वाल्मीकि रामायण- अयोध्याकाण्ड सर्ग- ७६-९०

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॥ श्री गणेशाय नमः ॥
॥ श्री कमलापति नम: ॥
॥ श्री जानकीवल्लभो विजयते ॥
॥ श्री वाल्मीकि रामायण ॥
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वाल्मीकि रामायण
(भावार्थ सहित)
सब एक ही स्थान पर

अयोध्याकाण्ड सर्ग- ७६-९०

अयोध्याकाण्डम्
षट्सप्ततितमः सर्गः (सर्ग 76)

( राजा दशरथ का अन्त्येष्टि संस्कार )

श्लोक:
तमेवं शोकसंतप्तं भरतं कैकयीसुतम्।
उवाच वदतां श्रेष्ठो वसिष्ठः श्रेष्ठवागृषिः॥१॥

भावार्थ :-
इस प्रकार शोक से संतप्त हुए केकयी कुमार भरत से वक्ताओं में श्रेष्ठ महर्षि वसिष्ठ ने उत्तम वाणी में कहा॥१॥

श्लोक:
अलं शोकेन भद्रं ते राजपुत्र महायशः।
प्राप्तकालं नरपतेः कुरु संयानमुत्तमम्॥२॥

भावार्थ :-
‘महायशस्वी राजकुमार! तुम्हारा कल्याण हो। यह शोक छोड़ो, क्योंकि इससे कुछ होने-जाने वाला नहीं है। अब समयोचित कर्तव्य पर ध्यान दो। राजा दशरथ के शव को दाहसंस्कार के लिये ले चलने का उत्तम प्रबन्ध करो’॥२॥

श्लोक:
वसिष्ठस्य वचः श्रुत्वा भरतो धरणीं गतः।
प्रेतकृत्यानि सर्वाणि कारयामास धर्मवित्॥३॥

भावार्थ :-
वसिष्ठजी का वचन सुनकर धर्मज्ञ भरत ने पृथ्वी पर पड़कर उन्हें साष्टाङ्ग प्रणाम किया और मन्त्रियों द्वारा पिता के सम्पूर्ण प्रेतकर्म का प्रबन्ध करवाया॥३॥

श्लोक:
उद्धृत्य तैलसंसेकात् स तु भूमौ निवेशितम्।
आपीतवर्णवदनं प्रसुप्तमिव भूमिपम्॥४॥

भावार्थ :-
राजा दशरथ का शव तेल के कड़ाह से निकालकर भूमि पर रखा गया। अधिक समय तक तेल में पड़े रहने से उनका मुख कुछ पीला हो गया। उसे देखने से ऐसा जान पड़ता था, मानो भूमिपाल दशरथ सो रहे हों॥४॥

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वाल्मीकि रामायण- अयोध्याकाण्ड सर्ग- ७७

अयोध्याकाण्डम्
सप्तसप्ततितमः सर्गः (सर्ग 77)

( भरत का पिता के श्राद्ध में ब्राह्मणों को बहुत धन-रत्न आदि का दान, पिता की चिता भूमि पर जाकर भरत और शत्रुघ्न का विलाप करना )

श्लोक:
ततो दशाहेऽतिगते कृतशौचो नृपात्मजः।
द्वादशेऽहनि सम्प्राप्ते श्राद्धकर्माण्यकारयत्॥१॥

भावार्थ :-
तदनन्तर दशाह व्यतीत हो जाने पर राजकुमार भरत ने ग्यारहवें दिन आत्मशुद्धि के लिये स्नान और एकादशाह श्राद्ध का अनुष्ठान किया, फिर बारहवाँ दिन आने पर उन्होंने अन्य श्राद्ध कर्म (मासिक और सपिण्डीकरण श्राद्ध) किये॥१॥

श्लोक:
ब्राह्मणेभ्यो धनं रत्नं ददावन्नं च पुष्कलम्।
वासांसि च महार्हाणि रत्नानि विविधानि च।
वास्तिकं बहु शुक्लं च गाश्चापि बहुशस्तदा॥२॥

भावार्थ :-
उसमें भरत ने ब्राह्मणों को धन, रत्न, प्रचुर अन्न, बहुमूल्य वस्त्र, नाना प्रकार के रत्न, बहुत-से बकरे, चाँदी और बहुतेरी गौएँ दान कीं॥२॥

श्लोक:
दासीर्दासांश्च यानानि वेश्मानि सुमहान्ति च।
ब्राह्मणेभ्यो ददौ पुत्रो राज्ञस्तस्यौदेहिकम्॥३॥

भावार्थ :-
राजपुत्र भरत ने राजा के पारलौकिक हित के लिये बहुत-से दास, दासियाँ, सवारियाँ तथा बड़े-बड़े घर भी ब्राह्मणों को दिये॥३॥

