॥ श्री गणेशाय नमः ॥
॥ श्री कमलापति नम: ॥
॥ श्री जानकीवल्लभो विजयते ॥
॥ श्री वाल्मीकि रामायण ॥
(भावार्थ सहित)
सब एक ही स्थान पर
अरण्यकाण्ड सर्ग- ६७-७५
अरण्यकाण्डम्
सप्तषष्टितमः सर्गः (सर्ग 67)
( श्रीराम और लक्ष्मण की पक्षिराज जटायु से भेंट तथा श्रीराम का उन्हें गले से लगाकर रोना )
श्लोक:
पूर्वजोऽप्युक्तमात्रस्तु लक्ष्मणेन सुभाषितम्।
सारग्राही महासारं प्रतिजग्राह राघवः॥१॥
भावार्थ :-
भगवान् श्रीरामचन्द्रजी सब वस्तुओं का सार ग्रहण करने वाले हैं। अवस्था में बड़े होने पर भी उन्होंने लक्ष्मण के कहे हुए अत्यन्त सारगर्भित उत्तम वचनों को सुनकर उन्हें स्वीकार किया॥१॥
श्लोक:
स निगृह्य महाबाहुः प्रवृद्धं रोषमात्मनः।
अवष्टभ्य धनुश्चित्रं रामो लक्ष्मणमब्रवीत्॥२॥
भावार्थ :-
तदनन्तर महाबाहु श्रीराम ने अपने बढ़े हुए रोष को रोका और उस विचित्र धनुष को उतारकर लक्ष्मण से कहा-॥२॥
श्लोक:
किं करिष्यावहे वत्स क्व वा गच्छाव लक्ष्मण।
केनोपायेन पश्यावः सीतामिह विचिन्तय॥३॥
भावार्थ :-
‘वत्स! अब हमलोग क्या करें? कहाँ जायँ? लक्ष्मण! किस उपाय से हमें सीता का पता लगे? यहाँ इसका विचार करो’॥३॥
श्लोक:
तं तथा परितापार्तं लक्ष्मणो वाक्यमब्रवीत्।
इदमेव जनस्थानं त्वमन्वेषितुमर्हसि॥४॥
भावार्थ :-
तब लक्ष्मण ने इस प्रकार संतापपीड़ित हुए श्रीराम से कहा—’भैया! आपको इस जनस्थान में ही सीता की खोज करनी चाहिये॥४॥
वाल्मीकि रामायण- अरण्यकाण्ड सर्ग- ६८
अरण्यकाण्डम्
अष्टषष्टितमः सर्गः (सर्ग 68)
( जटायु का प्राण-त्याग और श्रीराम द्वारा उनका दाह-संस्कार )
श्लोक:
रामः प्रेक्ष्य तु तं गृधं भुवि रौद्रेण पातितम्।
सौमित्रिं मित्रसम्पन्नमिदं वचनमब्रवीत्॥१॥
भावार्थ :-
भयंकर राक्षस रावण ने जिसे पृथ्वी पर मार गिराया था, उस गृध्रराज जटायु की ओर दृष्टि डालकर भगवान् श्रीराम मित्रोचित गुण से सम्पन्न सुमित्राकुमार लक्ष्मण से बोले-॥१॥
श्लोक:
ममायं नूनमर्थेषु यतमानो विहंगमः।
राक्षसेन हतः संख्ये प्राणांस्त्यजति मत्कृते॥२॥
भावार्थ :-
‘भाई! यह पक्षी अवश्य मेरा ही कार्य सिद्ध करने के लिये प्रयत्नशील था, किंतु उस राक्षस के द्वारा युद्ध में मारा गया। यह मेरे ही लिये अपने प्राणों का परित्याग कर रहा है॥२॥
श्लोक:
अतिखिन्नः शरीरेऽस्मिन् प्राणो लक्ष्मण विद्यते।
तथा स्वरविहीनोऽयं विक्लवं समुदीक्षते॥३॥
भावार्थ :-
‘लक्ष्मण! इस शरीर के भीतर इसके प्राणों को बड़ी वेदना हो रही है, इसीलिये इसकी आवाज बंद होती जा रही है तथा यह अत्यन्त व्याकुल होकर देख रहा है॥३॥
श्लोक:
जटायो यदि शक्नोषि वाक्यं व्याहरितुं पुनः।
सीतामाख्याहि भद्रं ते वधमाख्याहि चात्मनः॥४॥
भावार्थ :-
(लक्ष्मण से ऐसा कहकर श्रीराम उस पक्षी से बोले -) ‘जटायो! यदि आप पुनः बोल सकते हों तो आपका भला हो, बताइये, सीता की क्या अवस्था है? और आपका वध किस प्रकार हुआ?॥४॥
