ज्योतिष शास्त्र | Jyotish Shaastr


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ज्योतिष शास्त्र

ज्योतिष शास्त्र और आपका स्वास्थ्य

ज्योतिष शास्त्र मे कुंडली के 12 भाव होते हैं। कैसे ज्योतिष द्वारा रोग के आंकलन करते समय कुंडली के विभिन्न भावों से गणना करते हैं शास्त्रों मे कुण्डली को कालपुरुष की संज्ञा देकर इसमें शरीर के अंगों को स्थापित कर उनसे रोग, रोगेश, रोग को बढ़ाने व घटाने वाले ग्रह तथा रोग की स्थिति में उत्प्रेरक का कार्य करने वाले ग्रह, आयुर्वेदिक/ऐलोपैथी/होमियोपैथी में से कौन कारगर होगा इसका आँकलन, रक्त विकार, रक्त और आपरेशन की स्थिति, कौन सा आंतरिक या बाहरी अंग प्रभावित होगा इत्यादि गणना करने में कुंडली का मुख्य प्रयोग किया जाता है।

यह स्वंय शिवजी द्वारा माता जगदम्बा से कही गई एक पवित्र कथा है। आप भी विस्तार पूर्वक पढ़े:
शिव-शक्ति श्रीराम मिलन (संपूर्ण भाग) 🌞

प्रथम भाव:-
इस भाव से हम किसी भी व्यक्ति की रोगप्रतिरोधक क्षमता, सिर, मष्तिस्क का विचार करते हैं।

द्वितीय भाव:-
इससे हम दाहिना नेत्र, मुख, वाणी, नाक, गर्दन व गले के ऊपरी भाग का विचार होता है।

तृतीय भाव:-
अस्थि, गला, कान, हाथ, कंधे व छाती के आंतरिक अंगों का शुरुआती भाग इत्यादि का विचार करते है।

चतुर्थ भाव:- छाती व इसके आंतरिक अंग, जातक की मानसिक स्थिति/प्रकृति, स्तन आदि की गणना की जाती है।

पंचम भाव:-
यह जातक की बुद्धि व उसकी तीव्रता, पीठ, पसलियां, पेट, हृदय की स्थिति आंकलन में प्रयोग होता है।

षष्ठ भाव:-
इसको रोग भाव कहा जाता है। कुंडली मे इसके तत्कालिक भाव स्वामी, कालपुरुष कुंडली के स्वामी, दृष्टि संबंध, रोगेश की स्थिति, रोगेश के नक्षत्र औऱ रोगेश व भाव की डिग्री इत्यादि। घाव, स्वाद, नाभी, औऱ पेट व इसके आंतरिक अंगों की गणना छठे भाव से होती है। छठे भाव का स्वामी किस भाव पर दृष्टि डाल रहा है। नक्षत्र इत्यादि से प्रभावित कर रहा है। मुख्यतः इससे ही शरीर के विभिन्न रोगों का अध्यन होता है।

सप्तम भाव:-
इससे हम जातक के मूत्राशय, कमर, जातिका के जनन अंगों के अध्ययन के लिए प्रयोग करते है। यह महिलाओं के रोगों की गणना का केंद्र है।

अष्टम भाव:-
इस भाव से आयु, जननेन्द्रियां, मृत्यु, मलद्वार, गुप्तांगों, रोग की गहराई/जटिलता का आँकलन किया जाता है।

नवम भाव:-
से वात पित्त रोग, जाँघ दशम भाव-नींद, घुटना आदि का ऑंकलन किया जाता है।

एकादश भाव:-
एकादश भाव से पिंडलियों, बायां कान, टखनों का विचार करते हैं।

द्वादश भाव:-
बायां नेत्र, पँजे इत्यादि द्वादश भाव को व्यय भाव व भाव स्वामी को व्ययेश भी कहते हैं इस की स्थिति से, दृष्टि संबंध, भाव स्वामित्व, अंशों इत्यादि की गणना, अंगहीनता, आपरेशन इत्यादि में अंग को निकालने/व्यय/खर्च का अध्यन इस भाव, भावेश की स्थिति से होगा।

