वाल्मीकि रामायण- अरण्यकाण्ड सर्ग- ३४-४४

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॥ श्री गणेशाय नमः ॥
॥ श्री कमलापति नम: ॥
॥ श्री जानकीवल्लभो विजयते ॥
॥ श्री वाल्मीकि रामायण ॥
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वाल्मीकि रामायण
(भावार्थ सहित)
सब एक ही स्थान पर

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अरण्यकाण्ड सर्ग- ३४-४४

अरण्यकाण्डम्
चतुस्त्रिंशः सर्गः (सर्ग 34)

( रावण के पूछने पर शर्पणखा का उससे राम, लक्ष्मण और सीता का परिचय देते हुए सीता को भार्या बनाने के लिये उसे प्रेरित करना )

श्लोक:
ततः शूर्पणखां दृष्ट्वा ब्रुवन्तीं परुषं वचः।
अमात्यमध्ये संक्रुद्धः परिपप्रच्छ रावणः॥१॥

भावार्थ :-
शूर्पणखा को इस प्रकार कठोर बातें कहती देख मन्त्रियों के बीच में बैठे हुए रावण ने अत्यन्त कुपित होकर पूछा-॥१॥

श्लोक:
कश्च रामः कथंवीर्यः किंरूपः किंपराक्रमः।
किमर्थं दण्डकारण्यं प्रविष्टश्च सुदुस्तरम्॥२॥

भावार्थ :-
‘राम कौन है? उसका बल कैसा है? रूप और पराक्रम कैसे हैं? अत्यन्त दुस्तर दण्डकारण्य में उसने किस लिये प्रवेश किया है?॥२॥

श्लोक:
आयुधं किं च रामस्य येन ते राक्षसा हताः।
खरश्च निहतः संख्ये दूषणस्त्रिशिरास्तथा॥
[तत्त्वं ब्रूहि मनोज्ञाङ्गि केन त्वं च विरूपिता]॥३॥

भावार्थ :-
‘राम के पास कौन-सा ऐसा अस्त्र है, जिससे वे सब राक्षस मारे गये तथा युद्ध में खर, दूषण और त्रिशिरा का भी संहार हो गया॥३॥

श्लोक:
इत्युक्ता राक्षसेन्द्रेण राक्षसी क्रोधमूर्च्छिता।
ततो रामं यथान्यायमाख्यातुमुपचक्रमे।॥४॥

भावार्थ :-
‘मनोहर अङ्गों वाली शूर्पणखे! ठीक-ठीक बताओ, किसने तुम्हें कुरूप बनाया है—किसने तुम्हारी नाक और कान काट डाले हैं?’ राक्षसराज रावण के इस प्रकार पूछने पर वह राक्षसी क्रोध से अचेत-सी हो उठी॥४॥

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वाल्मीकि रामायण- अरण्यकाण्ड सर्ग- ३५

अरण्यकाण्डम्
पञ्चत्रिंशः सर्गः (सर्ग 35)

( रावण का समुद्रतटवर्ती प्रान्त की शोभा देखते हुए पुनः मारीच के पास जाना )

श्लोक:
ततः शूर्पणखावाक्यं तच्छ्रुत्वा रोमहर्षणम्।
सचिवानभ्यनुज्ञाय कार्यं बुद्ध्वा जगाम ह॥१॥

भावार्थ :-
शूर्पणखा की ये रोंगटे खड़ी कर देने वाली बातें सुनकर रावण मन्त्रियों से सलाह ले अपने कर्तव्य का निश्चय करके वहाँ से चल दिया॥१॥

श्लोक:
तत् कार्यमनुगम्यान्तर्यथावदुपलभ्य च।
दोषाणां च गुणानां च सम्प्रधार्य बलाबलम्॥२॥
इति कर्तव्यमित्येव कृत्वा निश्चयमात्मनः।
स्थिरबुद्धिस्ततो रम्यां यानशालां जगाम ह॥३॥

