वाल्मीकि रामायण- बालकाण्ड सर्ग- २१-३०

वाल्मीकि रामायण- बालकाण्ड सर्ग- २१-३०

बालकाण्ड सर्ग- २१-३०

॥ श्री गणेशाय नमः ॥
॥ श्री कमलापति नम: ॥
॥ श्री जानकीवल्लभो विजयते ॥
॥ श्री वाल्मीकि रामायण ॥
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बालकाण्ड सर्ग- २१-३०

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बालकाण्ड सर्ग- २१-३०

बालकाण्ड सर्ग- २१-३०वाल्मीकि रामायण
(भावार्थ सहित)
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यह स्वंय शिवजी द्वारा माता जगदम्बा से कही गई एक पवित्र कथा है। आप भी विस्तार पूर्वक पढ़े:
शिव-शक्ति श्रीराम मिलन (संपूर्ण भाग) 🌞

बालकाण्ड सर्ग- २१-३०

बालकाण्ड सर्ग- २१-३०

बालकाण्डम्
एकविंशः सर्गः (सर्ग 21)

( विश्वामित्र के रोषपूर्ण वचन तथा वसिष्ठ का राजा दशरथ को समझाना )

तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य स्नेहपर्याकुलाक्षरम्।
समन्युः कौशिको वाक्यं प्रत्युवाच महीपतिम्॥

राजा दशरथ की बात के एक-एक अक्षर में पुत्र के प्रति स्नेह भरा हुआ था, उसे सुनकर महर्षि विश्वामित्र कुपित हो उनसे इस प्रकार बोले- ॥१॥

पूर्वमर्थं प्रतिश्रुत्य प्रतिज्ञा हातुमिच्छसि।।
राघवाणामयुक्तोऽयं कुलस्यास्य विपर्ययः॥२॥

‘राजन् ! पहले मेरी माँगी हुई वस्तु के देने की प्रतिज्ञा करके अब तुम उसे तोड़ना चाहते हो। प्रतिज्ञा का यह त्याग रघुवंशियों के योग्य तो नहीं है,यह बर्ताव तो इस कुल के विनाश का सूचक है॥२॥

यदीदं ते क्षमं राजन् गमिष्यामि यथागतम्।
मिथ्याप्रतिज्ञः काकुत्स्थ सुखी भव सुहृवृतः॥

‘नरेश्वर ! यदि तुम्हें ऐसा ही उचित प्रतीत होता है तो मैं जैसे आया था, वैसे ही लौट जाऊँगा। ककुत्स्थकुल के रत्न! अब तुम अपनी प्रतिज्ञा झूठी करके हितैषी सुहृदों से घिरे रहकर सुखी रहो’ ॥ ३॥

तस्य रोषपरीतस्य विश्वामित्रस्य धीमतः।
चचाल वसुधा कृत्स्ना देवानां च भयं महत्॥४॥

बुद्धिमान् विश्वामित्र के कुपित होते ही सारी पृथ्वी काँप उठी और देवताओं के मन में महान् भय समा गया॥४॥

त्रस्तरूपं तु विज्ञाय जगत् सर्वं महानृषिः।
नृपतिं सुव्रतो धीरो वसिष्ठो वाक्यमब्रवीत्॥५॥

उनके रोष से सारे संसार को त्रस्त हुआ जान उत्तम व्रत का पालन करने वाले धीरचित्त महर्षि वसिष्ठ ने राजासे इस प्रकार कहा- ॥५॥

इक्ष्वाकूणां कुले जातः साक्षाद् धर्म इवापरः।
धृतिमान् सुव्रतः श्रीमान् न धर्मं हातुमर्हसि॥६॥

‘महाराज! आप इक्ष्वाकुवंशी राजाओं के कुल में साक्षात् दूसरे धर्म के समान उत्पन्न हुए हैं। धैर्यवान्, ” उत्तम व्रत के पालक तथा श्रीसम्पन्न हैं। आपको अपने धर्म का परित्याग नहीं करना चाहिये॥६॥

त्रिषु लोकेषु विख्यातो धर्मात्मा इति राघवः।
स्वधर्मं प्रतिपद्यस्व नाधर्मं वोढुमर्हसि ॥७॥

“रघुकुलभूषण दशरथ बड़े धर्मात्मा हैं’ यह बात तीनों लोकों में प्रसिद्ध है। अतः आप अपने धर्म का ही पालन कीजिये; अधर्म का भार सिरपर न उठाइये॥ ७॥

प्रतिश्रुत्य करिष्येति उक्तं वाक्यमकुर्वतः।
इष्टापूर्तवधो भूयात् तस्माद् रामं विसर्जय॥८॥

‘मैं अमुक कार्य करूँगा’—ऐसी प्रतिज्ञा करके भी जो उस वचनका पालन नहीं करता, उसके यज्ञयागादि इष्ट तथा बावली-तालाब बनवाने आदि पूर्त कर्मो के पुण्यका नाश हो जाता है, अतः आप श्रीराम को विश्वामित्रजी के साथ भेज दीजिये॥ ८॥

कृतास्त्रमकृतास्त्रं वा नैनं शक्ष्यन्ति राक्षसाः।
गुप्तं कुशिकपुत्रेण ज्वलनेनामृतं यथा॥९॥

‘ये अस्त्रविद्या जानते हों या न जानते हों, राक्षस इनका सामना नहीं कर सकते। जैसे प्रज्वलित अग्निद्वारा सुरक्षित अमृत पर कोई हाथ नहीं लगा सकता, उसी प्रकार कुशिकनन्दन विश्वामित्र से सुरक्षित हुए श्रीराम का वे राक्षस कुछ भी बिगाड़ नहीं सकते॥९॥

एष विग्रहवान् धर्म एष वीर्यवतां वरः।
एष विद्याधिको लोके तपसश्च परायणम्॥
‘ये श्रीराम तथा महर्षि विश्वामित्र साक्षात् धर्म की मूर्ति हैं। ये बलवानों में श्रेष्ठ हैं। विद्या के द्वारा ही ये संसार में सबसे बढ़े-चढ़े हैं। तपस्या के तो ये विशाल भण्डार ही हैं॥ १०॥

एषोऽस्त्रान् विविधान् वेत्ति त्रैलोक्ये सचराचरे।
नैनमन्यः पुमान् वेत्ति न च वेत्स्यन्ति केचन॥ ११॥

‘चराचर प्राणियों सहित तीनों लोकों में जो नाना प्रकार के अस्त्र हैं, उन सबको ये जानते हैं। इन्हें मेरे सिवा दूसरा कोई पुरुष न तो अच्छी तरह जानता है और न कोई जानेंगे ही॥ ११॥

न देवा नर्षयः केचिन्नामरा न च राक्षसाः।
गन्धर्वयक्षप्रवराः सकिन्नरमहोरगाः॥१२॥

‘देवता, ऋषि, राक्षस, गन्धर्व, यक्ष, किन्नर तथा बड़े-बड़े नाग भी इनके प्रभाव को नहीं जानते हैं। १२॥

सर्वास्त्राणि कृशाश्वस्य पुत्राः परमधार्मिकाः।
कौशिकाय पुरा दत्ता यदा राज्यं प्रशासति॥ १३॥

‘प्रायः सभी अस्त्र प्रजापति कृशाश्व के परम धर्मात्मा पुत्र हैं। उन्हें प्रजापति ने पूर्वकाल में कुशिकनन्दन विश्वामित्र को जब कि वे राज्यशासन करते थे, समर्पित कर दिया था॥१३॥

तेऽपि पुत्राः कृशाश्वस्य प्रजापतिसुतासुताः।
नैकरूपा महावीर्या दीप्तिमन्तो जयावहाः॥१४॥

‘कृशाश्व के वे पुत्र प्रजापति दक्ष की दो पुत्रियों की संतानें हैं,उनके अनेक रूप हैं। वे सब-के-सब महान् शक्तिशाली, प्रकाशमान और विजय दिलानेवाले हैं॥१४॥

जया च सुप्रभा चैव दक्षकन्ये सुमध्यमे।
ते सतेऽस्त्राणि शस्त्राणि शतं परमभास्वरम्॥ १५॥

‘प्रजापति दक्ष की दो सुन्दरी कन्याएँ हैं, उनके नाम हैं जया और सुप्रभा। उन दोनों ने एक सौ परम प्रकाशमान अस्त्र-शस्त्रों को उत्पन्न किया है॥ १५॥

पञ्चाशतं सुताँल्लेभे जया लब्धवरा वरान्।
वधायासुरसैन्यानामप्रमेयानरूपिणः॥१६॥

‘उनमेंसे जया ने वर पाकर पचास श्रेष्ठ पुत्रों को प्राप्त किया है, जो अपरिमित शक्तिशाली और रूपरहित हैं। वे सब-के-सब असुरों की सेनाओं का वध करने के लिये प्रकट हुए हैं।॥ १६॥

सुप्रभाजनयच्चापि पुत्रान् पञ्चाशतं पुनः ।
संहारान् नाम दुर्धर्षान् दुराकामान् बलीयसः॥ १७॥

‘फिर सुप्रभा ने भी संहार नामक पचास पुत्रों को जन्म दिया, जो अत्यन्त दुर्जय हैं। उन पर आक्रमण करना किसी के लिये भी सर्वथा कठिन है तथा वे सब-के-सब अत्यन्त बलिष्ठ हैं॥ १७॥

तानि चास्त्राणि वेत्त्येष यथावत् कुशिकात्मजः।
अपूर्वाणां च जनने शक्तो भूयश्च धर्मवित्॥ १८॥

‘ये धर्मज्ञ कुशिकनन्दन उन सब अस्त्र-शस्त्रों को अच्छी तरह जानते हैं। जो अस्त्र अब तक उपलब्ध नहीं हुए हैं, उनको भी उत्पन्न करने की इनमें पूर्ण शक्ति है॥ १८॥

तेनास्य मुनिमुख्यस्य धर्मज्ञस्य महात्मनः।
न किञ्चिदस्त्यविदितं भूतं भव्यं च राघव॥ १९॥

‘रघुनन्दन! इसलिये इन मुनिश्रेष्ठ धर्मज्ञ महात्मा विश्वामित्रजीसे भूत या भविष्यकी कोई बात छिपी नहीं है ॥ १९॥

एवंवीर्यो महातेजा विश्वामित्रो महायशाः।
न रामगमने राजन् संशयं गन्तुमर्हसि ॥२०॥

‘राजन्! ये महातेजस्वी, महायशस्वी विश्वामित्र ऐसे प्रभावशाली हैं। अतः इनके साथ राम को भेजने में आप किसी प्रकार का संदेह न करें॥२०॥

तेषां निग्रहणे शक्तः स्वयं च कुशिकात्मजः।
तव पुत्रहितार्थाय त्वामुपेत्याभियाचते॥२१॥

‘महर्षि कौशिक स्वयं भी उन राक्षसोंका संहार करने में समर्थ हैं; किंतु ये आपके पुत्र का कल्याण करना चाहते हैं, इसीलिये यहाँ आकर आपसे याचना कर रहे हैं ॥ २१॥

इति मुनिवचनात् प्रसन्नचित्तो रघुवृषभश्च मुमोद पार्थिवाग्र्यः।
गमनमभिरुरोच राघवस्य प्रथितयशाः कुशिकात्मजाय बुद्ध्या॥२२॥

महर्षि वसिष् ठके इस वचन से विख्यात यश वाले रघुकुल शिरोमणि नृपश्रेष्ठ दशरथ का मन प्रसन्न हो गया। वे आनन्दमग्न हो गये और बुद्धि से विचार करनेपर विश्वामित्रजी की प्रसन्नता के लिये उनके साथ श्रीराम का जाना उन्हें रुचि के अनुकूल प्रतीत होने लगा॥ २२॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे एकविंशः सर्गः ॥२१॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में इक्कीसवाँ सर्ग पूरा हुआ।२१॥

बालकाण्ड सर्ग- २१-३०

बालकाण्डम्
द्वाविंशः सर्गः (सर्ग 22)

( राजा दशरथ का स्वस्तिवाचन पूर्वक राम-लक्ष्मण को मुनि के साथ भेजना,विश्वामित्र से बला और अतिबला नामक विद्या की प्राप्ति )

तथा वसिष्ठे ब्रुवति राजा दशरथः स्वयम्।
प्रहृष्टवदनो राममाजुहाव सलक्ष्मणम्॥१॥
कृतस्वस्त्ययनं मात्रा पित्रा दशरथेन च।
पुरोधसा वसिष्ठेन मंगलैरभिमन्त्रितम्॥२॥

वसिष्ठ के ऐसा कहने पर राजा दशरथ का मुख प्रसन्नता से खिल उठा। उन्होंने स्वयं ही लक्ष्मण सहित श्रीराम को अपने पास बुलाया,फिर माता कौसल्या, पिता दशरथ और पुरोहित वसिष्ठ ने स्वस्तिवाचन करने के पश्चात् उनका यात्रा सम्बन्धी मंगलकार्य सम्पन्न किया—श्रीराम को मंगलसूचक मन्त्रों से अभिमन्त्रित किया गया॥ १-२॥

स पुत्रं मूर्युपाघ्राय राजा दशरथस्तदा।
ददौ कुशिकपुत्राय सुप्रीतेनान्तरात्मना॥ ३॥

तदनन्तर राजा दशरथ ने पुत्र का मस्तक सूंघकर अत्यन्त प्रसन्नचित्त से उसको विश्वामित्र को सौंप दिया॥३॥

ततो वायुः सुखस्पर्शी नीरजस्को ववौ तदा।
विश्वामित्रगतं रामं दृष्ट्वा राजीवलोचनम्॥४॥
पुष्पवृष्टिर्महत्यासीद् देवदुन्दुभिनिःस्वनैः।
शङ्खदुन्दुभिनिर्घोषः प्रयाते तु महात्मनि॥५॥

उस समय धूलरहित सुखदायिनी वायु चलने लगी। कमलनयन श्रीराम को विश्वामित्रजी के साथ जाते देख देवताओं ने आकाश से वहाँ फूलों की बड़ी भारी वर्षा की। देवदुन्दुभियाँ बजने लगीं,महात्मा श्रीराम की यात्रा के समय शङ्खों और नगाड़ोंकी ध्वनि होने लगी॥

विश्वामित्रो ययावग्रे ततो रामो महायशाः।
काकपक्षधरो धन्वी तं च सौमित्रिरन्वगात्॥६॥

आगे-आगे विश्वामित्र, उनके पीछे काकपक्षधारी महायशस्वी श्रीराम तथा उनके पीछे सुमित्राकुमार लक्ष्मण जा रहे थे॥६॥

कलापिनौ धनुष्पाणी शोभयानौ दिशो दश।
विश्वामित्रं महात्मानं त्रिशीर्षाविव पन्नगौ॥७॥

उन दोनों भाइयों ने पीठ पर तरकस बाँध रखे थे। उनके हाथों में धनुष शोभा पा रहे थे तथा वे दोनों दसों दिशाओं को सुशोभित करते हुए महात्मा विश्वामित्र के पीछे तीन-तीन फनवाले दो सर्पो के समान चल रहे थे। एक ओर कंधेपर धनुष, दूसरी ओर पीठपर तूणीर और बीच में मस्तक-इन्हीं तीनों की तीन फन से उपमा दी गयी है॥७॥

