॥ श्री गणेशाय नमः ॥
॥ श्री कमलापति नम: ॥
॥ श्री जानकीवल्लभो विजयते ॥
॥ श्री वाल्मीकि रामायण ॥
(भावार्थ सहित)
सब एक ही स्थान पर
अरण्यकाण्ड सर्ग- ४५-५५
अरण्यकाण्डम्
पञ्चचत्वारिंशः सर्गः (सर्ग 45)
( सीता के मार्मिक वचनों से प्रेरित होकर लक्ष्मण का श्रीराम के पास जाना )
श्लोक:
आर्तस्वरं तु तं भर्तुर्विज्ञाय सदृशं वने।
उवाच लक्ष्मणं सीता गच्छ जानीहि राघवम्॥१॥
भावार्थ :-
उस समय वन में जो आर्तनाद हुआ, उसे अपने पति के स्वर से मिलता-जुलता जान श्रीसीताजी लक्ष्मण से बोलीं- ’भैया! जाओ, श्रीरघुनाथजी की सुधि लो- उनका समाचार जानो॥१॥
श्लोक:
नहि मे जीवितं स्थाने हृदयं वावतिष्ठते।
क्रोशतः परमार्तस्य श्रुतः शब्दो मया भृशम्॥२॥
भावार्थ :-
‘उन्होंने बड़े आर्तस्वर से हमलोगों को पुकारा है। मैंने उनका वह शब्द सुना है। वह बहुत उच्च स्वर से बोला गया था। उसे सुनकर मेरे प्राण और मन अपने स्थान पर नहीं रह गये हैं- मैं घबरा उठी हूँ॥२॥
श्लोक:
आक्रन्दमानं तु वने भ्रातरं त्रातुमर्हसि।
तंक्षिप्रमभिधाव त्वं भ्रातरं शरणैषिणम्॥३॥
रक्षसां वशमापन्नं सिंहानामिव गोवृषम्।
न जगाम तथोक्तस्तु भ्रातुराज्ञाय शासनम्॥४॥
भावार्थ :-
‘तुम्हारे भाई वन में आर्तनाद कर रहे हैं। वे कोई शरण-रक्षा का सहारा चाहते हैं। तुम उन्हें बचाओ। ङ्के जल्दी ही अपने भाई के पास दौड़े हुए जाओ। जैसे कोई साँड सिंहों के पंजे में फँस गया हो, उसी प्रकार वे राक्षसों के वश में पड़ गये हैं, अतः जाओ।’ सीताके ऐसा कहने पर भी भाई के आदेश का विचार करके लक्ष्मण नहीं गये॥३-४॥
श्लोक:
तमुवाच ततस्तत्र क्षुभिता जनकात्मजा।
सौमित्रे मित्ररूपेण भ्रातुस्त्वमसि शत्रुवत्॥५॥
यस्त्वमस्यामवस्थायां भ्रातरं नाभिपद्यसे।
इच्छसि त्वं विनश्यन्तं रामं लक्ष्मण मत्कृते॥६॥
भावार्थ :-
उनके इस व्यवहार से वहाँ जनककिशोरी सीता क्षुब्ध हो उठीं और उनसे इस प्रकार बोलीं- ’सुमित्राकुमार! तुम मित्र रूप में अपने भाई के शत्रु ही जान पड़ते हो, इसीलिये तुम इस संकट की अवस्था में भी भाई के पास नहीं पहुंच रहे हो। लक्ष्मण! मैं जानती हूँ, तुम मुझ पर अधिकार करने के लिये इस समय श्रीराम का विनाश ही चाहते हो॥५-६॥
श्लोक:
लोभात्तु मत्कृते नूनं नानुगच्छसि राघवम्।
व्यसनं ते प्रियं मन्ये स्नेहो भ्रातरि नास्ति ते॥७॥
भावार्थ :-
‘मेरे लिये तुम्हारे मन में लोभ हो गया है, निश्चय ही इसीलिये तुम श्रीरघुनाथजी के पीछे नहीं जा रहे हो। मैं समझती हूँ, श्रीराम का संकटमें पड़ना ही तुम्हें प्रिय है। तुम्हारे मन में अपने भाई के प्रति स्नेह नहीं है॥७॥
श्लोक:
तेन तिष्ठसि विस्रब्धं तमपश्यन् महाद्युतिम्।
किं हि संशयमापन्ने तस्मिन्निह मया भवेत्॥८॥
कर्तव्यमिह तिष्ठन्त्या यत्प्रधानस्त्वमागतः।
भावार्थ :-
‘यही कारण है कि तुम उन महातेजस्वी श्रीरामचन्द्रजी को देखने न जाकर यहाँ निश्चिन्त खड़े हो। हाय! जो मुख्यतः तुम्हारे सेव्य हैं, जिनकी रक्षा और सेवा के लिये तुम यहाँ आये हो, यदि उन्हीं के प्राण संकट में पड़ गये तो यहाँ मेरी रक्षा से क्या होगा?’॥८ १/२॥
श्लोक:
एवं ब्रुवाणां वैदेहीं बाष्पशोकसमन्विताम्॥९॥
अब्रवील्लक्ष्मणस्त्रस्तां सीतां मृगवधूमिव।
भावार्थ :-
‘विदेहकमारी सीताजी की दशा भयभीत हई हरिणी के समान हो रही थी। उन्होंने शोकमग्न होकर आँसू बहाते हुए जब उपर्युक्त बातें कहीं, तब लक्ष्मण उनसे इस प्रकार बोले-॥९ १/२॥
श्लोक:
पन्नगासुरगन्धर्वदेवदानवराक्षसैः॥१०॥
अशक्यस्तव वैदेहि भर्ता जेतुं न संशयः।
भावार्थ :-
‘विदेहनन्दिनि! आप विश्वास करें, नाग, असुर, गन्धर्व, देवता, दानव तथा राक्षस-ये सब मिलकर भी आपके पति को परास्त नहीं कर सकते, मेरे इस कथन में संशय नहीं है॥१० १/२॥
श्लोक:
देवि देवमनुष्येषु गन्धर्वेषु पतत्रिषु॥११॥
राक्षसेषु पिशाचेषु किन्नरेषु मृगेषु च।
दानवेषु च घोरेषु न स विद्येत शोभने॥१२॥
यो रामं प्रतियुध्येत समरे वासवोपमम्।
अवध्यः समरे रामो नैवं त्वं वक्तमर्हसि॥१३॥
भावार्थ :-
‘देवि! शोभने! देवताओं, मनुष्यों, गन्धर्वो, पक्षियों, राक्षसों, पिशाचों, किन्नरों, मृगों तथा घोर दानवों में भी ऐसा कोई वीर नहीं है, जो समराङ्गण में इन्द्र के समान पराक्रमी श्रीराम का सामना कर सके। भगवान् श्रीराम युद्ध में अवध्य हैं, अतएव आपको ऐसी बात ही नहीं कहनी चाहिये॥११–१३॥
श्लोक:
न त्वामस्मिन् वने हातुमुत्सहे राघवं विना।
अनिवार्यं बलं तस्य बलैर्बलवतामपि॥१४॥
त्रिभिर्लोकैः समुदितैः सेश्वरैः सामरैरपि।
हृदयं निर्वृतं तेऽस्तु संतापस्त्यज्यतां तव॥१५॥
भावार्थ :-
‘श्रीरामचन्द्रजी की अनुपस्थिति में इस वन के भीतर मैं आपको अकेली नहीं छोड़ सकता। सैनिक-बल से सम्पन्न बड़े-बड़े राजा अपनी सारी सेनाओं के द्वारा भी श्रीराम के बल को कुण्ठित नहीं कर सकते। देवताओं तथा इन्द्र आदि के साथ मिले हुए तीनों लोक भी यदि आक्रमण करें तो वे श्रीराम के बल का वेग नहीं रोक सकते; अतः आपका हृदय शान्त हो। आप संताप छोड़ दें॥१४-१५॥
श्लोक:
आगमिष्यति ते भर्ता शीघ्रं हत्वा मृगोत्तमम्।
न स तस्य स्वरो व्यक्तं न कश्चिदपि दैवतः॥१६॥
गन्धर्वनगरप्रख्या माया तस्य च रक्षसः।
भावार्थ :-
‘आपके पतिदेव उस सुन्दर मृग को मारकर शीघ्र ही लौट आयेंगे। वह शब्द जो आपने सुना था, अवश्य ही उनका नहीं था। किसी देवता ने कोई शब्द प्रकट किया हो, ऐसी बात भी नहीं है। वह तो उस राक्षस की गन्धर्वनगर के समान झूठी माया ही थी॥१६ १/२
श्लोक:
न्यासभूतासि वैदेहि न्यस्ता मयि महात्मना॥१७॥
रामेण त्वं वरारोहे न त्वां त्यक्तुमिहोत्सहे।
भावार्थ :-
‘सुन्दरि! विदेहनन्दिनि! महात्मा श्रीरामचन्द्रजी ने मुझपर आपकी रक्षा का भार सौंपा है। इस समय आप मेरे पास उनकी धरोहर के रूप में हैं। अतः आपको मैं यहाँ अकेली नहीं छोड़ सकता॥१७ १/२॥
श्लोक:
कृतवैराश्च कल्याणि वयमेतैर्निशाचरैः॥१८॥
खरस्य निधने देवि जनस्थानवधं प्रति।।
भावार्थ :-
‘कल्याणमयी देवि! जिस समय खर का वध किया गया, उस समय जनस्थान निवासी दूसरे बहुत-से राक्षस भी मारे गये थे, इस कारण इन निशाचरों ने हमारे साथ वैर बाँध लिया है॥१८ १/२॥
श्लोक:
राक्षसा विविधा वाचो व्याहरन्ति महावने॥१९॥
हिंसाविहारा वैदेहि न चिन्तयितुमर्हसि।
भावार्थ :-
‘विदेहनन्दिनि! प्राणियों की हिंसा ही जिनका क्रीड़ा-विहार या मनोरञ्जन है, वे राक्षस ही इस विशाल वन में नाना प्रकार की बोलियाँ बोला करते हैं; अतः आपको चिन्ता नहीं करनी चाहिये’॥१९ १/२॥
श्लोक:
लक्ष्मणेनैवमुक्ता तु क्रुद्धा संरक्तलोचना॥२०॥
अब्रवीत् परुषं वाक्यं लक्ष्मणं सत्यवादिनम्।
भावार्थ :-
लक्ष्मण के ऐसा कहने पर सीता को बड़ा क्रोध हुआ, उनकी आँखें लाल हो गयीं और वे सत्यवादी लक्ष्मण से कठोर बातें कहने लगीं-॥२० १/२॥
श्लोक:
अनार्याकरुणारम्भ नृशंस कुलपांसन॥२१॥
अहं तव प्रियं मन्ये रामस्य व्यसनं महत्।
रामस्य व्यसनं दृष्ट्वा तेनैतानि प्रभाषसे॥२२॥
भावार्थ :-
‘अनार्य! निर्दयी! क्रूरकर्मा! कुलाङ्गार! मैं तुझे खूब समझती हूँ। श्रीराम किसी भारी विपत्ति में पड़ जायँ, यही तुझे प्रिय है। इसीलिये तू राम पर संकट आया देखकर भी ऐसी बातें बना रहा है॥२१-२२॥
श्लोक:
नैव चित्रं सपनेषु पापं लक्ष्मण यद् भवेत्।
त्वद्विधेषु नृशंसेषु नित्यं प्रच्छन्नचारिषु॥२३॥
भावार्थ :-
‘लक्ष्मण! तेरे-जैसे क्रूर एवं सदा छिपे हुए शत्रुओं के मन में इस तरह का पापपूर्ण विचार होना कोई आश्चर्य की बात नहीं है॥२३॥
श्लोक:
सुदुष्टस्त्वं वने राममेकमेकोऽनुगच्छसि।
मम हेतोः प्रतिच्छन्नः प्रयुक्तो भरतेन वा॥२४॥
भावार्थ :-
‘तू बड़ा दुष्ट है, श्रीराम को अकेले वन में आते देख मुझे प्राप्त करने के लिये ही अपने भाव को छिपाकर तू भी अकेला ही उनके पीछे-पीछे चला आया है, अथवा यह भी सम्भव है कि भरत ने ही तुझे भेजा हो॥२४॥
श्लोक:
तन्न सिध्यति सौमित्रे तवापि भरतस्य वा।
कथमिन्दीवरश्यामं रामं पद्मनिभेक्षणम्॥२५॥
उपसंश्रित्य भर्तारं कामयेयं पृथग्जनम्।
भावार्थ :-
‘परंतु सुमित्राकुमार! तेरा या भरत का वह मनोरथ सिद्ध नहीं हो सकता। नीलकमल के समान श्यामसुन्दर कमलनयन श्रीराम को पतिरूप में पाकर मैं दूसरे किसी क्षुद्र पुरुष की कामना कैसे कर सकती हूँ?॥२५॥
श्लोक:
समक्षं तव सौमित्रे प्राणांस्त्यक्ष्याम्यसंशयम्॥२६॥
रामं विना क्षणमपि नैव जीवामि भूतले।
भावार्थ :-
‘सुमित्राकुमार! मैं तेरे सामने ही निःसंदेह अपने प्राण त्याग दूंगी, किंतु श्रीराम के बिना एक क्षण भी इस भूतलपर जीवित नहीं रह सकूँगी’॥२६ १/२॥
श्लोक:
इत्युक्तः परुषं वाक्यं सीतया रोमहर्षणम्॥२७॥
अब्रवील्लक्ष्मणः सीतां प्राञ्जलिः स जितेन्द्रियः।
उत्तरं नोत्सहे वक्तुं दैवतं भवती मम॥२८॥
भावार्थ :-
सीता ने जब इस प्रकार कठोर तथा रोंगटे खड़े कर देने वाली बात कही, तब जितेन्द्रिय लक्ष्मण हाथ जोड़कर उनसे बोले- ’देवि! मैं आपकी बातका जवाब नहीं दे सकता; क्योंकि आप मेरे लिये आराधनीया देवी के समान हैं॥२७-२८॥
श्लोक:
वाक्यमप्रतिरूपं तु न चित्रं स्त्रीषु मैथिलि।
स्वभावस्त्वेष नारीणामेषु लोकेषु दृश्यते॥२९॥
भावार्थ :-
‘मिथिलेशकुमारी! ऐसी अनुचित और प्रतिकूल बातें मुँह से निकालना स्त्रियों के लिये आश्चर्य की बात नहीं है; क्योंकि इस संसार में नारियों का ऐसा स्वभाव बहुधा देखा जाता है॥२९॥
श्लोक:
विमुक्तधर्माश्चपलास्तीक्ष्णा भेदकराः स्त्रियः।
न सहे हीदृशं वाक्यं वैदेहि जनकात्मजे॥३०॥
श्रोत्रयोरुभयोर्मध्ये तप्तनाराचसंनिभम्।
भावार्थ :-
‘स्त्रियाँ प्रायः विनय आदि धर्मोंसे रहित, चञ्चल, कठोर तथा घरमें फूट डालनेवाली होती हैं। विदेहकुमारी जानकी! आपकी यह बात मेरे दोनों कानोंमें तपाये हुए लोहेके समान लगी है। मैं ऐसी बात सह नहीं सकता॥३० १/२॥
श्लोक:
उपशृण्वन्तु मे सर्वे साक्षिणो हि वनेचराः॥३१॥
न्यायवादी यथा वाक्यमुक्तोऽहं परुषं त्वया।
धिक् त्वामद्य विनश्यन्तीं यन्मामेवं विशङ्कसे॥३२॥
स्त्रीत्वाद् दुष्टस्वभावेन गुरुवाक्ये व्यवस्थितम्।
ङ्केाच्छामि काकुत्स्थः स्वस्ति तेऽस्तु वरानने ३३॥
भावार्थ :-
‘इस वन में विचरने वाले सभी प्राणी साक्षी होकर मेरा कथन सुनें। मैंने न्याययुक्त बात कही है तो भी आपने मेरे प्रति ऐसी कठोर बात अपने मुँह से निकाली है। निश्चय ही आज आपकी बुद्धि मारी गयी है। आप नष्ट होना चाहती हैं। धिक्कार है आपको, जो आप मुझपर ऐसा संदेह करती हैं। मैं बड़े भाई की आज्ञा का पालन करने में दृढ़तापूर्वक तत्पर हूँ और आप केवल नारी होने के कारण साधारण स्त्रियों के दुष्ट स्वभाव को अपनाकर मेरे प्रति ऐसी आशङ्का करती हैं। अच्छा अब मैं वहीं जाता हूँ, जहाँ भैया श्रीराम गये हैं। सुमुखि! आपका कल्याण हो॥३१-३३॥
श्लोक:
रक्षन्तु त्वां विशालाक्षि समग्रा वनदेवताः।
निमित्तानि हि घोराणि यानि प्रादुर्भवन्ति मे।
अपि त्वां सह रामेण पश्येयं पुनरागतः॥३४॥
भावार्थ :-
‘विशाललोचने! वन के सम्पूर्ण देवता आपकी रक्षा करें; क्योंकि इस समय मेरे सामने जो बड़े भयंकर अपशकुन प्रकट हो रहे हैं, उन्होंने मुझे संशय में डाल दिया है। क्या मैं श्रीरामचन्द्रजी के साथ लौटकर पुनः आपको सकुशल देख सकूँगा?’॥३४॥
श्लोक:
लक्ष्मणेनैवमुक्ता तु रुदती जनकात्मजा।
प्रत्युवाच ततो वाक्यं तीव्रबाष्पपरिप्लुता॥३५॥
भावार्थ :-
लक्ष्मण के ऐसा कहने पर जनककिशोरी सीता रोने लगीं। उनके नेत्रों से आँसुओं की तीव्र धारा बह चली। वे उन्हें इस प्रकार उत्तर देती हुई बोलीं-॥३५॥
श्लोक:
गोदावरी प्रवेक्ष्यामि हीना रामेण लक्ष्मण।
आबन्धिष्येऽथवा त्यक्ष्ये विषमे देहमात्मनः॥३६॥
पिबामि वा विषं तीक्ष्णं प्रवेक्ष्यामि हताशनम।
न त्वहं राघवादन्यं कदापि पुरुषं स्पृशे॥३७॥
भावार्थ :-
‘लक्ष्मण! मैं श्रीराम से बिछुड़ जाने पर गोदावरी नदी में समा जाऊँगी अथवा गले में फाँसी लगा लूँगी अथवा पर्वत के दुर्गम शिखर पर चढ़कर वहाँ से अपने शरीर को नीचे डाल दूँगी या तीव्र विष पान कर लूँगी अथवा जलती आग में प्रवेश कर जाऊँगी, परंतु श्रीरघुनाथजी के सिवा दूसरे किसी पुरुष का कदापि स्पर्श नहीं करूँगी’॥३६-३७॥
श्लोक:
इति लक्ष्मणमाश्रुत्य सीता शोकसमन्विता।
पाणिभ्यां रुदती दुःखादुदरं प्रजघान ह॥३८॥
भावार्थ :-
लक्ष्मण के सामने यह प्रतिज्ञा करके शोकमग्न होकर रोती हुई सीता अधिक दुःख के कारण दोनों हाथों से अपने उदरपर आघात करने लगी छाती पीटने लगीं॥३८॥
श्लोक:
तामार्तरूपां विमना रुदन्ती सौमित्रिरालोक्य विशालनेत्राम्।
आश्वासयामास न चैव भर्तुस्तं भ्रातरं किंचिदुवाच सीता॥३९॥
भावार्थ :-
विशाललोचना सीता को आर्त होकर रोती देख सुमित्राकुमार लक्ष्मण ने मन-ही-मन उन्हें सान्त्वना दी, परंतु सीता उस समय अपने देवर से कुछ नहीं बोलीं॥३९॥
श्लोक:
ततस्तु सीतामभिवाद्य लक्ष्मणः कृताञ्जलिः किंचिदभिप्रणम्य।
अवेक्षमाणो बहुशः स मैथिली जगाम रामस्य समीपमात्मवान्॥४०॥
भावार्थ :-
तब मन को वश में रखने वाले लक्ष्मण ने दोनों हाथ जोड़ कुछ झुककर मिथिलेशकुमारी सीता को प्रणाम किया और बारंबार उनकी ओर देखते हुए वे श्रीरामचन्द्रजी के पास चल दिये॥४०॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे पञ्चचत्वारिंशः सर्गः॥४५॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आपरामायण आदिकाव्य के अरण्यकाण्ड में पैंतालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥४५॥
अरण्यकाण्डम्
षट्चत्वारिंशः सर्गः (सर्ग 46)
( रावण का साधुवेष में सीता के पास जाकर उनका परिचय पूछना और सीता का आतिथ्य के लिये उसे आमन्त्रित करना )
श्लोक:
तया परुषमुक्तस्तु कुपितो राघवानुजः।
स विकांक्षन भृशं रामं प्रतस्थे नचिरादिव॥१॥
भावार्थ :-
सीता के कठोर वचन कहने पर कुपित हुए लक्ष्मण श्रीराम से मिलने की विशेष इच्छा रखकर शीघ्र ही वहाँ से चल दिये॥१॥
श्लोक:
तदासाद्य दशग्रीवः क्षिप्रमन्तरमास्थितः।
अभिचक्राम वैदेही परिव्राजकरूपधृक्॥२॥
भावार्थ :-
लक्ष्मण के चले जाने पर रावण को मौका मिल गया, अतः वह संन्यासी का वेष धारण करके शीघ्र ही विदेहकुमारी सीता के समीप गया॥२॥
श्लोक:
श्लक्ष्णकाषायसंवीतः शिखी छत्री उपानही।
वामे चांसेऽवसज्याथ शुभे यष्टिकमण्डलू॥३॥
भावार्थ :-
वह शरीर पर साफ-सुथरा गेरुए रंग का वस्त्र लपेटे हुए था। उसके मस्तक पर शिखा, हाथ में छाता और पैरों में जूते थे। उसने बायें कंधे पर डंडा रखकर उसमें कमण्डलु लटका रखा था॥३॥
श्लोक:
परिव्राजकरूपेण वैदेहीमन्ववर्तत।
