वाल्मीकि रामायण- बालकाण्ड सर्ग- ५१-६०

वाल्मीकि रामायण- बालकाण्ड सर्ग- ५१-६०

बालकाण्ड सर्ग- ५१-६०

॥ श्री गणेशाय नमः ॥
॥ श्री कमलापति नम: ॥
॥ श्री जानकीवल्लभो विजयते ॥
॥ श्री वाल्मीकि रामायण ॥
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बालकाण्ड सर्ग- ५१-६०

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बालकाण्ड सर्ग- ५१-६०

1BDC7FFE-1644-4736-AA95-0B3D20B5A06Bवाल्मीकि रामायण
(भावार्थ सहित)
सब एक ही स्थान पर

यह स्वंय शिवजी द्वारा माता जगदम्बा से कही गई एक पवित्र कथा है। आप भी विस्तार पूर्वक पढ़े:
शिव-शक्ति श्रीराम मिलन (संपूर्ण भाग) 🌞

बालकाण्ड सर्ग- ५१-६०

बालकाण्ड सर्ग- ५१-६०

बालकाण्डम्
एकपञ्चाशः सर्गः (सर्ग 51)

( शतानन्द को अहल्या के उद्धार का समाचार बताना,शतानन्द द्वारा श्रीराम का अभिनन्दन करते हुए विश्वामित्रजी के पूर्वचरित्र का वर्णन )

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा विश्वामित्रस्य धीमतः।
हृष्टरोमा महातेजाः शतानन्दो महातपाः॥१॥

परम बुद्धिमान् विश्वामित्रजी की वह बात सुनकर महातेजस्वी महातपस्वी शतानन्दजी के शरीर में रोमाञ्च हो आया॥१॥

गौतमस्य सुतो ज्येष्ठस्तपसा द्योतितप्रभः।
रामसंदर्शनादेव परं विस्मयमागतः॥२॥

वे गौतम के ज्येष्ठ पुत्र थे तपस्या से उनकी कान्ति प्रकाशित हो रही थी वे श्रीरामचन्द्रजी के दर्शन मात्र से ही बड़े विस्मित हुए॥२॥

एतौ निषण्णौ सम्प्रेक्ष्य शतानन्दो नृपात्मजौ।
सुखासीनौ मुनिश्रेष्ठं विश्वामित्रमथाब्रवीत्॥३॥

उन दोनों राजकुमारों को सुखपूर्वक बैठे देख शतानन्दने मुनिश्रेष्ठ विश्वामित्रजी से पूछा- ॥ ३॥

अपि ते मुनिशार्दूल मम माता यशस्विनी।
दर्शिता राजपुत्राय तपोदीर्घमुपागता॥४॥

‘मुनिप्रवर! मेरी यशस्विनी माता अहल्या बहुत दिनों से तपस्या कर रही थीं। क्या आपने राजकुमार श्रीराम को उनका दर्शन कराया? ॥ ४॥

अपि रामे महातेजा मम माता यशस्विनी।
वन्यैरुपाहरत् पूजां पूजार्हे सर्वदेहिनाम्॥५॥

‘क्या मेरी महातेजस्विनी एवं यशस्विनी माता अहल्याने वन में होने वाले फल-फूल आदि से समस्त देहधारियों के लिये पूजनीय श्रीरामचन्द्रजी का पूजन (आदर-सत्कार) किया था? ॥ ५ ॥

अपि रामाय कथितं यद् वृत्तं तत् पुरातनम्।
मम मातुर्महातेजो देवेन दुरनुष्ठितम्॥६॥

‘महातेजस्वी मुने! क्या आपने श्रीराम से वह प्राचीन वृत्तान्त कहा था, जो मेरी माता के प्रति देवराज इन्द्र द्वारा किये गये छल-कपट एवं दुराचार द्वारा घटित हुआ था?॥

अपि कौशिक भद्रं ते गुरुणा मम संगता।
मम माता मुनिश्रेष्ठ रामसंदर्शनादितः॥७॥

‘मुनिश्रेष्ठ कौशिक! आपका कल्याण हो क्या श्रीरामचन्द्रजी के दर्शन आदि के प्रभाव से मेरी माता शापमुक्त हो पिताजी से जा मिलीं? ॥ ७॥

अपि मे गुरुणा रामः पूजितः कुशिकात्मज।
इहागतो महातेजाः पूजां प्राप्य महात्मनः॥८॥

‘कुशिकनन्दन! क्या मेरे पिता ने श्रीराम का पूजन किया था? क्या उन महात्मा की पूजा ग्रहण करके ये महातेजस्वी श्रीराम यहाँ पधारे हैं? ॥ ८ ॥

अपि शान्तेन मनसा गुरुर्मे कुशिकात्मज।
इहागतेन रामेण पूजितेनाभिवादितः॥९॥

‘विश्वामित्रजी! क्या यहाँ आकर मेरे माता पिता द्वारा सम्मानित हुए श्रीराम ने मेरे पूज्य पिता का शान्त चित्त से अभिवादन किया था?’ ॥९॥

तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य विश्वामित्रो महामुनिः।
प्रत्युवाच शतानन्दं वाक्यज्ञो वाक्यकोविदम्॥ १०॥

शतानन्द का यह प्रश्न सुनकर बोलने की कला जानने वाले महामुनि विश्वामित्र ने बातचीत करने में कुशल शतानन्द को इस प्रकार उत्तर दिया- ॥ १० ॥

नातिक्रान्तं मुनिश्रेष्ठ यत्कर्तव्यं कृतं मया।
संगता मुनिना पत्नी भार्गवेणेव रेणुका॥११॥

‘मुनिश्रेष्ठ! मैंने कुछ उठा नहीं रखा है मेरा जो कर्तव्य था, उसे मैंने पूरा किया। महर्षि गौतम से उनकी पत्नी अहल्या उसी प्रकार जा मिली हैं, जैसे भृगुवंशी जमदग्नि से रेणुका मिली है’ ॥ ११ ॥

तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य विश्वामित्रस्य धीमतः।
शतानन्दो महातेजा रामं वचनमब्रवीत्॥१२॥

बुद्धिमान् विश्वामित्र की यह बात सुनकर महातेजस्वी शतानन्द ने श्रीरामचन्द्रजी से यह बात कही – ॥१२॥

स्वागतं ते नरश्रेष्ठ दिष्ट्या प्राप्तोऽसि राघव।
विश्वामित्रं पुरस्कृत्य महर्षिमपराजितम्॥१३॥

‘नरश्रेष्ठ! आपका स्वागत है। रघुनन्दन! मेरा अहोभाग्य जो आपने किसी से पराजित न होनेवाले महर्षि विश्वामित्र को आगे करके यहाँ तक पधारने का कष्ट उठाया॥ १३॥

अचिन्त्यकर्मा तपसा ब्रह्मर्षिरमितप्रभः।
विश्वामित्रो महातेजा वेम्येनं परमां गतिम्॥ १४॥

‘महर्षि विश्वामित्र के कर्म अचिन्त्य हैं। ये तपस्या से ब्रह्मर्षिपद को प्राप्त हुए हैं। इनकी कान्ति असीम है और ये महातेजस्वी हैं। मैं इनको जानता हूँ। ये जगत् के परम आश्रय (हितैषी) हैं॥१४॥

नास्ति धन्यतरो राम त्वत्तोऽन्यो भुवि कश्चन।
गोप्ता कुशिकपुत्रस्ते येन तप्तं महत्तपः॥१५॥

‘श्रीराम! इस पृथ्वी पर आपसे बढ़कर धन्यातिधन्य पुरुष दूसरा कोई नहीं है; क्योंकि कुशिकनन्दन विश्वामित्र आपके रक्षक हैं, जिन्होंने बड़ी भारी तपस्या की है।

श्रूयतां चाभिधास्यामि कौशिकस्य महात्मनः।
यथाबलं यथातत्त्वं तन्मे निगदतः शृणु॥१६॥

‘मैं महात्मा कौशिकके बल और स्वरूपका यथार्थ वर्णन करता हूँ। आप ध्यान देकर मुझसे यह सब सुनिये॥१६॥

राजाऽऽसीदेष धर्मात्मा दीर्घकालमरिंदमः।
धर्मज्ञः कृतविद्यश्च प्रजानां च हिते रतः॥१७॥

‘ये विश्वामित्र पहले एक धर्मात्मा राजा थे,इन्होंने शत्रुओं के दमनपूर्वक दीर्घकाल तक राज्य किया था ये धर्मज्ञ और विद्वान् होने के साथ ही प्रजावर्ग के हित साधन में तत्पर रहते थे॥ १७॥

प्रजापतिसुतस्त्वासीत् कुशो नाम महीपतिः।
कुशस्य पुत्रो बलवान् कुशनाभः सुधार्मिकः॥ १८॥

‘प्राचीनकाल में कुश नाम से प्रसिद्ध एक राजा हो गये हैं। वे प्रजापति के पुत्र थे। कुश के बलवान् पुत् रका नाम कुशनाभ हुआ। वह बड़ा ही धर्मात्मा था॥ १८ ॥

कुशनाभसुतस्त्वासीद् गाधिरित्येव विश्रुतः।
गाधेः पुत्रो महातेजा विश्वामित्रो महामुनिः॥

‘कुशनाभ के पुत्र गाधि नाम से विख्यात थे। उन्हीं गाधि के महातेजस्वी पुत्र ये महामुनि विश्वामित्र हैं। १९॥

विश्वामित्रो महातेजाः पालयामास मेदिनीम्।
बहवर्षसहस्राणि राजा राज्यमकारयत्॥२०॥

‘महातेजस्वी राजा विश्वामित्र ने कई हजार वर्षां तक इस पृथ्वी का पालन तथा राज्य का शासन किया। २०॥

कदाचित् तु महातेजा योजयित्वा वरूथिनीम्।
अक्षौहिणीपरिवृतः परिचक्राम मेदिनीम्॥२१॥

‘एक समयकी बात है महातेजस्वी राजा विश्वामित्र सेना एकत्र करके एक अक्षौहिणी सेनाके साथ पृथ्वीपर विचरने लगे॥२१॥

नगराणि च राष्ट्राणि सरितश्च महागिरीन्।
आश्रमान् क्रमशो राजा विचरन्नाजगाम ह॥२२॥
वसिष्ठस्याश्रमपदं नानापुष्पलताद्रुमम्।
नानामृगगणाकीर्णं सिद्धचारणसेवितम्॥२३॥

‘वे अनेकानेक नगरों, राष्ट्रों, नदियों, बड़े-बड़े पर्वतों और आश्रमों में क्रमशः विचरते हुए महर्षिवसिष्ठ के आश्रम पर आ पहुँचे, जो नाना प्रकार के फूलों, लताओं और वृक्षों से शोभा पा रहा था। नाना प्रकार के मृग (वन्यपशु) वहाँ सब ओर फैले हुए थे तथा सिद्ध और चारण उस आश्रम में निवास करते थे॥ २२-२३॥

देवदानवगन्धर्वैः किंनरैरुपशोभितम्।
प्रशान्तहरिणाकीर्णं द्विजसङ्घनिषेवितम्॥२४॥
ब्रह्मर्षिगणसंकीर्णं देवर्षिगणसेवितम्।

‘देवता, दानव, गन्धर्व और किन्नर उसकी शोभा बढाते थे। शान्त मृग वहाँ भरे रहते थे। बहत-से ब्राह्मणों, ब्रह्मर्षियों और देवर्षियोंके समुदाय उसका सेवन करते थे॥ २४ १/२॥

तपश्चरणसंसिद्धैरग्निकल्पैर्महात्मभिः॥ २५॥
सततं संकुलं श्रीमद्ब्रह्मकल्पैर्महात्मभिः ।
अब्भक्षैर्वायुभक्षैश्च शीर्णपर्णाशनैस्तथा॥२६॥
फलमूलाशनैर्दान्तैर्जितदोषैर्जितेन्द्रियैः।
ऋषिभिर्वालखिल्यैश्च जपहोमपरायणैः॥२७॥
अन्यैर्वैखानसैश्चैव समन्तादुपशोभितम्।
वसिष्ठस्याश्रमपदं ब्रह्मलोकमिवापरम्।
ददर्श जयतां श्रेष्ठो विश्वामित्रो महाबलः॥ २८॥

‘तपस्या से सिद्ध हुए अग्नि के समान तेजस्वी महात्मा तथा ब्रह्मा के समान महामहिम महात्मा सदा उस आश्रम में भरे रहते थे। उनमें से कोई जल पीकर रहता था तो कोई हवा पीकर। कितने ही महात्मा फल-मूल खाकर अथवा सूखे पत्ते चबाकर रहते थे। राग आदि दोषों को जीतकर मन और इन्द्रियों पर काबू रखने वाले बहुत-से ऋषि जप-होम में लगे रहते थे। वालखिल्य मुनिगण तथा अन्यान्य वैखानस महात्मासब ओर से उस आश्रम की शोभा बढ़ाते थे। इन सब विशेषताओं के कारण महर्षि वसिष्ठ का वह आश्रम दूसरे ब्रह्मलोक के समान जान पड़ता था। विजयी वीरों में श्रेष्ठ महाबली विश्वामित्र ने उसका दर्शन किया’ ॥ २५–२८॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे एकपञ्चाशः सर्गः॥५१॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में इक्यावनवाँ सर्ग पूरा हुआ।५१॥

बालकाण्ड सर्ग- ५१-६०

बालकाण्डम्
द्विपञ्चाशः सर्गः (सर्ग 52)

( महर्षि वसिष्ठ द्वारा विश्वामित्र का सत्कार और कामधेनु को अभीष्ट वस्तुओं की सृष्टि करने का आदेश )