श्लोक:
ततः प्रभातसमये दिवसे च त्रयोदशे।
विललाप महाबाहुर्भरतः शोकमूर्च्छितः॥४॥

भावार्थ :-
तदनन्तर तेरहवें दिन प्रातःकाल महाबाहु भरत शोक से मूर्च्छित होकर विलाप करने लगे॥४॥

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वाल्मीकि रामायण- अयोध्याकाण्ड सर्ग- ७८

अयोध्याकाण्डम्
अष्टसप्ततितमः सर्गः (सर्ग 78)

( शत्रुज का रोष, उनका कुब्जा को घसीटना और भरतजी के कहने से उसे मूर्च्छित अवस्था में छोड़ देना )

श्लोक:
अथ यात्रां समीहन्तं शत्रुघ्नो लक्ष्मणानुजः।
भरतं शोकसंतप्तमिदं वचनमब्रवीत्॥१॥

भावार्थ :-
तेरहवें दिन का कार्य पूर्ण करके श्रीरामचन्द्रजी के पास जाने का विचार करते हुए शोकसंतप्त भरत से लक्ष्मण के छोटे भाई शत्रुघ्न ने इस प्रकार कहा-॥१॥

श्लोक:
गतिर्यः सर्वभूतानां दुःखे किं पुनरात्मनः।
स रामः सत्त्वसम्पन्नः स्त्रिया प्रव्राजितो वनम्॥२॥

भावार्थ :-
‘भैया! जो दुःख के समय अपने तथा आत्मीयजनों के लिये तो बात ही क्या है, समस्त प्राणियों को भी सहारा देनेवाले हैं, वे सत्त्वगुणसम्पन्न श्रीराम एक स्त्री के द्वारा वन में भेज दिये गये (यह कितने खेदकी बात है)॥२॥

श्लोक:
बलवान् वीर्यसम्पन्नो लक्ष्मणो नाम योऽप्यसौ।
किं न मोचयते रामं कृत्वापि पितृनिग्रहम्॥३॥

भावार्थ :-
‘तथा वे जो बल और पराक्रम से सम्पन्न लक्ष्मण नामधारी शूरवीर हैं, उन्होंने भी कुछ नहीं किया। मैं पूछता हूँ कि उन्होंने पिता को कैद करके भी श्रीराम को इस संकट से क्यों नहीं छुड़ाया?॥३॥

श्लोक:
पूर्वमेव तु विग्राह्यः समवेक्ष्य नयानयो।
उत्पथं यः समारूढो नार्या राजा वशं गतः॥४॥

भावार्थ :-
‘जब राजा एक नारी के वश में होकर बुरे मार्ग पर आरूढ़ हो चुके थे, तब न्याय और अन्याय का विचार करके उन्हें पहले ही कैद कर लेना चाहिये था’॥४॥

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वाल्मीकि रामायण- अयोध्याकाण्ड सर्ग- ७९

अयोध्याकाण्डम्
एकोनाशीतितमः सर्गः (सर्ग 79)

( भरत का अभिषेक-सामग्री की परिक्रमा करके श्रीराम को ही राज्य का अधिकारी बताकर उन्हें लौटा लाने के लिये चलने के निमित्त व्यवस्था करने की सबको आज्ञा देना )

श्लोक:
ततः प्रभातसमये दिवसेऽथ चतुर्दशे।
समेत्य राजकर्तारो भरतं वाक्यमब्रुवन्॥१॥

भावार्थ :-
तदनन्तर चौदहवें दिन प्रातःकाल समस्त राजकर्मचारी मिलकर भरत से इस प्रकार बोले-॥१॥

श्लोक:
गतो दशरथः स्वर्ग यो नो गुरुतरो गुरुः।
रामं प्रव्राज्य वै ज्येष्ठं लक्ष्मणं च महाबलम्॥२॥
त्वमद्य भव नो राजा राजपुत्रो महायशः।
संगत्या नापराध्नोति राज्यमेतदनायकम्॥३॥

भावार्थ :-
‘महायशस्वी राजकुमार! जो हमारे सर्वश्रेष्ठ गुरु थे, वे महाराज दशरथ तो अपने ज्येष्ठ पुत्र श्रीराम तथा महाबली लक्ष्मण को वन में भेजकर स्वयं स्वर्गलोक को चले गये, अब इस राज्य का कोई स्वामी नहीं है; इसलिये अब आप ही हमारे राजा हों। आपके बड़े भाई को स्वयं महाराज ने वनवास की आज्ञा दी और आपको यह राज्य प्रदान किया! अतः आपका राजा होना न्यायसङ्गत है। इस सङ्गति के कारण ही आप राज्य को अपने अधिकार में लेकर किसी के प्रति कोई अपराध नहीं कर रहे हैं॥२-३॥

श्लोक:
आभिषेचनिकं सर्वमिदमादाय राघव।
प्रतीक्षते त्वां स्वजनः श्रेणयश्च नृपात्मज॥४॥

