वाल्मीकि रामायण- अयोध्याकाण्ड सर्ग- ४६-६०

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॥ श्री गणेशाय नमः ॥
॥ श्री कमलापति नम: ॥
॥ श्री जानकीवल्लभो विजयते ॥
॥ श्री वाल्मीकि रामायण ॥
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वाल्मीकि रामायण
(भावार्थ सहित)
सब एक ही स्थान पर

अयोध्याकाण्ड सर्ग- ४६-६०

अयोध्याकाण्डम्
षट्चत्वारिंशः सर्गः (सर्ग 46)

( सीता और लक्ष्मण सहित श्रीराम का रात्रि में तमसा-तट पर निवास, पुरवासियों को सोते छोड़कर वन की ओर जाना )

श्लोक:
ततस्तु तमसातीरं रम्यमाश्रित्य राघवः।
सीतामुद्रीक्ष्य सौमित्रिमिदं वचनमब्रवीत्॥१॥

भावार्थ :-
तदनन्तर तमसा के रमणीय तट का आश्रय लेकर श्रीराम ने सीता की ओर देखकर सुमित्राकुमार लक्ष्मण से इस प्रकार कहा-॥१॥

श्लोक:
इयमद्य निशा पूर्वा सौमित्रे प्रहिता वनम्।
वनवासस्य भद्रं ते न चोत्कण्ठितुमर्हसि॥२॥

भावार्थ :-
सुमित्रानन्दन! तुम्हारा कल्याण हो। हमलोग जो वन की ओर प्रस्थित हुए हैं, हमारे उस वनवास की आज यह पहली रात प्राप्त हुई है; अतः अब तुम्हें नगर के लिये उत्कण्ठित नहीं होना चाहिये॥२॥

श्लोक:
पश्य शून्यान्यरण्यानि रुदन्तीव समन्ततः।
यथानिलयमायद्भिर्निलीनानि मृगद्विजैः॥३॥

भावार्थ :-
इन सूने वनों की ओर तो देखो, इनमें वन्य पशु पक्षी अपने-अपने स्थान पर आकर अपनी बोली बोल रहे हैं। उनके शब्द से सारी वनस्थली व्याप्त हो गयी है, मानो ये सारे वन हमें इस अवस्था में देखकर खिन्न हो सब ओर से रो रहे हैं॥३॥

श्लोक:
अद्यायोध्या तु नगरी राजधानी पितुर्मम।
सस्त्रीपुंसा गतानस्मान् शोचिष्यति न संशयः॥४॥

भावार्थ :-
आज मेरे पिता की राजधानी अयोध्या नगरी वन में आये हुए हमलोगों के लिये समस्त नर-नारियों सहित शोक करेगी, इसमें संशय नहीं है॥४॥

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वाल्मीकि रामायण- अयोध्याकाण्ड सर्ग- ४७

अयोध्याकाण्डम्
सप्तचत्वारिंशः सर्गः (सर्ग 47)

( प्रातःकाल उठने पर पुरवासियों का विलाप करना और निराश होकर नगर को लौटना )

श्लोक:
प्रभातायां तु शर्वर्यां पौरास्ते राघवं विना।
शोकोपहतनिश्चेष्टा बभूवुर्हतचेतसः॥१॥

भावार्थ :-
इधर रात बीतने पर जब सबेरा हुआ, तब अयोध्यावासी मनुष्य श्रीरघुनाथजी को न देखकर अचेत हो गये। शोक से व्याकुल होने के कारण उनसे कोई भी चेष्टा करते न बनी॥१॥

श्लोक:
शोकजाश्रुपरिघुना वीक्षमाणास्ततस्ततः।
आलोकमपि रामस्य न पश्यन्ति स्म दुःखिताः॥२॥

भावार्थ :-
वे शोकजनित आँसू बहाते हुए अत्यन्त खिन्न हो गये तथा इधर-उधर उनकी खोज करने लगे। परंतु उन दुःखी पुरवासियों को श्रीराम किधर गये, इस बातका पता देने वाला कोई चिह्नतक नहीं दिखायी दिया॥२॥

श्लोक:
ते विषादातवदना रहितास्तेन धीमता।
कृपणाः करुणा वाचो वदन्ति स्म मनीषिणः॥३॥

भावार्थ :-
बुद्धिमान् श्रीराम से विलग होकर वे अत्यन्त दीन हो गये। उनके मुख पर विषादजनित वेदना स्पष्ट दिखायी देती थी। वे मनीषी पुरवासी करुणा भरे वचन बोलते हुए विलाप करने लगे-॥३॥