अनुजग्मतुरक्षुद्रौ पितामहमिवाश्विनौ।
अनुयातौ श्रिया दीप्तौ शोभयन्तावनिन्दितौ॥८॥

उनका स्वभाव उच्च एवं उदार था। अपनी अनुपम कान्ति से प्रकाशित होने वाले वे दोनों अनिन्द्य सुन्दर राजकुमार सब ओर शोभा का प्रसार करते हुए विश्वामित्रजी के पीछे उसी तरह जा रहे थे, जैसे ब्रह्माजी के पीछे दोनों अश्विनी कुमार चलते हैं॥८॥

तदा कुशिकपुत्रं तु धनुष्पाणी स्वलंकृतौ।
बद्धगोधांगुलित्राणौ खड्गवन्तौ महाद्युती॥९॥
कुमारौ चारुवपुषौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ।
अनुयातौ श्रिया दीप्तौ शोभयेतामनिन्दितौ॥ १०॥
स्थाणुं देवमिवाचिन्त्यं कुमाराविव पावकी।

वे दोनों भाई कुमार श्रीराम और लक्ष्मण वस्त्र और आभूषणों से अच्छी तरह अलंकृत थे। उनके हाथों में धनुष थे। उन्होंने अपने हाथों की अंगुलियों में गोहटी के चमड़े के बने हुए दस्ताने पहन रखे थे। उनके कटिप्रदेश में तलवारें लटक रही थीं। उनके श्रीअंग बड़े मनोहर थे। वे महातेजस्वी श्रेष्ठ वीर अद्भुत कान्ति से उद्भासित हो सब ओर अपनी शोभा फैलाते हुए कुशिक पुत्र विश्वामित्र का अनुसरण कर रहे थे। उस समय वे दोनों वीर अचिन्त्य शक्तिशाली स्थाणुदेव (महादेव) के पीछे चलने वाले दो अग्निकुमार स्कन्द और विशाख की भाँति शोभा पाते थे॥

अध्यर्धयोजनं गत्वा सरय्वा दक्षिणे तटे॥११॥
रामेति मधुरां वाणीं विश्वामित्रोऽभ्यभाषत।
गृहाण वत्स सलिलं मा भूत् कालस्य पर्ययः॥ १२॥

अयोध्या से डेढ़ योजन दूर जाकर सरयू के दक्षिण तट पर विश्वामित्र ने मधुर वाणी में राम को सम्बोधित किया और कहा—’वत्स राम! अब सरयू के जलसे आचमन करो। इस आवश्यक कार्य में विलम्ब न हो॥

मन्त्रग्रामं गृहाण त्वं बलामतिबलां तथा।
न श्रमो न ज्वरो वा ते न रूपस्य विपर्ययः॥ १३॥

‘बला और अतिबला नाम से प्रसिद्ध इस मन्त्रसमुदाय को ग्रहण करो। इसके प्रभाव से तुम्हें कभी श्रम (थकावट) का अनुभव नहीं होगा। ज्वर (रोग या चिन्ताजनित कष्ट) नहीं होगा। तुम्हारे रूप में किसी प्रकार का विकार या उलट-फेर नहीं होने पायेगा। १३॥

न च सुप्तं प्रमत्तं वा धर्षयिष्यन्ति नैर्ऋताः।
न बाह्वोः सदृशो वीर्ये पृथिव्यामस्ति कश्चन॥ १४॥

‘सोते समय अथवा असावधानी की अवस्था में भी राक्षस तुम्हारे ऊपर आक्रमण नहीं कर सकेंगे। इस भूतल पर बाहुबल में तुम्हारी समानता करने वाला कोई न होगा॥१४॥

त्रिषु लोकेषु वा राम न भवेत् सदृशस्तव।
बलामतिबलां चैव पठतस्तात राघव॥१५॥

‘तात! रघुकुलनन्दन राम! बला और अतिबला का अभ्यास करने से तीनों लोकों में तुम्हारे समान कोई नहीं रह जायगा॥ १५॥

न सौभाग्ये न दाक्षिण्ये न ज्ञाने बुद्धिनिश्चये।
नोत्तरे प्रतिवक्तव्ये समो लोके तवानघ॥१६॥

‘अनघ! सौभाग्य, चातुर्य, ज्ञान और बुद्धिसम्बन्धी निश्चय में तथा किसी के प्रश्न का उत्तर देने में भी कोई तुम्हारी तुलना नहीं कर सकेगा॥ १६ ॥

एतद्विद्याद्वये लब्धे न भवेत् सशस्तव।
बला चातिबला चैव सर्वज्ञानस्य मातरौ॥१७॥

‘इन दोनों विद्याओं के प्राप्त हो जाने पर कोई तुम्हारी समानता नहीं कर सकेगा; क्योंकि ये बला और अतिबला नामक विद्याएँ सब प्रकार के ज्ञान की जननी हैं॥ १७

क्षुत्पिपासे न ते राम भविष्यते नरोत्तम।
बलामतिबलां चैव पठतस्तात राघव॥१८॥
गृहाण सर्वलोकस्य गुप्तये रघुनन्दन।

‘नरश्रेष्ठ श्रीराम! तात रघुनन्दन! बला और अतिबला का अभ्यास कर लेने पर तुम्हें भूख-प्यास का भी कष्ट नहीं होगा; अतः रघुकुल को आनन्दित
करने वाले राम! तुम सम्पूर्ण जगत् की रक्षा के लिये इन दोनों विद्याओं को ग्रहण करो॥ १८ १/२ ॥

विद्याद्वयमधीयाने यशश्चाथ भवेद् भुवि।
पितामहसुते ह्येते विद्ये तेजःसमन्विते॥१९॥

‘इन दोनों विद्याओं का अध्ययन कर लेनेप र इस भूतल पर तुम्हारे यश का विस्तार होगा। ये दोनों विद्याएँ ब्रह्माजी की तेजस्विनी पुत्रियाँ हैं ॥ १९॥

प्रदातुं तव काकुत्स्थ सदृशस्त्वं हि पार्थिव।
कामं बहुगुणाः सर्वे त्वय्येते नात्र संशयः॥२०॥
तपसा सम्भृते चैते बहुरूपे भविष्यतः।

‘ककुत्स्थनन्दन! मैंने इन दोनों को तुम्हें देने का विचार किया है। राजकुमार! तुम्हीं इनके योग्य पात्र हो। यद्यपि तुममें इस विद्या को प्राप्त करने योग्य बहुत-से गुण हैं अथवा सभी उत्तम गुण विद्यमान हैं, इसमें संशय नहीं है तथापि मैंने तपोबल से इनका अर्जन किया है। अतः मेरी तपस्या से परिपूर्ण होकर ये तुम्हारे लिये बहुरूपिणी होंगी—अनेक प्रकारके फल प्रदान करेंगी’ ॥ २० १/२॥

ततो रामो जलं स्पृष्ट्वा प्रहृष्टवदनः शुचिः॥२१॥
प्रतिजग्राह ते विद्ये महर्षेवितात्मनः।

तब श्रीराम आचमन करके पवित्र हो गये। उनका मुख प्रसन्नता से खिल उठा। उन्होंने उन शुद्ध अन्तःकरणवाले महर्षि से वे दोनों विद्याएँ ग्रहण की। २१ १/२॥

विद्यासमुदितो रामः शुशुभे भीमविक्रमः ॥२२॥
सहस्ररश्मिभगवान्शरदीव दिवाकरः।

विद्या से सम्पन्न होकर भयङ्कर पराक्रमी श्रीराम सहस्रों किरणों से युक्त शरत्कालीन भगवान् सूर्य के समान शोभा पाने लगे॥ २२ १/२॥

गुरुकार्याणि सर्वाणि नियुज्य कुशिकात्मजे।
ऊषुस्तां रजनीं तत्र सरय्वां ससुखं त्रयः॥२३॥

तत्पश्चात् श्रीराम ने विश्वामित्रजी की सारी गुरुजनोचित सेवाएँ करके हर्ष का अनुभव किया,फिर वे तीनों वहाँ सरयू के तट पर रात में सुखपूर्वक रहे॥ २३॥

दशरथनृपसूनुसत्तमाभ्यां तृणशयनेऽनुचिते तदोषिताभ्याम्।
कुशिकसुतवचोऽनुलालिताभ्यां सुखमिव सा विबभौ विभावरी च॥२४॥

राजा दशरथ के वे दोनों श्रेष्ठ राजकुमार उस समय वहाँ तृण की शय्यापर, जो उनके योग्य नहीं थी, सोये थे। महर्षि विश्वामित्र अपनी वाणीद्वारा उन दोनों के प्रति लाड़-प्यार प्रकट कर रहे थे, इससे उन्हें वह रात बड़ी सुखमयी-सी प्रतीत हुई।॥ २४॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे द्वाविंशः सर्गः ॥२२॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में बाईसवाँ सर्ग पूरा हुआ।२२॥

बालकाण्ड सर्ग- २१-३०

बालकाण्डम्
त्रयोविंशः सर्गः (सर्ग 23)

( विश्वामित्र सहित श्रीराम और लक्ष्मण का सरयू-गंगा संगम के समीप पुण्य आश्रम में रात को ठहरना )

प्रभातायां तु शर्वर्यां विश्वामित्रो महामुनिः।
अभ्यभाषत काकुत्स्थौ शयानौ पर्णसंस्तरे॥१॥

जब रात बीती और प्रभात हुआ, तब महामुनि विश्वामित्र ने तिनकों और पत्तों के बिछौने पर सोये हुए उन दोनों ककुत्स्थवंशी राजकुमारों से कहा- ॥१॥

कौसल्या सुप्रजा राम पूर्वा संध्या प्रवर्तते।
उत्तिष्ठ नरशार्दूल कर्तव्यं दैवमाह्निकम्॥२॥

‘नरश्रेष्ठ राम! तुम्हारे-जैसे पुत्र को पाकर महारानी कौसल्या सुपुत्रजननी कही जाती हैं। यह देखो, प्रातःकाल की संध्या का समय हो रहा है; उठो और प्रतिदिन किये जाने वाले देव सम्बन्धी कार्यों को पूर्ण करो’ ॥२॥

तस्यर्षेः परमोदारं वचः श्रुत्वा नरोत्तमौ।
स्नात्वा कृतोदकौ वीरौ जेपतुः परमं जपम्॥३॥

महर्षि का यह परम उदार वचन सुनकर उन दोनों नरश्रेष्ठ वीरों ने स्नान करके देवताओं का तर्पण किया और फिर वे परम उत्तम जपनीय मन्त्र गायत्री का जप करने लगे॥३॥

कृताह्निकौ महावीर्यो विश्वामित्रं तपोधनम्।
अभिवाद्यातिसंहृष्टौ गमनायाभितस्थतुः॥४॥

नित्य कर्म समाप्त करके महापराक्रमी श्रीराम और लक्ष्मण अत्यन्त प्रसन्न हो तपोधन विश्वामित् रको प्रणाम करके वहाँ से आगे जाने को उद्यत हो गये। ४॥

तौ प्रयान्तौ महावी? दिव्यां त्रिपथगां नदीम्।
ददृशाते ततस्तत्र सरय्वाः संगमे शुभे॥५॥

जाते-जाते उन महाबली राजकुमारों ने गंगा और सरयू के शुभ संगम पर पहुँचकर वहाँ दिव्य त्रिपथगा नदी गंगाजी का दर्शन किया॥५॥

तत्राश्रमपदं पुण्यमृषीणां भावितात्मनाम्।
बहुवर्षसहस्राणि तप्यतां परमं तपः॥६॥

संगम के पास ही शुद्ध अन्तःकरण वाले महर्षियों का एक पवित्र आश्रम था, जहाँ वे कई हजार वर्षों से तीव्र तपस्या करते थे॥६॥

तं दृष्ट्वा परमप्रीतौ राघवौ पुण्यमाश्रमम्।
ऊचतुस्तं महात्मानं विश्वामित्रमिदं वचः॥७॥

उस पवित्र आश्रम को देखकर रघुकुलरत्न श्रीराम और लक्ष्मण बड़े प्रसन्न हुए उन्होंने महात्मा विश्वामित्र से यह बात कही— ॥७॥

कस्यायमाश्रमः पुण्यः को न्वस्मिन् वसते पुमान्।
भगवञ्छ्रोतुमिच्छावः परं कौतूहलं हि नौ॥८॥

‘भगवन्! यह किसका पवित्र आश्रम है? और इसमें कौन पुरुष निवास करता है? यह हम दोनों सुनना चाहते हैं इसके लिये हमारे मन में बड़ी उत्कण्ठा है’॥ ८॥

तयोस्तद् वचनं श्रुत्वा प्रहस्य मुनिपुंगवः।
अब्रवीच्छ्रयतां राम यस्यायं पूर्व आश्रमः॥९॥

उन दोनों का यह वचन सुनकर मुनिश्रेष्ठ विश्वामित्र हँसते हुए बोले—’राम! यह आश्रम पहले जिसके अधिकार में रहा है, उसका परिचय देता हूँ, सुनो। ९॥

कन्दर्पो मूर्तिमानासीत् काम इत्युच्यते बुधैः ।
तपस्यन्तमिह स्थाणुं नियमेन समाहितम्॥१०॥

‘विद्वान् पुरुष जिसे काम कहते हैं, वह कन्दर्प पूर्वकाल में मूर्तिमान् था—शरीर धारण करके विचरता था। उन दिनों भगवान् स्थाणु (शिव) इसी आश्रम में चित्तको एकाग्र करके नियमपूर्वक तपस्या करते थे। १०॥

कृतोद्धाहं तु देवेशं गच्छन्तं समरुद्गणम्।
धर्षयामास दुर्मेधा हुंकृतश्च महात्मना ॥११॥

‘एक दिन समाधि से उठकर देवेश्वर शिव मरुद्गणों के साथ कहीं जा रहे थे। उसी समय दुर्बुद्धि काम ने उन पर आक्रमण किया। यह देख महात्मा शिव ने हुङ्कार करके उसे रोका॥ ११॥

अवध्यातश्च रुद्रेण चक्षुषा रघुनन्दन।
व्यशीर्यन्त शरीरात् स्वात् सर्वगात्राणि दुर्मते॥ १२॥

‘रघुनन्दन! भगवान् रुद्र ने रोष भरी दृष् टिसे अवहेलना-पूर्वक उसकी ओर देखा; फिर तो उस दुर्बुद्धि के सारे अंग उसके शरीर से जीर्ण-शीर्ण होकर गिर गये॥ १२॥

तत्र गात्रं हतं तस्य निर्दग्धस्य महात्मनः।
अशरीरः कृतः कामः क्रोधाद् देवेश्वरेण ह॥ १३॥

‘वहाँ दग्ध हुए महामना कन्दर्पका शरीर नष्ट हो गया,देवेश्वर रुद्र ने अपने क्रोध से कामको अंगहीन कर दिया॥ १३॥

अनंग इति विख्यातस्तदाप्रभृति राघव।
स चांगविषयः श्रीमान् यत्रांगं स मुमोच ह॥ १४॥

‘राम! तभीसे वह ‘अनंग’ नाम से विख्यात हुआ शोभाशाली कन्दर्प ने जहाँ अपना अंग छोड़ा था, वह प्रदेश अंगदेश के नाम से विख्यात हुआ॥ १४ ॥

तस्यायमाश्रमः पुण्यस्तस्येमे मुनयः पुरा।
शिष्या धर्मपरा वीर तेषां पापं न विद्यते॥१५॥

‘यह उन्हीं महादेवजी का पुण्य आश्रम है। वीर! ये मुनि लोग पूर्वकाल में उन्हीं स्थाणु के धर्मपरायण शिष्य थे,इनका सारा पाप नष्ट हो गया है॥ १५ ॥