तामाससादातिबलो भ्रातृभ्यां रहितां वने॥४॥
भावार्थ :-
अत्यन्त बलवान् रावण उस वन में परिव्राजक का रूप धारण करके श्रीराम और लक्ष्मण दोनों बन्धुओं से रहित हुई अकेली विदेहकुमारी सीता के पास गया॥४॥
श्लोक:
रहितां सूर्यचन्द्राभ्यां संध्यामिव महत्तमः।
तामपश्यत् ततो बालां राजपुत्रीं यशस्विनीम्॥५॥
रोहिणीं शशिना हीनां ग्रहवद् भृशदारुणः।
भावार्थ :-
जैसे सूर्य और चन्द्रमा से हीन हुई संध्या के पास महान् अंधकार उपस्थित हो, उसी प्रकार वह सीता के निकट गया। तदनन्तर जैसे चन्द्रमा से रहित हुई रोहिणी पर अत्यन्त दारुण ग्रह मंगल या शनैश्चर की दृष्टि पड़े, उसी प्रकार उस अतिशय क्रूर रावण ने उस भोली-भाली यशस्विनी राजकुमारी की ओर देखा॥५ १/२॥
श्लोक:
तमुग्रं पापकर्माणं जनस्थानगता द्रुमाः॥६॥
संदृश्य न प्रकम्पन्ते न प्रवाति च मारुतः।
शीघ्रस्रोताश्च तं दृष्ट्वा वीक्षन्तं रक्तलोचनम्॥७॥
स्तिमितं गन्तुमारेभे भयाद् गोदावरी नदी।
भावार्थ :-
उस भयंकर पापाचारी को आया देख जनस्थान के वृक्षों ने हिलना बंद कर दिया और हवा का वेग रुक गया। लाल नेत्रों वाले रावण को अपनी ओर दृष्टिपात करते देख तीव्र गति से बहने वाली गोदावरी नदी भय के मारे धीरे-धीरे बहने लगी॥६-७ १/२॥
श्लोक:
रामस्य त्वन्तरं प्रेप्सुर्दशग्रीवस्तदन्तरे॥८॥
उपतस्थे च वैदेहीं भिक्षुरूपेण रावणः।
भावार्थ :-
राम से बदला लेने का अवसर ढूँढ़ने वाला दशमुख रावण उस समय भिक्षु रूप से विदेहकुमारी सीता के पास पहुँचा॥८ १/२॥
श्लोक:
अभव्यो भव्यरूपेण भर्तारमनुशोचतीम्॥९॥
अभ्यवर्तत वैदेहीं चित्रामिव शनैश्चरः।
भावार्थ :-
उस समय विदेहराजकुमारी सीता अपने पति के लिये शोक और चिन्ता में डूबी हुई थीं। उसी अवस्था में अभव्य रावण भव्य रूप धारण करके उनके सामने उपस्थित हुआ, मानो शनैश्चर ग्रह चित्रा के सामने जा पहुँचा हो॥९ १/२॥
श्लोक:
सहसा भव्यरूपेण तृणैः कूप इवावृतः॥१०॥
ङ्केअतिष्ठत् प्रेक्ष्य वैदेही रामपत्नी यशस्विनीम ।
भावार्थ :-
जैसे कुआँ तिनकों से ढका हुआ हो, उसी प्रकार भव्य रूप से अपनी अभव्यता को छिपाकर रावण सहसा वहाँ जा पहुंचा और यशस्विनी रामपत्नी वैदेही को देखकर खड़ा हो गया॥१० १/२॥
श्लोक:
तिष्ठन् सम्प्रेक्ष्य च तदा पत्नी रामस्य रावणः॥११॥
शुभां रुचिरदन्तोष्ठी पूर्णचन्द्रनिभाननाम्।
आसीनां पर्णशालायां बाष्पशोकाभिपीडिताम्॥१२॥
भावार्थ :-
उस समय रावण वहाँ खड़ा-खड़ा रामपत्नी सीता को देखने लगा। वे बड़ी सुन्दरी थीं। उनके दाँत और ओठ भी सुन्दर थे, मुख पूर्ण चन्द्रमा की शोभा को छीने लेता था। वे पर्णशाला में बैठी हुई शोक से पीड़ित हो आँसू बहा रही थीं॥११-१२॥
श्लोक:
स तां पद्मपलाशाक्षीं पीतकौशेयवासिनीम्।
अभ्यगच्छत वैदेहीं हृष्टचेता निशाचरः॥१३॥
भावार्थ :-
वह निशाचर प्रसन्नचित्त हो रेशमी पीताम्बर से सुशोभित कमलनयनी विदेहकुमारी के सामने गया॥१३॥
श्लोक:
दृष्ट्वा कामशराविद्धो ब्रह्मघोषमुदीरयन्।
अब्रवीत् प्रश्रितं वाक्यं रहिते राक्षसाधिपः॥१४॥
भावार्थ :-
उन्हें देखते ही कामदेव के बाणों से घायल हो राक्षसराज रावण वेदमन्त्र का उच्चारण करने लगा और उस एकान्त स्थान में विनीतभाव से उनसे कुछ कहने को उद्यत हुआ॥१४॥
श्लोक:
तामुत्तमां त्रिलोकानां पद्महीनामिव श्रियम्।
विभ्राजमानां वपुषा रावणः प्रशशंस ह॥१५॥
भावार्थ :-
त्रिलोकसुन्दरी सीता अपने शरीर से कमल से रहित कमलालया लक्ष्मी की भाँति शोभा पा रही थीं। रावण उनकी प्रशंसा करता हुआ बोला-॥१५॥
श्लोक:
रौप्यकाञ्चनवर्णाभे पीतकौशेयवासिनि।
कमलानां शुभां मालां पद्मिनीव च बिभ्रती॥१६॥
भावार्थ :-
‘उत्तम सुवर्ण की-सी कान्तिवाली तथा रेशमी पीताम्बर धारण करने वाली सुन्दरी! (तुम कौन हो?) तुम्हारे मुख, नेत्र, हाथ और पैर कमलों के समान हैं, अतः तुम पद्मिनी (पुष्करिणी) की भाँति कमलों की सुन्दर-सी माला धारण करती हो॥१६॥
श्लोक:
हीः श्रीः कीर्तिः शुभा लक्ष्मीरप्सरा वा शुभानने।
भूतिर्वा त्वं वरारोहे रतिर्वा स्वैरचारिणी॥१७॥
भावार्थ :-
‘शुभानने! तुम श्री, ह्री, कीर्ति, शुभस्वरूपा लक्ष्मी अथवा अप्सरा तो नहीं हो? अथवा वरारोहे! तुम भूति या स्वेच्छापूर्वक विहार करने वाली कामदेव की पत्नी रति तो नहीं हो?॥१७॥
श्लोक:
समाः शिखरिणः स्निग्धाः पाण्डुरा दशनास्तव।
विशाले विमले नेत्रे रक्तान्ते कृष्णतारके॥१८॥
विशालं जघनं पीनमूरू करिकरोपमौ।
भावार्थ :-
तुम्हारे दाँत बराबर हैं। उनके अग्रभाग कुन्द की कलियों के समान शोभा पाते हैं। वे सब-के-सब चिकने और सफेद हैं। तुम्हारी दोनों आँखें बड़ी-बड़ी और निर्मल हैं। उनके दोनों कोये लाल हैं और पुतलियाँ काली हैं। कटि का अग्रभाग विशाल एवं मांसल है। दोनों जाँधे हाथी की (ड़के समान शोभा पाती हैं॥१८ १/२॥
श्लोक:
एतावुपचितौ वृत्तौ संहतौ सम्प्रगल्भितौ॥१९॥
पीनोन्नतमुखौ कान्तौ स्निग्धतालफलोपमौ।
मणिप्रवेकाभरणौ रुचिरौ ते पयोधरौ॥२०॥
भावार्थ :-
‘तुम्हारे ये दोनों स्तन पुष्ट, गोलाकार, परस्पर सटे हुए, प्रगल्भ, मोटे, उठे हुए मुखवाले, कमनीय, चिकने ताड़फल के समान आकार वाले, परम सुन्दर और श्रेष्ठ मणिमय आभूषणों से विभूषित हैं॥१९-२०॥
श्लोक:
चारुस्मिते चारुदति चारुनेत्रे विलासिनि।
मनो हरसि मे रामे नदीकूलमिवाम्भसा॥२१॥
भावार्थ :-
‘सुन्दर मुसकान, रुचिर दन्तावली और मनोहर नेत्रवाली विलासिनी रमणी! तुम अपने रूप-सौन्दर्य से मेरे मन को वैसे ही हरे लेती हो, जैसे नदी जल के द्वारा अपने तट का अपहरण करती है॥२१॥
श्लोक:
करान्तमितमध्यासि सुकेशे संहतस्तनि।
नैव देवी न गन्धर्वी न यक्षी न च किंनरी॥२२॥
भावार्थ :-
‘तुम्हारी कमर इतनी पतली है कि मुट्ठी में आ जाय। केश चिकने और मनोहर हैं। दोनों स्तन एक दूसरे से सटे हुए हैं। सुन्दरी! देवता, गन्धर्व, यक्ष और किन्नर जाति की स्त्रियों में भी कोई तुम-जैसी नहीं है॥२२॥
श्लोक:
नैवंरूपा मया नारी दृष्टपूर्वा महीतले।
रूपमग्रयं च लोकेषु सौकुमार्यं वयश्च ते॥२३॥
इह वासश्च कान्तारे चित्तमुन्माथयन्ति मे।
सा प्रतिक्राम भद्रं ते न त्वं वस्तुमिहार्हसि॥२४॥
भावार्थ :-
‘पृथ्वी पर तो ऐसी रूपवती नारी मैंने आज से पहले कभी देखी ही नहीं थी। कहाँ तो तुम्हारा यह तीनों लोकों में सबसे सुन्दर रूप, सुकुमारता और नयी अवस्था और कहाँ इस दुर्गम वन में निवास! ये सब बातें ध्यान में आते ही मेरे मन को मथे डालती हैं। तुम्हारा कल्याण हो। यहाँ से चली जाओ। तुम यहाँ रहने के योग्य नहीं हो॥२३-२४॥
श्लोक:
राक्षसानामयं वासो घोराणां कामरूपिणाम्।
प्रासादाग्राणि रम्याणि नगरोपवनानि च॥२५॥
सम्पन्नानि सुगन्धीनि युक्तान्याचरितुं त्वया।
भावार्थ :-
‘यह तो इच्छानुसार रूप धारण करने वाले भयंकर राक्षसों के रहने की जगह है। तुम्हें तो रमणीय राजमहलों, समृद्धिशाली नगरों और सुगन्धयुक्त उपवनों में निवास करना और विचरना चाहिये॥२५ १/२॥
श्लोक:
वरं माल्यं वरं गन्धं वरं वस्त्रं च शोभने॥२६॥
भर्तारं च वरं मन्ये त्वद्युक्तमसितेक्षणे।
भावार्थ :-
‘शोभने! वही पुरुष श्रेष्ठ है, वही गन्ध उत्तम है और वही वस्त्र सुन्दर है, जो तुम्हारे उपयोग में आये। कजरारे नेत्रोंवाली सुन्दरि! मैं उसी को श्रेष्ठ पति मानता हूँ, जिसे तुम्हारा सुखद संयोग प्राप्त हो॥२६ १/२॥
श्लोक:
का त्वं भवसि रुद्राणां मरुतां वा शुचिस्मिते॥२७॥
वसूनां वा वरारोहे देवता प्रतिभासि मे।
भावार्थ :-
‘पवित्र मुसकान और सुन्दर अङ्गोंवाली देवि! तुम कौन हो? मुझे तो तुम रुद्रों, मरुद्गणों अथवा वसुओं से सम्बन्ध रखने वाली देवी जान पड़ती हो॥२७ १/२॥
श्लोक:
नेह गच्छन्ति गन्धर्वा न देवा न च किन्नराः॥२८॥
राक्षसानामयं वासः कथं तु त्वमिहागता।
भावार्थ :-
‘यहाँ गन्धर्व, देवता तथा किन्नर नहीं आते-जाते हैं। यह राक्षसों का निवास स्थान है, फिर तुम कैसे यहाँ आ गयी॥२८ १/२॥
श्लोक:
इह शाखामृगाः सिंहा दीपिव्याघ्रमृगा वृकाः॥२९॥
ऋक्षास्तरक्षवः कङ्काः कथं तेभ्यो न बिभ्यसे।
भावार्थ :-
‘यहाँ वानर, सिंह, चीते, व्याघ्र, मृग, भेड़िये, रीछ, शेर और कंक (गीध आदि पक्षी) रहते हैं। तुम्हें इनसे भय क्यों नहीं हो रहा है?॥२९ १/२॥
श्लोक:
मदान्वितानां घोराणां कुञ्जराणां तरस्विनाम्॥३०॥
कथमेका महारण्ये न बिभेषि वरानने।
भावार्थ :-
‘वरानने! इस विशाल वन के भीतर अत्यन्त वेगशाली और भयंकर मदमत्त गजराजों के बीच अकेली रहती हुई तुम भयभीत कैसे नहीं होती हो?॥३० १/२॥
श्लोक:
कासि कस्य कुतश्च त्वं किं निमित्तं च दण्डकान्॥३१॥
एका चरसि कल्याणि घोरान् राक्षससेवितान्।
भावार्थ :-
‘कल्याणमयी देवि! बताओ, तुम कौन हो? किसकी हो? और कहाँ से आकर किस कारण इस राक्षससेवित घोर दण्डकारण्य में अकेली विचरण करती हो?’॥३१ १/२॥
श्लोक:
इति प्रशस्ता वैदेही रावणेन महात्मना॥३२॥
द्विजातिवेषेण हि तं दृष्ट्वा रावणमागतम्।
सर्वैरतिथिसत्कारैः पूजयामास मैथिली॥३३॥
भावार्थ :-
वेशभूषा से महात्मा बनकर आये हुए रावण ने जब विदेहकुमारी सीता की इस प्रकार प्रशंसा की, तब ब्राह्मण वेष में वहाँ पधारे हुए रावण को देखकर मैथिली ने अतिथि-सत्कार के लिये उपयोगी सभी सामग्रियों द्वारा उसका पूजन किया॥३२-३३॥
श्लोक:
उपानीयासनं पूर्वं पाद्येनाभिनिमन्त्र्य च।
अब्रवीत् सिद्धमित्येव तदा तं सौम्यदर्शनम्॥३४॥
भावार्थ :-
पहले बैठने के लिये आसन दे, पाद्य (पैर धोने के लिये जल) निवेदन किया। तदनन्तर ऊपर से सौम्य दिखायी देने वाले उस अतिथि को भोजन के लिये निमन्त्रण देते हुए कहा- ’ब्रह्मन्! भोजन तैयार है, ग्रहण कीजिये॥३४॥
श्लोक:
द्विजातिवेषेण समीक्ष्य मैथिली समागतं पात्रकुसुम्भधारिणम्।
अशक्यमुद्देष्टमुपायदर्शनान्यमन्त्रयद् ब्राह्मणवत् तथागतम्॥३५॥
भावार्थ :-
वह ब्राह्मण के वेष में आया था, कमण्डलु और गेरुआ वस्त्र धारण किये हुए था। ब्राह्मण-वेष में आये हुए अतिथि की उपेक्षा असम्भव थी। उसकी वेशभूषा में ब्राह्मणत्व का निश्चय कराने वाले चिह्न दिखायी देते थे, अतः उस रूप में आये हुए उस रावण को देखकर मैथिली ने ब्राह्मण के योग्य सत्कार करने के लिये ही उसे निमन्त्रित किया॥३५॥
श्लोक:
इयं बृसी ब्राह्मण काममास्यतामिदं च पाद्यं प्रतिगृह्यतामिति।
इदं च सिद्धं वनजातमुत्तमं त्वदर्थमव्यग्रमिहोपभुज्यताम्॥३६॥
भावार्थ :-
वे बोलीं—’ब्राह्मण! यह चटाई है, इस पर इच्छानुसार बैठ जाइये। यह पैर धोने के लिये जल है, इसे ग्रहण कीजिये और यह वन में ही उत्पन्न हुआ उत्तम फल-मूल आपके लिये ही तैयार करके रखा गया है, यहाँ शान्तभाव से उसका उपभोग कीजिये’॥३६॥
श्लोक:
निमन्त्र्यमाणः प्रतिपूर्णभाषिणीं नरेन्द्रपत्नी प्रसमीक्ष्य मैथिलीम्।
प्रसह्य तस्या हरणे दृढं मनः समर्पयामास वधाय रावणः॥३७॥
भावार्थ :-
‘अतिथि के लिये सब कुछ तैयार है’ ऐसा कहकर सीता ने जब उसे भोजन के लिये निमन्त्रित किया, तब रावण ने ‘सर्वं सम्पन्नम्’ कहने वाली राजरानी मैथिली की ओर देखा और अपने ही वध के लिये उसने हठपूर्वक सीता का हरण करने के निमित्त मन में दृढ़ निश्चय कर लिया॥३७॥
श्लोक:
ततः सुवेषं मृगयागतं पतिं प्रतीक्षमाणा सहलक्ष्मणं तदा।
निरीक्षमाणा हरितं ददर्श तन्महद् वनं नैव तु रामलक्ष्मणौ॥३८॥
भावार्थ :-
तदनन्तर सीता शिकार खेलने के लिये गये हुए लक्ष्मणसहित अपने सुन्दर वेषधारी पति श्रीरामचन्द्रजी की प्रतीक्षा करने लगीं। उन्होंने चारों ओर दृष्टि दौड़ायी, किंतु उन्हें सब ओर हराभरा विशाल वन ही दिखायी दिया, श्रीराम और लक्ष्मण नहीं दीख पड़े॥३८॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे षट्चत्वारिंशः सर्गः॥४६॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अरण्यकाण्ड में छियालीसवाँ सर्ग पूराहुआ॥४६॥
अरण्यकाण्डम्
सप्तचत्वारिंशः सर्गः (सर्ग 47)
( सीता का रावण को अपना और पति का परिचय देकर वन में आने का कारण बताना, रावण का उन्हें अपनी पटरानी बनाने की इच्छा प्रकट करना और सीता का उसे फटकारना )
श्लोक:
रावणेन तु वैदेही तदा पृष्टा जिहीर्षुणा।
परिव्राजकरूपेण शशंसात्मानमात्मना॥१॥
भावार्थ :-
सीता को हरने की इच्छा से परिव्राजक (संन्यासी)का रूप धारण करके आये हुए रावण ने उस समय जब विदेहराजकुमारी से इस प्रकार पूछा, तब उन्होंने स्वयं ही अपना परिचय दिया॥१॥
श्लोक:
ब्राह्मणश्चातिथिश्चैष अनुक्तो हि शपेत माम्।
इति ध्यात्वा मुहूर्तं तु सीता वचनमब्रवीत्॥२॥
भावार्थ :-
वे दो घड़ी तक इस विचार में पड़ी रहीं कि ये ब्राह्मण और अतिथि हैं, यदि इनकी बात का उत्तर न दिया जाय तो ये मुझे शाप दे देंगे। यह सोचकर सीता ने इस प्रकार कहना आरम्भ किया-॥२॥
श्लोक:
दुहिता जनकस्याहं मैथिलस्य महात्मनः।
सीता नाम्नास्मि भद्रं ते रामस्य महिषी प्रिया॥३॥
भावार्थ :-
‘ब्रह्मन्! आपका भला हो। मैं मिथिलानरेश महात्मा जनक की पुत्री और अवधनरेश श्रीरामचन्द्रजी की प्यारी रानी हूँ। मेरा नाम सीता है॥३॥
श्लोक:
उषित्वा द्वादश समा इक्ष्वाकूणां निवेशने।
भुजाना मानुषान् भोगान् सर्वकामसमृद्धिनी॥४॥
भावार्थ :-
‘विवाह के बाद बारह वर्षों तक इक्ष्वाकुवंशी महाराज दशरथ के महल में रहकर मैंने अपने पति के साथ सभी मानवोचित भोग भोगे हैं। मैं वहाँ सदा मनोवाञ्छित सुख-सुविधाओं से सम्पन्न रही हूँ॥४॥
श्लोक:
तत्र त्रयोदशे वर्षे राजाऽमन्त्रयत प्रभुः।।
अभिषेचयितं रामं समेतो राजमन्त्रिभिः॥५॥
भावार्थ :-
‘तेरहवें वर्ष के प्रारम्भ में सामर्थ्यशाली महाराज दशरथ ने राजमन्त्रियों से मिलकर सलाह की और श्रीरामचन्द्रजी का युवराजपद पर अभिषेक करने का निश्चय किया॥५॥
श्लोक:
तस्मिन् सम्भ्रियमाणे तु राघवस्याभिषेचने।
कैकेयी नाम भर्तारं ममार्या याचते वरम्॥६॥
भावार्थ :-
‘जब श्रीरघुनाथजी के राज्याभिषेक की सामग्री जुटायी जाने लगी, उस समय मेरी सास कैकेयी ने अपने पति से वर माँगा॥६॥
श्लोक:
परिगृह्य तु कैकेयी श्वशुरं सुकृतेन मे।
मम प्रव्राजनं भर्तुर्भरतस्याभिषेचनम्॥७॥
द्वावयाचत भर्तारं सत्यसंधं नृपोत्तमम्।
भावार्थ :-
‘कैकेयी ने मेरे श्वशुर को पुण्य की शपथ दिलाकर वचनबद्ध कर लिया, फिर अपने सत्यप्रतिज्ञ पति उन राजशिरोमणि से दो वर माँगे- मेरे पति के लिये वनवास और भरत के लिये राज्याभिषेक॥७ १/२॥
श्लोक:
नाद्य भोक्ष्ये न च स्वप्स्ये न पास्ये न कदाचन॥८॥
एष मे जीवितस्यान्तो रामो यदभिषिच्यते।
भावार्थ :-
‘कैकेयी हठपूर्वक कहने लगीं यदि आज श्रीराम का अभिषेक किया गया तो मैं न तो खाऊँगी, न पीऊँगी और न कभी सोऊँगी ही। यही मेरे जीवन का अन्त होगा॥८ १/२॥
