वाद-विवाद

वाद-विवाद या कोई बहस, किसी विषय पर चर्चा की एक औपचारिक विधि है।


॥ श्री गणेशाय नमः ॥
॥ श्री कमलापति नम: ॥
॥ श्री जानकीवल्लभो विजयते ॥
॥ श्री गुरूदेवाय नमः ॥
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यह स्वंय शिवजी द्वारा माता जगदम्बा से कही गई एक पवित्र कथा है। आप भी विस्तार पूर्वक पढ़े:
शिव-शक्ति श्रीराम मिलन (संपूर्ण भाग) 🌞

वाद-विवाद या कोई बहस, किसी विषय पर चर्चा की एक औपचारिक विधि है। हमारे समाज मे हर व्यक्ति विशेष को अपना पक्ष रखने की पुर्ण आजादी है। वाद-विवाद में दो विपरीत विचारों के समर्थक अपना-अपना पक्ष स्वतंत्र रूप से रखते हैं और दूसरे के कथनों का खण्डन करने का पुर्णत प्रयत्न करते हैं। वाद-विवाद किसी सार्वजनिक बैठकों में भी हो सकता है, यह शैक्षणिक संस्थानों में हो सकता है, विधायी सभाओं (जैसे संसद) में भी हो सकता है।
परन्तु आज कल सोशल मिडिया का जमाना है। और यहा हर कोई दूसरे के कथनों का खण्डन करने का प्रयत्न करते ही रहते हैं। वैसे साफ शब्दो मे कहा जाए तो यह वाद-विवाद एक औपचारिक चर्चा मात्र ही है

चलिए हम श्रीगणेश करते है। गोस्वामी तुलसीदास जी के एक सुन्दर कांड की चौपाई से!

|ढोल, गंवार, शुद्र, पशु, नारी|

वाद-विवाद

ढोल, गंवार, शुद्र, पशु, नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी॥

वाद-विवाद है कि श्रीरामचरितमानस में तुलसीदासजी ने ऐसा क्यों लिखा।

पिछले दिनों कई बार हमने सोशल मीडिया पर ये श्लोक/चौपाई देखी। साथ में यह भी लिखा होता है कि जिस नारी के बारे मे ऐसा कहा जाता है, आज वो बुलंदियों के शिखर को छू रही हैं अपने परिवार और देश का नाम रोशन कर रही हैं। स्वभाविक है ये पढ़ कर मुझे भी अच्छा नहीं लग रहा था कि क्यों नारी को ऐसा कहा जाता है। क्या नारी और पशु एक समान हैं.?

और ये कहा भी स्वंय तुलसीदास जी ने जो खुद अपनी पत्नी से प्रेरणा पाकर महान बने।
क्या महान बनने के बाद पुरूष को नारी तुच्छ लगती है.?
क्या ताड़ना की अधिकारी लगती है.?
तुलसीदास जी के बारे में मेरे दादा जी ने कथा सुनाई थी। उन्हें ऐसी पुरातन कथायों के बारे में अच्छा ज्ञान धा। जितना मुझे याद है वह बता रहा हूँ।

तुलसीदास अपनी पत्नी से अत्यधिक प्रेम करते थे। एक बार उनकी पत्नी मायके चली गयी। तब उनसे रहा नहीं गया तो वो भी चल पड़े, पीछे पत्नी से मिलने। वहां पत्नी के मायके पहुंच कर एक लटकती रस्सी देख कर उसका सहारा लेकर अन्दर घर मे पहुंच गए। जब पत्नी ने देखा तो वह दंग रह गयी क्योंकि वो रस्सी नही साँप था। तब उनकी पत्नी ने कहा आप जितना प्रेम मुझसे करते हो यदि भगवान से भी करते तो पार हो जाते। उसके बाद उनका हृदय परिवर्तन हो गया और वो प्रभु भक्ति में पुर्णतः रम गए।

तब तुलसीदास जी ने ऐसा क्यों कहा या फिर लिखा। मैंने इस चौपाई का अर्थ जानने की पुर्ण कोशिश की। जितना मैं जान सका वह यहाँ बताने का प्रयास कर रहा हूँ। सबसे पहले तो ध्यान देने की यह बात है कि इस चौपाई में “ताड़ना” शब्द का प्रयोग हुआ है ना कि “प्रताड़ना” का। दोनों ही शब्दों का भिन्न भाव हैं।

तुलसी दास जी ने रामचरितमानस की रचना अवधी में की है और प्रचलित शब्द ज़्यादा आए हैं, इसलिए “ताड़न” शब्द को संस्कृत से जोड़कर बिलकुल भी नहीं देखा जा सकता । दरअसल “ताड़ना” एक अवधी शब्द है जिसका अर्थ “पहचानना, परखना या रेकी” करना होता है। फिर यह प्रश्न बहुत स्वाभिविक सा है कि आखिर इसका भावार्थ है क्या..?

