आत्मिक चक्र | Spiritual Chakras

ये सात आत्मिक चक्र जगाए और संसारिक चक्र से परे हो जाए।


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आत्मिक चक्र

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कैसे अपने आत्मिक चक्र को जगाऐ..?

शरीर के सात आत्मिक चक्र, उनकी स्थिति और जाग्रत करने का प्रभाव

हिन्दू और बौद्ध धारणा के अनुसार, चक्र हमारे शरीर में ऊर्जा के विशाल कुंड होते हैं, जो हमारे मनोवैज्ञानिक गुणों को नियंत्रित करते हैं। मुख्य चक्रों की संख्या कुल मिलाकर सात बताई गई है; चार शरीर के ऊपरी भाग में, जो हमारे मानसिक गुणों को नियंत्रित करते हैं और तीन शरीर के निचले भाग में, जो हमारे सहज वृत्ति गुणों को नियंत्रित करते हैं।

शरीर के सात चक्र हमारे शरीर में मौजूद कई चक्रों में से प्रमुख चक्र हैं। ये चक्र ऊर्जा के स्रोत होते हैं जो हमे मानसिक और शारीरिक रूप से मजबूत या कमजोर बना सकते हैं। इनके सक्रिय या निष्क्रिय होने से हमारा जीवन प्रभावित रहता है। उपनिषदों में इनका वर्णन मिलता है।

सामान्य अवस्था में ये चक्र निष्क्रिय अवस्था में होते हैं। इन्हें जागृत किया जा सकता है। शरीर के चक्र जागृत होने पर अत्यंत लाभकारी सिद्ध होते हैं तथा मानव को उन्नति की और अग्रसर करते हैं। सभी चक्र सम्पूर्ण रूप से जागृत होने पर इसे ”कुंडली जागरण” की अवस्था कहते हैं, जो मनुष्य का सर्व शक्तिमान रूप होता है।

चक्र मन्त्र और ध्यान की सहायता से जाग्रत किये जाते है। इन चक्रों को फूल के रूप में दर्शाया जाता है जिसमे अलग संख्या की पंखुडियां होती हैं। प्रत्येक चक्र का एक अलग अक्षर रुपी मन्त्र और एक अलग रंग होता है।

शरीर में स्थित सात चक्रों के नाम, उनका स्थान, उनके रंग, पंखुड़ी की संख्या और चक्र जागृत करने का प्रभाव आदि इस प्रकार होते हैं:-

1. मूलाधार चक्र 2. स्वाधिष्ठान चक्र 3. मणिपुर चक्र 4. अनाहत चक्र 5. विशुद्धि चक्र 6. आज्ञा चक्र 7. सहस्रार चक्र

बुद्धिस्ट और हिन्दू शिक्षा के अनुसार, सभी चक्रों को मानव के भलाई में योगदान करना चाहिए। हमारी सहज वृत्ति हमारे भावनाओं और विचारों के शक्तियों से सम्बद्ध हो जाएगी। आमतौर पर हमारे कुछ चक्र पूरी तरह से खुले हुए नहीं होते हैं (जिसका अर्थ है कि वे आपके जन्म के समय जैसे ही कार्य करते हैं), लेकिन कुछ अतिसक्रिय होते हैं अथवा लगभग बंद होते हैं। यदि चक्रों को संतुलित न किया जाए तो स्वयं के साथ शांति स्थापित नहीं हो सकती है।

चक्रों की अनुभूति प्राप्त करने की कला को जानने के लिए और साथ ही उन्हें खोलने के लिए डिज़ाइन की गई एक विश्वसनीय तकनीक के बारे में जानने के लिए आगे पढ़ें।

चरण

यदि आप चक्रों को खोल रहे हैं तो समझ लें कि अतिसक्रिय चक्रों को कम सक्रिय करने के प्रयास की कोई आवश्यकता नहीं है:

वे मात्र बंद चक्रों की निष्क्रियता से उत्पन्न कमी को पूरा करते हैं। एक बार जब सारे चक्र खुल जात हैं तब ऊर्जा बराबर हो जाती है और संतुलित हो जाती है।

1. मूलाधार चक्र

यह प्रथम चक्र रीढ़ की हड्डी के आधार पर गुदा और लिंग के बीच स्थित होता है। यह आधार चक्र भी कहलाता है। इस चक्र का मन्त्र ”लं” है। इसका रंग लाल है। इसे 4 पंखुड़ी वाले फूल के रूप में दर्शाया जाता है। ये पंखुडियां मानवता, बुद्धि, चित्त और अहंकार की प्रतीक हैं। इस चक्र का तत्व धरती है।