इहाद्य रजनीं राम वसेम शुभदर्शन।
पुण्ययोः सरितोर्मध्ये श्वस्तरिष्यामहे वयम्॥ १६॥

‘शुभदर्शन राम! आज की रात में हम लोग यहीं इन पुण्यसलिला सरिताओं के बीच में निवास करें। कल सबेरे इन्हें पार करेंगे॥१६॥

अभिगच्छामहे सर्वे शुचयः पुण्यमाश्रमम्।
 इह वासः परोऽस्माकं सुखं वत्स्यामहे निशाम्॥ १७॥
स्नाताश्च कृतजप्याश्च हुतहव्या नरोत्तम।

‘हम सब लोग पवित्र होकर इस पुण्य आश्रम में चलें। यहाँ रहना हमारे लिये बहुत उत्तम होगा। नरश्रेष्ठ! यहाँ स्नान करके जप और हवन करने के बाद हम रात में बड़े सुख से रहेंगे’ ॥ १७ १/२ ॥

 तेषां संवदतां तत्र तपोदीर्घेण चक्षुषा॥१८॥
विज्ञाय परमप्रीता मुनयो हर्षमागमन्।

वे लोग वहाँ इस प्रकार आपस में बातचीत कर ही रहे थे कि उस आश्रम में निवास करने वाले मुनि तपस्या द्वारा प्राप्त हुई दूर दृष्टि से उनका आगमन जानकर मन-ही-मन बड़े प्रसन्न हुए, उनके हृदयमें हर्षजनित उल्लास छा गया॥ १८ १/२ ॥

अर्घ्यं पाद्यं तथाऽऽतिथ्यं निवेद्य कुशिकात्मजे॥ १९॥
 रामलक्ष्मणयोः पश्चादकुर्वन्नतिथिक्रियाम्।

उन्होंने विश्वामित्रजी को अर्घ्य, पाद्य और अतिथि सत्कार की सामग्री अर्पित करने के बाद श्रीराम और लक्ष्मण का भी आतिथ्य किया॥ १९ १/२॥

सत्कारं समनुप्राप्य कथाभिरभिरञ्जयन्॥२०॥
यथार्हमजपन् संध्यामृषयस्ते समाहिताः।

यथोचित सत्कार करके उन मुनियों ने इन अतिथियों का भाँति-भाँति की कथा-वार्ताओं द्वारा मनोरञ्जन किया, फिर उन महर्षियों ने एकाग्रचित्त होकर यथावत् संध्यावन्दन एवं जप किया॥ २० १/२॥

 तत्र वासिभिरानीता मुनिभिः सुव्रतैः सह ॥२१॥
न्यवसन् सुसुखं तत्र कामाश्रमपदे तथा।।

तदनन्तर वहाँ रहने वाले मुनियों ने अन्य उत्तम व्रतधारी मुनियों के साथ विश्वामित्र आदि को शयन के लिये उपयुक्त स्थान में पहुँचा दिया। सम्पूर्ण कामनाओं की पूर्ति करने वाले उस पुण्य आश्रम में विश्वामित्र आदि ने बड़े सुख से निवास किया॥ २१ १/२॥

कथाभिरभिरामाभिरभिरामौ नृपात्मजौ।
रमयामास धर्मात्मा कौशिको मुनिपुंगवः॥२२॥

 धर्मात्मा मुनिश्रेष्ठ विश्वामित्र ने उन मनोहर राजकुमारों का सुन्दर कथाओं द्वारा मनोरञ्जन किया॥ २२।।

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे त्रयोविंशः सर्गः॥२३॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें तेईसवाँ सर्ग पूरा हुआ।२३॥

बालकाण्ड सर्ग- २१-३०

बालकाण्डम्
चतुर्विंशः सर्गः (सर्ग 24)

( श्रीराम और लक्ष्मण का गंगापार होते समय तुमुलध्वनि के विषय में प्रश्न, मलद, करूष एवं ताटका वन का परिचय,ताटका वध की आज्ञा )

ततः प्रभाते विमले कृताह्निकमरिन्दमौ।
विश्वामित्रं पुरस्कृत्य नद्यास्तीरमुपागतौ॥१॥

तदनन्तर निर्मल प्रभात काल में नित्यकर्म से निवृत्त हुए विश्वामित्रजी को आगे करके शत्रुदमन वीर श्रीराम और लक्ष्मण गंगा नदी के तट पर आये॥१॥

ते च सर्वे महात्मानो मुनयः संशितव्रताः।
 उपस्थाप्य शुभां नावं विश्वामित्रमथाब्रवन्॥२॥

उस समय उत्तम व्रत का पालन करने वाले उन पुण्याश्रम निवासी महात्मा मुनियों ने एक सुन्दर नाव मँगवाकर विश्वामित्रजी से कहा- ॥२॥

आरोहतु भवान् नावं राजपुत्रपुरस्कृतः।
अरिंष्ट गच्छ पन्थानं मा भूत् कालस्य पर्ययः॥ ३॥

‘महर्षे! आप इन राजकुमारों को आगे करके इस नाव पर बैठ जाइये और मार्ग को निर्विघ्नतापूर्वक तय कीजिये, जिससे विलम्ब न हो’ ॥३॥

विश्वामित्रस्तथेत्युक्त्वा तानृषीन् प्रतिपूज्य च।
ततार सहितस्ताभ्यां सरितं सागरंगमाम्॥४॥

विश्वामित्रजी ने ‘बहुत अच्छा’ कहकर उन महर्षियों की सराहना की और वे श्रीराम तथा लक्ष्मण के साथ समुद्रगामिनी गंगा नदी को पार करने लगे॥ ४॥

तत्र शुश्राव वै शब्दं तोयसंरम्भवर्धितम्।
मध्यमागम्य तोयस्य तस्य शब्दस्य निश्चयम्॥
ज्ञातुकामो महातेजाः सह रामः कनीयसा।

गंगा की बीच धारा में आने पर छोटे भाई सहित महातेजस्वी श्रीराम को दो जलों के टकराने की बड़ी भारी आवाज सुनायी देने लगी। ‘यह कैसी आवाज है? क्यों तथा कहाँ से आ रही है?’ इस बात को निश्चित रूप से जानने की इच्छा उनके भीतर जाग उठी॥ ५ १/२॥

अथ रामः सरिन्मध्ये पप्रच्छ मुनिपुंगवम्॥६॥
वारिणो भिद्यमानस्य किमयं तमलो ध्वनिः।

तब श्रीराम ने नदी के मध्य भाग में मुनिवर विश्वामित्र से पूछा—’जल के परस्पर मिलने से यहाँ ऐसी तुमुलध्वनि क्यों हो रही है ?’॥ ६ १/२॥

राघवस्य वचः श्रुत्वा कौतूहलसमन्वितम्॥७॥
कथयामास धर्मात्मा तस्य शब्दस्य निश्चयम्।

श्रीरामचन्द्रजी के वचन में इस रहस्य को जानने की उत्कण्ठा भरी हुई थी। उसे सुनकर धर्मात्मा विश्वामित्र ने उस महान् शब्द (तुमुलध्वनि) का सुनिश्चित कारण बताते हुए कहा- ॥ ७ १/२॥

 कैलासपर्वते राम मनसा निर्मितं परम्॥८॥
ब्रह्मणा नरशार्दूल तेनेदं मानसं सरः।

‘नरश्रेष्ठ राम! कैलास पर्वत पर एक सुन्दर सरोवर है। उसे ब्रह्माजी ने अपने मानसिक संकल्प से प्रकट किया था। मन के द्वारा प्रकट होने से ही वह उत्तम सरोवर ‘मानस’ कहलाता है॥ ८ १/२॥

तस्मात् सुस्राव सरसः सायोध्यामुपगूहते॥९॥
 सरःप्रवृत्ता सरयूः पुण्या ब्रह्मसरश्च्युता।

‘उस सरोवर से एक नदी निकली है, जो अयोध्यापुरी से सटकर बहती है। ब्रह्मसर से निकलने के कारण वह पवित्र नदी सरयू के नाम से विख्यात है॥ ९ १/२॥

तस्यायमतुलः शब्दो जाह्नवीमभिवर्तते॥१०॥
वारिसंक्षोभजो राम प्रणामं नियतः कुरु।

“उसी का जल गंगा जी में मिल रहा है। दो नदियों के जलों के संघर्ष से ही यह भारी आवाज हो रही है; जिसकी कहीं तुलना नहीं है। राम! तुम अपने मन को संयम में रखकर इस संगम के जलको प्रणाम करो’ ॥ १० १/२॥

ताभ्यां तु तावुभौ कृत्वा प्रणाममतिधार्मिकौ॥
तीरं दक्षिणमासाद्य जग्मतुर्लघुविक्रमौ।

यह सुनकर उन दोनों अत्यन्त धर्मात्मा भाइयों ने उन दोनों नदियों को प्रणाम किया और गंगा के दक्षिण किनारे पर उतरकर वे दोनों बन्धु जल्दी-जल्दी पैर बढ़ाते हुए चलने लगे॥ ११ १/२॥

 स वनं घोरसंकाशं दृष्ट्वा नरवरात्मजः॥१२॥
अविप्रहतमैक्ष्वाकः पप्रच्छ मुनिपुंगवम्।

उस समय इक्ष्वाकुनन्दन राजकुमार श्रीराम ने अपने सामने एक भयङ्कर वन देखा, जिसमें मनुष्यों के आने-जाने का कोई चिह्न नहीं था। उसे देखकर उन्होंने मुनिवर विश्वामित्र से पूछा- ॥ १२ १/२॥

अहो वनमिदं दुर्गं झिल्लिकागणसंयुतम्॥१३॥
भैरवैः श्वापदैः कीर्णं शकन्तैर्दारुणारवैः।
नानाप्रकारैः शकुनैर्वाश्यद्भिभैरवस्वनैः॥१४॥

‘गुरुदेव! यह वन तो बड़ा ही अद्भुत एवं दुर्गम है। यहाँ चारों ओर झिल्लियों की झनकार सुनायी देती है। भयानक हिंसक जन्तु भरे हुए हैं। भयङ्कर बोली बोलनेवाले पक्षी सब ओर फैले हुए हैं। नाना प्रकारके विहंगम भीषण स्व रमें चहचहा रहे हैं। १३-१४॥

सिंहव्याघ्रवराहैश्च वारणैश्चापि शोभितम्।
धवाश्वकर्णककुभैर्बिल्वतिन्दुकपाटलैः॥१५॥
संकीर्णं बदरीभिश्च किं न्विदं दारुणं वनम्।

‘सिंह, व्याघ्र, सूअर और हाथी भी इस जंगलकी शोभा बढ़ा रहे हैं। धव (धौरा), अश्वकर्ण (एक प्रकारके शालवृक्ष), ककुभ (अर्जुन), बेल, तिन्दुक (तेन्दू), पाटल (पाड़र) तथा बेरके वृक्षों से भरा हुआ यह भयङ्कर वन क्या है?—इसका क्या नाम है?’ ॥ १५ १/२॥

तमुवाच महातेजा विश्वामित्रो महामुनिः॥१६॥
श्रूयतां वत्स काकुत्स्थ यस्यैतद् दारुणं वनम्।

तब महातेजस्वी महामुनि विश्वामित्र ने उनसे कहा —’वत्स! ककुत्स्थनन्दन! यह भयङ्कर वन जिसके अधिकार में रहा है, उसका परिचय सुनो। १६ १/२ ॥

एतौ जनपदौ स्फीतौ पूर्वमास्तां नरोत्तम॥१७॥
मलदाश्च करूषाश्च देवनिर्माणनिर्मितौ।

‘नरश्रेष्ठ ! पूर्वकाल में यहाँ दो समृद्धिशाली जनपद थे—मलद और करूष। ये दोनों देश देवताओं के प्रयत्न से निर्मित हुए थे॥ १७ १/२॥

पुरा वृत्रवधे राम मलेन समभिप्लुतम्॥१८॥
क्षुधा चैव सहस्राक्षं ब्रह्महत्या समाविशत्।

‘राम! पहले की बात है, वृत्रासुर का वध करने के पश्चात् देवराज इन्द्र मल से लिप्त हो गये,क्षुधाने भी उन्हें धर दबाया और उनके भीतर ब्रह्म हत्या प्रविष्ट हो गयी॥

तमिन्द्रं मलिनं देवा ऋषयश्च तपोधनाः॥१९॥
कलशैः स्नापयामासुर्मलं चास्य प्रमोचयन्।

‘तब देवताओं तथा तपोधन ऋषियों ने मलिन इन्द्र को यहाँ गंगाजल से भरे हुए कलशों द्वारा नहलाया तथा उनके मल (और कारूष—क्षुधा) को छुड़ा दिया॥

इह भूम्यां मलं दत्त्वा देवाः कारूषमेव च॥२०॥
शरीर महेन्द्रस्य ततो हर्षं प्रपेदिरे।

इस भूभाग में देवराज इन्द्र के शरीर से उत्पन्न हुए मल और कारूष को देकर देवता लोग बड़े प्रसन्न हुए॥

निर्मलो निष्करूषश्च शुद्ध इन्द्रो यथाभवत्॥ २१॥
ततो देशस्य सुप्रीतो वरं प्रादादनुत्तमम्।
इमौ जनपदौ स्फीतौ ख्यातिं लोके गमिष्यतः॥ २२॥
मलदाश्च करूषाश्च ममांगमलधारिणौ।

‘इन्द्र पूर्ववत् निर्मल, निष्करूष (क्षुधाहीन) एवं शुद्ध हो गये। तब उन्होंने प्रसन्न होकर इस देशको यह उत्तम वर प्रदान किया—’ये दो जनपद लोक में मलद और करूष नाम से विख्यात होंगे। मेरे अंगजनित मल को धारण करने वाले ये दोनों देश बड़े समृद्धिशाली होंगे’।

साधु साध्विति तं देवाः पाकशासनमब्रुवन्॥ २३॥
देशस्य पूजां तां दृष्ट्वा कृतां शक्रेण धीमता।

‘बुद्धिमान् इन्द्र के द्वारा की गयी उस देश की वह पूजा देखकर देवताओं ने पाकशासन को बारम्बार साधुवाद दिया॥ २३ १/२॥

एतौ जनपदौ स्फीतौ दीर्घकालमरिंदम ॥२४॥
मलदाश्च करूषाश्च मुदिता धनधान्यतः।

‘शत्रुदमन! मलद और करूष—ये दोनों जनपद दीर्घकाल तक समृद्धिशाली, धन-धान्यसे सम्पन्न तथा सुखी रहे हैं॥ २४ १/२॥

कस्यचित्त्वथ कालस्य यक्षिणी कामरूपिणी॥ २५॥
 बलं नागसहस्रस्य धारयन्ती तदा ह्यभूत्।

‘कुछ काल के अनन्तर यहाँ इच्छानुसार रूप धारण करनेवाली एक यक्षिणी आयी, जो अपने शरीर में एक हजार हाथियों का बल धारण करती है॥ २५ १/२॥

ताटका नाम भद्रं ते भार्या सुन्दस्य धीमतः॥ २६॥
मारीचो राक्षसः पुत्रो यस्याः शक्रपराक्रमः।
वृत्तबाहुर्महाशीर्षो विपुलास्यतनुर्महान्॥ २७॥

“उसका नाम ताटका है। वह बुद्धिमान् सुन्द नामक दैत्य की पत्नी है,तुम्हारा कल्याण हो। मारीच नामक राक्षस, जो इन्द्र के समान पराक्रमी है, उस ताटका का ही पुत्र है। उसकी भुजाएँ गोल, मस्तक बहुत बड़ा, मुँह फैला हुआ और शरीर विशाल है॥ २६-२७॥