भावार्थ :-
‘राजकुमार रघुनन्दन! ये मन्त्री आदि स्वजन, पुरवासी तथा सेठलोग अभिषेक की सब सामग्री लेकर आपकी राह देखते हैं॥४॥

श्लोक:
राज्यं गृहाण भरत पितृपैतामहं ध्रुवम्।
अभिषेचय चात्मानं पाहि चास्मान् नरर्षभ॥५॥

भावार्थ :-
‘भरतजी! आप अपने माता-पितामहों के इस राज्य को अवश्य ग्रहण कीजिये। नरश्रेष्ठ! राजा के पद पर अपना अभिषेक कराइये और हमलोगों की रक्षा कीजिये॥५॥

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वाल्मीकि रामायण- अयोध्याकाण्ड सर्ग- ८०

अयोध्याकाण्डम्
अशीतितमः सर्गः (सर्ग 80)

( अयोध्या से गङ्गा तट तक सुरम्य शिविर और कूप आदि से युक्त सुखद राजमार्ग का निर्माण )

श्लोक:
अथ भूमिप्रदेशज्ञाः सूत्रकर्मविशारदाः।
स्वकर्माभिरताः शूराः खनका यन्त्रकास्तथा॥१॥
कान्तिकाः स्थपतयः पुरुषा यन्त्रकोविदाः।
तथा वर्धकयश्चैव मार्गिणो वृक्षतक्षकाः॥२॥
सूपकाराः सुधाकारा वंशचर्मकृतस्तथा।
समर्था ये च द्रष्टारः पुरतश्च प्रतस्थिरे॥३॥

भावार्थ :-
तत्पश्चात् ऊँची-नीची एवं सजल-निर्जल भूमि का ज्ञान रखने वाले, सूत्रकर्म (छावनी आदि बनाने के लिये सूत धारण करने) में कुशल, मार्ग की रक्षा आदि अपने कर्म में सदा सावधान रहने वाले शूर-वीर, भूमि खोदने या सुरङ्ग आदि बनाने वाले, नदी आदि पार करने के लिये तुरंत साधन उपस्थित करनेवाले अथवा जल के प्रवाह को रोकने वाले वेतन भोगी कारीगर, थवई, रथ और यन्त्र आदि बनाने वाले पुरुष, बढ़ई, मार्गरक्षक, पेड़ काटने वाले, रसोइये, चूनेसे पोतने आदि का काम करने वाले, बाँस की चटाई और सूप आदि बनाने वाले, चमड़े का चारजामा आदि बनाने वाले तथा रास्ते की विशेष जानकारी रखने वाले सामर्थ्यशाली पुरुषों ने पहले प्रस्थान किया॥१-३॥

श्लोक:
स तु हर्षात् तमुद्देशं जनौघो विपुलः प्रयान्।
अशोभत महावेगः सागरस्येव पर्वणि॥४॥

भावार्थ :-
उस समय मार्ग ठीक करने के लिये एक विशाल जनसमुदाय बड़े हर्ष के साथ वनप्रदेश की ओर अग्रसर हुआ, जो पूर्णिमा के दिन उमड़े हुए समुद्र के महान् वेग की भाँति शोभा पा रहा था॥४॥

श्लोक:
ते स्ववारं समास्थाय वर्मकर्मणि कोविदाः।
करणैर्विविधोपेतैः पुरस्तात् सम्प्रतस्थिरे॥५॥

भावार्थ :-
वे मार्ग-निर्माण में निपुण कारीगर अपना-अपना दल साथ लेकर अनेक प्रकार के औजारों के साथ आगे चल दिये॥५॥

श्लोक:
लता वल्लीश्च गुल्मांश्च स्थाणूनश्मन एव च।
जनास्ते चक्रिरे मार्ग छिन्दन्तो विविधान् द्रुमान्॥६॥

भावार्थ :-
वे लोग लताएँ, बेलें, झाड़ियाँ, ठूठे वृक्ष तथा पत्थरों को हटाते और नाना प्रकार के वृक्षों को काटते हुए मार्ग तैयार करने लगे॥६॥

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वाल्मीकि रामायण- अयोध्याकाण्ड सर्ग- ८१

अयोध्याकाण्डम्
एकाशीतितमः सर्गः (सर्ग 81)

( प्रातःकाल के मङ्गलवाद्य-घोष को सुनकर भरत का दुःखी होना और उसे बंद कराकर विलाप करना, वसिष्ठजी का सभा में आकर मन्त्री आदि को बुलाने के लिये दूत भेजना )

श्लोक:
ततो नान्दीमुखीं रात्रिं भरतं सूतमागधाः।
तुष्टुवुः सविशेषज्ञाः स्तवैर्मङ्गलसंस्तवैः॥१॥