श्लोक:
इति ब्रुवाणां कैकेयीं श्वशुरो मे स पार्थिवः॥९॥
अयाचतार्थैरन्वथैर्न च याच्यां चकार सा।
भावार्थ :-
‘ऐसी बात कहती हुई कैकेयी से मेरे श्वशुर महाराज दशरथ ने यह याचना की कि ‘तुम सब प्रकार की उत्तम वस्तुएँ ले लो; किंतु श्रीराम के अभिषेक में विघ्न न डालो।’ किंतु कैकेयी ने उनकी वह याचना सफल नहीं की॥९ १/२॥
श्लोक:
मम भर्ता महातेजा वयसा पञ्चविंशकः॥१०॥
अष्टादश हि वर्षाणि मम जन्मनि गण्यते।
भावार्थ :-
‘उस समय मेरे महातेजस्वी पति की अवस्था पचीस साल से ऊपर की थी और मेरे जन्मकाल से लेकर वनगमन काल तक मेरी अवस्था वर्षगणना के अनुसार अठारह साल की हो गयी थी॥१० १/२॥
श्लोक:
रामेति प्रथितो लोके सत्यवान् शीलवान् शुचिः॥११॥
विशालाक्षो महाबाहुः सर्वभूतहिते रतः।
भावार्थ :-
‘श्रीराम जगत् में सत्यवादी, सुशील और पवित्र रूप से विख्यात हैं। उनके नेत्र बड़े-बड़े और भुजाएँ विशाल हैं। वे समस्त प्राणियों के हित में तत्पर रहते हैं॥११ १/२॥
श्लोक:
कामार्तश्च महाराजः पिता दशरथः स्वयम्॥१२॥
कैकेय्याः प्रियकामार्थं तं रामं नाभ्यषेचयत्।
भावार्थ :-
“उनके पिता महाराज दशरथ ने स्वयं काम पीड़ित होने के कारण कैकेयी का प्रिय करने की इच्छा से श्रीराम का अभिषेक नहीं किया॥१२ १/२॥
श्लोक:
अभिषेकाय तु पितुः समीपं राममागतम्॥१३॥
कैकेयी मम भर्तारमित्युवाच द्रुतं वचः।
भावार्थ :-
‘श्रीरामचन्द्रजी जब अभिषेक के लिये पिता के समीप आये, तब कैकेयी ने मेरे उन पतिदेव से तुरंत यह बात कही॥१३ १/२॥
श्लोक:
तव पित्रा समाज्ञप्तं ममेदं शृणु राघव॥१४॥
भरताय प्रदातव्यमिदं राज्यमकण्टकम्।
त्वया तु खलु वस्तव्यं नव वर्षाणि पञ्च च॥१५॥
वने प्रव्रज काकुत्स्थ पितरं मोचयानृतात्।
भावार्थ :-
‘रघुनन्दन! तुम्हारे पिता ने जो आज्ञा दी है, इसे मेरे मुँह से सुनो। यह निष्कण्टक राज्य भरत को दिया जायगा, तुम्हें तो चौदह वर्षों तक वन में ही निवास करना होगा। काकुत्स्थ! तुम वन को जाओ और पिता को असत्य के बन्धन से छुड़ाओ॥१४-१५ १/२॥
श्लोक:
तथेत्युवाच तां रामः कैकेयीमकुतोभयः॥१६॥
चकार तद्वचः श्रुत्वा भर्ता मम दृढव्रतः।
भावार्थ :-
‘किसी से भी भय न मानने वाले श्रीराम ने कैकेयी की वह बात सुनकर कहा—’बहुत अच्छा’। उन्होंने उसे स्वीकार कर लिया। मेरे स्वामी दृढ़तापूर्वक अपनी प्रतिज्ञा का पालन करने वाले हैं॥१६ १/२॥
श्लोक:
दद्यान्न प्रतिगृह्णीयात् सत्यं ब्रूयान्न चानृतम्॥१७॥
एतद् ब्राह्मण रामस्य व्रतं धृतमनुत्तमम्।
भावार्थ :-
‘श्रीराम केवल देते हैं, किसी से कुछ लेते नहीं। वे सदा सत्य बोलते हैं, झूठ नहीं। ब्राह्मण! यह श्रीरामचन्द्रजी का सर्वोत्तम व्रत है, जिसे उन्होंने धारण कर रखा है॥१७ १/२॥
श्लोक:
तस्य भ्राता तु वैमात्रो लक्ष्मणो नाम वीर्यवान्॥१८॥
रामस्य पुरुषव्याघ्रः सहायः समरेऽरिहा।
स भ्राता लक्ष्मणो नाम ब्रह्मचारी दृढव्रतः॥१९॥
भावार्थ :-
‘श्रीराम के सौतेले भाई लक्ष्मण बड़े पराक्रमी हैं। समरभूमि में शत्रुओं का संहार करने वाले पुरुषसिंह लक्ष्मण श्रीराम के सहायक हैं, बन्धु हैं, ब्रह्मचारी और उत्तम व्रत का दृढ़तापूर्वक पालन करने वाले हैं॥१८-१९॥
श्लोक:
अन्वगच्छद् धनुष्पाणिः प्रव्रजन्तं मया सह।
जटी तापसरूपेण मया सह सहानुजः॥२०॥
प्रविष्टो दण्डकारण्यं धर्मनित्यो दृढव्रतः।
भावार्थ :-
‘श्रीरघुनाथजी मेरे साथ जब वन में आने लगे, तब लक्ष्मण भी हाथ में धनुष लेकर उनके पीछे हो लिये। इस प्रकार मेरे और अपने छोटे भाई के साथ श्रीराम इस दण्डकारण्य में आये हैं। वे दृढ़प्रतिज्ञ तथा नित्यनिरन्तर धर्म में तत्पर रहने वाले हैं और सिरपर जटा धारण किये तपस्वी के वेश में यहाँ रहते हैं॥२० १/२॥
श्लोक:
ते वयं प्रच्युता राज्यात् कैकेय्यास्तु कृते त्रयः॥२१॥
विचराम द्विजश्रेष्ठ वनं गम्भीरमोजसा।
समाश्वस मुहूर्तं तु शक्यं वस्तुमिह त्वया॥२२॥
आगमिष्यति मे भर्ता वन्यमादाय पुष्कलम्।
भावार्थ :-
‘द्विजश्रेष्ठ! इस प्रकार हम तीनों कैकेयी के कारण राज्य से वञ्चित हो इस गम्भीर वन में अपने ही बल के भरोसे विचरते हैं। आप यहाँ ठहर सकें तो दो घड़ी विश्राम करें। अभी मेरे स्वामी प्रचुरमात्रा में जंगली फल-मूल लेकर आते होंगे॥२१-२२ १/२॥
श्लोक:
रुरून् गोधान् वराहांश्च हत्वाऽऽदायामिषं बहु॥२३॥
स त्वं नाम च गोत्रं च कुलमाचक्ष्व तत्त्वतः।
एकश्च दण्डकारण्ये किमर्थं चरसि द्विज॥२४॥
भावार्थ :-
‘रुरु, गोह और जंगली सूअर आदि हिंसक पशुओं का वध करके तपस्वी जनों के उपभोग में आने योग्य बहुत-सा फल-मूल लेकर वे अभी आयँगे (उस समय आपका विशेष सत्कार होगा)। ब्रह्मन्! अब आप भी अपने नाम-गोत्र और कुल का ठीक ठीक परिचय दीजिये। आप अकेले इस दण्डकारण्य में किसलिये विचरते हैं!’॥२३-२४॥
श्लोक:
एवं ब्रुवत्यां सीतायां रामपत्न्यां महाबलः।
प्रत्युवाचोत्तरं तीव्र रावणो राक्षसाधिपः॥२५॥
भावार्थ :-
श्रीरामपत्नी सीता के इस प्रकार पूछने पर महाबली राक्षसराज रावण ने अत्यन्त कठोर शब्दों में उत्तर दिया॥२५॥
श्लोक:
येन वित्रासिता लोकाः सदेवासुरमानुषाः।
अहं स रावणो नाम सीते रक्षोगणेश्वरः॥२६॥
भावार्थ :-
‘सीते! जिसके नाम से देवता, असुर और मनुष्योंसहित तीनों लोक थर्रा उठते हैं, मैं वही राक्षसों का राजा रावण हूँ॥२६॥
श्लोक:
त्वां तु काञ्चनवर्णाभां दृष्ट्वा कौशेयवासिनीम्।
रतिं स्वकेषु दारेषु नाधिगच्छाम्यनिन्दिते॥२७॥
भावार्थ :-
‘अनिन्द्यसुन्दरि! तुम्हारे अङ्गों की कान्ति सुवर्ण के समान है, जिनपर रेशमी साड़ी शोभा पा रही है। तुम्हें देखकर अब मेरा मन अपनी स्त्रियों की ओर नहीं जाता है॥२७॥
श्लोक:
बह्वीनामुत्तमस्त्रीणामाहृतानामितस्ततः।
सर्वासामेव भद्रं ते ममाग्रमहिषी भव॥२८॥
भावार्थ :-
‘मैं इधर-उधर से बहुत-सी सुन्दरी स्त्रियों को हर लाया हूँ। उन सबमें तुम मेरी पटरानी बनो। तुम्हारा भला हो॥२८॥
श्लोक:
लङ्का नाम समुद्रस्य मध्ये मम महापुरी।
सागरेण परिक्षिप्ता निविष्टा गिरिमूर्धनि॥२९॥
भावार्थ :-
‘मेरी राजधानी का नाम लङ्का है। वह महापुरी समुद्र के बीच में एक पर्वत के शिखर पर बसी हुई है। समुद्र ने उसे चारों ओर से घेर रखा है॥२९॥
श्लोक:
तत्र सीते मया सार्धं वनेषु विचरिष्यसि।
न चास्य वनवासस्य स्पृहयिष्यसि भामिनि॥३०॥
भावार्थ :-
‘सीते! वहाँ रहकर तुम मेरे साथ नाना प्रकार के वनों में विचरण करोगी। भामिनि! फिर तुम्हारे मन में इस वनवास की इच्छा कभी नहीं होगी॥३०॥
श्लोक:
पञ्च दास्यः सहस्राणि सर्वाभरणभूषिताः।
सीते परिचरिष्यन्ति भार्या भवसि मे यदि॥३१॥
भावार्थ :-
‘सीते! यदि तुम मेरी भार्या हो जाओगी तो सब प्रकार के आभूषणों से विभूषित पाँच हजार दासियाँ सदा तुम्हारी सेवा किया करेंगी’॥३१॥
श्लोक:
रावणेनैवमुक्ता तु कुपिता जनकात्मजा।
प्रत्युवाचानवद्याङ्गी तमनादृत्य राक्षसम्॥३२॥
भावार्थ :-
रावण के ऐसा कहने पर निर्दोष अङ्गोंवाली जनकनन्दिनी सीता कुपित हो उठीं और राक्षस का तिरस्कार करके उसे यों उत्तर देने लगीं-॥३२॥
श्लोक:
महागिरिमिवाकम्प्यं महेन्द्रसदृशं पतिम्।
महोदधिमिवाक्षोभ्यमहं राममनुव्रता॥३३॥
भावार्थ :-
‘मेरे पतिदेव भगवान् श्रीराम महान् पर्वत के समान अविचल हैं, इन्द्र के तुल्य पराक्रमी हैं और महासागर के समान प्रशान्त हैं, उन्हें कोई क्षुब्ध नहीं कर सकता। मैं तन-मन-प्राण से उन्हीं का अनुसरण करने वाली तथा उन्हीं की अनुरागिणी हूँ॥३३॥
श्लोक:
सर्वलक्षणसम्पन्नं न्यग्रोधपरिमण्डलम्।
सत्यसंधं महाभागमहं राममनूव्रता॥३४॥
भावार्थ :-
‘श्रीरामचन्द्रजी समस्त शुभ लक्षणों से सम्पन्न, वटवृक्ष की भाँति सबको अपनी छाया में आश्रय देने वाले, सत्यप्रतिज्ञ और महान् सौभाग्यशाली हैं। मैं उन्हीं की अनन्य अनुरागिणी हूँ॥३४॥
श्लोक:
महाबाहुं महोरस्कं सिंहविक्रान्तगामिनम्।
नृसिंहं सिंहसंकाशमहं राममनुव्रता॥३५॥
भावार्थ :-
‘उनकी भुजाएँ बड़ी-बड़ी और छाती चौड़ी है। वे सिंह के समान पाँव बढ़ाते हुए बड़े गर्व के साथ चलते हैं और सिंह के ही समान पराक्रमी हैं। मैं उन पुरुषसिंह श्रीराम में ही अनन्य भक्ति रखने वाली हूँ॥३५॥
श्लोक:
पूर्णचन्द्राननं रामं राजवत्सं जितेन्द्रियम्।
पृथुकीर्तिं महाबाहुमहं राममनुव्रता॥३६॥
भावार्थ :-
‘राजकुमार श्रीराम का मुख पूर्ण चन्द्रमा के समान मनोहर है। वे जितेन्द्रिय हैं और उनका यश महान् है। उन महाबाहु श्रीराम में ही दृढ़तापूर्वक मेरा मन लगा हुआ है॥३६॥
श्लोक:
त्वं पुनर्जम्बुकः सिंहीं मामिहेच्छसि दुर्लभाम्।
नाहं शक्या त्वया स्प्रष्टमादित्यस्य प्रभा यथा॥३७॥
भावार्थ :-
‘पापी निशाचर! तू सियार है और मैं सिंहिनी हूँ। मैं तेरे लिये सर्वथा दुर्लभ हूँ। क्या तू यहाँ मुझे प्राप्त करने की इच्छा रखता है। अरे! जैसे सूर्य की प्रभा पर कोई हाथ नहीं लगा सकता, उसी प्रकार तू मुझे छू भी नहीं सकता॥३७॥
श्लोक:
पादपान् काञ्चनान् नूनं बहून् पश्यसि मन्दभाक्।
राघवस्य प्रियां भार्यां यस्त्वमिच्छसि राक्षस॥३८॥
भावार्थ :-
‘अभागे राक्षस! तेरा इतना साहस! तू श्रीरघुनाथजी की प्यारी पत्नी का अपहरण करना चाहता है! निश्चय ही तुझे बहुत-से सोने के वृक्ष दिखायी देने लगे हैं- अब तू मौत के निकट जा पहुँचा है॥३८॥
श्लोक:
क्षुधितस्य च सिंहस्य मृगशत्रोस्तरस्विनः।
आशीविषस्य वदनाद् दंष्ट्रामादातुमिच्छसि॥३९॥
मन्दरं पर्वतश्रेष्ठं पाणिना हर्तुमिच्छसि।
कालकूटं विषं पीत्वा स्वस्तिमान् गन्तुमिच्छसि॥४०॥
अक्षि सूच्या प्रमृजसि जिह्वया लेढि च क्षुरम्।
राघवस्य प्रियां भार्यामधिगन्तुं त्वमिच्छसि॥४१॥
भावार्थ :-
‘तू श्रीराम की प्यारी पत्नी को हस्तगत करना चाहता है। जान पड़ता है, अत्यन्त वेगशाली मृगवैरी भूखे सिंह और विषधर सर्प के मुख से उनके दाँत तोड़ लेना चाहता है, पर्वतश्रेष्ठ मन्दराचल को हाथ से उठाकर ले जाने की इच्छा करता है, कालकूट विष को पीकर कुशलपूर्वक लौट जाने की अभिलाषा रखता है तथा आँख को सूई से पोंछता और छुरे को जीभसे चाटता है॥३९-४१॥
श्लोक:
अवसज्य शिलां कण्ठे समुद्रं तर्तुमिच्छसि।
सूर्याचन्द्रमसौ चोभौ पाणिभ्यां हर्तुमिच्छसि॥४२॥
यो रामस्य प्रियां भार्यां प्रधर्षयितुमिच्छसि।
भावार्थ :-
‘क्या तू अपने गले में पत्थर बाँधकर समुद्र को पार करना चाहता है? सूर्य और चन्द्रमा दोनों को अपने दोनों हाथों से हर लाने की इच्छा करता है? जो श्रीरामचन्द्रजी की प्यारी पत्नी पर बलात् करने को उतारू हुआ है॥४२ १/२॥
श्लोक:
अग्निं प्रज्वलितं दृष्ट्वा वस्त्रेणाहर्तुमिच्छसि॥४३॥
कल्याणवृत्तां यो भार्यां रामस्याहर्तुमिच्छसि।
भावार्थ :-
‘यदि तू कल्याणमय आचार का पालन करने वाली श्रीराम की भार्या का अपहरण करना चाहता है तो अवश्य ही जलती हुई आग को देखकर भी तू उसे कपड़े में बाँधकर ले जाने की इच्छा करता है॥४३ १/२॥
श्लोक:
अयोमुखानां शूलानामग्रे चरितुमिच्छसि।
रामस्य सदृशीं भार्यां योऽधिगन्तुं त्वमिच्छसि॥४४॥
भावार्थ :-
‘अरे तू श्रीराम की भार्या को, जो सर्वथा उन्हीं के योग्य है, हस्तगत करना चाहता है, तो निश्चय ही लोहमय मुखवाले शूलों की नोक पर चलने की अभिलाषा करता है॥४४॥
श्लोक:
यदन्तरं सिंहसृगालयोर्वने यदन्तरं स्यन्दनिकासमुद्रयोः।
सुराग्रयसौवीरकयोर्यदन्तरं तदन्तरं दाशरथेस्तवैव च॥४५॥
भावार्थ :-
‘वन में रहने वाले सिंह और सियार में, समुद्र और छोटी नदी में तथा अमृत और काँजी में जो अन्तर है, वही अन्तर दशरथनन्दन श्रीराम में और तुझमें है॥४५॥
श्लोक:
यदन्तरं काञ्चनसीसलोहयोर्यदन्तरं चन्दनवारिपङ्कयोः।
यदन्तरं हस्तिबिडालयोर्वने तदन्तरं दाशरथेस्तवैव च॥४६॥
भावार्थ :-
‘सोने और सीसे में, चन्दनमिश्रित जल और कीचड़ में तथा वन में रहने वाले हाथी और बिलाव में जो अन्तर है, वही अन्तर दशरथनन्दन श्रीराम और तुझमें है॥४६॥
श्लोक:
यदन्तरं वायसवैनतेययोर्यदन्तरं मद्गुमयूरयोरपि।
यदन्तरं हंसकगृध्रयोर्वने तदन्तरं दाशरथेस्तवैव च॥४७॥
भावार्थ :-
‘गरुड़ और कौए में, मोर और जलकाक में तथा वनवासी हंस और गीध में जो अन्तर है, वही अन्तर दशरथनन्दन श्रीराम और तुझमें है॥४७॥
श्लोक:
तस्मिन् सहस्राक्षसमप्रभावे रामे स्थिते कार्मुकबाणपाणौ।
हृतापि तेऽहं न जरां गमिष्ये आज्यं यथा मक्षिकयावगीर्णम्॥४८॥
भावार्थ :-
‘जिस समय सहस्र नेत्रधारी इन्द्र के समान प्रभावशाली श्रीरामचन्द्रजी हाथ में धनुष और बाण लेकर खड़े हो जायँगे, उस समय तू मेरा अपहरण करके भी मुझे पचा नहीं सकेगा, ठीक उसी तरह जैसे मक्खी घी पीकर उसे पचा नहीं सकती’॥४८॥
श्लोक:
इतीव तद्वाक्यमदुष्टभावा सुदुष्टमुक्त्वा रजनीचरं तम्।
गात्रप्रकम्पाद् व्यथिता बभूव वातोद्धता सा कदलीव तन्वी॥४९॥
भावार्थ :-
सीता के मन में कोई दुर्भाव नहीं था तो भी उस राक्षस से यह अत्यन्त दुःखजनक बात कहकर सीता रोष से काँपने लगीं। शरीर के कम्पन से कृशाङ्गी सीता हवा से हिलायी गयी कदली के समान व्यथित हो उठीं॥४९॥
श्लोक:
तां वेपमानामुपलक्ष्य सीतां स रावणो मृत्युसमप्रभावः।
कुलं बलं नाम च कर्म चात्मनः समाचचक्षे भयकारणार्थम्॥५०॥
भावार्थ :-
सीता को काँपती देख मौत के समान प्रभाव रखने वाला रावण उनके मन में भय उत्पन्न करने के लिये अपने कुल, बल, नाम और कर्म का परिचय देने लगा॥५०॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे सप्तचत्वारिंशः सर्गः॥४७॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अरण्यकाण्ड में सैंतालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥४७॥
अरण्यकाण्डम्
अष्टचत्वारिंशः सर्गः (सर्ग 48)
( रावण के द्वारा अपने पराक्रम का वर्णन और सीता द्वारा उसको कड़ी फटकार )
श्लोक:
एवं ब्रुवत्यां सीतायां संरब्धः परुषं वचः।
ललाटे भ्रकुटिं कृत्वा रावणः प्रत्युवाच ह॥१॥
भावार्थ :-
सीता के ऐसा कहने पर रावण रोष में भर गया और ललाट में भौहें टेढ़ी करके वह कठोर वाणी में बोला–॥१॥
श्लोक:
भ्राता वैश्रवणस्याहं सापत्नो वरवर्णिनि।
रावणो नाम भद्रं ते दशग्रीवः प्रतापवान्॥२॥
भावार्थ :-
‘सुन्दरि! मैं कुबेर का सौतेला भाई परम प्रतापी दशग्रीव रावण हूँ। तुम्हारा भला हो॥२॥
श्लोक:
यस्य देवाः सगन्धर्वाः पिशाचपतगोरगाः।
विद्रवन्ति सदा भीता मृत्योरिव सदा प्रजाः॥३॥
येन वैश्रवणो भ्राता वैमात्राः कारणान्तरे।
द्वन्द्वमासादितः क्रोधाद् रणे विक्रम्य निर्जितः॥४॥
भावार्थ :-
