा होकर बेटे के साथ अयोध्या का राज्य करना।

सतीं त्वामहमत्यन्तं व्यवस्याम्यसतीं सतीम्।
रूपिणीं विषसंयुक्तां पीत्वेव मदिरां नरः॥७६॥

‘ओह ! मैं तुझे अत्यन्त सती-साध्वी समझता था, परंतु तू बड़ी दुष्टा निकली; ठीक उसी तरह जैसे कोई मनुष्य देखने में सुन्दर मदिरा को पीकर पीछे उसके द्वारा किये गये विकार से यह समझ पाता है कि इसमें विष मिला हुआ था। ७६ ॥

अनृतैर्बत मां सान्त्वैः सान्त्वयन्ती स्म भाषसे।
गीतशब्देन संरुध्य लुब्धो मृगमिवावधीः॥७७॥

‘अबतक जो तू सान्त्वनापूर्ण मीठे वचन बोलकर मुझे आश्वासन देती हुई बातें किया करती थी, वे तेरी कही हुई सारी बातें झूठी थीं। जैसे व्याध हरिण को मधुर संगीत से आकृष्ट करके उसे मार डालता है,
उसी प्रकार तू भी पहले मुझे लुभाकर अब मेरे प्राण ले रही है।

अनार्य इति मामार्याः पुत्रविक्रायकं ध्रुवम्।
विकरिष्यन्ति रथ्यासु सुरापं ब्राह्मणं यथा॥७८॥

‘श्रेष्ठ पुरुष निश्चय ही मुझे नीच और एक नारी के मोह में पड़कर बेटे को बेच देने वाला कहकर शराबी ब्राह्मण की भाँति मेरी राह-बाट और गली-कूचों में निन्दा करेंगे॥ ७८॥

अहो दुःखमहो कृच्छ्रे यत्र वाचः क्षमे तव।
दुःखमेवंविधं प्राप्तं पुरा कृतमिवाशुभम्॥७९॥

‘अहो! कितना दुःख है! कितना कष्ट है!! जहाँ मझे तेरी ये बातें सहन करनी पड़ती हैं। मानो यह मेरे पूर्वजन्म के किये हुए पाप का ही अशुभ फल है, जो मुझपर ऐसा महान् दुःख आ पड़ा॥ ७९ ॥

चिरं खलु मया पापे त्वं पापेनाभिरक्षिता।
अज्ञानादुपसम्पन्ना रज्जुरुबन्धनी यथा॥८०॥

‘पापिनि! मुझ पापी ने बहुत दिनों से तेरी रक्षा की और अज्ञानवश तुझे गले लगाया; किंतु तू आज मेरे गले में पड़ी हुई फाँसी की रस्सी बन गयी। ८० ॥

रममाणस्त्वया सार्धं मृत्युं त्वां नाभिलक्षये।
बालो रहसि हस्तेन कृष्णसर्पमिवास्पृशम्॥८१॥

‘जैसे बालक एकान्त में खेलता-खेलता काले नाग को हाथ में पकड़ ले, उसी प्रकार मैंने एकान्त में तेरे साथ क्रीडा करते हए तेरा आलिङ्गन किया है,परंतु उस समय मुझे यह न सूझा कि तू ही एक दिन मेरी मृत्यु का कारण बनेगी॥ ८१॥

तं तु मां जीवलोकोऽयं नूनमाक्रोष्टमर्हति।
मया ह्यपितृकः पुत्रः स महात्मा दुरात्मना ॥ ८२॥

‘हाय! मुझ दुरात्माने जीते-जी ही अपने महात्मा पुत्र को पितृहीन बना दिया। मुझे यह सारा संसार निश्चय ही धिक्कारेगा—गालियाँ देगा, जो उचित ही होगा॥ ८२॥

बालिशो बत कामात्मा राजा दशरथो भृशम्।
स्त्रीकृते यः प्रियं पुत्रं वनं प्रस्थापयिष्यति॥८३॥

‘लोग मेरी निन्दा करते हुए कहेंगे कि राजा दशरथ बड़ा ही मूर्ख और कामी है, जो एक स्त्री को संतुष्ट करने के लिये अपने प्यारे पुत्र को वन में भेज रहा है। ८३॥

वेदैश्च ब्रह्मचर्यैश्च गुरुभिश्चोपकर्शितः।
भोगकाले महत्कृच्छं पुनरेव प्रपत्स्यते॥८४॥

‘हाय! अब तक तो श्रीराम वेदों का अध्ययन करने, ब्रह्मचर्यव्रत का पालन करने तथा अनेकानेक गुरुजनों की सेवा में संलग्न रहने के कारण दुबले होते चले आये हैं। अब जब इनके लिये सुख भोग का समय आया है, तब ये वन में जाकर महान् कष्ट में पड़ेंगे॥ ८४॥

नालं द्वितीयं वचनं पुत्रो मां प्रतिभाषितुम्।
स वनं प्रव्रजेत्युक्तो बाढमित्येव वक्ष्यति॥८५॥

‘अपने पुत्र श्रीराम से यदि मैं कह दूँ कि तुम वन को चले जाओ तो वे तुरंत ‘बहुत अच्छा’ कहकर मेरी आज्ञा को स्वीकार कर लेंगे। मेरे पुत्र राम दूसरी कोई बात कहकर मुझे प्रतिकूल उत्तर नहीं दे सकते॥

यदि मे राघवः कुर्याद् वनं गच्छेति चोदितः।
प्रतिकूलं प्रियं मे स्यान्न तु वत्सः करिष्यति॥ ८६॥

‘यदि मेरे वन जाने की आज्ञा दे देने पर भी श्रीरामचन्द्र उसके विपरीत करते—वन में नहीं जाते तो वही मेरे लिये प्रिय कार्य होगा; किंतु मेरा बेटा ऐसा नहीं कर सकता।। ८६॥

राघवे हि वनं प्राप्ते सर्वलोकस्य धिक्कृतम्।
मृत्युरक्षमणीयं मां नयिष्यति यमक्षयम्॥८७॥

‘यदि रघुनन्दन राम वन को चले गये तो सब लोगों के धिक्कारपात्र बने हुए मुझ अक्षम्य अपराधी को मृत्यु अवश्य यमलोक में पहुँचा देगी॥ ८७ ॥

मृते मयि गते रामे वनं मनुजपुङ्गवे।
इष्टे मम जने शेषे किं पापं प्रतिपत्स्यसे॥८८॥

‘यदि नरश्रेष्ठ श्रीराम के वन में चले जाने पर मेरी मृत्यु हो गयी तो शेष जो मेरे प्रियजन (कौसल्या आदि) यहाँ रहेंगे, उनपर तू कौन-सा अत्याचार करेगी? ॥८८॥

कौसल्या मां च रामं च पुत्रौ च यदि हास्यति।
दुःखान्यसहती देवी मामेवानुगमिष्यति॥८९॥

‘देवी कौसल्या को यदि मुझसे, श्रीराम से तथा शेष दोनों पुत्र लक्ष्मण और शत्रुघ्न से विछोह हो जायगा तो वह इतने बड़े दुःख को सहन नहीं कर सकेगी; अतः मेरे ही पीछे वह भी परलोक सिधार जायगी। (सुमित्रा का भी यही हाल होगा) ॥ ८९॥

कौसल्यां च सुमित्रां च मां च पुत्रैस्त्रिभिः सह।
प्रक्षिप्य नरके सा त्वं कैकेयि सुखिता भव॥ ९०॥

‘कैकेयि! इस प्रकार कौसल्या को, सुमित्रा को और तीनों पुत्रों के साथ मुझे भी नरक-तुल्य महान् शोक में डालकर तू स्वयं सुखी होना॥९०॥

मया रामेण च त्यक्तं शाश्वतं सत्कृतं गुणैः।
इक्ष्वाकुकुलमक्षोभ्यमाकुलं पालयिष्यसि ॥९१॥

‘अनेकानेक गुणों से सत्कृत, शाश्वत तथा क्षोभरहित यह इक्ष्वाकुकुल जब मुझसे और श्रीराम से परित्यक्त होकर शोक से व्याकुल हो जायगा, तब उस अवस्था में तू इसका पालन करेगी। ९१॥

प्रियं चेद् भरतस्यैतद् रामप्रव्राजनं भवेत्।
मा स्म मे भरतः कार्षीत् प्रेतकृत्यं गतायुषः॥ ९२॥

‘यदि भरत को भी श्रीरामका यह वनमें  भेजा जाना प्रिय लगता हो तो मेरी मृत्यु के बाद वे मेरे शरीर का दाहसंस्कार न करें॥९२॥

मृते मयि गते रामे वनं पुरुषपुङ्गवे।
सेदानीं विधवा राज्यं सपुत्रा कारयिष्यसि॥९३॥

‘पुरुषशिरोमणि श्रीराम के वन-गमन के पश्चात् मेरी मृत्यु हो जाने पर अब विधवा होकर तू बेटे के साथ अयोध्या का राज्य करेगी॥ ९३॥

त्वं राजपत्रि दैवेन न्यवसो मम वेश्मनि।
अकीर्तिश्चातुला लोके ध्रुवः परिभवश्च मे।
सर्वभूतेषु चावज्ञा यथा पापकृतस्तथा॥९४॥

‘राजकुमारी! तू मेरे दुर्भाग्य से मेरे घर में आकर बस गयी। तेरे कारण संसार में पापाचारी की भाँति मुझे निश्चय ही अनुपम अपयश, तिरस्कार और समस्त प्राणियों से अवहेलना प्राप्त होगी॥९४॥

कथं रथैर्विभुर्यात्वा गजाश्वैश्च मुहुर्मुहुः।
पद्भ्यां रामो महारण्ये वत्सो मे विचरिष्यति॥ ९५॥

‘मेरे पुत्र सामर्थ्यशाली राम बारंबार रथों, हाथियों और घोड़ोंसे यात्रा किया करते थे। वे ही अब उसविशाल वन में पैदल कैसे चलेंगे? ॥ ९५ ॥

यस्य चाहारसमये सूदाः कुण्डलधारिणः।
अहंपूर्वाः पचन्ति स्म प्रसन्नाः पानभोजनम्॥
स कथं नु कषायाणि तिक्तानि कटुकानि च।
भक्षयन् वन्यमाहारं सुतो मे वर्तयिष्यति॥ ९७॥

‘भोजनके समय जिनके लिये कुण्डलधारी रसोइये प्रसन्न होकर ‘पहले मैं बनाऊँगा’ ऐसा कहते हुए खाने-पीने की वस्तुएँ तैयार करते थे, वे ही मेरे पुत्र रामचन्द्र वन में कसैले, तिक्त और कड़वे फलों का आहार करते हुए किस तरह निर्वाह करेंगे॥९६-९७॥

महार्हवस्त्रसम्बद्धो भूत्वा चिरसुखोचितः।
काषायपरिधानस्तु कथं रामो भविष्यति॥९८॥

‘जो सदा बहुमूल्य वस्त्र पहना करते थे और जिनका चिरकाल से सुख में ही समय बीता है, वे ही श्रीराम वन में गेरुए वस्त्र पहनकर कैसे रह सकेंगे? ॥ ९८॥