तं दृष्ट्वा परमप्रीतो विश्वामित्रो महाबलः।
प्रणतो विनयाद वीरो वसिष्ठं जपतां वरम्॥१॥

‘जप करनेवालों में श्रेष्ठ वसिष्ठ का दर्शन करके महाबली वीर विश्वामित्र बड़े प्रसन्न हुए और विनयपूर्वक उन्होंने उनके चरणों में प्रणाम किया॥१॥

स्वागतं तव चेत्युक्तो वसिष्ठेन महात्मना।
आसनं चास्य भगवान् वसिष्ठो व्यादिदेश ह॥ २॥

‘तब महात्मा वसिष्ठ ने कहा—’राजन्! तुम्हारा स्वागत है।’ ऐसा कहकर भगवान् वसिष्ठ ने उन्हें बैठने के लिये आसन दिया॥२॥

उपविष्टाय च तदा विश्वामित्राय धीमते।
यथान्यायं मुनिवरः फलमूलमुपाहरत्॥३॥

‘जब बुद्धिमान् विश्वामित्र आसन पर विराजमान हुए, तब मुनिवर वसिष्ठ ने उन्हें विधिपूर्वक फलमूल का उपहार अर्पित किया॥३॥

प्रतिगृह्य तु तां पूजां वसिष्ठाद् राजसत्तमः।
तपोऽग्निहोत्रशिष्येषु कुशलं पर्यपृच्छत॥४॥
विश्वामित्रो महातेजा वनस्पतिगणे तदा।
सर्वत्र कुशलं प्राह वसिष्ठो राजसत्तमम्॥५॥

‘वसिष्ठजी से वह आतिथ्य-सत्कार ग्रहण करके राजशिरोमणि महातेजस्वी विश्वामित्र ने उनके तप, अग्निहोत्र, शिष्यवर्ग और लता-वृक्ष आदिका कुशल समाचार पूछा, फिर वसिष्ठजी ने उन नृपश्रेष्ठ से सबके सकुशल होने की बात बतायी॥ ४-५॥

सुखोपविष्टं राजानं विश्वामित्रं महातपाः।
पप्रच्छ जपतां श्रेष्ठो वसिष्ठो ब्रह्मणः सुतः॥६॥

‘फिर जप करनेवालोंमें श्रेष्ठ ब्रह्मकुमार महातपस्वी वसिष्ठने वहाँ सुखपूर्वक बैठे हुए राजा विश्वामित्रसे इस प्रकार पूछा- ॥६॥

कच्चित्ते कुशलं राजन् कच्चिद् धर्मेण रञ्जयन्।
प्रजाः पालयसे राजन् राजवृत्तेन धार्मिक॥७॥

‘राजन् ! तुम सकुशल तो हो न? धर्मात्मा नरेश! क्या तुम धर्मपूर्वक प्रजा को प्रसन्न रखते हुए राजोचित रीति-नीति से प्रजावर्ग का पालन करते हो?॥७॥

कच्चित्ते सम्भृता भृत्याः कच्चित् तिष्ठन्ति शासने।
कच्चित्ते विजिताः सर्वे रिपवो रिपुसूदन॥८॥

‘शत्रुसूदन! क्या तुमने अपने भृत्यों का अच्छी तरह भरण-पोषण किया है? क्या वे तुम्हारी आज्ञा के अधीन रहते हैं? क्या तुमने समस्त शत्रुओं पर विजय पा ली है?॥

कच्चिद् बलेषु कोशेषु मित्रेषु च परंतप।
कुशलं ते नरव्याघ्र पुत्रपौत्रे तथानघ॥९॥

‘शत्रुओं को संताप देने वाले पुरुषसिंह निष्पाप नरेश! क्या तुम्हारी सेना, कोश, मित्रवर्ग तथा पुत्रपौत्र आदि सब सकुशल हैं ?’ ॥९॥

सर्वत्र कुशलं राजा वसिष्ठं प्रत्युदाहरत्।
विश्वामित्रो महातेजा वसिष्ठं विनयान्वितम्॥ १०॥

‘तब महातेजस्वी राजा विश्वामित्र ने विनयशील महर्षि वसिष्ठ को उत्तर दिया—’हाँ भगवन् ! मेरे यहाँ सर्वत्र कुशल है?’ ॥ १०॥

कृत्वा तौ सुचिरं कालं धर्मिष्ठौ ताः कथास्तदा।
मुदा परमया युक्तौ प्रीयेतां तौ परस्परम्॥११॥

‘तत्पश्चात् वे दोनों धर्मात्मा पुरुष बड़ी प्रसन्नताके साथ बहुत देरतक परस्पर वार्तालाप करते रहे। उस समय एकका दूसरेके साथ बड़ा प्रेम हो गया॥ ११ ॥

 ततो वसिष्ठो भगवान् कथान्ते रघुनन्दन।
विश्वामित्रमिदं वाक्यमुवाच प्रहसन्निव॥१२॥

‘रघुनन्दन! बातचीत करने के पश्चात् भगवान् वसिष्ठ ने विश्वामित्र से हँसते हुए-से इस प्रकार कहा – ॥१२॥

आतिथ्यं कर्तुमिच्छामि बलस्यास्य महाबल।
तव चैवाप्रमेयस्य यथार्ह सम्प्रतीच्छ मे॥१३॥

‘महाबली नरेश! तुम्हारा प्रभाव असीम है मैं तुम्हारा और तुम्हारी इस सेना का यथा योग्य आतिथ्यसत्कार करना चाहता हूँ तुम मेरे इस अनुरोध को स्वीकार करो॥ १३॥

सत्क्रियां हि भवानेतां प्रतीच्छतु मया कृताम्।
राजंस्त्वमतिथिश्रेष्ठः पूजनीयः प्रयत्नतः॥१४॥

‘राजन्! तुम अतिथियों में श्रेष्ठ हो, इसलिये यत्नपूर्वक तुम्हारा सत्कार करना मेरा कर्तव्य है अतः मेरे द्वारा किये गये इस सत्कार को तुम ग्रहण करो’ ॥ १४॥

एवमुक्तो वसिष्ठेन विश्वामित्रो महामतिः।
कृतमित्यब्रवीद् राजा पूजावाक्येन मे त्वया॥ १५॥

‘वसिष्ठ के ऐसा कहने पर महाबुद्धिमान् राजा विश्वामित्र ने कहा—’मुने! आपके सत्कारपूर्ण वचनों से ही मेरा पूर्ण सत्कार हो गया॥ १५ ॥

फलमूलेन भगवन् विद्यते यत् तवाश्रमे।
पाद्येनाचमनीयेन भगवदर्शनेन च ॥१६॥

‘भगवन् ! आपके आश्रम पर जो विद्यमान हैं, उन फल-मूल, पाद्य और आचमनीय आदि वस्तुओं से मेरा भलीभाँति आदर-सत्कार हुआ है। सबसे बढ़कर जो आपका दर्शन हुआ, इसी से मेरी पूजा हो गयी।१६॥

सर्वथा च महाप्राज्ञ पूजाहेण सुपूजितः।
नमस्तेऽस्तु गमिष्यामि मैत्रेणेक्षस्व चक्षुषा॥१७॥

‘महाज्ञानी महर्षे! आप सर्वथा मेरे पूजनीय हैं तो भी आपने मेरा भलीभाँति पूजन किया आपको नमस्कार है अब मैं यहाँ से जाऊँगा। आप मैत्रीपूर्ण दृष्टि से मेरी ओर देखिये’ ॥ १७॥

एवं ब्रुवन्तं राजानं वसिष्ठं पुनरेव हि।
न्यमन्त्रयत धर्मात्मा पुनः पुनरुदारधीः॥१८॥

ऐसा कहते हुए राजा विश्वामित्र से उदारचेता धर्मात्मा वसिष्ठ ने निमन्त्रण स्वीकार करने के लिये बारम्बार आग्रह किया॥ १८ ॥

बाढमित्येव गाधेयो वसिष्ठं प्रत्युवाच ह।
यथाप्रियं भगवतस्तथास्तु मुनिपुंगव॥१९॥

तब गाधिनन्दन विश्वामित्र ने उन्हें उत्तर देते हुए कहा—’बहुत अच्छा,मुझे आपकी आज्ञा स्वीकार है। मुनिप्रवर! आप मेरे पूज्य हैं आपकी जैसी रुचि हो—आपको जो प्रिय लगे, वही हो’ ॥ १९॥

एवमुक्तस्तथा तेन वसिष्ठो जपतां वरः।
आजुहाव ततः प्रीतः कल्माषीं धूतकल्मषाम्॥ २०॥

‘राजा के ऐसा कहने पर जप करने वालों में श्रेष्ठ मुनिवर वसिष्ठ बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने अपनी उस चितकबरी होम-धेनु को बुलाया, जिसके पाप (अथवा मैल) धुल गये थे (वह कामधेनु थी) ॥ २० ॥

एह्येहि शबले क्षिप्रं शृणु चापि वचो मम।
सबलस्यास्य राजर्षेः कर्तुं व्यवसितोऽस्म्यहम्।
भोजनेन महार्हेण सत्कारं संविधत्स्व मे॥२१॥

(उसे बुलाकर ऋषिने कहा-) शबले! शीघ्र आओ, आओ और मेरी यह बात सुनो—मैंने सेनासहित इन राजर्षि का महाराजाओं के योग्य उत्तम भोजन आदिके द्वारा आतिथ्य-सत्कार करने का निश्चय किया है तुम मेरे इस मनोरथ को सफल करो॥ २१॥

यस्य यस्य यथाकामं षड्रसेष्वभिपूजितम्।
तत् सर्वं कामधुग् दिव्ये अभिवर्ष कृते मम॥ २२॥

‘षड्रस भोजनों मेंसे जिसको जो-जो पसंद हो, उसके लिये वह सब प्रस्तुत कर दो। दिव्य कामधेनो! आज मेरे कहने से इन अतिथियों के लिये अभीष्ट वस्तुओं की वर्षा करो॥ २२॥

रसेनान्नेन पानेन लेह्यचोष्येण संयुतम्।
अन्नानां निचयं सर्वं सृजस्व शबले त्वर ॥२३॥

‘शबले! सरस पदार्थ, अन्न, पान, लेह्य (चटनी आदि) और चोष्य (चूसने की वस्तु) से युक्त भाँतिभाँति के अन्नों की ढेरी लगा दो। सभी आवश्यक वस्तुओं की सृष्टि कर दो,शीघ्रता करो—विलम्ब न होने पावे’ ॥ २३॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे द्विपञ्चाशः सर्गः॥५२॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में बावनवाँ सर्ग पूरा हुआ।५२॥

बालकाण्ड सर्ग- ५१-६०

बालकाण्डम्
त्रिपञ्चाशः सर्गः (सर्ग 53)

( विश्वामित्र का वसिष्ठ से उनकी कामधेनु को माँगना और उनका देने से अस्वीकार करना )

एवमुक्ता वसिष्ठेन शबला शत्रुसूदन।
विदधे कामधुक् कामान् यस्य यस्येप्सितं यथा॥

‘शत्रुसूदन! महर्षि वसिष्ठ के ऐसा कहनेपर चितकबरे रंग की उस कामधेनु ने जिसकी जैसी इच्छा थी, उसके लिये वैसी ही सामग्री जुटा दी॥१॥

इथून् मधूंस्तथा लाजान् मैरेयांश्च वरासवान्।
पानानि च महार्हाणि भक्ष्यांश्चोच्चावचानपि॥ २॥

‘ईख, मधु, लावा, मैरेय, श्रेष्ठ आसव, पानक रस आदि नाना प्रकार के बहुमूल्य भक्ष्य-पदार्थ प्रस्तुत कर दिये॥२॥

उष्णाढ्यस्यौदनस्यात्र राशयः पर्वतोपमाः।
मृष्टान्यन्नानि सूपांश्च दधिकुल्यास्तथैव च ॥३॥

‘गरम-गरम भात के पर्वत के सदृश ढेर लग गये मिष्टान्न (खीर) और दाल भी तैयार हो गयी। दूध, दही और घीकी तो नहरें बह चलीं॥३॥

नानास्वादुरसानां च खाण्डवानां तथैव च।
भोजनानि सुपूर्णानि गौडानि च सहस्रशः॥४॥

‘भाँति-भाँति के सुस्वादु रस, खाण्डव तथा नाना प्रकार के भोजनों से भरी हुई चाँदी की सहस्रों थालियाँ सज गयीं॥ ४॥

सर्वमासीत् सुसंतुष्टं हृष्टपुष्टजनायुतम्।
विश्वामित्रबलं राम वसिष्ठेन सुतर्पितम्॥५॥

‘श्रीराम! महर्षि वसिष्ठ ने विश्वामित्रजी की सारी सेना के लोगों को भलीभाँति तृप्त किया। उस सेना में बहुत-से हृष्ट-पुष्ट सैनिक थे। उन सबको वह दिव्य भोजन पाकर बड़ा संतोष हुआ॥५॥

विश्वामित्रो हि राजर्षिर्हृष्टपुष्टस्तदाभवत्।
सान्तःपुरवरो राजा सब्राह्मणपुरोहितः॥६॥

‘राजर्षि विश्वामित्र भी उस समय अन्तःपुर की रानियों, ब्राह्मणों और पुरोहितों के साथ बहुत ही हृष्टपुष्ट हो गये॥६॥

सामात्यो मन्त्रिसहितः सभृत्यः पूजितस्तदा।
युक्तः परमहर्षेण वसिष्ठमिदमब्रवीत्॥७॥

‘अमात्य, मन्त्री और भृत्योंसहित पूजित हो वे बहुत प्रसन्न हुए और वसिष्ठजी से इस प्रकार बोले

पूजितोऽहं त्वया ब्रह्मन् पूजाहेण सुसत्कृतः।
श्रूयतामभिधास्यामि वाक्यं वाक्यविशारद॥८॥