मूलाधार चक्र (Mooladhar chakra) को जागृत करने से चेतना और मानवता का विकास होने लगता है। इसके अलावा वीरता, निर्भीकता तथा आनंद का भाव महसूस होने लगता है।

जिस व्यक्ति में यह चक्र असंतुलित होता है तो वह सांसारिक चीजों को अधिक महत्त्व देता है, असुरक्षित और बैचेनी महसूस करता है तथा अकेला रहना पसंद करता है। उसे भोजन और नींद अधिक प्रिय होते हैं।

मूलाधार चक्र (लाल) को खोलें:

यह चक्र भौतिक रूप से भिज्ञ (physically aware) होने और अधिकांश स्थितियों में सहज महसूस करने पर आधारित है। इसके खुल जाने के बाद, आपको स्वयं को सुसंतुलित (well-balanced) और समझदार, स्थिर और सुरक्षित महसूस करना चाहिए। आप अकारण ही अपने आस-पास के लोगों पर अविश्वास नहीं करते हैं। आप, जो भी घटित हो रहा है उसमें स्वयं को उपस्थित और अपने भौतिक शरीर से अत्यधिक जुड़े हुए, महसूस करते हैं। यदि यह कम सक्रिय है: आप भयभीत या नर्वस रहते हैं और आसानी से अपने को अवांछनीय समझने लगते हैं। यदि यह अतिसक्रिय है: आप भौतिकवादी और लोभी हो सकते हैं। आपको ऐसा लगता है जैसे कि आपको सुरक्षित होना चाहिए और किसी भी परिवर्तन के लिए आप अवांछनीय हैं।

शरीर का प्रयोग करें और उससे भिज्ञ (aware) होएँ। योगा करें, ब्लॉक के चारों ओर टहलें या घर की साफ-सफाई का काम शारीरिक रूप से करें। ये गतिविधियां आपको अपने शरीर का ज्ञान कराती हैं और चक्र को सशक्त बनाती हैं।

भूमि पर बैठ जाएँ। इसका अर्थ ये है कि आपको भूमि से जुड़ जाना चाहिए और उसे अपने नीचे महसूस करना चाहिए। इसे करने के लिए, सीधे आराम से खड़े हो जाएँ, अपने पैरों के बीच कंधों की चौड़ाई के बराबर दूरी बना लें और घुटनों को हल्का सा मोड़ें। अपने कूल्हे को थोड़ा सा आगे की ओर बढ़ाएँ और अपने शरीर का संतुलन इस तरह बनाए कि आपके शरीर का भार आपके पैरों के तलवों पर समान रूप से वितरित हो जाए। इसके बाद अपने भार को नीचे की ओर ले जाएँ। इस स्थिति में कई मिनट तक बने रहें।

भूमि पर बैठने के बाद आप पालथी मार लें।

अपने अंगूठे और तर्जनी के सिरों को, शांतिपूर्ण गति से, आपस में हल्के से स्पर्श करने दें।

जननांगों और गुदा के बीच के बिन्दु पर स्थित मूलाधार चक्र, और वह जिस चीज के लिए है, उस पर ध्यान केन्द्रित करें।

खामोशी से, तथापि स्पष्टता से, “लं” का मंत्रोच्चार करें। मंत्र का जाप करें

इस पूरे समय, अपने को रिलैक्स होने दें, चक्र और उसके अर्थ के बारे में सोचते हुए तथा यह भी कि वह किस तरह आपके जीवन को प्रभावित करता है या प्रभावित करना चाहिए।

इसे तब तक करें जब तक आप पूर्णतया रिलैक्स न हो जाएं। आपको एक “स्वच्छ” अनुभूति हो सकती है।

एक बंद लाल फूल की कल्पना करें। इसे प्रकाशित करती हुई एक अत्यंत शक्तिशाली ऊर्जा की कल्पना करें: यह धीरे-धीरे खुलती है और ऊर्जा से भरी हुए चार पंखुड़ियां दिखाई पड़ने लगती हैं।

श्वांस को रोक कर मूलाधार को संकुचित करें और ढीला छोड़ दें।

2. स्वाधिष्ठान चक्र

यह दुसरा चक्र त्रिकास्थि के निचले छोर में स्थित होता है। इसका मन्त्र ”वं“ है। इसे 6 पंखुड़ी वाले कमल के फूल के रूप में दर्शाया जाता है। ये पंखुड़ीयां क्रोध, घृणा, वैमनस्य, क्रूरता, अभिलाषा, और गर्व की प्रतीक हैं। इन पर विजय पाना लक्ष्य होता है। इसके अलावा ये विकास में बाधक 6 अवगुण आलस, डर, संदेह, इर्ष्या, लोभ और प्रतिशोध का भी संकेतक है।