राक्षसो भैरवाकारो नित्यं त्रासयते प्रजाः।
 इमौ जनपदौ नित्यं विनाशयति राघव॥२८॥
मलदांश्च करूषांश्च ताटका दुष्टचारिणी।

‘वह भयानक आकार वाला राक्षस यहाँ की प्रजा को सदा ही त्रास पहुँचाता रहता है। रघुनन्दन! वह दुराचारिणी ताटका भी सदा मलद और करूष—इन दोनों जनपदों का विनाश करती रहती है॥ २८१/२॥

सेयं पन्थानमावृत्य वसत्यत्यर्धयोजने॥२९॥
अत एव च गन्तव्यं ताटकाया वनं यतः।
 स्वबाहुबलमाश्रित्य जहीमां दुष्टचारिणीम्॥३०॥

‘वह यक्षिणी डेढ़ योजन (छः कोस) तक के मार्ग को घेरकर इस वन में रहती है; अतः हमलोगों को जिस ओर ताटका-वन है, उधर ही चलना चाहिये। तुम अपने बाहुबल का सहारा लेकर इस दुराचारिणी को मार डालो॥ २९-३०॥

मन्नियोगादिमं देशं कुरु निष्कण्टकं पुनः।
नहि कश्चिदिमं देशं शक्तो ह्यागन्तुमीदृशम्॥ ३१॥

‘मेरी आज्ञा से इस देश को पुनः निष्कण्टक बना दो। यह देश ऐसा रमणीय है तो भी इस समय कोई यहाँ आ नहीं सकता है॥ ३१॥

यक्षिण्या घोरया राम उत्सादितमसह्यया।
एतत्ते सर्वमाख्यातं यथैतद् दारुणं वनम्।
 यक्ष्या चोत्सादितं सर्वमद्यापि न निवर्तते॥ ३२॥

‘राम! उस असह्य एवं भयानक यक्षिणी ने इस देशको उजाड़ कर डाला है। यह वन ऐसा भयङ्कर क्यों है, यह सारा रहस्य मैंने तुम्हें बता दिया। उस यक्षिणी ने ही इस सारे देश को उजाड़ दिया है और वह आज भी अपने उस क्रूर कर्म से निवृत्त नहीं हुई है’॥ ३२॥

 इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे चतुर्विंशः सर्गः॥२४॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें चौबीसवाँ सर्ग पूरा हुआ। २४॥

बालकाण्ड सर्ग- २१-३०

बालकाण्डम्
पञ्चविंशः सर्गः (सर्ग 25 )

( श्रीराम के पूछने पर विश्वामित्रजी का ताटका की उत्पत्ति, विवाह एवं शाप आदि का प्रसंग सुनाकर उन्हें ताटका-वध के लिये प्रेरित करना )

अथ तस्याप्रमेयस्य मुनेर्वचनमुत्तमम्।
श्रुत्वा पुरुषशार्दूलः प्रत्युवाच शुभां गिरम्॥१॥

अपरिमित प्रभावशाली विश्वामित्र मुनि का यह उत्तम वचन सुनकर पुरुषसिंह श्रीराम ने यह शुभ बात कही-॥१॥

अल्पवीर्या यदा यक्षी श्रूयते मुनिपुंगव।
कथं नागसहस्रस्य धारयत्यबला बलम्॥२॥

‘मुनिश्रेष्ठ! जब वह यक्षिणी एक अबला सुनी जाती है, तब तो उसकी शक्ति थोड़ी ही होनी चाहिये; फिर वह एक हजार हाथियों का बल कैसे धारण करती है ?’ ॥२॥

इत्युक्तं वचनं श्रुत्वा राघवस्यामितौजसः।
हर्षयन् श्लक्ष्णया वाचा सलक्ष्मणमरिंदमम्॥३॥
विश्वामित्रोऽब्रवीद् वाक्यं शृणु येन बलोत्कटा।
वरदानकृतं वीर्यं धारयत्यबला बलम्॥४॥

अमित तेजस्वी श्रीरघुनाथ के कहे हुए इस वचन को सुनकर विश्वामित्र जी अपनी मधुर वाणीद् वारा लक्ष्मण सहित शत्रुदमन श्रीराम को हर्ष प्रदान करते हुए बोले—’रघुनन्दन! जिस कारण से ताटका अधिक बलशालिनी हो गयी है, वह बताता हूँ, सुनो। उसमें वरदानजनित बल का उदय हुआ है; अतः वह अबला होकर भी बल धारण करती है (सबला हो गयी है)। ३-४॥

पूर्वमासीन्महायक्षः सुकेतुर्नाम वीर्यवान्।
 अनपत्यः शुभाचारः स च तेपे महत्तपः॥५॥

‘पूर्व काल की बात है, सुकेतु नाम से प्रसिद्ध एक महान् यक्ष थे। वे बड़े पराक्रमी और सदाचारी थे परंतु उन्हें कोई संतान नहीं थी; इसलिये उन्होंने बड़ी भारी तपस्या की॥ ५॥

पितामहस्तु सुप्रीतस्तस्य यक्षपतेस्तदा।
कन्यारत्नं ददौ राम ताटकां नाम नामतः॥६॥

‘श्रीराम! यक्षराज सुकेतु की उस तपस्या से ब्रह्माजी को बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने सुकेतु को एक कन्यारत्न प्रदान किया, जिसका नाम ताटका था।

ददौ नागसहस्रस्य बलं चास्याः पितामहः।
 न त्वेव पुत्रं यक्षाय ददौ चासौ महायशाः॥७॥

ब्रह्माजी ने ही उस कन्या को एक हजार हाथियों के समान बल दे दिया; परंतु उन महायशस्वी पितामह ने उस यक्ष को पुत्र नहीं ही दिया (उसके संकल्प के अनुसार पुत्र प्राप्त हो जाने पर उसके द्वारा जनता का अत्यधिक उत्पीड़न होता, यही सोचकर ब्रह्माजी ने पुत्र नहीं दिया) ॥ ७॥

तां तु बालां विवर्धन्तीं रूपयौवनशालिनीम्।
जम्भपुत्राय सुन्दाय ददौ भार्यां यशस्विनीम्॥ ८॥

‘धीरे-धीरे वह यक्ष-बालिका बढ़ने लगी और बढ़कर रूप-यौवन से सुशोभित होने लगी। उस अवस्था में सुकेतु ने अपनी उस यशस्विनी कन्या को जम्भपुत्र सुन्द के हाथ में उसकी पत्नी के रूप में दे दिया॥ ८॥

कस्यचित्त्वथ कालस्य यक्षी पुत्रं व्यजायत।
मारीचं नाम दुर्धर्षं यः शापाद् राक्षसोऽभवत्॥ ९॥

‘कुछ काल के बाद उस यक्षी ताटका ने मारीच नाम से प्रसिद्ध एक दुर्जय पुत्र को जन्म दिया, जो अगस्त्य मुनि के शाप से राक्षस हो गया॥९॥

सुन्दे तु निहते राम अगस्त्यमृषिसत्तमम्।
 ताटका सहपुत्रेण प्रधर्षयितुमिच्छति॥१०॥

‘श्रीराम! अगस्त्य ने ही शाप देकर ताटका पति सुन्द को भी मार डाला। उसके मारे जाने पर ताटका पुत्र सहित जाकर मुनिवर अगस्त्य को भी मौत के घाट उतार देने की इच्छा करने लगी॥१०॥

भक्षार्थं जातसंरम्भा गर्जन्ती साभ्यधावत।
आपतन्तीं तु तां दृष्ट्वा अगस्त्यो भगवानृषिः॥ ११॥
 राक्षसत्वं भजस्वेति मारीचं व्याजहार सः।

‘वह कुपित हो मुनि को खा जानेके लिये गर्जना करती हुई दौड़ी। उसे आती देख भगवान् अगस्त्य मुनि ने मारीच से कहा—’तू देवयोनि-रूप का परित्याग करके राक्षस भाव को प्राप्त हो जा’॥ ११ १/२॥

अगस्त्यः परमामर्षस्ताटकामपि शप्तवान्॥१२॥
 पुरुषादी महायक्षी विकृता विकृतानना।
इदं रूपं विहायाशु दारुणं रूपमस्तु ते॥१३॥

‘फिर अत्यन्त अमर्ष में भरे हुए ऋषि ने ताटका को भी शाप दे दिया—’तू विकराल मुखवाली नरभक्षिणी राक्षसी हो जा। तू है तो महायक्षी; परंतु अब शीघ्र ही इस रूप को त्याग कर तेरा भयङ्कर रूप हो जाय’। १२-१३॥

सैषा शापकृतामर्षा ताटका क्रोधमर्च्छिता।
देशमुत्सादयत्येनमगस्त्याचरितं शुभम्॥१४॥

‘इस प्रकार शाप मिलने के कारण ताटका का अमर्ष और भी बढ़ गया। वह क्रोध से मूर्च्छित हो उठी और उन दिनों अगस्त्य जी जहाँ रहते थे, उस सुन्दर देश को उजाड़ने लगी॥१४॥

एनां राघव दुर्वृत्तां यक्षीं परमदारुणाम्।
गोब्राह्मणहितार्थाय जहि दुष्टपराक्रमाम्॥१५॥

‘रघुनन्दन! तुम गौओं और ब्राह्मणों का हित करनेके लिये दुष्ट पराक्रम वाली इस परम भयङ्कर दुराचारिणी यक्षी का वध कर डालो॥ १५ ॥

नह्येनां शापसंसृष्टां कश्चिदुत्सहते पुमान्।
 निहन्तुं त्रिषु लोकेषु त्वामृते रघुनन्दन॥१६॥

‘रघुकुल को आनन्दित करनेवाले वीर! इस शापग्रस्त ताटका को मारने के लिये तीनों लोकों में तुम्हारे सिवा दूसरा कोई पुरुष समर्थ नहीं है॥ १६॥

नहि ते स्त्रीवधकृते घृणा कार्या नरोत्तम।
 चातुर्वर्ण्यहितार्थं हि कर्तव्यं राजसूनुना॥ १७॥

‘नरश्रेष्ठ! तुम स्त्री-हत्या का विचार करके इसके प्रति दया न दिखाना। एक राजपुत्र को चारों वर्गों के हितके लिये स्त्रीहत्या भी करनी पड़े तो उससे मुँह नहीं मोड़ना चाहिये॥ १७॥

नृशंसमनृशंसं वा प्रजारक्षणकारणात्।
पातकं वा सदोषं वा कर्तव्यं रक्षता सदा॥१८॥

‘प्रजापालक नरेश को प्रजाजनों की रक्षाके लिये क्रूरतापूर्ण या क्रूरतारहित, पातकयुक्त अथवा सदोष कर्म भी करना पड़े तो कर लेना चाहिये। यह बात उसे सदा ही ध्यान में रखनी चाहिये॥१८॥

राज्यभारनियुक्तानामेष धर्मः सनातनः।
अध` जहि काकुत्स्थ धर्मो ह्यस्यां न विद्यते॥ १९॥

‘जिनके ऊपर राज्य के पालनका भार है, उनका तो यह सनातन धर्म है। ककुत्स्थकुलनन्दन! ताटका महापापिनी है। उसमें धर्म का लेशमात्र भी नहीं है; अतः उसे मार डालो॥ १९॥

श्रूयते हि पुरा शक्रो विरोचनसुतां नृप।
 पृथिवीं हन्तुमिच्छन्ती मन्थरामभ्यसूदयत्॥ २०॥

‘नरेश्वर! सुना जाता है कि पूर्वकाल में विरोचन की पुत्री मन्थरा सारी पृथ्वी का नाश कर डालना चाहती थी। उसके इस विचार को जानकर इन्द्र ने उसका वध कर डाला ॥ २०॥

विष्णुना च पुरा राम भृगुपत्नी पतिव्रता।
 अनिन्द्रं लोकमिच्छन्ती काव्यमाता निषूदिता॥ २१॥

‘श्रीराम! प्राचीन काल में शुक्राचार्य की माता तथा भृगुकी पतिव्रता पत्नी त्रिभुवन को इन्द्र से शून्य कर देना चाहती थीं। यह जानकर भगवान् विष्णु ने उनको मार डाला॥

एतैश्चान्यैश्च बहुभी राजपुत्रैर्महात्मभिः।
अधर्मसहिता नार्यो हताः पुरुषसत्तमैः।
तस्मादेनां घृणां त्यक्त्वा जहि मच्छासनान्नृप। २२॥

‘इन्होंने तथा अन्य बहुत-से महामनस्वी पुरुषप्रवर राजकुमारों ने पापचारिणी स्त्रियों का वध किया है। नरेश्वर! अतः तुम भी मेरी आज्ञा से दया अथवा घृणा को त्यागकर इस राक्षसी को मार डालो’ ॥ २२ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे पञ्चविंशः सर्गः ॥२५॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में पचीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥२५॥

बालकाण्ड सर्ग- २१-३०

बालकाण्डम्
षड्विंशः सर्गः(सर्ग 26 )

( श्रीराम द्वारा ताटका का वध )

मुनेर्वचनमक्लीबं श्रुत्वा नरवरात्मजः।
राघवः प्राञ्जलिभूत्वा प्रत्युवाच दृढव्रतः॥१॥

मुनि के ये उत्साह भरे वचन सुनकर दृढ़तापूर्वक उत्तम व्रत का पालन करने वाले राजकुमार श्रीराम ने हाथ जोड़कर उत्तर दिया- ॥१॥

पितुर्वचननिर्देशात् पितुर्वचनगौरवात्।
वचनं कौशिकस्येति कर्तव्यमविशङ्कया॥२॥
अनुशिष्टोऽस्म्ययोध्यायां गुरुमध्ये महात्मना।
पित्रा दशरथेनाहं नावज्ञेयं हि तद्वचः॥३॥

‘भगवन्! अयोध्या में मेरे पिता महामना महाराजदशरथ ने अन्य गुरुजनों के बीच मुझे यह उपदेश दिया था कि ‘बेटा! तुम पिता के कहने से पिता के वचनों का गौरव रखने के लिये कुशिकनन्दन विश्वामित्र की आज्ञा का निःशङ्क होकर पालन करना कभी भी उनकी बात की अवहेलना न करना’।

सोऽहं पितुर्वचः श्रुत्वा शासनाद् ब्रह्मवादिनः।
करिष्यामि न संदेहस्ताटकावधमुत्तमम्॥४॥

‘अतः मैं पिताजी के उस उपदेश को सुनकर आप ब्रह्मवादी महात्मा की आज्ञा से ताटका वध सम्बन्धी कार्य को उत्तम मानकर करूँगा—इसमें संदेह नहीं है॥ ४॥

गोब्राह्मणहितार्थाय देशस्य च हिताय च।
तव चैवाप्रमेयस्य वचनं कर्तुमुद्यतः॥५॥

‘गौ, ब्राह्मण तथा समूचे देश का हित करने के लिये मैं आप-जैसे अनुपम प्रभावशाली महात्मा के आदेश का पालन करने को सब प्रकार से तैयार हूँ’।

एवमुक्त्वा धनुर्मध्ये बद्ध्वा मुष्टिमरिंदमः।
ज्याघोषमकरोत् तीव्र दिशः शब्देन नादयन्॥ ६॥

ऐसा कहकर शत्रुदमन श्रीराम ने धनुष के मध्यभाग में मुट्ठी बाँधकर उसे जोर से पकड़ा और उसकी प्रत्यञ्चा पर तीव्र टङ्कार दी। उसकी आवाज से सम्पूर्ण दिशाएँ गूंज उठीं॥६॥

