श्री गरुड़ पुराण | Shri Garuda Puran Now In Hindi

श्री गरुड़ पुराण हिन्दी में


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श्री गरुड़ पुराण
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श्री गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण– वैष्णव सम्प्रदाय से सम्बन्धित एक महापुराण है। यह सनातन धर्म में मृत्यु के बाद सद्गति प्रदान करने वाला माना जाता है। इसलिये सनातन (हिन्दू धर्म) में मृत्यु के बाद गरुड़ पुराण के श्रवण का प्रावधान है। इस पुराण के अधिष्ठातृ देव भगवान विष्णु हैं।

यह स्वंय शिवजी द्वारा माता जगदम्बा से कही गई एक पवित्र कथा है। आप भी विस्तार पूर्वक पढ़े:
शिव-शक्ति श्रीराम मिलन (संपूर्ण भाग) 🌞

इसमें भक्ति, ज्ञान, वैराग्य, सदाचार, निष्काम कर्म की महिमा के साथ यज्ञ, दान, तप तीर्थ आदि शुभ कर्मों में सर्व साधारण को प्रवृत्त करने के लिये अनेक लौकिक और पारलौकिक फलों का वर्णन किया गया है। इसके अतिरिक्त इसमें आयुर्वेद, नीतिसार आदि विषयों के वर्णनके साथ मृत जीव के अन्तिम समय में किये जाने वाले कृत्यों का विस्तार से निरूपण किया गया है। आत्मज्ञान का विवेचन भी इसका मुख्य विषय है।

गरुड़ पुराण
लेखकवेदव्यास
देशभारत
भाषासंस्कृत [हिन्दी भावार्थ]
श्रृंखलापुराण
विषयविष्णु भक्ति
प्रकारवैष्णव ग्रन्थ
पृष्ठ१९,००० श्लोक [भावार्थ]
प्रस्तुत करताश्री मनीष कुमार चतुर्वेदी

अठारह पुराणों में गरुड़महापुराण का अपना एक विशेष महत्व है। इसके अधिष्ठातृदेव भगवान विष्णु है। अतः यह वैष्णव पुराण है। गरूड़ पुराण में विष्णु-भक्ति का विस्तार से वर्णन है। भगवान विष्णु के चौबीस अवतारों का वर्णन ठीक उसी प्रकार यहां प्राप्त होता है, जिस प्रकार ‘श्रीमद्भागवत‘ में उपलब्ध होता है।

आरम्भ में मनु से सृष्टि की उत्पत्ति, ध्रुव चरित्र और बारह आदित्यों की कथा प्राप्त होती है। उसके उपरान्त सूर्य और चन्द्र ग्रहों के मंत्र, शिव-पार्वती मंत्र, इन्द्र से सम्बन्धित मंत्र, सरस्वती के मंत्र और नौ शक्तियों के विषय में विस्तार से बताया गया है। इसके अतिरिक्त इस पुराण में श्राद्ध-तर्पण, मुक्ति के उपायों तथा जीव की गति का विस्तृत वर्णन मिलता है।

संरचना

‘गरुड़पुराण’ में उन्नीस हजार श्लोक कहे जाते हैं, किन्तु वर्तमान समय में उपलब्ध पाण्डुलिपियों में लगभग आठ हजार श्लोक ही मिलते हैं। गरुडपुराण के दो भाग हैं- पूर्वखण्ड तथा उत्तरखण्ड। पूर्वखण्ड में २२९ अध्याय हैं (कुछ पाण्डुलिपियों में २४० से २४३ तक अध्याय मिलते हैं)। उत्तरखण्ड में अलग-अलग पाण्डुलिपियों में अध्यायों की सख्या ३४ से लेकर ४९ तक है।

उत्तरखण्ड को प्रायः ‘प्रेतखण्ड’ या ‘प्रेतकल्प’ कहा जाता है। इस प्रकार गरुणपुराण का लगभग ९० प्रतिशत सामग्री पूर्वखण्ड में है और केवल १० प्रतिशत सामग्री उत्तरखण्ड में। पूर्वखण्ड में विविध प्रकार के विषयों का समावेश है जो जीव और जीवन से सम्बन्धित हैं। प्रेतखण्ड मुख्यतः मृत्यु के पश्चात जीव की गति एवं उससे जुड़े हुए कर्मकाण्डों से सम्बन्धित है।