कस्येदं दारुणं वाक्यमेवंविधमपीरितम्।
रामस्यारण्यगमनं भरतस्याभिषेचनम्॥ ९९॥

‘श्रीराम का वनगमन और भरत का अभिषेक-ऐसा कठोर वाक्य तुने किसकी प्रेरणा से अपने मुंह से निकाला है॥ ९९॥

धिगस्तु योषितो नाम शठाः स्वार्थपरायणाः।
न ब्रवीमि स्त्रियः सर्वा भरतस्यैव मातरम्॥ १००॥

‘स्त्रियों को धिक्कार है; क्योंकि वे शठ और स्वार्थपरायण होती हैं; परंतु मैं सारी स्त्रियों के लिये ऐसा नहीं कह सकता, केवल भरत की माता की ही निन्दा करता हूँ॥१०० ॥

अनर्थभावेऽर्थपरे नृशंसे ममानुतापाय निवेशितासि।
किमप्रियं पश्यसि मन्निमित्तं हितानुकारिण्यथवापि रामे॥१०१॥

‘अनर्थ में ही अर्थबुद्धि रखनेवाली क्रूर कैकेयि! तू मुझे संताप देने के लिये ही इस घर में बसायी गयी है। अरी! मेरे कारण तू अपना कौन-सा अप्रिय होता देख रही है? अथवा सबका निरन्तर हित करने वाले श्रीराम में ही तुझे कौन-सी बुराई दिखायी देती है। १०१॥

“परित्यजेयुः पितरोऽपि पुत्रान् भार्याः पतींश्चापि कृतानुरागाः।
कृत्स्नं हि सर्वं कुपितं जगत् स्याद् दृष्ट्वैव रामं व्यसने निमग्नम्॥१०२॥

‘श्रीराम को संकट के समुद्र में डूबा हुआ देखकर तो पिता अपने पुत्रों को त्याग देंगे। अनुरागिणी स्त्रियाँ भी अपने पतियों को त्याग देंगी। इस प्रकार यह सारा जगत् ही कुपित–विपरीत व्यवहार करनेवाला हो जायगा॥ १०२॥

अहं पुनर्देवकुमाररूपमलंकृतं तं सुतमाव्रजन्तम्।
नन्दामि पश्यन्निव दर्शनेन भवामि दृष्ट्वैव पुनर्युवेव॥१०३॥

‘देवकुमार के समान कमनीय रूपवाले अपने पुत्र श्रीराम को जब वस्त्र और आभूषणों से विभूषित होकर सामने आते देखता हूँ तो नेत्रों से उनकी शोभा निहारकर निहाल हो जाता हूँ। उन्हें देखकर ऐसा जान पड़ता है मानो मैं फिर जवान हो गया॥ १०३॥

विना हि सूर्येण भवेत् प्रवृत्तिरवर्षता वज्रधरेण वापि।
रामं तु गच्छन्तमितः समीक्ष्य जीवेन्न कश्चित्त्विति चेतना मे॥१०४॥

‘कदाचित् सूर्य के बिना भी संसारका काम चल जाय, वज्रधारी इन्द्र के वर्षा न करने पर भी प्राणियों का जीवन सुरक्षित रह जाय, परंतु राम को यहाँ से वन की ओर जाते देखकर कोई भी जीवित नहीं रह सकता –मेरी ऐसी धारणा है॥ १०४॥

विनाशकामामहिताममित्रामावासयं मृत्युमिवात्मनस्त्वाम्।
चिरं बताङ्केन धृतासि सी महाविषा तेन हतोऽस्मि मोहात्॥ १०५॥

‘अरी! तू मेरा विनाश चाहने वाली, अहित करनेवाली और शत्रुरूप है। जैसे कोई अपनी ही मृत्यु को घर में स्थान दे दे, उसी प्रकार मैंने तुझे घर में बसा लिया है। खेदकी बात है कि मैंने मोहवश तुझ महाविषैली नागिन को चिरकाल से अपने अङ्क में धारण कर रखा है इसीलिये आज मैं मारा गया। १०५॥

मया च रामेण सलक्ष्मणेन प्रशास्तु हीनो भरतस्त्वया सह।
पुरं च राष्ट्रं च निहत्य बान्धवान् ममाहितानां च भवाभिहर्षिणी॥१०६॥

‘मुझसे, श्रीराम और लक्ष्मण से हीन होकर भरत समस्त बान्धवों का विनाश करके तेरे साथ इस नगर तथा राष्ट्र का शासन करें तथा तू मेरे शत्रुओं का हर्ष बढ़ानेवाली हो॥

नृशंसवृत्ते व्यसनप्रहारिणि प्रसह्य वाक्यं यदिहाद्य भाषसे।
न नाम ते तेन मुखात् पतन्त्यधो विशीर्यमाणा दशनाः सहस्रधा॥१०७॥

‘क्रूरतापूर्ण बर्ताव करने वाली कैकेयी! तू संकट में पड़े हुए पर प्रहार कर रही है। अरी! जब तू दुराग्रहपूर्वक आज ऐसी कठोर बातें मुँह से निकालती है, उस समय तेरे दाँतों के हजारों टुकड़े होकर मुँह से नीचे क्यों नहीं गिर जाते? ।। १०७॥

न किंचिदाहाहितमप्रियं वचो न वेत्ति रामः परुषाणि भाषितुम्।
कथं तु रामे ह्यभिरामवादिनि ब्रवीषि दोषान् गुणनित्यसम्मते॥१०८॥

‘श्रीराम कभी किसी से कोई अहितकारक या अप्रिय वचन नहीं कहते हैं। वे कटुवचन बोलना जानते ही नहीं हैं। उनका अपने गुणों के कारण सदासर्वदा सम्मान होता है। उन्हीं मनोहर वचन बोलने वाले श्रीराम में तू दोष कैसे बता रही है? क्योंकि वनवास उसी को दिया जाता है, जिसके बहुत-से दोष सिद्ध हो चुके हों ॥ १०८॥

प्रताम्य वा प्रज्वल वा प्रणश्य वा सहस्रशो वा स्फुटितां महीं व्रज।
न ते करिष्यामि वचः सुदारुणं ममाहितं केकयराजपांसने॥१०९॥

‘ओ केकयराज के कुलकी जीती-जागती कलङ्क ! तू चाहे ग्लानि में डूब जा अथवा आग में जलकर खाक हो जा या विष खाकर प्राण दे दे अथवा पृथ्वी में हजारों दरारें बनाकर उसी में समा जा; परंतु मेरा अहित करने वाली तेरी यह अत्यन्त कठोर बात मैं कदापि नहीं मानूँगा॥ १०९॥

क्षुरोपमां नित्यमसत्प्रियंवदां प्रदुष्टभावां स्वकुलोपघातिनीम्।
न जीवितुं त्वां विषहेऽमनोरमां दिधक्षमाणां हृदयं सबन्धनम्॥११०॥

‘तू छुरे के समान घात करनेवाली है। बातें तो मीठी-मीठी करती है, परंतु वे सदा झूठी औरसद्भावना से रहित होती हैं। तेरे हृदय का भाव अत्यन्त दूषित है तथा तू अपने कुल का भी नाश करनेवाली है। इतना ही नहीं, तू प्राणों सहित मेरे हृदय को भी जलाकर भस्म कर डालना चाहती है; इसीलिये मेरे मन को नहीं भाती है। तुझ पापिनी का जीवित रहना मैं नहीं सह सकता॥ ११० ॥

न जीवितं मेऽस्ति कुतः पुनः सुखं विनात्मजेनात्मवतां कुतो रतिः।
ममाहितं देवि न कर्तुमर्हसि स्पृशामि पादावपि ते प्रसीद मे॥१११॥

‘देवि! अपने बेटे श्रीराम के बिना मेरा जीवन नहीं रह सकता, फिर कहाँ से सुख हो सकता है? आत्मज्ञ पुरुषों को भी अपने पुत्र से बिछोह हो जाने पर कैसे चैन मिल सकता है ? अतः तू मेरा अहित न कर। मैं तेरे पैर छूता हूँ, तू मुझ पर प्रसन्न हो जा’ ॥ १११॥

स भूमिपालो विलपन्ननाथवत् स्त्रिया गृहीतो हृदयेऽतिमात्रया।
पपात देव्याश्चरणौ प्रसारितावुभावसम्प्राप्य यथाऽऽतुरस्तथा॥११२॥

इस प्रकार महाराज दशरथ मर्यादा का उल्लङ्घन करने वाली उस हठीली स्त्री के वश में पड़कर अनाथ की भाँति विलाप कर रहे थे। वे देवी कैकेयी के फैलाये हुए दोनों चरणों को छूना चाहते थे; परंतु उन्हें न पाकर बीच में ही मूर्च्छित होकर गिर पड़े। ठीक उसी तरह, जैसे कोई रोगी किसी वस्तु को छूना चाहता है; किंतु दुर्बलता के कारण वहाँ तक न पहँचकर बीच में ही अचेत होकर गिर जाता है।

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे द्वादशः सर्गः॥१२॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आपरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें बारहवाँ सर्ग पूरा हुआ।१२॥

अयोध्याकाण्डम्
त्रयोदशः सर्गः (सर्ग 13)

( राजा का विलाप और कैकेयी से अनुनय-विनय )

अतदर्ह महाराजं शयानमतथोचितम्।
ययातिमिव पुण्यान्ते देवलोकात् परिच्युतम्॥
अनर्थरूपासिद्धार्था ह्यभीता भयदर्शिनी।
पुनराकारयामास तमेव वरमङ्गना॥२॥

महाराज दशरथ उस अयोग्य और अनुचित अवस्था में पृथ्वी पर पड़े थे। उस समय वे पुण्य समाप्त होने पर देवलोक से भ्रष्ट हुए राजा ययाति के समान जान पड़ते थे। उनकी वैसी दशा देख अनर्थ की साक्षात् मूर्ति कैकेयी, जिसका प्रयोजन अभी तक सिद्ध नहीं हुआ था, जो लोकापवाद का भय छोड़ चुकी थी और श्रीराम से भरत के लिये भय देखती थी, पुनः उसी वर के लिये राजा को सम्बोधित करके कहने लगी- ॥ १-२॥

त्वं कत्थसे महाराज सत्यवादी दृढव्रतः।
मम चेदं वरं कस्माद् विधारयितुमिच्छसि॥३॥

‘महाराज! आप तो डींग मारा करते थे कि मैं बड़ा सत्यवादी और दृढ़प्रतिज्ञ हूँ, फिर आप मेरे इस वरदान को क्यों हजम कर जाना चाहते हैं ?’ ॥३॥

एवमुक्तस्तु कैकेय्या राजा दशरथस्तदा।
प्रत्युवाच ततः क्रुद्धो मुहूर्तं विह्वलन्निव॥४॥

कैकेयी के ऐसा कहने पर राजा दशरथ दो घड़ी तक व्याकुलकी-सी अवस्था में रहे। तत्पश्चात् कुपित होकर उसे इस प्रकार उत्तर देने लगे— ॥४॥

मृते मयि गते रामे वनं मनुजपुङ्गवे।
हन्तानार्ये ममामित्रे सकामा सुखिनी भव॥५॥

‘ओ नीच! तू मेरी शत्रु है। नरश्रेष्ठ श्रीराम के वन में चले जाने पर जब मेरी मृत्यु हो जायगी, उस समय तू सफल मनोरथ होकर सुख से रहना॥ ५॥

