॥ श्री गणेशाय नमः ॥
॥ श्री कमलापति नम: ॥
॥ श्री जानकीवल्लभो विजयते ॥
॥ श्री वाल्मीकि रामायण ॥
(भावार्थ सहित)
सब एक ही स्थान पर
अयोध्याकाण्ड सर्ग- ९१-१०५
अयोध्याकाण्डम्
एकनवतितमः सर्गः (सर्ग 91)
( भरद्वाज मुनि के द्वारा सेनासहित भरत का दिव्य सत्कार )
श्लोक:
कृतबुद्धिं निवासाय तत्रैव स मुनिस्तदा।
भरतं केकयीपुत्रमातिथ्येन न्यमन्त्रयत्॥१॥
भावार्थ :-
जब भरत ने उस आश्रम में ही निवास का दृढ़निश्चय कर लिया, तब मुनि ने कैकेयीकुमार भरत को अपना आतिथ्य ग्रहण करने के लिये न्यौता दिया॥१॥
श्लोक:
अब्रवीद् भरतस्त्वेनं नन्विदं भवता कृतम्।
पाद्यमय॑मथातिथ्यं वने यदुपपद्यते॥२॥
भावार्थ :-
यह सुनकर भरत ने उनसे कहा—’मुने! वन में जैसा आतिथ्य-सत्कार सम्भव है, वह तो आप पाद्य, अर्घ्य और फल-मूल आदि देकर कर ही चुके’॥२॥
श्लोक:
अथोवाच भरद्वाजो भरतं प्रहसन्निव।
जाने त्वां प्रीतिसंयुक्तं तष्येस्त्वं येन केनचित्॥३॥
भावार्थ :-
उनके ऐसा कहने पर भरद्वाजजी भरत से हँसते हुए से बोले— ’भरत! मैं जानता हूँ, मेरे प्रति तुम्हारा प्रेम है; अतः मैं तुम्हें जो कुछ दूंगा, उसी से तुम संतुष्ट हो जाओगे॥३॥
श्लोक:
सेनायास्तु तवैवास्याः कर्तुमिच्छामि भोजनम्।
मम प्रीतिर्यथारूपा त्वम मनुजर्षभ॥४॥
भावार्थ :-
‘किंतु इस समय मैं तुम्हारी सेना को भोजन कराना चाहता हूँ। नरश्रेष्ठ! इससे मुझे प्रसन्नता होगी और जिस तरह मुझे प्रसन्नता हो, वैसा कार्य तुम्हें अवश्य करना चाहिये॥४॥
वाल्मीकि रामायण- अयोध्याकाण्ड सर्ग- ९२
अयोध्याकाण्डम्
द्विनवतितमः सर्गः (सर्ग 92)
( भरत का भरद्वाज मुनि से श्रीराम के आश्रम जाने का मार्ग जानना, वहाँ से चित्रकूट के लिये सेनासहित प्रस्थान करना )
श्लोक:
ततस्तां रजनीं व्यष्य भरतः सपरिच्छदः।
कृतातिथ्यो भरद्वाजं कामादभिजगाम ह॥१॥
भावार्थ :-
परिवार सहित भरत इच्छानुसार मुनि का आतिथ्य ग्रहण करके रात भर आश्रम में ही रहे। फिर सबेरे जाने की आज्ञा लेने के लिये वे महर्षि भरद्वाज के पास गये॥१॥
श्लोक:
तमृषिः पुरुषव्याघ्र प्रेक्ष्य प्राञ्जलिमागतम्।
हताग्निहोत्रो भरतं भरद्वाजोऽभ्यभाषत॥२॥
भावार्थ :-
पुरुषसिंह भरत को हाथ जोड़े अपने पास आया देख भरद्वाजजी अग्निहोत्र का कार्य करके उनसे बोले–॥२॥
श्लोक:
कच्चिदत्र सुखा रात्रिस्तवास्मद्विषये गता।
समग्रस्ते जनः कच्चिदातिथ्ये शंस मेऽनघ॥३॥
भावार्थ :-
‘निष्पाप भरत! क्या हमारे इस आश्रम में तुम्हारी यह रात सुख से बीती है? क्या तुम्हारे साथ आये हुए सब लोग इस आतिथ्य से संतुष्ट हुए हैं? यह बताओ’॥३॥
श्लोक:
तमुवाचाञ्जलिं कृत्वा भरतोऽभिप्रणम्य च।
आश्रमादुपनिष्क्रान्तमृषिमुत्तमतेजसम्॥४॥
भावार्थ :-
तब भरत ने आश्रम से बाहर निकले हुए उन उत्तम तेजस्वी महर्षि को प्रणाम करके उनसे हाथ जोड़कर कहा-॥४॥
वाल्मीकि रामायण- अयोध्याकाण्ड सर्ग- ९३
अयोध्याकाण्डम्
त्रिनवतितमः सर्गः (सर्ग 93)
( सेनासहित भरत की चित्रकूट-यात्रा का वर्णन )