भावार्थ :-
इधर अयोध्या में उस अभ्युदयसूचक रात्रि का थोड़ा-सा ही भाग अवशिष्ट देख स्तुति-कलाके विशेषज्ञ सूत और मागधों ने मङ्गलमयी स्तुतियों द्वारा भरत का स्तवन आरम्भ किया॥१॥

श्लोक:
सुवर्णकोणाभिहतः प्राणदद्यामदुन्दुभिः।
दध्मुः शङ्खांश्च शतशो वाद्यांश्चोच्चावचस्वरान्॥२॥

भावार्थ :-
प्रहरकी समाप्ति को सूचित करने वाली दुन्दुभि सोने के डंडे से आहत होकर बज उठी। बाजे बजाने वालों ने शङ्ख तथा दूसरे-दूसरे नाना प्रकार के सैकड़ों बाजे बजाये॥२॥

श्लोक:
स तूर्यघोषः सुमहान् दिवमापूरयन्निव।
भरतं शोकसंतप्तं भूयः शोकैररन्धयत्॥३॥

भावार्थ :-
वाद्यों का वह महान् तुमुल घोष समस्त आकाश को व्याप्त करता हुआ-सा गूंज उठा और शोकसंतप्त भरत को पुनः शोकाग्नि की आँच से राँध ने लगा॥३॥

श्लोक:
ततः प्रबुद्धो भरतस्तं घोषं संनिवर्त्य च।
नाहं राजेति चोक्त्वा तं शत्रुघ्नमिदमब्रवीत्॥४॥

भावार्थ :-
वाद्यों की उस ध्वनि से भरत की नींद खुल गयी; वे जाग उठे और ‘मैं राजा नहीं हूँ’ ऐसा कहकर उन्होंने उन बाजों का बजना बंद करा दिया। तत्पश्चात् वे शत्रुघ्न से बोले॥४॥

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वाल्मीकि रामायण- अयोध्याकाण्ड सर्ग- ८२

अयोध्याकाण्डम्
द्व्यशीतितमः सर्गः (सर्ग 82)

( वसिष्ठजी का भरत को राज्य पर अभिषिक्त होने के लिये आदेश देना,भरत का उसे अनुचित बताकर श्रीराम को लाने के लिये वन में चलने की तैयारी का आदेश देना )

श्लोक:
तामार्यगणसम्पूर्णां भरतः प्रग्रहां सभाम्।
ददर्श बुद्धिसम्पन्नः पूर्णचन्द्रां निशामिव॥१॥

भावार्थ :-
बुद्धिमान् भरत ने उत्तम ग्रह-नक्षत्रों से सुशोभित और पूर्ण चन्द्रमण्डल से प्रकाशित रात्रि की भाँति उस सभा को देखा। वह श्रेष्ठ पुरुषों की मण्डली से भरी-पूरी तथा वसिष्ठ आदि श्रेष्ठ मुनियों की उपस्थिति से शोभायमान थी॥१॥

श्लोक:
आसनानि यथान्यायमार्याणां विशतां तदा।
वस्त्राङ्गरागप्रभया द्योतिता सा सभोत्तमा॥२॥

भावार्थ :-
उस समय यथायोग्य आसनों पर बैठे हुए आर्य पुरुषों के वस्त्रों तथा अङ्गरागों की प्रभा से वह उत्तम सभा अधिक दीप्तिमती हो उठी थी॥२॥

श्लोक:
सा विद्वज्जनसम्पूर्णा सभा सुरुचिरा तथा।
अदृश्यत घनापाये पूर्णचन्द्रेव शर्वरी॥३॥

भावार्थ :-
जैसे वर्षाकाल व्यतीत होने पर शरद्-ऋतु की पूर्णिमा को पूर्ण चन्द्रमण्डल से अलंकृत रजनी बड़ी मनोहर दिखायी देती है, उसी प्रकार विद्वानों के समुदाय से भरी हुई वह सभा बड़ी सुन्दर दिखायी देती थी॥३॥

श्लोक:
राज्ञस्तु प्रकृतीः सर्वाः स सम्प्रेक्ष्य च धर्मवित् ।
इदं पुरोहितो वाक्यं भरतं मृदु चाब्रवीत्॥४॥

भावार्थ :-
उस समय धर्म के ज्ञाता पुरोहित वसिष्ठजी ने राजा की सम्पूर्ण प्रकृतियों को उपस्थित देख भरत से यह मधुर वचन कहा—॥४॥

श्लोक:
तात राजा दशरथः स्वर्गतो धर्ममाचरन्।
धनधान्यवतीं स्फीतां प्रदाय पृथिवीं तव॥५॥

भावार्थ :-
‘तात! राजा दशरथ यह धन-धान्य से परिपूर्ण समृद्धिशालिनी पृथिवी तुम्हें देकर स्वयं धर्म का आचरण करते हुए स्वर्गवासी हुए हैं॥५॥