भावार्थ :-
उसने पहले सीताहरणरूपी कार्य पर मन-ही-मन विचार किया। फिर उसके दोषों और गुणों का यथावत् ज्ञान प्राप्त करके बलाबल का निश्चय किया। अन्त में यह स्थिर किया कि इस काम को करना ही चाहिये। जब इस बात पर उसकी बुद्धि जम गयी, तब वह रमणीय रथशाला में गया॥२-३॥

श्लोक:
यानशालां ततो गत्वा प्रच्छन्नं राक्षसाधिपः।
सूतं संचोदयामास रथः संयुज्यतामिति॥४॥

भावार्थ :-
गुप्त रूप से रथशाला में जाकर राक्षसराज रावण ने अपने सारथि को यह आज्ञा दी कि ‘मेरा रथ जोतकर तैयार करो’॥४॥

श्लोक:
एवमुक्तः क्षणेनैव सारथिर्लघुविक्रमः।
रथं संयोजयामास तस्याभिमतमुत्तमम्॥५॥

भावार्थ :-
सारथि शीघ्रतापूर्वक कार्य करने में कुशल था। रावण की उपर्युक्त आज्ञा पाकर उसने एक ही क्षण में उसके मन के अनुकूल उत्तम रथ जोतकर तैयार कर दिया॥५॥

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वाल्मीकि रामायण- अरण्यकाण्ड सर्ग- ३६

अरण्यकाण्डम्
षट्त्रिंशः सर्गः (सर्ग 36)

( रावण का मारीच से श्रीराम के अपराध बताकर उनकी पत्नी सीता के अपहरण में सहायता के लिये कहना )

श्लोक:
मारीच श्रूयतां तात वचनं मम भाषतः।
आर्तोऽस्मि मम चार्तस्य भवान् हि परमा गतिः॥१॥

भावार्थ :-
‘तात मारीच! मैं सब बता रहा हूँ। मेरी बात सुनो। इस समय मैं बहुत दुःखी हूँ और इस दुःख की अवस्था में तुम्हीं मुझे सबसे बढ़कर सहारा देने वाले हो॥१॥

श्लोक:
जानीषे त्वं जनस्थानं भ्राता यत्र खरो मम।
दूषणश्च महाबाहुः स्वसा शूर्पणखा च मे॥२॥
त्रिशिराश्च महाबाहू राक्षसः पिशिताशनः।
अन्ये च बहवः शूरा लब्धलक्षा निशाचराः॥३॥

भावार्थ :-
‘तुम जनस्थान को जानते हो, जहाँ मेरा भाई खर, महाबाहु दूषण, मेरी बहिन शूर्पणखा, मांसभोजी राक्षस महाबाहु त्रिशिरा तथा और भी बहुत-से लक्ष्यवेध में कुशल शूरवीर निशाचर रहा करते थे॥२-३॥

श्लोक:
वसन्ति मन्नियोगेन अधिवासं च राक्षसाः।
बाधमाना महारण्ये मुनीन् ये धर्मचारिणः॥४॥

भावार्थ :-
‘वे सभी राक्षस मेरी आज्ञा से वहाँ घर बनाकर रहते थे और उस विशाल वन में जो धर्माचरण करने वाले मुनि थे, उन्हें सताया करते थे॥४॥

श्लोक:
चतुर्दश सहस्राणि रक्षसां भीमकर्मणाम्।
शूराणां लब्धलक्षाणां खरचित्तानुवर्तिनाम्॥५॥

भावार्थ :-
‘वहाँ खर के मन का अनुसरण करने वाले तथा युद्धविषयक उत्साह से सम्पन्न चौदह हजार शूरवीर राक्षस रहते थे, जो भयंकर कर्म करने वाले थे॥५॥

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वाल्मीकि रामायण- अरण्यकाण्ड सर्ग- ३७