श्लोक:
तया महत्या यायिन्या ध्वजिन्या वनवासिनः।
अर्दिता यूथपा मत्ताः सयूथाः सम्प्रदुद्रुवुः॥१॥
भावार्थ :-
यात्रा करने वाली उस विशाल वाहिनी से पीड़ित हो वनवासी यूथपति मतवाले हाथी आदि अपने यूथों के साथ भाग चले॥१॥
श्लोक:
ऋक्षाः पृषतमुख्याश्च रुरवश्च समन्ततः।
दृश्यन्ते वनवाटेषु गिरिष्वपि नदीषु च॥२॥
भावार्थ :-
रीछ, चितकबरे मृग तथा रुरु नामक मृग वन प्रदेशों में, पर्वतों में और नदियों के तटों पर चारों ओर उस सेना से पीड़ित दिखायी देते थे॥२॥
श्लोक:
स सम्प्रतस्थे धर्मात्मा प्रीतो दशरथात्मजः।
वृतो महत्या नादिन्या सेनया चतुरङ्गया॥३॥
भावार्थ :-
महान् कोलाहल करने वाली उस विशाल चतुरंगिणी सेना से घिरे हुए धर्मात्मा दशरथनन्दन भरत बड़ी प्रसन्नता के साथ यात्रा कर रहे थे॥३॥
श्लोक:
सागरौघनिभा सेना भरतस्य महात्मनः।
महीं संछादयामास प्रावृषि द्यामिवाम्बुदः॥४॥
भावार्थ :-
जैसे वर्षा ऋतु में मेघों की घटा आकाश को ढकलेती है, उसी प्रकार महात्मा भरत की समुद्र-जैसी उस विशाल सेना ने दूर तक के भूभाग को आच्छादित कर लिया था॥४॥
वाल्मीकि रामायण- अयोध्याकाण्ड सर्ग- ९४
अयोध्याकाण्डम्
चतुर्नवतितमः सर्गः (सर्ग 94)
( श्रीराम का सीता को चित्रकूट की शोभा दिखाना )
श्लोक:
दीर्घकालोषितस्तस्मिन् गिरौ गिरिवरप्रियः।
वैदेह्याः प्रियमाकांक्षन् स्वं च चित्तं विलोभयन्॥१॥
अथ दाशरथिश्चित्रं चित्रकूटमदर्शयत्।
भार्याममरसंकाशः शचीमिव पुरंदरः॥२॥
भावार्थ :-
गिरिवर चित्रकूट श्रीराम को बहुत ही प्रिय लगता था। वे उस पर्वत पर बहुत दिनों से रह रहे थे। एक दिन अमरतुल्य तेजस्वी दशरथनन्दन श्रीराम विदेहराजकुमारी सीता का प्रिय करने की इच्छा से तथा अपने मन को भी बहलाने के लिये अपनी भार्या को विचित्र चित्रकूट की शोभा का दर्शन कराने लगे, मानो देवराज इन्द्र अपनी पत्नी शची को पर्वतीय सुषमा का दर्शन करा रहे हों॥१-२॥
श्लोक:
न राज्यभ्रंशनं भद्रे न सुहृद्भिर्विनाभवः।
मनो मे बाधते दृष्ट्वा रमणीयमिमं गिरिम्॥३॥
भावार्थ :-
(वे बोले-) ‘भद्रे! यद्यपि मैं राज्य से भ्रष्ट हो गया हँ तथा मुझे अपने हितैषी सुहृदों से विलग होकर रहना पड़ता है, तथापि जब मैं इस रमणीय पर्वत की ओर देखता हूँ, तब मेरा सारा दुःख दूर हो जाता है राज्य का न मिलना और सुहृदों का विछोह होना भी मेरे मन को व्यथित नहीं कर पाता है॥३॥
श्लोक:
पश्येममचलं भद्रे नानाद्विजगणायुतम्।
शिखरैः खमिवोद्विद्वैर्धातुमद्भिर्विभूषितम्॥४॥
भावार्थ :-
‘कल्याणि! इस पर्वत पर दृष्टिपात तो करो, नाना प्रकार के असंख्य पक्षी यहाँ कलरव कर रहे हैं। नाना प्रकार के धातुओं से मण्डित इसके गगन-चुम्बी शिखर मानो आकाश को बेध रहे हैं। इन शिखरों से विभूषित हुआ यह चित्रकूट कैसी शोभा पा रहा है!॥४॥
श्लोक:
केचिद् रजतसंकाशाः केचित् क्षतजसंनिभाः।
पीतमाञ्जिष्ठवर्णाश्च केचिन्मणिवरप्रभाः॥५॥
पुष्पार्ककेतकाभाश्च केचिज्ज्योतीरसप्रभाः।
विराजन्तेऽचलेन्द्रस्य देशा धातुविभूषिताः॥६॥