तेन शब्देन वित्रस्तास्ताटकावनवासिनः।
ताटका च सुसंक्रुद्धा तेन शब्देन मोहिता॥७॥

उस शब्द से ताटका वन में रहने वाले समस्त प्राणी थर्रा उठे। ताटका भी उस टङ्कार-घोष से पहले तो किंकर्तव्यविमूढ़ हो उठी; परंतु फिर कुछ सोचकर अत्यन्त क्रोध में भर गयी॥७॥

तं शब्दमभिनिध्याय राक्षसी क्रोधमूर्च्छिता।
श्रुत्वा चाभ्यद्रवत् क्रुद्धा यत्र शब्दो विनिःसृतः॥ ८॥

उस शब्दको सुनकर वह राक्षसी क्रोध से अचेत-सी हो गयी थी। उसे सुनते ही वह जहाँ से आवाज आयी थी, उसी दिशाकी ओर रोषपूर्वक दौड़ी॥८॥

तां दृष्ट्वा राघवः क्रुद्धां विकृतां विकृताननाम्।
प्रमाणेनातिवृद्धां च लक्ष्मणं सोऽभ्यभाषत॥९॥

उसके शरीर की ऊँचाई बहुत अधिक थी। उसकी मुखाकृति विकृत दिखायी देती थी। क्रोध में भरी हुई उस विकराल राक्षसी की ओर दृष्टिपात करके श्रीराम ने लक्ष्मण से कहा— ॥९॥

पश्य लक्ष्मण यक्षिण्या भैरवं दारुणं वपुः।
भिद्येरन् दर्शनादस्या भीरूणां हृदयानि च॥ १०॥

‘लक्ष्मण! देखो तो सही, इस यक्षिणी का शरीर कैसा दारुण एवं भयङ्कर है! इसके दर्शन मात्र से भीरु पुरुषों के हृदय विदीर्ण हो सकते हैं ॥ १० ॥

एतां पश्य दुराधर्षां मायाबलसमन्विताम्।
विनिवृत्तां करोम्यद्य हृतकर्णाग्रनासिकाम्॥११॥

‘मायाबलसे सम्पन्न होने के कारण यह अत्यन्त दुर्जय हो रही है। देखो, मैं अभी इसके कान और नाक काटकर इसे पीछे लौटने को विवश किये देता हूँ॥ ११॥

न ह्येनामुत्सहे हन्तुं स्त्रीस्वभावेन रक्षिताम्।
वीर्यं चास्या गतिं चैव हन्यामिति हि मे मतिः॥ १२॥

‘यह अपने स्त्री स्वभाव के कारण रक्षित है; अतः मुझे इसे मारने में उत्साह नहीं है। मेरा विचार यह है कि मैं इसके बल-पराक्रम तथा गमन शक्ति को नष्ट कर दूँ (अर्थात् इसके हाथ-पैर काट डालूँ) ‘ ॥ १२॥

एवं ब्रुवाणे रामे तु ताटका क्रोधमूर्च्छिता।
उद्यम्य बाहं गर्जन्ती राममेवाभ्यधावत॥१३॥

श्रीराम इस प्रकार कह ही रहे थे कि क्रोध से अचेत हुई ताटका वहाँ आ पहुँची और एक बाँह उठाकर गर्जना करती हुई उन्हीं की ओर झपटी॥ १३॥

विश्वामित्रस्तु ब्रह्मर्षिहुँकारेणाभिभत्र्य ताम्।
स्वस्ति राघवयोरस्तु जयं चैवाभ्यभाषत ॥१४॥

यह देख ब्रह्मर्षि विश्वामित्र ने अपने हुंकार के द्वारा उसे डाँटकर कहा–’रघुकुल के इन दोनों राजकुमारों का कल्याण हो इनकी विजय हो’ ॥ १४ ॥

उद्धन्वाना रजो घोरं ताटका राघवावुभौ।
रजोमेघेन महता मुहूर्तं सा व्यमोहयत्॥१५॥

तब ताटका ने उन दोनों रघुवंशी वीरों पर भयङ्कर धूल उड़ाना आरम्भ किया। वहाँ धूल का विशाल बादल-सा छा गया। उसके द्वारा उसने श्रीराम और लक्ष्मण को दो घड़ी तक मोह में डाल दिया॥ १५ ॥

ततो मायां समास्थाय शिलावर्षेण राघवौ।
अवाकिरत् सुमहता ततश्चुक्रोध राघवः॥१६॥

तत्पश्चात् माया का आश्रय लेकर वह उन दोनों भाइयों पर पत्थरों की बड़ी भारी वर्षा करने लगी। यह देख रघुनाथ जी उसपर कुपित हो उठे॥ १६॥

शिलावर्षं महत् तस्याः शरवर्षेण राघवः।
प्रतिवार्योपधावन्त्याः करौ चिच्छेद पत्रिभिः॥ १७॥

रघुवीर ने अपनी बाण वर्षा के द्वारा उसकी बड़ी भारी शिलावृष्टि को रोककर अपनी ओर आती हुई उस निशाचरी के दोनों हाथ तीखे सायकों से काट डाले॥ १७॥

ततश्छिन्नभुजां श्रान्तामभ्याशे परिगर्जतीम्।
सौमित्रिरकरोत् क्रोधाद्धृतकर्णाग्रनासिकाम्॥ १८॥

दोनों भुजाएँ कट जानेसे थकी हुई ताटका उनके निकट खड़ी होकर जोर-जोरसे गर्जना करने लगी। यह देख सुमित्राकुमार लक्ष्मणने क्रोधमें भरकर उसके नाक-कान काट लिये॥ १८ ॥
कामरूपधरा सा तु कृत्वा रूपाण्यनेकशः।
अन्तर्धानं गता यक्षी मोहयन्ती स्वमायया॥१९॥

परंतु वह तो इच्छानुसार रूप धारण करने वाली यक्षिणी थी; अतः अनेक प्रकार के रूप बनाकर अपनी माया से श्रीराम और लक्ष्मण को मोह में डालती हुई अदृश्य हो गयी॥ १९॥

अश्मवर्षं विमुञ्चन्ती भैरवं विचचार सा।
ततस्तावश्मवर्षेण कीर्यमाणौ समन्ततः॥२०॥
दृष्ट्वा गाधिसुतः श्रीमानिदं वचनमब्रवीत्।
अलं ते घृणया राम पापैषा दुष्टचारिणी॥२१॥
यज्ञविघ्नकरी यक्षी पुरा वर्धेत मायया।
वध्यतां तावदेवैषा पुरा संध्या प्रवर्तते॥२२॥
रक्षांसि संध्याकाले तु दुर्धर्षाणि भवन्ति हि।

अब वह पत्थरों की भयङ्कर वर्षा करती हुई आकाश में विचरने लगी। श्रीराम और लक्ष्मण पर चारों ओर से प्रस्तरों की वृष्टि होती देख तेजस्वी गाधिनन्दन विश्वामित्र ने इस प्रकार कहा—’श्रीराम! इसके ऊपर तुम्हारा दया करना व्यर्थ है। यह बड़ी पापिनी और दुराचारिणी है। सदा यज्ञों में विघ्न डाला करती है। यह अपनी मायासे पुनः प्रबल हो उठे, इसके पहले ही इसे मार डालो। अभी संध्याकाल आना चाहता है, इसके पहले ही यह कार्य हो जाना चाहिये; क्योंकि संध्याके समय राक्षस दुर्जय हो जाते हैं’। २०–२२ १/२॥

इत्युक्तः स तु तां यक्षीमश्मवृष्टयाभिवर्षिणीम्॥ २३॥
दर्शयन् शब्दवेधित्वं तां रुरोध स सायकैः।

विश्वामित्रजी के ऐसा कहने पर श्रीराम ने शब्दवेधी बाण चलाने की शक्ति का परिचय देते हुए बाण मारकर प्रस्तरों की वर्षा करने वाली उस यक्षिणी  को सब ओर से अवरुद्ध कर दिया। २३ १/२॥

सा रुद्वा बाणजालेन मायाबलसमन्विता ॥ २४॥
अभिदुद्राव काकुत्स्थं लक्ष्मणं च विनेदुषी।
तामापतन्तीं वेगेन विक्रान्तामशनीमिव॥ २५॥
शरेणोरसि विव्याध सा पपात ममार च।

उनके बाण-समूह से घिर जानेपर मायाबल से युक्त वह यक्षिणी जोर-जोरसे गर्जना करती हुई श्रीराम और लक्ष्मण के ऊपर टूट पड़ी। उसे चलाये हुए इन्द्रके वज्र की भाँति वेग से आती देख श्रीराम ने एक बाण मारकर उसकी छाती चीर डाली तब ताटका पृथ्वी पर गिरी और मर गयी॥ २४-२५ १/२ ।।

तां हतां भीमसंकाशां दृष्ट्वा सुरपतिस्तदा ॥२६॥
साधु साध्विति काकुत्स्थं सुराश्चाप्यभिपूजयन्।

उस भयङ्कर राक्षसी को मारी गयी देख देवराज इन्द्र तथा देवताओं ने श्रीराम को साधुवाद देते हुए उनकी सराहना की॥ २६ १/२॥

उवाच परमप्रीतः सहस्राक्षः पुरन्दरः॥ २७॥
सुराश्च सर्वे संहृष्टा विश्वामित्रमथाब्रुवन्।

उस समय सहस्रलोचन इन्द्र तथा समस्त देवताओं ने अत्यन्त प्रसन्न एवं हर्षोत्फुल्ल होकर विश्वामित्रजीसे कहा- ॥ २७ १/२॥

मुने कौशिक भद्रं ते सेन्द्राः सर्वे मरुद्गणाः॥ २८॥
तोषिताः कर्मणानेन स्नेहं दर्शय राघवे।

‘मुने! कुशिकनन्दन! आपका कल्याण हो,आपने इस कार्य से इन्द्र सहित सम्पूर्ण देवताओं को संतुष्ट किया है। अब रघुकुलतिलक श्रीरामपर आप अपना स्नेह प्रकट कीजिये॥ २८ १/२॥

प्रजापतेः कृशाश्वस्य पुत्रान् सत्यपराक्रमान्॥ २९॥
तपोबलभृतो ब्रह्मन् राघवाय निवेदय।

” ‘ब्रह्मन्! प्रजापति कृशाश्व के अस्त्र-रूपधारी पत्रोंको, जो सत्यपराक्रमी तथा तपोबल से सम्पन्न हैं, श्रीरामको समर्पित कीजिये॥ २९ १/२ ॥

पात्रभूतश्च ते ब्रह्मस्तवानुगमने रतः॥३०॥
कर्तव्यं सुमहत् कर्म सुराणां राजसूनुना।

‘विप्रवर! ये आपके अस्त्रदान के सुयोग्य पात्र हैं तथा आपके अनुसरण (सेवा-शुश्रूषा) में तत्पर रहते हैं। राजकुमार श्रीराम के द्वारा देवताओं का महान् कार्य सम्पन्न होनेवाला है’ ॥ ३० १/२ ॥

एवमुक्त्वा सुराः सर्वे जग्मुर्हृष्टा विहायसम्॥ ३१॥
विश्वामित्रं पूजयन्तस्ततः संध्या प्रवर्तते।

ऐसा कहकर सभी देवता विश्वामित्रजीकी प्रशंसा करते हुए प्रसन्नतापूर्वक आकाश मार्ग से चले गये तत्पश्चात् संध्या हो गयी॥ ३१ १/२ ॥

ततो मुनिवरः प्रीतस्ताटकावधतोषितः॥३२॥
मूर्ध्नि राममुपाघ्राय इदं वचनमब्रवीत्।

तदनन्तर ताटकावधसे संतुष्ट हुए मुनिवर विश्वामित्रने श्रीरामचन्द्रजीका मस्तक सूंघकर उनसे यह बात कही— ॥ ३२ १/२॥

इहाद्य रजनीं राम वसाम शुभदर्शन॥३३॥
श्वः प्रभाते गमिष्यामस्तदाश्रमपदं मम।

‘शुभदर्शन राम! आजकी रात में हम लोग यहीं निवास करें कल सबेरे अपने आश्रम पर चलेंगे’। ३३ १/२॥

विश्वामित्रवचः श्रुत्वा हृष्टो दशरथात्मजः॥ ३४॥
उवास रजनीं तत्र ताटकाया वने सुखम्।

विश्वामित्रजी की यह बात सुनकर दशरथकुमार श्रीराम बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने ताटका वन में रहकर वह रात्रि बड़े सुख से व्यतीत की॥ ३४ १/२॥

मुक्तशापं वनं तच्च तस्मिन्नेव तदाहनि।
रमणीयं विबभ्राज यथा चैत्ररथं वनम्॥३५॥

उसी दिन वह वन शापमुक्त होकर रमणीय शोभा से सम्पन्न हो गया और चैत्ररथ वनकी भाँति अपनी मनोहर छटा दिखाने लगा॥ ३५ ॥

निहत्य तां यक्षसुतां स रामः प्रशस्यमानः सुरसिद्धसंघैः।
उवास तस्मिन् मुनिना सहैव प्रभातवेलां प्रतिबोध्यमानः॥३६॥

यक्षकन्या ताटका का वध करके श्रीरामचन्द्र जी देवताओं तथा सिद्ध समूहों की प्रशंसाके पात्र बन गये। उन्होंने प्रातःकाल की प्रतीक्षा करते हुए विश्वामित्रजी के साथ ताटका वन में निवास किया। ३६॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे षड्विंशः सर्गः ॥२६॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में छब्बीसवाँ सर्ग पूरा हुआ। २६॥

बालकाण्ड सर्ग- २१-३०

बालकाण्डम्
सप्तविंशः सर्गः (सर्ग 27)

( विश्वामित्र द्वारा श्रीराम को दिव्यास्त्र )

दान अथ तां रजनीमुष्य विश्वामित्रो महायशाः।
 प्रहस्य राघवं वाक्यमुवाच मधुरस्वरम्॥१॥

ताटका वन में वह रात बिताकर महायशस्वी विश्वामित्र हँसते हुए मीठे स्वर में श्रीरामचन्द्रजी से बोले- ॥१॥

परितुष्टोऽस्मि भद्रं ते राजपुत्र महायशः।
प्रीत्या परमया युक्तो ददाम्यस्त्राणि सर्वशः॥२॥

‘महायशस्वी राजकुमार! तुम्हारा कल्याण हो। ताटका वध के कारण मैं तुम पर बहुत संतुष्ट हूँ; अतःबड़ी प्रसन्नता के साथ तुम्हें सब प्रकार के अस्त्र दे रहा हूँ॥

देवासुरगणान् वापि सगन्धर्वोरगान् भुवि।
यैरमित्रान् प्रसह्याजौ वशीकृत्य जयिष्यसि॥३॥

‘इनके प्रभाव से तुम अपने शत्रुओं को–चाहे वे देवता, असुर, गन्धर्व अथवा नाग ही क्यों न हों, “रणभूमि में बलपूर्वक अपने अधीन करके उनपर विजय पा जाओगे॥३॥

तानि दिव्यानि भद्रं ते ददाम्यस्त्राणि सर्वशः।
दण्डचक्रं महद दिव्यं तव दास्यामि राघव॥४॥
धमर्चक्रं ततो वीर कालचक्रं तथैव च।
विष्णुचक्रं तथात्युग्रमैन्द्रं चक्रं तथैव च॥५॥

‘रघुनन्दन! तुम्हारा कल्याण हो,आज मैं तुम्हें वे सभी दिव्यास्त्र दे रहा हूँ। वीर ! मैं तुमको दिव्य एवं महान् दण्डचक्र, धर्मचक्र, कालचक्र, विष्णुचक्र तथा अत्यन्त भयंकर ऐन्द्रचक्र दूंगा॥ ४-५॥