सुन्दर कांड की पूरी चौपाई कुछ इस तरह से है:

प्रभु भल कीन्ह मोहि सिख दीन्हीं।
मरजादा पुनि तुम्हरी कीन्हीं॥
ढोल, गंवार, शुद्र, पशु , नारी ।
सकल ताड़ना के अधिकारी॥3॥

असल में ये चौपाइयां उस समय मे कही गई है जब समुन्द्र द्वारा विनय स्वीकार न करने पर श्री राम क्रोधित हो गए थे और अपने तरकश से बाण निकाला, तब समुद्र देव श्री राम के चरणों में आए और, श्री राम से क्षमा मांगते हुए अनुनय-विनय करते हुए कहने लगे– हे प्रभु आपने अच्छा किया जो मुझे शिक्षा दी क्योकि
( ढोल, गंवार, शुद्र, पशु, नारी )
ये लोग विशेष ध्यान रखने, यानी शिक्षा देने के योग्य होते है।

तुलसीदास जी के कहने का मन्तव्य यह है कि:

अगर हम ढोल- के व्यवहार (सुर) को नहीं पहचानेंगे तो, उसे बजाते समय उसकी आवाज कर्कश होगी अतः उससे स्वभाव को जानना अति आवश्यक है।

इसी तरह गंवार- का अर्थ किसी का मजाक बनाना नहीं बल्कि, उनसे है जो अज्ञानी हैं और प्रकृति या व्यवहार को जाने बिना उसके साथ मे जीवन सही से नहीं बिताया जा सकता।

इसी तरह पशु- के संदर्भ में भी वही अर्थ है कि जब तक हम पशु के स्वभाव को नहीं पहचानते, उसके साथ जीवन का निर्वाह अच्छी तरह और सुख-पूर्वक नहीं हो सकता।

इसी तरह शूद्र- वर्ण व्यवस्था के समय जो समाज का विभाजन हुआ था वह प्रवृत्ति व क्षमता के आधार पर किया गया था। बुद्धि तो प्रत्येक वर्ण के व्यक्तियों को चाहिए थी, जो इश्वर द्वारा प्रदान भी की गयी।

शूद्र वर्ण में उत्पादक, वैज्ञानिक, टैकनीशियन, श्रमिक और लागत अर्थात धन लगाने वाले लोग आते थे। अधिक लाभ के लालच में वह अनुचित कार्य न करें, समाज व देशहित का ध्यान रखें, कर सही समय पर प्रदान करें इस लिए इन पर कड़ी निगरानी व अंकुश आवश्यक था। परन्तु उद्योग फले-फूले व उत्पादन पर्याप्त व श्रेष्ठ हो इसका दायित्व भी राजा का ही होता था। तब इसको ताड़ना कहा जायेगा न कि प्रताड़ना।

आज के युग में देखें तो उद्योग किसी भी श्रेणी का हो, उद्यमियों तथा स्किल्ड या अनस्किल्ड श्रमिकों, व्यापारियों तथा उससे सम्बंधित वर्गों पर कानून की सही पकड़ नहीं हो अर्थात यदि कानून व शासन-प्रशासन कमजोर होता है तो भ्रष्टाचार, करचोरी, मिलावट, जमाखोरी, नकली सामान, धोखाधड़ी जैसी घटना आम होती हैं। अतः अंकुश, कड़ी निगरानी अर्थात ताड़ना और पर्याप्त कानून व सुदृढ़ शासन आवश्यक होता है।

इसी तरह नारी- जहाँ भी नारी शब्द आता है तब वह पत्नी के अर्थ में होता है। स्त्री स्वभाव से ही त्याग और समर्पण के भाव से युक्त होती है। जब बात विवाह की आती है तो स्त्री चाहती है की अपना शरीर मन आत्मा किसी ऐसे व्यक्ति को समर्पित करे जो अधिकारी हो जो इसे संभाल सके।