वाल्मीकि रामायण- अरण्यकाण्ड सर्ग- ६९
अरण्यकाण्डम्
एकोनसप्ततितमः सर्गः (सर्ग 69)
( लक्ष्मण का अयोमुखी को दण्ड देना तथा श्रीराम और लक्ष्मण का कबन्ध के बाहुबन्ध में पड़कर चिन्तित होना )
श्लोक:
कृत्वैवमुदकं तस्मै प्रस्थितौ राघवौ तदा।
अवेक्षन्तौ वने सीतां जग्मतुः पश्चिमां दिशम्॥१॥
भावार्थ :-
इस प्रकार जटायु के लिये जलाञ्जलि दान करके वे दोनों रघुवंशी बन्धु उस समय वहाँ से प्रस्थित हुए और वन में सीता की खोज करते हुए पश्चिम दिशा (नैर्ऋत्य कोण) की ओर गये॥१॥
श्लोक:
तां दिशं दक्षिणां गत्वा शरचापासिधारिणौ।
अविप्रहतमैक्ष्वाकौ पन्थानं प्रतिपेदतुः॥२॥
भावार्थ :-
धनुष, बाण और खड्ग धारण किये वे दोनों इक्ष्वाकुवंशी वीर उस दक्षिण-पश्चिम दिशा की ओर आगे बढ़ते हुए एक ऐसे मार्ग पर जा पहुँचे, जिसपर लोगों का आना-जाना नहीं होता था॥२॥
श्लोक:
गुल्मैर्वृक्षैश्च बहुभिर्लताभिश्च प्रवेष्टितम्।
आवृतं सर्वतो दुर्गं गहनं घोरदर्शनम्॥३॥
भावार्थ :-
वह मार्ग बहुत-से वृक्षों, झाड़ियों और लता बेलों द्वारा सब ओर से घिरा हुआ था। वह बहुत ही दुर्गम, गहन और देखने में भयंकर था॥३॥
श्लोक:
व्यतिक्रम्य तु वेगेन गृहीत्वा दक्षिणां दिशम्।
सुभीमं तन्महारण्यं व्यतियातौ महाबलौ॥४॥
भावार्थ :-
उसे वेगपूर्वक लाँघकर वे दोनों महाबली राजकुमार दक्षिण दिशा का आश्रय ले उस अत्यन्त भयानक और विशाल वन से आगे निकल गये॥४॥
वाल्मीकि रामायण- अरण्यकाण्ड सर्ग- ७०
अरण्यकाण्डम्
सप्ततितमः सर्गः (सर्ग 70)
( श्रीराम और लक्ष्मण का परस्पर विचार करके कबन्ध की दोनों भुजाओं को काट डालना तथा कबन्ध के द्वारा उनका स्वागत )
श्लोक:
तौ तु तत्र स्थितौ दृष्ट्वा भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ।
बाहुपाशपरिक्षिप्तौ कबन्धो वाक्यमब्रवीत्॥१॥
भावार्थ :-
अपने बाहुपाश से घिरकर वहाँ खड़े हुए उन दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण की ओर देखकर कबन्ध ने कहा—॥१॥
श्लोक:
तिष्ठतः किं नु मां दृष्ट्वा क्षुधार्तं क्षत्रियर्षभौ।
आहारार्थं तु संदिष्टौ दैवेन हतचेतनौ॥२॥
भावार्थ :-
‘क्षत्रियशिरोमणि राजकुमारो! मुझे भूख से पीड़ित देखकर भी खड़े क्यों हो? (मेरे मुँह में चले आओ) क्योंकि दैव ने मेरे भोजन के लिये ही तुम्हें यहाँ भेजा है। इसीलिये तुम दोनों की बुद्धि मारी गयी है’॥२॥
श्लोक:
तच्छ्रुत्वा लक्ष्मणो वाक्यं प्राप्तकालं हितं तदा।
उवाचार्तिसमापन्नो विक्रमे कृतनिश्चयः॥३॥
भावार्थ :-
यह सुनकर पीड़ित हुए लक्ष्मण ने उस समय पराक्रम का ही निश्चय करके यह समयोचित एवं हितकर बात कही-॥३॥
श्लोक:
त्वां च मां च पुरा तूर्णमादत्ते राक्षसाधमः।
तस्मादसिभ्यामस्याशु बाहू छिन्दावहे गुरू॥४॥