‘ब्रह्मन् ! आप स्वयं मेरे पूजनीय हैं तो भी आपने मेरा पूजन किया, भलीभाँति स्वागत-सत्कार किया, बातचीत करने में कुशल महर्षे ! अब मैं एक बात कहता हूँ, उसे सुनिये॥८॥

गवां शतसहस्रेण दीयतां शबला मम।
रत्नं हि भगवन्नेतद रत्नहारी च पार्थिवः॥९॥
तस्मान्मे शबलां देहि ममैषा धर्मतो द्विज।

‘भगवन्! आप मुझसे एक लाख गौएँ लेकर यह चितकबरी गाय मुझे दे दीजिये; क्योंकि यह गौ रत्नरूप है और रत्न लेने का अधिकारी राजा होता है। ब्रह्मन् ! मेरे इस कथनपर ध्यान देकर मुझे यह शबला गौ दे दीजिये; क्योंकि यह धर्मतः मेरी ही वस्तु है’। ९१/२॥

एवमुक्तस्तु भगवान् वसिष्ठो मुनिपुंगवः ॥१०॥
विश्वामित्रेण धर्मात्मा प्रत्युवाच महीपतिम्।

‘विश्वामित्र के ऐसा कहने पर धर्मात्मा मुनिवर भगवान् वसिष्ठ राजा को उत्तर देते हुए बोले- ॥ १० १/२॥

नाहं शतसहस्रेण नापि कोटिशतैर्गवाम्॥११॥
राजन् दास्यामि शबलां राशिभी रजतस्य वा।
न परित्यागमयं मत्सकाशादरिंदम॥१२॥

‘शत्रुओं का दमन करने वाले नरेश्वर! मैं एक लाख या सौ करोड़ अथवा चाँदी के ढेर लेकर भी बदले में इस शबला गौ को नहीं दूंगा। यह मेरे पास से अलग होने योग्य नहीं है॥ १२॥
शाश्वती शबला मह्यं कीर्तिरात्मवतो यथा।
अस्यां हव्यं च कव्यं च प्राणयात्रा तथैव च॥१३॥

‘जैसे मनस्वी पुरुष की अक्षय कीर्ति कभी उससे अलग नहीं रह सकती, उसी प्रकार यह सदा मेरे साथ सम्बन्ध रखने वाली शबला गौ मुझसे पृथक् नहीं रह सकती। मेरा हव्य-कव्य और जीवन-निर्वाह इसी पर निर्भर है॥ १३॥

आयत्तमग्निहोत्रं च बलि.मस्तथैव च।
स्वाहाकारवषट्कारौ विद्याश्च विविधास्तथा॥ १४॥

‘मेरे अग्निहोत्र, बलि, होम, स्वाहा, वषट्कार और भाँति-भाँति की विद्याएँ इस कामधेनु के ही अधीन हैं। १४॥

आयत्तमत्र राजर्षे सर्वमेतन्न संशयः।
सर्वस्वमेतत् सत्येन मम तुष्टिकरी तथा॥१५॥
कारणैर्बहभी राजन् न दास्ये शबलां तव।

‘राजर्षे ! मेरा यह सब कुछ इस गौके ही अधीन है, इसमें संशय नहीं है, मैं सच कहता हूँ—यह गौ ही मेरा सर्वस्व है और यही मुझे सब प्रकार से संतुष्ट करने वाली है। राजन् ! बहुत-से ऐसे कारण हैं, जिनसे बाध्य होकर मैं यह शबला गौ आपको नहीं दे सकता’ ॥ १५ १/२॥

वसिष्ठेनैवमुक्तस्तु विश्वामित्रोऽब्रवीत् तदा॥ १६॥
संरब्धतरमत्यर्थं वाक्यं वाक्यविशारदः।

‘वसिष्ठजी के ऐसा कहने पर बोलने में कुशल विश्वामित्र अत्यन्त क्रोधपूर्वक इस प्रकार बोले—॥ १६ १/२॥

हैरण्यकक्षप्रैवेयान् सुवर्णाङ्कशभूषितान्॥१७॥
ददामि कुञ्जराणां ते सहस्राणि चतुर्दश।

‘मुने! मैं आपको चौदह हजार ऐसे हाथी दे रहा हूँ, जिनके कसने वाले रस्से, गले के आभूषण और अंकुश भी सोने के बने होंगे और उन सबसे वे हाथी विभूषित होंगे॥ १७ १/२॥

हैरण्यानां रथानां च श्वेताश्वानां चतुर्युजाम्॥ १८॥
ददामि ते शतान्यष्टौ किंकिणीकविभूषितान्।
हयानां देशजातानां कुलजानां महौजसाम्।
सहस्रमेकं दश च ददामि तव सुव्रत॥१९॥
नानावर्णविभक्तानां वयःस्थानां तथैव च।
ददाम्येकां गवां कोटिं शबला दीयतां मम॥ २०॥

‘उत्तम व्रत का पालन करने वाले मुनीश्वर! इनके सिवा मैं आठ सौ सुवर्णमय रथ प्रदान करूँगा; जिनमें शोभा के लिये सोने के घुघुरू लगे होंगे और हर एक रथ में चार-चार सफेद रंग के घोड़े जुते हुए होंगे तथा अच्छी जाति और उत्तम देश में उत्पन्न महातेजस्वी ग्यारह हजार घोड़े भी आपकी सेवा में अर्पित करूँगा। इतना ही नहीं, नाना प्रकार के रंगवाली नयी अवस्था की एक करोड़ गौएँ भी दूंगा, परंतु यह शबला गौ मुझे दे दीजिये॥ १८-२०॥

यावदिच्छसि रत्नानि हिरण्यं वा द्विजोत्तम।
तावद् ददामि ते सर्वं दीयतां शबला मम॥२१॥

‘द्विजश्रेष्ठ! इनके अतिरिक्त भी आप जितने रत्न या सुवर्ण लेना चाहें, वह सब आपको देनेके लिये मैं तैयार हूँ; किंतु यह चितकबरी गाय मुझे दे दीजिये’।२१॥

एवमुक्तस्तु भगवान् विश्वामित्रेण धीमता।
न दास्यामीति शबलां प्राह राजन् कथंचन॥ २२॥

‘बुद्धिमान् विश्वामित्र के ऐसा कहने पर भगवान् वसिष्ठ बोले—’राजन्! मैं यह चितकबरी गाय तुम्हें किसी तरह भी नहीं दूंगा॥ २२ ॥

एतदेव हि मे रत्नमेतदेव हि मे धनम्।
एतदेव हि सर्वस्वमेतदेव हि जीवितम्॥२३॥

‘यही मेरा रत्न है, यही मेरा धन है, यही मेरा सर्वस्व है और यही मेरा जीवन है॥ २३ ॥

दर्शश्च पौर्णमासश्च यज्ञाश्चैवाप्तदक्षिणाः।
एतदेव हि मे राजन् विविधाश्च क्रियास्तथा॥ २४॥

‘राजन् ! मेरे दर्श, पौर्णमास, प्रचुर दक्षिणावाले यज्ञ तथा भाँति-भाँति के पुण्यकर्म—यह गौ ही है। इसी पर ही मेरा सब कुछ निर्भर है॥ २४ ॥

अतोमूलाः क्रियाः सर्वा मम राजन् न संशयः।
बहुना किं प्रलापेन न दास्ये कामदोहिनीम्॥ २५॥

‘नरेश्वर ! मेरे सारे शुभ कर्मों का मूल यही है, इसमें संशय नहीं है, बहुत व्यर्थ बात करने से क्या लाभ मैं इस कामधेनु को कदापि नहीं दूंगा’ ॥ २५ ॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे त्रिपञ्चाशः सर्गः॥५३॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में तिरपनवाँ सर्ग पूरा हुआ।५३॥

बालकाण्ड सर्ग- ५१-६०

बालकाण्डम्
चतुःपञ्चाशः सर्गः (सर्ग 54)

( विश्वामित्र का वसिष्ठजी की गौ को बलपूर्वक ले जाना, गौका दुःखी होकर वसिष्ठजी से इसका कारण पूछना, विश्वामित्रजी की सेना का संहार करना )

कामधेनुं वसिष्ठोऽपि यदा न त्यजते मुनिः।
तदास्य शबलां राम विश्वामित्रोऽन्वकर्षत॥१॥

‘श्रीराम! जब वसिष्ठ मुनि किसी तरह भी उस कामधेनु गौको देने के लिये तैयार न हुए, तब राजा विश्वामित्र उस चितकबरे रंग की धेनु को बलपूर्वक घसीट ले चले॥१॥

नीयमाना तु शबला राम राज्ञा महात्मना।
दुःखिता चिन्तयामास रुदन्ती शोककर्शिता॥ २॥

‘रघुनन्दन! महामनस्वी राजा विश्वामित्र के द्वारा इस प्रकार ले जायी जाती हुई वह गौ शोकाकुल हो मन-ही-मन रो पड़ी और अत्यन्त दुःखित हो विचार करने लगी- ॥२॥

परित्यक्ता वसिष्ठेन किमहं सुमहात्मना।
याहं राजभृतैर्दीना ह्रियेय भृशदुःखिता॥३॥

‘अहो! क्या महात्मा वसिष्ठ ने मुझे त्याग दिया है, जो ये राजा के सिपाही मुझ दीन और अत्यन्तदुःखिया गौ को इस तरह बलपूर्वक लिये जा रहे हैं? ॥३॥

किं मयापकृतं तस्य महर्षे वितात्मनः।
यन्मामनागसं दृष्ट्वा भक्तां त्यजति धार्मिकः॥४॥

‘पवित्र अन्तःकरण वाले उन महर्षि का मैंने क्या अपराध किया है कि वे धर्मात्मा मुनि मुझे निरपराध और अपना भक्त जानकर भी त्याग रहे हैं?’ ॥ ४॥

इति संचिन्तयित्वा तु निःश्वस्य च पुनः पुनः।
जगाम वेगेन तदा वसिष्ठं परमौजसम्॥५॥
निर्धूय तांस्तदा भृत्यान् शतशः शत्रुसूदन।

‘शत्रुसूदन! यह सोचकर वह गौ बारम्बार लंब साँस लेने लगी और राजा के उन सैकड़ों सेवकों को झटककर उस समय महातेजस्वी वसिष्ठ मुनि के पास बड़े वेग से जा पहुँची॥ ५ १/२ ॥

जगामानिलवेगेन पादमूलं महात्मनः॥६॥
शबला सा रुदन्ती च क्रोशन्ती चेदमब्रवीत्।
वसिष्ठस्याग्रतः स्थित्वा रुदन्ती मेघनिःस्वना॥ ७॥

‘वह शबला गौ वायु के समान वेग से उन महात्मा के चरणों के समीप गयी और उनके सामने खड़ी हो मेघ के समान गम्भीर स्वर से रोती-चीत्कार करती हुई उनसे इस प्रकार बोली- ॥६-७॥

भगवन् किं परित्यक्ता त्वयाहं ब्रह्मणः सुत।
यस्माद् राजभटा मां हि नयन्ते त्वत्सकाशतः॥ ८॥

‘भगवन् ! ब्रह्मकुमार! क्या आपने मुझे त्याग दिया,जो ये राजा के सैनिक मुझे आपके पास से दूर लिये जा रहे हैं?’ ॥ ८॥

एवमुक्तस्तु ब्रह्मर्षिरिदं वचनमब्रवीत्।
शोकसंतप्तहृदयां स्वसारमिव दुःखिताम्॥९॥

‘उसके ऐसा कहने पर ब्रह्मर्षि वसिष्ठ शोक से संतप्त हृदयवाली दुःखिया बहिन के समान उस गौ से इस प्रकार बोले- ॥९॥

न त्वां त्यजामि शबले नापि मेऽपकृतं त्वया।
एष त्वां नयते राजा बलान्मत्तो महाबलः॥१०॥

‘शबले! मैं तुम्हारा त्याग नहीं करता तुमने मेरा कोई अपराध नहीं किया है,ये महाबली राजा अपने बल से मतवाले होकर तुमको मुझसे छीनकर ले जा रहे हैं॥ १०॥

नहि तुल्यं बलं मह्यं राजा त्वद्य विशेषतः।
बली राजा क्षत्रियश्च पृथिव्याः पतिरेव च॥ ११॥

‘मेरा बल इनके समान नहीं है विशेषतःआजकल ये राजा के पदपर प्रतिष्ठित हैं। राजा, क्षत्रिय तथा इस पृथ्वी के पालक होने के कारण ये बलवान् हैं।॥ ११॥

इयमक्षौहिणी पूर्णा गजवाजिरथाकुला।
हस्तिध्वजसमाकीर्णा तेनासौ बलवत्तरः॥१२॥

‘इनके पास हाथी, घोड़े और रथों से भरी हुई यह अक्षौहिणी सेना है, जिसमें हाथियों के हौदों पर लगे हुए ध्वज सब ओर फहरा रहे हैं। इस सेना के कारण भी ये मुझसे प्रबल हैं’ ॥ १२॥

एवमुक्ता वसिष्ठेन प्रत्युवाच विनीतवत्।
वचनं वचनज्ञा सा ब्रह्मर्षिमतुलप्रभम्॥१३॥

‘वसिष्ठजी के ऐसा कहने पर बातचीत के मर्म को समझने वाली उस कामधेनु ने उन अनुपम तेजस्वी ब्रह्मर्षि से यह विनययुक्त बात कही- ॥१३॥

न बलं क्षत्रियस्याहुर्ब्राह्मणा बलवत्तराः।
ब्रह्मन् ब्रह्मबलं दिव्यं क्षात्राच्च बलवत्तरम्॥ १४॥