अरण्यकाण्डम्
सप्तत्रिंशः सर्गः (सर्ग 37)

( मारीच का रावण को श्रीरामचन्द्रजी के गुण और प्रभाव बताकर सीताहरण के उद्योग से रोकना )

श्लोक:
तच्छ्रत्वा राक्षसेन्द्रस्य वाक्यं वाक्यविशारदः।
प्रत्युवाच महातेजा मारीचो राक्षसेश्वरम्॥१॥

भावार्थ :-
राक्षसराज रावण की पूर्वोक्त बात सुनकर बातचीत करने में कुशल महातेजस्वी मारीच ने उसे इस प्रकार उत्तर दिया-॥१॥

श्लोक:
सुलभाः पुरुषा राजन् सततं प्रियवादिनः।
अप्रियस्य च पथ्यस्य वक्ता श्रोता च दुर्लभः॥२॥

भावार्थ :-
‘राजन् ! सदा प्रिय वचन बोलने वाले पुरुष तो सर्वत्र सुलभ होते हैं; परंतु जो अप्रिय होने पर भी हितकर हो, ऐसी बात के कहने और सुनने वाले दोनों ही दुर्लभ हैं॥२॥

श्लोक:
न नूनं बुध्यसे रामं महावीर्यगुणोन्नतम्।
अयुक्तचारश्चपलो महेन्द्रवरुणोपमम्॥३॥

भावार्थ :-
‘तुम कोई गुप्तचर तो रखते नहीं और तुम्हारा हृदय भी बहुत ही चञ्चल है; अतः निश्चय ही तुम श्रीरामचन्द्रजी को बिलकुल नहीं जानते। वे पराक्रमोचित गुणों में बहुत बढ़े-चढ़े तथा इन्द्र और वरुण के समान हैं॥३॥

श्लोक:
अपि स्वस्ति भवेत् तात सर्वेषामपि रक्षसाम्।
अपि रामो न संक्रुद्धः कुर्याल्लोकानराक्षसान्॥४॥

भावार्थ :-
‘तात! मैं तो यही चाहता हूँ कि समस्त राक्षसों का कल्याण हो। कहीं ऐसा न हो कि श्रीरामचन्द्रजी अत्यन्त कुपित हो समस्त लोकों को राक्षसों से शून्य कर दें?॥४॥

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वाल्मीकि रामायण- अरण्यकाण्ड सर्ग- ३८

अरण्यकाण्डम्
अष्टात्रिंशः सर्गः (सर्ग 38)

( श्रीराम की शक्ति के विषय में अपना अनुभव बताकर मारीच का रावण को उनका अपराध करने से मना करना )

श्लोक:
कदाचिदप्यहं वीर्यात् पर्यटन् पृथिवीमिमाम्।
बलं नागसहस्रस्य धारयन् पर्वतोपमः॥१॥

भावार्थ :-
‘एक समय की बात है कि मैं अपने पराक्रम के अभिमान में आकर पर्वत  के समान शरीर धारण किये इस पृथ्वीपर चक्कर लगा रहा था। उस समय मुझमें एक हजार हाथियोंका बल था॥१॥

श्लोक:
नीलजीमूतसंकाशस्तप्तकाञ्चनकुण्डलः।
भयं लोकस्य जनयन् किरीटी परिघायुधः॥२॥
व्यचरन् दण्डकारण्यमृषिमांसानि भक्षयन्।

भावार्थ :-
‘मेरा शरीर नील मेघ के समान काला था। मैंने कानों में पक्के सोने के कुण्डल पहन रखे थे। मेरे मस्तक पर किरीट था और हाथ में परिघ मैं ऋषियों के मांस खाता और समस्त जगत् के मन में भय उत्पन्न करता हुआ दण्डकारण्य में विचर रहा था॥२ १/२॥

श्लोक:
विश्वामित्रोऽथ धर्मात्मा मद्वित्रस्तो महामुनिः॥३॥
स्वयं गत्वा दशरथं नरेन्द्रमिदमब्रवीत्।