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वाल्मीकि रामायण- अयोध्याकाण्ड सर्ग- ८३

अयोध्याकाण्डम्
त्र्यशीतितमः सर्गः (सर्ग 83)

( भरत की वनयात्रा और शृङ्गवेरपुर में रात्रिवास )

श्लोक:
ततः समुत्थितः कल्यमास्थाय स्यन्दनोत्तमम्।
प्रययौ भरतः शीघ्रं रामदर्शनकाम्यया॥१॥

भावार्थ :-
तदनन्तर प्रातःकाल उठकर भरत ने उत्तम रथपर आरूढ़ हो श्रीरामचन्द्रजी के दर्शन की इच्छा से शीघ्रतापूर्वक प्रस्थान किया॥१॥

श्लोक:
अग्रतः प्रययुस्तस्य सर्वे मन्त्रिपुरोहिताः।
अधिरुह्य हयैर्युक्तान् रथान् सूर्यरथोपमान्॥२॥

भावार्थ :-
उनके आगे-आगे सभी मन्त्री और पुरोहित घोड़े जुते हुए रथों पर बैठकर यात्रा कर रहे थे। वे रथ सूर्यदेव के रथ के समान तेजस्वी दिखायी देते थे॥२॥

श्लोक:
नवनागसहस्राणि कल्पितानि यथाविधि।
अन्वयुर्भरतं यान्तमिक्ष्वाकुकुलनन्दनम्॥३॥

भावार्थ :-
यात्रा करते हुए इक्ष्वाकुकुलनन्दन भरत के पीछे पीछे विधिपूर्वक सजाये गये नौ हजार हाथी चल रहे थे॥३॥

श्लोक:
षष्ठी रथसहस्राणि धन्विनो विविधायुधाः।
अन्वयुर्भरतं यान्तं राजपुत्रं यशस्विनम्॥४॥

भावार्थ :-
यात्रापरायण यशस्वी राजकुमार भरत के पीछे साठ हजार रथ और नाना प्रकार के आयुध धारण करने वाले धनुर्धर योद्धा भी जा रहे थे॥४॥

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वाल्मीकि रामायण- अयोध्याकाण्ड सर्ग- ८४

अयोध्याकाण्डम्
चतुरशीतितमः सर्गः (सर्ग 84)

( निषादराज गुह का अपने बन्धुओं भेंट की सामग्री ले भरत के पास जाना और उनसे आतिथ्य स्वीकार करने के लिये अनुरोध करना )

श्लोक:
ततो निविष्टां ध्वजिनीं गङ्गामन्वाश्रितां नदीम्।
निषादराजो दृष्ट्वैव ज्ञातीन् स परितोऽब्रवीत्॥१॥

भावार्थ :-
उधर निषादराज गुह ने गङ्गा नदी के तटपर ठहरी हुई भरत की सेना को देखकर सब ओर बैठे हुए अपने भाई-बन्धुओं से कहा-॥१॥

श्लोक:
महतीयमितः सेना सागराभा प्रदृश्यते।
नास्यान्तमवगच्छामि मनसापि विचिन्तयन्॥२॥

भावार्थ :-
‘भाइयो! इस ओर जो यह विशाल सेना ठहरी हुई है समुद्र के समान अपार दिखायी देती है; मैं मन से बहुत सोचने पर भी इसका पार नहीं पाता हूँ॥२॥

श्लोक:
यदा नु खलु दुर्बुद्धिर्भरतः स्वयमागतः।
स एष हि महाकायः कोविदारध्वजो रथे॥३॥

भावार्थ :-
‘निश्चय ही इसमें स्वयं दुर्बुद्धि भरत भी आया हआ है; यह कोविदार के चिह्मवाली विशाल ध्वजा उसी के रथ पर फहरा रही है॥३॥

श्लोक:
बन्धयिष्यति वा पाशैरथ वास्मान् वधिष्यति।
अनु दाशरथिं रामं पित्रा राज्याद् विवासितम्॥४॥

भावार्थ :-
‘मैं समझता हूँ कि यह अपने मन्त्रियों द्वारा पहले हमलोगों को पाशों से बँधवायेगा अथवा हमारा वध कर डालेगा; तत्पश्चात् जिन्हें पिता ने राज्य से निकाल दिया है, उन दशरथनन्दन श्रीराम को भी मार डालेगा॥४॥

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वाल्मीकि रामायण- अयोध्याकाण्ड सर्ग- ८५

अयोध्याकाण्डम्
पञ्चाशीतितमः सर्गः (सर्ग 85)

( गुह और भरत की बातचीत तथा भरत का शोक )

श्लोक:
एवमुक्तस्तु भरतो निषादाधिपतिं गुहम्।
प्रत्युवाच महाप्राज्ञो वाक्यं हेत्वर्थसंहितम्॥१॥