“ब्रह्मन् ! क्षत्रिय का बल कोई बल नहीं है ब्राह्मण ही क्षत्रिय आदि से अधिक बलवान् होते हैं। ब्राह्मणका बल दिव्य है। वह क्षत्रिय-बल से अधिक प्रबल होता है।

अप्रमेयं बलं तुभ्यं न त्वया बलवत्तरः।
विश्वामित्रो महावीर्यस्तेजस्तव दुरासदम्॥१५॥

“आपका बल अप्रमेय है। महापराक्रमी विश्वामित्र आपसे अधिक बलवान् नहीं हैं। आपका तेज दुर्धर्ष है॥ १५ ॥

नियुक्ष्व मां महातेजस्त्वं ब्रह्मबलसम्भृताम्।
तस्य दर्पं बलं यत्नं नाशयामि दुरात्मनः॥१६॥

“महातेजस्वी महर्षे! मैं आपके ब्रह्मबल से परिपुष्ट हुई हूँ अतः आप केवल मुझे आज्ञा दे दीजिये। मैं इस दुरात्मा राजा के बल, प्रयत्न और अभिमान को अभी चूर्ण किये देती हूँ’॥ १६ ॥

इत्युक्तस्तु तया राम वसिष्ठस्तु महायशाः।
सृजस्वेति तदोवाच बलं परबलार्दनम्॥१७॥

‘श्रीराम! कामधेनु के ऐसा कहने पर महायशस्वी वसिष्ठ ने कहा—’इस शत्रु-सेना को नष्ट करने वाले सैनिकों की सृष्टि करो’ ॥ १७॥

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा सुरभिः सासृजत् तदा।
तस्या हुंभारवोत्सृष्टाः पहलवाः शतशो नृप। १८॥

‘राजकुमार ! उनका वह आदेश सुनकर उस गौने उस समय वैसा ही किया। उसके हुंकार करते ही सैकड़ों पह्नव जाति के वीर पैदा हो गये॥१८॥

नाशयन्ति बलं सर्वं विश्वामित्रस्य पश्यतः।
स राजा परमक्रुद्धः क्रोधविस्फारितेक्षणः॥१९॥

वे सब विश्वामित्र के देखते-देखते उनकी सारी सेना का नाश करने लगे। इससे राजा विश्वामित्र को बड़ा क्रोध हुआ वे रोष से आँखें फाड़-फाड़कर देखने लगे॥ १९॥

पहलवान् नाशयामास शस्त्रैरुच्चावचैरपि।
विश्वामित्रार्दितान् दृष्ट्वा पलवान् शतशस्तदा॥ २०॥
भूय एवासृजद् घोरान् शकान् यवनमिश्रितान्।
तैरासीत् संवृता भूमिः शकैर्यवनमिश्रितैः॥२१॥

‘उन्होंने छोटे-बड़े कई तरह के अस्त्रों का प्रयोग करके उन पहलवों का संहार कर डाला विश्वामित्र द्वारा उन सैकड़ों पहलवों को पीड़ित एवं नष्ट हुआ देख उस समय उस शबला गौ ने पुनः यवन मिश्रित शक जाति के भयंकर वीरों को उत्पन्न किया उन यवन मिश्रित शकों से वहाँ की सारी पृथ्वी भर गयी॥ २०-२१॥

प्रभावद्भिर्महावीहेमकिंजल्कसंनिभैः।
तीक्ष्णासिपट्टिशधरैर्हेमवर्णाम्बरावृतैः॥२२॥
निर्दग्धं तबलं सर्वं प्रदीप्तैरिव पावकैः।
ततोऽस्त्राणि महातेजा विश्वामित्रो मुमोच ह।
तैस्ते यवनकाम्बोजा बर्बराश्चाकुलीकृताः॥ २३॥

‘वे वीर महापराक्रमी और तेजस्वी थे। उनके शरीरकी कान्ति सुवर्ण तथा केसर के समान थी। वे सुनहरे वस्त्रों से अपने शरीर को ढंके हुए थे। उन्होंने हाथों में तीखे खड्ग और पट्टिश ले रखे थे। प्रज्वलित अग्नि के समान उद्भासित होने वाले उन वीरों ने विश्वामित्र की सारी सेना को भस्म करना आरम्भ किया, तब महातेजस्वी विश्वामित्र ने उन पर बहुत-से अस्त्र छोड़े उन अस्त्रों की चोट खाकर वे यवन, काम्बोज और बर्बर जाति के योद्धा व्याकुल हो उठे’ ।। २२-२३॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे चतुःपञ्चाशः सर्गः॥५४॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आपरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में चौवनवाँ सर्ग पूरा हुआ। ५४॥

बालकाण्ड सर्ग- ५१-६०

बालकाण्डम्
पञ्चपञ्चाशः सर्गः (सर्ग 55)

( अपने सौ पुत्रों और सारी सेना के नष्ट हो जाने पर विश्वामित्र का तपस्या करके दिव्यास्त्र पाना, वसिष्ठजी का ब्रह्मदण्ड लेकर उनके सामने खड़ा होना )

ततस्तानाकुलान् दृष्ट्वा विश्वामित्रास्त्रमोहितान्।
वसिष्ठश्चोदयामास कामधुक् सृज योगतः॥१॥

‘विश्वामित्र के अस्त्रों से घायल होकर उन्हें व्याकुल हुआ देख वसिष्ठजी ने फिर आज्ञा दी—’कामधेनो! अब योग बल से दूसरे सैनिकों की सृष्टि करो’ ॥ १॥

तस्या हुंकारतो जाताः काम्बोजा रविसंनिभाः।
ऊधसश्चाथ सम्भूता बर्बराः शस्त्रपाणयः॥२॥

‘तब उस गौ ने फिर हुंकार किया उसके हुंकार से सूर्य के समान तेजस्वी काम्बोज उत्पन्न हुए थन से शस्त्रधारी बर्बर प्रकट हुए॥२॥

योनिदेशाच्च यवनाः शकृद्देशाच्छकाः स्मृताः।
रोमकूपेषु म्लेच्छाश्च हारीताः सकिरातकाः॥ ३॥

‘योनि देश से यवन और शकृद्देश (गोबर के स्थान) से शक उत्पन्न हुए। रोमकूपों से म्लेच्छ, हारीत और किरात प्रकट हुए॥३॥

तैस्तन्निषूदितं सर्वं विश्वामित्रस्य तत्क्षणात्।
सपदातिगजं साश्वं सरथं रघुनन्दन॥४॥

‘रघुनन्दन! उन सब वीरों ने पैदल, हाथी, घोड़े और रथसहित विश्वामित्र की सारी सेना का तत्काल संहार कर डाला॥४॥

दृष्ट्वा निषूदितं सैन्यं वसिष्ठेन महात्मना।
विश्वामित्रसुतानां तु शतं नानाविधायुधम्॥५॥
अभ्यधावत् सुसंक्रुद्धं वसिष्ठं जपतां वरम्।
हंकारेणैव तान् सर्वान् निर्ददाह महानृषिः॥६॥

‘महात्मा वसिष्ठ द्वारा अपनी सेना का संहार हुआ देख विश्वामित्र के सौ पुत्र अत्यन्त क्रोध में भर गये और नाना प्रकार के अस्त्र-शस्त्र लेकर जप करने वालों में श्रेष्ठ वसिष्ठमुनि पर टूट पड़े,तब उन महर्षि ने हुंकार मात्र से उन सबको जलाकर भस्म कर डाला॥ ५-६॥

ते साश्वरथपादाता वसिष्ठेन महात्मना।
भस्मीकृता मुहूर्तेन विश्वामित्रसुतास्तथा॥७॥

‘महात्मा वसिष्ठ द्वारा विश्वामित्र के वे सभी पुत्र दो ही घड़ी में घोड़े, रथ और पैदल सैनिकों सहित जलाकर भस्म कर डाले गये॥७॥

दृष्टा विनाशितान् सर्वान् बलं च सुमहायशाः।
सव्रीडं चिन्तयाविष्टो विश्वामित्रोऽभवत् तदा॥ ८॥

‘अपने समस्त पुत्रों तथा सारी सेना का विनाश हुआ देख महायशस्वी विश्वामित्र लज्जित हो बड़ी चिन्ता में पड़ गये॥ ८॥

समुद्र इव निर्वेगो भग्नद्रष्ट्र इवोरगः।
उपरक्त इवादित्यः सद्यो निष्प्रभतां गतः॥९॥

‘समुद्र के समान उनका सारा वेग शान्त हो गया जिसके दाँत तोड़ लिये गये हों उस सर्प के समान तथा राहुग्रस्त सूर्य की भाँति वे तत्काल ही निस्तेज हो गये॥

हतपुत्रबलो दीनो लूनपक्ष इव द्विजः।
हतसर्वबलोत्साहो निर्वेदं समपद्यत॥१०॥

‘पुत्र और सेना दोनों के मारे जाने से वे पंख कटे हुए पक्षी के समान दीन हो गये। उनका सारा बल और उत्साह नष्ट हो गया। वे मन-ही-मन बहुत खिन्न हो उठे॥ १० ॥

स पुत्रमेकं राज्याय पालयेति नियुज्य च।
पृथिवीं क्षत्रधर्मेण वनमेवाभ्यपद्यत॥११॥

‘उनके एक ही पुत्र बचा था, उसको उन्होंने राजा के पदपर अभिषिक्त करके राज्य की रक्षा के लिये नियुक्त कर दिया और क्षत्रिय-धर्म के अनुसार पृथ्वी के पालन की आज्ञा देकर वे वन में चले गये॥ ११ ॥

स गत्वा हिमवत्पार्वे किंनरोरगसेवितम्।
महादेवप्रसादार्थं तपस्तेपे महातपाः॥१२॥

‘हिमालयके पार्श्वभाग में, जो किन्नरों और नागों से सेवित प्रदेश है, वहाँ जाकर महादेवजी की प्रसन्नता के लिये महान् तपस्या का आश्रय ले वे तपमें ही संलग्न हो गये॥ १२॥

केनचित् त्वथ कालेन देवेशो वृषभध्वजः।
दर्शयामास वरदो विश्वामित्रं महामुनिम्॥ १३॥

‘कुछ काल के पश्चात् वरदायक देवेश्वर भगवान् वृषभध्वज (शिव) ने महामुनि विश्वामित्र को दर्शन दिया और कहा- ॥ १३॥

किमर्थं तप्यसे राजन् ब्रूहि यत् ते विवक्षितम्।
वरदोऽस्मि वरो यस्ते कांक्षितः सोऽभिधीयताम्॥ १४॥

“राजन् ! किसलिये तप करते हो? बताओ क्या कहना चाहते हो? मैं तुम्हें वर देने के लिये आया हूँ तुम्हें जो वर पाना अभीष्ट हो, उसे कहो’ ॥ १४॥

एवमुक्तस्तु देवेन विश्वामित्रो महातपाः।
प्रणिपत्य महादेवं विश्वामित्रोऽब्रवीदिदम्॥

‘महादेवजी के ऐसा कहने पर महातपस्वी विश्वामित्र ने उन्हें प्रणाम करके इस प्रकार कहा-॥ १५॥

यदि तुष्टो महादेव धनुर्वेदो ममानघ।
सांगोपांगोपनिषदः सरहस्यः प्रदीयताम्॥१६॥

“निष्पाप महादेव! यदि आप संतुष्ट हों तो अंग, उपांग, उपनिषद् और रहस्यों सहित धनुर्वेद मुझे प्रदान कीजिये॥

यानि देवेषु चास्त्राणि दानवेषु महर्षिषु।
गन्धर्वयक्षरक्षःसु प्रतिभान्तु ममानघ॥१७॥
तव प्रसादाद् भवतु देवदेव ममेप्सितम्।

“अनघ! देवताओं, दानवों, महर्षियों, गन्धर्वो, यक्षों तथा राक्षसों के पास जो-जो अस्त्र हों, वे सब आपकी कृपा से मेरे हृदय में स्फुरित हो जायँ। देवदेव! यही मेरा मनोरथ है, जो मुझे प्राप्त होना चाहिये। १७ १/२॥

एवमस्त्विति देवेशो वाक्यमुक्त्वा गतस्तदा। १८॥
प्राप्य चास्त्राणि देवेशाद् विश्वामित्रो महाबलः।
दर्पण महता युक्तो दर्पपूर्णोऽभवत् तदा॥१९॥

‘तब ‘एवमस्तु’ कहकर देवेश्वर भगवान् शङ्कर वहाँ से चले गये। देवेश्वर महादेव से वे अस्त्र पाकर महाबली विश्वामित्र को बड़ा घमंड हो गया वे अभिमान में भर गये॥ १८-१९॥

विवर्धमानो वीर्येण समुद्र इव पर्वणि।
हतं मेने तदा राम वसिष्ठमृषिसत्तमम्॥२०॥

‘जैसे पूर्णिमा को समुद्र बढ़ने लगता है, उसी प्रकार वे पराक्रम द्वारा अपने को बहुत बढ़ा-चढ़ा मानने लगे। श्रीराम! उन्होंने मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठ को उस समय मरा हुआ ही समझा ॥ २० ॥

ततो गत्वाऽऽश्रमपदं मुमोचास्त्राणि पार्थिवः।
यैस्तत् तपोवनं नाम निर्दग्धं चास्त्रतेजसा॥२१॥

फिर तो वे पृथ्वीपति विश्वामित्र वसिष्ठ के आश्रम पर जाकर भाँति-भाँति के अस्त्रों का प्रयोग करने लगे। जिनके तेज से वह सारा तपोवन दग्ध होने लगा॥ २१॥

उदीर्यमाणमस्त्रं तद् विश्वामित्रस्य धीमतः।
दृष्ट्वा विप्रद्रुता भीता मुनयः शतशो दिशः॥ २२॥