श्लोक:
धिगस्तु खलु निद्रां तां ययापहतचेतसः।
नाद्य पश्यामहे रामं पृथूरस्कं महाभुजम्॥४॥

भावार्थ :-
हाय! हमारी उस निद्रा को धिक्कार है, जिससे अचेत हो जाने के कारण हम उस समय विशाल वक्ष वाले महाबाहु श्रीराम के दर्शन से वञ्चित हो गये हैं॥४॥

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वाल्मीकि रामायण- अयोध्याकाण्ड सर्ग- ४८

अयोध्याकाण्डम्
अष्टचत्वारिंशः सर्गः (सर्ग 48)

( नगरनिवासिनी स्त्रियों का विलाप करना )

श्लोक:
तेषामेवं विषण्णानां पीडितानामतीव च।
बाष्पविप्लुतनेत्राणां सशोकानां मुमूर्षया॥१॥
अभिगम्य निवृत्तानां रामं नगरवासिनाम्।
उद्गतानीव सत्त्वानि बभूवुरमनस्विनाम्॥२॥

भावार्थ :-
इस प्रकार जो विषादग्रस्त, अत्यन्त पीड़ित,शोकमग्न तथा प्राण त्याग देने की इच्छा से युक्त हो नेत्रों से आँसू बहा रहे थे, श्रीरामचन्द्रजी के साथ जाकर भी जो उन्हें लिये बिना लौट आये थे और इसीलिये जिनका चित्त ठिकाने नहीं था, उन नगरवासियों की ऐसी दशा हो रही थी मानो उनके प्राण निकल गये हों॥१-२॥

श्लोक:
स्वं स्वं निलयमागम्य पुत्रदारैः समावृताः।
अश्रूणि मुमुचुः सर्वे बाष्पेण पिहिताननाः॥३॥

भावार्थ :-
वे सब अपने-अपने घर में आकर पत्नी और पुत्रों से घिरे हुए आँसू बहाने लगे। उनके मुख अश्रुधारा से आच्छादित थे॥३॥

श्लोक:
न चाहृष्यन् न चामोदन् वणिजो न प्रसारयन्।
न चाशोभन्त पण्यानि नापचन् गृहमेधिनः॥४॥

भावार्थ :-
उनके शरीर में हर्ष का कोई चिह्न नहीं दिखायी देता था तथा मन में भी आनन्द का अभाव ही था। वैश्यों ने अपनी दुकानें नहीं खोली। क्रय-विक्रय की वस्तुएँ बाजारों में फैलायी जाने पर भी उनकी शोभा नहीं हुई (उन्हें लेने के लिये ग्राहक नहीं आये)। उस दिन गृहस्थों के घर में चूल्हे नहीं जले—रसोई नहीं बनी॥४॥

श्लोक:
नष्टं दृष्ट्वा नाभ्यनन्दन् विपुलं वा धनागमम्।
पुत्रं प्रथमजं लब्ध्वा जननी नाप्यनन्दत॥५॥

भावार्थ :-
खोयी हुई वस्तु मिल जाने पर भी किसी को प्रसन्नता नहीं हुई, विपुल धन-राशि प्राप्त हो जाने पर भी किसी ने उसका अभिनन्दन नहीं किया। जिसने प्रथम बार पुत्र को जन्म दिया था, वह माता भी आनन्दित नहीं हुई॥५॥

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वाल्मीकि रामायण- अयोध्याकाण्ड सर्ग- ४९

अयोध्याकाण्डम्
एकोनपञ्चाशः सर्गः (सर्ग 49)

( ग्रामवासियों की बातें सुनते हुए श्रीराम का कोसल जनपद को लाँघते हुए आगे जाना और वेदश्रुति, गोमती एवं स्यन्दि का नदियों को पार करके सुमन्त्र से कुछ कहना )

श्लोक:
रामोऽपि रात्रिशेषेण तेनैव महदन्तरम्।
जगाम पुरुषव्याघ्रः पितुराज्ञामनुस्मरन्॥१॥

भावार्थ :-
उधर पुरुषसिंह श्रीराम भी पिता की आज्ञा का बारंबार स्मरण करते हुए उस शेष रात्रि में ही बहुत दूर निकल गये॥१॥

श्लोक:
तथैव गच्छतस्तस्य व्यपायाद रजनी शिवा।
उपास्य तु शिवां संध्यां विषयानत्यगाहत॥२॥

भावार्थ :-
उसी तरह चलते-चलते उनकी वह कल्याणमयी रजनी भी व्यतीत हो गयी। सबेरा होने पर मङ्गलमयी संध्योपासना करके वे विभिन्न जनपदों को लाँघते हुए चल दिये॥२॥