भावार्थ :-
‘भैया! यह नीच राक्षस मुझको और आपको तुरंत मुँह में ले ले, इसके पहले ही हमलोग अपनी तलवारों से इसकी बड़ी-बड़ी बाँहें शीघ्र ही काट डालें॥४॥
वाल्मीकि रामायण- अरण्यकाण्ड सर्ग- ७१
अरण्यकाण्डम्
एकसप्ततितमः सर्गः (सर्ग 71)
( कबन्ध की आत्मकथा, अपने शरीर का दाह हो जाने पर उसका श्रीराम को सीता के अन्वेषण में सहायता देने का आश्वासन )
श्लोक:
पुरा राम महाबाहो महाबलपराक्रमम्।
रूपमासीन्ममाचिन्त्यं त्रिषु लोकेषु विश्रुतम्॥१॥
भावार्थ :-
‘महाबाहु श्रीराम! पूर्वकाल में मेरा रूप महान् बलपराक्रम से सम्पन्न, अचिन्त्य तथा तीनों लोकों में विख्यात था॥१॥
श्लोक:
यथा सूर्यस्य सोमस्य शक्रस्य च यथा वपुः।
सोऽहं रूपमिदं कृत्वा लोकवित्रासनं महत्॥२॥
ऋषीन् वनगतान् राम त्रासयामि ततस्ततः।
भावार्थ :-
‘सूर्य, चन्द्रमा और इन्द्र का शरीर जैसा तेजस्वी है, वैसा ही मेरा भी था। ऐसा होने पर भी मैं लोगों को भयभीत करने वाले इस अत्यन्त भयंकर राक्षसरूप को धारण करके इधर-उधर घूमता और वन में रहने वाले ऋषियों को डराया करता था॥२ १/२॥
श्लोक:
ततः स्थूलशिरा नाम महर्षिः कोपितो मया॥३॥
स चिन्वन् विविधं वन्यं रूपेणानेन धर्षितः।
तेनाहमुक्तः प्रेक्ष्यैवं घोरशापाभिधायिना॥४॥
भावार्थ :-
अपने इस बर्ताव से एक दिन मैंने स्थूलशिरा नामक महर्षि को कुपित कर दिया। वे नाना प्रकार के जंगली फल-मूल आदि का संचय कर रहे थे, उसी समय मैंने उन्हें इस राक्षसरूप से डरा दिया। मुझे ऐसे विकट रूप में देखकर उन्होंने घोर शाप देते हुए कहा—॥३-४॥
श्लोक:
एतदेवं नृशंसं ते रूपमस्तु विगर्हितम्।
स मया याचितः क्रुद्धः शापस्यान्तो भवेदिति॥५॥
अभिशापकृतस्येति तेनेदं भाषितं वचः।
भावार्थ :-
‘दुरात्मन् ! आज से सदा के लिये तुम्हारा यही क्रूर और निन्दित रूप रह जाय।’ यह सुनकर मैंने उन कुपित महर्षि से प्रार्थना की- ’भगवन्! इस अभिशाप (तिरस्कार) जनित शाप का अन्त होना चाहिये।’ तब उन्होंने इस प्रकार कहा-॥५ १/२॥
वाल्मीकि रामायण- अरण्यकाण्ड सर्ग- ७२
अरण्यकाण्डम्
द्विसप्ततितमः सर्गः (सर्ग 72)
( श्रीराम और लक्ष्मण के द्वारा चिता की आग में कबन्ध का दाह तथा उसका दिव्य रूप में प्रकट होकर उन्हें सग्रीव से मित्रता करने के लिये कहना )
श्लोक:
एवमुक्तौ तु तौ वीरौ कबन्धेन नरेश्वरौ।
गिरिप्रदरमासाद्य पावकं विससर्जतुः॥१॥
भावार्थ :-
कबन्ध के ऐसा कहने पर उन दोनों वीर नरेश्वर श्रीराम और लक्ष्मण ने उसके शरीर को एक पर्वत के गड्ढे में डालकर उसमें आग लगा दी॥१॥
श्लोक:
लक्ष्मणस्तु महोल्काभिर्खलिताभिः समन्ततः।
चितामादीपयामास सा प्रजज्वाल सर्वतः॥२॥
भावार्थ :-
लक्ष्मण ने जलती हुई बड़ी-बड़ी लुकारियों के द्वारा चारों ओर से उसकी चिता में आग लगायी; फिर तो वह सब ओर से प्रज्वलित हो उठी॥२॥