भावार्थ :-
‘विभिन्न धातुओं से अलंकृत अचलराज चित्रकूट के प्रदेश कितने सुन्दर लगते हैं! इनमें से कोई तो चाँदी के समान चमक रहे हैं। कोई लोहू की लाल आभा का विस्तार करते हैं। किन्हीं प्रदेशों के रंग पीले और मंजिष्ठ वर्ण के हैं। कोई श्रेष्ठ मणियों के समान उद्भासित होते हैं। कोई पुखराज के समान, कोई स्फटिक के सदृश और कोई केवड़े के फूल के समान कान्ति वाले हैं तथा कुछ प्रदेश नक्षत्रों और पारे के समान प्रकाशित होते हैं॥५-६॥
वाल्मीकि रामायण- अयोध्याकाण्ड सर्ग- ९५
अयोध्याकाण्डम्
पञ्चनवतितमः सर्गः (सर्ग 95)
( श्रीराम का सीता के प्रति मन्दाकिनी नदी की शोभा का वर्णन )
श्लोक:
अथ शैलाद् विनिष्क्रम्य मैथिली कोसलेश्वरः।
अदर्शयच्छुभजलां रम्यां मन्दाकिनी नदीम्॥१॥
भावार्थ :-
तदनन्तर उस पर्वत से निकलकर कोसल नरेश श्रीरामचन्द्रजी ने मिथिलेशकुमारी सीता को पुण्यसलिला रमणीय मन्दाकिनी नदी का दर्शन कराया॥१॥
श्लोक:
अब्रवीच्च वरारोहां चन्द्रचारुनिभाननाम्।
विदेहराजस्य सुतां रामो राजीवलोचनः॥२॥
भावार्थ :-
और उस समय कमलनयन श्रीराम ने चन्द्रमा के समान मनोहर मुख तथा सुन्दर कटिप्रदेशवाली विदेहराजनन्दिनी सीता से इस प्रकार कहा-॥२॥
श्लोक:
विचित्रपुलिनां रम्यां हंससारससेविताम्।
कुसुमैरुपसम्पन्नां पश्य मन्दाकिनी नदीम्॥३॥
भावार्थ :-
‘प्रिये! अब मन्दाकिनी नदी की शोभा देखो, हंस और सारसों से सेवित होने के कारण यह कितनी सुन्दर जान पड़ती है। इसका किनारा बड़ा ही विचित्र है। नाना प्रकार के पुष्प इसकी शोभा बढ़ा रहे हैं॥३॥
श्लोक:
नानाविधैस्तीररुहैर्वृतां पुष्पफलद्रुमैः।
राजन्तीं राजराजस्य नलिनीमिव सर्वतः॥४॥
भावार्थ :-
‘फल और फूलों के भार से लदे हुए नाना प्रकार के तटवर्ती वृक्षों से घिरी हुई यह मन्दाकिनी कुबेर के सौगन्धिक सरोवर की भाँति सब ओर से सुशोभित हो रही है॥४॥
वाल्मीकि रामायण- अयोध्याकाण्ड सर्ग- ९६
अयोध्याकाण्डम्
षण्णवतितमः सर्गः (सर्ग 96)
( लक्ष्मण का शाल-वृक्ष पर चढ़कर भरत की सेना को देखना और उनके प्रति अपना रोषपूर्ण उद्गार प्रकट करना )
श्लोक:
तां तदा दर्शयित्वा तु मैथिली गिरिनिम्नगाम्।
निषसाद गिरिप्रस्थे सीतां मांसेन छन्दयन्॥१॥
भावार्थ :-
इस प्रकार मिथिलेशकुमारी सीता को मन्दाकिनी नदी का दर्शन कराकर उस समय श्रीरामचन्द्रजी पर्वत के समतल प्रदेश में उनके साथ बैठ गये और तपस्वी-जनों के उपभोग में आने योग्य फल-मूल के गूदे से उनकी मानसिक प्रसन्नता को बढ़ाने- उनका लालन करने लगे॥१॥
श्लोक:
इदं मेध्यमिदं स्वादु निष्टप्तमिदमग्निना।
एवमास्ते स धर्मात्मा सीतया सह राघवः॥२॥
भावार्थ :-
धर्मात्मा रघुनन्दन सीताजी के साथ इस प्रकार की बातें कर रहे थे- ’प्रिये! यह फल परम पवित्र है। यह बहुत स्वादिष्ट है तथा इस कन्द को अच्छी तरह आग पर सेका गया है’॥२॥
श्लोक:
तथा तत्रासतस्तस्य भरतस्योपयायिनः।
सैन्यरेणुश्च शब्दश्च प्रादुरास्तां नभस्पृशौ॥३॥
भावार्थ :-