भावार्थ :-
‘उन दिनों धर्मात्मा महामुनि विश्वामित्र को मुझसे बड़ा भय हो गया था। वे स्वयं राजा दशरथ के पास गये और उनसे इस प्रकार बोले-॥३ १/२॥

श्लोक:
अयं रक्षतु मां रामः पर्वकाले समाहितः॥४॥
मारीचान्मे भयं घोरं समुत्पन्नं नरेश्वर।

भावार्थ :-
‘नरेश्वर! मुझे मारीच नामक राक्षस से घोर भय प्राप्त हुआ है, अतः ये श्रीराम मेरे साथ चलें और पर्व के दिन एकाग्रचित्त हो मेरी रक्षा करें’॥४ १/२॥

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वाल्मीकि रामायण- अरण्यकाण्ड सर्ग- ३९

अरण्यकाण्डम्
एकोनचत्वारिंशः सर्गः (सर्ग 39)

( मारीच का रावण को समझाना )

श्लोक:
एवमस्मि तदा मुक्तः कथंचित् तेन संयुगे।
इदानीमपि यद् वृत्तं तच्छृणुष्व यदुत्तरम्॥१॥

भावार्थ :-
‘इस प्रकार इस समय तो मैं किसी तरह श्रीरामचन्द्रजी के हाथ से जीवित बच गया। उसके बाद इन दिनों जो घटना घटित हुई है, उसे भी सुन लो॥१॥

श्लोक:
राक्षसाभ्यामहं द्वाभ्यामनिर्विण्णस्तथाकृतः।
सहितो मृगरूपाभ्यां प्रविष्टो दण्डकावने॥२॥

भावार्थ :-
‘श्रीराम ने मेरी वैसी दुर्दशा कर दी थी, तो भी मैं उनके विरोध से बाज नहीं आया। एक दिन मृगरूपधारी दो राक्षसों के साथ मैं भी मृग का ही रूप धारण करके दण्डक वन में गया॥२॥

श्लोक:
दीप्तजिह्वो महादंष्ट्रस्तीक्ष्णशृङ्गो महाबलः।
व्यचरन् दण्डकारण्यं मांसभक्षो महामृगः॥३॥

भावार्थ :-
‘मैं महान् बलशाली तो था ही, मेरी जीभ आग के समान उद्दीप्त हो रही थी। दाढ़ें भी बहुत बड़ी थीं,सींग तीखे थे और मैं महान् मृग के रूपमें मांस खाता हुआ दण्डकारण्य में विचरने लगा॥३॥

श्लोक:
अग्निहोत्रेषु तीर्थेषु चैत्यवृक्षेषु रावण।
अत्यन्तघोरो व्यचरंस्तापसांस्तान् प्रधर्षयन्॥४॥

भावार्थ :-
‘रावण! मैं अत्यन्त भयंकर रूप धारण किये अग्निशालाओं में, जलाशयों के घाटों पर तथा देववृक्षों के नीचे बैठे हुए तपस्वीजनों को तिरस्कृत करता हुआ सब ओर विचरण करने लगा॥४॥

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वाल्मीकि रामायण- अरण्यकाण्ड सर्ग- ४०

अरण्यकाण्डम्
चत्वारिंशः सर्गः (सर्ग 40)

( रावण का मारीच को फटकारना और सीताहरण के कार्य में सहायता करने की आज्ञा देना )

श्लोक:
मारीचस्य तु तद् वाक्यं क्षमं युक्तं च रावणः।
उक्तो न प्रतिजग्राह मर्तुकाम इवौषधम्॥१॥

भावार्थ :-
मारीच का वह कथन उचित और मानने योग्य था तो भी जैसे मरने की इच्छावाला रोगी दवा नहीं लेता, उसी प्रकार उसके बहुत कहने पर भी रावण ने उसकी बात नहीं मानी॥१॥