स्वाधिष्ठान चक्र (Swadhishthan chakra) का रंग नारंगी (Orange) तथा तत्व जल है। यह सकारात्मक गुणों का प्रतीक है। इस चक्र में प्रसन्नता, निष्ठा, आत्म विश्वास और उर्जा जैसे गुण पैदा होते हैं।

इस चक्र के संतुलित होने पर ईमानदारी और नैतिकता के गुण आते हैं। ख़ुशी और आनंद का पूर्ण अनुभव होता है। रचनात्मक विचार बढ़ जाते हैं।

स्वाधिष्ठान चक्र (नारंगी) को खोलें:

यह चक्र भावनाओं और कामुकता पर कार्य करता है। यदि यह खुला है: भावना स्वतन्त्रता के साथ मुक्त हो जाती है और, आपके बिना अति-भावुक हुए, व्यक्त हो जाती है। आपके आत्मीयता के द्वार खुल जाएंगे और आप अनुरागी तथा बहिर्गामी हो सकते हैं। आपको कामुकता पर आधारित कोई समस्या भी नहीं रहती है। यदि यह कम सक्रिय है: आप भावहीन या आवेगहीन होते हैं और किसी से भी नहीं खुलते हैं। यदि यह अतिसक्रिय है: आप हर समय संवेदनशील और भावुक होते हैं। आप अत्यधिक कामुक भी हो सकते हैं।

पीठ को सीधा परंतु ढीला रखते हुए अपने घुटनों पर बैठ जाएँ।

हथेलियों को ऊपर कि दिशा में रखते हुए, अपने हाथों को एक दूसरे के ऊपर करके गोद में रख लें। बाएँ हाथ को इस प्रकार नीचे रखेँ कि उसकी हथेली दाहिने हाथ के उँगलियों के पिछले भाग को स्पर्श करे और अंगूठे आपस में हल्के से स्पर्श करें।

पीठ के निचले हिस्से में स्थित स्वाधिष्ठान चक्र, और वह जिस चीज के लिए है, उस पर ध्यान केन्द्रित करें।

खामोशी से, तथापि स्पष्टता से, “वं” का मंत्रोच्चार करें। मंत्र का जाप करें

इस पूरे समय, अपने को रिलैक्स होने दें, चक्र और उसके अर्थ के बारे में अभी भी सोचते हुए कि वह किस तरह आपके जीवन को प्रभावित करता है या प्रभावित करना चाहिए।

इसे तब तक करें जब तक आप पूर्णतया रिलैक्स न हो जाएं। पुनः, आपको एक “स्वच्छ” अनुभूति हो सकती है।

3. मणिपुर चक्र

यह तीसरा चक्र नाभि केंद्र में स्थित होता है। इसका मन्त्र “रं” है। इसका रंग पीला होता है। इसका तत्व अग्नि है अतः इसे सूर्य केंद्र भी कहा जाता है। इसे 10 पंखुड़ी वाले फूल के रूप में दर्शाया जाता है। मणिपुर चक्र (Manipur chakra) को जाग्रत करने से ज्ञान, बुद्धि, आत्म विश्वास, नेतृत्व और सही निर्णय लेने की क्षमता जैसे गुण विकसित होते हैं।

इस चक्र में अवरोध होने पर पाचन तंत्र में खराबी, ब्लड प्रेशर का ज्यादा या कम होना, डायबिटीज जैसी परेशानी हो सकती है। इसके अलावा यह चक्र कम सक्रीय हो तो व्यक्ति में असफलता से भय तथा आत्म विश्वास कम होना जैसे लक्षण हो सकते हैं।

मणिपुर चक्र (पीला) को खोलें:

यह चक्र आत्मविश्वास को परिवेष्टित करता है खास कर तब, जब आप एक समूह में हों। जब यह खुला रहता है तो आपको नियंत्रण में होना महसूस होना चाहिए तथा अपने अंदर गौरव होने की अच्छी अनुभूति होनी चाहिए। यदि यह कम सक्रिय है: आप निष्क्रिय और अनिर्णायक होते हैं। आप बार-बार भयभीत हो सकते हैं और यह आपको कोई प्रतिफल भी नहीं देता है। यदि यह अतिसक्रिय है: आप अभिमानी और आक्रामक होते हैं।