‘बुद्धिमान् विश्वामित्र के उस बढ़ते हुए अस्त्रतेज को देखकर वहाँ रहने वाले सैकड़ों मुनि भयभीत हो सम्पूर्ण दिशाओं में भाग चले॥ २२ ॥

वसिष्ठस्य च ये शिष्या ये च वै मृगपक्षिणः।
विद्रवन्ति भयाद भीता नानादिग्भ्यः सहस्रशः॥ २३॥

‘वसिष्ठजी के जो शिष्य थे, जो वहाँ के पशु और पक्षी थे, वे सहस्रों प्राणी भयभीत हो नाना दिशाओं की ओर भाग गये॥२३॥

वसिष्ठस्याश्रमपदं शून्यमासीन्महात्मनः।
मुहूर्तमिव निःशब्दमासीदीरिणसंनिभम्॥ २४॥

‘महात्मा वसिष्ठ का वह आश्रम सूना हो गया। दो ही घड़ी में ऊसर भूमि के समान उस स्थान पर सन्नाटा छा गया॥२४॥

वदतो वै वसिष्ठस्य मा भैरिति मुहर्महः।
नाशयाम्यद्य गाधेयं नीहारमिव भास्करः॥२५॥

‘वसिष्ठजी बार-बार कहने लगे—’डरो मत, मैं अभी इस गाधिपुत्र को नष्ट किये देता हूँ ठीक उसी तरह, जैसे सूर्य कुहासे को मिटा देता है’ ॥ २५ ॥

एवमुक्त्वा महातेजा वसिष्ठो जपतां वरः।
विश्वामित्रं तदा वाक्यं सरोषमिदमब्रवीत्॥२६॥

‘जपनेवालों में श्रेष्ठ महातेजस्वी वसिष्ठ ऐसा कहकर उस समय विश्वामित्रजी से रोषपूर्वक बोले

आश्रमं चिरसंवृद्धं यद् विनाशितवानसि।
दुराचारो हि यन्मूढस्तस्मात् त्वं न भविष्यसि॥ २७॥

“अरे! तूने चिरकाल से पाले-पोसे तथा हरे-भरे किये हुए इस आश्रम को नष्ट कर दिया-उजाड़ डाला, इसलिये तू दुराचारी और विवेकशून्य है और इस पाप के कारण तू कुशल से नहीं रह सकता’। २७॥

इत्युक्त्वा परमक्रुद्धो दण्डमुद्यम्य सत्वरः।
विधूम इव कालाग्निर्यमदण्डमिवापरम्॥२८॥

‘ऐसा कहकर वे अत्यन्त क्रुद्ध हो धूमरहित कालाग्नि के समान उद्दीप्त हो उठे और दूसरे यमदण्ड के समान भयंकर डंडा हाथ में उठाकर तुरंत उनका सामना करने के लिये तैयार हो गये’ ॥ २८॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे पञ्चपञ्चाशः सर्गः॥५५॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में पचपनवाँ सर्ग पूरा हुआ।५५॥

बालकाण्ड सर्ग- ५१-६०

बालकाण्डम्
पञ्चपञ्चाशः सर्गः (सर्ग 56)

( विश्वामित्र द्वारा वसिष्ठजी पर नाना प्रकार के दिव्यास्त्रों का प्रयोग, वसिष्ठ द्वारा ब्रह्मदण्ड से ही उनका शमन, विश्वामित्र का ब्रह्मणत्व की प्राप्ति के लिए तप करने का निश्चय )

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एवम् उक्तो वसिष्ठेन विश्वामित्रो महाबलः ।
आग्नेयम् अस्त्रम् उत्क्षिप्य तिष्ठ तिष्ठ इति च अब्रवीत् ॥१-५६-१॥
ब्रह्मदण्डम् समुद्यम्य काल दण्डम् इव अपरम् ।
वसिष्ठो भगवान् क्रोधात् इदम् वचनम् अब्रवीत् ॥१-५६-२॥
क्षत्र बन्धो स्थितो अस्मि एष यद् बलम् तद् विदर्शय ।
नाशयामि अद्य ते दर्पम् शस्त्रस्य तव गाधिज ॥१-५६-३॥
क्व च ते क्षत्रिय बलम् क्व च ब्रह्म बलम् महत् ।
पश्य ब्रह्म बलम् दिव्यम् मम क्षत्रिय पांसन ॥१-५६-४॥
तस्य अस्त्रम् गाधि पुत्रस्य घोरम् आग्नेयम् उत्तमम् ।
ब्रह्म दण्डेन तत् शांतम् अग्नेः वेग इव अंभसा ॥१-५६-५॥
वारुणम् चैव रौद्रम् च ऐन्द्रम् पाशुपतम् तथा ।
ऐषीकम् च अपि चिक्षेप रुषितो गाधि नंदनः ॥१-५६-६॥
मानवम् मोहनम् चैव गांधर्वम् स्वापनम् तथा ।
जृंभणम् मदानम् चैव संतापन विलापने ॥१-५६-७॥
शोषणम् दारणम् चैव वज्रम् अस्त्रम् सुदुर्जयम् ।
ब्रह्म पाशम् काल पाशम् वारुणम् पाशम् एव च ॥१-५६-८॥
पिनाकम् अस्त्रम् च दयितम् शुष्क आर्द्रे अशनी तथा ।
दण्ड अस्त्रम् अथ पैशाचम् क्रौन्चम् अस्त्रम् तथैव च ॥१-५६-९॥
धर्म चक्रम् काल चक्रम् विष्णु चक्रम् तथैव च ।
वायव्यम् मथनम् चैव अस्त्रम् हय शिरः तथा ॥१-५६-१०॥
शक्ति द्वयम् च चिक्षेप कंकालम् मुसलम् तथा ।
वैद्याधरम् महाअस्त्रम् च कालास्त्रम् अथ दारुणम् ॥१-५६-११॥
त्रिशूलम् अस्त्रम् घोरम् च कापालम् अथ कंकणम् ।
एतानि अस्त्राणि चिक्षेप सर्वाणि रघु नंदन ॥१-५६-१२॥
वसिष्ठे जपताम् श्रेष्ठे तद् अद्भुतम् इव अभवत् ।
तानि सर्वाणि दण्डेन ग्रसते ब्रह्मणः सुतः ॥१-५६-१३॥
तेषु शांतेषु ब्रह्मास्त्रम् क्षिप्तवान् गाधि नंदनः ।
तत् अस्त्रम् उद्यतम् दृष्ट्वा देवाः स अग्नि पुरोगमाः ॥१-५६-१४॥
देव ऋषयः च संभ्रांता गंधर्वाः स महा उरगाः ।
त्रैलोक्यम् आसीत् संत्रस्तम् ब्रह्मास्त्रे समुदीरिते ॥१-५६-१५॥
तत् अपि अस्त्रम् महाघोरम् ब्राह्मम् ब्राह्मेण तेजसा ।
वसिष्ठो ग्रसते सर्वम् ब्रह्म दण्डेन राघव ॥१-५६-१६॥
ब्रह्म अस्त्रम् ग्रसमानस्य वसिष्ठस्य महात्मनः ।
त्रैलोक्य मोहनम् रौद्रम् रूपम् आसीत् सुदारुणम् ॥१-५६-१७॥
रोम कूपेषु सर्वेषु वसिष्ठस्य महात्मनः ।
मरीच्य इव निष्पेतुः अग्नेः धूम आकुल अर्चिषः ॥१-५६-१८॥
प्राज्वलत् ब्रह्म दण्डः च वसिष्ठस्य कर उद्यतः ।
विधूम इव काल अग्निः यम दण्ड इव अपरः ॥१-५६-१९॥
ततो अस्तुवन् मुनि गणा वसिष्ठम् जपताम् वरम् ।
अमोघम् ते बलम् ब्रह्मन् तेजो धारय तेजसा ॥१-५६-२०॥
निगृहीतः त्वया ब्रह्मन् विश्वामित्रो महातपाः ।
प्रसीद जपताम् श्रेष्ठ लोकाः सन्तु गत व्यथाः ॥१-५६-२१॥
एवम् उक्तो महातेजाः शमम् चक्रे महातपाः ।
विश्वामित्रो अपि निकृतो विनिःश्वस्य इदम् अब्रवीत् ॥१-५६-२२॥
धिक् बलम् क्षत्रिय बलम् ब्रह्म तेजो बलम् बलम् ।
एकेन ब्रह्म दण्डेन सर्व अस्त्राणि हतानि मे ॥१-५६-२३॥
तत् एतत् समवेक्ष्य अहम् प्रसन्न इन्द्रिय मानसः ।
तपो महत् समास्थास्ये यत् वै ब्रह्मत्व कारणम् ॥१-५६-२४॥
इति वाल्मीकि रामायणे आदि काव्ये बालकाण्डे षट्पञ्चाशः सर्गः ॥१-५६॥

बालकाण्ड सर्ग- ५१-६०

बालकाण्डम्
सप्तपञ्चाशः सर्गः (सर्ग 57)

( विश्वामित्र की तपस्या, राजा त्रिशंकु का यज्ञ के लिये वसिष्ठजी से प्रार्थना करना,उनके इन्कार करने पर उन्हीं के पुत्रों की शरण में जाना )

ततः संतप्तहृदयः स्मरन्निग्रहमात्मनः।
विनिःश्वस्य विनिःश्वस्य कृतवैरो महात्मना॥१॥
स दक्षिणां दिशं गत्वा महिष्या सह राघव।
तताप परमं घोरं विश्वामित्रो महातपाः॥२॥

श्रीराम! तदनन्तर विश्वामित्र अपनी पराजय को याद करके मन-ही-मन संतप्त होने लगे। महात्मा वसिष्ठ के साथ वैर बाँधकर महातपस्वी विश्वामित्र बारम्बार लम्बी साँस खींचते हुए अपनी रानी के साथ दक्षिण दिशा में जाकर अत्यन्त उत्कृष्ट एवं भयंकर तपस्या करने लगे॥ १-२॥

फलमूलाशनो दान्तश्चचार परमं तपः।
अथास्य जज्ञिरे पुत्राः सत्यधर्मपरायणाः॥३॥
हविष्पन्दो मधुष्पन्दो दृढनेत्रो महारथः।

वहाँ मन और इन्द्रियों को वश में करके वे फलमूल का आहार करते तथा उत्तम तपस्या में लगे रहते थे। वहीं उनके हविष्पन्द, मधुष्पन्द, दृढनेत्र और महारथ नामक चार पुत्र उत्पन्न हुए, जो सत्य और धर्म में तत्पर रहने वाले थे॥ ३ १/२ ॥

पूर्णे वर्षसहस्रे तु ब्रह्मा लोकपितामहः॥४॥
अब्रवीन्मधुरं वाक्यं विश्वामित्रं तपोधनम्।
जिता राजर्षिलोकास्ते तपसा कुशिकात्मज॥५॥
अनेन तपसा त्वां हि राजर्षिरिति विद्महे।

एक हजार वर्ष पूरे हो जानेपर लोकपितामह ब्रह्माजी ने तपस्या के धनी विश्वामित्र को दर्शन देकर मधुर वाणी में कहा—’कुशिकनन्दन! तुमने तपस्या के द्वारा राजर्षियों के लोकों पर विजय पायी है। इस तपस्या के प्रभाव से हम तुम्हें सच्चा राजर्षि समझते हैं’॥ ४-५ १/२॥

एवमुक्त्वा महातेजा जगाम सह दैवतैः॥६॥
त्रिविष्टपं ब्रह्मलोकं लोकानां परमेश्वरः।

यह कहकर सम्पूर्ण लोकों के स्वामी ब्रह्माजी देवताओं के साथ स्वर्गलोक होते हुए ब्रह्मलोक को चले गये॥ ६ १/२॥

विश्वामित्रोऽपि तच्छत्वा ह्रिया किंचिदवाङ्मखः॥ ७॥
दुःखेन महताविष्टः समन्युरिदमब्रवीत्।
तपश्च सुमहत् तप्तं राजर्षिरिति मां विदुः ॥८॥
देवाः सर्षिगणाः सर्वे नास्ति मन्ये तपः फलम्।

उनकी बात सुनकर विश्वामित्र का मुख लज्जा से कुछ झुक गया। वे बड़े दुःख से व्यथित हो दीनतापूर्वक मन-ही-मन यों कहने लगे—’अहो! मैंने इतना बड़ा तप किया तो भी ऋषियों सहित सम्पूर्ण देवता मुझे राजर्षि ही समझते हैं मालूम होता है, इस तपस्या का कोई फल नहीं हुआ’। ७-८ १/२॥

एवं निश्चित्य मनसा भूय एव महातपाः॥९॥
तपश्चचार धर्मात्मा काकुत्स्थ परमात्मवान्।

श्रीराम! मन में ऐसा सोचकर अपने मन को वश में रखने वाले महातपस्वी धर्मात्मा विश्वामित्र पुनः भारी तपस्या में लग गये॥९ १/२॥

एतस्मिन्नेव काले तु सत्यवादी जितेन्द्रियः॥ १०॥
त्रिशङ्करिति विख्यात इक्ष्वाकुकुलवर्धनः।

इसी समय इक्ष्वाकुकुलकी कीर्ति बढ़ानेवाले एक सत्यवादी और जितेन्द्रिय राजा राज्य करते थे। उनका नाम था त्रिशंकु ॥ १० १/२ ॥

तस्य बुद्धिः समुत्पन्ना यजेयमिति राघव॥११॥
गच्छेयं स्वशरीरेण देवतानां परां गतिम्।

रघुनन्दन! उनके मन में यह विचार हुआ कि ‘मैं ऐसा कोई यज्ञ करूँ, जिससे अपने इस शरीर के साथ ही देवताओं की परम गति—स्वर्गलोक को जा पहुँचूँ’ ॥