तो यहाँ ताड़ना का अर्थ अपनी पत्नी की सभी इच्छाओं को समझकर उसकी पूर्ति करने का है। क्या कोई भी स्त्री ऐसे पति के साथ रहना चाहेगी जो उसके मनोभाव को न समझ सके.? इसमे अत्याचार की बात नहीं अपितु आदर्श व सुखपूर्ण रिश्ते की बात है।

क्योंकि ढोल, गँवार, शूद्र, पशु और नारी ये सब सही शिक्षा तथा सही ज्ञान के अधिकारी हैं।

धन्यवाद और यहाँ मेरा किसी की भी धार्मिक भावनाओ को ठेस पहुंचाने का कोई उद्देश्य नही है।

|33 करोड़ देवी देवता|

आप सभी ने बहुत बार सुना होगा कि हिन्दू धर्म में 33 करोड़ देवी देवता हैं।
क्या सच में ही हिन्दू धर्म में इतने सारे देवी देवता हैं..?

आइये हम आपको विस्तार से बताते हैं कि हिन्दू धर्म में 33 करोड़ नहीं बल्कि 33 कोटि देवी देवता हैं।

कोटि = प्रकार।
देवभाषा संस्कृत में कोटि के दो अर्थ होते हैं।

एक कोटि का मतलब प्रकार होता है और एक का अर्थ करोड़ भी होता है।

हिन्दू धर्म का दुष्प्रचार करने के उद्देश्य से यह बात उड़ाई गयी की हिन्दूओं के 33 करोड़ देवी देवता हैं और अब तो कुछ मूर्ख हिन्दू स्वयं ही गाते फिरते हैं की हमारे 33 करोड़ देवी देवता है।

कुल 33 प्रकार के देवी देवता हैँ हिन्दू धर्म में:

12 प्रकार हैँ:
आदित्य , धाता, मित, आर्यमा, शक्रा, वरुण, अँशभाग, विवास्वान, पूष, सविता, तवास्था, और विष्णु!

8 प्रकार हैं:
वासु:, धरध्रुव, सोम, अह, अनिल, अनल, प्रत्युष और प्रभाष।

11 प्रकार हैं:
रुद्र: ,हरबहुरुप, त्रयँबक, अपराजिता, बृषाकापि, शँभू, कपार्दी,
रेवात, मृगव्याध, शर्वा, और कपाली।
एवं
2 प्रकार है: अश्विनी और कुमार ।

कुल:- 12+8+11+2=33 कोटी

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ब्राह्मण

ब्राह्मण में ऐसा क्या है कि सभी ब्राह्मण के पीछे पड़ हुए है।
इसका उत्तर इस प्रकार है।

श्रीरामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदास जी ने लिखा है कि भगवान श्रीराम जी ने श्री परशुराम जी से कहा कि:
देव एक गुन धनुष हमारे।
नौ गुन परम पुनीत तुम्हारे॥

हे प्रभु हम क्षत्रिय हैं हमारे पास एक ही गुण अर्थात धनुष ही है आप ब्राह्मण हैं आप में परम पवित्र 9 गुण है।

ब्राह्मण के नौ गुण:
रिजुः तपस्वी सन्तोषी क्षमाशीलो जितेन्द्रियः।
दाता शूरो दयालुश्च ब्राह्मणो नवभिर्गुणैः॥

  • रिजुः = सरल हो
  • तपस्वी = तप करनेवाला हो
  • संतोषी= मेहनत की कमाई पर सन्तुष्ट रहनेवाला हो
  • क्षमाशीलो = क्षमा करनेवाला हो
  • जितेन्द्रियः = इन्द्रियों को वश में रखनेवाला हो
  • दाता= दान करनेवाला हो
  • शूर = बहादुर हो
  • दयालुश्च= सब पर दया करने वाला हो
  • ब्राह्मणो= ब्रह्मज्ञानी
  • नवभिर्गुणैः= सभी नव गुणो से उक्त

श्री भगवद गीता के 18वें अध्याय के 42वें श्लोक में भी ब्राह्मण के 9 गुण को इस प्रकार बताए गये हैं:

शमो दमस्तप: शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च।
ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्म कर्म स्वभावजम्॥

अर्थात:- मन को निग्रह करना, इंद्रियों को वश में करना, तप (धर्म पालन के लिए सभी कष्ट सहना), शौच (बाहर भीतर से सदैव शुद्ध रहना), क्षमा (दूसरों के अपराध को सदैव क्षमा करना), आर्जवम् (शरीर, मन आदि में सरलता रखना, वेद शास्त्र आदि का पूर्ण ज्ञान होना, यज्ञ विधि को अनुभव में लाना एवं परमात्मा वेद-पुराण आदि में आस्तिक भाव रखना यह सब ब्राह्मणों के स्वभाविक कर्म हैं।