स्वर्गेऽपि खलु रामस्य कुशलं दैवतैरहम्।
प्रत्यादेशादभिहितं धारयिष्ये कथं बत॥६॥

‘हाय! स्वर्ग में भी जब देवता मुझसे श्रीराम का कुशल समाचार पूछेगे, उस समय मैं उन्हें क्या उत्तर दूंगा? यदि कहूँ, उन्हें वन में भेज दिया तो उसके बाद वे लोग जो मेरे प्रति धिक्कारपूर्ण बात कहेंगे, उसे कैसे सह सकूँगा? इसके लिये मुझे बड़ा खेद है॥

कैकेय्याः प्रियकामेन रामः प्रव्राजितो वनम्।
यदि सत्यं ब्रवीम्येतत् तदसत्यं भविष्यति॥७॥

‘कैकेयी का प्रिय करने की इच्छा से उसके माँगे हुए वरदान के अनुसार मैंने श्रीराम को वन में भेज दिया, यदि ऐसा कहूँ और इसे सत्य बताऊँ तो मेरी वह पहली बात असत्य हो जायगी, जिसके द्वारा मैंने राम को राज्य देने का आश्वासन दिया है।॥ ७॥

अपुत्रेण मया पुत्रः श्रमेण महता महान्।
रामो लब्धो महातेजाः स कथं त्यज्यते मया॥ ८॥

‘मैं पहले पुत्रहीन था, फिर महान् परिश्रम करके मैंने जिन महातेजस्वी महापुरुष श्रीराम को पुत्र रूप में प्राप्त किया है, उनका मेरे द्वारा त्याग कैसे किया जा सकता है ? ॥ ८॥

शूरश्च कृतविद्यश्च जितक्रोधः क्षमापरः।
कथं कमलपत्राक्षो मया रामो विवास्यते॥९॥

‘जो शूरवीर, विद्वान्, क्रोधको जीतने वाले और क्षमापरायण हैं, उन कमलनयन श्रीराम को मैं देश निकाला कैसे दे सकता हूँ? ॥९॥

कथमिन्दीवरश्यामं दीर्घबाहुं महाबलम्।
अभिराममहं रामं स्थापयिष्यामि दण्डकान्॥ १०॥

‘जिनकी अङ्गकान्ति नीलकमल के समान श्याम है, भुजाएँ विशाल और बल महान् हैं, उन नयनाभिराम श्रीराम को मैं दण्डक वन में कैसे भेज सकूँगा?॥ १० ॥

सुखानामुचितस्यैव दुःखैरनुचितस्य च।
दुःखं नामानुपश्येयं कथं रामस्य धीमतः॥११॥

‘जो सदा सुख भोगने के ही योग्य हैं, कदापि दुःख भोगने के योग्य नहीं हैं, उन बुद्धिमान् श्रीराम को दुःख उठाते मैं कैसे देख सकता हूँ? ॥ ११ ॥

यदि दुःखमकृत्वा तु मम संक्रमणं भवेत्।
अदुःखार्हस्य रामस्य ततः सुखमवाप्नुयाम्॥ १२॥

‘जो दुःख भोगने के योग्य नहीं हैं, उन श्रीराम को यह वनवास का दुःख दिये बिना ही यदि मैं इस संसार से विदा हो जाता तो मुझे बड़ा सुख मिलता॥ १२॥

नृशंसे पापसंकल्पे रामं सत्यपराक्रमम्।
किं विप्रियेण कैकेयि प्रियं योजयसे मम॥१३॥
अकीर्तिरतुला लोके ध्रुवं परिभविष्यति।

‘ओ पापपूर्ण विचार रखने वाली पाषाणहृदया कैकेयि! सत्यपराक्रमी श्रीराम मुझे बहुत प्रिय हैं, तू मुझसे उनका विछोह क्यों करा रही है? अरी! ऐसा करने से निश्चय ही संसार में तेरी वह अपकीर्ति फैलेगी, जिसकी कहीं तुलना नहीं है’ ॥ १३ १/२॥

तथा विलपतस्तस्य परिभ्रमितचेतसः॥१४॥
अस्तमभ्यागमत् सूर्यो रजनी चाभ्यवर्तत।

इस प्रकार विलाप करते-करते राजा दशरथ का चित्त अत्यन्त व्याकुल हो उठा। इतने में ही सूर्यदेव अस्ताचल को चले गये और प्रदोषकाल आ पहुँचा॥ १४ १/२॥

सा त्रियामा तदार्तस्य चन्द्रमण्डलमण्डिता॥ १५॥
राज्ञो विलपमानस्य न व्यभासत शर्वरी।

वह तीन पहरोंवाली रात यद्यपि चन्द्रमण्डलकी चारुचन्द्रिकासे आलोकित हो रही थी, तो भी उस समय आर्त होकर विलाप करते हुए राजा दशरथके लिये प्रकाश या उल्लास न दे सकी॥ १५ १/२ ।।

सदैवोष्णं विनिःश्वस्य वृद्धो दशरथो नृपः॥ १६॥
विललापार्तवद् दुःखं गगनासक्तलोचनः।

बूढ़े राजा दशरथ निरन्तर गरम उच्छ्वास लेते हुए आकाश की ओर दृष्टि लगाये आर्त की भाँति दुःखपूर्ण विलाप करने लगे- ॥ १६ १/२।।।

न प्रभातं त्वयेच्छामि निशे नक्षत्रभूषिते॥१६॥
क्रियतां मे दया भद्रे मयायं रचितोऽञ्जलिः।

‘नक्षत्रमालाओं से अलंकृत कल्याणमयी रात्रिदेवि ! मैं नहीं चाहता कि तुम्हारे द्वारा प्रभात-काल लाया जाय। मुझपर दया करो मैं तुम्हारे सामने हाथ जोड़ता हूँ॥

अथवा गम्यतां शीघ्रं नाहमिच्छामि निघृणाम्॥ १८॥
नृशंसां केकयीं द्रष्टुं यत्कृते व्यसनं मम।

‘अथवा शीघ्र बीत जाओ; क्योंकि जिसके कारण मुझे भारी संकट प्राप्त हुआ है, उस निर्दय और क्रूर कैकेयी को अब मैं नहीं देखना चाहता’ ॥ १८ १/२॥

एवमुक्त्वा ततो राजा कैकेयीं संयताञ्जलिः॥ १९॥
प्रसादयामास पुनः कैकेयी राजधर्मवित्।

कैकेयी से ऐसा कहकर राजधर्म के ज्ञाता राजा दशरथ ने पुनः हाथ जोड़कर उसे मनाने या प्रसन्न करने की चेष्टा आरम्भ की— ॥ १९ १/२॥

साधुवृत्तस्य दीनस्य त्वद्गतस्य गतायुषः॥२०॥
प्रसादः क्रियतां भद्रे देवि राज्ञो विशेषतः।

‘कल्याणमयी देवि! जो सदाचारी, दीन, तेरे आश्रित, गतायु (मरणासन्न) और विशेषतः राजा है —ऐसे मुझ दशरथ पर कृपा कर॥ २० १/२॥

शून्ये न खलु सुश्रोणि मयेदं समुदाहृतम्॥२१॥
कुरु साधुप्रसादं मे बाले सहृदया ह्यसि।।

‘सुन्दर कटिप्रदेश वाली केकयनन्दिनि ! मैंने जो यह श्रीराम को राज्य देने की बात कही है, वह किसी सूनेघर में नहीं, भरी सभा में घोषित की है, अतः बाले! तूबड़ी सहृदय है; इसलिये मुझ पर भलीभाँति कृपा कर (जिससे सभासदों द्वारा मेरा उपहास न हो) ॥ २११/२॥

प्रसीद देवि रामो मे त्वद्दत्तं राज्यमव्ययम्॥ २२॥
लभतामसितापाते यशः परमवाप्स्यसि।

‘देवि! प्रसन्न हो जा। कजरारे नेत्रप्रान्तवाली प्रिये ! मेरे श्रीराम तेरे ही दिये हुए इस अक्षय राज्य को प्राप्त करें, इससे तुझे उत्तम यश की प्राप्ति होगी॥ २२ १/२॥

मम रामस्य लोकस्य गुरूणां भरतस्य च।
प्रियमेतद् गुरुश्रोणि कुरु चारुमुखेक्षणे॥२३॥

‘पृथुल नितम्बवाली देवि! सुमुखि! सुलोचने! यह प्रस्ताव मुझको, श्रीराम को, समस्त प्रजावर्ग को, गुरुजनों को तथा भरत को भी प्रिय होगा, अतः इसे पूर्ण कर’॥ २३॥

विशुद्धभावस्य हि दुष्टभावा दीनस्य ताम्राश्रुकलस्य राज्ञः।
श्रुत्वा विचित्रं करुणं विलापं भर्तनूशंसा न चकार वाक्यम्॥२४॥

राजा के हृदय का भाव अत्यन्त शुद्ध था, उनके आँसूभरे नेत्र लाल हो गये थे और वे दीनभाव से विचित्र करुणाजनक विलाप कर रहे थे, किंतु मन में दूषित विचार रखनेवाली निष्ठुर कैकेयी ने पति के उस विलाप को सुनकर भी उनकी आज्ञा का पालन नहीं किया॥ २४॥

ततः स राजा पुनरेव मूर्च्छितः प्रियामतुष्टां प्रतिकूलभाषिणीम्।
समीक्ष्य पुत्रस्य विवासनं प्रति क्षितौ विसंज्ञो निपपात दुःखितः॥२५॥

(इतनी अनुनय-विनयके बाद भी) जब प्रिया कैकेयी किसी तरह संतुष्ट न हो सकी और बराबर प्रतिकूल बात ही मुँह से निकालती गयी, तब पुत्र के वनवास की बात सोचकर राजा पुनः दुःख के मारे मूिर्च्छत हो गये और सुध-बुध खोकर पृथ्वी पर गिर पड़े॥२५॥

इतीव राज्ञो व्यथितस्य सा निशा जगाम घोरं श्वसतो मनस्विनः।
विबोध्यमानः प्रतिबोधनं तदा निवारयामास स राजसत्तमः॥२६॥

इस प्रकार व्यथित होकर भयंकर उच्छ्वास लेते हुए मनस्वी राजा दशरथ की वह रात धीरे-धीरे बीत गयी। प्रातःकाल राजा को जगाने के लिये मनोहर वाद्यों के साथ मङ्गलगान होने लगा, परंतु उन राजशिरोमणिने तत्काल मनाही भेजकर वह सब बंद करा दिया॥२६॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे त्रयोदशः सर्गः॥१३॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में तेरहवाँ सर्ग पूरा हुआ।१३॥

अयोध्याकाण्डम्
चतुर्दशःसर्गः (सर्ग 14)

( कैकेयी का राजा को अपने वरों की पूर्ति के लिये दुराग्रह दिखाना, राजा की आज्ञा से सुमन्त्रका श्रीराम को बुलाना )

पुत्रशोकार्दितं पापा विसंज्ञं पतितं भुवि।
विचेष्टमानमुत्प्रेक्ष्य ऐक्ष्वाकमिदमब्रवीत्॥१॥

इक्ष्वाकुनन्दन राजा दशरथ पुत्रशोक से पीड़ित हो पृथ्वी पर अचेत पड़े थे और वेदना से छटपटा रहे थे, उन्हें इस अवस्था में देखकर पापिनी कैकेयी इस प्रकार बोली- ॥१॥