कुंडली अध्यन एक क्लिष्ट /कठिन प्रक्रिया है। जिसका अध्यन करते-करते और अनुभव के आधार पर फल कथन में सटीकता आती जाती है। यहां पर विस्तार से रोग और ज्योतिष की चर्चा करना संभव नहीं है। हमारा उद्देश्य मात्र लोगों को ज्योतिष के वैज्ञानिक पहलुओं से परिचित कराना था। हमारे ग्रंथों का विदेशी आक्रमणकारियों ने बहुत नुकसान किया है जिस कारण कई महत्वपूर्ण ग्रन्थ अब अस्तित्व में ही नहीं है। पर ज्योतिष विज्ञान में अनंत संभावनाएं हैं। लोग जब चर्चा करेंगे तभी कुछ सीखने को मिलेगा।

गर्व करिये कि हम एक उन्नत समाज और वैज्ञानिक जीवनशैली का पालन करने वाले लोग हैं। जिनके पूर्वजों ने हज़ारो वर्षों पूर्व ही ज्योतिष औऱ खगोल शास्त्र जैसे विषयों पर सूक्ष्मता पूर्ण अध्यन कर हमें संसार की हर सभ्यता से आगे रखा है।

हस्त रेखा शास्त्र

हम बिना जन्मपत्री, कुंडली, ज्योतिष के आप भी यह जान सकते हैं कि कौन सा ग्रह आपको अनुकूल या प्रतिकूल प्रभाव प्रदान कर रहा है, हमारे ऋषियों ने इसके लिए हथेली के पर्वत से इसका समाधान निकाला है। प्रत्येक हथेली में नौ क्षेत्र महत्वपूर्ण है। जो निम्न प्रकार है:

🖐 बृहस्पति का पर्वत – आध्यात्मिकता

🖐 शनि का पर्वत – गंभीरता

🖐 सूर्य का पर्वत – प्रतिष्ठा

🖐 बुध का पर्वत – वाणिज्य

🖐 मंगल ग्रह उंचा पर्वत – जीवन शक्ति

🖐 चंद्रमा का पर्वत – कल्पना

🖐 शुक्र का पर्वत – प्रेम

🖐 मंगल ग्रह निम्न पर्वत – क्रोध

हस्त रेखा में नक्षत्र या तारा और उनके प्रभाव

  1. यदि गुरु पर्वत पर नक्षत्र का चिन्ह हो, तो वह व्यक्ति पूर्ण सफलता प्राप्त करता हैं।
  2. यदि शनि पर्वत पर यह चिन्ह हो तो, ऐसा व्यक्ति तंत्र-मंत्र गुह्यविधायो का ज्ञाता होता हैं।
  3. यदि सूर्य पर्वत पर नक्षत्र हो तो पूर्ण धन लाभ होता हैं और प्रसिद्धि प्राप्त होती हैं।
  4. यदि बुध पर्वत पर नक्षत्र या तारा हो तो व्यापारिक तथा उच्च कोटि का वैज्ञानिक उपलब्धि प्राप्त करता हैं।
  5. यदि केतु पर्वत पर हो तो उस व्यक्ति का बचपन अत्यन्त सुख में बीतता हैं।
  6. यदि शुक्र पर्वत पर हो तो कामुकता व भोग की सामग्रियों से सम्पन्न होता हैं।
  7. मंगल पर्वत पर नक्षत्र का चिन्ह हो तो वह व्यक्ति साहसी होता हैं अपने पराक्रम से प्रतिष्ठा प्राप्त करता हैं।
  8. यदि राहु पर्वत पर हो तो हमेशा भाग्य साथ देता हैं ऐसा व्यति जुआ में सफलता प्राप्त कर सकता हैं।
  9. चन्द्र पर्वत पर इस प्रकार का चिन्ह हो तो व्यक्ति साधक होता हैं या विशिष्ट होता हैं।
  10. यदि विवाह रेखा पर नक्षत्र तारे का चिन्ह हो, तो उस व्यक्ति के विवाह में कई प्रकार की बाधाएं आती हैं।
  11. यदि ह्रदय रेखा पर नक्षत्र चिन्ह हो, तो ह्रदय रोग एवं प्रेम में आघात होता हैं।
  12. यदि मस्तिष्क रेखा पर हो तो व्यक्ति को मानसिक आघात या शिरोरोग से पीड़ित होता हैं।
  13. तर्जनी उँगली पर अगर हो तो यह चिन्ह सभी प्रकार से शुभ माना गया हैं।