वसिष्ठं स समाहृय कथयामास चिन्तितम्॥१२॥
अशक्यमिति चाप्युक्तो वसिष्ठेन महात्मना।।

तब उन्होंने वसिष्ठजी को बुलाकर अपना यह विचार उन्हें कह सुनाया। महात्मा वसिष्ठ ने उन्हें बताया कि ‘ऐसा होना असम्भव है’ ।। १२ १/२।।

प्रत्याख्यातो वसिष्ठेन स ययौ दक्षिणां दिशम्॥ १३॥
ततस्तत्कर्मसिद्ध्यर्थं पुत्रांस्तस्य गतो नृपः।

जब वसिष्ठ ने उन्हें कोरा उत्तर दे दिया, तब वे राजा उस कर्म की सिद्धि के लिये दक्षिण दिशा में उन्हीं के पुत्रों के पास चले गये। १३ १/२ ।।

वासिष्ठा दीर्घतपसस्तपो यत्र हि तेपिरे॥१४॥
त्रिशङ्कस्तु महातेजाः शतं परमभास्वरम्।।
वसिष्ठपुत्रान् ददृशे तप्यमानान् मनस्विनः॥१५॥

वसिष्ठजी के वे पुत्र जहाँ दीर्घकाल से तपस्या में प्रवृत्त होकर तप करते थे, उस स्थानपर पहुँचकर महातेजस्वी त्रिशंकु ने देखा कि मन को वश में रखने वाले वे सौ परमतेजस्वी वसिष्ठकुमार तपस्या में संलग्न हैं॥

सोऽभिगम्य महात्मानः सर्वानेव गुरोः सुतान्।
अभिवाद्यानुपूर्वेण ह्रिया किंचिदवाङ्मुखः॥१६॥
अब्रवीत् स महात्मानः सर्वानेव कृताञ्जलिः।

उन सभी महात्मा गुरुपुत्रों के पास जाकर उन्होंने क्रमशः उन्हें प्रणाम किया और लज्जा से अपने मुख को कुछ नीचा किये हाथ जोड़कर उन सब महात्माओं से कहा- ॥ १६ १/२ ॥

शरणं वः प्रपन्नोऽहं शरण्यान् शरणं गतः॥ १७॥
प्रत्याख्यातो हि भद्रं वो वसिष्ठेन महात्मना।
यष्टकामो महायज्ञं तदनुज्ञातुमर्हथ॥१८॥

‘गुरुपुत्रो! आप शरणागतवत्सल हैं। मैं आप लोगों की शरण में आया हूँ, आपका कल्याण हो। महात्मा वसिष्ठ ने मेरा यज्ञ कराना अस्वीकार कर दिया है। मैं एक महान् यज्ञ करना चाहता हूँ। आप लोग उसके लिये आज्ञा दें॥१७-१८॥

गुरुपुत्रानहं सर्वान् नमस्कृत्य प्रसादये।
शिरसा प्रणतो याचे ब्राह्मणांस्तपसि स्थितान्॥ १९॥
ते मां भवन्तः सिद्ध्यर्थं याजयन्तु समाहिताः।
सशरीरो यथाहं वै देवलोकमवाप्नुयाम्॥२०॥

‘मैं समस्त गुरुपुत्रों को नमस्कार करके प्रसन्न करना चाहता हूँ। आप लोग तपस्या में संलग्न रहने वाले ब्राह्मण हैं। मैं आपके चरणों में मस्तक रखकर यह याचना करता हूँ कि आप लोग
एकाग्रचित्त हो मुझसे मेरी अभीष्टसिद्धि के लिये ऐसा कोई यज्ञ करावें, जिससे मैं इस शरीर के साथ ही देवलोक में जा सकूँ॥ १९-२०॥

प्रत्याख्यातो वसिष्ठेन गतिमन्यां तपोधनाः।
गुरुपुत्रानृते सर्वान् नाहं पश्यामि कांचन॥२१॥

‘तपोधनो! महात्मा वसिष्ठ के अस्वीकार कर देने पर अब मैं अपने लिये समस्त गुरुपुत्रों की शरण में जाने के सिवा दूसरी कोई गति नहीं देखता॥ २१ ॥

इक्ष्वाकूणां हि सर्वेषां पुरोधाः परमा गतिः।
तस्मादनन्तरं सर्वे भवन्तो दैवतं मम॥२२॥

‘समस्त इक्ष्वाकुवंशियों के लिये पुरोहित वसिष्ठजी ही परमगति हैं। उनके बाद आप सब लोग ही मेरे परम देवता हैं’॥ २२॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे सप्तपञ्चाशः सर्गः॥५७॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में सत्तावनवाँ सर्ग पूरा हुआ।५७॥

बालकाण्ड सर्ग- ५१-६०

बालकाण्डम्
अष्टपञ्चाशः सर्गः (सर्ग 58)

( वसिष्ठ ऋषि के पुत्रों का त्रिशंकु को शाप-प्रदान, उनके शाप से चाण्डाल हुए त्रिशंकु का विश्वामित्रजी की शरण में जाना )

ततस्त्रिशङ्कोर्वचनं श्रुत्वा क्रोधसमन्वितम्।
ऋषिपुत्रशतं राम राजानमिदमब्रवीत्॥१॥
प्रत्याख्यातोऽसि दुर्मेधो गुरुणा सत्यवादिना।
तं कथं समतिक्रम्य शाखान्तरमुपेयिवान्॥२॥

रघुनन्दन! राजा त्रिशंकु का यह वचन सुनकर वसिष्ठ मुनि के वे सौ पुत्र कुपित हो उनसे इस प्रकार बोले- ‘दुर्बुद्धे ! तुम्हारे सत्यवादी गुरु ने जब तुम्हें मना कर दिया है, तब तुमने उनका उल्लङ्घन करके दूसरी शाखा का आश्रय कैसे लिया? ॥ १-२॥

इक्ष्वाकूणां हि सर्वेषां पुरोधाः परमा गतिः।
न चातिक्रमितुं शक्यं वचनं सत्यवादिनः॥३॥

‘समस्त इक्ष्वाकुवंशी क्षत्रियों के लिये पुरोहित वसिष्ठजी ही परमगति हैं। उन सत्यवादी महात्मा की बात को कोई अन्यथा नहीं कर सकता॥३॥

अशक्यमिति सोवाच वसिष्ठो भगवानृषिः।
तं वयं वै समाहर्तुं क्रतुं शक्ताः कथंचन॥४॥

‘जिस यज्ञ कर्म को उन भगवान् वसिष्ठमुनि ने असम्भव बताया है, उसे हम लोग कैसे कर सकते हैं॥४॥

बालिशस्त्वं नरश्रेष्ठ गम्यतां स्वपुरं पुनः।
याजने भगवान् शक्तस्त्रैलोक्यस्यापि पार्थिव॥
अवमानं कथं कर्तुं तस्य शक्ष्यामहे वयम्।

‘नरश्रेष्ठ ! तुम अभी नादान हो, अपने नगर को लौट जाओ। पृथ्वीनाथ! भगवान् वसिष्ठ तीनों लोकों का यज्ञ कराने में समर्थ हैं, हम लोग उनका अपमान कैसे कर सकेंगे’॥ ५ १/२॥

तेषां तद् वचनं श्रुत्वा क्रोधपर्याकुलाक्षरम्॥६॥
स राजा पुनरेवैतानिदं वचनमब्रवीत्।
प्रत्याख्यातो भगवता गुरुपुत्रैस्तथैव हि ॥७॥
अन्यां गतिं गमिष्यामि स्वस्ति वोऽस्तु तपोधनाः।

गुरुपुत्रों का वह क्रोधयुक्त वचन सुनकर राजा त्रिशंकु ने पुनः उनसे इस प्रकार कहा—’तपोधनो! भगवान् वसिष्ठ ने तो मुझे ठुकरा ही दिया था, आप गुरुपुत्र गण भी मेरी प्रार्थना नहीं स्वीकार कर रहे हैं; अतः आपका कल्याण हो, अब मैं दूसरे किसी की शरण में जाऊँगा’॥

ऋषिपुत्रास्तु तच्छ्रुत्वा वाक्यं घोराभिसंहितम्॥ ८ ॥
शेपुः परमसंक्रुद्धाश्चण्डालत्वं गमिष्यसि।
इत्युक्त्वा ते महात्मानो विविशुः स्वं स्वमाश्रमम्॥ ९॥

त्रिशंकु का यह घोर अभिसंधिपूर्ण वचन सुनकर महर्षि के पुत्रों ने अत्यन्त कुपित हो उन्हें शाप दे दिया —’अरे! जा तू चाण्डाल हो जायगा।’ ऐसा कहकर वे महात्मा अपने-अपने आश्रम में प्रविष्ट हो गये॥ ८-९॥

अथ रात्र्यां व्यतीतायां राजा चण्डालतां गतः।
नीलवस्त्रधरो नीलः पुरुषो ध्वस्तमूर्धजः॥१०॥
चित्यमाल्यांगरागश्च आयसाभरणोऽभवत्।

तदनन्तर रात व्यतीत होते ही राजा त्रिशंकु चाण्डाल हो गये। उनके शरीर का रंग नीला हो गया। कपड़े भी नीले हो गये। प्रत्येक अंग में रुक्षता आ गयी। सिर के बाल छोटे-छोटे हो गये। सारे शरीर में चिता की राख-सी लिपट गयी। विभिन्न अंगों में यथास्थान लोहे के गहने पड़ गये॥ १० १/२ ॥

तं दृष्ट्वा मन्त्रिणः सर्वे त्यज्य चण्डालरूपिणम्॥ ११॥
प्राद्रवन सहिता राम पौरा येऽस्यानुगामिनः।
एको हि राजा काकुत्स्थ जगाम परमात्मवान्॥ १२॥
दह्यमानो दिवारानं विश्वामित्रं तपोधनम्।

श्रीराम! अपने राजा को चाण्डाल के रूप में देखकर सब मन्त्री और पुरवासी जो उनके साथ आये थे, उन्हें छोड़कर भाग गये। ककुत्स्थनन्दन! वे धीरस्वभाव नरेश दिन-रात चिन्ता की आग में जलने लगे और अकेले ही तपोधन विश्वामित्र की शरण में गये॥११-१२ १/२॥

विश्वामित्रस्तु तं दृष्ट्वा राजानं विफलीकृतम्॥ १३॥
चण्डालरूपिणं राम मुनिः कारुण्यमागतः।
कारुण्यात् स महातेजा वाक्यं परमधार्मिकः॥ १४॥
इदं जगाद भद्रं ते राजानं घोरदर्शनम्।
किमागमनकार्यं ते राजपुत्र महाबल॥१५॥
अयोध्याधिपते वीर शापाच्चण्डालतां गतः।

श्रीराम ! विश्वामित्र ने देखा राजा का जीवन निष्फल हो गया है। उन्हें चाण्डाल के रूपमें देखकर उन महातेजस्वी परम धर्मात्मा मुनि के हृदय में करुणा भर आयी। वे दया से द्रवित होकर भयंकर दिखायी देने वाले राजा त्रिशंकु से इस प्रकार बोले—’महाबली राजकुमार! तुम्हारा भला हो, यहाँ किस काम से तुम्हारा आना हुआ है। वीर अयोध्यानरेश! जान पड़ता है तुम शाप से चाण्डाल भाव को प्राप्त हुए हो’॥ १३–१५ १/२॥

अथ तदाक्यमाकर्ण्य राजा चण्डालतां गतः॥ १६॥
अब्रवीत् प्राञ्जलिर्वाक्यं वाक्यज्ञो वाक्यकोविदम्।

विश्वामित्र की बात सुनकर चाण्डालभाव को प्राप्त हुए और वाणी के तात्पर्य को समझने वाले राजा त्रिशंकु ने हाथ जोड़कर वाक्यार्थ कोविद विश्वामित्र मुनि से इस प्रकार कहा— ॥ १६ १/२ ॥

प्रत्याख्यातोऽस्मि गुरुणा गुरुपुत्रैस्तथैव च॥ १७॥
अनवाप्यैव तं कामं मया प्राप्तो विपर्ययः।

‘महर्षे! मुझे गुरु तथा गुरुपुत्रों ने ठुकरा दिया। मैं जिस मनोऽभीष्ट वस्तु को पाना चाहता था, उसे न पाकर इच्छा के विपरीत अनर्थ का भागी हो गया। १७ १/२॥

सशरीरो दिवं यायामिति मे सौम्यदर्शन॥१८॥
मया चेष्टं क्रतुशतं तच्च नावाप्यते फलम्।

‘सौम्यदर्शन मुनीश्वर! मैं चाहता था कि इसी शरीर से स्वर्ग को जाऊँ, परंतु यह इच्छा पूर्ण न हो सकी। मैंने सैकड़ों यज्ञ किये हैं; किंतु उनका भी कोई फल नहीं मिल रहा है॥ १८ १/२॥

अनृतं नोक्तपूर्वं मे न च वक्ष्ये कदाचन ॥१९॥
कृच्छ्रेष्वपि गतः सौम्य क्षत्रधर्मेण ते शपे।

‘सौम्य! मैं क्षत्रिय धर्म की शपथ खाकर आपसे कहता हूँ कि बड़े-से-बड़े सङ्कट में पड़ने पर भी न तो पहले कभी मैंने मिथ्या भाषण किया है और न भविष्य में ही कभी करूँगा। १९ १/२॥

यज्ञैर्बहुविधैरिष्टं प्रजा धर्मेण पालिताः॥२०॥
गुरवश्च महात्मानः शीलवृत्तेन तोषिताः।
धर्मे प्रयतमानस्य यज्ञं चाहर्तुमिच्छतः॥ २१॥
परितोषं न गच्छन्ति गुरवो मुनिपुंगव।
दैवमेव परं मन्ये पौरुषं तु निरर्थकम्॥२२॥