वज्रमस्त्रं नरश्रेष्ठ शैवं शूलवरं तथा।
अस्त्रं ब्रह्मशिरश्चैव ऐषीकमपि राघव॥६॥
ददामि ते महाबाहो ब्राह्ममस्त्रमनुत्तमम्।

‘नरश्रेष्ठ राघव! इन्द्रका वज्रास्त्र, शिवका श्रेष्ठ त्रिशूल तथा ब्रह्माजी का ब्रह्मशिर नामक अस्त्र भी दूंगा। महाबाहो! साथ ही तुम्हें ऐषीकास्त्र तथा परम उत्तम ब्रह्मास्त्र भी प्रदान करता हूँ॥६॥

गदे द्वे चैव काकुत्स्थ मोदकीशिखरी शुभे॥७॥
प्रदीप्ते नरशार्दूल प्रयच्छामि नृपात्मज।
 धर्मपाशमहं राम कालपाशं तथैव च॥८॥
वारुणं पाशमस्त्रं च ददाम्यहमनुत्तमम्।

‘ककुत्स्थकुलभूषण! इनके सिवा दो अत्यन्त उज्ज्वल और सुन्दर गदाएँ, जिनके नाम मोद की और शिखरी हैं, मैं तुम्हें अर्पण करता हूँ। पुरुषसिंह राजकुमार राम! धर्मपाश, कालपाश और वरुणपाश भी बड़े उत्तम अस्त्र हैं,इन्हें भी आज तुम्हें अर्पित करता हूँ॥ ७-८॥

अशनी द्वे प्रयच्छामि शुष्कार्टे रघुनन्दन॥९॥
ददामि चास्त्रं पैनाकमस्त्रं नारायणं तथा।

‘रघुनन्दन ! सूखी और गीली दो प्रकार की अशनि तथा पिनाक एवं नारायणास्त्र भी तुम्हें दे रहा हूँ॥९॥

आग्नेयमस्त्रं दयितं शिखरं नाम नामतः॥१०॥
वायव्यं प्रथमं नाम ददामि तव चानघ।

‘अग्निका प्रिय आग्नेय-अस्त्र, जो शिखरास्त्रके नामसे भी प्रसिद्ध है, तुम्हें अर्पण करता हूँ। अनघ! अस्त्रों में प्रधान जो वायव्यास्त्र है, वह भी तुम्हें दे रहा हूँ॥१० १/२॥

अस्त्रं हयशिरो नाम क्रौञ्चमस्त्रं तथैव च॥११॥
शक्तिद्वयं च काकुत्स्थ ददामि तव राघव।

‘ककुत्स्थ कुलभूषण राघव! हयशिरा नामक अस्त्र, क्रौञ्च-अस्त्र तथा दो शक्तियों को भी तुम्हें देता हूँ॥

कङ्कालं मुसलं घोरं कापालमथ किङ्किणीम्॥ १२॥
वधार्थं रक्षसां यानि ददाम्येतानि सर्वशः।

‘कङ्काल, घोर मूसल, कपाल तथा किङ्किणी आदि सब अस्त्र, जो राक्षसों के वध में उपयोगी होते हैं, तुम्हें दे रहा हूँ॥ १२ १/२॥

वैद्याधरं महास्त्रं च नन्दनं नाम नामतः॥१३॥
असिरत्नं महाबाहो ददामि नृवरात्मज।

‘महाबाहु राजकुमार! नन्दन नाम से प्रसिद्ध विद्याधरों का महान् अस्त्र तथा उत्तम खड्ग भी तुम्हें अर्पित करता हूँ॥ १३ १/२॥

 गान्धर्वमस्त्रं दयितं मोहनं नाम नामतः॥१४॥
प्रस्वापनं प्रशमनं दद्मि सौम्यं च राघव।

‘रघुनन्दन ! गन्धर्वो का प्रिय सम्मोहन नामक अस्त्र, प्रस्वापन, प्रशमन तथा सौम्य-अस्त्र भी देता हूँ॥ १४१/२॥

 वर्षणं शोषणं चैव संतापनविलापने॥१५॥
मादनं चैव दुर्धर्षं कन्दर्पदयितं तथा।
गान्धर्वमस्त्रं दयितं मानवं नाम नामतः॥१६॥
पैशाचमस्त्रं दयितं मोहनं नाम नामतः।
प्रतीच्छ नरशार्दूल राजपुत्र महायशः॥१७॥

‘महायशस्वी पुरुषसिंह राजकुमार! वर्षण, शोषण, संतापन, विलापन तथा कामदेव का प्रिय दुर्जय अस्त्र मादन, गन्धर्वो का प्रिय मानवास्त्र तथा पिशाचों का प्रिय मोहनास्त्र भी मुझसे ग्रहण करो। १५–१७॥

तामसं नरशार्दूल सौमनं च महाबलम्।
 संवर्तं चैव दुर्धर्षं मौसलं च नृपात्मज॥१८॥
सत्यमस्त्रं महाबाहो तथा मायामयं परम्।
 सौरं तेजःप्रभं नाम परतेजोऽपकर्षणम्॥१९॥

‘नरश्रेष्ठ राजपुत्र महाबाहु राम! तामस, महाबली सौमन, संवर्त, दुर्जय, मौसल, सत्य और मायामय उत्तम अस्त्र भी तुम्हें अर्पण करता हूँ। सूर्यदेवता का तेजःप्रभ नामक अस्त्र, जो शत्रु के तेज का नाश करने वाला है, तुम्हें अर्पित करता हूँ॥ १८-१९ ॥

सोमास्त्रं शिशिरं नाम त्वाष्ट्रमस्त्रं सुदारुणम्।
 दारुणं च भगस्यापि शीतेषुमथ मानवम्॥२०॥

‘सोम देवता का शिशिर नामक अस्त्र, त्वष्टा (विश्वकर्मा) का अत्यन्त दारुण अस्त्र, भगदेवता का भी भयंकर अस्त्र तथा मनु का शीतेषु नामक अस्त्र भी तुम्हें देता हूँ॥ २० ॥

 एतान् राम महाबाहो कामरूपान् महाबलान्।
गृहाण परमोदारान् क्षिप्रमेव नृपात्मज॥२१॥

‘महाबाहु राजकुमार श्रीराम! ये सभी अस्त्र इच्छानुसार रूप धारण करने वाले, महान् बल से सम्पन्न तथा परम उदार हैं,तुम शीघ्र ही इन्हें ग्रहण करो’ ॥ २१॥

 स्थितस्तु प्राङ्मुखो भूत्वा शुचिर्मुनिवरस्तदा।
ददौ रामाय सुप्रीतो मन्त्रग्राममनुत्तमम्॥२२॥

ऐसा कहकर मुनिवर विश्वामित्रजी उस समय स्नान आदिसे शुद्ध हो पूर्वाभिमुख होकर बैठ गये और अत्यन्त प्रसन्नताके साथ उन्होंने श्रीरामचन्द्रजीको उन सभी उत्तम अस्त्रोंका उपदेश दिया॥ २२॥

सर्वसंग्रहणं येषां दैवतैरपि दुर्लभम्।
 तान्यस्त्राणि तदा विप्रो राघवाय न्यवेदयत्॥ २३॥

जिन अस्त्रों का पूर्ण रूप से संग्रह करना देवताओं के लिये भी दुर्लभ है, उन सब को विप्रवर विश्वामित्रजी नेश्रीरामचन्द्रजी को समर्पित कर दिया॥ २३ ॥

जपतस्तु मुनेस्तस्य विश्वामित्रस्य धीमतः।
 उपतस्थुर्महार्हाणि सर्वाण्यस्त्राणि राघवम्॥ २४॥
ऊचुश्च मुदिता रामं सर्वे प्राञ्जलयस्तदा।
इमे च परमोदार किंकरास्तव राघव॥ २५॥
यद्यदिच्छसि भद्रं ते तत्सर्वं करवाम वै।

बुद्धिमान् विश्वामित्रजी ने ज्यों ही जप आरम्भ किया त्यों ही वे सभी परम पूज्य दिव्यास्त्र स्वतः आकर श्रीरघुनाथजी के पास उपस्थित हो गये और अत्यन्त हर्ष में भरकर उस समय श्रीरामचन्द्रजी से हाथ जोड़कर कहने लगे—’परम उदार रघुनन्दन ! आपका कल्याण हो। हम सब आपके किङ्कर हैं। आप हमसे जो-जो सेवा लेना चाहेंगे, वह सब हम करनेको तैयार रहेंगे’। २४-२५ १/२ ॥

ततो रामः प्रसन्नात्मा तैरित्युक्तो महाबलैः॥२६॥
 प्रतिगृह्य च काकुत्स्थः समालभ्य च पाणिना।
मानसा मे भविष्यध्वमिति तान्यभ्यचोदयत्॥ २७॥

उन महान् प्रभावशाली अस्त्रों के इस प्रकार कहने पर श्रीरामचन्द्र जी मन-ही-मन बहुत प्रसन्न हुए और उन्हें ग्रहण करने के पश्चात् हाथ से उनका स्पर्श करके बोले—’आप सब मेरे मन में निवास करें’। २६-२७॥

 ततः प्रीतमना रामो विश्वामित्रं महामुनिम्।
 अभिवाद्य महातेजा गमनायोपचक्रमे ॥२८॥

तदनन्तर महातेजस्वी श्रीराम ने प्रसन्नचित्त होकर महामुनि विश्वामित्र को प्रणाम किया और आगे की यात्रा आरम्भ की॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे सप्तविंशः सर्गः ॥२७॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में सत्ताईसवाँ सर्ग पूरा हुआ। २७॥

बालकाण्ड सर्ग- २१-३०

बालकाण्डम्
अष्टाविंशः सर्गः (सर्ग 28)

( विश्वामित्र का श्रीराम को अस्त्रों की संहारविधि बताना,अस्त्रोंका उपदेश करना, श्रीराम का आश्रम एवं यज्ञस्थानके विषय में मुनि से प्रश्न )

प्रतिगृह्य ततोऽस्त्राणि प्रहृष्टवदनः शुचिः।
गच्छन्नेव च काकुत्स्थो विश्वामित्रमथाब्रवीत्॥१॥

उन अस्त्रों को ग्रहण करके परम पवित्र श्रीराम का मुख प्रसन्नता से खिल उठा था। वे चलते-चलते ही विश्वामित् रसे बोले- ॥१॥

गृहीतास्त्रोऽस्मि भगवन् दुराधर्षः सुरैरपि।
अस्त्राणां त्वहमिच्छामि संहारान् मुनिपुंगव॥२॥

‘भगवन्! आपकी कृपा से इन अस्त्रों को ग्रहण करके मैं देवताओं के लिये भी दुर्जय हो गया हूँ। । मुनिश्रेष्ठ! अब मैं अस्त्रों की संहार विधि जानना चाहता हूँ’॥२॥

एवं ब्रुवति काकुत्स्थे विश्वामित्रो महातपाः।
 संहारान् व्याजहाराथ धृतिमान् सुव्रतः शुचिः॥ ३॥

ककुत्स्थकुलतिलक श्रीराम के ऐसा कहने पर महातपस्वी, धैर्यवान्, उत्तम व्रतधारी और पवित्र विश्वामित्र मुनि ने उन्हें अस्त्रों की संहार विधि का उपदेश दिया॥३॥

सत्यवन्तं सत्यकीर्तिं धृष्टं रभसमेव च।
 प्रतिहारतरं नाम पराङ्मुखमवाङ्मुखम्॥४॥
 लक्ष्यालक्ष्याविमौ चैव दृढनाभसुनाभको।
 दशाक्षशतवक्त्रौ च दशशीर्षशतोदरौ॥५॥
पद्मनाभमहानाभौ दुन्दुनाभस्वनाभको।
ज्योतिषं शकुनं चैव नैरास्यविमलावुभौ॥६॥
यौगंधरविनिद्रौ च दैत्यप्रमथनौ तथा।
शुचिबाहुर्महाबाहुनिष्कलिर्विरुचस्तथा।
सार्चिमाली धृतिर्माली वृत्तिमान् रुचिरस्तथा॥ ७॥
पित्र्यः सौमनसश्चैव विधूतमकरावुभौ।
परवीरं रतिं चैव धनधान्यौ च राघव॥८॥
कामरूपं कामरुचिं मोहमावरणं तथा।
 जृम्भकं सर्पनाथं च पन्थानवरुणौ तथा॥९॥
कृशाश्वतनयान् राम भास्वरान् कामरूपिणः।
 प्रतीच्छ मम भद्रं ते पात्रभूतोऽसि राघव॥१०॥

तदनन्तर वे बोले—’रघुकुलनन्दन राम! तुम्हारा कल्याण हो! तुम अस्त्र विद्या के सुयोग्य पात्र हो; अतः निम्नाङ्कित अस्त्रों को भी ग्रहण करो—सत्यवान्, सत्यकीर्ति, धृष्ट, रभस, प्रतिहारतर, प्रामख, अवाङ्मख, लक्ष्य, अलक्ष्य, दृढ़नाभ, सुनाभ, दशाक्ष, शतवक्त्र, दशशीर्ष, शतोदर, पद्मनाभ, महानाभ, दुन्दुनाभ, स्वनाभ, ज्योतिष, शकुन, नैरास्य, विमल, दैत्यनाशक यौगंधर और विनिद्र, शुचिबाहु, महाबाहु, निष्कलि, विरुच, सार्चिमाली, धृतिर्माली, वृत्तिमान्, रुचिर, पित्र्य, सौमनस, विधूत, मकर, परवीर, रति, धन, धान्य, कामरूप, कामरुचि, मोह, आवरण, जृम्भक, सर्पनाथ, पन्थान और वरुण—ये सभी प्रजापति कृशाश्व के पुत्र हैं। ये इच्छानुसार रूप धारण करने वाले तथा परम तेजस्वी हैं तुम इन्हें ग्रहण करो’ ॥ ४–१०॥

बाढमित्येव काकुत्स्थः प्रहृष्टेनान्तरात्मना।
 दिव्यभास्वरदेहाश्च मूर्तिमन्तः सुखप्रदाः॥११॥

तब ‘बहुत अच्छा’ कहकर श्रीरामचन्द्रजी ने प्रसन्न मन से उन अस्त्रों को ग्रहण किया। उन मूर्तिमान् अस्त्रों के शरीर दिव्य तेज से उद्भासित हो रहे थे। वे अस्त्र जगत् को सुख देनेवाले थे॥ ११ ॥

केचिदंगारसदृशाः केचिद् धूमोपमास्तथा।
चन्द्रार्कसदृशाः केचित् प्रह्वाञ्जलिपुटास्तथा॥ १२॥

उनमें से कितने ही अंगारों के समान तेजस्वी थे। कितने ही धूम के समान काले प्रतीत होते थे तथा कुछ अस्त्र सूर्य और चन्द्रमा के समान प्रकाशमान थे। वे सब-के-सब हाथ जोड़कर श्रीरामके समक्ष खड़े हुए॥ १२॥

रामं प्राञ्जलयो भूत्वाब्रुवन् मधुरभाषिणः।
इमे स्म नरशार्दूल शाधि किं करवाम ते॥१३॥

उन्होंने अञ्जलि बाँधे मधुर वाणी में श्रीराम से इस प्रकार कहा–’पुरुषसिंह! हम लोग आपके दास हैं। आज्ञा कीजिये, हम आपकी क्या सेवा करें?’ ।। १३॥