‘जैसे प्रजा मौत के भय से सदा डरती रहती है, उसी प्रकार देवता, गन्धर्व, पिशाच, पक्षी और नाग सदा जिससे भयभीत होकर भागते हैं, जिसने किसी कारणवश अपने सौतेले भाई कुबेर के साथ द्वन्द्वयुद्ध किया और क्रोधपूर्वक पराक्रम करके रणभूमि में उन्हें परास्त कर दिया था, वही रावण मैं हूँ॥३-४॥
श्लोक:
मद्भयार्तः परित्यज्य स्वमधिष्ठानमृद्धिमत्।
कैलास पर्वतश्रेष्ठमध्यास्ते नरवाहनः॥५॥
भावार्थ :-
‘मेरे ही भय से पीड़ित हो नरवाहन कुबेर ने अपनी समृद्धिशालिनी पुरी लङ्का का परित्याग करके इस समय पर्वतश्रेष्ठ कैलास की शरण ली है॥५॥
श्लोक:
यस्य तत् पुष्पकं नाम विमानं कामगं शुभम्।
वीर्यादावर्जितं भद्रे येन यामि विहायसम्॥६॥
भावार्थ :-
‘भद्रे! उनका सुप्रसिद्ध पुष्पक नामक सुन्दर विमान, जो इच्छा के अनुसार चलने वाला है, मैंने पराक्रम से जीत लिया है और उसी विमान के द्वारा मैं आकाश में विचरता हूँ॥६॥
श्लोक:
मम संजातरोषस्य मुखं दृष्ट्वैव मैथिलि।
विद्रवन्ति परित्रस्ताः सुराः शक्रपुरोगमाः॥७॥
भावार्थ :-
‘मिथिलेशकुमारी! जब मुझे रोष चढ़ता है, उस समय इन्द्र आदि सब देवता मेरा मुँह देखकर ही भय से थर्रा उठते हैं और इधर-उधर भाग जाते हैं॥७॥
श्लोक:
यत्र तिष्ठाम्यहं तत्र मारुतो वाति शङ्कितः।
तीव्रांशुः शिशिरांशुश्च भयात् सम्पद्यते दिवि॥८॥
भावार्थ :-
‘जहाँ मैं खड़ा होता हूँ, वहाँ हवा डरकर धीरे-धीरे चलने लगती है। मेरे भय से आकाश में प्रचण्ड किरणों वाला सूर्य भी चन्द्रमा के समान शीतल हो जाता है॥८॥
श्लोक:
निष्कम्पपत्रास्तरवो नद्यश्च स्तिमितोदकाः।
भवन्ति यत्र तत्राहं तिष्ठामि च चरामि च॥९॥
भावार्थ :-
‘जिस स्थान पर मैं ठहरता या भ्रमण करता हूँ, वहाँ वृक्षों के पत्ते तक नहीं हिलते और नदियों का पानी स्थिर हो जाता है॥९॥
श्लोक:
मम पारे समुद्रस्य लङ्का नाम पुरी शुभा।
सम्पूर्णा राक्षसैोरैर्यथेन्द्रस्यामरावती॥१०॥
भावार्थ :-
‘समुद्र के उस पार लङ्का नामक मेरी सुन्दर पुरी है, जो इन्द्र की अमरावती के समान मनोहर तथा घोरराक्षसों से भरी हुई है॥१०॥
श्लोक:
प्राकारेण परिक्षिप्ता पाण्डुरेण विराजिता।
हेमकक्ष्या पुरी रम्या वैदूर्यमयतोरणा॥११॥
भावार्थ :-
‘उसके चारों ओर बनी हुई सफेद चहारदिवारी उस पुरी की शोभा बढ़ाती है। लङ्कापुरी के महलों के दालान, फर्श आदि सोने के बने हैं और उसके बाहरी दरवाजे वैदूर्यमय हैं। वह पुरी बहुत ही रमणीय है॥
११॥
श्लोक:
हस्त्यश्वरथसम्बाधा तूर्यनादविनादिता।
सर्वकामफलैर्वृक्षैः संकुलोद्यानभूषिता॥१२॥
भावार्थ :-
‘हाथी, घोड़े और रथों से वहाँ की सड़कें भरी रहती हैं। भाँति-भाँति के वाद्यों की ध्वनि गूंजा करती है। सब प्रकार के मनोवाञ्छित फल देने वाले वृक्षों से लङ्कापुरी व्याप्त है। नाना प्रकार के उद्यान उसकी शोभा बढ़ाते हैं॥१२॥
श्लोक:
तत्र त्वं वस हे सीते राजपुत्रि मया सह।
न स्मरिष्यसि नारीणां मानुषीणां मनस्विनि॥१३॥
भावार्थ :-
‘राजकुमारी सीते! तुम मेरे साथ उस पुरी में चलकर निवास करो। मनस्विनि! वहाँ रहकर तुम मानवी स्त्रियों को भूल जाओगी॥१३॥
श्लोक:
भुञ्जाना मानुषान् भोगान् दिव्यांश्च वरवर्णिनि।
न स्मरिष्यसि रामस्य मानुषस्य गतायुषः॥१४॥
भावार्थ :-
‘सुन्दरि! लङ्का में दिव्य और मानुष-भोगों का उपभोग करती हुई तुम उस मनुष्य राम का कभी स्मरण नहीं करोगी, जिसकी आयु अब समाप्त हो चली है॥१४॥
श्लोक:
स्थापयित्वा प्रियं पुत्रं राज्ये दशरथो नृपः।
मन्दवीर्यस्ततो ज्येष्ठः सुतः प्रस्थापितो वनम्॥१५॥
तेन किं भ्रष्टराज्येन रामेण गतचेतसा।
करिष्यसि विशालाक्षि तापसेन तपस्विना॥१६॥
भावार्थ :-
‘विशाललोचने! राजा दशरथ ने अपने प्यारे पुत्र को राज्य पर बिठाकर जिस अल्पपराक्रमी ज्येष्ठ पुत्र को वन में भेज दिया, उस राज्यभ्रष्ट, बुद्धिहीन एवं तपस्या में लगे हुए तापस राम को लेकर क्या करोगी?॥१५-१६॥
श्लोक:
रक्ष राक्षसभर्तारं कामय स्वयमागतम्।
न मन्मथशराविष्टं प्रत्याख्यातुं त्वमर्हसि॥१७॥
भावार्थ :-
‘यह राक्षसों का स्वामी स्वयं तुम्हारे द्वार पर आया है, तुम इसकी रक्षा करो, इसे मन से चाहो यह कामदेव के बाणों से पीड़ित है। इसे ठुकराना तुम्हारे लिये उचित नहीं है॥१७॥
श्लोक:
प्रत्याख्याय हि मां भीरु पश्चात्तापं गमिष्यसि।
चरणेनाभिहत्येव पुरूरवसमर्वशी॥१८॥
भावार्थ :-
‘भीरु ! मुझे ठुकराकर तुम उसी तरह पश्चात्ताप करोगी, जैसे पुरूरवा को लात मारकर उर्वशी पछतायी थी॥१८॥
श्लोक:
अङ्गल्या न समो रामो मम युद्धे स मानुषः।
तव भाग्येन सम्प्राप्तं भजस्व वरवर्णिनि॥१९॥
भावार्थ :-
‘सुन्दरि! युद्ध में मनुष्यजातीय राम मेरी एक अङ्गुलि के बराबर भी नहीं है। तुम्हारे भाग्य से मैं आ गया हूँ। तुम मुझे स्वीकार करो’॥१९॥
श्लोक:
एवमुक्ता तु वैदेही क्रुद्धा संरक्तलोचना।
अब्रवीत् परुषं वाक्यं रहिते राक्षसाधिपम्॥२०॥
भावार्थ :-
रावण के ऐसा कहने पर विदेहकुमारी सीता के नेत्र क्रोध से लाल हो गये। उन्होंने उस एकान्त स्थान में राक्षसराज रावण से कठोर वाणी में कहा-॥२०॥
श्लोक:
कथं वैश्रवणं देवं सर्वदेवनमस्कृतम्।
भ्रातरं व्यपदिश्य त्वमशुभं कर्तुमिच्छसि॥२१॥
भावार्थ :-
‘अरे! भगवान् कुबेर तो सम्पूर्ण देवताओं के वन्दनीय हैं। तू उन्हें अपना भाई बताकर ऐसा पापकर्म कैसे करना चाहता है?॥२१॥
श्लोक:
अवश्यं विनशिष्यन्ति सर्वे रावण राक्षसाः।
येषां त्वं कर्कशो राजा दुर्बुद्धिरजितेन्द्रियः॥२२॥
भावार्थ :-
‘रावण! जिनका तुझ-जैसा क्रूर, दुर्बुद्धि और अजितेन्द्रिय राजा है, वे सब राक्षस अवश्य ही नष्ट हो जायँगे॥२२॥
श्लोक:
अपहृत्य शची भार्यां शक्यमिन्द्रस्य जीवितुम्।
नहि रामस्य भार्यां मामानीय स्वस्तिमान् भवेत्॥२३॥
भावार्थ :-
‘इन्द्रकी पत्नी शची का अपहरण करके सम्भव है कोई जीवित रह जाय; किंतु रामपत्नी मुझ सीता का हरण करके कोई कुशल से नहीं रह सकता॥२३॥
श्लोक:
जीवेच्चिरं वज्रधरस्य पश्चाच्छची प्रधृष्याप्रतिरूपरूपाम्।
न मादृशीं राक्षस धर्षयित्वा पीतामृतस्यापि तवास्ति मोक्षः॥२४॥
भावार्थ :-
‘राक्षस! वज्रधारी इन्द्र की अनुपम रूपवती भार्या शची का तिरस्कार करके सम्भव है कोई उसके बाद भी चिरकाल तक जीवित रह जाय; परंतु मेरी-जैसी स्त्री का अपमान करके तू अमृत पी ले तो भी तुझे जीते-जी छुटकारा नहीं मिल सकता’॥२४॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डेऽष्टचत्वारिंशः सर्गः॥४८॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अरण्यकाण्ड में अड़तालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥४८॥
अरण्यकाण्डम्
एकोनपञ्चाशः सर्गः (सर्ग 49)
( रावण द्वारा सीता का अपहरण, सीता का विलाप और उनके द्वारा जटायु का दर्शन )
श्लोक:
सीताया वचनं श्रुत्वा दशग्रीवः प्रतापवान्।
हस्ते हस्तं समाहत्य चकार सुमहद् वपुः॥१॥
भावार्थ :-
सीता के इस वचन को सुनकर प्रतापी दशमुखरावण ने अपने हाथ पर हाथ मारकर शरीर को बहुत बड़ा बना लिया॥१॥
श्लोक:
स मैथिली पुनर्वाक्यं बभाषे वाक्यकोविदः।
नोन्मत्तया श्रुतौ मन्ये मम वीर्यपराक्रमौ॥२॥
भावार्थ :-
वह बातचीत करने की कला जानता था। उसने मिथिलेशकुमारी सीता से फिर इस प्रकार कहना आरम्भ किया—’मेरी समझ में तुम पागल हो गयी हो, इसीलिये तुमने मेरे बल और पराक्रम की बातें अनसुनी कर दी हैं॥२॥
श्लोक:
उदहेयं भुजाभ्यां तु मेदिनीमम्बरे स्थितः।
आपिबेयं समुद्रं च मृत्युं हन्यां रणे स्थितः॥३॥
भावार्थ :-
‘अरी! मैं आकाश में खड़ा हो इन दोनों भुजाओं से ही सारी पृथ्वी को उठा ले जा सकता हूँ। समुद्र को पी सकता हूँ और युद्ध में स्थित हो मौत को भी मार सकता हूँ॥३॥
श्लोक:
अर्कं तुद्यां शरैस्तीक्ष्णैर्विभिन्द्यां हि महीतलम्।
कामरूपेण उन्मत्ते पश्य मां कामरूपिणम्॥४॥
भावार्थ :-
‘काम तथा रूप से उन्मत्त रहने वाली नारी! यदि चाहूँ तो अपने तीखे बाणों से सूर्य को भी व्यथित कर दूँ और इस भूतल को भी विदीर्ण कर डालूँ। मैं इच्छानुसार रूप धारण करने में समर्थ हूँ तुम मेरी ओर देखो’॥४॥
श्लोक:
एवमुक्तवतस्तस्य रावणस्य शिखिप्रभे।
क्रुद्धस्य हरिपर्यन्ते रक्ते नेत्रे बभूवतुः॥५॥
भावार्थ :-
ऐसा कहते-कहते क्रोध से भरे हुए रावण की आँखें, जिनके प्रान्तभाग काले थे, जलती आग के समान लाल हो गयीं॥५॥
श्लोक:
सद्यः सौम्यं परित्यज्य तीक्ष्णरूपं स रावणः।
स्वं रूपं कालरूपाभं भेजे वैश्रवणानुजः॥६॥
भावार्थ :-
कुबेर के छोटे भाई रावण ने तत्काल अपने सौम्य रूप को त्यागकर तीखा एवं काल के समान विकराल अपना स्वाभाविक रूप धारण कर लिया॥६॥
श्लोक:
संरक्तनयनः श्रीमांस्तप्तकाञ्चनभूषणः।
क्रोधेन महताविष्टो नीलजीमूतसंनिभः॥७॥
भावार्थ :-
उस समय श्रीमान् रावण के सभी नेत्र लाल हो रहे थे। वह पक्के सोने के आभूषणों से अलंकृत था और महान् क्रोध से आविष्ट हो नीलमेघ के समान काला दिखायी देने लगा॥७॥
श्लोक:
दशास्यो विंशतिभुजो बभूव क्षणदाचरः।
स परिव्राजकच्छद्म महाकायो विहाय तत्॥८॥
भावार्थ :-
वह विशालकाय निशाचर परिव्राजक के उस छद्मवेश को त्यागकर दस मुखों और बीस भुजाओं से संयुक्त हो गया॥८॥
श्लोक:
प्रतिपेदे स्वकं रूपं रावणो राक्षसाधिपः।
रक्ताम्बरधरस्तस्थौ स्त्रीरत्नं प्रेक्ष्य मैथिलीम्॥९॥
भावार्थ :-
उस समय राक्षसराज रावण ने अपने सहज रूप को ग्रहण कर लिया और लाल रंग के वस्त्र पहनकर वह स्त्री-रत्न सीता की ओर देखता हुआ खड़ा हो गया॥९॥
श्लोक:
स तामसितकेशान्तां भास्करस्य प्रभामिव।
वसनाभरणोपेतां मैथिली रावणोऽब्रवीत्॥१०॥
भावार्थ :-
काले केशवाली मैथिली वस्त्राभूषणों से विभूषित हो सूर्य की प्रभा-सी जान पड़ती थीं। रावण ने उनसे कहा-॥१०॥
श्लोक:
त्रिषु लोकेषु विख्यातं यदि भर्तारमिच्छसि।
मामाश्रय वरारोहे तवाहं सदृशः पतिः॥११॥
भावार्थ :-
‘वरारोहे ! यदि तुम तीनों लोकों में विख्यात पुरुष को अपना पति बनाना चाहती हो तो मेरा आश्रय लो। मैं ही तुम्हारे योग्य पति हूँ॥११॥
श्लोक:
मां भजस्व चिराय त्वमहं श्लाघ्यः पतिस्तव।
नैव चाहं क्वचिद् भद्रे करिष्ये तव विप्रियम्॥१२॥
भावार्थ :-
‘भद्रे! मुझे सुदीर्घकाल के लिये स्वीकार करो। मैं तुम्हारे लिये स्पृहणीय एवं प्रशंसनीय पति होऊँगा तथा कभी तुम्हारे मन के प्रतिकूल कोई बर्ताव नहीं करूँगा॥१२॥
श्लोक:
त्यज्यतां मानुषो भावो मयि भावः प्रणीयताम्।
राज्याच्च्यतमसिद्धार्थं रामं परिमितायुषम्॥१३॥
कैर्गुणैरनुरक्तासि मूढे पण्डितमानिनि।।
भावार्थ :-
‘मनुष्य राम के विषय में जो तुम्हारा अनुराग है, उसे त्याग दो और मुझसे स्नेह करो। अपने को पण्डित (बुद्धिमती) मानने वाली मूढ़ नारी! जो राज्य से भ्रष्ट है, जिसका मनोरथ सफल नहीं हुआ तथा जिसकी आयु सीमित है, उस राम में किन गुणों के कारण तुम अनुरक्त हो॥१३ १/२॥
श्लोक:
यः स्त्रियो वचनाद् राज्यं विहाय ससुहृज्जनम्॥१४॥
अस्मिन् व्यालानुचरिते वने वसति दुर्मतिः।
भावार्थ :-
‘जो एक स्त्री के कहने से सुहृदोंसहित सारे राज्य का त्याग करके इस हिंसक जन्तुओं से सेवित वन में निवास करता है, उसकी बुद्धि कैसी खोटी है? (वह सर्वथा मूढ़ है)’॥१४ १/२॥
श्लोक:
इत्युक्त्वा मैथिली वाक्यं प्रियाहाँ प्रियवादिनीम्॥१५॥
अभिगम्य सुदुष्टात्मा राक्षसः काममोहितः।
जग्राह रावणः सीतां बुधः खे रोहिणीमिव॥१६॥
भावार्थ :-
जो प्रिय वचन सुनने के योग्य और सबसे प्रिय वचन बोलने वाली थीं, उन मिथिलेशकुमारी सीता से ऐसा अप्रिय वचन कहकर काम से मोहित हुए उस अत्यन्त दुष्टात्मा राक्षस रावण ने निकट जाकर (माता के समान आदरणीया) सीता को पकड़ लिया, मानो बुधने आकाश में अपनी माता रोहिणी को पकड़ने का दुस्साहस किया हो*॥१५-१६॥
* यहाँ अभूतोपमालंकार है। बुध चन्द्रमाके पुत्र हैं और रोहिणी चन्द्रमाकी पत्नी। बुधने न तो कभी रोहिणीको पकड़ा है और न वे ऐसा कर ही सकते हैं। यहाँ यह दिखाया गया है कि यदि कदाचित् बुध कामवश अपनी माता रोहिणीको पकड़ लें तो वह जैसा घोर पाप होगा, वही पाप रावणने सीताको पकड़नेके कारण किया था।
श्लोक:
वामेन सीतां पद्माक्षीं मूर्धजेषु करेण सः।
ऊर्वोस्तु दक्षिणेनैव परिजग्राह पाणिना॥१७॥
भावार्थ :-
उसने बायें हाथ से कमलनयनी सीता के केशोंसहित मस्तक को पकड़ा तथा दाहिना हाथ उनकी दोनों जाँघों के नीचे लगाकर उसके द्वारा उन्हें उठा लिया॥१७॥
श्लोक:
तं दृष्ट्वा गिरिशृङ्गाभं तीक्ष्णदंष्ट्रं महाभुजम्।
प्राद्रवन् मृत्युसंकाशं भयार्ता वनदेवताः॥१८॥
भावार्थ :-
उस समय तीखी दाढ़ों और विशाल भुजाओं से युक्त पर्वतशिखर के समान प्रतीत होने वाले उसकाल के समान विकराल राक्षस को देखकर वन के समस्त देवता भयभीत होकर भाग गये॥१८॥
श्लोक:
स च मायामयो दिव्यः खरयुक्तः खरस्वनः।
प्रत्यदृश्यत हेमाङ्गो रावणस्य महारथः॥१९॥
भावार्थ :-
इतने ही में गधों से जुता हुआ और गधों के समान ही शब्द करने वाला रावण का वह विशाल सुवर्णमय मायानिर्मित दिव्य रथ वहाँ दिखायी दिया॥१९॥
श्लोक:
ततस्तां परुषैर्वाक्यैरभितर्ध्य महास्वनः।
अंकेनादाय वैदेहीं रथमारोपयत् तदा॥२०॥
भावार्थ :-
रथ के प्रकट होते ही जोर-जोर से गर्जना करने वाले रावण ने कठोर वचनों द्वारा विदेहनन्दिनी सीता को डाँटा और पूर्वोक्त रूप से गोद में उठाकर तत्काल रथपर बिठा दिया॥२०॥
श्लोक:
सा गृहीतातिचुक्रोश रावणेन यशस्विनी।
रामेति सीता दुःखार्ता रामं दूरं गतं वने॥२१॥
भावार्थ :-
रावण के द्वारा पकड़ी जाने पर यशस्विनी सीता दुःख से व्याकुल हो गयीं और वन में दूर गये हुए श्रीरामचन्द्रजी को ‘हे राम!’ कहकर जोर-जोर से पुकारने लगीं॥२१॥
श्लोक:
तामकामां स कामार्तः पन्नगेन्द्रवधूमिव।
विचेष्टमानामादाय उत्पपाताथ रावणः॥२२॥
भावार्थ :-
सीता के मन में रावण की कामना नहीं थी— वे उसकी ओर से सर्वथा विरक्त थीं और उसकी कैद से अपने को छुड़ाने के लिये चोट खायी हुई नागिन की तरह उस रथ पर छटपटा रही थीं। उसी अवस्था में कामपीड़ित राक्षस उन्हें लेकर आकाश में उड़ चला॥२२॥
श्लोक:
ततः सा राक्षसेन्द्रेण ह्रियमाणा विहायसा।
भृशं चक्रोश मत्तेव भ्रान्तचित्ता यथातुरा॥२३॥
भावार्थ :-
राक्षसराज जब सीता को हरकर आकाशमार्ग से ले जाने लगा, उस समय उनका चित्त भ्रमित हो उठा।वे पगली-सी हो गयीं और दुःख से आतुर-सी होकर जोर-जोर से विलाप करने लगीं-॥२३॥
श्लोक:
हा लक्ष्मण महाबाहो गुरुचित्तप्रसादक।
ह्रियमाणां न जानीषे रक्षसा कामरूपिणा॥२४॥
भावार्थ :-
‘हा महाबाहु लक्ष्मण! तुम गुरुजनों के मन को प्रसन्न करने वाले हो। इस समय इच्छानुसार रूप धारण करने वाला राक्षस मुझे हरकर लिये जाता है, किंतु तुम्हें इसका पता नहीं है॥२४॥
श्लोक:
जीवितं सुखमर्थं च धर्महेतोः परित्यजन्।