इस प्रकार वे उस पर्वतीय प्रदेश में बैठे हुए ही थे कि उनके पास आने वाली भरत की सेना की धूल और कोलाहल दोनों एक साथ प्रकट हुए और आकाश में फैलने लगे॥३॥
श्लोक:
एतस्मिन्नन्तरे त्रस्ताः शब्देन महता ततः।
अर्दिता यूथपा मत्ताः सयूथाद् दुद्रुवुर्दिशः॥४॥
भावार्थ :-
इसी बीच में सेना के महान् कोलाहल से भयभीत एवं पीड़ित हो हाथियों के कितने ही मतवाले यूथपति अपने यूथों के साथ सम्पूर्ण दिशाओं में भागने लगे॥४॥
वाल्मीकि रामायण- अयोध्याकाण्ड सर्ग- ९७
अयोध्याकाण्डम्
सप्तनवतितमः सर्गः (सर्ग 97)
( श्रीराम का लक्ष्मण के रोष को शान्त करके भरत के सद्भाव का वर्णन करना,लक्ष्मण का लज्जित होना और भरत की सेना का पर्वत के नीचे छावनी डालना )
श्लोक:
सुसंरब्धं तु भरतं लक्ष्मणं क्रोधमूर्च्छितम्।
रामस्तु परिसान्त्व्याथ वचनं चेदमब्रवीत्॥१॥
भावार्थ :-
लक्ष्मण भरत के प्रति रोषावेश के कारण क्रोधवश अपना विवेक खो बैठे थे, उस अवस्था में श्रीराम ने उन्हें समझा-बुझाकर शान्त किया और इस प्रकार कहा-॥१॥
श्लोक:
किमत्र धनुषा कार्यमसिना वा सचर्मणा।
महाबले महोत्साहे भरते स्वयमागते॥२॥
भावार्थ :-
‘लक्ष्मण! महाबली और महान् उत्साही भरत जब स्वयं यहाँ आ गये हैं, तब इस समय यहाँ धनुष अथवा ढाल-तलवार से क्या काम है?॥२॥
श्लोक:
पितुः सत्यं प्रतिश्रुत्य हत्वा भरतमाहवे।
किं करिष्यामि राज्येन सापवादेन लक्ष्मण॥३॥
भावार्थ :-
‘लक्ष्मण! पिता के सत्य की रक्षा के लिये प्रतिज्ञा करके यदि मैं युद्ध में भरत को मारकर उनका राज्य छीन लूँ तो संसार में मेरी कितनी निन्दा होगी, फिर उस कलंकित राज्य को लेकर मैं क्या करूँगा?॥३॥
श्लोक:
यद् द्रव्यं बान्धवानां वा मित्राणां वा क्षये भवेत्।
नाहं तत् प्रतिगृह्णीयां भक्ष्यान् विषकृतानिव॥४॥
भावार्थ :-
‘अपने बन्धु-बान्धवों या मित्रों का विनाश करके जिस धन की प्राप्ति होती हो, वह तो विषमिश्रित भोजन के समान सर्वथा त्याग देने योग्य है; उसे मैं कदापि ग्रहण नहीं करूँगा॥४॥
वाल्मीकि रामायण- अयोध्याकाण्ड सर्ग- ९८
अयोध्याकाण्डम्
अष्टनवतितमः सर्गः (सर्ग 98)
( भरत के द्वारा श्रीराम के आश्रम की खोज का प्रबन्ध तथा उन्हें आश्रम का दर्शन )
श्लोक:
निवेश्य सेनां तु विभुः पद्भ्यां पादवतां वरः।
अभिगन्तुं स काकुत्स्थमियेष गुरुवर्तकम्॥१॥
निविष्टमात्रे सैन्ये तु यथोद्देशं विनीतवत्।
भरतो भ्रातरं वाक्यं शत्रुघ्नमिदमब्रवीत्॥२॥
भावार्थ :-
इस प्रकार सेना को ठहराकर जंगम प्राणियों में श्रेष्ठ एवं प्रभावशाली भरत ने गुरुसेवापरायण (एवं पिता के आज्ञा पालक) श्रीरामचन्द्रजी के पास जाने का विचार किया। जब सारी सेना विनीत भाव से यथास्थान ठहर गयी, तब भरत ने अपने भाई शत्रुघ्न से इस प्रकार कहा-॥१-२॥
श्लोक:
क्षिप्रं वनमिदं सौम्य नरसंधैः समन्ततः।
लुब्धैश्च सहितैरेभिस्त्वमन्वेषितुमर्हसि॥३॥
भावार्थ :-
‘सौम्य! बहुत-से मनुष्यों के साथ इन निषादों को भी साथ लेकर तुम्हें शीघ्र ही इस वन में चारों ओर श्रीरामचन्द्रजी की खोज करनी चाहिये॥३॥