श्लोक:
तच्छरीरं कबन्धस्य घृतपिण्डोपमं महत्।
मेदसा पच्यमानस्य मन्दं दहत पावकः॥३॥
भावार्थ :-
चिता में जलते हुए कबन्ध का विशाल शरीर चर्बियों से भरा होने के कारण घी के लोदे के समान प्रतीत होता था। चिता की आग उसे धीरे-धीरे जलाने लगी॥३॥
श्लोक:
सविधूय चितामाशु विधूमोऽग्निरिवोत्थितः।
अरजे वाससी बिभ्रन्माल्यं दिव्यं महाबलः॥४॥
भावार्थ :-
तदनन्तर वह महाबली कबन्ध तुरंत ही चिता को हिलाकर दो निर्मल वस्त्र और दिव्य पुष्पों का हार धारण किये धूमरहित अग्नि के समान उठ खड़ा हुआ॥४॥
वाल्मीकि रामायण- अरण्यकाण्ड सर्ग- ७३
अरण्यकाण्डम्
त्रिसप्ततितमः सर्गः (सर्ग 73)
( दिव्य रूपधारी कबन्ध का श्रीराम और लक्ष्मण को ऋष्यमूक और पम्पासरोवर का मार्ग बताना तथा मतङ्गमुनि के वन एवं आश्रम का परिचय देकर प्रस्थान करना )
श्लोक:
दर्शयित्वा तु रामाय सीतायाः परिमार्गणे।
वाक्यमन्वर्थमर्थज्ञः कबन्धः पुनरब्रवीत्॥१॥
भावार्थ :-
श्रीराम को सीता की खोज का उपाय दिखाकर अर्थवेत्ता कबन्ध ने उनसे पुनः यह प्रयोजनयुक्त बात कही—॥१॥
श्लोक:
एष राम शिवः पन्था यत्रैते पुष्पिता द्रुमाः।
प्रतीची दिशमाश्रित्य प्रकाशन्ते मनोरमाः॥२॥
भावार्थ :-
‘श्रीराम! यहाँ से पश्चिम दिशा का आश्रय लेकर जहाँ ये फूलों से भरे हुए मनोरम वृक्ष शोभा पा रहे हैं, यही आपके जाने लायक सुखद मार्ग है॥२॥
श्लोक:
जम्बूप्रियालपनसा न्यग्रोधप्लक्षतिन्दुकाः।
अश्वत्थाः कर्णिकाराश्च चूताश्चान्ये च पादपाः॥३॥
धन्वना नागवृक्षाश्च तिलका नक्तमालकाः।
नीलाशोकाः कदम्बाश्च करवीराश्च पुष्पिताः॥४॥
अग्निमुख्या अशोकाश्च सुरक्ताः पारिभद्रकाः।
तानारुह्याथवा भूमौ पातयित्वा च तान् बलात्॥५॥
फलान्यमृतकल्पानि भक्षयित्वा गमिष्यथः।
भावार्थ :-
‘जामुन, प्रियाल (चिरौंजी), कटहल, बड़, पाकड़, तेंदू, पीपल, कनेर, आम तथा अन्य वृक्ष, धव, नागकेसर, तिलक, नक्तमाल, नील, अशोक, कदम्ब, खिले हुए करवीर, भिलावा, अशोक, लाल चन्दन तथा मन्दार—ये वृक्ष मार्ग में पड़ेंगे। आप दोनों भाई इनकी डालियों को बलपूर्वक भूमिपर झुकाकर अथवा इन वृक्षों पर चढ़कर इनके अमृततुल्य मधुर फलों का आहार करते हुए यात्रा कीजियेगा॥३–५ १/२॥
वाल्मीकि रामायण- अरण्यकाण्ड सर्ग- ७४
अरण्यकाण्डम्
चतुःसप्ततितमः सर्गः (सर्ग 74)
( श्रीराम और लक्ष्मण का पम्पासरोवर के तट पर मतङ्गवन में शबरी के आश्रम पर जाना, शबरी का अपने शरीर की आहुति दे दिव्यधाम को प्रस्थान करना )
श्लोक:
तौ कबन्धेन तं मागं पम्पाया दर्शितं वने।
आतस्थतुर्दिशं गृह्य प्रतीची नृवरात्मजौ॥१॥
भावार्थ :-
तदनन्तर राजकुमार श्रीराम और लक्ष्मण कबन्ध के बताये हुए पम्पासरोवर के मार्ग का आश्रय ले पश्चिम दिशा की ओर चल दिये॥१॥
श्लोक:
तौ शैलेष्वाचितानेकान् क्षौद्रपुष्पफलद्रुमान्।