ह्रियमाणामधर्मेण मां राघव न पश्यसि॥२५॥
भावार्थ :-
‘हा रघुनन्दन! आपने धर्म के लिये प्राणों का मोह, शरीर का सुख तथा राज्य-वैभव सब कुछ छोड़ दिया है। यह राक्षस मुझे अधर्मपूर्वक हरकर लिये जा रहा है, परंतु आप नहीं देखते हैं॥२५॥
श्लोक:
ननु नामाविनीतानां विनेतासि परंतप।
कथमेवंविधं पापं न त्वं शाधि हि रावणम्॥२६॥
भावार्थ :-
‘शत्रुओं को संताप देनेवाले आर्यपुत्र! आप तो कुमार्ग पर चलने वाले उद्दण्ड पुरुषों को दण्ड देकर उन्हें राह पर लाने वाले हैं, फिर ऐसे पापी रावण को क्यों नहीं दण्ड देते हैं।२६॥
श्लोक:
न तु सद्योऽविनीतस्य दृश्यते कर्मणः फलम्।
कालोऽप्यङ्गीभवत्यत्र सस्यानामिव पक्तये॥२७॥
भावार्थ :-
‘उद्दण्ड पुरुष के उद्दण्डतापूर्ण कर्म का फल तत्काल मिलता नहीं दिखायी देता है; क्योंकि इसमें काल भी सहकारी कारण होता है, जैसे कि खेती के पकने के लिये तदनुकूल समय की अपेक्षा होती है॥२७॥
श्लोक:
त्वं कर्म कृतवानेतत् कालोपहतचेतनः।
जीवितान्तकरं घोरं रामाद् व्यसनमाप्नुहि॥२८॥
भावार्थ :-
‘रावण! तेरे सिर पर काल नाच रहा है। उसी ने तेरी विचारशक्ति को नष्ट कर दी है, इसीलिये तूने ऐसा पापकर्म किया है। तुझे श्रीराम से वह भयंकर संकट प्राप्त हो, जो तेरे प्राणों का अन्त कर डाले॥२८॥
श्लोक:
हन्तेदानीं सकामा त कैकेयी बान्धवैः सह।
ह्रियेयं धर्मकामस्य धर्मपत्नी यशस्विनः॥२९॥
भावार्थ :-
‘हाय! इस समय कैकेयी अपने बन्धुबान्धवोंसहित सफलमनोरथ हो गयी; क्योंकि धर्मकी अभिलाषा रखनेवाले यशस्वी श्रीरामकी धर्मपत्नी होकर भी मैं एक राक्षसद्वारा हरी जा रही हूँ॥२९॥
श्लोक:
आमन्त्रये जनस्थाने कर्णिकारांश्च पुष्पितान्।
क्षिप्रं रामाय शंसध्वं सीतां हरति रावणः॥३०॥
भावार्थ :-
‘मैं जनस्थान में खिले हुए कनेर वृक्षों से प्रार्थना करती हूँ, तुमलोग शीघ्र ही श्रीराम से कहना कि सीता को रावण हर ले जा रहा है॥३०॥
श्लोक:
हंससारससंघुष्टां वन्दे गोदावरी नदीम्।
क्षिप्रं रामाय शंस त्वं सीतां हरति रावणः॥३१॥
भावार्थ :-
‘हंसों और सारसों के कलरवों से मुखरित हुई गोदावरी नदी को मैं प्रणाम करती हूँ। माँ! तुम श्रीराम से शीघ्र ही कह देना, सीता को रावण हर ले जा रहा है॥३१॥
श्लोक:
दैवतानि च यान्यस्मिन् वने विविधपादपे।
नमस्करोम्यहं तेभ्यो भर्तुः शंसत मां हृताम्॥३२॥
भावार्थ :-
‘इस वन के विभिन्न वृक्षों पर निवास करने वाले जो-जो देवता हैं, उन सबको मैं नमस्कार करती हूँ। आप सब लोग शीघ्र ही मेरे स्वामी को सूचना दे दें कि आपकी स्त्री को राक्षस हर ले गया॥३२॥
श्लोक:
यानि कानिचिदप्यत्र सत्त्वानि विविधानि च।
सर्वाणि शरणं यामि मृगपक्षिगणानि वै॥३३॥
ह्रियमाणां प्रियां भर्तुः प्राणेभ्योऽपि गरीयसीम्।
विवशा ते हृता सीता रावणेनेति शंसत॥३४॥
भावार्थ :-
‘यहाँ पशु-पक्षी आदि जो कोई भी नाना प्रकार के प्राणी रहते हों, उन सबकी मैं शरण लेती हूँ। वे मेरे स्वामी श्रीरामचन्द्रजी से कहें कि जो आपको प्राणों से भी बढ़कर प्रिय थी, वह सीता हरी गयी। आपकी सीता को असहाय अवस्था में रावण हर ले गया॥३३-३४॥
श्लोक:
विदित्वा तु महाबाहुरमुत्रापि महाबलः।
आनेष्यति पराक्रम्य वैवस्वतहृतामपि॥३५॥
भावार्थ :-
‘महाबाहु श्रीराम बड़े बलवान् हैं। वे मुझे परलोक में भी गयी हुई जान लें तो यमराज के द्वारा अपहृत होने पर भी मुझको पराक्रमपूर्वक वहाँ से लौटा लायेंगे’॥३५॥
श्लोक:
सा तदा करुणा वाचो विलपन्ती सुदुःखिता।
वनस्पतिगतं गृधं ददर्शायतलोचना॥३६॥
भावार्थ :-
उस समय अत्यन्त दुःखी हो करुणाजनक बातें कहकर विलाप करती हुई विशाललोचना सीता ने एक वृक्ष पर बैठे हुए गृध्रराज जटायु को देखा॥३६॥
श्लोक:
सा तमुद्रीक्ष्य सुश्रोणी रावणस्य वशंगता।
समाक्रन्दद् भयपरा दुःखोपहतया गिरा॥३७॥
भावार्थ :-
रावण के वश में पड़ जाने के कारण सुन्दरी सीता अत्यन्त भयभीत हो रही थीं। जटायु को देखकर वे दुःखभरी वाणी में करुण क्रन्दन करने लगीं-॥३७॥
श्लोक:
जटायो पश्य मामार्य ह्रियमाणामनाथवत्।
अनेन राक्षसेन्द्रेणाकरुणं पापकर्मणा॥३८॥
भावार्थ :-
‘आर्य जटायो! देखिये, यह पापाचारी राक्षसराज अनाथ की भाँति मुझे निर्दयतापूर्वक हरकर लिये जा रहा है॥३८॥
श्लोक:
नैष वारयितुं शक्यस्त्वया क्रूरो निशाचरः।
सत्ववाञ्जितकाशी च सायुधश्चैव दुर्मतिः॥३९॥
भावार्थ :-
‘परंतु आप इस क्रूर निशाचर को रोक नहीं सकते; क्योंकि यह बलवान् है, अनेक युद्धों में विजय पाने के कारण इसका दुस्साहस बढ़ा हुआ है। इसके हाथों में हथियार है और इसके मन में दुष्टता भी भरी हुई है॥३९॥
श्लोक:
रामाय तु यथातत्त्वं जटायो हरणं मम।
लक्ष्मणाय च तत् सर्वमाख्यातव्यमशेषतः॥४०॥
भावार्थ :-
‘आर्य जटायो! जिस प्रकार मेरा अपहरण हुआ है, यह सब समाचार आप श्रीराम और लक्ष्मण से ज्यों का-ज्यों पूर्णरूप से बता दीजियेगा’॥४०॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे एकोनपञ्चाशः सर्गः॥४९॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अरण्यकाण्ड में उनचासवाँ सर्ग पूरा हुआ।४९॥
अरण्यकाण्डम्
पञ्चाशः सर्गः (सर्ग 50)
( जटायु का रावण को सीताहरण के दुष्कर्म से निवृत्त होने के लिये समझाना और अन्त में युद्ध के लिये ललकारना )
श्लोक:
तं शब्दमवसुप्तस्तु जटायुरथ शुश्रुवे।
निरैक्षद् रावणं क्षिप्रं वैदेहीं च ददर्श सः॥१॥
भावार्थ :-
जटायु उस समय सो रहे थे। उसी अवस्था में उन्होंने सीता की वह करुण पुकार सुनी। सुनते ही तुरंत आँख खोलकर उन्होंने विदेहनन्दिनी सीता तथा रावण को देखा॥१॥
श्लोक:
ततः पर्वतशृङ्गाभस्तीक्ष्णतुण्डः खगोत्तमः।
वनस्पतिगतः श्रीमान् व्याजहार शुभां गिरम्॥२॥
भावार्थ :-
पक्षियों में श्रेष्ठ श्रीमान् जटायु का शरीर पर्वतशिखर के समान ऊँचा था और उनकी चोंच बड़ी ही तीखी थी। वे पेड़ पर बैठे-ही-बैठे रावण को लक्ष्य करके यह शुभ वचन बोले-॥२॥
श्लोक:
दशग्रीव स्थितो धर्मे पुराणे सत्यसंश्रयः।
भ्रातस्त्वं निन्दितं कर्म कर्तुं नार्हसि साम्प्रतम्॥३॥
जटायुर्नाम नाम्नाहं गृध्रराजो महाबलः।
भावार्थ :-
‘दशमुख रावण! मैं प्राचीन (सनातन) धर्म में स्थित, सत्यप्रतिज्ञ और महाबलवान् गृध्रराज हूँ। मेरा नाम जटायु है। भैया! इस समय मेरे सामने तुम्हें ऐसा निन्दित कर्म नहीं करना चाहिये॥३ १/२॥
श्लोक:
राजा सर्वस्य लोकस्य महेन्द्रवरुणोपमः॥४॥
लोकानां च हिते युक्तो रामो दशरथात्मजः।
भावार्थ :-
‘दशरथनन्दन श्रीरामचन्द्रजी सम्पूर्ण जगत् के स्वामी, इन्द्र और वरुण के समान पराक्रमी तथा सब लोगों के हित में संलग्न रहने वाले हैं॥४ १/२॥
श्लोक:
तस्यैषा लोकनाथस्य धर्मपत्नी यशस्विनी॥५॥
सीता नाम वरारोहा यां त्वं हर्तुमिहेच्छसि।
भावार्थ :-
‘ये उन्हीं जगदीश्वर श्रीराम की यशस्विनी धर्मपत्नी हैं। इन सुन्दर शरीरवाली देवी का नाम सीता है, जिन्हें तुम हरकर ले जाना चाहते हो॥५ १/२॥
श्लोक:
कथं राजा स्थितो धर्मे परदारान् परामृशेत्॥६॥
रक्षणीया विशेषेण राजदारा महाबल।
निवर्तय गतिं नीचां परदाराभिमर्शनात्॥७॥
भावार्थ :-
‘अपने धर्म में स्थित रहने वाला कोई भी राजा भला परायी स्त्री का स्पर्श कैसे कर सकता है? महाबली रावण! राजाओं की स्त्रियों की तो सभी को विशेष रूप से रक्षा करनी चाहिये। परायी स्त्री के स्पर्श से जो नीच गति प्राप्त होनेवाली है, उसे अपने-आपसे दूर हटा दो॥६-७॥
श्लोक:
न तत् समाचरेद् धीरो यत् परोऽस्य विगर्हयेत्।
यथाऽऽत्मनस्तथान्येषां दारा रक्ष्या विमर्शनात्॥८॥
भावार्थ :-
‘धीर (बुद्धिमान्) वह कर्म न करे जिसकी दूसरे लोग निन्दा करें। जैसे पराये पुरुषों के स्पर्श से अपनी स्त्री की रक्षा की जाती है, उसी प्रकार दूसरों की स्त्रियों की भी रक्षा करनी चाहिये॥८॥
श्लोक:
अर्थं वा यदि वा कामं शिष्टाः शास्त्रेष्वनागतम्।
व्यवस्यन्त्यनुराजानं धर्मं पौलस्त्यनन्दन॥९॥
भावार्थ :-
‘पुलस्त्यकुलनन्दन ! जिनकी शास्त्रों में चर्चा नहीं है ऐसे धर्म, अर्थ अथवा काम का भी श्रेष्ठ पुरुष केवल राजा की देखादेखी आचरण करने लगते हैं (अतःराजा को अनुचित या अशास्त्रीय कर्म में प्रवृत्त नहीं होना चाहिये)॥९॥
श्लोक:
राजा धर्मश्च कामश्च द्रव्याणां चोत्तमो निधिः।
धर्मः शुभं वा पापं वा राजमूलं प्रवर्तते॥१०॥
भावार्थ :-
‘राजा धर्म और काम का प्रवर्तक तथा द्रव्यों की उत्तम निधि है, अतः धर्म, सदाचार अथवा पापइन की प्रवृत्ति का मूल कारण राजा ही है॥१०॥
श्लोक:
पापस्वभावश्चपलः कथं त्वं रक्षसां वर।
ऐश्वर्यमभिसम्प्राप्तो विमानमिव दुष्कृती॥११॥
भावार्थ :-
‘राक्षसराज! जब तुम्हारा स्वभाव ऐसा पापपूर्ण है और तुम इतने चपल हो, तब पापी को देवताओं के विमान की भाँति तुम्हें यह ऐश्वर्य कैसे प्राप्त हो गया?॥११॥
श्लोक:
कामस्वभावो यःसोऽसौ न शक्यस्तं प्रमार्जितुम्।
नहि दुष्टात्मनामार्यमावसत्यालये चिरम्॥१२॥
भावार्थ :-
‘जिसके स्वभाव में काम की प्रधानता है, उसके उस स्वभाव का परिमार्जन नहीं किया जा सकता; क्योंकि दुष्टात्माओं के घर में दीर्घकाल के बाद भी पुण्य का आवास नहीं होता॥१२॥
श्लोक:
विषये वा पुरे वा ते यदा रामो महाबलः।
नापराध्यति धर्मात्मा कथं तस्यापराध्यसि॥१३॥
भावार्थ :-
‘जब महाबली धर्मात्मा श्रीराम तुम्हारे राज्य अथवा नगर में कोई अपराध नहीं करते हैं, तब तुम उनका अपराध कैसे कर रहे हो?॥१३॥
श्लोक:
यदि शूर्पणखाहेतोर्जनस्थानगतः खरः।
अतिवृत्तो हतः पूर्वं रामेणाक्लिष्टकर्मणा॥१४॥
अत्र ब्रूहि यथातत्त्वं को रामस्य व्यतिक्रमः।
यस्य त्वं लोकनाथस्य हृत्वा भार्यां गमिष्यसि॥१५॥
भावार्थ :-
‘यदि पहले शूर्पणखा का बदला लेने के लिये चढ़कर आये हुए अत्याचारी खर का अनायास ही महान् कर्म करने वाले श्रीराम ने वध किया तो तुम्हीं । ठीक-ठीक बताओ कि इसमें श्रीराम का क्या अपराध है, जिससे तुम उन जगदीश्वर की पत्नी को हर ले जाना चाहते हो?॥१४-१५॥
श्लोक:
क्षिप्रं विसृज वैदेहीं मा त्वा घोरेण चक्षुषा।
दहेद् दहनभूतेन वृत्रमिन्द्राशनिर्यथा॥१६॥
भावार्थ :-
‘रावण! अब शीघ्र ही विदेहकुमारी सीता को छोड़ दो जिससे श्रीरामचन्द्रजी अपनी अग्नि के समान भयंकर दृष्टि से तुम्हें जलाकर भस्म न कर डालें। जैसे इन्द्र का वज्र वृत्रासुर का विनाश कर डाला था, उसी प्रकार श्रीराम की रोषपूर्ण दृष्टि दग्ध कर डालेगी॥१६॥
श्लोक:
सर्पमाशीविषं बद्ध्वा वस्त्रान्ते नावबुध्यसे।
ग्रीवायां प्रतिमुक्तं च कालपाशं न पश्यसि॥१७॥
भावार्थ :-
‘तुमने अपने कपड़े में विषधर सर्प को बाँध लिया है, फिर भी इस बात को समझ नहीं पाते हो। तुमने अपने गले में मौत की फाँसी डाल ली है, फिर भी यह तुम्हें सूझ नहीं रहा है॥१७॥
श्लोक:
स भारः सौम्य भर्तव्यो यो नरं नावसादयेत्।
तदन्नमपि भोक्तव्यं जीर्यते यदनामयम्॥१८॥
भावार्थ :-
‘सौम्य! पुरुष को उतना ही बोझ उठाना चाहिये, जो उसे शिथिल न कर दे और वही अन्न भोजन करना चाहिये, जो पेट में जाकर पच जाय, रोग न पैदा करे॥१८॥
श्लोक:
यत् कृत्वा न भवेद् धर्मो न कीर्तिर्न यशो ध्रुवम्।
शरीरस्य भवेत् खेदः कस्तत् कर्म समाचरेत्॥१९॥
भावार्थ :-
‘जो कार्य करने से न तो धर्म होता हो, न कीर्ति बढ़ती हो और न अक्षय यश ही प्राप्त होता हो, उल्टे शरीर को खेद हो रहा हो, उस कर्म का अनुष्ठान कौन करेगा?॥१९॥
श्लोक:
षष्टिवर्षसहस्राणि जातस्य मम रावण।
पितृपैतामहं राज्यं यथावदनुतिष्ठतः॥२०॥
भावार्थ :-
‘रावण! बाप-दादों से प्राप्त इस पक्षियों के राज्य का विधिवत् पालन करते हुए मुझे जन्म से लेकर अबतक साठ हजार वर्ष बीत गये॥२०॥
श्लोक:
वृद्धोऽहं त्वं युवा धन्वी सरथः कवची शरी।
न चाप्यादाय कुशली वैदेहीं मे गमिष्यसि॥२१॥
भावार्थ :-
‘अब मैं बूढ़ा हो गया हूँ और तुम नवयुवक हो (मेरे पास कोई युद्ध का साधन नहीं है, किंतु) तुम्हारे पास धनुष, कवच, बाण तथा रथ सब कुछ है, फिर भी तुम सीताको लेकर कुशलपूर्वक नहीं जा सकोगे॥२१॥
श्लोक:
न शक्तस्त्वं बलाद्धा वैदेहीं मम पश्यतः।
हेतुभिर्यायसंयुक्तैर्बुवां वेदश्रुतीमिव॥२२॥
भावार्थ :-
‘मेरे देखते-देखते तुम विदेहनन्दिनी सीता का बलपूर्वक अपहरण नहीं कर सकते; ठीक उसी तरह जैसे कोई न्यायसङ्गत हेतुओं से सत्य सिद्ध हुई वैदिक श्रुति को अपनी युक्तियों के बलपर पलट नहीं सकता॥२२॥
श्लोक:
युध्यस्व यदि शूरोऽसि मुहूर्तं तिष्ठ रावण।
शयिष्यसे हतो भूमौ यथा पूर्वं खरस्तथा॥२३॥
भावार्थ :-
‘रावण! यदि शूरवीर हो तो युद्ध करो। मेरे सामने दो घड़ी ठहर जाओ; फिर जैसे पहले खर मारा गया था, उसी प्रकार तुम भी मेरे द्वारा मारे जाकर सदा के लिये सो जाओगे॥२३॥
श्लोक:
असकृत्संयुगे येन निहता दैत्यदानवाः।
न चिराच्चीरवासास्त्वां रामो युधि वधिष्यति॥२४॥
भावार्थ :-
‘जिन्होंने युद्ध में अनेक बार दैत्यों और दानवों का वध किया है, वे चीरवस्त्रधारी भगवान् श्रीराम तुम्हारा भी शीघ्र ही युद्धभूमि में विनाश करेंगे॥२४॥
श्लोक:
किं नु शक्यं मया कर्तुं गतौ दूरं नृपात्मजौ।
क्षिप्रं त्वं नश्यसे नीच तयोर्भातो न संशयः॥२५॥
भावार्थ :-
‘इस समय मैं क्या कर सकता हूँ, वे दोनों राजकुमार बहुत दूर चले गये हैं। नीच! (यदि मैं उन्हें बुलाने जाऊँ तो) तुम उन दोनों से भयभीत होकर शीघ्र ही भाग जाओगे (आँखों से ओझल हो जाओगे), इसमें संशय नहीं है॥२५॥
श्लोक:
नहि मे जीवमानस्य नयिष्यसि शुभामिमाम्।
सीतां कमलपत्राक्षीं रामस्य महिषीं प्रियाम्॥२६॥
भावार्थ :-
‘कमल के समान नेत्रोंवाली ये शुभलक्षणा सीता श्रीरामचन्द्रजी की प्यारी पटरानी हैं। इन्हें मेरे जीते-जी तुम नहीं ले जाने पाओगे॥२६॥
श्लोक:
अवश्यं त् मया कार्यं प्रियं तस्य महात्मनः।
जीवितेनापि रामस्य तथा दशरथस्य च॥२७॥
भावार्थ :-
‘मुझे अपने प्राण देकर भी महात्मा श्रीराम तथा राजा दशरथ का प्रिय कार्य अवश्य करना होगा॥२७॥
श्लोक:
तिष्ठ तिष्ठ दशग्रीव मुहूर्तं पश्य रावण।
वृन्तादिव फलं त्वां तु पातयेयं रथोत्तमात्।
युद्धातिथ्यं प्रदास्यामि यथाप्राणं निशाचर॥२८॥
भावार्थ :-
‘दशमुख रावण! ठहरो, ठहरो! केवल दो घड़ी रुक जाओ, फिर देखो, जैसे डंठल से फल गिरता है, उसी प्रकार तुम्हें इस उत्तम रथ से नीचे गिराये देता हूँ। निशाचर! अपनी शक्ति के अनुसार युद्ध में मैं तुम्हारा पूरा आतिथ्य-सत्कार करूँगा–तुम्हें भलीभाँति भेंट पूजा दूंगा’॥२८॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे पञ्चाशः सर्गः॥५०॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अरण्यकाण्ड में पचासवाँ सर्ग पूरा हुआ॥५०॥
अरण्यकाण्डम्