श्लोक:
गुहो ज्ञातिसहस्रेण शरचापासिपाणिना।
समन्वेषतु काकुत्स्थावस्मिन् परिवृतः स्वयम्॥४॥
भावार्थ :-
‘निषादराज गुह स्वयं भी धनुष-बाण और तलवार धारण करने वाले अपने सहस्रों बन्धु-बान्धवों से घिरे हुए जायँ और इस वन में ककुत्स्थवंशी श्रीराम और लक्ष्मण का अन्वेषण करें॥४॥
श्लोक:
अमात्यैः सह पौरैश्च गुरुभिश्च द्विजातिभिः।
सह सर्वं चरिष्यामि पद्भ्यां परिवृतः स्वयम्॥५॥
भावार्थ :-
‘मैं स्वयं भी मन्त्रियों, पुरवासियों, गुरुजनों तथा ब्राह्मणों के साथ उन सबसे घिरा रहकर पैदल ही सारे वन में विचरण करूँगा॥५॥
वाल्मीकि रामायण- अयोध्याकाण्ड सर्ग- ९९
अयोध्याकाण्डम्
नवनवतितमः सर्गः (सर्ग 99)
( भरत का शत्रुघ्न आदि के साथ श्रीराम के आश्रम पर जाना, उनकी पर्णशाला देख रोते-रोते चरणों में गिरना, श्रीराम का उन सबको हृदय से लगाना )
श्लोक:
निविष्टायां तु सेनायामुत्सुको भरतस्ततः।
जगाम भ्रातरं द्रष्टं शत्रुघ्नमनुदर्शयन्॥१॥
भावार्थ :-
सेना के ठहर जाने पर भाई के दर्शन के लिये उत्कण्ठित होकर भरत अपने छोटे भाई शत्रुघ्न को आश्रम के चिह्न दिखाते हुए उसकी ओर चले॥१॥
श्लोक:
ऋषिं वसिष्ठं संदिश्य मातृमें शीघ्रमानय।
इति त्वरितमग्रे स जगाम गुरुवत्सलः॥२॥
भावार्थ :-
गुरुभक्त भरत महर्षि वसिष्ठ को यह संदेश देकर कि आप मेरी माताओं को साथ लेकर शीघ्र ही आइये, तुरंत आगे बढ़ गये॥२॥
श्लोक:
सुमन्त्रस्त्वपि शत्रुघ्नमदूरादन्वपद्यत।
रामदर्शनजस्त! भरतस्येव तस्य च॥३॥
भावार्थ :-
सुमन्त्र भी शत्रुघ्न के समीप ही पीछे-पीछे चल रहे थे। उन्हें भी भरत के समान ही श्रीरामचन्द्रजी के दर्शन की तीव्र अभिलाषा थी॥३॥
श्लोक:
गच्छन्नेवाथ भरतस्तापसालयसंस्थिताम्।
भ्रातुः पर्णकुटी श्रीमानुटजं च ददर्श ह॥४॥
भावार्थ :-
चलते-चलते ही श्रीमान् भरत ने तपस्वीजनों के आश्रमों के समान प्रतिष्ठित हुई भाई की पर्णकुटी और झोंपड़ी देखी॥४॥
वाल्मीकि रामायण- अयोध्याकाण्ड सर्ग- १००
अयोध्याकाण्डम्
शततमः सर्गः (सर्ग 100)
( श्रीराम का भरत को कुशल-प्रश्न के बहाने राजनीति का उपदेश करना )
श्लोक:
जटिलं चीरवसनं प्राञ्जलिं पतितं भुवि।
ददर्श रामो दुर्दर्श युगान्ते भास्करं यथा॥१॥
कथंचिदभिविज्ञाय विवर्णवदनं कृशम्।
भ्रातरं भरतं रामः परिजग्राह पाणिना॥२॥
आघ्राय रामस्तं मूर्ध्नि परिष्वज्य च राघवम्।
अङ्के भरतमारोप्य पर्यपृच्छत सादरम्॥३॥
भावार्थ :-
जटा और चीर-वस्त्र धारण किये भरत हाथ जोड़कर पृथ्वी पर पड़े थे, मानो प्रलयकाल में सूर्यदेव धरती पर गिर गये हों। उनको उस अवस्था में देखना किसी भी स्नेही सुहृद् के लिये अत्यन्त कठिन था। श्रीराम ने उन्हें देखा और जैसे-तैसे किसी तरह पहचाना। उनका मुख उदास हो गया था। वे बहुत दुर्बल हो गये थे। श्रीराम ने भाई भरत को अपने हाथ से पकड़कर उठाया और उनका मस्तक सूंघकर उन्हें हृदय से लगा लिया। इसके बाद रघुकुलभूषण भरत को गोद में बिठाकर श्रीराम ने बड़े आदर से पूछा-॥१-३॥