गम्यतामिति तानाह यथेष्टं रघुनन्दनः।
 मानसाः कार्यकालेषु साहाय्यं मे करिष्यथ॥ १४॥

तब रघुकुलनन्दन राम ने उनसे कहा—’इस समय तो आप लोग अपने अभीष्ट स्थान को जायँ; परंतु आवश्यकता के समय मेरे मन में स्थित होकर सदा मेरी सहायता करते रहें’ ।। १४॥

अथ ते राममामन्त्र्य कृत्वा चापि प्रदक्षिणम्।
 एवमस्त्विति काकुत्स्थमुक्त्वा जग्मुर्यथागतम्॥ १५॥

तत्पश्चात् वे श्रीराम की परिक्रमा करके उनसे विदा ले उनकी आज्ञा के अनुसार कार्य करने की प्रतिज्ञा करके जैसे आये थे, वैसे चले गये॥ १५ ॥

स च तान् राघवो ज्ञात्वा विश्वामित्रं महामुनिम्।
गच्छन्नेवाथ मधुरं श्लक्ष्णं वचनमब्रवीत्॥१६॥
किमेतन्मेघसंकाशं पर्वतस्याविदूरतः।
वृक्षखण्डमितो भाति परं कौतूहलं हि मे॥१७॥

इस प्रकार उन अस्त्रों का ज्ञान प्राप्त करके श्रीरघुनाथजी ने चलते-चलते ही महामुनि विश्वामित्र से मधुर वाणी में पूछा—’भगवन्! सामने वाले पर्वत के पास ही जो यह मेघों की घटा के समान सघन वृक्षों से भरा स्थान दिखायी देता है, क्या है ? उसके विषय में जानने के लिये मेरे मन में बड़ी उत्कण्ठा हो रही है। १६-१७॥

दर्शनीयं मृगाकीर्णं मनोहरमतीव च।
नानाप्रकारैः शकुनैवल्गुभाषैरलंकृतम्॥१८॥

‘यह दर्शनीय स्थान मृगों के झुंड से भरा हुआ होने के कारण अत्यन्त मनोहर प्रतीत होता है। नाना प्रकार के पक्षी अपनी मधुर शब्दावली से इस स्थान की शोभा बढ़ाते हैं॥ १८॥

निःसृताःस्मो मुनिश्रेष्ठ कान्ताराद् रोमहर्षणात्।
अनया त्ववगच्छामि देशस्य सुखवत्तया॥१९॥

‘मुनिश्रेष्ठ ! इस प्रदेशकी इस सुखमयी स्थिति से यह जान पड़ता है कि अब हम लोग उस रोमाञ्चकारी दुर्गम ताटका वन से बाहर निकल आये हैं॥ १९॥

सर्वं मे शंस भगवन् कस्याश्रमपदं त्विदम्।
सम्प्राप्ता यत्र ते पापा ब्रह्मघ्ना दुष्टचारिणः॥ २०॥
तव यज्ञस्य विघ्नाय दुरात्मानो महामुने।
भगवंस्तस्य को देशः सा यत्र तव याज्ञिकी॥ २१॥
रक्षितव्या क्रिया ब्रह्मन् मया वध्याश्च राक्षसाः।
एतत् सर्वं मुनिश्रेष्ठ श्रोतुमिच्छाम्यहं प्रभो॥२२॥

‘भगवन्! मुझे सब कुछ बताइये यह किसका आश्रम है? भगवन्! महामुने! जहाँ आपकी यज्ञक्रिया हो रही है, जहाँ वे पापी, दुराचारी, ब्रह्महत्यारे, दुरात्मा राक्षस आपके यज्ञ में विघ्न डालने के लिये आया करते हैं और जहाँ मुझे यज्ञ की रक्षा तथा राक्षसों के वध का कार्य करना है, उस आपके आश्रमका कौन-सा देश है ? ब्रह्मन् ! मुनिश्रेष्ठ प्रभो! यह सब मैं सुनना चाहता हूँ’। २०–२२॥

 इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डेऽष्टाविंशः सर्गः ॥२८॥
 इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें अट्ठाईसवाँ सर्ग पूरा हुआ।२८॥

बालकाण्ड सर्ग- २१-३०

बालकाण्डम्
एकोनत्रिंशः सर्गः (सर्ग 29 )

( विश्वामित्रजी का श्रीराम से सिद्धाश्रम का पूर्ववृत्तान्त बताना और उन दोनों भाइयों के साथ अपने आश्रम पहुँचकर पूजित होना )

अथ तस्याप्रमेयस्य वचनं परिपृच्छतः।
विश्वामित्रो महातेजा व्याख्यातुमुपचक्रमे॥१॥

अपरिमित प्रभावशाली भगवान् श्रीराम का वचन सुनकर महातेजस्वी विश्वामित्र ने उनके प्रश्नका उत्तर देना आरम्भ किया— ॥१॥

इह राम महाबाहो विष्णुर्देवनमस्कृतः।
वर्षाणि सुबहूनीह तथा युगशतानि च॥२॥
तपश्चरणयोगार्थमुवास सुमहातपाः।
 एष पूर्वाश्रमो राम वामनस्य महात्मनः॥३॥

‘महाबाहु श्रीराम! पूर्वकाल में यहाँ देववन्दित भगवान् विष्णु ने बहुत वर्षों एवं सौ युगों तक तपस्या के लिये निवास किया था। उन्होंने यहाँ बहुत बड़ी तपस्या की थी। यह स्थान महात्मा वामन का वामन अवतार धारण करने को उद्यत हुए श्री विष्णुका अवतार ग्रहण से पूर्व आश्रम था॥२-३॥

सिद्धाश्रम इति ख्यातः सिद्धो ह्यत्र महातपाः।
 एतस्मिन्नेव काले तु राजा वैरोचनिर्बलिः॥४॥
 निर्जित्य दैवतगणान् सेन्द्रान् सहमरुद्गणान्।
 कारयामास तद्राज्यं त्रिषु लोकेषु विश्रुतः॥५॥

‘इसकी सिद्धाश्रम के नाम से प्रसिद्धि थी; क्योंकि यहाँ महातपस्वी विष्णु को सिद्धि प्राप्त हुई थी। जब वे तपस्या करते थे, उसी समय विरोचन कुमार राजा बलि ने इन्द्र और मरुद्गणों सहित समस्त देवताओं को पराजित करके उनका राज्य अपने अधिकार में कर लिया था। वे तीनों लोकों में विख्यात हो गये थे। ४-५॥

यज्ञं चकार सुमहानसुरेन्द्रो महाबलः।
बलेस्तु यजमानस्य देवाः साग्निपुरोगमाः।
समागम्य स्वयं चैव विष्णुमूचुरिहाश्रमे॥६॥

‘उन महाबली महान् असुरराज ने एक यज् ञका आयोजन किया। उधर बलि यज्ञ में लगे हुए थे, इधर अग्नि आदि देवता स्वयं इस आश्रम में पधार कर भगवान् विष्णु से बोले—॥

बलिर्वैरोचनिर्विष्णो यजते यज्ञमुत्तमम्।
असमाप्तव्रते तस्मिन् स्वकार्यमभिपद्यताम्॥७॥

“सर्वव्यापी परमेश्वर! विरोचन कुमार बलि एक उत्तम यज्ञ का अनुष्ठान कर रहे हैं। उनका वह यज्ञ सम्बन्धी नियम पूर्ण होने से पहले ही हमें अपना कार्य सिद्ध कर लेना चाहिये॥७॥

ये चैनमभिवर्तन्ते याचितार इतस्ततः।
यच्च यत्र यथावच्च सर्वं तेभ्यः प्रयच्छति॥८॥

“इस समय जो भी याचक इधर-उधर से आकर उनके यहाँ याचना के लिये उपस्थित होते हैं, वे गो, भूमि और सुवर्ण आदि सम्पत्तियों में से जिस वस्तु को भी लेना चाहते हैं, उनको वे सारी वस्तुएँ राजा बलि यथावत्-रूप से अर्पित करते हैं॥८॥

स त्वं सुरहितार्थाय मायायोगमुपाश्रितः।
 वामनत्वं गतो विष्णो कुरु कल्याणमुत्तमम्॥९॥

“अतः विष्णो! आप देवताओं के हित के लिये अपनी योगमाया का आश्रय ले वामनरूप धारण करके उस यज्ञ में जाइये और हमारा उत्तम कल्याण साधन कीजिये’ ॥ ९॥

एतस्मिन्नन्तरे राम कश्यपोऽग्निसमप्रभः।
 अदित्या सहितो राम दीप्यमान इवौजसा॥१०॥
देवीसहायो भगवान् दिव्यं वर्षसहस्रकम्।
व्रतं समाप्य वरदं तुष्टाव मधुसूदनम्॥११॥

‘श्रीराम! इसी समय अग्नि के समान तेजस्वी महर्षि कश्यप धर्मपत्नी अदिति के साथ अपने तेज से प्रकाशित होते हुए वहाँ आये। वे एक सहस्र दिव्य वर्षों तक चालू रहनेवाले महान् व्रत को अदिति देवी के साथ ही समाप्त करके आये थे। उन्होंने वरदायक भगवान् मधुसूदन की इस प्रकार स्तुति की— ॥ १० ११॥

तपोमयं तपोराशिं तपोमूर्तिं तपात्मकम्।
 तपसा त्वां सुतप्तेन पश्यामि पुरुषोत्तमम्॥१२॥

“भगवन्! आप तपोमय हैं,तपस्या की राशि हैं, तप आपका स्वरूप है, आप ज्ञानस्वरूप हैं मैं भलीभाँति तपस्या करके उसके प्रभाव से आप पुरुषोत्तम का दर्शन कर रहा हूँ॥१२॥

शरीरे तव पश्यामि जगत् सर्वमिदं प्रभो।
त्वमनादिरनिर्देश्यस्त्वामहं शरणं गतः॥१३॥

“प्रभो! मैं इस सारे जगत् को आपके शरीर में स्थित देखता हूँ। आप अनादि हैं। देश, काल और वस्तु की सीमा से परे होने के कारण आपका – इदमित्थंरूप से निर्देश नहीं किया जा सकता, मैं आपकी शरण में आया हूँ’॥ १३॥

तमुवाच हरिः प्रीतः कश्यपं गतकल्मषम्।
वरं वरय भद्रं ते वरार्होऽसि मतो मम॥१४॥

‘कश्यप जी के सारे पाप धुल गये थे। भगवान् श्रीहरि ने अत्यन्त प्रसन्न होकर उनसे कहा—’महर्षे! तुम्हारा कल्याण हो। तुम अपनी इच्छा के अनुसार कोई वर माँगो; क्योंकि तुम मेरे विचार से वर पाने के योग्य हो’॥ १४॥

 तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य मारीचः कश्यपोऽब्रवीत्।
 अदित्या देवतानां च मम चैवानुयाचितम्॥ १५॥
वरं वरद सुप्रीतो दातुमर्हसि सुव्रत।
पुत्रत्वं गच्छ भगवन्नदित्या मम चानघ॥१६॥

‘भगवान् का यह वचन सुनकर मरीचिनन्दन कश्यप ने कहा-‘उत्तम व्रत का पालन करने वाले वरदायक परमेश्वर! सम्पूर्ण देवताओं की, अदिति की तथा मेरी भी आपसे एक ही बातके लिये बारम्बार याचना है। आप अत्यन्त प्रसन्न होकर मुझे वह एक ही वर प्रदान करें। भगवन् ! निष्पाप नारायणदेव! आप मेरे और अदिति के पुत्र हो जायँ॥ १५-१६ ।।

भ्राता भव यवीयांस्त्वं शक्रस्यासुरसूदन।
 शोकार्तानां तु देवानां साहाय्यं कर्तुमर्हसि ॥१७॥

“असुरसूदन! आप इन्द्र के छोटे भाई हों और शोक से पीड़ित हुए इन देवताओं की सहायता करें। १७॥

अयं सिद्धाश्रमो नाम प्रसादात् ते भविष्यति।
 सिद्धे कर्मणि देवेश उत्तिष्ठ भगवन्नितः॥१८॥

“देवेश्वर! भगवन्! आपकी कृपा से यह स्थान सिद्धाश्रम के नाम से विख्यात होगा। अब आपका तपरूप कार्य सिद्ध हो गया है,अतः यहाँ से उठिये’। १८॥

अथ विष्णुर्महातेजा अदित्यां समजायत।
 वामनं रूपमास्थाय वैरोचनिमुपागमत्॥१९॥

‘तदनन्तर महातेजस्वी भगवान् विष्णु अदिति देवी के गर्भ से प्रकट हुए और वामनरूप धारण करके विरोचन कुमार बलि के पास गये॥ १९॥

त्रीन् पदानथ भिक्षित्वा प्रतिगृह्य च मेदिनीम्।
आक्रम्य लोकाँल्लोकार्थी सर्वलोकहिते रतः॥ २०॥
महेन्द्राय पुनः प्रादान्नियम्य बलिमोजसा।
 त्रैलोक्यं स महातेजाश्चक्रे शक्रवशं पुनः॥ २१॥

‘सम्पूर्ण लोकों के हित में तत्पर रहने वाले भगवान् विष्णु बलि के अधिकार से त्रिलोकी का राज्य ले लेना चाहते थे; अतः उन्होंने तीन पग भूमि के लिये याचना करके उनसे भूमिदान ग्रहण किया और तीनों लोकों को आक्रान्त करके उन्हें पुनः देवराज इन्द्र को लौटा दिया। महातेजस्वी श्रीहरि ने अपनी शक्ति से बलि का निग्रह करके त्रिलोकी को पुनः इन्द्र के अधीन कर दिया॥ २०-२१॥

तेनैव पूर्वमाक्रान्त आश्रमः श्रमनाशनः।
 मयापि भक्त्या तस्यैव वामनस्योपभुज्यते॥२२॥

‘उन्हीं भगवान् ने पूर्वकाल में यहाँ निवास किया था; इसलिये यह आश्रम सब प्रकार के श्रम (दुःखशोक) का नाश करनेवाला है। उन्हीं भगवान् वामन में भक्ति होने के कारण मैं भी इस स्थान को अपने उपयोग में लाता हूँ॥ २२॥

एनमाश्रममायान्ति राक्षसा विघ्नकारिणः।
अत्र ते पुरुषव्याघ्र हन्तव्या दुष्टचारिणः ॥२३॥

‘इसी आश्रमपर मेरे यज्ञ में विघ्न डालने वाले राक्षस आते हैं। पुरुषसिंह! यहीं तुम्हें उन दुराचारियों का वध करना है॥२३॥

अद्य गच्छामहे राम सिद्धाश्रममनुत्तमम्।
तदाश्रमपदं तात तवाप्येतद् यथा मम॥२४॥

‘श्रीराम ! अब हम लोग उस परम उत्तम सिद्धाश्रम में पहुँच रहे हैं। तात! वह आश्रम जैसे मेरा है, वैसे ही तुम्हारा भी है’ ॥ २४ ॥

इत्युक्त्वा परमप्रीतो गृह्य रामं सलक्ष्मणम्।
 प्रविशन्नाश्रमपदं व्यरोचत महामुनिः।
 शशीव गतनीहारः पुनर्वसुसमन्वितः॥ २५॥

ऐसा कहकर महामुनि ने बड़े प्रेम से श्रीराम और लक्ष्मण के हाथ पकड़ लिये और उन दोनों के साथ आश्रम में प्रवेश किया। उस समय पुनर्वसु नामक दो नक्षत्रों के बीचमें स्थित तुषाररहित चन्द्रमाकी भाँति उनकी शोभा हुई॥ २५ ॥