पीठ को सीधा परंतु ढीला रखते हुए अपने घुटनों पर बैठ जाएँ।

अपने हाथों को, अपने मणिपुर चक्र से थोड़ा नीचे, अपने पेट के सामने लाएँ। उँगलियों के सिरों को इस तरह मिलाएँ कि वे सब आपसे दूर इंगित करें। अंगूठों को क्रास कराएं और उँगलियों को सीधा कर लें (यह महत्वपूर्ण है)।

नाभि से थोड़ा ऊपर, रीढ़ की हड्डी पर स्थित मणिपुर चक्र, और वह जिस चीज के लिए है, उस पर ध्यान केन्द्रित करें।

खामोशी से, तथापि स्पष्टता से, “रं” का मंत्रोच्चार करें। मंत्र का जाप करें

इस पूरे समय, अपने को और रिलैक्स होने दें, चक्र और उसके अर्थ के बारे में लगातार सोचते हुए तथा यह भी कि वह किस तरह आपके जीवन को प्रभावित करता है या प्रभावित करना चाहिए।

इसे तब तक करें जब तक पूर्णतया रिलैक्स न हो जाएं। आपको एक “स्वच्छ” अनुभूति होनी चाहिए (प्रत्येक चक्र के लिए)।

4. अनाहत चक्र

यह चौथा चक्र ह्रदय के पास सीने में मध्य में स्थित होता है। इसे ह्रदय चक्र भी कहते हैं। इसका मन्त्र “यं“ है। इसका रंग हरा होता है। इसे 12 पंखुड़ी वाले कमल के रूप में दर्शाया जाता है जो शांति, व्यवस्था, प्रेम, संज्ञान, स्पष्टता, शुद्धता, एकता, अनुकंपा, दयालुता, क्षमाभाव और सुनिश्चिय को दर्शाती हैं। (Anahat chakra) अनाहत चक्र को जाग्रत करने से निस्वार्थ प्रेम तथा क्षमा की भावना पैदा होती है। ऐसा व्यक्ति सबका प्रिय बन जाता है।

जिस व्यक्ति में यह चक्र असंतुलित होता है उसमे भावनाओं पर काबू ना रहना, खुद से नफरत करना, इर्ष्या, हताशा, उदासीनता जैसे लक्षण दिखाई देते हैं।

अनाहत चक्र (हरा) को खोलें:

यह चक्र प्रेम, परवाह करने तथा लाड़-प्यार के बारे में सब कुछ है। जब यह खुला रहता है तब हमेशा सौहार्दपूर्ण रिश्तों में कार्य करते हुए आप दयालु और मित्रवत प्रतीत होते हैं। यदि यह कम सक्रिय है: आप सर्द-मिज़ाज और अमैत्रीपूर्ण होते हैं। यदि यह अतिसक्रिय है: आप लोगों के प्रति इतने “स्नेही” होते हैं कि आप उनका दम ही घोंट देते हैं और इसके कारण आप स्वार्थी की तरह समझे जा सकते हैं।

पालथी मार कर बैठें।

अपने दोनों हाथों में तर्जनी और अंगूठे के सिरों को स्पर्श करने दें।

अपने बाएँ हाथ को अपने बाएँ घुटने पर रखें और दाहिने हाथ को छाती के निचले हिस्से के सामने रखें।

हृदय के स्तर पर, रीढ़ की हड्डी पर स्थित अनाहत चक्र, और वह जिस चीज के लिए है, उस पर ध्यान केन्द्रित करें।

खामोशी से, तथापि स्पष्टता से, “यं” का मंत्रोच्चार करें। मंत्र का जाप करें

इस पूरे समय, अपने शरीर को रिलैक्स होते रहने दें तथा चक्र और उसके अर्थ के बारे में सोचें कि वह किस तरह आपके जीवन को प्रभावित करता है या प्रभावित करना चाहिए।

इसे तब तक करें जब तक आप पूर्णतया रिलैक्स न हो जाएं और “स्वच्छ” अनुभूति आपके शरीर के अंदर वापस न आ जाए और/या तीव्र न हो जाए।

5. विशुद्धि चक्र

यह पांचवां चक्र कंठ में स्थित होता है, इसका मन्त्र “हं“ है। इसका रंग बैंगनी होता है। इसे 16 पंखुड़ी वाले फूल के रूप में दर्शाया जाता है जो उन सोलह कलाओं का प्रतीक है जो इन्सान का विकास करती हैं। इसे कंठ चक्र भी कहते हैं।इसका तत्त्व आकाश (अंतरिक्ष) है।