पापं कृत्वेव किमिदं मम संश्रुत्य संश्रवम्।
शेषे क्षितितले सन्नः स्थित्यां स्थातुं त्वमर्हसि॥ २॥

‘महाराज! आपने मुझे दो वर देने की प्रतिज्ञा की थी और जब मैंने उन्हें माँगा, तब आप इस प्रकार सन्न होकर पृथ्वी पर गिर पड़े, मानो कोई पाप करके पछता रहे हों, यह क्या बात है? आपको सत्पुरुषों की मर्यादा में स्थिर रहना चाहिये॥२॥

आहुः सत्यं हि परमं धर्मं धर्मविदो जनाः।
सत्यमाश्रित्य च मया त्वं धर्मं प्रतिचोदितः॥३॥

‘धर्मज्ञ पुरुष सत्य को ही सबसे श्रेष्ठ धर्म बतलाते हैं, उस सत्य का सहारा लेकर मैंने आपको धर्म का पालन करने के लिये ही प्रेरित किया है॥३॥

संश्रुत्य शैब्यः श्येनाय स्वां तनुं जगतीपतिः।
प्रदाय पक्षिणे राजा जगाम गतिमुत्तमाम्॥४॥

‘पृथ्वीपति राजा शैब्य ने बाज पक्षी को अपना शरीर देने की प्रतिज्ञा करके उसे दे ही दिया और देकर उत्तम गति प्राप्त कर ली॥४॥

तथा ह्यलर्कस्तेजस्वी ब्राह्मणे वेदपारगे।
याचमाने स्वके नेत्रे उद्धृत्याविमना ददौ॥५॥

‘इसी प्रकार तेजस्वी राजा अलर्कने वेदोंके पारङ्गत । विद्वान् ब्राह्मणको उसके याचना करनेपर मनमें खेद न लाते हए अपनी दोनों आँखें निकालकर दे दी थीं॥

सरितां तु पतिः स्वल्पां मर्यादां सत्यमन्वितः।
सत्यानुरोधात् समये वेलां स्वां नातिवर्तते॥६॥

‘सत्यको प्राप्त हुआ समुद्र सत्यका ही अनुसरण करनेके कारण पर्व आदिके समय भी अपनी छोटीसी सीमातट-भूमिका भी उल्लङ्घन नहीं करता॥६॥

सत्यमेकपदं ब्रह्म सत्ये धर्मः प्रतिष्ठितः।।
सत्यमेवाक्षया वेदाः सत्येनावाप्यते परम्॥७॥

‘सत्य ही प्रणवरूप शब्दब्रह्म है, सत्यमें ही धर्म प्रतिष्ठित है, सत्य ही अविनाशी वेद है और सत्यसे ही परब्रह्म की प्राप्ति होती है॥७॥

सत्यं समनुवर्तस्व यदि धर्मे धृता मतिः।
स वरः सफलो मेऽस्तु वरदो ह्यसि सत्तम॥८॥

‘इसलिये यदि आपकी बुद्धि धर्म में स्थित है तो सत्य का अनुसरण कीजिये। साधुशिरोमणे! मेरा माँगा हुआ वह वर सफल होना चाहिये; क्योंकि आप स्वयं ही उस वर के दाता हैं।॥ ८॥

धर्मस्यैवाभिकामार्थं मम चैवाभिचोदनात्।
प्रव्राजय सुतं रामं त्रिः खलु त्वां ब्रवीम्यहम्॥९॥

‘धर्म के ही अभीष्ट फल की सिद्धि के लिये तथा मेरी प्रेरणा से भी आप अपने पुत्र श्रीराम को घर से निकाल दीजिये। मैं अपने इस कथन को तीन बार दुहराती हूँ।

समयं च ममार्येमं यदि त्वं न करिष्यसि।
अग्रतस्ते परित्यक्ता परित्यक्ष्यामि जीवितम्॥ १०॥

‘आर्य! यदि मुझसे की हुई इस प्रतिज्ञा का आप पालन नहीं करेंगे तो मैं आपसे परित्यक्त (उपेक्षित) होकर आपके सामने ही अपने प्राणों का परित्याग कर दूंगी’ ॥ १०॥

एवं प्रचोदितो राजा कैकेय्या निर्विशङ्कया।
नाशकत् पाशमुन्मोक्तुं बलिरिन्द्रकृतं यथा॥ ११॥

इस प्रकार कैकेयी ने जब निःशङ्क होकर राजा को प्रेरित किया, तब वे उस सत्यरूपी बन्धन को वैसे ही नहीं खोल सके—उस बन्धन से अपने को उसी तरह नहीं मुक्त कर सके, जैसे राजा बलि इन्द्र प्रेरित वामन के पाश से अपने को मुक्त करने में असमर्थ हो गये थे॥११॥

उद्भ्रान्तहृदयश्चापि विवर्णवदनोऽभवत्।
स धुर्यो वै परिस्पन्दन् युगचक्रान्तरं यथा॥१२॥

दो पहियों के बीच में फँसकर वहाँ से निकलने की चेष्टा करने वाले गाड़ी के बैल की भाँति उनका हृदय उद्भ्रान्त हो उठा था और उनके मुख की कान्ति भी फीकी पड़ गयी थी॥ १२ ॥

विकलाभ्यां च नेत्राभ्यामपश्यन्निव भूमिपः।
कृच्छ्राद् धैर्येण संस्तभ्य कैकेयीमिदमब्रवीत्॥१३॥

अपने विकल नेत्रों से कुछ भी देखने में असमर्थ से होकर भूपाल दशरथ ने बड़ी कठिनाई से धैर्य धारण करके अपने हृदय को सँभाला और कैकेयी से इस प्रकार कहा- ॥१३॥

यस्ते मन्त्रकृतः पाणिरग्नौ पापे मया धृतः।
संत्यजामि स्वजं चैव तव पुत्रं सह त्वया॥१४॥

‘पापिनि! मैंने अग्नि के समीप ‘साष्ठं ते गृभ्णामि सौभगत्वाय हस्तम्’ इत्यादि वैदिक मन्त्र का पाठ करके तेरे जिस हाथ को पकड़ा था, उसे आज छोड़ रहा हूँ। साथ ही तेरे और अपने द्वारा उत्पन्न हुए तेरे पुत्र का भी त्याग करता हूँ॥ १४ ॥

प्रयाता रजनी देवि सूर्यस्योदयनं प्रति।
अभिषेकाय हि जनस्त्वरयिष्यति मां ध्रुवम्॥

‘देवि! रात बीत गयी। सूर्योदय होते ही सब लोग निश्चय ही श्रीराम का राज्याभिषेक करने के लिये मुझे शीघ्रता करने को कहेंगे॥ १५ ॥

रामाभिषेकसम्भारैस्तदर्थमुपकल्पितैः।
रामः कारयितव्यो मे मृतस्य सलिलक्रियाम्॥ १६॥
सपुत्रया त्वया नैव कर्तव्या सलिलक्रिया।

‘उस समय जो सामान श्रीराम के अभिषेक के लिये जुटाया गया है, उसके द्वारा मेरे मरने के बाद श्रीराम के हाथ से मुझे जलाञ्जलि दिलवा देना; परंतु अपने पुत्र सहित तू मेरे लिये जलाञ्जलि न देना॥ १६ १/२॥

व्याहन्तास्यशुभाचारे यदि रामाभिषेचनम्॥१७॥
न शक्तोऽद्यास्म्यहं द्रष्टुं दृष्ट्वा पूर्वं तथामुखम्।
हतहर्षं तथानन्दं पुनर्जनमवाङ्मुखम्॥ १८॥

‘पापाचारिणि! यदि तू श्रीराम के अभिषेक में विघ्न डालेगी (तो तुझे मेरे लिये जलाञ्जलि देने का कोई अधिकार न होगा)। मैं पहले श्रीराम के राज्याभिषेक के समाचार से जो जन-समुदाय का हर्षोल्लास से परिपूर्ण उन्नत मुख देख चुका हूँ, वैसा देखने के पश्चात् आज पुनः उसी जनता के हर्ष और आनन्द से शून्य, नीचे लटके हुए मुख को मैं नहीं देख सकूँगा’ ॥ १७-१८॥

तां तथा ब्रुवतस्तस्य भूमिपस्य महात्मनः।
प्रभाता शर्वरी पुण्या चन्द्रनक्षत्रमालिनी॥१९॥

महात्मा राजा दशरथ के कैकेयी से इस तरह की बातें करते-करते ही चन्द्रमा और नक्षत्रमालाओं से अलंकृत वह पुण्यमयी रजनी बीत गयी और प्रभातकाल आ गया॥ १९॥

ततः पापसमाचारा कैकेयी पार्थिवं पुनः।
उवाच परुषं वाक्यं वाक्यज्ञा रोषमूर्च्छिता॥ २०॥

तदनन्तर बातचीत के मर्म को समझने वाली पापचारिणी कैकेयी रोष से मूर्च्छित-सी होकर राजा से पुनः कठोर वाणी में बोली- ॥ २० ॥

किमिदं भाषसे राजन् वाक्यं गररुजोपमम्।
आनाययितुमक्लिष्टं पुत्रं राममिहार्हसि ॥२१॥
स्थाप्य राज्ये मम सुतं कृत्वा रामं वनेचरम्। २०॥
निःसपत्नां च मां कृत्वा कृतकृत्यो भविष्यसि॥ २२॥

‘राजन् ! आप विष और शूल आदि रोगों के समान कष्ट देने वाले ऐसे वचन क्यों बोल रहे हैं (इन बातों से कुछ होने-जाने वाला नहीं है)। आप बिना किसी क्लेश के अपने पुत्र श्रीराम को यहाँ बुलवाइये। मेरे पुत्र को राज्यपर प्रतिष्ठित कीजिये और श्रीराम को वन में भेजकर मुझे निष्कण्टक बनाइये; तभी आप कृतकृत्य हो सकेंगे’॥ २१-२२॥

स तुन्न इव तीक्ष्णेन प्रतोदेन हयोत्तमः।
राजा प्रचोदितोऽभीक्ष्णं कैकेय्या वाक्यमब्रवीत्॥२३॥

तीखे कोडे की मार से पीड़ित हुए उत्तम अश्व की भाँति कैकेयी द्वारा बारंबार प्रेरित होने पर व्यथित हुए राजा दशरथ ने इस प्रकार कहा- ॥२३॥

धर्मबन्धेन बद्धोऽस्मि नष्टा च मम चेतना।
ज्येष्ठं पुत्रं प्रियं रामं द्रष्टुमिच्छामि धार्मिकम्॥ २४॥

‘मैं धर्म के बन्धन में बँधा हुआ हूँ। मेरी चेतना लुप्त होती जा रही है। इसलिये इस समय मैं अपने धर्मपरायण परम प्रिय ज्येष्ठ पुत्र श्रीराम को देखना चाहता हूँ’॥ २४॥

ततः प्रभातां रजनीमुदिते च दिवाकरे।
पुण्ये नक्षत्रयोगे च मुहुर्ते च समागते॥२५॥
वसिष्ठो गुणसम्पन्नः शिष्यैः परिवृतस्तथा।
उपगृह्याशु सम्भारान् प्रविवेश पुरोत्तमम्॥२६॥