श्लोक:
ग्रामान् विकृष्टसीमान्तान् पुष्पितानि वनानि च।
पश्यन्नतिययौ शीघ्रं शनैरिव हयोत्तमैः॥३॥

भावार्थ :-
जिनकी सीमा के पास की भूमि जोत दी गयी थी, उन ग्रामों तथा फूलों से सुशोभित वनों को देखते हुए वे उन उत्तम घोड़ों द्वारा शीघ्रतापूर्वक आगे बढ़े जा रहे थे तथापि सुन्दर दृश्यों के देखने में तन्मय रहने के कारण उन्हें उस रथ की गति धीमी-सी ही जान पड़ती थी॥३॥

श्लोक:
शृण्वन् वाचो मनुष्याणां ग्रामसंवासवासिनाम्।
राजानं धिग् दशरथं कामस्य वशमास्थितम्॥४॥

भावार्थ :-
मार्ग में जो बड़े और छोटे गाँव मिलते थे, उनमें निवास करने वाले मनुष्यों की निम्नाङ्कित बातें उनके कानों में पड़ रही थीं—’अहो! काम के वश में पड़े हुए राजा दशरथ को धिक्कार है॥४॥

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वाल्मीकि रामायण- अयोध्याकाण्ड सर्ग- ५०

अयोध्याकाण्डम्
पञ्चाशः सर्गः (सर्ग 50)

( श्रीराम का शृङ्गवेरपुर में गङ्गा तट पर पहुँचकर रात्रि में निवास, वहाँ निषादराज गुह द्वारा उनका सत्कार )

श्लोक:
विशालान् कोसलान् रम्यान् यात्वा लक्ष्मणपूर्वजः।
अयोध्यामुन्मुखो धीमान् प्राञ्जलिर्वाक्यमब्रवीत्॥१॥

भावार्थ :-
इस प्रकार विशाल और रमणीय कोसलदेशकी सीमाको पार करके लक्ष्मणके बड़े भाई बुद्धिमान् श्रीरामचन्द्रजीने अयोध्याकी ओर अपना मुख किया और हाथ जोड़कर कहा-॥१॥

श्लोक:
आपृच्छे त्वां पुरिश्रेष्ठे काकुत्स्थपरिपालिते।
दैवतानि च यानि त्वां पालयन्त्यावसन्ति च॥२॥

भावार्थ :-
ककुत्स्थवंशी राजाओं से परिपालित परीशिरोमणि अयोध्ये! मैं तुमसे तथा जो-जो देवता तुम्हारी रक्षा करते और तुम्हारे भीतर निवास करते हैं, उनसे भी वन में जाने की आज्ञा चाहता हूँ॥२॥

श्लोक:
निवृत्तवनवासस्त्वामनृणो जगतीपतेः।
पुनर्द्रक्ष्यामि मात्रा च पित्रा च सह संगतः॥३॥

भावार्थ :-
वनवास की अवधि पूरी करके महाराज के ऋण से उऋण हो मैं पुनः लौटकर तुम्हारा दर्शन करूँगा और अपने माता-पिता से भी मिलूँगा’॥३॥

श्लोक:
ततो रुचिरताम्राक्षो भुजमुद्यम्य दक्षिणम्।
अश्रुपूर्णमुखो दीनोऽब्रवीज्जानपदं जनम्॥४॥

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वाल्मीकि रामायण- अयोध्याकाण्ड सर्ग- ५१

अयोध्याकाण्डम्
एकपञ्चाशः सर्गः (सर्ग 51)

( निषादराज गुह के समक्ष लक्ष्मण का विलाप )

श्लोक:
तं जाग्रतमदम्भेन भ्रातुराय लक्ष्मणम्।
गुहः संतापसंतप्तो राघवं वाक्यमब्रवीत्॥१॥

भावार्थ :-
लक्ष्मण को अपने भाई के लिये स्वाभाविक अनुराग से जागते देख निषादराज गुह को बड़ा संताप हुआ। उसने रघुकुलनन्दन लक्ष्मण से कहा-॥१॥

श्लोक:
इयं तात सुखा शय्या त्वदर्थमुपकल्पिता।
प्रत्याश्वसिहि साध्वस्यां राजपुत्र यथासुखम्॥२॥

भावार्थ :-
तात! राजकुमार! तुम्हारे लिये यह आराम देने वाली शय्या तैयार है, इस पर सुखपूर्वक सोकर भलीभाँति विश्राम कर लो॥२॥