विशुद्धि चक्र (Vishuddhi chakra) प्रसन्नता की अनगिनत भावनाओं और स्वतंत्रता को दर्शाता है जो हमारी योग्यता और कुशलता को प्रफुल्लित करता है। विकास के इस स्तर के साथ, एक स्पष्ट वाणी, गायन और भाषण की प्रतिभा के साथ-साथ एक संतुलित और शांत विचार भी होते हैं।

विशुद्धि चक्र में अवरोध चिन्ता की भावनाएं, स्वतंत्रता का अभाव, बंधन और कंठ की समस्याएं उत्पन्न करता है। कुछ शारीरिक कठिनाइयों, जैसे सूजन और वाणी में रुकावट का भी सामना करना पड़ सकता है।

विशुद्धि चक्र (हल्का नीला) खोलें:

यह चक्र आत्म-अभिव्यक्ति तथा सम्प्रेषण पर आधारित है। जब चक्र खुला रहता है तो आत्म-अभिव्यक्ति आसान हो जाती है और कला, इसे करने का एक उत्तम मार्ग प्रतीत होने लगता है। यदि यह कम सक्रिय है: आप ज्यादा नहीं बोलते हैं जिसके कारण आपको शर्मीला मान लिया जाता है। यदि आप अक्सर झूठ बोलते हैं तो ये चक्र अवरुद्ध हो सकता है। यदि यह अतिसक्रिय है: आप इतना अधिक बोलने लगते हैं कि बहुत सारे लोगों को चिढ़ हो जाती है। आप एक काफ़ी खराब श्रोता भी हो सकते हैं।

एक बार पुनः, अपने घुटनों पर बैठें।

अंगूठे को छोड़कर शेष उँगलियों को अपने हाथों के अंदर की तरफ क्रास कर लें। अँगूठों के सिरों को आपस में मिलाकर थोड़ा सा ऊपर की ओर खींचें।

गले के आधार पर स्थित विशुद्धि चक्र, और वह जिस चीज के लिए है, उस पर ध्यान केन्द्रित करें।

खामोशी से, तथापि स्पष्टता से, “हं” का मंत्रोच्चार करें। मंत्र का जाप करें

इस पूरे समय अपने शरीर को रिलैक्स होने दें तथा चक्र और उसके अर्थ के बारे में सोचें कि वह किस तरह आपके जीवन को प्रभावित करता है या करना चाहिए।

इसे लगभग पाँच मिनट तक करते रहें और “स्वच्छ” अनुभूति एक बार फिर तीव्र हो जाएगी।

6. अजना चक्र (आज्ञा चक्र)

यह छठा मस्तक पर भोहों के बीच स्थित होता है। इसे तीसरा नेत्र भी कहते हैं। इसका मन्त्र ॐ तथा रंग सफ़ेद होता है। आज्ञा चक्र के प्रतीक चित्र में दो पंखुडिय़ों वाला एक कमल है जो यह बताता है कि चेतना के इस स्तर पर आत्मा और परमात्मा (स्व और ईश्वर) ही हैं। इस स्तर पर केवल शुद्ध मानव और दैवी गुण होते हैं।

आज्ञा चक्र (Agya chakra) के जाग्रत होने से अध्यात्मिक जागरूकता, आत्मचिंतन तथा स्पष्ट विचार की प्राप्ति होती है। सभी सोई हुए शक्ति जाग उठती हैं और व्यक्ति एक ज्ञानवान सिद्ध व्यक्ति बन जाता है।

आज्ञा चक्र के स्थान पर तीनो प्रमुख नाड़ी इडा , पिंगला और सुषुम्ना की ऊर्जा मिलकर आगे उठती है तो समाधी और सर्वोच्च चेतना प्राप्त होती है।

इस चक्र को योगहृदय वृत्त, हृदय अधर और सुखमन भी कहा जाता है।

इस चक्र में अवरोध होने पर व्यक्ति की परिकल्पना और विवेक की शक्ति कम हो जाती है तथा वह भ्रम की स्थिति में होता है।

आज्ञा चक्र (गहरा नीला) खोलें:

अपने नाम के अनुरूप, यह चक्र अंतर्दृष्टि पर कार्य करता है। जब खुला रहता है तब आपके पास उत्तम अतींद्रिय दृष्टि होती है और आप बहुत अधिक स्वप्न देखने लगते हैं। यदि यह कम सक्रिय है: आप अन्य लोगों पर, आपके लिए सोचने के लिए, निर्भर बन जाते हैं। धारणाओं पर बार-बार भरोसा करने के कारण आप अधिकांशतः असपष्ट भी होते हैं। यदि यह अतिसक्रिय है: आप दिन भर कल्पना की दुनिया में रहते हैं। इसकी चरम सीमा पर आप बारंबार दिवास्वप्न या मतिभ्रम के भी शिकार हो सकते हैं।

पालथी मार कर बैठें।

अपने हाथों को छती के निचले हिस्से के सामने रखें। दोनों हाथों के बीच की उंगली (मध्यमा) सीधी होनी चाहिए और उनके सिरे आपस में इस तरह स्पर्श करने चाहिए कि उनकी दिशा आपसे दूर इंगित करें। अन्य उँगलियाँ मुड़ी हों और दोनों ऊपरी पोर पर स्पर्श कर रही हों। अंगूठे के सिरे आपके दिशा में इंगित करते हुए स्पर्श कर रहे हों।

दोनों भौंहों के केंद्र से थोड़ा उपर स्थित आज्ञा चक्र, और वह जिस चीज के लिए है, उस पर ध्यान केन्द्रित करें।

खामोशी से, तथापि स्पष्टता से, “ॐ” या “औं” का मंत्रोच्चार करें। मंत्र का जाप करें

इस पूरे समय, शरीर थोड़ा स्वाभाविक रूप से रिलैक्स हो जाना चाहिए और चक्र तथा उसके अर्थ के बारे में सोचते रहें कि वह किस तरह आपके जीवन को प्रभावित करता है या करना चाहिए।

इसे तब तक करते रहें जब तक वही “स्वच्छ” अनुभूति वापस आती हुई या तीव्र होती हुई न लगने लगे।

7. सहस्रार चक्र

यह सातवां सिर के शिखर पर स्थित होता है। इसका मन्त्र “ङ” तथा रंग बैंगनी होता है। इसे हजार पंखुड़ी वाला कमल और ब्रह्म रंध्र भी कहा जाता है। सहस्रार चक्र का कोई विशेष रंग या गुण नहीं है। यह विशुद्ध प्रकाश है, जिसमें सभी रंग हैं। सभी नाडिय़ों की ऊर्जा इस केन्द्र में एक हो जाती है।

सहस्रार चक्र (Sahasrar chakra) में एक महत्त्वपूर्ण शक्ति मेधा शक्ति होती है जो स्मरण शक्ति, एकाग्रता और बुद्धि को प्रभावित करती है। सहस्रार चक्र के जाग्रत होने का अर्थ है दैवी चमत्कार और सर्वोच्च चेतना का दर्शन। सहस्रार चक्र के जागरण से अज्ञानता पूर्णतया नष्ट हो जाती है।

ध्यान में योगी, समाधि के उच्चतम स्तर द्वारा सहस्रार चक्र पर पहुँचते हैं, जहाँ मन पूरी तरह निश्चल हो जाता है और ज्ञान, ज्ञाता और ज्ञेय एक में ही समाविष्ट होकर पूर्णता को प्राप्त होते हैं।

सहस्रार चक्र (बैंगनी) खोलें:

यह सातवाँ और सबसे अधिक आत्मिक चक्र है। यह चक्र बुद्धिमत्ता तथा ब्रह्मांड से एकीकृत होने को परिवेष्टित करता है। जब यह चक्र खुला रहता है तब आपके टु-डू लिस्ट (To Do list) में से पक्षपात लुप्त हो जाता है और आप संसार तथा उससे अपने संबंध के बारे में अधिक भिज्ञ प्रतीत होते हैं। यदि यह कम सक्रिय है: आप अधिक आध्यात्मिक नहीं होते हैं और अपने विचारों में काफ़ी अड़ियल हो सकते हैं। यदि यह अतिसक्रिय है: आप चीजों को हर समय बुद्धिसंगत करते हैं। आध्यात्मिकता सबसे पहले आपके मस्तिष्क में आती हुई प्रतीत होती है और यदि आप वास्तव में अतिसक्रिय हैं तो आप अपने शारीरिक आवश्यकताओं (भोजन, जल, आश्रय) की भी उपेक्षा कर सकते हैं।

पालथी मार कर बैठें।

हाथों को अपने पेट पर रखें। छोटी उँगलियों (कनिष्ठाओं) को उनके सिरों पर इस तरह स्पर्श करने दें कि वे ऊपर आपसे दूर इंगित करें तथा शेष उँगलियों को आपस में इस तरह क्रास करें कि बायाँ अंगूठा आपके दाहिने अंगूठे के नीचे रहे।