उधर जब रात बीती, प्रभात हुआ, सूर्यदेव का उदय हो गया और पुण्यनक्षत्र के योग में अभिषेक का शुभ मुहूर्त आ पहुँचा, उस समय शिष्यों से घिरे हुए शुभगुणसम्पन्न महर्षि वसिष्ठ अभिषेक की आवश्यक सामग्रियों का संग्रह करके शीघ्रतापूर्वक उस श्रेष्ठ पुरी में आये॥ २५-२६॥

सिक्तसम्मार्जितपथां पताकोत्तमभूषिताम्।
संहृष्टमनुजोपेतां समृद्धविपणापणाम्॥२७॥

उस पुण्यवेला में अयोध्या की सड़कें झाड़-बुहारकर साफ की गयी थीं और उनपर जल का छिड़काव हआ था। सारी पुरी उत्तम पताकाओं से सुशोभित थी। वहाँ के सभी मनुष्य हर्ष और उत्साह से भरे हुए थे। बाजार और दूकानें इस तरह सजी हुई थीं कि उनकी समृद्धि देखते ही बनती थी॥ २७॥

महोत्सवसमायुक्तां राघवार्थे समुत्सुकाम्।
चन्दनागुरुधूपैश्च सर्वतः परिधूमिताम्॥२८॥

सब ओर महान् उत्सव हो रहा था। सारी नगरी श्रीरामचन्द्रजी के अभिषेक के लिये उत्सुक थी। चारों ओर चन्दन, अगर और धूप की सुगन्ध व्याप्त हो रही थी॥ २८॥

तां पुरीं समतिक्रम्य पुरंदरपुरोपमाम्।
ददर्शान्तःपुरं श्रीमान् नानाध्वजगणायुतम्॥ २९॥

इन्द्रनगरी अमरावती के समान शोभा पाने वाली उस पुरी को पार करके श्रीमान् वसिष्ठजी ने राजा दशरथ के अन्तःपुर का दर्शन किया जहाँ सहस्रों ध्वजाएँ फहरा रही थीं॥२९॥

पौरजानपदाकीर्णं ब्राह्मणैरुपशोभितम्।
यष्टिमद्भिः सुसम्पूर्ण सदश्वैः परमार्चितैः॥ ३०॥

नगर और जनपद के लोग वहाँ भरे हुए थे। बहुत से ब्राह्मण उस स्थान की शोभा बढ़ाते थे। छड़ीदार राजसेवक तथा सजे-सजाये सुन्दर घोड़े वहाँ अधिक संख्या में उपस्थित थे॥३०॥

तदन्तःपुरमासाद्य व्यतिचक्राम तं जनम्।
वसिष्ठः परमप्रीतः परमर्षिभिरावृतः॥३१॥

श्रेष्ठ महर्षियों से घिरे हए वसिष्ठजी परम प्रसन्न हो उस अन्तःपुर में पहुँचकर उस जन-समुदाय को लाँघकर आगे बढ़ गये॥ ३१॥

स त्वपश्यद् विनिष्क्रान्तं सुमन्त्रं नाम सारथिम्।
द्वारे मनुजसिंहस्य सचिवं प्रियदर्शनम्॥३२॥

वहाँ उन्होंने महाराज के सुन्दर सचिव तथा सारथि सुमन्त्र को अन्तःपुर के द्वार पर उपस्थित देखा, जो उसी समय भीतर से निकले थे॥ ३२॥

तमुवाच महातेजाः सूतपुत्रं विशारदम्।
वसिष्ठः क्षिप्रमाचक्ष्व नृपतेर्मामिहागतम्॥३३॥

तब महातेजस्वी वसिष्ठ ने परम चतुर सूतपुत्र सुमन्त्र से कहा—’सूत! तुम महाराज को शीघ्र ही मेरे आगमन की सूचना दो॥ ३३॥

इमे गङ्गोदकघटाः सागरेभ्यश्च काञ्चनाः।
औदुम्बरं भद्रपीठमभिषेकार्थमाहृतम्॥ ३४॥

‘(उन्हें बताओ कि श्रीराम के राज्याभिषेक के लिये सारी सामग्री एकत्र कर ली गयी है) ये गङ्गाजल से भरे कलश रखे हैं, इन सोने के कलशों में समुद्रों से लाया हुआ जल भरा हुआ है। यह गूलर की लकड़ी का बना हुआ भद्रपीठ है, जो अभिषेक के लिये लाया गया है (इसी पर बिठाकर श्रीराम का अभिषेक होगा) ॥ ३४॥

सर्वबीजानि गन्धाश्च रत्नानि विविधानि च।
क्षौद्रं दधि घृतं लाजा दर्भाः सुमनसः पयः॥ ३५॥
अष्टौ च कन्या रुचिरा मत्तश्च वरवारणः।
चतुरश्वो रथः श्रीमान् निस्त्रिंशो धनुरुत्तमम्॥
वाहनं नरसंयुक्तं छत्रं च शशिसंनिभम्।
श्वेते च वालव्यजने भृङ्गारं च हिरण्मयम्॥३७॥
हेमदामपिनद्धश्च ककुद्मान् पाण्डुरो वृषः।
केसरी च चतुर्दष्ट्रो हरिश्रेष्ठो महाबलः॥ ३८॥
सिंहासनं व्याघ्रतनुः समिधश्च हुताशनः।
सर्वे वादित्रसङ्घाश्च वेश्याश्चालंकृताः स्त्रियः॥ ३९॥
आचार्या ब्राह्मणा गावः पुण्याश्च मृगपक्षिणः।
पौरजानपदश्रेष्ठा नैगमाश्च गणैः सह ॥ ४०॥
एते चान्ये च बहवः प्रीयमाणाः प्रियंवदाः।
अभिषेकाय रामस्य सह तिष्ठन्ति पार्थिवैः ॥४१॥

‘सब प्रकार के बीज, गन्ध, भाँति-भाँति के रत्न, मधु, दही, घी, लावा या खील, कुश, फूल, दूध, आठ सुन्दरी कन्याएँ, मत्त गजराज, चार घोड़ोंवाला रथ, चमचमाता हुआ खड्ग, उत्तम धनुष, मनुष्यों द्वारा ढोयी जाने वाली सवारी (पालकी आदि), चन्द्रमा के समान श्वेत छत्र, सफेद चँवर, सोने की झारी, सुवर्ण की माला से अलंकृत ऊँचे डीलवाला श्वेत पीतवर्ण का वृषभ, चार दाढ़ों वाला सिंह, महाबलवान् उत्तम अश्व, सिंहासन, व्याघ्रचर्म, समिधाएँ, अग्नि, सब प्रकार के बाजे, वाराङ्गनाएँ, शृङ्गारयुक्त सौभाग्यवती स्त्रियाँ, आचार्य, ब्राह्मण, गौ, पवित्र पशु-पक्षी, नगर और जनपद के श्रेष्ठ पुरुष अपने सेवक-गणों सहित प्रसिद्ध-प्रसिद्ध व्यापारी ये तथा और भी बहुत-से प्रियवादी मनुष्य बहुसंख्यक राजाओं के साथ प्रसन्नतापूर्वक श्रीरामके अभिषेकके । लिये यहाँ उपस्थित हैं॥ ३५-४१॥

त्वरयस्व महाराजं यथा समुदितेऽहनि।
पुष्ये नक्षत्रयोगे च रामो राज्यमवाप्नुयात्॥४२॥

‘तुम महाराज से शीघ्रता करने के लिये कहो, जिससे अब सूर्योदय के पश्चात् पुष्यनक्षत्र के योग में श्रीरामराज्य प्राप्त कर लें’॥ ४२ ॥

इति तस्य वचः श्रुत्वा सूतपुत्रो महाबलः।
स्तुवन् नृपतिशार्दूलं प्रविवेश निवेशनम्॥४३॥

वसिष्ठजी के ये वचन सुनकर महाबली सूतपुत्र सुमन्त्र ने राजसिंह दशरथ की स्तुति करते हुए उनके भवन में प्रवेश किया॥४३॥

तं तु पूर्वोदितं वृद्धं द्वारस्था राजसम्मताः।
न शेकुरभिसंरोधडं राज्ञः प्रियचिकीर्षवः॥४४॥

राजा का प्रिय करने की इच्छा रखने वाले और उनके द्वारा सम्मानित द्वारपाल उन बूढ़े सचिव को भीतर जाने से रोक न सके; क्योंकि उनके लिये पहले से ही महाराज की आज्ञा थी कि ये किसी समय भी भीतर आने से रोके न जायँ॥ ४४॥

स समीपस्थितो राज्ञस्तामवस्थामजज्ञिवान्।
वाग्भिः परमतुष्टाभिरभिष्टोतुं प्रचक्रमे॥४५॥

सुमन्त्र राजा के पास जाकर खड़े हो गये। उन्हें उनकी उस अवस्था का पता नहीं था; इसलिये वे अत्यन्त संतोषदायक वचनों द्वारा उनकी स्तुति करने को उद्यत हुए॥ ४५ ॥

ततः सूतो यथापूर्वं पार्थिवस्य निवेशने।
सुमन्त्रः प्राञ्जलिर्भूत्वा तुष्टाव जगतीपतिम्॥ ४६॥

सूत सुमन्त्र राजा के उस महल में पहले की ही भाँति हाथ जोड़कर उन महाराज की स्तुति करने लगे-॥४६॥

यथा नन्दति तेजस्वी सागरो भास्करोदये।
प्रीतः प्रीतेन मनसा तथा नन्दय नस्ततः॥४७॥

‘महाराज! जैसे सूर्योदय होनेपर तेजस्वी समुद्र स्वयं हर्षकी तरंगोंसे उल्लसित हो उसमें स्नानकी इच्छावाले मनुष्योंको आनन्दित करता है, उसी प्रकार आप स्वयं प्रसन्न हो प्रसन्नतापूर्ण हृदयसे हम सेवकोंको आनन्द प्रदान कीजिये॥ ४७ ॥

इन्द्रमस्यां तु वेलायामभितुष्टाव मातलिः।
सोऽजयद् दानवान् सर्वांस्तथा त्वां बोधयाम्यहम्॥४८॥

‘देवसारथि मातलि ने इसी बेला में देवराज इन्द्र की स्तुति की थी, जिससे उन्होंने समस्त दानवों पर विजय प्राप्त कर ली, उसी प्रकार मैं भी स्तुति-वचनों द्वारा आपको जगा रहा हूँ॥४८॥

वेदाः सहाङ्गा विद्याश्च यथा ह्यात्मभुवं प्रभुम्।
रह्माणं बोधयन्त्यद्य तथा त्वां बोधयाम्यहम्॥ ४९॥

‘छहों अङ्गों सहित चारों वेद तथा समस्त विद्याएँ जैसे स्वयम्भू भगवान् ब्रह्मा को जगाती हैं, उसी प्रकार आज मैं आपको जगा रहा हूँ॥४९॥

आदित्यः सह चन्द्रेण यथा भूतधरां शुभाम्।
बोधयत्यद्य पृथिवीं तथा त्वां बोधयाम्यहम्॥ ५०॥

‘जैसे चन्द्रमा के साथ सूर्य समस्त भूतों की आधारभूता इस शुभ-स्वरूपा पृथ्वी को जगाया करते हैं, उसी प्रकार आज मैं आपको जगा रहा हूँ॥ ५० ॥