श्लोक:
तं पथ्यहितवक्तारं मारीचं राक्षसाधिपः।
अब्रवीत् परुषं वाक्यमयुक्तं कालचोदितः॥२॥

भावार्थ :-
काल से प्रेरित हुए उस राक्षसराज ने यथार्थ और हित की बात बताने वाले मारीच से अनुचित और कठोर वाणी में कहा-॥२॥

श्लोक:
दुष्कुलैतदयुक्तार्थं मारीच मयि कथ्यते।
वाक्यं निष्फलमत्यर्थं बीजमुप्तमिवोषरे॥३॥

भावार्थ :-
‘दूषित कुल में उत्पन्न मारीच! तुमने मेरे प्रति जो ये अनाप-शनाप बातें कही हैं, ये मेरे लिये अनुचित और असंगत हैं, ऊसर में बोये हुए बीज के समान अत्यन्त निष्फल हैं॥३॥

श्लोक:
त्वद्वाक्यैर्न तु मां शक्यं भेत्तुं रामस्य संयुगे।
मूर्खस्य पापशीलस्य मानुषस्य विशेषतः॥४॥

भावार्थ :-
‘तुम्हारे इन वचनों द्वारा मूर्ख, पापाचारी और विशेषतः मनुष्य राम के साथ युद्ध करने अथवा उसकी स्त्री का अपहरण करने के निश्चय से मुझे विचलित नहीं किया जा सकता॥४॥

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वाल्मीकि रामायण- अरण्यकाण्ड सर्ग- ४१

अरण्यकाण्डम्
एकचत्वारिंशः सर्गः (सर्ग 41)

( मारीच का रावण को विनाश का भय दिखाकर पुनः समझाना )

श्लोक:
आज्ञप्तो रावणेनेत्थं प्रतिकूलं च राजवत्।
अब्रवीत् परुषं वाक्यं निःशङ्को राक्षसाधिपम्॥१॥

भावार्थ :-
रावण ने जब राजा की भाँति उसे ऐसी प्रतिकूल आज्ञा दी, तब मारीच ने निःशङ्क होकर उस राक्षसराज से कठोर वाणी में कहा-॥१॥

श्लोक:
केनायमुपदिष्टस्ते विनाशः पापकर्मणा।
सपुत्रस्य सराज्यस्य सामात्यस्य निशाचर॥२॥

भावार्थ :-
‘निशाचर! किस पापी ने तुम्हें पुत्र, राज्य और मन्त्रियों सहित तुम्हारे विनाश का यह मार्ग बताया है?॥२॥

श्लोक:
कस्त्वया सुखिना राजन् नाभिनन्दति पापकृत्।
केनेदमुपदिष्टं ते मृत्युद्वारमुपायतः॥३॥

भावार्थ :-
‘राजन्! कौन ऐसा पापाचारी है, जो तुम्हें सुखी देखकर प्रसन्न नहीं हो रहा है? किसने युक्ति से तुम्हें मौत के द्वार पर जाने की यह सलाह दी है?॥३॥

श्लोक:
शत्रवस्तव सुव्यक्तं हीनवीर्या निशाचर।
इच्छन्ति त्वां विनश्यन्तमुपरुद्धं बलीयसा॥४॥

भावार्थ :-
‘निशाचर! आज यह बात स्पष्ट रूप से ज्ञात हो गयी कि तुम्हारे दुर्बल शत्रु तुम्हें किसी बलवान् से भिड़ाकर नष्ट होते देखना चाहते हैं॥४॥

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वाल्मीकि रामायण- अरण्यकाण्ड सर्ग- ४२

अरण्यकाण्डम्
द्विचत्वारिंशः सर्गः (सर्ग 42)

( मारीच का सुवर्णमय मृगरूप धारण करके श्रीराम के आश्रम पर जाना और सीता का उसे देखना )