भावार्थ :-
निषादराज गुह के ऐसा कहने पर महाबुद्धिमान् भरत ने युक्ति और प्रयोजनयुक्त वचनों में उसे इस प्रकार उत्तर दिया-॥१॥

श्लोक:
ऊर्जितः खलु ते कामः कृतो मम गुरोः सखे।
यो मे त्वमीदृशीं सेनामभ्यर्चयितुमिच्छसि॥२॥

भावार्थ :-
‘भैया ! तुम मेरे बड़े भाई श्रीराम के सखा हो। मेरी इतनी बड़ी सेना का सत्कार करना चाहते हो, यह तुम्हारा मनोरथ बहुत ही ऊँचा है। तुम उसे पूर्ण ही समझो तुम्हारी श्रद्धा से ही हम सब लोगों का सत्कार हो गया’॥२॥

श्लोक:
इत्युक्त्वा स महातेजा गुहं वचनमुत्तमम्।
अब्रवीद् भरतः श्रीमान् पन्थानं दर्शयन् पुनः॥३॥

भावार्थ :-
यह कहकर महातेजस्वी श्रीमान् भरत ने गन्तव्य मार्ग को हाथ के संकेत से दिखाते हुए पुनः गुह से उत्तम वाणी में पूछा-॥३॥

श्लोक:
कतरेण गमिष्यामि भरद्वाजाश्रमं यथा।
गहनोऽयं भृशं देशो गङ्गानूपो दुरत्ययः॥४॥

भावार्थ :-
‘निषादराज! इन दो मार्गों में से किसके द्वारा मुझे भरद्वाज मुनि के आश्रम पर जाना होगा? गङ्गा के किनारे का यह प्रदेश तो बड़ा गहन मालूम होता है। इसे लाँघकर आगे बढ़ना कठिन है’॥४॥

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वाल्मीकि रामायण- अयोध्याकाण्ड सर्ग- ८६

अयोध्याकाण्डम्
षडशीतितमः सर्गः (सर्ग 86)

( निषादराज गुह के द्वारा लक्ष्मण के सद्भाव और विलाप का वर्णन )

श्लोक:
आचचक्षेऽथ सद्भावं लक्ष्मणस्य महात्मनः।
भरतायाप्रमेयाय गुहो गहनगोचरः॥१॥

भावार्थ :-
वनचारी गुह ने अप्रमेय शक्तिशाली भरत से महात्मा लक्ष्मण के सद्भाव का इस प्रकार वर्णन किया—॥१॥

श्लोक:
तं जाग्रतं गुणैर्युक्तं वरचापेषुधारिणम्।
भ्रातृगुप्त्यर्थमत्यन्तमहं लक्ष्मणमब्रुवम्॥२॥

भावार्थ :-
‘लक्ष्मण अपने भाई की रक्षा के लिये श्रेष्ठ धनुष और बाण धारण किये अधिक कालतक जागते रहे। उस समय उन सद्गुणशाली लक्ष्मण से मैंने इस प्रकार कहा—॥२॥

श्लोक:
इयं तात सुखा शय्या त्वदर्थमुपकल्पिता।
प्रत्याश्वसिहि शेष्वास्यां सुखं राघवनन्दन॥३॥
उचितोऽयं जनः सर्वो दुःखानां त्वं सुखोचितः।
धर्मात्मस्तस्य गुप्त्यर्थं जागरिष्यामहे वयम्॥४॥

भावार्थ :-
‘तात रघुकुलनन्दन! मैंने तुम्हारे लिये यह सुखदायिनी शय्या तैयार की है। तुम इसपर सुखपूर्वक सोओ और भलीभाँति विश्राम करो। यह (मैं) सेवक तथा इसके साथ के सब लोग वनवासी होने के कारण दुःख सहन करने के योग्य हैं (क्योंकि हम सबको कष्ट सहने का अभ्यास है); परंतु तुम सुख में ही पले होने के कारण उसी के योग्य हो। धर्मात्मन्! हमलोग श्रीरामचन्द्रजी की रक्षा के लिये रातभर जागते रहेंगे॥३-४॥

श्लोक:
नहि रामात् प्रियतरो ममास्ति भुवि कश्चन।
मोत्सुको भूर्ब्रवीम्येतदथ सत्यं तवाग्रतः॥५॥

भावार्थ :-
‘मैं तुम्हारे सामने सत्य कहता हूँ कि इस भूमण्डल में मुझे श्रीराम से बढ़कर प्रिय दूसरा कोई नहीं है; अतः तुम इनकी रक्षा के लिये उत्सुक न होओ॥५॥

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वाल्मीकि रामायण- अयोध्याकाण्ड सर्ग- ८७

अयोध्याकाण्डम्
सप्ताशीतितमः सर्गः (सर्ग 87)