श्लोक:
क्व नु तेऽभूत् पिता तात यदरण्यं त्वमागतः।
न हि त्वं जीवतस्तस्य वनमागन्तुमर्हसि॥४॥
भावार्थ :-
‘तात! पिताजी कहाँ थे कि तुम इस वन में आये हो? उनके जीते-जी तो तुम वन में नहीं आ सकते थे॥४॥
श्लोक:
चिरस्य बत पश्यामि दूराद् भरतमागतम्।
दुष्प्रतीकमरण्येऽस्मिन् किं तात वनमागतः॥५॥
भावार्थ :-
‘मैं दीर्घकाल के बाद दूर से (नाना के घर से) आये हुए भरत को आज इस वन में देख रहा हूँ; परंतु इनका शरीर बहुत दुर्बल हो गया है। तात! तुम क्यों वन में आये हो?॥५॥
वाल्मीकि रामायण- अयोध्याकाण्ड सर्ग- १०१
अयोध्याकाण्डम्
एकाधिकशततमः सर्गः (सर्ग 101)
( श्रीराम का भरत से वन में आगमन का प्रयोजन पूछना, भरत का उनसे राज्य ग्रहण करने के लिये कहना और श्रीराम का उसे अस्वीकार कर देना )
श्लोक:
तं तु रामः समाज्ञाय भ्रातरं गुरुवत्सलम्।
लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा प्रष्टुं समुपचक्रमे॥१॥
भावार्थ :-
लक्ष्मणसहित श्रीरामचन्द्रजी ने अपने गुरुभक्त भाई भरत को अच्छी तरह समझाकर अथवा उन्हें अपने में अनुरक्त जानकर उनसे इस प्रकार पूछना आरम्भ किया-॥१॥
श्लोक:
किमेतदिच्छेयमहं श्रोतुं प्रव्याहृतं त्वया।
यस्मात्त्वमागतो देशमिमं चीरजटाजिनी॥२॥
किं निमित्तमिमं देशं कृष्णाजिनजटाधरः।
हित्वा राज्यं प्रविष्टस्त्वं तत् सर्वं वक्तुमर्हसि॥३॥
भावार्थ :-
‘भाई! तुम राज्य छोड़कर वल्कल, कृष्णमृगचर्म और जटा धारण करके जो इस देश में आये हो, इसका क्या कारण है? जिस निमित्त से इस वन में तुम्हारा प्रवेश हुआ है, यह मैं तुम्हारे मुँह से सुनना चाहता हूँ। तुम्हें सब कुछ साफ-साफ बताना चाहिये’॥२-३॥
श्लोक:
इत्युक्तः केकयीपुत्रः काकुत्स्थेन महात्मना।
प्रगृह्य बलवद् भूयः प्राञ्जलिर्वाक्यमब्रवीत्॥४॥
भावार्थ :-
ककुत्स्थवंशी महात्मा श्रीरामचन्द्रजी के इस प्रकार पूछने पर भरत ने बलपूर्वक आन्तरिक शोक को दबा पुनः हाथ जोड़कर इस प्रकार कहा-॥४॥
श्लोक:
आर्य तातः परित्यज्य कृत्वा कर्म सुदुष्करम्।
गतः स्वर्गं महाबाहः पुत्रशोकाभिपीडितः॥५॥
भावार्थ :-
‘आर्य! हमारे महाबाहु पिता अत्यन्त दुष्कर कर्म करके पुत्रशोक से पीड़ित हो हमें छोड़कर स्वर्गलोक को चले गये॥५॥
वाल्मीकि रामायण- अयोध्याकाण्ड सर्ग- १०२
अयोध्याकाण्डम्
द्व्यधिकशततमः सर्गः (सर्ग 102)
( भरत का पुनः श्रीराम से राज्य ग्रहण करने का अनुरोध करके उनसे पिता की मृत्यु का समाचार बताना )
श्लोक:
रामस्य वचनं श्रुत्वा भरतः प्रत्युवाच ह।
किं मे धर्माद विहीनस्य राजधर्मः करिष्यति॥१॥
भावार्थ :-
श्रीरामचन्द्रजी की बात सुनकर भरत ने इस प्रकार उत्तर दिया— भैया! मैं राज्य का अधिकारी न होने के कारण उस राजधर्म के अधिकार से रहित हूँ, अतः मेरे लिये यह राजधर्म का उपदेश किस काम आयगा?॥१॥
श्लोक:
शाश्वतोऽयं सदा धर्मः स्थितोऽस्मासु नरर्षभ।
ज्येष्ठ पुत्रे स्थिते राजा न कनीयान् भवेन्नृपः॥२॥