एकपञ्चाशः सर्गः (सर्ग 51)
( जटायु तथा रावण का घोर युद्ध और रावण के द्वारा जटायु का वध )
इत्युक्तः क्रोधताम्राक्षस्तप्तकाञ्चनकुण्डलः।
राक्षसेन्द्रोऽभिदुद्राव पतगेन्द्रममर्षणः॥१॥
जटायु के ऐसा कहने पर राक्षसराज रावण क्रोध से आँखें लाल किये अमर्ष में भरकर उन पक्षिराज की ओर दौड़ा। उस समय उसके कानों में तपाये हुए सोने के कुण्डल झलमला रहे थे॥१॥
स सम्प्रहारस्तुमुलस्तयोस्तस्मिन् महामृधे।
बभूव वातो तयोर्मेघयोर्गगने यथा॥२॥
उस महासमर में उन दोनों का एक-दूसरे पर भयंकर प्रहार होने लगा, मानो आकाश में वायु से उड़ाये गये दो मेघखण्ड आपस में टकरा गये हों॥२॥
तद् बभूवाद्भुतं युद्धं गृध्रराक्षसयोस्तदा।
सपक्षयोर्माल्यवतोर्महापर्वतयोरिव॥३॥
उस समय गृध्र और राक्षस में वह बड़ा अद्भुत युद्ध होने लगा, मानो दो पंखधारी माल्यवान् * पर्वत एक दूसरे से भिड़ गये हों॥३॥
* माल्यवान् पर्वत दो माने गये हैं, एक तो दण्डकारण्य में किष्किन्धा के समीप है और दूसरा मेरुपर्वत के निकट बताया गया है। ये दोनों पर्वत परस्पर इतने दूर हैं कि इनमें संघर्ष की कोई सम्भावना नहीं हो सकती। इसलिये ‘सपक्ष’ (पंखधारी) विशेषण दिया गया है। पाँखवाले पर्वत कदाचित् उड़कर एक-दूसरे के समीप पहुँच सकते हैं।
ततो नालीकनाराचैस्तीक्ष्णाग्रैश्च विकर्णिभिः ।
अभ्यवर्षन्महाघोरैर्गृध्रराजं महाबलम्॥४॥
रावण ने महाबली गृध्रराज जटायुपर नालीक, नाराच तथा तीखे अग्रभागवाले विकर्णी नामक महाभयंकर अस्त्रों की वर्षा आरम्भ कर दी॥ ४॥
स तानि शरजालानि गृध्रः पत्ररथेश्वरः।
जटायुः प्रतिजग्राह रावणास्त्राणि संयुगे॥५॥
पक्षिराज गृध्रजातीय जटायु ने युद्ध में रावण के उन बाणसमूहों तथा अन्य अस्त्रों का आघात सह लिया। ५॥
तस्य तीक्ष्णनखाभ्यां तु चरणाभ्यां महाबलः।
चकार बहुधा गात्रे व्रणान् पतगसत्तमः॥६॥
साथ ही उन महाबली पक्षिशिरोमणि ने अपने तीखे नखोंवाले पंजों से मार-मारकर रावण के शरीर में बहुत से घाव कर दिये॥६॥
अथ क्रोधाद दशग्रीवो जग्गाह दशा मागणाना
मृत्युदण्डनिभान् घोरान् शत्रोर्निधनकांक्षया॥७॥
तब दशग्रीव ने क्रोध में भरकर अपने शत्रु को मार डालने की इच्छा से दस बाण हाथ में लिये, जो कालदण्ड के समान भयंकर थे॥७॥
स तैर्बाणैर्महावीर्यः पूर्णमुक्तैरजिह्मगैः।
बिभेद निशितैस्तीक्ष्णैर्गुरूं घोरैः शिलीमुखैः॥ ८॥
महापराक्रमी रावण ने धनुष को पूर्णतः खींचकर छोड़े गये उन सीधे जाने वाले तीखे, पैने और भयंकर बाणों द्वारा, जिनके मुखपर शल्य (काँटे) लगे हुए थे। गृध्रराज को क्षत-विक्षत कर दिया॥ ८॥
स राक्षसरथे पश्यञ्जानकी बाष्पलोचनाम्।
अचिन्तयित्वा बाणांस्तान् राक्षसं समभिद्रवत्॥ ९॥
जटायु ने देखा, जनकनन्दिनी सीता राक्षस के रथ पर बैठी हैं और नेत्रों से आँसू बहा रही हैं। उन्हें देखकर गृध्रराज अपने शरीर में लगते हुए उन बाणों की परवा न करके सहसा उस राक्षस पर टूट पड़े॥९॥
ततोऽस्य सशरं चापं मुक्तामणिविभूषितम्।
चरणाभ्यां महातेजा बभञ्ज पतगोत्तमः ॥१०॥
महातेजस्वी पक्षिराज जटायु ने मोती-मणियों से विभूषित, बाणसहित रावण के धनुष को अपने दोनों पैरों से मारकर तोड़ दिया॥१०॥
ततोऽन्यद् धनुरादाय रावणः क्रोधमूर्च्छितः।
ववर्ष शरवर्षाणि शतशोऽथ सहस्रशः॥११॥
फिर तो रावण क्रोध से भर गया और दूसरा धनुष हाथ में लेकर उसने सैकड़ों-हजारों बाणों की झड़ी लगा दी॥ ११॥
शरैरावारितस्तस्य संयुगे पतगेश्वरः।
कुलायमभिसम्प्राप्तः पक्षिवच्च बभौ तदा॥ १२॥
उस समय उस युद्धस्थल में गृध्रराज के चारों ओर बाणों का जाल-सा तन गया। वे उस समय घोंसले में बैठे हुए पक्षी के समान प्रतीत होने लगे॥ १२ ॥
स तानि शरजालानि पक्षाभ्यां तु विधूय ह।
चरणाभ्यां महातेजा बभञ्जास्य महद् धनुः॥ १३॥
तब महातेजस्वी जटायु ने अपने दोनों पंखों से ही उन बाणों को उड़ा दिया और पंजों की मार से पुनः उसके धनुष के टुकड़े-टुकड़े कर डाले॥१३॥
तच्चाग्निसदृशं दीप्तं रावणस्य शरावरम्।
पक्षाभ्यां च महातेजा व्यधुनोत् पतगेश्वरः॥ १४॥
रावणका कवच अग्नि के समान प्रज्वलित हो रहा था। महातेजस्वी पक्षिराज ने उसे भी पंखों से ही मारकर छिन्न-भिन्न कर दिया॥१४॥
काञ्चनोरश्छदान् दिव्यान् पिशाचवदनान् खरान्।
तांश्चास्य जवसम्पन्नाञ्जघान समरे बली॥१५॥
तत्पश्चात् उन बलवान् वीर ने समराङ्गण में पिशाच के-से मुखवाले उन वेगशाली गधों को भी, जिनकी छाती पर सोने के कवच बँधे हुए थे, मार डाला॥ १५ ॥
अथ त्रिवेणुसम्पन्नं कामगं पावकार्चिषम्।
मणिसोपानचित्राङ्गं बभञ्ज च महारथम्॥१६॥
तदनन्तर अग्नि की भाँति दीप्तिमान्, मणिमय सोपान से विचित्र अङ्गोंवाले तथा इच्छानुसार चलने वाले उसके त्रिवेणुसम्पन्न* विशाल रथ को भी तोड़-फोड़ डाला॥१६॥
* त्रिवेणु रथ का वह अङ्ग है, जो जूए को धारण करता है। इसका पर्याय है युगन्धर।
पूर्णचन्द्रप्रतीकाशं छत्रं च व्यजनैः सह।
पातयामास वेगेन ग्राहिभी राक्षसैः सह ॥१७॥
सारथेश्चास्य वेगेन तुण्डेन च महच्छिरः।
पुनर्व्यपहनच्छ्रीमान् पक्षिराजो महाबलः॥१८॥
इसके बाद पूर्ण चन्द्रमा की भाँति सुशोभित छत्र और चवँर को भी उन्हें धारण करने वाले राक्षसों के साथ ही वेगपूर्वक मार गिराया। फिर उन महाबली तेजस्वी पक्षिराज ने बड़े वेग से चोंच मारकर रावण के सारथि का विशाल मस्तक भी धड़ से अलग कर दिया॥ १७-१८॥
स भग्नधन्वा विरथो हताश्वो हतसारथिः।
अङ्केनादाय वैदेहीं पपात भुवि रावणः॥१९॥
इस प्रकार जब धनुष टूटा, रथ चौपट हुआ, घोड़े मारे गये और सारथि भी काल के गाल में चला गया, तब रावण सीता को गोद में लिये-लिये पृथ्वी पर गिर पड़ा॥१९॥
दृष्ट्वा निपतितं भूमौ रावणं भग्नवाहनम्।
साधु साध्विति भूतानि गृध्रराजमपूजयन्॥२०॥
रथ टूट जाने से रावण को धरती पर पड़ा देख सब प्राणी ‘साधु-साधु’ कहकर गृध्रराज की प्रशंसा करने लगे॥२०॥
परिश्रान्तं तु तं दृष्ट्वा जरया पक्षियूथपम्।
उत्पपात पुनहष्टो मैथिली गृह्य रावणः॥२१॥
वृद्धावस्था के कारण पक्षिराज को थका हुआ देख रावण को बड़ा हर्ष हुआ और वह मैथिली को लिये हुए फिर आकाश में उड़ चला॥ २१॥
तं प्रहृष्टं निधायाङ्के रावणं जनकात्मजाम्।
गच्छन्तं खड्गशेषं च प्रणष्टहतसाधनम्॥२२॥
गृध्रराजः समुत्पत्य रावणं समभिद्रवत्।
समावार्य महातेजा जटायुरिदमब्रवीत्॥२३॥
जनककिशोरी को गोद में लेकर जब रावण प्रसन्नतापूर्वक जाने लगा, उस समय उसके अन्य सब साधन तो नष्ट हो गये थे, किंतु एक तलवार उसके पास शेष रह गयी थी। उसे जाते देख महातेजस्वी गृध्रराज जटायु उड़कर रावण की ओर दौड़े और उसे रोककर इस प्रकार बोले-॥ २२-२३॥
वज्रसंस्पर्शबाणस्य भार्यां रामस्य रावण।
अल्पबुद्धे हरस्येनां वधाय खलु रक्षसाम्॥२४॥
‘मन्दबुद्धि रावण! जिनके बाणों का स्पर्श वज्र के समान है, उन श्रीराम की इन धर्मपत्नी सीता को तुम अवश्य राक्षसों के वध के लिये ही लिये जा रहे हो॥२४॥
समित्रबन्धुः सामात्यः सबलः सपरिच्छदः।
विषपानं पिबस्येतत् पिपासित इवोदकम्॥२५॥
‘जैसे प्यासा मनुष्य जल पी रहा हो, उसी प्रकार तुम मित्र, बन्धु, मन्त्री, सेना तथा परिवारसहित यह विषपान कर रहे हो॥२५॥
अनुबन्धमजानन्तः कर्मणामविचक्षणाः।
शीघ्रमेव विनश्यन्ति यथा त्वं विनशिष्यसि॥२६॥
‘अपने कर्मों का परिणाम न जानने वाले अज्ञानीजन जैसे शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं, उसी प्रकार तुम भी विनाश के गर्त में गिरोगे॥२६॥
बद्धस्त्वं कालपाशेन क्व गतस्तस्य मोक्ष्यसे।
वधाय बडिशं गृह्य सामिषं जलजो यथा॥२७॥
‘तुम कालपाश में बँध गये हो। कहाँ जाकर उससे छुटकारा पाओगे? जैसे जल में उत्पन्न होने वाला मत्स्य मांसयुक्त बंसी को अपने वध के लिये ही निगल जाता है, उसी प्रकार तुम भी अपने मौत के लिये ही सीता का अपहरण करते हो॥२७॥
नहि जातु दुराधर्षों काकुत्स्थौ तव रावण।
धर्षणं चाश्रमस्यास्य क्षमिष्येते तु राघवौ॥ २८॥
‘रावण! ककुत्स्थकुलभूषण रघुकुलनन्दन श्रीराम और लक्ष्मण दोनों भाई दुर्धर्ष वीर हैं। वे तुम्हारे द्वारा अपने आश्रम पर किये गये इस अपमानजनक अपराध को कभी क्षमा नहीं करेंगे॥२८॥
यथा त्वया कृतं कर्म भीरुणा लोकगर्हितम्।
तस्कराचरितो मार्गो नैष वीरनिषेवितः॥२९॥
‘तुम कायर और डरपोक हो। तुमने जैसा लोकनिन्दित कर्म किया है, यह चोरों का मार्ग है। वीर पुरुष ऐसे मार्ग का आश्रय नहीं लेते हैं॥ २९॥
युद्ध्यस्व यदि शूरोऽसि मुहूर्तं तिष्ठ रावण।
शयिष्यसे हतो भूमौ यथा भ्राता खरस्तथा॥ ३०॥
‘रावण! यदि शूरवीर हो तो दो घड़ी और ठहरो और मुझसे युद्ध करो। फिर तो तुम भी उसी प्रकार मरकर पृथ्वी पर सो जाओगे, जैसे तुम्हारा भाई खर सोया था॥३०॥
परेतकाले पुरुषो यत् कर्म प्रतिपद्यते।
विनाशायात्मनोऽधर्म्यं प्रतिपन्नोऽसि कर्म तत्॥ ३१॥
‘विनाश के समय पुरुष जैसा कर्म करता है, तुमने भी अपने विनाश के लिये वैसे ही अधर्मपूर्ण कर्म को अपनाया है॥ ३१॥
पापानुबन्धो वै यस्य कर्मणः को नु तत् पुमान्।
कर्वीत लोकाधिपतिः स्वयंभूर्भगवानपि॥३२॥
‘जिस कर्म को करने से कर्ता का पाप के फल से सम्बन्ध होता है, उस कर्म को कौन पुरुष निश्चित रूप से कर सकता है। लोकपाल इन्द्र तथा भगवान् स्वयम्भू (ब्रह्मा) भी वैसा कर्म नहीं कर सकते’ ॥३२॥
एवमुक्त्वा शुभं वाक्यं जटायुस्तस्य रक्षसः।
निपपात भृशं पृष्ठे दशग्रीवस्य वीर्यवान्॥३३॥
तं गृहीत्वा नखैस्तीक्ष्णैर्विददार समन्ततः।
अधिरूढो गजारोहो यथा स्याद् दुष्टवारणम्॥३४॥
इस प्रकार उत्तम वचन कहकर पराक्रमी जटायु उस राक्षस दशग्रीव की पीठ पर बड़े वेग से जा बैठे और उसे पकड़कर अपने तीखे नखों द्वारा चारों ओर से चीरने लगे। मानो कोई हाथीवान् किसी दुष्ट हाथी के ऊपर सवार होकर उसे अंकुश से छेद रहा हो॥ ३३-३४॥
विददार नखैरस्य तुण्डं पृष्ठे समर्पयन्।
केशांश्चोत्पाटयामास नखपक्षमुखायुधः॥ ३५॥
नख, पाँख और चोंच—ये ही जटायु के हथियार थे। वे नखों से खरोंचते थे, पीठपर चोंच मारते थे और बाल पकड़कर उखाड़ लेते थे॥ ३५॥
स तथा गृध्रराजेन क्लिश्यमानो मुहर्मुहुः।
अमर्षस्फुरितोष्ठः सन् प्राकम्पत च राक्षसः॥ ३६॥
इस प्रकार जब गृध्रराज ने बारंबार क्लेश पहुँचाया, तब राक्षस रावण काँप उठा। क्रोध के मारे उसके ओठ फड़कने लगे॥ ३६॥
सम्परिष्वज्य वैदेहीं वामेनाङ्केन रावणः।
तलेनाभिजघाना जटायुं क्रोधमूर्च्छितः॥ ३७॥
उस समय क्रोध से भरे रावण ने विदेहनन्दिनी सीता को बायीं गोद में करके अत्यन्त पीड़ित हो जटायु पर तमाचे का प्रहार किया॥ ३७॥
जटायुस्तमतिक्रम्य तुण्डेनास्य खगाधिपः।
वामबाहून् दश तदा व्यपाहरदरिंदमः ॥ ३८॥
परंतु उस वार को बचाकर शत्रुदमन गृध्रराज जटायु ने अपनी चोंच से मार-मारकर रावण की दसों बायीं भुजाओं को उखाड़ लिया।॥ ३८ ॥
संछिन्नबाहोः सद्यो वै बाहवः सहसाभवन्।
विषज्वालावलीयुक्ता वल्मीकादिव पन्नगाः॥ ३९॥
उन बाँहों के कट जाने पर बाँबी से प्रकट होने वाले विष की ज्वाला-मालाओं से युक्त सर्पो की भाँति तुरंत दूसरी नयी भुजाएँ सहसा उत्पन्न हो गयीं॥ ३९॥
ततः क्रोधाद् दशग्रीवः सीतामुत्सृज्य वीर्यवान्।
मुष्टिभ्यां चरणाभ्यां च गृध्रराजमपोथयत्॥ ४०॥
तब पराक्रमी दशानन ने सीता को तो छोड़ दिया और गृध्रराज को क्रोधपूर्वक मुक्कों और लातों से मारना आरम्भ किया॥४०॥
ततो मुहूर्तं संग्रामो बभूवातुलवीर्ययोः।
राक्षसानां च मुख्यस्य पक्षिणां प्रवरस्य च॥ ४१॥
उस समय उन दोनों अनुपम पराक्रमी वीर राक्षसराज रावण और पक्षिराज जटायु में दो घड़ी तक घोर संग्राम होता रहा ॥ ४१॥
तस्य व्यायच्छमानस्य रामस्यार्थे स रावणः।
पक्षौ पादौ च पाश्वौ च खड्गमुद्धृत्य सोऽच्छिनत्॥४२॥
तदनन्तर रावण ने तलवार निकाली और श्रीरामचन्द्रजी के लिये पराक्रम करने वाले जटायु के दोनों पंख, पैर तथा पार्श्वभाग काट डाले॥४२॥
स च्छिन्नपक्षः सहसा रक्षसा रौद्रकर्मणा।
निपपात महागृध्रो धरण्यामल्पजीवितः॥४३॥
भयंकर कर्म करने वाले उस राक्षस के द्वारा सहसा पंख काट लिये जाने पर महागृध्र जटायु पृथ्वी पर गिर पड़े। अब वे थोड़ी ही देर के मेहमान थे। ४३॥
तं दृष्ट्वा पतितं भूमौ क्षतजा जटायुषम्।
अभ्यधावत वैदेही स्वबन्धुमिव दुःखिता॥४४॥
अपने बान्धव के समान जटायु को खून से लथपथ होकर पृथ्वी पर पड़ा देख सीता दुःख से व्याकुल हो उनकी ओर दौड़ी॥ ४४॥
तं नीलजीमूतनिकाशकल्पं सपाण्डुरोरस्कमुदारवीर्यम्।
ददर्श लङ्काधिपतिः पृथिव्यां जटायुषं शान्तमिवाग्निदावम्॥४५॥
जटायु के शरीर की कान्ति नीले मेघ के समान काली थी। उनकी छाती का रंग श्वेत था। वे बड़े पराक्रमी थे, तो भी उस समय बुझे हुए दावानल के समान पृथ्वी पर पड़ गये। लङ्कापति रावण ने उन्हें इस अवस्था में देखा॥४५॥
ततस्तु तं पत्ररथं महीतले निपातितं रावणवेगमर्दितम्।
पुनश्च संगृह्य शशिप्रभानना रुरोद सीता जनकात्मजा तदा॥४६॥
तदनन्तर रावण के वेग से रौंदे जाकर धराशायी हुए जटायु को पकड़कर चन्द्रमुखी जनकनन्दिनी सीता पुनः उस समय वहाँ रोने लगीं॥ ४६॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे एकपञ्चाशः सर्गः॥५१॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अरण्यकाण्ड में इक्यावनवाँ सर्ग पूरा हुआ॥५१॥
अरण्यकाण्डम्
द्विपञ्चाशः सर्गः (सर्ग 52)
( रावण द्वारा सीता का अपहरण )
सा तु ताराधिपमुखी रावणेन निरीक्ष्य तम्।
गृध्रराजं विनिहतं विललाप सुदुःखिता॥१॥
रावण के द्वारा मारे गये गृध्रराज की ओर देखकर चन्द्रमुखी सीता अत्यन्त दुःखी होकर विलाप करने लगीं- ॥१॥
निमित्तं लक्षणं स्वप्नं शकुनिस्वरदर्शनम्।
अवश्यं सुखदुःखेषु नराणां परिदृश्यते॥२॥
‘मनुष्यों को सुख-दुःख की प्राप्ति के सूचक लक्षण, स्वप्न, पक्षियों के स्वर तथा उनके दायें-बायें दर्शन आदि शुभाशुभ निमित्त अवश्य दिखायी देते हैं॥२॥
न नूनं राम जानासि महद्व्यसनमात्मनः।।
धावन्ति नूनं काकुत्स्थ मदर्थं मृगपक्षिणः॥३॥
‘ककुत्स्थकुलभूषण श्रीराम! मेरे अपहरण की सूचना देने के लिये निश्चय ही ये मृग और पक्षी अशुभसूचक मार्ग से दौड़ रहे हैं, परंतु उनके द्वारा सूचित होने पर भी अपने इस महान् संकट को अवश्य
ही आप नहीं जानते हैं (क्योंकि जानने पर आप इसकी उपेक्षा नहीं कर सकते थे) ॥३॥
अयं हि कृपया राम मां त्रातुमिह संगतः।
शेते विनिहतो भूमौ ममाभाग्याद् विहंगमः॥४॥
‘हा राम! मेरा कैसा अभाग्य है कि जो कृपा करके मुझे बचाने के लिये यहाँ आये थे, वे पक्षिप्रवर जटायु इस निशाचर द्वारा मारे जाकर पृथ्वी पर पड़े हैं।
त्राहि मामद्य काकुत्स्थ लक्ष्मणेति वराङ्गना।
सुसंत्रस्ता समाक्रन्दच्छृण्वतां तु यथान्तिके॥५॥