‘मैंने नाना प्रकार के यज्ञों का अनुष्ठान किया, प्रजाजनों की धर्मपूर्वक रक्षा की और शील एवं सदाचार के द्वारा महात्माओं तथा गुरुजनों को संतुष्ट रखने का प्रयास किया। इस समय भी मैं यज्ञ करना चाहता था; अतः मेरा यह प्रयत्न धर्म के लिये ही था। मुनिप्रवर! तो भी मेरे गुरुजन मुझ पर संतुष्ट न हो सके। यह देखकर मैं दैव को ही बड़ा मानता हूँ पुरुषार्थ तो निरर्थक जान पड़ता है। २०–२२ ॥

दैवेनाक्रम्यते सर्वं दैवं हि परमा गतिः।
तस्य मे परमार्तस्य प्रसादमभिकांक्षतः।
कर्तुमर्हसि भद्रं ते दैवोपहतकर्मणः॥२३॥

‘दैव सबपर आक्रमण करता है। दैव ही सबकी परमगति है। मुने! मैं अत्यन्त आर्त होकर आपकी कृपा चाहता हूँ। दैव ने मेरे पुरुषार्थ को दबा दिया है। आपका भला हो। आप मुझपर अवश्य कृपा करें।२३॥

नान्यां गतिं गमिष्यामि नान्यच्छरणमस्ति मे।
दैवं पुरुषकारेण निवर्तयितुमर्हसि ॥२४॥

‘अब मैं आपके सिवा दूसरे किसी की शरण में नहीं जाऊँगा। दूसरा कोई मुझे शरण देने वाला है भी नहीं। आप ही अपने पुरुषार्थ से मेरे दुर्दैव को पलट सकते हैं ॥२४॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डेऽष्टपञ्चाशः सर्गः॥५८॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में अट्ठावनवाँ सर्ग पूरा हुआ ।५८॥

बालकाण्ड सर्ग- ५१-६०

बालकाण्डम्
एकोनषष्टितमः सर्गः(सर्ग 59)

( विश्वामित्र का त्रिशंकु का यज्ञ कराने के लिये ऋषिमुनियों को आमन्त्रित करना और उनकी बात न मानने वाले महोदय तथा ऋषिपुत्रों को शाप देकर नष्ट करना )

उक्तवाक्यं तु राजानं कृपया कुशिकात्मजः।
अब्रवीन्मधुरं वाक्यं साक्षाच्चण्डालतां गतम्॥

[शतानन्दजी कहते हैं- श्रीराम!] साक्षात् चाण्डाल के स्वरूप को प्राप्त हुए राजा त्रिशंकु के पूर्वोक्त वचन को सुनकर कुशिकनन्दन विश्वामित्रजी ने दया से द्रवित होकर उनसे मधुर वाणीमें कहा— ॥१॥

इक्ष्वाको स्वागतं वत्स जानामि त्वां सुधार्मिकम्।
शरणं ते प्रदास्यामि मा भैषीनूपपुंगव॥२॥

‘वत्स! इक्ष्वाकुकुलनन्दन! तुम्हारा स्वागत है, मैं जानता हूँ, तुम बड़े धर्मात्मा हो। नृपप्रवर! डरो मत, मैं तुम्हें शरण दूंगा॥२॥

अहमामन्त्रये सर्वान् महर्षीन् पुण्यकर्मणः।
यज्ञसाह्यकरान् राजंस्ततो यक्ष्यसि निर्वृतः॥३॥

‘राजन्! तुम्हारे यज्ञ में सहायता करने वाले समस्त पुण्यकर्मा महर्षियों को मैं आमन्त्रित करता हूँ फिर तुम आनन्दपूर्वक यज्ञ करना॥३॥

गुरुशापकृतं रूपं यदिदं त्वयि वर्तते।
अनेन सह रूपेण सशरीरो गमिष्यसि॥४॥
हस्तप्राप्तमहं मन्ये स्वर्गं तव नराधिप।
यस्त्वं कौशिकमागम्य शरण्यं शरणागतः॥५॥

‘गुरु के शाप से तुम्हें जो यह नवीन रूप प्राप्त हुआ है इसके साथ ही तुम सदेह स्वर्गलोक को जाओगे। नरेश्वर! तुम जो शरणागतवत्सल विश्वामित्र की शरण में आ गये, इससे मैं यह समझता हूँ कि स्वर्गलोक तुम्हारे हाथ में आ गया है’॥ ४-५॥

एवमुक्त्वा महातेजाः पुत्रान् परमधार्मिकान्।
व्यादिदेश महाप्राज्ञान् यज्ञसम्भारकारणात्॥६॥

ऐसा कहकर महातेजस्वी विश्वामित्र ने अपने परम धर्मपरायण महाज्ञानी पुत्रों को यज्ञ की सामग्री जुटाने की आज्ञा दी॥६॥

सर्वान् शिष्यान् समाहूय वाक्यमेतदुवाच ह।
सर्वानृषीन् सवासिष्ठानानयध्वं ममाज्ञया॥७॥
सशिष्यान् सुहृदश्चैव सर्विजः सुबहुश्रुतान्।

तत्पश्चात् समस्त शिष्यों को बुलाकर उनसे यह बात कही—’तुम लोग मेरी आज्ञा से अनेक विषयों के ज्ञाता समस्त ऋषि-मुनियों को, जिनमें वसिष्ठ के पुत्र भी सम्मिलित हैं, उनके शिष्यों, सुहृदों तथा ऋत्विजों सहित बुला लाओ॥ ७ १/२॥

यदन्यो वचनं ब्रूयान्मवाक्यबलचोदितः॥८॥
तत् सर्वमखिलेनोक्तं ममाख्येयमनादृतम्।

‘जिसे मेरा संदेश देकर बुलाया गया हो वह अथवा दूसरा कोई यदि इस यज्ञ के विषय में कोई अवहेलनापूर्ण बात कहे तो तुम लोग वह सब पूरा-पूरा मुझसे आकर कहना’ ॥ ८ १/२॥

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा दिशो जग्मुस्तदाज्ञया॥
आजग्मुरथ देशेभ्यः सर्वेभ्यो ब्रह्मवादिनः।
ते च शिष्याः समागम्य मुनिं ज्वलिततेजसम्॥ १०॥
ऊचुश्च वचनं सर्वं सर्वेषां ब्रह्मवादिनाम्।

उनकी आज्ञा मानकर सभी शिष्य चारों दिशाओं में चले गये। फिर तो सब देशों से ब्रह्मवादी मुनि आने लगे। विश्वामित्र के वे शिष्य उन प्रज्वलित तेज वाले महर्षि के पास सबसे पहले लौट आये और समस्त ब्रह्मवादियों ने जो बातें कही थीं, उन्हें सबने विश्वामित्रजी से कह सुनाया।

श्रुत्वा ते वचनं सर्वे समायान्ति द्विजातयः॥११॥
सर्वदेशेषु चागच्छन् वर्जयित्वा महोदयम्।।

वे बोले—’गुरुदेव! आपका आदेश या संदेश सुनकर प्रायः सम्पूर्ण देशों में रहने वाले सभी ब्राह्मण आ रहे हैं। केवल महोदय नामक ऋषि तथा वसिष्ठपुत्रों को छोड़कर सभी महर्षि यहाँ आने के लिये प्रस्थान कर चुके हैं। ११ १/२॥

वासिष्ठं यच्छतं सर्वं क्रोधपर्याकुलाक्षरम्॥१२॥
यथाह वचनं सर्वं शृणु त्वं मुनिपुंगव।

‘मुनिश्रेष्ठ! वसिष्ठ के जो सौ पुत्र हैं, उन सबने क्रोधभरी वाणी में जो कुछ कहा है, वह सब आप सुनिये॥ १२ १/२॥

क्षत्रियो याजको यस्य चण्डालस्य विशेषतः॥ १३॥
कथं सदसि भोक्तारो हविस्तस्य सुरर्षयः।
ब्राह्मणा वा महात्मानो भुक्त्वा चाण्डालभोजनम्॥१४॥
कथं स्वर्गं गमिष्यन्ति विश्वामित्रेण पालिताः।

‘वे कहते हैं—जो विशेषतः चण्डाल है और जिसका यज्ञ कराने वाला आचार्य क्षत्रिय है, उसके यज्ञ में देवर्षि अथवा महात्मा ब्राह्मण हविष्य का भोजन कैसे कर सकते हैं? अथवा चण्डाल का अन्न खाकर विश्वामित्र से पालित हुए ब्राह्मण स्वर्ग में कैसे जा सकेंगे?’ ॥ १३-१४ १/२ ॥

एतद् वचननैष्ठर्यमूचुः संरक्तलोचनाः॥१५॥
वासिष्ठा मुनिशार्दूल सर्वे सहमहोदयाः।

‘मुनिप्रवर! महोदय के साथ वसिष्ठ के सभी पुत्रों ने क्रोध से लाल आँखें करके ये उपर्युक्त निष्ठुरतापूर्ण बातें कही थीं’॥ १५ १/२ ॥

तेषां तद् वचनं श्रुत्वा सर्वेषां मुनिपुंगवः ॥१६॥
क्रोधसंरक्तनयनः सरोषमिदमब्रवीत्।

उन सबकी वह बात सुनकर मुनिवर विश्वामित्र के दोनों नेत्र क्रोध से लाल हो गये और वे रोषपूर्वक इस प्रकार बोले- ॥ १६ १/२॥

यद् दूषयन्त्यदुष्टं मां तप उग्रं समास्थितम्॥१७॥
भस्मीभूता दुरात्मानो भविष्यन्ति न संशयः।

‘मैं उग्र तपस्या में लगा हूँ और दोष या दुर्भावना से रहित हूँ तो भी जो मुझ पर दोषारोपण करते हैं, वे दुरात्मा भस्मीभूत हो जायँगे, इसमें संशय नहीं है। १७ १/२॥

अद्य ते कालपाशेन नीता वैवस्वतक्षयम्॥१८॥
सप्तजातिशतान्येव मृतपाः सम्भवन्तु ते।।
श्वमांसनियताहारा मुष्टिका नाम निघृणाः॥१९॥

‘आज कालपाश से बँधकर वे यमलोक में पहँचा दिये गये। अब ये सात सौ जन्मोंतक मुर्दो की रखवाली करने वाली, निश्चितरूप से कुत्ते का मांस खाने वाली मुष्टिक नामक प्रसिद्ध निर्दय चण्डालजाति में जन्म ग्रहण करें॥ १८-१९॥

विकृताश्च विरूपाश्च लोकाननुचरन्त्विमान्।
महोदयश्च दुर्बुद्धिर्मामदूष्यं ह्यदूषयत्॥२०॥
दूषितः सर्वलोकेषु निषादत्वं गमिष्यति।
प्राणातिपातनिरतो निरनुक्रोशतां गतः॥ २१॥
दीर्घकालं मम क्रोधाद् दुर्गतिं वर्तयिष्यति।

‘वे लोग विकृत एवं विरूप होकर इन लोकों में विचरें, साथ ही दुर्बुद्धि महोदय भी, जिसने मुझ दोषहीन को भी दूषित किया है, मेरे क्रोध से दीर्घकाल तक सब लोगों में निन्दित, दूसरे प्राणियों की हिंसा में तत्पर और दयाशून्य निषादयोनि को प्राप्त करके दुर्गति भोगेगा’। २०-२१ १/२॥

एतावदुक्त्वा वचनं विश्वामित्रो महातपाः।
विरराम महातेजा ऋषिमध्ये महामुनिः॥ २२॥

ऋषियों के बीच में ऐसा कहकर महातपस्वी, महातेजस्वी एवं महामुनि विश्वामित्र चुप हो गये। २२॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे एकोनषष्टितमः सर्गः॥५९॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में उनसठवाँ सर्ग पूरा हुआ। ५९॥

बालकाण्ड सर्ग- ५१-६०

बालकाण्डम्
षष्टितमः सर्गः (सर्ग 60)

( ऋषियोंद्वारा यज्ञ का आरम्भ, त्रिशंकु का सशरीर स्वर्गगमन, इन्द्र द्वारा स्वर्ग से उनके गिराये जाने पर क्षुब्ध हुए विश्वामित्र का नूतन देवसर्ग के लिये उद्योग )

तपोबलहतान् ज्ञात्वा वासिष्ठान् समहोदयान्।
ऋषिमध्ये महातेजा विश्वामित्रोऽभ्यभाषत॥१॥

[शतानन्दजी कहते हैं- श्रीराम!] महोदयसहित वसिष्ठ के पुत्रों को अपने तपोबल से नष्ट हुआ जानमहातेजस्वी विश्वामित्र ने ऋषियों के बीच में इस प्रकार कहा- ॥१॥

अयमिक्ष्वाकुदायादस्त्रिशङ्करिति विश्रुतः।
धर्मिष्ठश्च वदान्यश्च मां चैव शरणं गतः॥२॥

‘मुनिवरो! ये इक्ष्वाकुवंश में उत्पन्न राजा त्रिशंकु हैं। ये विख्यात नरेश बड़े ही धर्मात्मा और दानी रहे हैं तथा इस समय मेरी शरण में आये हैं॥२॥

स्वेनानेन शरीरेण देवलोकजिगीषया।
यथायं स्वशरीरेण देवलोकं गमिष्यति॥३॥
तथा प्रवर्त्यतां यज्ञो भवद्भिश्च मया सह।

‘इनकी इच्छा है कि मैं अपने इसी शरीर से देवलोक पर अधिकार प्राप्त करूँ। अतः आपलोग मेरे साथ रहकर ऐसे यज्ञ का अनुष्ठान करें, जिससे इन्हें इस शरीर से ही देवलोक की प्राप्ति हो सके’॥ ३
१/२॥