श्लोक:
उचितोऽयं जनः सर्वः क्लेशानां त्वं सुखोचितः।
गुप्त्यर्थं जागरिष्यामः काकुत्स्थस्य वयं निशाम्॥३॥

भावार्थ :-
यह (मैं) सेवक तथा इसके साथ के सब लोग वनवासी होने के कारण सब प्रकार के क्लेश सहन करने के योग्य हैं (क्योंकि हम सबको कष्ट सहने का अभ्यास है), परंतु तुम सुख में ही पले हो, अतः उसी के योग्य हो (इसलिये सो जाओ)। हम सब लोग श्रीरामचन्द्रजी की रक्षा के लिये रातभर जागते रहेंगे॥३॥

श्लोक:
नहि रामात् प्रियतमो ममास्ते भुवि कश्चन।
ब्रवीम्येव च ते सत्यं सत्येनैव च ते शपे॥४॥

भावार्थ :-
मैं सत्य की ही शपथ खाकर तुमसे सत्य कहता हूँ कि इस भूतल पर मुझे श्रीराम से बढ़कर प्रिय दूसरा कोई नहीं है॥४॥

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वाल्मीकि रामायण- अयोध्याकाण्ड सर्ग- ५२

अयोध्याकाण्डम्
द्विपञ्चाशः सर्गः (सर्ग 52)

( श्रीराम की आज्ञासे गुह का नाव मँगाना, श्रीराम का सुमन्त्र को समझाबुझाकर अयोध्यापुरी लौट जाने के लिये आज्ञा देना, सीता की गङ्गाजी से प्रार्थना )

श्लोक:
प्रभातायां तु शर्वर्यां पृथुवक्षा महायशाः।
उवाच रामः सौमित्रिं लक्ष्मणं शुभलक्षणम्॥१॥

भावार्थ :-
जब रात बीती और प्रभात हुआ, उस समय विशाल वक्षवाले महायशस्वी श्रीरामने शुभलक्षणसम्पन्न सुमित्राकुमार लक्ष्मणसे इस प्रकार कहा-॥१॥

श्लोक:
भास्करोदयकालोऽसौ गता भगवती निशा।
असौ सुकृष्णो विहगः कोकिलस्तात कूजति॥२॥

भावार्थ :-
तात! भगवती रात्रि व्यतीत हो गयी अब सूर्योदय का समय आ पहुँचा है। वह अत्यन्त कालेरंग का पक्षी कोकिल कुहू कुहू बोल रहा है॥२॥

श्लोक:
बर्हिणानां च निर्घोषः श्रूयते नदतां वने।
तराम जाह्नवीं सौम्य शीघ्रगां सागरङ्गमाम्॥३॥

भावार्थ :-
वन में अव्यक्त शब्द करने वाले मयूरों की केकावाणी भी सुनायी देती है; अतः सौम्य! अब हमें तीव्र गति से बहने वाली समुद्रगामिनी गङ्गाजी के पार उतरना चाहिये’॥३॥

श्लोक:
विज्ञाय रामस्य वचः सौमित्रिर्मित्रनन्दनः।
गुहमामन्त्र्य सूतं च सोऽतिष्ठद् भ्रातुरग्रतः॥४॥

भावार्थ :-
मित्रों को आनन्दित करने वाले सुमित्राकुमार लक्ष्मण ने श्रीरामचन्द्रजी के कथन का अभिप्राय समझकर गुह और सुमन्त्र को बुलाकर पार उतरने की व्यवस्था करने के लिये कहा और स्वयं वे भाई के सामने आकर खड़े हो गये॥४॥

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वाल्मीकि रामायण- अयोध्याकाण्ड सर्ग- ५३

अयोध्याकाण्डम्
त्रिपञ्चाशः सर्गः (सर्ग 53)

( श्रीराम का राजा को उपालम्भ देते हुए कैकेयी से कौसल्या आदि के अनिष्ट की आशङ्का बताकर लक्ष्मण को अयोध्या लौटाने के लिये प्रयत्न करना )

श्लोक:
स तं वृक्षं समासाद्य संध्यामन्वास्य पश्चिमाम्।
रामो रमयतां श्रेष्ठ इति होवाच लक्ष्मणम्॥१॥

भावार्थ :-
उस वृक्ष के नीचे पहुँचकर आनन्द प्रदान करने वालों में श्रेष्ठ श्रीराम ने सायंकाल की संध्योपासना करके लक्ष्मण से इस प्रकार कहा-॥१॥