तं दृष्ट्वा मुनयः सर्वे सिद्धाश्रमनिवासिनः।
 उत्पत्योत्पत्य सहसा विश्वामित्रमपूजयन्॥२६॥
यथार्ह चक्रिरे पूजां विश्वामित्राय धीमते।
 तथैव राजपुत्राभ्यामकुर्वन्नतिथिक्रियाम्॥ २७॥

विश्वामित्रजी को आया देख सिद्धाश्रम में रहने वाले सभी तपस्वी उछलते-कूदते हुए सहसा उनके पास आये और सबने मिलकर उन बुद्धिमान् विश्वामित्रजी की यथोचित पूजा की। इसी प्रकार उन्होंने उन दोनों राजकुमारों का भी अतिथि- सत्कार किया॥ २६-२७॥

मुहूर्तमथ विश्रान्तौ राजपुत्रावरिंदमौ।
 प्राञ्जली मुनिशार्दूलमूचतू रघुनन्दनौ ॥२८॥

दो घड़ी तक विश्राम करने के बाद रघुकुल को आनन्द देने वाले शत्रुदमन राजकुमार श्रीराम और लक्ष्मण हाथ जोड़कर मुनिवर विश्वामित्र से बोले-॥ २८॥

अद्यैव दीक्षां प्रविश भद्रं ते मुनिपुंगव।
 सिद्धाश्रमोऽयं सिद्धः स्यात् सत्यमस्तु वचस्तव॥ २९॥

‘मुनिश्रेष्ठ ! आप आज ही यज्ञ की दीक्षा ग्रहण करें,आपका कल्याण हो। यह सिद्धाश्रम वास्तव में यथानाम तथागुण सिद्ध हो और राक्षसों के वध के विषयमें आपकी कही हुई बात सच्ची हो’ ॥ २९॥

एवमुक्तो महातेजा विश्वामित्रो महानृषिः।
 प्रविवेश तदा दीक्षा नियतो नियतेन्द्रियः॥३०॥
कुमारावपि तां रात्रिमुषित्वा सुसमाहितौ।
 प्रभातकाले चोत्थाय पूर्वां संध्यामुपास्य च॥ ३१॥
प्रशुची परमं जाप्यं समाप्य नियमेन च।
हताग्निहोत्रमासीनं विश्वामित्रमवन्दताम्॥३२॥

उनके ऐसा कहने पर महातेजस्वी महर्षि विश्वामित्र जितेन्द्रिय भाव से नियमपूर्वक यज्ञ की दीक्षा में प्रविष्ट हुए। वे दोनों राजकुमार भी सावधानी के साथ रात व्यतीत करके सबेरे उठे और स्नान आदि से शुद्ध हो प्रातःकाल की संध्योपासना तथा नियमपूर्वक सर्वश्रेष्ठ गायत्री मन्त्र का जप करने लगे। जप पूरा होने पर उन्होंने अग्निहोत्र करके बैठे हुए विश्वामित्रजी के चरणों में वन्दना की॥ ३०–३२॥

 इत्या श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे एकोनत्रिंशः सर्गः॥२९॥
 इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें उन्तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ। २९॥

बालकाण्ड सर्ग- २१-३०

बालकाण्डम्
त्रिंशः सर्गः (सर्ग 30 )

( श्रीराम द्वारा विश्वामित्र के यज्ञ की रक्षा तथा राक्षसों का संहार )

अथ तौ देशकालज्ञौ राजपुत्रावरिंदमौ।
देशे काले च वाक्यज्ञावब्रूतां कौशिकं वचः॥

तदनन्तर देश और काल को जानने वाले शत्रुदमन राजकुमार श्रीराम और लक्ष्मण जो देश और काल के अनुसार बोलने योग्य वचन के मर्मज्ञ थे, कौशिक मुनि से इस प्रकार बोले ॥१॥

भगवञ्छ्रोतुमिच्छावो यस्मिन् काले निशाचरौ।
 संरक्षणीयौ तौ ब्रूहि नातिवर्तेत तत्क्षणम्॥२॥

‘भगवन् ! अब हम दोनों यह सुनना चाहते हैं कि किस समय उन दोनों निशाचरों का आक्रमण होता है? जब कि हमें उन दोनों को यज्ञ भूमि में आने से रोकना है,कहीं ऐसा न हो, असावधानी में ही वह समय हाथ से निकल जाय; अतः उसे बता दीजिये’॥२॥।

 एवं ब्रुवाणौ काकुत्स्थौ त्वरमाणौ युयुत्सया।
 सर्वे ते मुनयः प्रीताः प्रशशंसुर्नृपात्मजौ॥३॥

ऐसी बात कहकर युद्ध की इच्छा से उतावले हुए उन दोनों ककुत्स्थवंशी राजकुमारों की ओर देखकर वे सब मुनि बड़े प्रसन्न हुए और उन दोनों बन्धुओं की भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे॥३॥

अद्यप्रभृति षड्रानं रक्षतां राघवौ युवाम्।
दीक्षां गतो ह्येष मुनिौनित्वं च गमिष्यति॥४॥

वे बोले—’ये मुनिवर विश्वामित्रजी यज्ञ की दीक्षा ले चुके हैं; अतः अब मौन रहेंगे आप दोनों रघुवंशी वीर सावधान होकर आज से छः रातों तक इनके यज्ञ की रक्षा करते रहें’॥४॥

तौ तु तद्वचनं श्रुत्वा राजपुत्रौ यशस्विनौ।
अनिद्रं षडहोरात्रं तपोवनमरक्षताम्॥५॥

मुनियोंका यह वचन सुनकर वे दोनों यशस्वी राजकुमार लगातार छः दिन और छः रात तक उस तपोवन की रक्षा करते रहे; इस बीच में उन्होंने नींद भी नहीं ली।॥ ५॥

उपासांचक्रतुर्वीरौ यत्तौ परमधन्विनौ।
ररक्षतुर्मुनिवरं विश्वामित्रमरिंदमौ॥६॥

शत्रुओं का दमन करने वाले वे परम धनुर्धर वीर सतत सावधान रहकर मुनिवर विश्वामित्र के पास खड़े हो उनकी (और उनके यज्ञ की) रक्षा में लगे रहे॥६॥

अथ काले गते तस्मिन् षष्ठेऽहनि तदागते।
सौमित्रिमब्रवीद् रामो यत्तो भव समाहितः॥७॥

इस प्रकार कुछ काल बीत जाने पर जब छठा दिन आया, तब श्रीराम ने सुमित्राकुमार लक्ष्मण से कहा —’सुमित्रानन्दन! तुम अपने चित्त को एकाग्र करके सावधान हो जाओ’ ॥७॥

रामस्यैवं ब्रुवाणस्य त्वरितस्य युयुत्सया।
 प्रजज्वाल ततो वेदिः सोपाध्यायपुरोहिता॥८॥

युद्ध की इच्छा से शीघ्रता करते हुए श्रीराम इस प्रकार कह ही रहे थे कि उपाध्याय (ब्रह्मा), पुरोहित (उपद्रष्टा) तथा अन्यान्य ऋत्विजों से घिरी हुई यज्ञ की वेदी सहसा प्रज्वलित हो उठी (वेदी का यह जलना राक्षसों के आगमन का सूचक उत्पात था) ॥ ८॥

सदर्भचमसमुक्का ससमित्कुसुमोच्चया।
विश्वामित्रेण सहिता वेदिर्जज्वाल सर्विजा॥९॥

इसके बाद कुश, चमस, मुक्, समिधा और फूलों के ढेरसे सुशोभित होनेवाली विश्वामित्र तथा ऋत्विजों सहित जो यज्ञ की वेदी थी, उसपर आहवनीय अग्नि प्रज्वलित हुई (अग्नि का यह प्रज्वलन यज्ञ के उद्देश्य से हुआ था)॥९॥

 मन्त्रवच्च यथान्यायं यज्ञोऽसौ सम्प्रवर्तते।
आकाशे च महान् शब्दः प्रादुरासीद् भयानकः॥ १०॥

फिर तो शास्त्रीय विधि के अनुसार वेद-मन्त्रों के उच्चारणपूर्वक उस यज्ञ का कार्य आरम्भ हुआ। इसी समय आकाश में बड़े जोर का शब्द हुआ, जो बड़ा ही भयानक था॥ १०॥

आवार्य गगनं मेघो यथा प्रावृषि दृश्यते।
 तथा मायां विकुर्वाणौ राक्षसावभ्यधावताम्॥ ११॥
मारीचश्च सुबाहुश्च तयोरनुचरास्तथा।
आगम्य भीमसंकाशा रुधिरौघानवासृजन्॥१२॥

जैसे वर्षाकाल में मेघों की घटा सारे आकाश को घेरकर छायी हुई दिखायी देती है, उसी प्रकार मारीच और सुबाहु नामक राक्षस सब ओर अपनी माया फैलाते हुए यज्ञमण्डप की ओर दौड़े आ रहे थे। उनके अनुचर भी साथ थे। उन भयंकर राक्षसों ने वहाँ आकर रक्त की धाराएँ बरसाना आरम्भ कर दिया। ११-१२॥

तां तेन रुधिरौघेण वेदी वीक्ष्य समुक्षिताम्।
सहसाभिद्रुतो रामस्तानपश्यत् ततो दिवि॥१३॥
तावापतन्तौ सहसा दृष्ट्वा राजीवलोचनः।
लक्ष्मणं त्वभिसम्प्रेक्ष्य रामो वचनमब्रवीत्॥१४॥

रक्त के उस प्रवाह से यज्ञ-वेदी के आस-पास की भूमि को भीगी हुई देख श्रीरामचन्द्र जी सहसा दौड़े और इधर-उधर दृष्टि डालने पर उन्होंने उन राक्षसों को आकाश में स्थित देखा। मारीच और सुबाहुको सहसा आते देख कमलनयन श्रीराम ने लक्ष्मण की ओर देखकर कहा- ॥ १३-१४॥

पश्य लक्ष्मण दुर्वृत्तान् राक्षसान् पिशिताशनान्।
मानवास्त्रसमाधूताननिलेन यथा घनान्॥१५॥
करिष्यामि न संदेहो नोत्सहे हन्तुमीदृशान्।

‘लक्ष्मण! वह देखो, मांस भक्षण करने वाले दुराचारी राक्षस आ पहुँचे, मैं मानवास्त्रसे इन सबको उसी प्रकार मार भगाऊँगा, जैसे वायु के वेग से बादल छिन्न-भिन्न हो जाते हैं। मेरे इस कथनमें तनिक भी संदेह नहीं है,ऐसे कायरों को मैं मारना नहीं चाहता’। १५ १/२॥

 इत्युक्त्वा वचनं रामश्चापे संधाय वेगवान्॥ १६॥
मानवं परमोदारमस्त्रं परमभास्वरम्।
 चिक्षेप परमक्रुद्धो मारीचोरसि राघवः॥१७॥

ऐसा कहकर वेगशाली श्रीराम ने अपने धनुष पर परम उदार मानवास्त्रका संधान किया। वह अस्त्र अत्यन्त तेजस्वी था। श्रीरामने बड़े रोष में भरकर मारीच की छाती में उस बाण का प्रहार किया। १६-१७॥

स तेन परमास्त्रेण मानवेन समाहतः।
सम्पूर्ण योजनशतं क्षिप्तः सागरसम्प्लवे॥१८॥

उस उत्तम मानवास्त्र का गहरा आघात लगने से मारीच पूरे सौ योजन की दूरी पर समुद्र के जल में जा गिरा॥ १८॥

विचेतनं विघूर्णन्तं शीतेषुबलपीडितम्।
निरस्तं दृश्य मारीचं रामो लक्ष्मणमब्रवीत्॥ १९॥

शीतेषु नामक मानवास्त्र से पीड़ित हो मारीच अचेत-सा होकर चक्कर काटता हुआ दूर चला जा रहा है यह देख श्रीरामने लक्ष्मणसे कहा- ॥१९॥

पश्य लक्ष्मण शीतेषु मानवं मनुसंहितम्।
मोहयित्वा नयत्येनं न च प्राणैर्वियुज्यते॥२०॥

‘लक्ष्मण! देखो, मनु के द्वारा प्रयुक्त शीतेषु नामक मानवास्त्र इस राक्षस को मूर्छित करके दूर लिये जा रहा है, किंतु उसके प्राण नहीं ले रहा है।॥ २० ॥

इमानपि वधिष्यामि निघृणान् दुष्टचारिणः।
राक्षसान् पापकर्मस्थान् यज्ञघ्नान् रुधिराशनान्॥ २१॥

‘अब यज्ञ में विघ्न डालने वाले इन दूसरे निर्दय, दुराचारी, पापकर्मी एवं रक्तभोजी राक्षसों को भी मार गिराता हूँ’॥ २१॥

इत्युक्त्वा लक्ष्मणं चाशु लाघवं दर्शयन्निव।
विगृह्य सुमहच्चास्त्रमाग्नेयं रघुनन्दनः॥२२॥
सुबाहूरसि चिक्षेप स विद्धः प्रापतद् भुवि।
 शेषान् वायव्यमादाय निजघान महायशाः।
राघवः परमोदारो मुनीनां मुदमावहन्॥ २३॥

लक्ष्मण से ऐसा कहकर रघुनन्दन श्रीराम ने अपने हाथ की फुर्ती दिखाते हुए-से शीघ्र ही महान् आग्नेयास्त्र का संधान करके उसे सुबाहु की छाती पर चलाया । उसकी चोट लगते ही वह मरकर पृथ्वी पर गिर पड़ा। फिर महायशस्वी परम उदार रघुवीर ने वायव्यास्त्र लेकर शेष निशाचरों का भी संहार कर डाला और मुनियों को परम आनन्द प्रदान किया। २३॥

स हत्वा राक्षसान् सर्वान् यज्ञघ्नान् रघुनन्दनः।
ऋषिभिः पूजितस्तत्र यथेन्द्रो विजये पुरा॥२४॥

इस प्रकार रघुकुलनन्दन श्रीराम यज्ञ में विघ्न डालने वाले समस्त राक्षसों का वध करके वहाँ ऋषियों द्वारा उसी प्रकार सम्मानित हुए जैसे पूर्वकाल में देवराज इन्द्र असुरों पर विजय पाकर महर्षियों द्वारा पूजित हुए थे॥ २४॥

अथ यज्ञे समाप्ते तु विश्वामित्रो महामुनिः।
निरीतिका दिशो दृष्ट्वा काकुत्स्थमिदमब्रवीत्॥ २५॥

यज्ञ समाप्त होने पर महामुनि विश्वामित्र ने सम्पूर्ण दिशाओं को विघ्न-बाधाओं से रहित देख श्रीरामचन्द्रजीसे कहा- ॥ २५ ॥

कृतार्थोऽस्मि महाबाहो कृतं गुरुवचस्त्वया।
सिद्धाश्रममिदं सत्यं कृतं वीर महायशः।
 स हि रामं प्रशस्यैवं ताभ्यां संध्यामुपागमत्॥ २६॥

‘महाबाहो! मैं तुम्हें पाकर कृतार्थ हो गया। तुमने गुरु की आज्ञा का पूर्णरूप से पालन किया। महायशस्वी वीर! तुमने इस सिद्धाश्रम का नाम सार्थक कर दिया।’ इस प्रकार श्रीरामचन्द्रजी की प्रशंसा करके मुनि ने उन दोनों भाइयों के साथ संध्योपासना की॥२६॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे त्रिंशः सर्गः॥३०॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥३०॥

बालकाण्ड सर्ग- २१-३०

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बालकाण्ड सर्ग- २१-३०

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