पूर्व श्लोक में “स्वभावप्रभवैर्गुणै:” कहा गया है इसलिए स्वभावत कर्म बताया है। स्वभाव बनने में जन्म मुख्य है। एवं जन्म के बाद संग मुख्य है। संग स्वाध्याय, अभ्यास आदि के कारण ही स्वभाव में कर्म गुण बन जाता है।

दैवाधीनं जगत सर्वं, मन्त्रा धीनाश्च देवता:।
ते मंत्रा: ब्राह्मणा धीना:, तस्माद् ब्राह्मण देवता:॥

धिग्बलं क्षत्रिय बलं, ब्रह्म तेजो बलम बलम्।
एकेन ब्रह्म दण्डेन, सर्व शस्त्राणि हतानि च॥

इस श्लोक में भी गुणो के ही कारण हैं त्याग, तपस्या, गायत्री और सन्ध्या के बल से परन्तु आज लोग उसी को त्यागते जा रहे हैं, और पुजवाने का भाव जबर्दस्ती रखे हुए हैं।

विप्रो वृक्षस्तस्य मूलं च सन्ध्या।
वेदा: शाखा धर्मकर्माणि पत्रम्॥
तस्मान्मूलं यत्नतो रक्षणीयं।
छिन्ने मूले नैव शाखा न पत्रम्॥

भावार्थ:- वेदों का ज्ञाता एवं विद्वान ब्राह्मण एक ऐसे वृक्ष के समान हैं जिसका मूल (जड़) दिन के तीन विभागों प्रातः, मध्याह्न और सायं (सन्ध्याकाल) के समय यह तीन सन्ध्या (गायत्री मन्त्र का जप) करना है, एवं चारों वेद उसकी शाखायें हैं, तथा वैदिक धर्म के आचार-विचार का पालन करना ही उसके पत्तों के समान हैं। अतः प्रत्येक ब्राह्मण का यह कर्तव्य है कि इस सन्ध्या रूपी मूल की यत्न पर्वक रक्षा करें, क्योंकि यदि मूल ही नष्ट हो जायेगा तो न तो शाखायें बचेंगी और न ही पत्ते बचेंगे॥

पुराणों में कहा गया है:

विप्राणांयत्रपूज्यंतेरमन्तेतत्र देवता।

जिस स्थान पर ब्राह्मणों का पूजन होता है वहाँ देवता भी निवास करते हैं। अन्यथा ब्राह्मणों के सम्मान के बिना देवालय भी शून्य हो जाते हैं।
इसलिए:

ब्राह्मणातिक्रमोनास्तिविप्रावेदविवर्जिताः॥

श्रीकृष्ण ने कहा- ब्राह्मण यदि वेद-पुराण से हीन भी हो, तब भी उसका अपमान नही करना चाहिए। क्योंकि तुलसी का पत्ता क्या छोटा और क्या बड़ा वह हर अवस्था में कल्याण ही करता है।

ब्राह्मणोस्य मुखमासिद्।

वेदों ने कहा गया है की ब्राह्मण विराट पुरुष भगवान के मुख में सदैव निवास करते हैं। इनके मुख से निकला हर शब्द भगवान का ही शब्द है, जैसा की स्वयं भगवान् ने कहा है:

विप्रप्रसादात्धरणीधरोहमम्। विप्रप्रसादात्कमलावरोहम॥
विप्रप्रसादात्अजिताजितोहम्। विप्रप्रसादात्मम्रामनामम्॥

भावार्थ:- ब्राह्मणों के आशीर्वाद से ही मैंने धरती को धारण कर रखा है। अन्यथा इतना भार कोई पुरुष कैसे उठा सकता है, इन्ही के आशीर्वाद से ही नारायण हो कर भी मैंने लक्ष्मी को वरदान में प्राप्त किया है, इन्ही के आशीर्वाद से ही मैं हर युद्ध को जीत गया और ब्राह्मणों के आशीर्वाद से ही मेरा नाम “राम” अमर हुआ है, अतः ब्राह्मण सर्व पूज्यनीय है। एवं ब्राह्मणों का अपमान ही कलियुग में पाप की वृद्धि का मुख्य कारण है।

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