उत्तिष्ठ सुमहाराज कृतकौतुकमङ्गलः।
विराजमानो वपुषा मेरोरिव दिवाकरः॥५१॥

‘महाराज! उठिये और उत्सवकालिक मङ्गलकृत्य पूर्ण करके वस्त्राभूषणोंसे सुशोभित शरीरसे सिंहासनपर विराजमान होइये। फिर मेरु पर्वतसे ऊपर उठनेवाले सूर्यदेवके समान आपकी शोभा होती रहे। ५१॥

सोमसूर्यौ च काकुत्स्थ शिववैश्रवणावपि।
वरुणश्चाग्निरिन्द्रश्च विजयं प्रदिशन्तु ते॥५२॥

‘ककुत्स्थ-कुलनन्दन ! चन्द्रमा, सूर्य, शिव, कुबेर, वरुण, अग्नि और इन्द्र आपको विजय प्रदान करें। ५२॥

गता भगवती रात्रिः कृतं कृत्यमिदं तव।
बुध्यस्व नृपशार्दूल कुरु कार्यमनन्तरम्॥५३॥

‘राजसिंह ! भगवती रात्रिदेवी विदा हो गयीं। आपने जिसके लिये आज्ञा दी थी, आपका वह सारा कार्य पूर्ण हो गया। इस बातको आप जान लें और इसके बाद जो अभिषेक का कार्य शेष है, उसे पूर्ण करें। ५३॥
उदतिष्ठत रामस्य समग्रमभिषेचनम्।
पौरजानपदाश्चापि नैगमश्च कृताञ्जलिः॥५४॥

‘श्रीराम के अभिषेक की सारी तैयारी हो चुकी है। नगर और जनपद के लोग तथा मुख्य-मुख्य व्यापारी भी हाथ जोड़े हुए उपस्थित हैं ॥ ५४॥

स्वयं वसिष्ठो भगवान् ब्राह्मणैः सह तिष्ठति।
क्षिप्रमाज्ञाप्यतां राजन् राघवस्याभिषेचनम्॥ ५५॥

‘राजन् ! ये भगवान् वसिष्ठ मुनि ब्राह्मणों के साथ द्वार पर खड़े हैं; अतः श्रीराम के अभिषेक का कार्य आरम्भ करने के लिये शीघ्र आज्ञा दीजिये॥ ५५ ॥

यथा ह्यपालाः पशवो यथा सेना ह्यनायका।
यथा चन्द्रं विना रात्रिर्यथा गावो विना वृषम्॥ ५६॥
एवं हि भविता राष्ट्रं यत्र राजा न दृश्यते।

‘जैसे चरवाहों के बिना पशु, सेनापति के बिना सेना, चन्द्रमा के बिना रात्रि और साँड़ के बिना गौओं की शोभा नहीं होती, ऐसी ही दशा उस राष्ट्र की हो जाती है, जहाँ राजा का दर्शन नहीं होता है’। ५६ १/२॥

एवं तस्य वचः श्रुत्वा सान्त्वपूर्वमिवार्थवत्॥ ५७॥
अभ्यकीर्यत शोकेन भूय एव महीपतिः।

सुमन्त्रके इस प्रकार कहे हुए सान्त्वनापूर्ण और सार्थक वचनको सुनकर राजा दशरथ पुनः शोकसे ग्रस्त होगये॥ ५७ १/२॥

ततस्तु राजा तं सूतं सन्नहर्षः सुतं प्रति॥५८॥
शोकरक्तेक्षणः श्रीमानुद्रीक्ष्योवाच धार्मिकः।
वाक्यैस्तु खलु मर्माणि मम भूयो निकृन्तसि॥ ५९॥

उस समय पुत्र के वियोग की सम्भावना से उनकी प्रसन्नता नष्ट हो चुकी थी। शोक के कारण उनके नेत्र लाल हो गये थे। उन धर्मात्मा श्रीमान् नरेश ने एकबार दृष्टि उठाकर सूत की ओर देखा और इस प्रकार कहा—’तुम ऐसी बातें सुनाकर मेरे मर्म-स्थानों पर और अधिक आघात क्यों कर रहे हो’। ५८-५९॥

सुमन्त्रः करुणं श्रुत्वा दृष्ट्वा दीनं च पार्थिवम्।
प्रगृहीताञ्जलिः किंचित् तस्माद् देशादपाक्रमत्॥ ६०॥

राजा के ये करुण वचन सुनकर और उनकी दीन दशापर दृष्टिपात करके सुमन्त्र हाथ जोड़े हुए उस स्थानसे कुछ पीछे हट गये॥ ६०॥

यदा वक्तुं स्वयं दैन्यान्न शशाक महीपतिः।
तदा सुमन्त्रं मन्त्रज्ञा कैकेयी प्रत्युवाच ह॥६१॥

जब दुःख और दीनता के कारण राजा स्वयं कुछ भी न कह सके, तब मन्त्रणा का ज्ञान रखने वाली कैकेयी ने सुमन्त्र को इस प्रकार उत्तर दिया- ॥ ६१॥

सुमन्त्र राजा रजनीं रामहर्षसमुत्सुकः।
प्रजागरपरिश्रान्तो निद्रावशमुपागतः॥६२॥

‘सुमन्त्र! राजा रातभर श्रीराम के राज्याभिषेक जनित हर्ष के कारण उत्कण्ठित होकर जागते रहे हैं। अधिक जागरण से थक जाने के कारण इस समय इन्हें नींद आ गयी है। ६२॥

तद् गच्छ त्वरितं सूत राजपुत्रं यशस्विनम्।
राममानय भद्रं ते नात्र कार्या विचारणा॥६३॥

‘अतः सूत! तुम्हारा भला हो। तुम तुरंत जाओ और यशस्वी राजकुमार श्रीराम को यहाँ बुला लाओ। इस विषय में तुम्हें कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये’ ॥ ६३॥

अश्रुत्वा राजवचनं कथं गच्छामि भामिनि।
तच्छ्रुत्वा मन्त्रिणो वाक्यं राजा मन्त्रिणमब्रवीत्॥ ६४॥

तब सुमन्त्र ने कहा—’भामिनि! मैं महाराज की आज्ञा सुने बिना कैसे जा सकता हूँ?’ मन्त्री की बात सुनकर राजा ने उनसे कहा- ॥६४॥

सुमन्त्र रामं द्रक्ष्यामि शीघ्रमानय सुन्दरम्।
स मन्यमानः कल्याणं हृदयेन ननन्द च॥६५॥

‘सुमन्त्र! मैं सुन्दर श्रीराम को देखना चाहता हूँ। तुम शीघ्र उन्हें यहाँ ले आओ।’ उस समय श्रीराम के दर्शन से ही कल्याण मानते हुए राजा मन-ही-मन आनन्द का अनुभव करने लगे॥६५॥

निर्जगाम च स प्रीत्या त्वरितो राजशासनात्।
सुमन्त्रश्चिन्तयामास त्वरितं चोदितस्तया॥६६॥

इधर सुमन्त्र राजा की आज्ञा से तुरंत प्रसन्नतापूर्वक वहाँ से चल दिये। कैकेयी ने जो तुरंत श्रीराम को बुला लाने की आज्ञा दी थी, उसे याद करके वे सोचने लगे – ‘पता नहीं, यह उन्हें बुलाने के लिये इतनी जल्दी क्यों मचा रही है? ॥६६॥

व्यक्तं रामाभिषेकार्थे इहायास्यति धर्मराट्।
इति सूतो मतिं कृत्वा हर्षेण महता पुनः॥६७॥
निर्जगाम महातेजा राघवस्य दिदृक्षया।
सागरहदसंकाशात्सुमन्त्रोऽन्तःपुराच्छुभात्।
निष्क्रम्य जनसम्बाधं ददर्श द्वारमग्रतः॥६८॥

‘जान पड़ता है, श्रीरामचन्द्र के अभिषेक के लिये ही यह जल्दी कर रही है। इस कार्य में धर्मराज राजा दशरथ को अधिक आयास करना पड़ता है (शायद इसीलिये ये बाहर नहीं निकलते)।’ ऐसा निश्चय करके महातेजस्वी सूत सुमन्त्र फिर बड़े हर्ष के साथ श्रीराम के दर्शन की इच्छा से चल पड़े। समुद्र के अन्तर्वर्ती जलाशय के समान उस सुन्दर अन्तःपुर से निकलकर सुमन्त्र ने द्वारके सामने मनुष्यों की भारी भीड़ एकत्र हुई देखी॥६७-६८॥

ततः पुरस्तात् सहसा विनिःसृतो महीपतेरिगतान् विलोकयन्।
ददर्श पौरान् विविधान् महाधनानुपस्थितान् द्वारमुपेत्य विष्ठितान्॥६९॥

राजा के अन्तःपुर से सहसा निकलकर सुमन्त्र ने द्वार पर एकत्र हुए लोगों की ओर दृष्टिपात किया। उन्होंने देखा, बहुसंख्यक पुरवासी वहाँ उपस्थित थे और अनेकानेक महाधनी पुरुष राजद्वार पर आकर खड़े थे। ६९॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे चतुदर्शः सर्गः॥१४॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में चौदहवाँ सर्ग पूरा हुआ।१४॥

अयोध्याकाण्डम्
पञ्चदशः सर्गः (सर्ग 15)

( सुमन्त्र का राजा की आज्ञा से श्रीराम को बुलाने के लिये उनके महल में जाना )

ते तु तां रजनीमुष्य ब्राह्मणा वेदपारगाः।
उपतस्थुरुपस्थानं सह राजपुरोहिताः॥१॥

वे वेदों के पारङ्गत ब्राह्मण तथा राजपुरोहित वह रात बिताकर प्रातःकाल (राजा की प्रेरणा के अनुसार) राजद्वार पर उपस्थित हुए थे॥१॥

अमात्या बलमुख्याश्च मुख्या ये निगमस्य च।
राघवस्याभिषेकार्थे प्रीयमाणाः सुसंगताः॥२॥

मन्त्री, सेना के मुख्य-मुख्य अधिकारी और बड़े बड़े सेठ-साहूकार श्रीरामचन्द्रजी के अभिषेक के लिये बड़ी प्रसन्नता के साथ वहाँ एकत्र हुए थे॥२॥

उदिते विमले सूर्ये पुष्ये चाभ्यागतेऽहनि।
लग्ने कर्कटके प्राप्ते जन्म रामस्य च स्थिते॥३॥
अभिषेकाय रामस्य द्विजेन्द्रैरुपकल्पितम्।
काञ्चना जलकुम्भाश्च भद्रपीठं स्वलंकृतम्॥ ४॥
रथश्च सम्यगास्तीर्णो भास्वता व्याघ्रचर्मणा।
गङ्गायमुनयोः पुण्यात् संगमादाहृतं जलम्॥५॥

निर्मल सूर्योदय होने पर दिन में जब पुष्यनक्षत्र का योग आया तथा श्रीराम के जन्म का कर्क लग्न उपस्थित हुआ, उस समय श्रेष्ठ ब्राह्मणों ने श्रीराम के अभिषेक के लिये सारी सामग्री एकत्र करके उसे अँचाकर रख दिया। जल से भरे हुए सोने के कलश, भलीभाँति सजाया हुआ भद्रपीठ, चमकीलेव्याघ्र चर्म से अच्छी तरह आवृत रथ, गङ्गा-यमुनाके पवित्र सङ्गम से लाया हुआ जल-ये सब वस्तुएँ एकत्र कर ली गयी थीं॥३–५॥