‘हे राम! हे लक्ष्मण! अब आप ही दोनों मेरी रक्षा करें।’ यों कहकर अत्यन्त डरी हुई सुन्दरी सीता इस प्रकार क्रन्दन करने लगी, जिससे निकटवर्ती देवता और मनुष्य सुन सकें॥५॥
तां क्लिष्टमाल्याभरणां विलपन्तीमनाथवत्।
अभ्यधावत वैदेहीं रावणो राक्षसाधिपः॥६॥
उनके पुष्पहार और आभूषण मसलकर छिन्नभिन्न हो गये थे। वे अनाथ की भाँति विलाप कर रही थीं। उसी अवस्था में राक्षसराज रावण उन विदेहकुमारी सीता की ओर दौड़ा॥६॥
तां लतामिव वेष्टन्तीमालिङ्गन्तीं महाद्रुमान्।
मुञ्च मुञ्चेति बहुशः प्राप तां राक्षसाधिपः॥७॥
वे लिपटी हुई लता की भाँति बड़े-बड़े वृक्षों से लिपट जातीं और बारंबार कहतीं—’मुझे इस संकट से छुड़ाओ, छुड़ाओ।’ इतने ही में वह निशाचरराज उनके पास जा पहुँचा॥ ७॥
क्रोशन्तीं राम रामेति रामेण रहितां वने।
जीवितान्ताय केशेषु जग्राहान्तकसंनिभः॥८॥
प्रधर्षितायां वैदेह्यां बभूव सचराचरम्।
जगत् सर्वममर्यादं तमसान्धेन संवृतम्॥९॥
वन में श्रीराम से रहित होकर सीता को राम-राम की रट लगाती देख उस काल के समान विकराल राक्षस ने अपने ही विनाश के लिये उनके केश पकड़ लिये। सीता का इस प्रकार तिरस्कार होने पर समस्त चराचरजगत् मर्यादारहित तथा अन्धकार से आच्छन्नसा हो गया॥९॥
न वाति मारुतस्तत्र निष्प्रभोऽभून दिवाकरः।
दृष्ट्वा सीतां परामृष्टां देवो दिव्येन चक्षुषा॥१०॥
कृतं कार्यमिति श्रीमान् व्याजहार पितामहः।
वहाँ वायु की गति रुक गयी और सूर्य की भी प्रभा फीकी पड़ गयी। श्रीमान् पितामह ब्रह्माजी दिव्यदृष्टि से विदेहनन्दिनी का वह राक्षस के द्वारा केशाकर्षणरूप अपमान देखकर बोले—’बस अब कार्य सिद्ध हो गया’ ॥ १० १/२ ॥
प्रहृष्टा व्यथिताश्चासन् सर्वे ते परमर्षयः॥११॥
दृष्ट्वा सीतां परामृष्टां दण्डकारण्यवासिनः।
रावणस्य विनाशं च प्राप्तं बुद्ध्वा यदृच्छया॥ १२॥
सीता के केशों का खींचा जाना देखकर दण्डकारण्य में निवास करने वाले वे सब महर्षि मन ही-मन व्यथित हो उठे। साथ ही अकस्मात् रावण का विनाश निकट आया जान उनको बड़ा हर्ष हुआ॥ ११-१२॥
स तु तां राम रामेति रुदती लक्ष्मणेति च।
जगामादाय चाकाशं रावणो राक्षसेश्वरः॥१३॥
बेचारी सीता ‘हा राम! हा राम’ कहकर रो रही थीं। लक्ष्मण को भी पुकार रही थीं। उसी अवस्था में राक्षसों का राजा रावण उन्हें लेकर आकाशमार्ग से चल दिया॥१३॥
तप्ताभरणवर्णाङ्गी पीतकौशेयवासिनी।
रराज राजपुत्री तु विद्युत्सौदामनी यथा॥१४॥
तपाये हुए सोने के आभूषणों से उनका सारा अङ्ग विभूषित था। वे पीले रंग की रेशमी साड़ी पहने हुए थीं। अतः उस समय राजकुमारी सीता सुदाम पर्वत से प्रकट हुई विद्युत् के समान प्रकाशित हो रही थीं। १४॥
उद्धृतेन च वस्त्रेण तस्याः पीतेन रावणः।
अधिकं परिबभ्राज गिरिर्दीप्त इवाग्निना॥१५॥
उनके फहराते हुए पीले वस्त्र से उपलक्षित रावण दावानल से उद्भासित होने वाले पर्वत के समान अधिक शोभा पाने लगा॥ १५॥
तस्याः परमकल्याण्यास्ताम्राणि सुरभीणि च।
पद्मपत्राणि वैदेह्या अभ्यकीर्यन्त रावणम्॥१६॥
उन परम कल्याणी विदेहकुमारी के अङ्गों में जो कमलपुष्प थे, उनके किंचित् अरुण और सुगन्धित दल बिखर-बिखरकर रावण पर गिरने लगे॥ १६॥
तस्याः कौशेयमुद्धृतमाकाशे कनकप्रभम्।
बभौ चादित्यरागेण ताम्रमभ्रमिवातपे॥१७॥
आकाश में उड़ता हुआ उनका सुवर्ण के समान कान्तिमान् रेशमी पीताम्बर संध्याकाल में सूर्य की किरणों से रँगे हुए ताम्रवर्ण के मेघखण्ड की भाँति शोभा पाता था॥ १७॥
तस्यास्तद् विमलं वक्त्रमाकाशे रावणाङ्कगम्।
न रराज विना रामं विनालमिव पङ्कजम्॥१८॥
आकाश में रावण के अङ्क में स्थित सीता का निर्मल मुख श्रीराम के बिना नालरहित कमल की भाँति शोभित नहीं होता था॥ १८॥
बभूव जलदं नीलं भित्त्वा चन्द्र इवोदितः।
सुललाटं सुकेशान्तं पद्मगर्भाभमव्रणम्॥१९॥
शुक्लैः सुविमलैर्दन्तैः प्रभावद्भिरलंकृतम्।
तस्याः सुनयनं वक्त्रमाकाशे रावणाङ्कगम्॥ २०॥
सुन्दर ललाट और मनोहर केशों से युक्त कमल के भीतरी भाग के समान कान्तिमान्, चेचक आदि के दाग से रहित, श्वेत, निर्मल और दीप्तिमान् दाँतों से अलंकृत तथा सुन्दर नेत्रों से सुशोभित सीता का मुख आकाश में रावण के अङ्क में ऐसा जान पड़ता था मानो मेघों की काली घटा का भेदन करके चन्द्रमा उदित हुआ हो॥१९-२०॥
रुदितं व्यपमृष्टास्रं चन्द्रवत् प्रियदर्शनम्।
सुनासं चारुताम्रोष्ठमाकाशे हाटकप्रभम्॥ २१॥
राक्षसेन्द्रसमाधूतं तस्यास्तद् वदनं शुभम्।
शुशुभे न विना रामं दिवा चन्द्र इवोदितः॥२२॥
चन्द्रमा के समान प्यारा दिखायी देने वाला सीता का वह सुन्दर मुख तुरंत का रोया हुआ था। उसके आँसू पोंछ दिये गये थे। उसकी सुघड़ नासिका तथा ताँबे जैसे लाल-लाल मनोहर ओठ थे। आकाश में वह अपनी सुनहरी प्रभा बिखेर रहा था तथा राक्षसराज के वेगपूर्वक चलने से उसमें कम्पन हो रहा था। इस प्रकार वह मनोहर मुख भी श्रीराम के बिना उस समय दिन में उगे हुए चन्द्रमा के समान शोभाहीन प्रतीत होता था॥२१-२२॥
सा हेमवर्णा नीलाऊं मैथिली राक्षसाधिपम्।
शुशुभे काञ्चनी काञ्ची नीलं गजमिवाश्रिता॥ २३॥
मिथिलेशकुमारी सीता का श्रीअङ्ग सुवर्ण के समान दीप्तिमान् था और राक्षसराज रावण का शरीर बिलकुल काला था। उसकी गोद में वे ऐसी जान पड़ती थीं मानो काले हाथी को सोने की करधनी पहना दी गयी हो ॥२३॥
सा पद्मपीता हेमाभा रावणं जनकात्मजा।
विद्युद् घनमिवाविश्य शुशुभे तप्तभूषणा ॥ २४॥
कमल के केसर की भाँति पीली एवं सुनहरी कान्तिवाली जनककुमारी सीता तपे हुए सोने के आभूषण धारण किये रावण की पीठपर वैसी ही शोभा पा रही थीं, जैसे मेघमाला का आश्रय लेकर बिजली चमक रही हो॥ २४॥
तस्या भूषणघोषेण वैदेह्या राक्षसेश्वरः।
बभूव विमलो नीलः सघोष इव तोयदः॥ २५॥
विदेहनन्दिनी के आभूषणों की झनकार से राक्षसराज रावण गर्जना करते हुए निर्मल नील मेघ के समान प्रतीत होता था॥ २५ ॥
उत्तमाङ्गच्युता तस्याः पुष्पवृष्टिः समन्ततः।
सीताया ह्रियमाणायाः पपात धरणीतले॥२६॥
हरकर ले जायी जाती हुई सीता के सिर से उनके केशों में गुंथे हुए फूल बिखरकर सब ओर पृथ्वी पर गिर रहे थे॥२६॥
सा तु रावणवेगेन पुष्पवृष्टिः समन्ततः।
समाधूता दशग्रीवं पुनरेवाभ्यवर्तत॥२७॥
चारों ओर होने वाली वह फूलों की वर्षा रावण के वेग से उठी हुई वायु के द्वारा प्रेरित हो फिर उस दशानन पर ही आकर पड़ती थी॥२७॥
अभ्यवर्तत पुष्पाणां धारा वैश्रवणानुजम्।
नक्षत्रमाला विमला मेरुं नगमिवोन्नतम्॥२८॥
कुबेर के छोटे भाई रावण के ऊपर जब वह फूलों की धारा गिरती थी, उस समय ऊँचे मेरुपर्वत पर उतरने वाली निर्मल नक्षत्रमाला की भाँति शोभा पाती थी॥२८॥
चरणान्नूपुरं भ्रष्टं वैदेह्या रत्नभूषितम्।
विद्युन्मण्डलसंकाशं पपात धरणीतले॥२९॥
विदेहनन्दिनी का रत्नजटित नूपुर उनके एक चरण से खिसककर विद्युन्मण्डल के समान पृथ्वी पर गिर पड़ा॥ २९॥
तरुप्रवालरक्ता सा नीलाङ्गं राक्षसेश्वरम्।
प्रशोभयत वैदेही गजं कक्ष्येव काञ्चनी॥३०॥
वृक्षों के नूतन पल्लवों के समान किंचित् अरुण वर्णवाली सीता उस काले-कलूटे राक्षसराज को उसी प्रकार सुशोभित कर रही थीं जैसे हाथी को कसने वाला सुनहरा रस्सा उसकी शोभा बढ़ाता हो। ३०॥
तां महोल्कामिवाकाशे दीप्यमानां स्वतेजसा।
जहाराकाशमाविश्य सीतां वैश्रवणानुजः॥३१॥
आकाश में अपने तेज से बहुत बड़ी उल्का के समान प्रकाशित होने वाली सीता को रावण आकाशमार्ग का ही आश्रय ले हर ले गया॥३१॥
तस्यास्तान्यग्निवर्णानि भूषणानि महीतले।
सघोषाण्यवशीर्यन्त क्षीणास्तारा इवाम्बरात्॥ ३२॥
जानकी के शरीर पर अग्नि के समान प्रकाशमान् आभूषण थे। वे उस समय खन-खन की आवाज करते हुए एक-एक करके गिरने लगे, मानो आकाश से ताराएँ टूट-टूटकर पृथ्वी पर गिर रही हों। ३२॥
तस्याः स्तनान्तराद् भ्रष्टो हारस्ताराधिपद्युतिः।
वैदेह्या निपतन् भाति गङ्गेव गगनच्युता॥३३॥
उन विदेहनन्दिनी सीता के स्तनों के बीच से खिसककर गिरता हुआ चन्द्रमा के समान उज्ज्वलहार गगनमण्डल से उतरती हुई गङ्गा के समान प्रतीत हुआ॥३३॥
उत्पातवाताभिरता नानाद्विजगणायुताः।
मा भैरिति विधूताग्रा व्याजहरिव पादपाः॥३४॥
रावण के वेग से उत्पन्न हुई उत्पातसूचक वायु के झकोरों से हिलते हुए वृक्षों पर नाना प्रकार के पक्षी कोलाहल कर रहे थे। उन्हें देखकर ऐसा जान पड़ता था मानो वे वृक्ष अपने सिरों को हिला-हिलाकर संकेत करते हुए सीता से कह रहे हैं कि ‘तुम डरो मत’॥ ३४॥
नलिन्यो ध्वस्तकमलास्त्रस्तमीनजलेचराः।
सखीमिव गतोत्साहां शोचन्तीव स्म मैथिलीम्॥ ३५॥
जिनके कमल सूख गये थे और मत्स्य आदि जलचर जीव डर गये थे, वे पुष्करिणियाँ उत्साहहीन हुई मिथिलेशकुमारी सीता को मानो अपनी सखी मानकर उनके लिये शोक कर रही थीं॥ ३५ ॥
समन्तादभिसम्पत्य सिंहव्याघ्रमृगद्विजाः।
अन्वधावंस्तदा रोषात् सीताच्छायानुगामिनः॥ ३६॥
उस सीताहरण के समय रावण पर रोष-सा करके सिंह, व्याघ्र, मृग और पक्षी सब ओर से सीता की परछाहीं का अनुसरण करते हुए दौड़ रहे थे॥ ३६॥
जलप्रपातास्रमुखाः शृङ्गैरुच्छ्रितबाहुभिः।
सीतायां ह्रियमाणायां विक्रोशन्तीव पर्वताः॥ ३७॥
जब सीता हरी जाने लगी, उस समय वहाँके पर्वत झरनोंके रूपमें आँसू बहाते हुए, ऊँचे शिखरोंके रूपमें अपनी भुजाएँ ऊपर उठाकर मानो जोर-जोरसे चीत्कार कर रहे थे॥ ३७॥
ह्रियमाणां तु वैदेहीं दृष्ट्वा दीनो दिवाकरः।
प्रविध्वस्तप्रभः श्रीमानासीत् पाण्डुरमण्डलः॥ ३८॥
सीता का हरण होता देख श्रीमान् सूर्यदेव दुःखी हो गये। उनकी प्रभा नष्ट-सी हो गयी तथा उनका मण्डल पीला पड़ गया॥ ३८॥ ।
नास्ति धर्मः कुतः सत्यं नार्जवं नानृशंसता।
यत्र रामस्य वैदेहीं सीतां हरति रावणः॥३९॥
इति भूतानि सर्वाणि गणशः पर्यदेवयन्।
वित्रस्तका दीनमुखा रुरुदुर्भुगपोतकाः॥४०॥
हाय! हाय! जब श्रीरामचन्द्रजी की धर्मपत्नी विदेहनन्दिनी सीता को रावण हरकर लिये जा रहा है, तब यही कहना पड़ता है कि ‘संसार में धर्म नहीं है, सत्य भी कहाँ है? सरलता और दया का भी सर्वथा लोप हो गया है।’ इस प्रकार वहाँ झुंड-के-झुंड एकत्र हो सब प्राणी विलाप कर रहे थे। मृगों के बच्चे भयभीत हो दीनमुख से रो रहे थे॥ ३९-४० ॥
उदीक्ष्योगीक्ष्य नयनर्भयादिव विलक्षणैः।
सुप्रवेपितगात्राश्च बभूवुर्वनदेवताः॥४१॥
विक्रोशन्तीं दृढं सीतां दृष्ट्वा दुःखं तथा गताम्।
श्रीराम को जोर-जोर से पुकारती और वैसे भारी दुःख में पड़ी हुई सीता को अपनी विलक्षण आँखों से बारंबार देख-देखकर भय के मारे वनदेवताओं के अङ्ग थर-थर काँपने लगे॥ ४१ १/२॥
तां तु लक्ष्मण रामेति क्रोशन्तीं मधुरस्वराम्॥ ४२॥
अवेक्षमाणां बहुशो वैदेहीं धरणीतलम्।
स तामाकुलकेशान्तां विप्रमृष्टविशेषकाम्।
जहारात्मविनाशाय दशग्रीवो मनस्विनीम्॥४३॥
विदेहनन्दिनी मधुर स्वर में ‘हा राम, हा लक्ष्मण’ की पुकार करती हुई बारंबार भूतल की ओर देख रही थीं। उनके केश खुलकर सब ओर फैल गये थे और ललाट की बेंदी मिट गयी थी। वैसी अवस्था में दशग्रीव रावण अपने ही विनाश के लिये मनस्विनी सीता को लिये जा रहा था॥ ४२-४३।।
ततस्तु सा चारुदती शुचिस्मिता विनाकृता बन्धुजनेन मैथिली।
अपश्यती राघवलक्ष्मणावुभौ विवर्णवक्त्रा भयभारपीडिता॥४४॥
उस समय मनोहर दाँत और पवित्र मुसकानवाली मिथिलेशकुमारी सीता, जो अपने बन्धुजनों से बिछुड़ गयी थीं, दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण को न देखकर भय के भार से व्यथित हो उठीं। उनके मुखमण्डल की कान्ति फीकी पड़ गयी॥ ४४ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे द्विपञ्चाशः सर्गः॥५२॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अरण्यकाण्ड में बावनवाँ सर्ग पूरा हुआ।५२॥
अरण्यकाण्डम्
त्रिपञ्चाशः सर्गः (सर्ग 53)
( सीता का रावण को धिक्कारना )
खमुत्पतन्तं तं दृष्ट्वा मैथिली जनकात्मजा।
दुःखिता परमोद्विग्ना भये महति वर्तिनी॥१॥
रावण को आकाश में उड़ते देख मिथिलेशकुमारी जानकी दुःखमग्न हो अत्यन्त उद्विग्न हो रही थीं। वे बहुत बड़े भय में पड़ गयी थीं॥१॥
रोषरोदनताम्राक्षी भीमाक्षं राक्षसाधिपम्।
रुदती करुणं सीता ह्रियमाणा तमब्रवीत्॥२॥
रोष और रोदन के कारण उनकी आँखें लाल हो गयी थीं। हरी जाती हुई सीता करुणाजनक स्वर में रोती हुई उस भयंकर नेत्रवाले राक्षसराज से इस प्रकार बोलीं॥२॥
न व्यपत्रपसे नीच कर्मणानेन रावण।
ज्ञात्वा विरहितां यो मां चोरयित्वा पलायसे॥३॥
‘ओ नीच रावण! क्या तुझे अपने इस कुकर्म से लज्जा नहीं आती है, जो मुझे स्वामी से रहित अकेली और असहाय जानकर चुराये लिये भागा जाता है?॥३॥
त्वयैव नूनं दुष्टात्मन् भीरुणा हर्तुमिच्छता।
ममापवाहितो भर्ता मृगरूपेण मायया॥४॥
‘दुष्टात्मन्! तू बड़ा कायर और डरपोक है। निश्चय ही मुझे हर ले जाने की इच्छा से तूने ही माया द्वारा मृगरूप में उपस्थित हो मेरे स्वामी को आश्रम से दूर हटा दिया था॥४॥
यो हि मामुद्यतस्त्रातुं सोऽप्ययं विनिपातितः।
गृध्रराजः पुराणोऽसौ श्वशुरस्य सखा मम॥५॥
‘मेरे श्वशुर के सखा वे जो बूढ़े जटायु मेरी रक्षा करने के लिये उद्यत हुए थे, उनको भी तूने मार गिराया॥५॥
परमं खलु ते वीर्यं दृश्यते राक्षसाधम।
विश्राव्य नामधेयं हि युद्धे नास्मि जिता त्वया॥६॥
ईदृशं गर्हितं कर्म कथं कृत्वा न लज्जसे।
स्त्रियाश्चाहरणं नीच रहिते च परस्य च॥७॥
‘नीच राक्षस! अवश्य तुझमें बड़ा भारी बल दिखायी देता है (क्योंकि-तू बूढ़े पक्षी को भी मार गिराता है!), तूने अपना नाम बताकर श्रीरामलक्ष्मण के साथ युद्ध करके मुझे नहीं जीता है। ओ नीच! जहाँ कोई रक्षक न हो—ऐसे स्थान पर जाकर परायी स्त्री के अपहरण-जैसा निन्दित कर्म करके तू लज्जित कैसे नहीं होता है ?॥६-७॥
कथयिष्यन्ति लोकेषु पुरुषाः कर्म कुत्सितम्।
सुनृशंसमधर्मिष्ठं तव शौटीर्यमानिनः॥८॥
‘तू तो अपने को बड़ा शूर-वीर मानता है, परंतु संसार के सभी वीर पुरुष तेरे इस कर्म को घृणित, क्रूरतापूर्ण और पापरूप ही बतायेंगे॥ ८॥
धिक् ते शौर्यं च सत्त्वं च यत्त्वया कथितं तदा।
कुलाक्रोशकरं लोके धिक ते चारित्रमीदृशम्॥९॥
‘तूने पहले स्वयं ही जिसका बड़े ताव से वर्णन किया था, तेरे उस शौर्य और बल को धिक्कार है! कुल में कलङ्क लगाने वाले तेरे ऐसे चरित्र को संसार में सदा धिक्कार ही प्राप्त होगा॥९॥
किं शक्यं कर्तुमेवं हि यज्जवेनैव धावसि।
मुहूर्तमपि तिष्ठ त्वं न जीवन् प्रतियास्यसि॥१०॥
‘किंतु इस समय क्या किया जा सकता है? क्योंकि तू बड़े वेग से भागा जा रहा है। अरे! दो घड़ी भी तो ठहर जा, फिर यहाँ से जीवित नहीं लौट सकेगा॥१०॥