सम्भवतः गरुणपुराण की रचना अग्निपुराण के बाद हुई। इस पुराण की सामग्री वैसी नहीं है जैसा पुराण के लिए भारतीय साहित्य में वर्णित है। इस पुराण में वर्णित जानकारी गरुड़ ने विष्णु भगवान से सुनी और फिर कश्यप ऋषि को सुनाई।

पहले भाग में विष्णु भक्ति और उपासना की विधियों का उल्लेख है तथा मृत्यु के उपरान्त प्रायः ‘गरूड़ पुराण’ के श्रवण का प्रावधान है।

दूसरे भाग में प्रेत कल्प का विस्तार से वर्णन करते हुए विभिन्न नरकों में जीव के पड़ने का वृत्तान्त है। इसमें मरने के बाद मनुष्य की क्या गति होती है, उसका किस प्रकार की योनियों में जन्म होता है, प्रेत योनि से मुक्त कैसे पाई जा सकती है, श्राद्ध और पितृ कर्म किस तरह करने चाहिए तथा नरकों के दारूण दुख से कैसे मोक्ष प्राप्त किया जा सकता है, आदि का विस्तारपूर्वक वर्णन प्राप्त होता है।

श्री गरुड़ पुराण कथा एवं वर्ण्य विषय

महर्षि कश्यप के पुत्र पक्षीराज गरुड़ को भगवान विष्णु का वाहन कहा गया है। एक बार गरुड़ ने भगवान विष्णु से मृत्यु के बाद प्राणियों की स्थिति, जीव की यमलोक-यात्रा, विभिन्न कर्मों से प्राप्त होने वाले नरकों, योनियों तथा पापियों की दुर्गति से संबंधित अनेक गूढ़ एवं रहस्ययुक्त प्रश्न पूछे। उस समय भगवान विष्णु ने गरुड़ की जिज्ञासा शान्त करते हुए उन्हें जो ज्ञानमय उपदेश दिया था, उसी उपदेश का इस पुराण में विस्तृत विवेचन किया गया है।

गरुड़ के माध्यम से ही भगवान विष्णु के श्रीमुख से मृत्यु के उपरान्त के गूढ़ तथा परम कल्याणकारी वचन प्रकट हुए थे, इसलिए इस पुराण को ‘गरुड़ पुराण’ कहा गया है। श्री विष्णु द्वारा प्रतिपादित यह पुराण मुख्यतः वैष्णव पुराण है। इस पुराण को ‘मुख्य गारुड़ी विद्या’ भी कहा गया है। इस पुराण का ज्ञान सर्वप्रथम ब्रह्माजी ने महर्षि वेद व्यास को प्रदान किया था। तत्पश्चात् व्यासजी ने अपने शिष्य सूतजी को तथा सूतजी ने नैमिषारण्य में शौनकादि ऋषि-मुनियों को प्रदान किया था।

प्राचीन काल में , भारत में  “वेद  ग्रन्थों की रचना हुई, यह प्राचीन काल के वैज्ञानिक उन्नति को दर्शाते थे, इन की भाषा बहुत कठिन थी। इन के मूल तत्वों को ले कर  “पुराण  ग्रन्थों “की उत्पत्ति हुई इस में कहानिओं के रूप में वैज्ञानिक उन्नति को दर्शाया गया। गरुडा पुराण  भी उन्ही अनेक पुरानों में से एक पुराण है।

संसार के लोगों में यह जिज्ञासा होनी स्वाभाविक है की मृतु  के बाद, प्राणी कहाँ जाता है  और उस की क्या गति होती है।

इस पुराण में परलोक का वर्णन तथा संसार के आवागमन से मुक्त होने की विधि भी वर्णित है। यह एक पवित्र वैश्नाब ग्रन्थ है और इस के अधीष्ट देव भगवान् विष्णु हैं। मनुष्य इस लोक से जाने के बाद अपने प्रलोकिक जीवन को किसपरकार सुख-समृद्ध और शान्तिप्रद बना सकता है तथा उस की मृतु के बाद उस प्राणी के उद्धार के लिए पुत्र-पौत्रदिक पारिवारिक जनों के कर्तव्य का विशेष वर्णन भी यहाँ प्राप्त होता है।