श्लोक:
अद्येयं प्रथमा रात्रिर्याता जनपदाद् बहिः।
या समन्त्रेण रहिता तां नोत्कण्ठितुमर्हसि॥२॥

भावार्थ :-
सुमित्रानन्दन! आज हमें अपने जनपद से बाहर यह पहली रात प्राप्त हुई है। जिसमें सुमन्त्र हमारे साथ नहीं हैं। इस रात को पाकर तुम्हें नगर की सुख सुविधाओं के लिये उत्कण्ठित नहीं होना चाहिये॥२॥

श्लोक:
जागर्तव्यमतन्द्रिभ्यामद्यप्रभृति रात्रिषु।
योगक्षेमौ हि सीताया वर्तेते लक्ष्मणावयोः॥३॥

भावार्थ :-
“लक्ष्मण! आज से हम दोनों भाइयों को आलस्य छोड़कर रात में जागना होगा; क्योंकि सीता के योग क्षेम हम दोनों के ही अधीन हैं॥३॥

श्लोक:
रात्रिं कथंचिदेवेमां सौमित्रे वर्तयामहे।
अपवर्तामहे भूमावास्तीर्य स्वयमर्जितैः॥४॥

भावार्थ :-
सुमित्रानन्दन! यह रात हमलोग किसी तरह बितायँगे और स्वयं संग्रह करके लाये हुए तिनकों और पत्तों की शय्या बनाकर उसे भूमिपर बिछाकर उस पर किसी तरह सो लेंगे’॥४॥

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वाल्मीकि रामायण- अयोध्याकाण्ड सर्ग- ५४

अयोध्याकाण्डम्
चतुःपञ्चाशः सर्गः (सर्ग 54)

( लक्ष्मण और सीता सहित श्रीराम का भरद्वाज-आश्रम में जाना, मुनि का उन्हें चित्रकूट पर्वत पर ठहरने का आदेश तथा चित्रकूट की महत्ता एवं शोभा का वर्णन )

श्लोक:
ते तु तस्मिन् महावृक्षे उषित्वा रजनी शुभाम्।
विमलेऽभ्युदिते सूर्ये तस्माद् देशात् प्रतस्थिरे॥१॥

भावार्थ :-
उस महान् वृक्ष के नीचे वह सुन्दर रात बिताकर वे सब लोग निर्मल सूर्योदयकाल में उस स्थान से आगे को प्रस्थित हुए॥१॥

श्लोक:
यत्र भागीरथीं गङ्गां यमुनाभिप्रवर्तते।
जग्मुस्तं देशमुद्दिश्य विगाह्य सुमहद् वनम्॥२॥

भावार्थ :-
जहाँ भागीरथी गङ्गा से यमुना मिलती हैं, उस स्थान पर जाने के लिये वे महान् वन के भीतर से होकर यात्रा करने लगे॥२॥

श्लोक:
ते भूमिभागान् विविधान् देशांश्चापि मनोहरान्।
अदृष्टपूर्वान् पश्यन्तस्तत्र तत्र यशस्विनः॥३॥

भावार्थ :-
वे तीनों यशस्वी यात्री मार्ग में जहाँ-तहाँ जो पहले कभी देखने में नहीं आये थे, ऐसे अनेक प्रकार के भूभाग तथा मनोहर प्रदेश देखते हुए आगे बढ़ रहे थे॥३॥

श्लोक:
यथा क्षेमेण सम्पश्यन् पुष्पितान् विविधान् दुमान्।
निर्वृत्तमात्रे दिवसे रामः सौमित्रिमब्रवीत्॥४॥

भावार्थ :-
सुखपूर्वक आराम से उठते-बैठते यात्रा करते हुए उन तीनों ने फूलों से सुशोभित भाँति-भाँति के वृक्षों का दर्शन किया। इस प्रकार जब दिन प्रायः समाप्त हो चला, तब श्रीराम ने लक्ष्मण से कहा-॥४॥

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वाल्मीकि रामायण- अयोध्याकाण्ड सर्ग- ५५

अयोध्याकाण्डम्
पञ्चपञ्चाशः सर्गः (सर्ग 55)

( श्रीराम आदि का अपने ही बनाये हुए बेडे से यमुनाजी को पार करना, सीता की यमुना और श्यामवट से प्रार्थना,यमुनाजी के समतल तटपर रात्रि में निवास करना )

श्लोक:
उषित्वा रजनीं तत्र राजपुत्रावरिंदमौ।
महर्षिमभिवाद्याथ जग्मतुस्तं गिरिं प्रति॥१॥