श्लोक:
एवमुक्त्वा तु परुषं मारीचो रावणं ततः।
गच्छावेत्यब्रवीद् दीनो भयाद रात्रिंचरप्रभोः॥१॥

भावार्थ :-
रावण से इस प्रकार कठोर बातें कहकर उस निशाचरराज के भय से दुःखी हुए मारीच ने कहा- ’चलो चलें॥१॥

श्लोक:
दृष्टश्चाहं पुनस्तेन शरचापासिधारिणा।
मद्धोद्यतशस्त्रेण निहतं जीवितं च मे॥२॥

भावार्थ :-
‘मेरे वध के लिये जिनका हथियार सदा उठा ही रहता है, उन धनुष-बाण और तलवार धारण करने वाले श्रीरामचन्द्रजी ने यदि फिर मुझे देख लिया तो मेरे जीवन का अन्त निश्चित है॥२॥

श्लोक:
नहि रामं पराक्रम्य जीवन् प्रतिनिवर्तते।
वर्तते प्रतिरूपोऽसौ यमदण्डहतस्य ते॥३॥

भावार्थ :-
‘श्रीरामचन्द्रजी के साथ पराक्रम दिखाकर कोई जीवित नहीं लौटता है। तुम यमदण्ड से मारे गये हो (इसीलिये उनसे भिड़ने की बात सोचते हो)। वे श्रीरामचन्द्रजी तुम्हारे लिये यमदण्ड के ही समान हैं॥३॥

श्लोक:
किं नु कर्तुं मया शक्यमेवं त्वयि दुरात्मनि।
एष गच्छाम्यहं तात स्वस्ति तेऽस्तु निशाचर॥४॥

भावार्थ :-
‘परंतु जब तुम इस प्रकार दुष्टतापर उतारू हो गये, तब मैं क्या कर सकता हूँ लो, यह मैं चलता हूँ। तात निशाचर! तुम्हारा कल्याण हो’॥४॥

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वाल्मीकि रामायण- अरण्यकाण्ड सर्ग- ४३

अरण्यकाण्डम्
त्रिचत्वारिंशः सर्गः (सर्ग 43)

( कपटमृग को देखकर लक्ष्मण का संदेह, सीता का उस मृग को ले आने के लिये श्रीराम को प्रेरित करना, लक्ष्मण को सीता की रक्षा का भार सौंप राम का मृग के लिये जाना )

श्लोक:
सा तं सम्प्रेक्ष्य सुश्रोणी कुसुमानि विचिन्वती।
हेमराजतवर्णाभ्यां पार्वाभ्यामुपशोभितम्॥१॥
प्रहृष्टा चानवद्याङ्गी मृष्टहाटकवर्णिनी।
भर्तारमपि चक्रन्द लक्ष्मणं चैव सायुधम्॥२॥

भावार्थ :-
वह मृग सोने और चाँदी के समान कान्तिवाले पार्श्व-भागों से सुशोभित था। शुद्ध सुवर्ण के समान कान्ति तथा निर्दोष अङ्गोंवाली सुन्दरी सीता फूल चुनते-चुनते ही उस मृग को देखकर मन-ही-मन बहुत प्रसन्न हुईं और अपने पति श्रीराम तथा देवर लक्ष्मण को हथियार लेकर आने के लिये पुकारने लगीं॥१-२॥

श्लोक:
आहूयाहूय च पुनस्तं मृगं साधु वीक्षते।
आगच्छागच्छ शीघ्रं वै आर्यपुत्र सहानुज॥३॥

भावार्थ :-
वे बार-बार उन्हें पुकारती और फिर उस मृग को अच्छी तरह देखने लगती थीं। वे बोलीं, ‘आर्यपुत्र! अपने भाई के साथ आइये, शीघ्र आइये’॥३॥

श्लोक:
तावाहूतौ नरव्याघ्रौ वैदेह्या रामलक्ष्मणौ।
वीक्षमाणौ तु तं देशं तदा ददृशतुगम्॥४॥