याश्चान्याः सरितः पुण्या ह्रदाः कूपाः सरांसि च।
प्राग्वहाश्चोर्ध्ववाहाश्च तिर्यग्वाहाश्च क्षीरिणः॥ ६॥
ताभ्यश्चैवाहृतं तोयं समुद्रेभ्यश्च सर्वशः।
क्षौद्रं दधि घृतं लाजा दर्भाः सुमनसः पयः॥७॥
अष्टौ च कन्या रुचिरा मत्तश्च वरवारणः।
सजलाः क्षीरिभिश्छन्ना घटाः काञ्चनराजताः॥ ८॥
 पद्मोत्पलयुता भान्ति पूर्णाः परमवारिणा।

इनके सिवा जो अन्य नदियाँ, पवित्र जलाशय, कूप और सरोवर हैं तथा जो पूर्व की ओर बहने वाली (गोदावरी और कावेरी आदि) नदियाँ हैं, ऊपर की ओर प्रवाह वाले जो (ब्रह्मावर्त आदि) सरोवर हैं तथा दक्षिण और उत्तर की ओर बहने वाली जो (गण्डकी एवं शोणभद्र आदि) नदियाँ हैं, जिनमें दूध के समान निर्मल जल भरा रहता है, उन सबसे और समस्त समुद्रों से भी लाया हुआ जल वहाँ संग्रह करके रखा गया था। इनके अतिरिक्त दूध, दही, घी, मधु, लावा, कुश, फूल, आठ सुन्दर कन्याएँ, मदमत्त गजराज और दूध वाले वृक्षों के पल्लवों से ढके हुए सोने चाँदी के जलपूर्ण कलश भी वहाँ विराजमान थे, जोउत्तम जलसे भरे होनेके साथ ही पद्म और उत्पलोंसे संयुक्त होनेके कारण बड़ी शोभा पा रहे थे॥ ६–८ । १/२॥

चन्द्रांशुविकचप्रख्यं पाण्डुरं रत्नभूषितम्॥९॥
सज्जं तिष्ठति रामस्य वालव्यजनमुत्तमम्।

श्रीराम के लिये चन्द्रमा की किरणों के समान विकसित कान्ति से युक्त श्वेत, पीतवर्ण का रत्नजटित उत्तम चँवर सुसज्जित रूप से रखा हुआ था॥ ९ १/२ ॥

चन्द्रमण्डलसंकाशमातपत्रं च पाण्डुरम्॥१०॥
सज्जं द्युतिकरं श्रीमदभिषेकपुरस्सरम्।

चन्द्रमण्डल के समान सुसज्जित श्वेत छत्र भी अभिषेक-सामग्री के साथ शोभा पा रहा था, जो परम सुन्दर और प्रकाश फैलाने वाला था॥ १० १/२॥

पाण्डुरश्च वृषः सज्जः पाण्डुराश्वश्च संस्थितः॥ ११॥
सुसज्जित श्वेत वृषभ और श्वेत अश्व भी खड़े थे॥ ११ ॥
वादित्राणि च सर्वाणि वन्दिनश्च तथापरे।
इक्ष्वाकूणां यथा राज्ये सम्ध्येिताभिषेचनम्॥ १२॥
तथाजातीयमादाय राजपुत्राभिषेचनम्।
ते राजवचनात् तत्र समवेता महीपतिम्॥१३॥

सब प्रकार के बाजे मौजूद थे। स्तुति-पाठ करने वाले वन्दी तथा अन्य मागध आदि भी उपस्थित थे। इक्ष्वाकुवंशी राजाओं के राज्यमें जैसी अभिषेक सामग्री का संग्रह होना चाहिये, राजकुमार के अभिषेक की वैसी ही सामग्री साथ लेकर वे सब लोग महाराज दशरथ की आज्ञा के अनुसार वहाँ उनके दर्शन के लिये एकत्र हुए थे॥ १२-१३ ॥

अपश्यन्तोऽब्रुवन् को नु राज्ञो नः प्रतिवेदयेत्।
न पश्यामश्च राजानमुदितश्च दिवाकरः॥१४॥
यौवराज्याभिषेकश्च सज्जो रामस्य धीमतः।

राजा को द्वार पर न देखकर वे कहने लगे—’कौन महाराज के पास जाकर हमारे आगमन की सूचना देगा। हम महाराज को यहाँ नहीं देखते हैं। सूर्योदय हो गया है और बुद्धिमान् श्रीराम के यौवराज्याभिषेक की सारी सामग्री जुट गयी है’ ॥ १४ १/२ ।।

इति तेषु ब्रुवाणेषु सर्वांस्तांश्च महीपतीन्॥१५॥
अब्रवीत् तानिदं वाक्यं सुमन्त्रो राजसत्कृतः।

वे सब लोग जब इस प्रकार की बातें कर रहे थे, उसी समय राजा द्वारा सम्मानित सुमन्त्र ने वहाँ खड़े हुए उन समस्त भूपतियों से यह बात कही— ॥ १५ १/२॥

रामं राज्ञो नियोगेन त्वरया प्रस्थितो ह्यहम्॥ १६॥
पूज्या राज्ञो भवन्तश्च रामस्य तु विशेषतः।
अयं पृच्छामि वचनात् सुखमायुष्मतामहम्॥ १७॥

‘मैं महाराज की आज्ञा से श्रीराम को बुलाने के लिये तुरंत जा रहा हूँ। आप सब लोग महाराज के तथा विशेषतः श्रीरामचन्द्रजी के पूजनीय हैं, मैं उन्हीं की ओर से आप समस्त चिरंजीवी पुरुषों के कुशल
समाचार पूछ रहा हूँ। आपलोग सुख से हैं न?’॥ १६-१७॥

राज्ञः सम्प्रतिबुद्धस्य चानागमनकारणम्।
इत्युक्त्वान्तःपुरद्वारमाजगाम पुराणवित्॥१८॥

ऐसा कहकर और जगे हुए होने पर श्रीमहाराज के बाहर न आने का कारण बताकर पुरातन वृत्तान्तों को जानने वाले सुमन्त्र पुनः अन्तःपुर के द्वार पर लौट आये॥१८॥

सदा सक्तं च तद् वेश्म सुमन्त्रः प्रविवेश ह।
तुष्टावास्य तदा वंशं प्रविश्य स विशाम्पतेः॥ १९॥

वह राजभवन सुमन्त्र के लिये सदा खुला रहता था। उन्होंने भीतर प्रवेश किया और प्रवेश करके महाराज के वंश की स्तुति की॥ १९ ॥

शयनीयं नरेन्द्रस्य तदासाद्य व्यतिष्ठत।
सोऽत्यासाद्य तु तद् वेश्म तिरस्करणिमन्तरा॥ २०॥
आशीर्भिर्गुणयुक्ताभिरभितुष्टाव राघवम्।

तदनन्तर वे राजा के शयनगृह के पास जाकर खड़े हो गये। उस घर के अत्यन्त निकट पहुँचकर जहाँ बीच में केवल चिक का अन्तर रह गया था, खड़े होवे गुणवर्णनपूर्वक आशीर्वादसूचक वचनों द्वारा रघुकुलनरेश की स्तुति करने लगे- ॥ २० १/२ ।।

सोमसूर्यौ च काकुत्स्थ शिववैश्रवणावपि॥२१॥
वरुणश्चाग्निरिन्द्रश्च विजयं प्रदिशन्त ते।

‘ककुत्स्थनन्दन ! चन्द्रमा, सूर्य, शिव, कुबेर,वरुण, अग्नि और इन्द्र आपको विजय प्रदान करें॥ २१ १/२॥

गता भगवती रात्रिरहः शिवमुपस्थितम्॥ २२॥
बुद्ध्यस्व राजशार्दूल कुरु कार्यमनन्तरम्।

“भगवती रात्रि विदा हो गयी। अब कल्याणस्वरूप दिन उपस्थित हुआ है। राजसिंह ! निद्रा त्यागकर जग जाइये और अब जो कार्य प्राप्त है, उसे कीजिये। २२ १/२॥

ब्राह्मणा बलमुख्याश्च नैगमाश्चागतास्त्विह॥ २३॥
दर्शनं तेऽभिकांक्षन्ते प्रतिबुद्ध्यस्व राघव।

‘ब्राह्मण, सेना के मुख्य अधिकारी और बड़े-बड़े सेठ-साहूकार यहाँ आ गये हैं। वे सब लोग आपका दर्शन चाहते हैं। रघुनन्दन! जागिये’ ।। २३ १/२ ।।

स्तुवन्तं तं तदा सूतं सुमन्त्रं मन्त्रकोविदम्॥२४॥
प्रतिबुद्ध्य ततो राजा इदं वचनमब्रवीत्।

मन्त्रणा करने में कुशल सूत सुमन्त्र जब इस प्रकार स्तुति करने लगे, तब राजा ने जागकर उनसे यह बात कही- ॥२४ १/२॥

राममानय सूतेति यदस्यभिहितो मया॥ २५ ॥
किमिदं कारणं येन ममाज्ञा प्रतिवाह्यते।
न चैव सम्प्रसुप्तोऽहमानयेहाशु राघवम्॥२६॥

‘सूत! श्रीराम को बुला लाओ’—यह जो मैंने तुमसे कहा था, उसका पालन क्यों नहीं हुआ? ऐसा कौन सा कारण है, जिससे मेरी आज्ञा का उल्लङ्घन किया जा रहा है? मैं सोया नहीं हूँ। तुम श्रीराम को शीघ्र यहाँ बुला लाओ’॥

इति राजा दशरथः सूतं तत्रान्वशात् पुनः।
स राजवचनं श्रुत्वा शिरसा प्रतिपूज्य तम्॥२७॥
निर्जगाम नृपावासान्मन्यमानः प्रियं महत्।
प्रपन्नो राजमार्गं च पताकाध्वजशोभितम्॥२८॥

इस प्रकार राजा दशरथ ने जब सूत को फिर उपदेश दिया, तब वे राजा की वह आज्ञा सुनकर सिर झुकाकर उसका सम्मान करते हुए राजभवन से बाहर निकल गये। वे मन-ही-मन अपना महान् प्रिय हुआ मानने लगे। राजभवन से निकलकर सुमन्त्र ध्वजापताकाओं से सुशोभित राजमार्गपर आ गये॥ २७-२८॥

हृष्टः प्रमुदितः सूतो जगामाशु विलोकयन्।
स सूतस्तत्र शुश्राव रामाधिकरणाः कथाः॥ २९॥
अभिषेचनसंयुक्ताः सर्वलोकस्य हृष्टवत्।

वे हर्ष और उल्लास में भरकर सब ओर दृष्टि डालते हुए शीघ्रतापूर्वक आगे बढ़ने लगे। सूत सुमन्त्र वहाँ मार्ग में सब लोगों के मुँह से श्रीराम के राज्याभिषेक की आनन्ददायिनी बातें सुनते जा रहे थे। २९ १/२॥

ततो ददर्श रुचिरं कैलाससदृशप्रभम्॥३०॥
रामवेश्म सुमन्त्रस्तु शक्रवेश्मसमप्रभम्।
महाकपाटपिहितं वितर्दिशतशोभितम्॥३१॥