वीक्षन्तौ जग्मतुर्द्रष्टुं सुग्रीवं रामलक्ष्मणौ॥२॥
भावार्थ :-
दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण पर्वतों पर फैले हुए बहुत-से वृक्षों को, जो फूल, फल और मधु से सम्पन्न थे, देखते हुए सुग्रीव से मिलने के लिये आगे बढ़े॥२॥
श्लोक:
कृत्वा तु शैलपृष्ठे तु तौ वासं रघुनन्दनौ।
पम्पायाः पश्चिमं तीरं राघवावुपतस्थतुः॥३॥
भावार्थ :-
रात में एक पर्वत-शिखर पर निवास करके रघुकुल का आनन्द बढ़ाने वाले वे दोनों रघुवंशी बन्धु पम्पासरोवर के पश्चिम तट पर जा पहुँचे॥३॥
श्लोक:
तौ पुष्करिण्याः पम्पायास्तीरमासाद्य पश्चिमम्।
अपश्यतां ततस्तत्र शबर्या रम्यमाश्रमम्॥४॥
भावार्थ :-
पम्पानामक पुष्करिणी के पश्चिम तट पर पहुँचकर उन दोनों भाइयों ने वहाँ शबरी का रमणीय आश्रम देखा॥४॥
वाल्मीकि रामायण- अरण्यकाण्ड सर्ग- ७५
अरण्यकाण्डम्
पञ्चसप्ततितमः सर्गः (सर्ग 75)
( श्रीराम और लक्ष्मण की बातचीत तथा उन दोनों भाइयों का पम्पासरोवर के तट पर जाना )
श्लोक:
दिवं तु तस्यां यातायां शबर्यां स्वेन तेजसा।
लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा चिन्तयामास राघवः॥१॥
चिन्तयित्वा तु धर्मात्मा प्रभावं तं महात्मनाम्।
हितकारिणमेकाग्रं लक्ष्मणं राघवोऽब्रवीत्॥२॥
भावार्थ :-
अपने तेज से प्रकाशित होने वाली शबरी के दिव्यलोक में चले जाने पर भाई लक्ष्मणसहित धर्मात्मा श्रीरघुनाथजी ने उन महात्मा महर्षियों के प्रभाव का चिन्तन किया। चिन्तन करके अपने हित में संलग्न रहने वाले एकाग्रचित्त लक्ष्मण से श्रीराम ने इस प्रकार कहा—॥१-२॥
श्लोक:
दृष्टो मयाऽऽश्रमः सौम्य बह्वाश्चर्यः कृतात्मनाम्।
विश्वस्तमृगशार्दूलो नानाविहगसेवितः॥३॥
भावार्थ :-
‘सौम्य! मैंने उन पुण्यात्मा महर्षियों का यह पवित्र आश्रम देखा। यहाँ बहुत-सी आश्चर्यजनक बातें हैं। हरिण और बाघ एक-दूसरे पर विश्वास करते हैं। नाना प्रकार के पक्षी इस आश्रम का सेवन करते हैं॥३॥
श्लोक:
सप्तानां च समुद्राणां तेषां तीर्थेषु लक्ष्मण।
उपस्पृष्टं च विधिवत् पितरश्चापि तर्पिताः॥४॥
प्रणष्टमशुभं यन्नः कल्याणं समुपस्थितम्।
तेन त्वेतत् प्रहृष्टं मे मनो लक्ष्मण सम्प्रति॥५॥
भावार्थ :-
‘लक्ष्मण! यहाँ जो सातों समुद्रों के जल से भरे हुए तीर्थ हैं, उनमें हमने विधिपूर्वक स्नान तथा पितरों का तर्पण किये हैं। इससे हमारा सारा अशुभ नष्ट हो गया और अब हमारे कल्याण का समय उपस्थित हुआ है। सुमित्राकुमार! इससे इस समय मेरे मन में अधिक प्रसन्नता हो रही है॥४-५॥
श्लोक:
हृदये मे नरव्याघ्र शुभमाविर्भविष्यति।
तदागच्छ गमिष्यावः पम्पां तां प्रियदर्शनाम्॥६॥
भावार्थ :-
‘नरश्रेष्ठ! अब मेरे हृदय में कोई शुभ संकल्प उठने वाला है इसलिये आओ, अब हम दोनों परम सुन्दर पम्पासरोवर के तट पर चलें॥६॥