( भरत की मूर्छा से गुह, शत्रुघ्न और माताओं का दुःखी होना, भरत का गुह से श्रीराम आदि के भोजन और शयन आदि के विषय में पूछना )

श्लोक:
गुहस्य वचनं श्रुत्वा भरतो भृशमप्रियम्।
ध्यानं जगाम तत्रैव यत्र तच्छ्रुतमप्रियम्॥१॥

भावार्थ :-
गुह का श्रीराम के जटाधारण आदि से सम्बन्ध रखने वाला अत्यन्त अप्रिय वचन सुनकर भरत चिन्तामग्न हो गये। जिन श्रीराम के विषय में उन्होंने अप्रिय बात सुनी थी, उन्हीं का वे चिन्तन करने लगे (उन्हें यह चिन्ता हो गयी कि अब मेरा मनोरथ पूर्ण न हो सकेगा। श्रीराम ने जब जटा धारण कर ली, तब वे शायद ही लौटें)॥१॥

श्लोक:
सुकुमारो महासत्त्वः सिंहस्कन्धो महाभुजः।
पुण्डरीकविशालाक्षस्तरुणः प्रियदर्शनः॥२॥
प्रत्याश्वस्य मुहूर्तं तु कालं परमदुर्मनाः।
ससाद सहसा तोत्रैर्हदि विद्ध इव द्विपः॥३॥

भावार्थ :-
भरत सुकुमार होने के साथ ही महान् बलशाली थे, उनके कंधे सिंह के समान थे, भुजाएँ बड़ी-बड़ी और नेत्र विकसित कमल के सदृश सुन्दर थे। उनकी अवस्था तरुण थी और वे देखने में बड़े मनोरम थे। उन्होंने गुह की बात सुनकर दो घड़ी तक किसी प्रकार धैर्य धारण किया, फिर उनके मन में बड़ा दुःख हुआ। वे अंकुश से विद्ध हुए हाथी के समान अत्यन्त व्यथित होकर सहसा दुःख से शिथिल एवं मूर्च्छित हो गये॥२-३॥

श्लोक:
भरतं मूर्च्छितं दृष्ट्वा विवर्णवदनो गुहः।
बभूव व्यथितस्तत्र भूमिकम्पे यथा द्रुमः॥४॥

भावार्थ :-
भरत को मूर्छित हुआ देख गुह के चेहरे का रंग उड़ गया। वह भूकम्प के समय मथित हुए वृक्ष की भाँति वहाँ व्यथित हो उठा॥४॥

श्लोक:
तदवस्थं तु भरतं शत्रुघ्नोऽनन्तरस्थितः।
परिष्वज्य रोदोच्चैर्विसंज्ञः शोककर्शितः॥५॥

भावार्थ :-
शत्रुघ्न भरत के पास ही बैठे थे। वे उनकी वैसी अवस्था देख उन्हें हृदय से लगाकर जोर-जोर से रोने लगे और शोक से पीड़ित हो अपनी सुध-बुध खो बैठे॥५॥

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वाल्मीकि रामायण- अयोध्याकाण्ड सर्ग- ८८

अयोध्याकाण्डम्
अष्टाशीतितमः सर्गः (सर्ग 88)

( श्रीराम की कुश-शय्या देखकर भरत का स्वयं भी वल्कल और जटाधारण करके वन में रहने का विचार प्रकट करना )

श्लोक:
तच्छ्रुत्वा निपुणं सर्वं भरतः सह मन्त्रिभिः।
इङ्गदीमूलमागम्य रामशय्यामवैक्षत॥१॥

भावार्थ :-
निषादराज की सारी बातें ध्यान से सुनकर मन्त्रियों सहित भरत ने इंगुदी-वृक्ष की जड़ के पास आकर श्रीरामचन्द्रजी की शय्या का निरीक्षण किया॥१॥

श्लोक:
अब्रवीज्जननीः सर्वा इह तस्य महात्मनः।
शर्वरी शयिता भूमाविदमस्य विमर्दितम्॥२॥

भावार्थ :-
फिर उन्होंने समस्त माताओं से कहा—’यहीं महात्मा श्रीराम ने भूमि पर शयन करके रात्रि व्यतीत की थी। यही वह कुशसमूह है, जो उनके अङ्गों से विमर्दित हुआ था॥२॥

श्लोक:
महाराजकुलीनेन महाभागेन धीमता।
जातो दशरथेनोवा॒ न रामः स्वप्तमर्हति॥३॥

भावार्थ :-
‘महाराजों के कुल में उत्पन्न हुए परम बुद्धिमान् महाभाग राजा दशरथ ने जिन्हें जन्म दिया है, वे श्रीराम इस तरह भूमि पर शयन करने के योग्य नहीं हैं॥३॥

श्लोक:
अजिनोत्तरसंस्तीर्णे वरास्तरणसंचये।
शयित्वा पुरुषव्याघ्रः कथं शेते महीतले॥४॥