अपने सिर के ठीक उपर स्थित सहस्रार चक्र, और वह जिस चीज के लिए है, उस पर ध्यान केन्द्रित करें।

खामोशी से, तथापि स्पष्टता से, “ङ” (हाँ, इसका मंत्रोच्चार उतना ही कठिन है जितना यह दिखाई देता है) का मंत्रोच्चार करें। मंत्र का जाप करें

इस पूरे समय, अब आपका शरीर पूर्णतया रिलैक्स हो चुका होना चाहिए और आपका दिमाग शांत होना चाहिए। तथापि, सहस्रार चक्र पर ध्यान केन्द्रित करना बंद न करें।

यह ध्यान सबसे लंबा होता है और इसमें दस मिनट से कम समय नहीं लगना चाहिए।

चेतावनी: यदि आपका मूलाधार चक्र सशक्त या खुला हुआ न हो तो सहस्रार के लिए इस मेडिटेशन का प्रयोग न करें। इस अंतिम चक्र पर कार्य करने से पूर्व, सर्वप्रथम आपको एक सशक्त “नींव” की आवश्यकता होती है जो आपको मूलाधार के अभ्यास से मिलेगी।

सलाह

  • यदि आप एक नौसिखिया हैं तो आवश्यकता से अधिक मेडिटेशन करने का प्रयास न करें।
  • प्रतिदिन मेडिटेशन करने का प्रयास करें भले ही आपके पास ज्यादा समय न हो, इसे उतने ही देर तक करें जितनी आपकी इच्छा हो।
  • ”आज्ञा चक्र” को सक्रिय करते समय उस स्थान पर गोलाई में चारों ओर हल्के से रगड़ें जहां पर आज्ञा चक्र निकलता है।
  • किसी शांत और गरम स्थान पर बैठें, इस एक्सर्साइज़ को आप वैसा ही समझें जैसे कि एक मेडिटेशन। गर्मियों में, आप किसी मैदान या बागीचे में बैठ सकते हैं। जाड़ों में किसी गरम कमरे का प्रयोग करें जहां ध्यान न भटक सके। यदि आपके पास एक वाष्पकक्ष (sauna) हो (यद्यपि यह बहुत कम लोगों के पास होता है), तो यह बैठने, अपने को शांत करने और निर्विचारिता के लिए एक उत्तम स्थान होता है।
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आत्मिक चक्र FAQ?

मूलाधार चक्र क्या है और इसे कैसे जाग्रत करते है?

यह पहला चक्र रीढ़ की हड्डी के आधार पर गुदा और लिंग के बीच स्थित होता है। इसे 4 पंखुड़ी वाले फूल के रूप में दर्शाया जाता है। ये पंखुडियां मानवता , बुद्धि , चित्त और अहंकार की प्रतीक हैं। इस चक्र का तत्व धरती है। मूलाधार चक्र को जागृत करने से चेतना और मानवता का विकास होने लगता है। इसके अलावा वीरता, निर्भीकता तथा आनंद का भाव महसूस होने लगता है। इस चक्र का मन्त्र ” लं ”  है। इसका रंग लाल है। विस्तार पूर्वक पढ़ें:

आत्मिक चक्र | Spiritual Chakras

स्वाधिष्ठान चक्र क्या है और इसे कैसे जाग्रत करते है?

यह दुसरा चक्र त्रिकास्थि के निचले छोर में स्थित होता है। इसे 6 पंखुड़ी वाले कमल के फूल के रूप में दर्शाया जाता है। ये पंखुड़ीयां क्रोध , घृणा , वैमनस्य , क्रूरता , अभिलाषा , और गर्व की प्रतीक हैं। इन पर विजय पाना लक्ष्य होता है। इसके अलावा ये विकास में बाधक 6 अवगुण आलस , डर , संदेह , इर्ष्या , लोभ और प्रतिशोध का भी संकेतक है। इसका मन्त्र ” वं “ है। इसका रंग नारंगी तथा तत्व जल है। विस्तार पूर्वक पढ़ें:

आत्मिक चक्र | Spiritual Chakras

मणिपुर चक्र क्या है और इसे कैसे जाग्रत करते है?