कालसर्प दोष

कुंडली शास्त्र मे कालसर्प दोष का विस्तार पूर्वक निवारण उपलब्ध है। परन्तु किसी कुंडली के जानकार व्यक्ति से ही कालसर्प दोष का निवारण कराया जाना चाहिए। परन्तु कुछ सरल उपायों से भी व्यक्ति अपने दुख तथा समस्याओं में कमी कर सकता है।

  1. राहु तथा केतु के मंत्रों का जाप करें या करवाएं-
    राहु मंत्र : ॐ भ्रां भ्रीं भ्रौं स: राहवे नम:
    केतु मंत्र : ॐ स्त्रां स्त्रीं स्त्रौं स: केतवे नम:।
  2. सर्प मंत्र या नाग गायत्री के जाप करें या करवाएं।
    सर्प मंत्र- ॐ नागदेवताय नम:
    नाग गायत्री मंत्र- ॐ नवकुलाय विद्यमहे विषदंताय धीमहि तन्नो सर्प: प्रचोदयात्
  3. ऐसे शिवलिंग (शिव मंदिर में) जहां ॐ शिवजी पर नाग न हो, प्रतिष्ठा करवाकर नाग चढ़ाएं।
  4. श्रीमद् भागवत और श्री हरिवंश पुराण का पाठ करवाते रहें।
  5. दुर्गा पाठ करें या करवाएं।
  6. भैरव उपासना करें।
  7. श्री महामृत्युंजय मंत्र का जाप करने से राहु-केतु का असर खत्म होगा।
  8. राहु-केतु के असर को खत्म करने के लिए रामबाण है- पाशुपतास्त्र का प्रयोग।
  9. पितृ शांति का उपाय करें।
  10. घर में फिटकरी, समुद्री नमक तथा देशी गाय का गौमूत्र मिलाकर रोज पोंछा लगाएं तथा गुग्गल की धूप दें।
  11. नागपंचमी को सपेरे से नाग लेकर जंगल में छुड़वाएं।
  12. घर में बड़ों का आशीर्वाद लें तथा किसी का दिल न दुखाएं और न अपमान करें।

कुछ आदतें जिसे बदलना अति आवश्यक है।

१. सूर्य:- जुठे हाथ सिर पर लगाने से सूर्य खराब होती है।
२. चंद्र:- पानी व्यर्थ फैलाने से चंद्र खराब होती है।
३. मंगल:- क्रोध करने से मंगल खराब होती है।
४. बुध:- झूठ बोलने से बुध खराब होती है।
५. गुरु:- बड़ो का सम्मान न करने से गुरु खराब होती है।
६. शुक्र:- पत्नी या स्त्री का सम्मान न करने से शुक्र खराब होती है।
७. शनि:- आलस्य करने से शनि खराब होती है।
८. राहु:- चुगली करने से राहु खराब होती है।
९. केतु:- किसी भिखारी या भिछु का मजाक उड़ाने से केतु खराब होता है।
आदत बदलने से सारे ग्रह गोचर प्रसन्न रहते हैं

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