विश्वामित्रवचः श्रुत्वा सर्व एव महर्षयः॥४॥
ऊचुः समेताः सहसा धर्मज्ञा धर्मसंहितम्।
अयं कुशिकदायादो मुनिः परमकोपनः॥५॥
यदाह वचनं सम्यगेतत् कार्यं न संशयः।

विश्वामित्रजी की यह बात सुनकर धर्म को जानने वाले सभी महर्षियों ने सहसा एकत्र होकर आपस में धर्मयुक्त परामर्श किया—’ब्राह्मणो! कुशिक के पुत्र विश्वामित्र मुनि बड़े क्रोधी हैं ये जो बात कह रहे हैं, उसका ठीक तरह से पालन करना चाहिये, इसमें संशय नहीं है॥ ४-५ १/२॥

अग्निकल्पो हि भगवान् शापं दास्यति रोषतः॥
तस्मात् प्रवर्त्यतां यज्ञः सशरीरो यथा दिवि।
गच्छेदिक्ष्वाकुदायादो विश्वामित्रस्य तेजसा॥ ७॥

‘ये भगवान् विश्वामित्र अग्नि के समान तेजस्वी हैं। यदि इनकी बात नहीं मानी गयी तो ये रोषपूर्वक शाप दे देंगे। इसलिये ऐसे यज्ञ का आरम्भ करना चाहिये, जिससे विश्वामित्र के तेज से ये इक्ष्वाकुनन्दन त्रिशंकु सशरीर स्वर्गलोक में जा सकें’॥६-७॥

ततः प्रवर्त्यतां यज्ञः सर्वे समधितिष्ठत।
एवमुक्त्वा महर्षयः संजह्वस्ताः क्रियास्तदा ॥८॥

इस तरह विचार करके उन्होंने सर्वसम्मति से यह निश्चय किया कि ‘यज्ञ आरम्भ किया जाय।’ ऐसा निश्चय करके महर्षियों ने उस समय अपना-अपना कार्य आरम्भ किया॥ ८॥

याजकश्च महातेजा विश्वामित्रोऽभवत् क्रतौ।
ऋत्विजश्चानुपूर्येण मन्त्रवन्मन्त्रकोविदाः॥९॥
चक्रुः सर्वाणि कर्माणि यथाकल्पं यथाविधि।

महातेजस्वी विश्वामित्र स्वयं ही उस यज्ञमें याजक (अध्वर्यु) हुए। फिर क्रमशः अनेक मन्त्रवेत्ता ब्राह्मण ऋत्विज् हुए; जिन्होंने कल्पशास्त्रके अनुसार विधि एवं मन्त्रोच्चारणपूर्वक सारे कार्य सम्पन्न किये॥९ १/२॥
ततः कालेन महता विश्वामित्रो महातपाः॥१०॥
चकारावाहनं तत्र भागार्थं सर्वदेवताः।
नाभ्यागमंस्तदा तत्र भागार्थं सर्वदेवताः॥११॥

तदनन्तर बहुत समयतक यत्नपूर्वक मन्त्रपाठ करके महातपस्वी विश्वामित्र ने अपना-अपना भाग ग्रहण करने के लिये सम्पूर्ण देवताओं का आवाहन किया; परंतु उस समय वहाँ भाग लेने के लिये वे सब देवता नहीं आये॥१०-११॥

ततः कोपसमाविष्टो विश्वामित्रो महामुनिः।
स्रुवमुद्यम्य सक्रोधस्त्रिशङ्कमिदमब्रवीत्॥१२॥

इससे महामुनि विश्वामित्र को बड़ा क्रोध आया और उन्होंने स्रुवा उठाकर रोष के साथ राजा त्रिशंकु से इस प्रकार कहा- ॥ १२॥

पश्य मे तपसो वीर्यं स्वार्जितस्य नरेश्वर।
एष त्वां स्वशरीरेण नयामि स्वर्गमोजसा ॥१३॥

‘नरेश्वर! अब तुम मेरे द्वारा उपार्जित तपस्या का बल देखो। मैं अभी तुम्हें अपनी शक्ति से सशरीर स्वर्गलोक में पहुँचाता हूँ॥ १३॥

दुष्प्रापं स्वशरीरेण स्वर्गं गच्छ नरेश्वर।
स्वार्जितं किंचिदप्यस्ति मया हि तपसः फलम्॥ १४॥
राजंस्त्वं तेजसा तस्य सशरीरो दिवं व्रज।

‘राजन्! आज तुम अपने इस शरीर के साथ ही दुर्लभ स्वर्गलोक को जाओ। नरेश्वर! यदि मैंने तपस्या का कुछ भी फल प्राप्त किया है तो उसके प्रभाव से तुम सशरीर स्वर्गलोक को जाओ’॥ १४ १/२॥

उक्तवाक्ये मुनौ तस्मिन् सशरीरो नरेश्वरः॥ १५॥
दिवं जगाम काकुत्स्थ मुनीनां पश्यतां तदा।

श्रीराम ! विश्वामित्र मुनि के इतना कहते ही राजा त्रिशंकु सब मुनियों के देखते-देखते उस समय अपने शरीर के साथ ही स्वर्गलोक को चले गये॥ १५ १/२॥

स्वर्गलोकं गतं दृष्ट्वा त्रिशङ्कं पाकशासनः॥१६॥
सह सर्वैः सुरगणैरिदं वचनमब्रवीत्।

त्रिशंकु को स्वर्गलोक में पहुँचा हुआ देख समस्त देवताओं के साथ पाकशासन इन्द्र ने उनसे इस प्रकार कहा- ॥ १६ १/२॥

त्रिशङ्को गच्छ भूयस्त्वं नासि स्वर्गकृतालयः॥ १७॥
गुरुशापहतो मूढ पत भूमिमवाक्शिराः।

‘मूर्ख त्रिशंकु ! तू फिर यहाँ से लौट जा, तेरे लिये स्वर्ग में स्थान नहीं है। तू गुरु के शाप से नष्ट हो चुका है, अतः नीचे मुँह किये पुनः पृथ्वी पर गिर जा’ ॥ १७ १/२॥

एवमुक्तो महेन्द्रेण त्रिशङ्करपतत् पुनः॥१८॥
विक्रोशमानस्त्राहीति विश्वामित्रं तपोधनम्।

इन्द्र के इतना कहते ही राजा त्रिशंकु तपोधन विश्वामित्र को पुकार कर ‘त्राहि-त्राहि’ की रट लगाते हुए पुनः स्वर्ग से नीचे गिरे॥ १८ १/२॥

तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य क्रोशमानस्य कौशिकः॥ १९॥
रोषमाहारयत् तीव्र तिष्ठ तिष्ठति चाब्रवीत्।

चीखते-चिल्लाते हुए त्रिशंकु की वह करुण पुकार सुनकर कौशिक मुनि को बड़ा क्रोध हुआ। वे त्रिशंकु से बोले– ‘राजन् ! वहीं ठहर जा, वहीं ठहरजा’ (उनके ऐसा कहने पर त्रिशंकु बीच में ही लटके रह गये) ॥ १९ १/२॥

ऋषिमध्ये स तेजस्वी प्रजापतिरिवापरः॥२०॥
सृजन् दक्षिणमार्गस्थान् सप्तर्षीनपरान् पुनः।
नक्षत्रवंशमपरमसृजत् क्रोधमूर्च्छितः॥२१॥

तत्पश्चात् तेजस्वी विश्वामित्र ने ऋषिमण्डली के बीच दूसरे प्रजापति के समान दक्षिण मार्ग के लिये नये सप्तर्षियों की सृष्टि की तथा क्रोध से भरकर उन्होंने नवीन नक्षत्रों का भी निर्माण कर डाला॥ २०-२१॥

दक्षिणां दिशमास्थाय ऋषिमध्ये महायशाः।
सृष्ट्वा नक्षत्रवंशं च क्रोधेन कलुषीकृतः॥२२॥
अन्यमिन्द्रं करिष्यामि लोको वा स्यादनिन्द्रकः।
दैवतान्यपि स क्रोधात् स्रष्टं समुपचक्रमे॥२३॥

वे महायशस्वी मुनि क्रोध से कलुषित हो दक्षिण दिशा में ऋषिमण्डली के बीच नूतन नक्षत्रमालाओं की सृष्टि करके यह विचार करने लगे कि ‘मैं दूसरे इन्द्र की सृष्टि करूँगा अथवा मेरे द्वारा रचित स्वर्गलोक बिना इन्द्र के ही रहेगा।’ ऐसा निश्चय करके उन्होंने क्रोधपूर्वक नूतन देवताओं की सृष्टि प्रारम्भ की॥ २२-२३॥

ततः परमसम्भ्रान्ताः सर्षिसङ्गाः सुरासुराः।
विश्वामित्रं महात्मानमूचुः सानुनयं वचः॥२४॥ ।

इससे समस्त देवता, असुर और ऋषि-समुदाय बहुत घबराये और सभी वहाँ आकर महात्मा विश्वामित्र से विनयपूर्वक बोले- ॥२४॥

अयं राजा महाभाग गुरुशापपरिक्षतः।
सशरीरो दिवं यातुं नार्हत्येव तपोधन॥ २५॥

‘महाभाग! ये राजा त्रिशंकु गुरु के शाप से अपना पुण्य नष्ट करके चाण्डाल हो गये हैं; अतः तपोधन ! ये सशरीर स्वर्ग में जाने के कदापि अधिकारी नहीं हैं’।

तेषां तद् वचनं श्रुत्वा देवानां मुनिपुंगवः।
अब्रवीत् सुमहद् वाक्यं कौशिकः सर्वदेवताः॥ २६॥

उन देवताओं की यह बात सुनकर मुनिवर कौशिक ने सम्पूर्ण देवताओं से परमोत्कृष्ट वचन कहा – |॥ २६॥

सशरीरस्य भद्रं वस्त्रिशङ्कोरस्य भूपतेः।
आरोहणं प्रतिज्ञातं नानृतं कर्तुमुत्सहे॥ २७॥

‘देवगण! आपका कल्याण हो मैंने राजा त्रिशंक को सदेह स्वर्ग भेजनेकी प्रतिज्ञा कर ली है। अतः उसे मैं झूठी नहीं कर सकता॥ २७॥

स्वर्गोऽस्तु सशरीरस्य त्रिशङ्कोरस्य शाश्वतः।
नक्षत्राणि च सर्वाणि मामकानि ध्रुवाण्यथ॥ २८॥
यावल्लोका धरिष्यन्ति तिष्ठन्त्वेतानि सर्वशः।
यत् कृतानि सुराः सर्वे तदनुज्ञातुमर्हथ॥२९॥

‘इन महाराज त्रिशंकु को सदा स्वर्गलोक का सुख प्राप्त होता रहे। मैंने जिन नक्षत्रों का निर्माण किया है, वे सब सदा मौजूद रहें। जब तक संसार रहे, तब तक ये सभी वस्तुएँ, जिनकी मेरे द्वारा सृष्टि हुई है, सदा बनी रहें। देवताओ! आप सब लोग इन बातों का अनुमोदन करें’॥

एवमुक्ताः सुराः सर्वे प्रत्यूचुर्मुनिपुंगवम्।
एवं भवतु भद्रं ते तिष्ठन्त्वेतानि सर्वशः॥ ३०॥
गगने तान्यनेकानि वैश्वानरपथाद बहिः।
नक्षत्राणि मुनिश्रेष्ठ तेषु ज्योतिःषु जाज्वलन्॥ ३१॥
अवाक्शिरास्त्रिशङ्कुश्च तिष्ठत्वमरसंनिभः ।
अनुयास्यन्ति चैतानि ज्योतींषि नृपसत्तमम्॥
कृतार्थं कीर्तिमन्तं च स्वर्गलोकगतं यथा।

उनके ऐसा कहने पर सब देवता मुनिवर विश्वामित्र से बोले—’महर्षे! ऐसा ही हो ये सभी वस्तुएँ बनी रहें और आपका कल्याण हो। मुनिश्रेष्ठ ! आपके रचे हुए अनेक नक्षत्र आकाश में वैश्वानर पथ से बाहर प्रकाशित होंगे और उन्हीं ज्योतिर्मय नक्षत्रों के बीच में सिर नीचा किये त्रिशंक भी प्रकाशमान रहेंगे। वहाँ इनकी स्थिति देवताओं के समान होगी और ये सभी नक्षत्र इन कृतार्थ एवं यशस्वी नृपश्रेष्ठ का स्वर्गीय पुरुष की भाँति अनुसरण करते रहेंगे’।

विश्वामित्रस्तु धर्मात्मा सर्वदेवैरभिष्टतः॥३३॥
ऋषिमध्ये महातेजा बाढमित्येव देवताः।

इसके बाद सम्पूर्ण देवताओं ने ऋषियों के बीचमें ही महातेजस्वी धर्मात्मा विश्वामित्र मुनि की स्तुति की, इससे प्रसन्न होकर उन्होंने ‘बहुत अच्छा’ कहकर देवताओं का अनुरोध स्वीकार कर लिया॥३३ १/२॥

ततो देवा महात्मानो ऋषयश्च तपोधनाः।
जग्मुर्यथागतं सर्वे यज्ञस्यान्ते नरोत्तम ॥ ३४॥

नरश्रेष्ठ श्रीराम! तदनन्तर यज्ञ समाप्त होने पर सब देवता और तपोधन महर्षि जैसे आये थे, उसी प्रकार अपने-अपने स्थान को लौट गये॥३४॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे षष्टितमः सर्गः॥६०॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में साठवाँ सर्ग पूरा हुआ।६०॥

बालकाण्ड सर्ग- ५१-६०

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बालकाण्ड सर्ग- ५१-६०

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