प्राचीन काल में, गरुडा की माता, “विनता” को सर्पों की माता “कद्रू” नें बंदी बना कर उस पर अनेक अत्याचार किये। गरुडा ने भगवन विष्णु की कड़ी तपस्या की। उस की श्रधा से खुश हो कर भगवन विष्णु ने उस की मनोकामनाओं को पूरण करते हुए, उसकी माताश्री को “कद्रू” की चुंगल से निकाला। साथ में उस की इच्छा अनुसार उसे अपना वाहान भी सवीकार किया और यह पुराण भी उस के नाम अर्पित किया जो की गरुडा पुराण की उपाधि से प्रसिद्ध हुआ।

वास्तव में सभी धर्म ग्रन्थों का मत एक ही है। सत्य कर्म करो, दूसरों को मन, वाणी से दुखित मत करो किसी की सहनशीलता को अपना सुख न बनाओ  इत्यादि। लोग दिन रात पूजा पाठ करते हैं परन्तु दूसरों के प्रति उन का व्यवहार कष्ट दायक और रूखा होता है। वह भूल जाते हैं की भगवान् उन से कभी खुश नहीं होते जो दूसरों को ठेस पहुंचाते हैं, उन के प्रति घृणा का भाव रखते हैं। कोई कैसे ही गुप्त रूप से ,छोटे से छोटा पाप कर्म करता है, वह प्रकृति की नजर से बच नहीं सकता। विधि का विधान सब पर लागू होता है, इस से बच निकलना किसी के लिए सम्भव नहीं है।

कई साहित्कार, विद्वानों का मत है कि, स्वर्ग, नर्क केवल काल्पनिक हैं।  इस धरती पर, जो पूरी तरह सम्पन्न हैं, जिन कि अपने क्रोद्ध, अहंकार, इच्छाओं पर संयम है, वह स्वर्ग में वास कर रहे हैं। इस के विपरीत दुसरे प्राणी, मन- शरीर से पीडत, नर्क का भोग, भोग रहे हैं।

यह गरुडा पुराण बहुत ही पवित्र और पुण्यदायक है। यह सभी पापों का विनाश एव सुनने वालों की समस्त कामनाओं का पूरक है। जो मनुष्य इस महा पुराण को सुने या इस का पाठ करे, तो वह प्राणी यमराज की भयंकर यातनाओं को तोड़ कर निष्पाप हो कर स्वर्ग को प्राप्त करता है।

इस उल्लेख के हिंदी व्याकरण में कुछ त्रुटियाँ सम्भवता हैं। कृपया उन पर ध्यान न दें।
इस लेख के माध्यम से आपका जीवन मंगलमय हो, यही हमारी शुभ कामना है।

यदि आप गरुड़ पुराण का विस्तार पूर्वक अध्ययन करना चाहते हैं तब कृपया दिए गए लिंक पर क्लिक कीजिए।

गरुड़ पुराण- प्रथम अध्याय
गरुड़ पुराण- दूसरा अध्याय
गरुड़ पुराण- तीसरा अध्याय
गरुड़ पुराण- चौथा अध्याय
गरुड़ पुराण- पाॅचवा अध्याय
गरुड़ पुराण- छठा अध्याय
गरुड़ पुराण- सातवाॅ अध्याय
गरुड़ पुराण- आठवाॅ अध्याय
गरुड़ पुराण- नवाॅ अध्याय
गरुड़ पुराण- दसवाॅ अध्याय
गरुड़ पुराण- ग्यारहवाॅ अध्याय
गरुड़ पुराण- बारहवाॅ अध्याय
गरुड़ पुराण- तेरहवाॅ अध्याय
गरुड़ पुराण- चौदहवाॅ अध्याय
गरुड़ पुराण- पंद्रहवाॅ अध्याय
गरुड़ पुराण- सोलहवाॅ अध्याय

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