भावार्थ :-
‘नरश्रेष्ठ! हमारे यहाँ सदा से ही इस शाश्वत धर्म का पालन होता आया है कि ज्येष्ठ पुत्र के रहते हुए छोटा पुत्र राजा नहीं हो सकता॥२॥
श्लोक:
स समृद्धां मया सार्धमयोध्यां गच्छ राघव।
अभिषेचय चात्मानं कुलस्यास्य भवाय नः॥३॥
भावार्थ :-
‘अतः रघुनन्दन! आप मेरे साथ समृद्धिशालिनी अयोध्यापुरी को चलिये और हमारे कुल के अभ्युदय के लिये राजा के पद पर अपना अभिषेक कराइये॥३॥
श्लोक:
राजानं मानुषं प्राहुर्देवत्वे सम्मतो मम।
यस्य धर्मार्थसहितं वृत्तमाहुरमानुषम्॥४॥
भावार्थ :-
‘यद्यपि सब लोग राजा को मनुष्य कहते हैं, तथापि मेरी राय में वह देवत्वपर प्रतिष्ठित है; क्योंकि उसके धर्म और अर्थयुक्त आचार को साधारण मनुष्य के लिये असम्भावित बताया गया है॥४॥
वाल्मीकि रामायण- अयोध्याकाण्ड सर्ग- १०३
अयोध्याकाण्डम्
त्र्यधिकशततमः सर्गः (सर्ग 103)
( श्रीराम आदि का विलाप, पिता के लिये जलाञ्जलि-दान, पिण्डदान और रोदन )
श्लोक:
तां श्रुत्वा करुणां वाचं पितुर्मरणसंहिताम्।
राघवो भरतेनोक्तां बभूव गतचेतनः॥१॥
भावार्थ :-
भरत की कही हुई पिता की मृत्यु से सम्बन्ध रखने वाली करुणाजनक बात सुनकर श्रीरामचन्द्रजी दुःख के कारण अचेत हो गये॥१॥
श्लोक:
तं तु वज्रमिवोत्सृष्टमाहवे दानवारिणा।
वाग्वजं भरतेनोक्तममनोज्ञं परंतपः॥२॥
प्रगृह्य रामो बाहू वै पुष्पिताङ्ग इव द्रुमः।
वने परशुना कृत्तस्तथा भुवि पपात ह॥३॥
भावार्थ :-
भरत के मुख से निकला हुआ वह वचन वज्र-सा लगा, मानो दानवशत्रु इन्द्र ने युद्धस्थल में वज्र का प्रहार-सा कर दिया हो। मन को प्रिय न लगने वाले उस वाग्-वज्र को सुनकर शत्रुओं को संताप देने वाले श्रीराम दोनों भुजाओं को ऊपर उठाकर जिसकी डालियाँ खिली हुई हों, वन में कुल्हाड़ी से कटे हुए उस वृक्ष की भाँति पृथ्वी पर गिर पड़े (भरत के दर्शन से श्रीराम को हर्ष हुआ था, पिताकी मृत्यु के संवाद से दुःख; अतः उन्हें खिले और कटे हुए पेड़ की उपमा दी गयी है)॥२-३॥
श्लोक:
तथा हि पतितं रामं जगत्यां जगतीपतिम्।
कूलघातपरिश्रान्तं प्रसुप्तमिव कुञ्जरम्॥४॥
भ्रातरस्ते महेष्वासं सर्वतः शोककर्शितम्।
रुदन्तः सह वैदेह्या सिषिचुः सलिलेन वै॥५॥
भावार्थ :-
पृथ्वीपति श्रीराम इस प्रकार पृथ्वी पर गिरकर नदी के तटको दाँतों से विदीर्ण करने के परिश्रम से थककर सोये हुए हाथी के समान प्रतीत होते थे। शोक के कारण दुर्बल हुए उन महाधनुर्धर श्रीराम को सब ओर से घेरकर सीतासहित रोते हुए वे तीनों भाई आँसुओं के जलसे भिगोने लगे॥४-५॥
श्लोक:
स तु संज्ञां पुनर्लब्ध्वा नेत्राभ्यामश्रुमुत्सृजन्।
उपाक्रामत काकुत्स्थः कृपणं बहु भाषितुम्॥६॥
भावार्थ :-
थोड़ी देर बाद पुनः होश में आने पर नेत्रों से अश्रुवर्षा करते हुए ककुत्स्थकुलभूषण श्रीराम ने अत्यन्त दीन वाणी में विलाप आरम्भ किया।॥६॥
वाल्मीकि रामायण- अयोध्याकाण्ड सर्ग- १०४
अयोध्याकाण्डम्
चतुरधिकशततमः सर्गः (सर्ग 104)
श्लोक:
वसिष्ठः पुरतः कृत्वा दारान् दशरथस्य च।