भावार्थ :-
उस आश्रम में रातभर रहकर शत्रुओं का दमन करने वाले वे दोनों राजकुमार महर्षि को प्रणाम करके चित्रकूट पर्वत पर जाने को उद्यत हुए॥१॥

श्लोक:
तेषां स्वस्त्ययनं चैव महर्षिः स चकार ह।
प्रस्थितान् प्रेक्ष्य तांश्चैव पिता पुत्रानिवौरसान्॥२॥

भावार्थ :-
उन तीनों को प्रस्थान करते देख महर्षि ने उनके लिये उसी प्रकार स्वस्तिवाचन किया जैसे पिता अपने औरस पुत्रों को यात्रा करते देख उनके लिये मङ्गलसूचक आशीर्वाद देता है॥२॥

श्लोक:
ततः प्रचक्रमे वक्तुं वचनं स महामुनिः।
भरद्वाजो महातेजा रामं सत्यपराक्रमम्॥३॥

भावार्थ :-
तदनन्तर महातेजस्वी महामुनि भरद्वाज ने सत्य पराक्रमी श्रीराम से इस प्रकार कहना आरम्भ किया॥३॥

श्लोक:
गङ्गायमुनयोः संधिमासाद्य मनुजर्षभौ।
कालिन्दीमनुगच्छेतां नदी पश्चान्मुखाश्रिताम्॥४॥

भावार्थ :-
नरश्रेष्ठ! तुम दोनों भाई गङ्गा और यमुना के संगम पर पहुँचकर जिनमें पश्चिममुखी होकर गङ्गा मिली हैं, उन महानदी यमुना के निकट जाना॥४॥

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वाल्मीकि रामायण- अयोध्याकाण्ड सर्ग- ५६

अयोध्याकाण्डम्
षट्पञ्चाशः सर्गः (सर्ग 56)

( श्रीराम आदि का चित्रकूट में पहुँचना, वाल्मीकिजी का दर्शन करके श्रीराम की आज्ञा से लक्ष्मणद् वारा पर्णशाला का निर्माण,सबका कुटी में प्रवेश )

श्लोक:
अथ रात्र्यां व्यातीतायामवसुप्तमनन्तरम्।
प्रबोधयामास शनैर्लक्ष्मणं रघुपुङ्गवः॥१॥

भावार्थ :-
तदनन्तर रात्रि व्यतीत होने पर रघुकुल-शिरोमणि श्रीराम ने अपने जागने के बाद वहाँ सोये हुए लक्ष्मण को धीरे से जगाया (और इस प्रकार कहा -)॥१॥

श्लोक:
सौमित्रे शृणु वन्यानां वल्गु व्याहरतां स्वनम्।
सम्प्रतिष्ठामहे कालः प्रस्थानस्य परंतप॥२॥

भावार्थ :-
‘शत्रुओं को संताप देने वाले सुमित्राकुमार! मीठी बोली बोलने वाले शुक-पिक आदि जंगली पक्षियों का कलरव सुनो। अब हमलोग यहाँ से प्रस्थान करें; क्योंकि प्रस्थान के योग्य समय आ गया है’॥२॥

श्लोक:
प्रसुप्तस्तु ततो भ्रात्रा समये प्रतिबोधितः।
जहौ निद्रां च तन्द्रां च प्रसक्तं च परिश्रमम्॥३॥

भावार्थ :-
सोये हुए लक्ष्मण ने अपने बड़े भाई द्वारा ठीक समय पर जगा दिये जाने पर निद्रा, आलस्य तथा राह चलने की थकावट को दूर कर दिया॥३॥

श्लोक:
तत उत्थाय ते सर्वे स्पृष्ट्वा नद्याः शिवं जलम्।
पन्थानमृषिभिर्जुष्टं चित्रकूटस्य तं ययुः॥४॥

भावार्थ :-
फिर सब लोग उठे और यमुना नदी के शीतल जल में स्नान आदि करके ऋषि-मुनियों द्वारा सेवित चित्रकूट के उस मार्ग पर चल दिये॥४॥

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वाल्मीकि रामायण- अयोध्याकाण्ड सर्ग- ५७

अयोध्याकाण्डम्
सप्तपञ्चाशः सर्गः (सर्ग 57)

( सुमन्त्र का अयोध्या को लौटना, उनके मुख से श्रीराम का संदेश सुनकर पुरवासियों का विलाप, राजा दशरथ और कौसल्या की मूर्छा तथा अन्तःपुर की रानियों का आर्तनाद )

श्लोक:
कथयित्वा तु दुःखार्तः सुमन्त्रेण चिरं सह।
रामे दक्षिणकूलस्थे जगाम स्वगृहं गुहः॥१॥