तदनन्तर सुमन्त्र को श्रीराम का सुन्दर भवन दिखायी दिया, जो कैलासपर्वत के समान श्वेत प्रभा से प्रकाशित हो रहा था। वह इन्द्रभवन के समान दीप्तिमान् था। उसका फाटक विशाल किवाड़ों से बंद था (उसके भीतर का छोटा-सा द्वार ही खुला हुआ था)। सैकड़ों वेदिकाएँ उस भवन की शोभा बढ़ा रही थीं॥ ३०-३१॥

काञ्चनप्रतिमैकाग्रं मणिविद्रुमतोरणम्।
शारदाभ्रघनप्रख्यं दीप्तं मेरुगुहासमम्॥३२॥

उसका मुख्य अग्रभाग सोने की देव-प्रतिमाओं से अलंकृत था। उसके बाहर फाटक में मणि और मूंगे जड़े हुए थे। वह सारा भवन शरद् ऋतु  के बादलों की भाँति श्वेत कान्ति से युक्त, दीप्तिमान् और मेरुपर्वत की कन्दरा के समान शोभायमान था॥ ३२॥

मणिभिर्वरमाल्यानां सुमहद्भिरलंकृतम्।
मुक्तामणिभिराकीर्णं चन्दनागुरुभूषितम्॥३३॥

सुवर्णनिर्मित पुष्पों की मालाओं के बीच-बीच में पिरोयी हुई बहुमूल्य मणियों से वह भवन सजा हुआ था। दीवारों में जड़ी हुई मुक्तामणियों से व्याप्त होकर जगमगा रहा था (अथवा वहाँ मोती और मणियोंके भण्डार भरे हुए थे)। चन्दन और अगर की सुगन्ध उसकी शोभा बढ़ा रही थी॥ ३३॥

गन्धान् मनोज्ञान् विसृजद् दार्दुरं शिखरं यथा।
सारसैश्च मयूरैश्च विनदद्भिर्विराजितम्॥ ३४॥

वह भवन मलयाचल के समीपवर्ती दर्दुर नामक चन्दनगिरि के शिखर की भाँति सब ओर मनोहर सुगन्ध बिखेर रहा था। कलरव करते हुए सारस और मयूर आदि पक्षी उसकी शोभावृद्धि कर रहे थे। ३४॥

सुकृतेहामृगाकीर्णमुत्कीर्णं भक्तिभिस्तथा।
मनश्चक्षुश्च भूतानामाददत् तिग्मतेजसा॥३५॥

सोने आदि की सुन्दर ढंग से बनी हुई भेड़ियों की मूर्तियों से वह व्याप्त था। शिल्पियों ने उसकी दीवारों में बड़ी सुन्दर नक्काशी की थी। वह अपनी उत्कृष्ट शोभा से समस्त प्राणियों के मन और नेत्रों को आकृष्ट कर लेता था॥ ३५ ॥

चन्द्रभास्करसंकाशं कुबेरभवनोपमम्।
महेन्द्रधामप्रतिमं नानापक्षिसमाकुलम्॥ ३६॥

चन्द्रमा और सूर्य के समान तेजस्वी, कुबेर-भवन के समान अक्षय सम्पत्ति से पूर्ण तथा इन्द्रधाम के समान भव्य एवं मनोरम उस श्रीरामभवन में नाना प्रकार के पक्षी चहक रहे थे॥३६॥

मेरुशृङ्गसमं सूतो रामवेश्म ददर्श ह।
उपस्थितैः समाकीर्णं जनैरञ्जलिकारिभिः॥ ३७॥

सुमन्त्रने देखा—श्रीराम का महल मेरु-पर्वत के शिखर की भाँति शोभा पा रहा है। हाथ जोड़कर श्रीराम की वन्दना करने के लिये उपस्थित हुए असंख्य मनुष्यों से वह भरा हुआ है॥ ३७॥

उपादाय समाक्रान्तैस्तदा जानपदैर्जनैः।
रामाभिषेकसुमुखैरुन्मुखैः समलंकृतम्॥ ३८॥

भाँति-भाँति के उपहार लेकर जनपद-निवासी मनुष्य उस समय वहाँ पहुँचे हुए थे। श्रीराम के अभिषेक का समाचार सुनकर उनके मुख प्रसन्नता से खिल उठे थे। वे उस उत्सव को देखने के लिये उत्कण्ठित थे। । उन सबकी उपस्थिति से भवन की बड़ी शोभा हो रही थी॥

महामेघसमप्रख्यमुदग्रं सुविराजितम्।
नानारत्नसमाकीर्णं कुब्जकैरपि चावृतम्॥३९॥

वह विशाल राजभवन महान् मेघखण्ड के समान ऊँचा और सुन्दर शोभा से सम्पन्न था। उसकी दीवारों में नाना प्रकार के रत्न जड़े गये थे और कुबड़े सेवकों से वह भरा हुआ था॥ ३९॥

स वाजियुक्तेन रथेन सारथिः समाकुलं राजकुलं विराजयन्।
वरूथिना राजगृहाभिपातिना पुरस्य सर्वस्य मनांसि हर्षयन्॥४०॥

सारथि सुमन्त्र राजभवन की ओर जाने वाले वरूथ (लोहे की चद्दर या सींकचों के बने हुए आवरण) सेयुक्त तथा अच्छे घोड़ों से जुते हुए रथ के द्वारा मनुष्यों की भीड़ से भरे राजमार्ग की शोभा बढ़ाते तथा समस्त नगर-निवासियों के मन को आनन्द प्रदान करते हुए श्रीराम के भवन के पास जा पहुँचे॥ ४०॥

ततः समासाद्य महाधनं महत् प्रहृष्टरोमा स बभूव सारथिः।
मृगैर्मयूरैश्च समाकुलोल्बणं गृहं वराहस्य शचीपतेरिव॥४१॥

उत्तम वस्तु को प्राप्त करने के अधिकारी श्रीराम का वह महान् समृद्धिशाली विशाल भवन शचीपति इन्द्र के भवन की भाँति सुशोभित होता था। इधर-उधर फैले हुए मृगों और मयूरों से उसकी शोभा और भी बढ़ गयी थी। वहाँ पहुँचकर सारथि सुमन्त्र के शरीर में अधिक हर्ष के कारण रोमाञ्च हो आया। ४१॥

स तत्र कैलासनिभाः स्वलंकृताः प्रविश्य कक्ष्यास्त्रिदशालयोपमाः।
प्रियान् वरान् राममते स्थितान् बहून् व्यपोह्य शुद्धान्तमुपस्थितौ रथी॥४२॥

वहाँ कैलास और स्वर्ग के समान दिव्य शोभा से युक्त, सुन्दर सजी हुई अनेक ड्यौढ़ियों को लाँघकर श्रीरामचन्द्रजी की आज्ञा में चलने वाले बहुतेरे श्रेष्ठ मनुष्यों को बीच में छोड़ते हुए रथसहित सुमन्त्र अन्तःपुर के द्वार पर उपस्थित हुए। ४२॥

स तत्र शुश्राव च हर्षयुक्ता रामाभिषेकार्थकृतां जनानाम्।
नरेन्द्रसूनोरभिमङ्गलार्थाः सर्वस्य लोकस्य गिरः प्रहृष्टाः॥४३॥

उस स्थान पर उन्होंने श्रीराम के अभिषेक-सम्बन्धी कर्म करने वाले लोगों की हर्षभरी बातें सुनीं, जो राजकुमार श्रीराम के लिये सब ओर से मङ्गलकामना सूचित करती थीं। इसी प्रकार उन्होंने अन्य सब लोगों की भी हर्षोल्लास से परिपूर्ण वार्ताओं को श्रवण किया। ४३॥

महेन्द्रसद्मप्रतिमं च वेश्म रामस्य रम्यं मृगपक्षिजुष्टम्।
ददर्श मेरोरिव शृङ्गमुच्चं विभ्राजमानं प्रभया सुमन्त्रः॥४४॥

श्रीराम का वह भवन इन्द्रसदन की शोभा को तिरस्कृत कर रहा था। मृगों और पक्षियों से सेवित होने के कारण उसकी रमणीयता और भी बढ़ गयी थी। सुमन्त्र ने उस भवन को देखा। वह अपनी प्रभा से प्रकाशित होने वाले मेरुगिरि के ऊँचे शिखर की भाँति सुशोभित हो रहा था॥ ४४॥

उपस्थितैरञ्जलिकारिभिश्च सोपायनैर्जानपदैर्जनैश्च।
कोट्या परार्धेश्च विमुक्तयानैः समाकुलं द्वारपदं ददर्श ॥ ४५ ॥

उस भवन के द्वार पर पहुँचकर सुमन्त्र ने देखाश्रीराम की वन्दना के लिये हाथ जोड़े उपस्थित हुए जनपदवासी मनुष्य अपनी सवारियों से उतरकर हाथों में भाँति-भाँतिके उपहार लिये करोड़ों और परार्धा की संख्या में खड़े थे, जिससे वहाँ बड़ी भारी भीड़ लग गयी थी॥ ४५ ॥

ततो महामेघमहीधराभं प्रभिन्नमत्यङ्कशमत्यसह्यम्।
रामोपवाह्यं रुचिरं ददर्श शत्रुञ्जयं नागमुदग्रकायम्॥४६॥

तदनन्तर उन्होंने श्रीराम की सवारी में आने वाले सुन्दर शत्रुञ्जय नामक विशालकाय गजराज को देखा, जो महान् मेघ से युक्त पर्वत के समान प्रतीत होता था। उसके गण्डस्थल से मद की धारा बह रही
थी। वह अंकुश से काबू में आने वाला नहीं था। उसका वेग शत्रुओं के लिये अत्यन्त असह्य था। उसका जैसा नाम था, वैसा ही गुण भी था॥ ४६॥

स्वलंकृतान् साश्वरथान् सकुञ्जरानमात्यमुख्यांश्च ददर्श वल्लभान्।
व्यपोह्य सूतः सहितान् समन्ततः समृद्धमन्तःपुरमाविवेश ह॥४७॥

उन्होंने वहाँ राजा के परम प्रिय मुख्य-मुख्य मन्त्रियों को भी एक साथ उपस्थित देखा, जो सुन्दर वस्त्राभूषणों से विभूषित थे और घोड़े, रथ तथा हाथियों के साथ वहाँ आये थे। सुमन्त्र ने उन सबको एक ओर हटाकर स्वयं श्रीराम के समृद्धिशाली अन्तःपुर में प्रवेश किया॥४७॥

ततोऽद्रिकूटाचलमेघसंनिभं महाविमानोपमवेश्मसंयुतम्।
अवार्यमाणः प्रविवेश सारथिः प्रभूतरत्नं मकरो यथार्णवम्॥४८॥

जैसे मगर प्रचुर रत्नों से भरे हुए समुद्र में बेरोकटोक प्रवेश करता है, उसी प्रकार सारथि सुमन्त्र ने पर्वत-शिखर पर आरूढ़ हुए अविचल मेघ के समान शोभायमान महान् विमान के सदृश सुन्दर गृहों से संयुक्त तथा प्रचुर रत्न-भण्डार से भरपूर उस महल में बिना किसी रोक-टोक के प्रवेश किया॥४८॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे पञ्चदशः सर्गः ॥१५॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में पंद्रहवाँ सर्ग पूरा हुआ।१५॥

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अयोध्याकाण्ड सर्ग- १-१५

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