भावार्थ :-
‘जो पुरुषसिंह श्रीराम मुलायम मृगचर्म की विशेष चादर से ढके हुए तथा अच्छे-अच्छे बिछौनों के समूह से सजे हुए पलंग पर सदा सोते आये हैं, वे इस समय पृथ्वी पर कैसे शयन करते होंगे?॥४॥

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वाल्मीकि रामायण- अयोध्याकाण्ड सर्ग- ८९

अयोध्याकाण्डम्
एकोननवतितमः सर्गः (सर्ग 89)

( भरत का सेनासहित गङ्गापार करके भरद्वाज के आश्रम पर जाना )

श्लोक:
व्युष्य रात्रिं तु तत्रैव गङ्गाकूले स राघवः।
काल्यमुत्थाय शत्रुघ्नमिदं वचनमब्रवीत्॥१॥

भावार्थ :-
शृङ्गवेरपुर में ही गङ्गा के तटपर रात्रि बिताकर रघुकुलनन्दन भरत प्रातःकाल उठे और शत्रुघ्न से इस प्रकार बोले-॥१॥

श्लोक:
शत्रुघ्नोत्तिष्ठ किं शेषे निषादाधिपतिं गुहम्।
शीघ्रमानय भद्रं ते तारयिष्यति वाहिनीम्॥२॥

भावार्थ :-
‘शत्रुघ्न! उठो, क्या सो रहे हो। तुम्हारा कल्याण हो, तुम निषादराज गुह को शीघ्र बुला लाओ, वही हमें गङ्गा के पार उतारेगा’॥२॥

श्लोक:
जागर्मि नाहं स्वपिमि तथैवार्यं विचिन्तयन्।
इत्येवमब्रवीद् भ्राता शत्रुनो विप्रचोदितः॥३॥

भावार्थ :-
उनसे इस प्रकार प्रेरित होने पर शत्रुघ्न ने कहा– ‘भैया! मैं भी आपकी ही भाँति आर्य श्रीराम का चिन्तन करता हुआ जाग रहा हूँ, सोता नहीं हूँ’॥३॥

श्लोक:
इति संवदतोरेवमन्योन्यं नरसिंहयोः।
आगम्य प्राञ्जलिः काले गुहो वचनमब्रवीत्॥४॥

भावार्थ :-
वे दोनों पुरुषसिंह जब इस प्रकार परस्पर बातचीत कर रहे थे, उसी समय गुह उपयुक्त वेला में आ पहुँचा और हाथ जोड़कर बोला—॥४॥

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वाल्मीकि रामायण- अयोध्याकाण्ड सर्ग- ९०

अयोध्याकाण्डम्
नवतितमः सर्गः (सर्ग 90)

( भरत और भरद्वाज मुनि की भेंट एवं बातचीत तथा मुनि का अपने आश्रम पर ही ठहरने का आदेश देना )

श्लोक:
भरद्वाजाश्रमं गत्वा क्रोशादेव नरर्षभः।
जनं सर्वमवस्थाप्य जगाम सह मन्त्रिभिः॥१॥
पद्भ्यामेव तु धर्मज्ञो न्यस्तशस्त्रपरिच्छदः।
वसानो वाससी क्षौमे पुरोधाय पुरोहितम्॥२॥

भावार्थ :-
धर्म के ज्ञाता नरश्रेष्ठ भरत ने भरद्वाज-आश्रम के पास पहुँचकर अपने साथ के सब लोगों को आश्रम से एक कोस इधर ही ठहरा दिया था और अपने भी अस्त्रशस्त्र तथा राजोचित वस्त्र उतारकर वहीं रख दिये थे। केवल दो रेशमी वस्त्र धारण करके पुरोहित को आगे किये वे मन्त्रियों के साथ पैदल ही वहाँ गये॥१-२॥

श्लोक:
ततः संदर्शने तस्य भरद्वाजस्य राघवः।
मन्त्रिणस्तानवस्थाप्य जगामानुपुरोहितम्॥३॥

भावार्थ :-
आश्रम में प्रवेश करके जहाँ दूर से ही मुनिवर भरद्वाज का दर्शन होने लगा। वहीं उन्होंने उन मन्त्रियों को खड़ा कर दिया और पुरोहित वसिष्ठजी को आगे करके वे पीछे-पीछे ऋषिके पास गये॥३॥

श्लोक:
वसिष्ठमथ दृष्ट्वैव भरद्वाजो महातपाः।
संचचालासनात् तूर्णं शिष्यानय॑मिति ब्रुवन्॥४॥

भावार्थ :-
महर्षि वसिष्ठ को देखते ही महातपस्वी भरद्वाज आसन से उठ खड़े हुए और शिष्यों से शीघ्रतापूर्वक अर्घ्य ले आने को कहा॥४॥

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