भावार्थ :-
इधर, जब श्रीराम गङ्गा के दक्षिण तट पर उतर गये, तब गुह दुःख से व्याकुल हो सुमन्त्र के साथ बड़ी देरतक बातचीत करता रहा। इसके बाद वह सुमन्त्र को साथ ले अपने घर को चला गया॥१॥

श्लोक:
भरद्वाजाभिगमनं प्रयागे च सभाजनम्।
आ गिरेर्गमनं तेषां तत्रस्थैरभिलक्षितम्॥२॥

भावार्थ :-
श्रीरामचन्द्रजी का प्रयाग में भरद्वाज के आश्रम पर जाना, मुनि के द्वारा सत्कार पाना तथा चित्रकूट पर्वत पर पहुँचना—ये सब वृत्तान्त शृङ्गवेर के निवासी गुप्तचरों ने देखे और लौटकर गुह को इन बातों से अवगत कराया॥२॥

श्लोक:
अनुज्ञातः सुमन्त्रोऽथ योजयित्वा हयोत्तमान्।
अयोध्यामेव नगरी प्रययौ गाढदुर्मनाः॥३॥

भावार्थ :-
इन सब बातों को जानकर सुमन्त्र गुह से विदा ले अपने उत्तम घोड़ों को रथ में जोतकर अयोध्या की ओर ही लौट पड़े। उस समय उनके मन में बड़ा दुःख हो रहा था॥३॥

श्लोक:
स वनानि सुगन्धीनि सरितश्च सरांसि च।
पश्यन् यत्तो ययौ शीघ्रं ग्रामाणि नगराणि च॥४॥

भावार्थ :-
वे मार्ग में सुगन्धित वनों, नदियों, सरोवरों, गाँवों और नगरों को देखते हुए बड़ी सावधानी के साथ शीघ्रतापूर्वक जा रहे थे॥४॥

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वाल्मीकि रामायण- अयोध्याकाण्ड सर्ग- ५८

अयोध्याकाण्डम्
अष्टपञ्चाशः सर्गः (सर्ग 58)

( महाराज दशरथ की आज्ञा से सुमन्त्र का श्रीराम और लक्ष्मण के संदेश सुनाना )

श्लोक:
प्रत्याश्वस्तो यदा राजा मोहात् प्रत्यागतस्मृतिः।
तदाजुहाव तं सूतं रामवृत्तान्तकारणात्॥१॥

भावार्थ :-
मूर्छा दूर होने पर जब राजा को चेत हुआ तब सुस्थिर चित्त होकर उन्होंने श्रीराम का वृत्तान्त सुनने के लिये सारथि सुमन्त्र को सामने बुलाया॥१॥

श्लोक:
तदा सूतो महाराजं कृताञ्जलिरुपस्थितः।
राममेवानुशोचन्तं दुःखशोकसमन्वितम्॥२॥

भावार्थ :-
उस समय सुमन्त्र श्रीराम के ही शोक और चिन्ता में निरन्तर डूबे रहने वाले दुःख-शोक से व्याकुल महाराज दशरथ के पास हाथ जोड़कर खड़े हो गये॥२॥

श्लोक:
वृद्धं परमसंतप्तं नवग्रहमिव द्विपम्।
विनिःश्वसन्तं ध्यायन्तमस्वस्थमिव कुञ्जरम्॥३॥
राजा तु रजसा सूतं ध्वस्ताङ्गं समुपस्थितम्।
अश्रुपूर्णमुखं दीनमुवाच परमार्तवत्॥४॥

भावार्थ :-
जैसे जंगल से तुरंत पकड़कर लाया हुआ हाथी अपने यूथपति गजराज का चिन्तन करके लंबी साँस खींचता और अत्यन्त संतप्त तथा अस्वस्थ हो जाता है, उसी प्रकार बूढ़े राजा दशरथ श्रीराम के लिये अत्यन्त संतप्त हो लंबी साँस खींचकर उन्हीं का ध्यान करते हुए अस्वस्थ-से हो गये थे। राजा ने देखा, सारथि का सारा शरीर धूल से भर गया है। यह सामने खड़ा है इसके मुख पर आँसुओं की धारा बह रही है और यह अत्यन्त दीन दिखायी देता है। उस अवस्था में राजा ने अत्यन्त आर्त होकर उससे पूछा-॥३-४॥

श्लोक:
क्व नु वत्स्यति धर्मात्मा वृक्षमूलमुपाश्रितः।
सोऽत्यन्तसुखितः सूत किमशिष्यति राघवः॥५॥