अभिचक्राम तं देशं रामदर्शनतर्षितः॥१॥
भावार्थ :-
महर्षि वसिष्ठजी महाराज दशरथ की रानियों को आगे करके श्रीरामचन्द्रजी को देखने की अभिलाषा लिये उस स्थान की ओर चले, जहाँ उनका आश्रम था॥१॥
श्लोक:
राजपत्न्यश्च गच्छन्त्यो मन्दं मन्दाकिनी प्रति।
ददृशुस्तत्र तत् तीर्थं रामलक्ष्मणसेवितम्॥२॥
भावार्थ :-
राजरानियाँ मन्द गति से चलती हुई जब मन्दाकिनी के तट पर पहुँची, तब उन्होंने वहाँ श्रीराम और लक्ष्मण के स्नान करने का घाट देखा॥२॥
श्लोक:
कौसल्या बाष्पपूर्णेन मुखेन परिशुष्यता।
सुमित्रामब्रवीद् दीनां याश्चान्या राजयोषितः॥३॥
भावार्थ :-
इस समय कौसल्या के मुँह पर आँसुओं की धारा बह चली। उन्होंने सूखे एवं उदास मुख से दीन सुमित्रा तथा अन्य राजरानियों से कहा-॥३॥
श्लोक:
इदं तेषामनाथानां क्लिष्टमक्लिष्टकर्मणाम्।
वने प्राक्कलनं तीर्थं ये ते निर्विषयीकृताः॥४॥
भावार्थ :-
‘जो राज्य से निकाल दिये गये हैं तथा जो दूसरों को क्लेश न देने वाले कार्य ही करते हैं, उन मेरे अनाथ बच्चों का यह वन में दुर्गम तीर्थ है, जिसे इन्होंने पहले पहल स्वीकार किया है॥४॥
वाल्मीकि रामायण- अयोध्याकाण्ड सर्ग- १०५
अयोध्याकाण्डम्
पञ्चाधिकशततमः सर्गः (सर्ग 105)
( भरत का श्रीराम को राज्य ग्रहण करने के लिये कहना, श्रीराम का पिताकी आज्ञा का पालन करने के लिये ही राज्य ग्रहण न करके वन में रहने का ही दृढ़ निश्चय बताना )
श्लोक:
ततः पुरुषसिंहानां वृतानां तैः सुहृद्गणैः।
शोचतामेव रजनी दुःखेन व्यत्यवर्तत॥१॥
रजन्यां सुप्रभातायां भ्रातरस्ते सुहृवृताः।
मन्दाकिन्यां हुतं जप्यं कृत्वा राममुपागमन्॥२॥
भावार्थ :-
अपने सुहृदों से घिरकर बैठे हुए पुरुषसिंह श्रीराम आदि भाइयों की वह रात्रि पिताकी मृत्यु के दुःख से शोक करते हुए ही व्यतीत हुई। सबेरा होने पर भरत आदि तीनों भाई सुहृदों के साथ ही मन्दाकिनी के तटपर गये और स्नान, होम एवं जप आदि करके पुनः श्रीराम के पास लौट आये॥१-२॥
श्लोक:
तूष्णीं ते समुपासीना न कश्चित् किंचिदब्रवीत्।
भरतस्तु सुहृन्मध्ये रामं वचनमब्रवीत्॥३॥
भावार्थ :-
वहाँ आकर सभी चुपचाप बैठ गये। कोई कुछ नहीं बोल रहा था। तब सुहृदों के बीच में बैठे हुए भरत ने श्रीराम से इस प्रकार कहा—॥३॥
श्लोक:
सान्त्विता मामिका माता दत्तं राज्यमिदं मम।
तद् ददामि तवैवाहं भुक्ष्व राज्यमकण्टकम्॥४॥
भावार्थ :-
‘भैया! पिताजीने वरदान देकर मेरी माता को संतुष्ट कर दिया और माता ने यह राज्य मुझे दे दिया। अब मैं अपनी ओर से यह अकण्टक राज्य आपकी ही सेवा में समर्पित करता हूँ। आप इसका पालन एवं उपभोग कीजिये॥४॥
श्लोक:
महतेवाम्बुवेगेन भिन्नः सेतुर्जलागमे।
दुरावरं त्वदन्येन राज्यखण्डमिदं महत्॥५॥
भावार्थ :-
‘वर्षाकाल में जल के महान् वेग से टूटे हुए सेतु की भाँति इस विशाल राज्यखण्ड को सँभालना आपके सिवा दूसरे के लिये अत्यन्त कठिन है॥५॥
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