भावार्थ :-
विदेहकुमारी सीता के द्वारा पुकारे जाने पर नरश्रेष्ठ श्रीराम और लक्ष्मण वहाँ आये और उस स्थान पर सब ओर दृष्टि डालते हुए उन्होंने उस समय उस मृग को देखा॥४॥

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वाल्मीकि रामायण- अरण्यकाण्ड सर्ग- ४४

अरण्यकाण्डम्
चतुश्चत्वारिंशः सर्गः (सर्ग 44)

( श्रीराम के द्वारा मारीच का वध और उसके द्वारा सीता और लक्ष्मण के पुकारने का शब्द सुनकर श्रीराम की चिन्ता )

श्लोक:
तथा तु तं समादिश्य भ्रातरं रघुनन्दनः।
बबन्धासिं महातेजा जाम्बूनदमयत्सरुम्॥१॥

भावार्थ :-
लक्ष्मण को इस प्रकार आदेश देकर रघुकुल का आनन्द बढ़ाने वाले महातेजस्वी श्रीरामचन्द्रजी ने सोने की गूंठवाली तलवार कमर में बाँध ली॥१॥

श्लोक:
ततस्त्रिविनतं चापमादायात्मविभूषणम्।
आबध्य च कपालौ द्वौ जगामोदग्रविक्रमः॥२॥

भावार्थ :-
तत्पश्चात् महापराक्रमी रघुनाथजी तीन स्थानों में झुके हुए अपने आभूषण रूप धनुष को हाथ में ले पीठ पर दो तरकस बाँधकर वहाँ से चल दिये॥२॥

श्लोक:
तं वन्यराजो राजेन्द्रमापतन्तं निरीक्ष्य वै।
बभूवान्तर्हितस्त्रासात् पुनः संदर्शनेऽभवत्॥३॥

भावार्थ :-
राजाधिराज श्रीराम को आते देख वह वन्य मृगों का राजा काञ्चनमृग भय के मारे छिप गया, किंतु फिर तुरंत ही उनके दृष्टिपथ में आ गया॥३॥

श्लोक:
बद्धासिर्धनुरादाय प्रदुद्राव यतो मृगः।
तं स्म पश्यति रूपेण द्योतयन्तमिवाग्रतः॥४॥
अवेक्ष्यावेक्ष्य धावन्तं धनुष्पाणिर्महावने।
अतिवृत्तमिवोत्पाताल्लोभयानं कदाचन॥५॥
शङ्कितं तु समुद्घान्तमुत्पतन्तमिवाम्बरम्।
दृश्यमानमदृश्यं च वनोद्देशेषु केषुचित्॥६॥
छिन्नाभैरिव संवीतं शारदं चन्द्रमण्डलम्।
मुहूर्तादेव ददृशे मुहर्दूरात् प्रकाशते॥७॥

भावार्थ :-
तब तलवार बाँधे और धनुष लिये श्रीराम जिस ओर वह मृग था, उसी ओर दौड़े। धनुर्धर श्रीराम ने देखा, वह अपने रूप से सामने की दिशा को प्रकाशित सी कर रहा था। उस महान् वन में वह पीछे की ओर देख-देखकर आगे की ओर भाग रहा था। कभी छलाँगें मारकर बहुत दूर निकल जाता और कभी इतना निकट दिखायी देता कि हाथ से पकड़ लेने का लोभ पैदा कर देता था। कभी डरा हुआ, कभी घबराया हुआ और कभी आकाश में उछलता हुआ दीख पड़ता था। कभी वन के किन्हीं स्थानों में छिपकर अदृश्य हो जाता था, मानो शरद्-ऋतु का चन्द्रमण्डल मेघखण्डों से आवृत हो गया हो। एक ही मुहूर्त में वह निकट दिखायी देता और पुनः बहुत दूर के स्थान चमक उठता था॥४–७॥

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