भावार्थ :-
‘सूत! धर्मात्मा श्रीराम वृक्ष की जड़का सहारा ले कहाँ निवास करेंगे? जो अत्यन्त सुख में पले थे, वे मेरे लाडले राम वहाँ क्या खायेंगे?॥५॥

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वाल्मीकि रामायण- अयोध्याकाण्ड सर्ग- ५९

अयोध्याकाण्डम्
एकोनषष्टितमः सर्गः (सर्ग 59)

( सुमन्त्र द्वारा श्रीराम के शोक से जडचेतन एवं अयोध्यापुरी की दुरवस्था का वर्णन तथा राजा दशरथ का विलाप )

श्लोक:
मम त्वश्वा निवृत्तस्य न प्रावर्तन्त वर्त्मनि।
उष्णमश्रु विमुञ्चन्तो रामे सम्प्रस्थिते वनम्॥१॥
उभाभ्यां राजपुत्राभ्यामथ कृत्वाहमञ्जलिम्।
प्रस्थितो रथमास्थाय तदुःखमपि धारयन्॥२॥

भावार्थ :-
सुमन्त्र ने कहा-‘जब श्रीरामचन्द्रजी वन की ओर प्रस्थित हुए, तब मैंने उन दोनों राजकुमारों को हाथ जोड़कर प्रणाम किया और उनके वियोग के दुःख को हृदय में धारण करके रथ पर आरूढ़ हो उधर से लौटा। लौटते समय मेरे घोड़े नेत्रों से गरम-गरम आँसू बहाने लगे रास्ता चलने में उनका मन नहीं लगता था॥१-२॥

श्लोक:
गुहेन सार्धं तत्रैव स्थितोऽस्मि दिवसान् बहून्।
आशया यदि मां रामः पुनः शब्दापयेदिति॥३॥

भावार्थ :-
‘मैं गृह के साथ कई दिनों तक वहाँ इस आशा से ठहरा रहा कि सम्भव है, श्रीराम फिर मुझे बुला लें॥३॥

श्लोक:
विषये ते महाराज महाव्यसनकर्शिताः।
अपि वृक्षाः परिम्लानाः सपुष्पाङ्करकोरकाः॥४॥

भावार्थ :-
‘महाराज! आपके राज्य में वृक्ष भी इस महान् संकट से कृशकाय हो गये हैं, फूल, अंकुर और कलियों सहित मुरझा गये हैं॥४॥

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वाल्मीकि रामायण- अयोध्याकाण्ड सर्ग- ६०

अयोध्याकाण्डम्
षष्टितमः सर्गः (सर्ग 60)

( कौसल्या का विलाप और सारथि सुमन्त्र का उन्हें समझाना )

श्लोक:
ततो भूतोपसृष्टेव वेपमाना पुनः पुनः।
धरण्यां गतसत्त्वेव कौसल्या सूतमब्रवीत्॥१॥

भावार्थ :-
तदनन्तर जैसे उनमें भूत का आवेश हो गया हो, इस प्रकार कौसल्या देवी बारंबार काँपने लगीं और अचेत-सी होकर पृथ्वी पर गिर पड़ीं। उसी अवस्था में उन्होंने सारथि से कहा-॥१॥

श्लोक:
नय मां यत्र काकुत्स्थः सीता यत्र च लक्ष्मणः।
तान् विना क्षणमप्यद्य जीवितुं नोत्सहे ह्यहम्॥२॥

भावार्थ :-
‘सुमन्त्र! जहाँ श्रीराम हैं, जहाँ सीता और लक्ष्मण हैं, वहीं मुझे भी पहुँचा दो। मैं उनके बिना अब एक क्षण भी जीवित नहीं रह सकती॥२॥

श्लोक:
निवर्तय रथं शीघ्रं दण्डकान् नय मामपि।
अथ तान् नानुगच्छामि गमिष्यामि यमक्षयम्॥३॥

भावार्थ :-
‘जल्दी रथ लौटाओ और मुझे भी दण्डकारण्य में ले चलो। यदि मैं उनके पास न जा सकी तो यमलोक की यात्रा करूँगी’॥३॥

श्लोक:
बाष्पवेगोपहतया स वाचा सज्जमानया।
इदमाश्वासयन् देवीं सूतः प्राञ्जलिरब्रवीत्॥४॥

भावार्थ :-
देवी कौसल्या की बात सुनकर सारथि सुमन्त्र ने हाथ जोड़कर उन्हें समझाते हुए आँसुओं के वेग से अवरुद्ध हुई गद्गदवाणी में कहा-॥४॥

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