यह तीसरा चक्र नाभि केंद्र में स्थित होता है। इसे सूर्य केंद्र भी कहा जाता है। इसे 10 पंखुड़ी वाले फूल के रूप में दर्शाया जाता है। मणिपुर चक्र को जाग्रत करने से ज्ञान , बुद्धि , आत्म विश्वास , नेतृत्व और सही निर्णय लेने की क्षमता जैसे गुण विकसित होते हैं। इसका मन्त्र “ रं ” है। इसका रंग पीला होता है। इसका तत्व अग्नि है। विस्तार पूर्वक पढ़ें:

आत्मिक चक्र | Spiritual Chakras

अनाहत चक्र क्या है और इसे कैसे जाग्रत करते है?

यह चौथा चक्र ह्रदय के पास सीने में मध्य में स्थित होता है। इसे ह्रदय चक्र भी कहते हैं। इसे 12 पंखुड़ी वाले कमल के रूप में दर्शाया जाता है जो शांति , व्यवस्था , प्रेम , संज्ञान , स्पष्टता , शुद्धता, एकता, अनुकंपा, दयालुता, क्षमाभाव और सुनिश्चिय को दर्शाती हैं। अनाहत चक्र को जाग्रत करने से निस्वार्थ प्रेम तथा क्षमा की भावना पैदा होती है। ऐसा व्यक्ति सबका प्रिय बन जाता है। इसका मन्त्र “यं “ है। इसका रंग हरा होता है। विस्तार पूर्वक पढ़ें:

आत्मिक चक्र | Spiritual Chakras

विशुद्धि चक्र क्या है और इसे कैसे जाग्रत करते है?

यह पांचवां चक्र कंठ में स्थित होता है। इसे 16 पंखुड़ी वाले फूल के रूप में दर्शाया जाता है जो उन सोलह कलाओं का प्रतीक है जो इन्सान का विकास करती हैं। इसे कंठ चक्र भी कहते हैं।इसका तत्त्व आकाश (अंतरिक्ष) है। विशुद्धि चक्र प्रसन्नता की अनगिनत भावनाओं और स्वतंत्रता को दर्शाता है जो हमारी योग्यता और कुशलता को प्रफुल्लित करता है। विकास के इस स्तर के साथ, एक स्पष्ट वाणी, गायन और भाषण की प्रतिभा के साथ-साथ एक संतुलित और शांत विचार भी होते हैं। इसका मन्त्र “ हं “ है। इसका रंग बैंगनी होता है। विस्तार पूर्वक पढ़ें:

आत्मिक चक्र | Spiritual Chakras

आज्ञा चक्र क्या है और इसे कैसे जाग्रत करते है?

यह छठा चक्र मस्तक पर भोहों के बीच स्थित होता है। इसे तीसरा नेत्र भी कहते हैं। आज्ञा चक्र के प्रतीक चित्र में दो पंखुडिय़ों वाला एक कमल है जो यह बताता है कि चेतना के इस स्तर पर आत्मा और परमात्मा (स्व और ईश्वर) ही हैं। इस स्तर पर केवल शुद्ध मानव और दैवी गुण होते हैं। आज्ञा चक्र के जाग्रत होने से अध्यात्मिक जागरूकता, आत्मचिंतन तथा स्पष्ट विचार की प्राप्ति होती है। सभी सोई हुए शक्ति जाग उठती हैं और व्यक्ति एक ज्ञानवान सिद्ध व्यक्ति बन जाता है। इसका मन्त्र “ॐ” तथा रंग सफ़ेद होता है। विस्तार पूर्वक पढ़ें:

आत्मिक चक्र | Spiritual Chakras

सहस्रार चक्र क्या है और इसे कैसे जाग्रत करते है?

यह सातवां सिर के शिखर पर स्थित होता है। इसे हजार पंखुड़ी वाला कमल और ब्रह्म रंध्र भी कहा जाता है। सहस्रार चक्र का कोई विशेष रंग या गुण नहीं है। यह विशुद्ध प्रकाश है, जिसमें सभी रंग हैं। सभी नाडिय़ों की ऊर्जा इस केन्द्र में एक हो जाती है। सहस्रार चक्र में एक महत्त्वपूर्ण शक्ति मेधा शक्ति होती है जो स्मरण शक्ति, एकाग्रता और बुद्धि को प्रभावित करती है। सहस्रार चक्र के जाग्रत होने का अर्थ है दैवी चमत्कार और सर्वोच्च चेतना का दर्शन। सहस्रार चक्र के जागरण से अज्ञानता पूर्णतया नष्ट हो जाती है। इसका मन्त्र “ङ” तथा रंग बैंगनी होता है। विस्तार पूर्वक पढ़ें:

आत्मिक चक्र | Spiritual Chakras

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