नहि चक्षुःपथं प्राप्य तयोः पार्थिवपुत्रयोः।
ससैन्योऽपि समर्थस्त्वं मुहूर्तमपि जीवितुम्॥११॥
“उन दोनों राजकुमारों के दृष्टिपथ में आ जाने पर तू सेना के साथ हो तो भी दो घड़ी भी जीवित नहीं रह सकता ॥ ११॥
न त्वं तयोः शरस्पर्श सोढुं शक्तः कथंचन।
वने प्रज्वलितस्येव स्पर्शमग्नेर्विहंगमः॥१२॥
‘जैसे कोई आकाशचारी पक्षी वन में प्रज्वलित हुए दावानल का स्पर्श सहन करने में समर्थ नहीं होता, उसी प्रकार तू मेरे पति और उनके भाई दोनों के बाणों का स्पर्श किसी तरह सह नहीं सकता॥ १२॥
साधु कृत्वाऽऽत्मनः पथ्यं साधु मां मुञ्च रावण।
मत्प्रधर्षणसंक्रुद्धो भ्रात्रा सह पतिर्मम॥१३॥
विधास्यति विनाशाय त्वं मां यदि न मुञ्चसि।
‘रावण! यदि तू मुझे छोड़ नहीं देता है तो मेरे तिरस्कार से कुपित हुए मेरे पतिदेव अपने भाई के साथ चढ़ आयेंगे और तेरे विनाश का उपाय करेंगे, अतः तू अच्छी तरह अपनी भलाई सोच ले और मुझे छोड़ दे। यही तेरे लिये अच्छा होगा॥१३ १/२ ॥
येन त्वं व्यवसायेन बलान्मां हर्तुमिच्छसि॥१४॥
व्यवसायस्तु ते नीच भविष्यति निरर्थकः।
‘नीच! तू जिस संकल्प या अभिप्राय से बलपूर्वक मेरा हरण करना चाहता है, तेरा वह अभिप्राय व्यर्थ होगा। १४ १/२॥
नह्यहं तमपश्यन्ती भर्तारं विबुधोपमम्॥१५॥
उत्सहे शत्रुवशगा प्राणान् धारयितुं चिरम्।
‘मैं अपने देवोपम पति का दर्शन न पाने पर शत्रु के अधीनता में अधिक कालतक अपने प्राणों को नहीं धारण कर सकूँगी॥ १५ १/२ ॥
न नूनं चात्मनः श्रेयः पथ्यं वा समवेक्षसे॥१६॥
मृत्युकाले यथा मर्यो विपरीतानि सेवते।
मुमूर्पूणां तु सर्वेषां यत् पथ्यं तन्न रोचते॥१७॥
‘निश्चय ही तू अपने कल्याण और हित का विचार नहीं करता है। जैसे मरने के समय मनुष्य स्वास्थ्य के विरोधी पदार्थों का सेवन करने लगता है, वही दशा तेरी है। प्रायः सभी मरणासन्न मनुष्यों को पथ्य (हितकारक सलाह या भोजन) नहीं रुचता है॥ १६-१७॥
पश्यामीह हि कण्ठे त्वां कालपाशावपाशितम्।
यथा चास्मिन् भयस्थाने न बिभेषि निशाचर ॥ १८॥
‘निशाचर! मैं देखती हूँ, तेरे गले में काल की फाँसी पड़ चुकी है, इसी से इस भय के स्थान पर भी तू निर्भय बना हुआ है।॥ १८॥
व्यक्तं हिरण्मयांस्त्वं हि सम्पश्यसि महीरुहान्।
नदीं वैतरणी घोरां रुधिरौघविवाहिनीम्॥१९॥
खड्गपत्रवनं चैव भीमं पश्यसि रावण।।
तप्तकाञ्चनपुष्पां च वैदूर्यप्रवरच्छदाम्॥२०॥
द्रक्ष्यसे शाल्मलीं तीक्ष्णामायसैः कण्टकैश्चिताम्।
‘रावण! अवश्य ही तू सुवर्णमय वृक्षों को देख रहा है, रक्त का स्रोत बहाने वाली भयंकर वैतरणी नदी का दर्शन कर रहा है, भयानक असिपत्र-वन को भी देखना चाहता है तथा जिसमें तपाये हुए सुवर्ण के
समान फूल तथा श्रेष्ठ वैदूर्यमणि (नीलम) के समान पत्ते हैं और जिसमें लोहे के काँटे चिने गये हैं, उस तीखी शाल्मलिका भी अब तू शीघ्र ही दर्शन करेगा॥१९-२० १/२॥
नहि त्वमीदृशं कृत्वा तस्यालीकं महात्मनः॥ २१॥
धारितुं शक्ष्यसि चिरं विषं पीत्वेव निघृण।
बद्धस्त्वं कालपाशेन दुर्निवारेण रावण॥२२॥
‘निर्दयी निशाचर! तू महात्मा श्रीराम का ऐसा महान् अपराध करके विषपान किये हुए मनुष्य की भाँति अधिक कालतक जीवन धारण नहीं कर सकेगा। रावण! तू अटल कालपाश से बँध गया है॥ २१-२२ ॥
क्व गतो लप्स्यसे शर्म मम भर्तुर्महात्मनः।
निमेषान्तरमात्रेण विना भ्रातरमाहवे॥ २३॥
राक्षसा निहता येन सहस्राणि चतुर्दश।
कथं स राघवो वीरः सर्वास्त्रकुशलो बली॥ २४॥
न त्वां हन्याच्छरैस्तीक्ष्णैरिष्टभार्यापहारिणम्।
‘मेरे महात्मा पति से बचकर तू कहाँ जाकर शान्ति पा सकेगा। जिन्होंने अपने भाई लक्ष्मण की सहायता लिये बिना ही युद्ध में पलक मारते-मारते चौदह हजार राक्षसों का विनाश कर डाला, वे सम्पूर्ण अस्त्रों का प्रयोग करने में कुशल बलवान् वीर रघुनाथजी अपनी प्यारी पत्नी का अपहरण करने वाले तुझ-जैसे पापी को तीखे बाणों द्वारा क्यों नहीं कालके गाल में भेज देंगे’॥ २३-२४ १/२॥
एतच्चान्यच्च परुषं वैदेही रावणाङ्कगा।
भयशोकसमाविष्टा करुणं विललाप ह॥२५॥
रावण के चंगुल में फँसी हुई विदेहराजकुमारी सीता भय और शोक से व्याकुल हो ये तथा और भी बहुत से कठोर वचन सुनाकर करुण-स्वर में विलाप करने लगीं॥ २५ ॥
तदा भृशात् बहु चैव भाषिणीं विलापपूर्वं करुणं च भामिनीम्।
जहार पापस्तरुणीं विचेष्टतीं नृपात्मजामागतगात्रवेपथुः॥२६॥
अत्यन्त दुःख से आतुर हो विलापपूर्वक बहुत-सी करुणाजनक बातें कहती और छूटने के लिये नाना प्रकार की चेष्टा करती हुई तरुणी भामिनी राजकुमारी सीता को वह पापी निशाचर हर ले गया। उस समय अधिक बोझ के कारण उसका शरीर काँप रहा था। २६॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे त्रिपञ्चाशः सर्गः॥५३॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अरण्यकाण्ड में तिरपनवाँ सर्ग पूरा हुआ।५३॥
अरण्यकाण्डम्
चतुष्पञ्चाशः सर्गः (सर्ग 54)
( सीता का पाँच वानरों के बीच अपने भूषण और वस्त्र को गिराना, रावण का सीता को अन्तःपुर में रखना )
ह्रियमाणा तु वैदेही कंचिन्नाथमपश्यती।
ददर्श गिरिशृङ्गस्थान् पञ्च वानरपुङ्गवान्॥१॥
रावण के द्वारा हरी जाती हुई विदेहनन्दिनी सीता को उस समय कोई भी अपना सहायक नहीं दिखायी देता था। मार्ग में उन्होंने एक पर्वत के शिखर पर पाँच श्रेष्ठ वानरों को बैठे देखा॥१॥
तेषां मध्ये विशालाक्षी कौशेयं कनकप्रभम्।
उत्तरीयं वरारोहा शुभान्याभरणानि च॥२॥
मुमोच यदि रामाय शंसेयुरिति भामिनी।
वस्त्रमुत्सृज्य तन्मध्ये निक्षिप्तं सहभूषणम्॥३॥
तब सुन्दर अङ्गोंवाली विशाललोचना भामिनी सीता ने यह सोचकर कि शायद ये भगवान् श्रीराम को कुछ समाचार कह सकें, अपने सुनहरे रंग की रेशमी चादर उतारी और उसमें वस्त्र और आभूषण रखकर उसे उनके बीच में फेंक दिया॥ २-३॥
सम्भ्रमात् तु दशग्रीवस्तत्कर्म च न बुद्धवान्।
पिङ्गाक्षास्तां विशालाक्षी नेत्रैरनिमिषैरिव॥४॥
विक्रोशन्तीं तदा सीतां ददृशुर्वानरोत्तमाः।
रावण बड़ी घबराहट में था, इसलिये सीता के इस कार्य को वह न जान सका। वे भूरी आँखों वाले श्रेष्ठ वानर उस समय उच्च स्वर से विलाप करती हुई विशाल-लोचना सीता की ओर एकटक नेत्रों से देखने लगे॥ ४ १/२॥
स च पम्पामतिक्रम्य लङ्कामभिमुखः पुरीम्॥५॥
जगाम मैथिलीं गृह्य रुदतीं राक्षसेश्वरः।
राक्षसराज रावण पम्पासरोवर को लाँघकर रोती हुई मैथिली सीता को साथ लिये लङ्कापुरी की ओर चल दिया॥ ५ १/२॥
तां जहार सुसंहृष्टो रावणो मृत्युमात्मनः॥६॥
उत्सङ्गेनैव भुजगीं तीक्ष्णदंष्ट्रां महाविषाम्।
निशाचर रावण बड़े हर्ष में भरकर सीता के रूप में अपनी मौत को ही हरकर लिये जा रहा था। उसने वैदेही के रूप में तीखे दाढ़वाली महाविषैली नागिन को ही अपनी गोद में उठा रखा था॥ ६ १/२॥
वनानि सरितः शैलान् सरांसि च विहायसा॥७॥
स क्षिप्रं समतीयाय शरश्चापादिव च्युतः।
वह धनुष से छूटे हुए बाण की तरह तीव्र गति से चलकर आकाशमार्ग से अनेकानेक वनों, नदियों, पर्वतों और सरोवरों को तुरंत लाँघ गया॥७ १/२॥
तिमिनक्रनिकेतं तु वरुणालयमक्षयम्॥८॥
सरितां शरणं गत्वा समतीयाय सागरम्।
उसने तिमि नामक मत्स्यों और नाकों के निवासस्थान एवं वरुण के अक्षय गृह समुद्र को भी, जो समस्त नदियों का आश्रय है, पार कर लिया॥८ १/२॥
सम्भ्रमात् परिवृत्तोर्मी रुद्धमीनमहोरगः॥९॥
वैदेह्यां ह्रियमाणायां बभूव वरुणालयः।
विदेहनन्दिनी जगन्माता जानकी का अपहरण होते समय वरुणालय समुद्र को बड़ी घबराहट हुई। उससे उसकी उठती हुई लहरें शान्त हो गयीं। उसके भीतररहने वाली मछलियों और बड़े-बड़े सर्पो की गति रुकगयी॥९ १/२ ॥
अन्तरिक्षगता वाचः ससृजुश्चारणास्तदा॥१०॥
एतदन्तो दशग्रीव इति सिद्धास्तथाब्रुवन्।
उस समय आकाश में विचरने वाले चारण यों बोले —’अब दशग्रीव रावण का यह अन्तकाल निकट आ पहुँचा है’ तथा सिद्धों ने भी यही बात दुहरायी॥ १० १/२॥
स तु सीतां विचेष्टन्तीमतेनादाय रावणः॥११॥
प्रविवेश पुरीं लङ्कां रूपिणीं मृत्युमात्मनः।
सीता छटपटा रही थीं। रावण ने अपनी साकारमृत्यु की भाँति उन्हें अङ्क में लेकर लङ्कापुरी में प्रवेश किया॥ ११ १/२॥
सोऽभिगम्य पुरीं लङ्कां सुविभक्तमहापथाम्॥ १२॥
संरूढकक्ष्यां बहुलां स्वमन्तःपुरमाविशत्।
वहाँ पृथक्-पृथक् विशाल राजमार्ग बने हुए थे। पुरी के द्वारपर बहुत-से राक्षस इधर-उधर फैले हुए थे तथा उस नगरी का विस्तार बहुत बड़ा था। उसमें जाकर रावण ने अपने अन्तःपुर में प्रवेश किया॥ १२ १/२॥
तत्र तामसितापाङ्गीं शोकमोहसमन्विताम्॥१३॥
निदधे रावणः सीतां मयो मायामिवासुरीम्।
कजरारे नेत्रप्रान्तवाली सीता शोक और मोह में डूबी हुई थीं। रावण ने उन्हें अन्तःपुर में रख दिया, मानो मयासुर ने मूर्तिमती आसुरी माया को वहाँ स्थापित कर दिया हो* ॥ १३ १/२॥
*रामायणतिलक नामक व्याख्या के विद्वान् लेखक ने यह बताया है कि यहाँ जो सीता की माया से उपमा दी गयी है, उसके द्वारा यह अभिप्राय व्यक्त किया गया है कि मायामयी सीता ही लङ्का में आयी थीं; मुख्य सीता तो अग्नि में प्रविष्ट हो चुकी थीं। इसीलिये रावण इन्हें ला सका। मायारूपिणी होने के कारण ही रावण को इनके स्वरूपका ज्ञान न हो सका।
अब्रवीच्च दशग्रीवः पिशाचीरदर्शनाः॥१४॥
यथा नैनां पुमान् स्त्री वा सीतां पश्यत्यसम्मतः।
इसके बाद दशग्रीव ने भयंकर आकारवाली पिशाचिनों को बुलाकर कहा—'(तुम सब सावधानी के साथ सीता की रक्षा करो।) कोई भी स्त्री या पुरुष मेरी आज्ञा के बिना सीता को देखने या इनसे मिलने न पाये॥ १४ १/२॥
मुक्तामणिसुवर्णानि वस्त्राण्याभरणानि च॥ १५॥
यद् यदिच्छेत् तदैवास्या देयं मच्छन्दतो यथा।
‘उन्हें मोती, मणि, सुवर्ण, वस्त्र और आभूषण आदि जिस-जिस वस्तु की इच्छा हो, वह तुरंत दी जाय इसके लिये मेरी खुली आज्ञा है। १५ १/२ ॥
या च वक्ष्यति वैदेहीं वचनं किंचिदप्रियम्॥ १६॥
अज्ञानाद् यदि वा ज्ञानान्न तस्या जीवितं प्रियम्।
‘तुमलोगों में से जो कोई भी जानकर या बिना जाने विदेहकुमारी सीता से कोई अप्रिय बात कहेगी, मैं समशृंगा, उसे अपनी जिंदगी प्यारी नहीं है’ ॥ १६ १/२॥
तथोक्त्वा राक्षसीस्तास्तु राक्षसेन्द्रः प्रतापवान्॥ १७॥
निष्क्रम्यान्तःपुरात् तस्मात् किं कृत्यमिति चिन्तयन्।
ददर्शाष्टौ महावीर्यान् राक्षसान् पिशिताशनान्॥ १८॥
राक्षसियों को वैसी आज्ञा देकर प्रतापी राक्षसराज ‘अब आगे क्या करना चाहिये’ यह सोचता हुआ अन्तःपुर से बाहर निकला और कच्चे मांस का आहार करने वाले आठ महापराक्रमी राक्षसों से तत्काल मिला॥१७-१८॥
स तान् दृष्ट्वा महावीर्यो वरदानेन मोहितः।
उवाच तानिदं वाक्यं प्रशस्य बलवीर्यतः॥१९॥
उनसे मिलकर ब्रह्माजी के वरदान से मोहित हुए महापराक्रमी रावण ने उसके बल और वीर्य की प्रशंसा करके उनसे इस प्रकार कहा- ॥१९॥
नानाप्रहरणाः क्षिप्रमितो गच्छत सत्वराः।
जनस्थानं हतस्थानं भूतपूर्वं खरालयम्॥२०॥
‘वीरो! तुमलोग नाना प्रकार के अस्त्र-शस्त्र साथ लेकर शीघ्र ही जनस्थान को, जहाँ पहले खर रहता था, जाओ। वह स्थान इस समय उजाड़ पड़ा है। २०॥
तत्रास्यतां जनस्थाने शून्ये निहतराक्षसे।
पौरुषं बलमाश्रित्य त्रासमुत्सृज्य दूरतः॥२१॥
‘वहाँ के सभी राक्षस मार डाले गये हैं। उस सूने जनस्थान में तुमलोग अपने ही बल-पौरुष का भरोसा करके भय को दूर हटाकर रहो॥ २१॥
बहुसैन्यं महावीर्यं जनस्थाने निवेशितम्।
सदूषणखरं युद्धे निहतं रामसायकैः॥ २२॥
‘मैंने वहाँ बहुत बड़ी सेना के साथ महापराक्रमी खर और दूषण को बसा रखा था, किंतु वे सब-के सब युद्ध में राम के बाणों से मारे गये॥ २२॥
ततः क्रोधो ममापूर्वो धैर्यस्योपरि वर्धते।
वैरं च सुमहज्जातं रामं प्रति सुदारुणम्॥२३॥
‘इससे मेरे मन में अपूर्व क्रोध जाग उठा है और वह धैर्य की सीमा से ऊपर उठकर बढ़ने लगा है; इसीलिये राम के साथ मेरा बड़ा भारी और भयंकर वैर ठन गया है॥२३॥
निर्यातयितुमिच्छामि तच्च वैरं महारिपोः।
नहि लप्स्याम्यहं निद्रामहत्वा संयुगे रिपुम्॥२४॥
‘मैं अपने महान् शत्रु से उस वैर का बदला लेना चाहता हूँ। उस शत्रु को संग्राम में मारे बिना मैं चैन से सो नहीं सकूँगा॥२४॥
तं त्विदानीमहं हत्वा खरदूषणघातिनम्।
रामं शर्मोपलप्स्यामि धनं लब्ध्वेव निर्धनः॥२५॥
‘राम ने खर और दूषण का वध किया है, अतः मैं भी इस समय उन्हें मारकर जब बदला चुका लूँगा, तभी मुझे शान्ति मिलेगी। जैसे निर्धन मनुष्य धन पाकर संतुष्ट होता है, उसी प्रकार मैं राम का वध करके शान्ति पा सकूँगा॥ २५॥
जनस्थाने वसद्भिस्तु भवद्भी राममाश्रिता।
प्रवृत्तिरुपनेतव्या किं करोतीति तत्त्वतः॥२६॥
‘जनस्थान में रहकर तुमलोग रामचन्द्र का समाचार जानो और वे कब क्या कर रहे हैं, इसका ठीक-ठीक पता लगाते रहो और जो कुछ मालूम हो, उसकी सूचना मेरे पास भेज दिया करो॥२६॥
अप्रमादाच्च गन्तव्यं सर्वैरेव निशाचरैः।
कर्तव्यश्च सदा यत्नो राघवस्य वधं प्रति॥२७॥
‘तुम सभी निशाचर सावधानी के साथ वहाँ जाना और राम के वध के लिये सदा प्रयत्न करते रहना॥ २७॥
युष्माकं तु बलं ज्ञातं बहुशो रणमूर्धनि।
अतश्चास्मिञ्जनस्थाने मया यूयं निवेशिताः॥ २८॥
‘मुझे अनेक बार युद्धके मुहाने पर तुमलोगों के बल का परिचय मिल चुका है। इसीलिये इस जनस्थान में मैंने तुम्हीं लोगों को रखने का निश्चय किया है’ ॥२८॥
ततः प्रियं वाक्यमुपेत्य राक्षसा महार्थमष्टावभिवाद्य रावणम्।
विहाय लङ्कां सहिताः प्रतस्थिरे यतो जनस्थानमलक्ष्यदर्शनाः॥२९॥
रावण की यह महान् प्रयोजन से भरी हुई प्रिय बातें सुनकर वे आठों राक्षस उसे प्रणाम करके अदृश्य हो एक साथ ही लङ्का को छोड़कर जनस्थान की ओर प्रस्थित हो गये॥ २९॥
ततस्तु सीतामुपलभ्य रावणः सुसम्प्रहृष्टः परिगृह्य मैथिलीम्।
प्रसज्य रामेण च वैरमुत्तमं बभूव मोहान्मुदितः स रावणः॥३०॥
तदनन्तर मिथिलेशकुमारी सीताको पाकर उन्हें राक्षसियों की देख-रेख में सौंपकर रावण को बड़ा हर्ष हुआ। श्रीराम के साथ भारी वैर ठानकर वह राक्षस मोहवश आनन्द मानने लगा॥ ३० ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे चतुष्पञ्चाशः सर्गः॥५४॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अरण्यकाण्ड में चौवनवाँ सर्ग पूरा हुआ।५४॥
अरण्यकाण्डम्
पञ्चपञ्चाशः सर्गः (सर्ग 55)
( रावण का सीता को अपने अन्तःपुर का दर्शन कराना और अपनी भार्या बन जाने के लिये समझाना )
संदिश्य राक्षसान् घोरान् रावणोऽष्टौ महाबलान्।
आत्मानं बुद्धिवैक्लव्यात् कृत्कृत्यममन्यत॥१॥
इस प्रकार आठ महाबली भयंकर राक्षसों को जनस्थान में जाने की आज्ञा दे रावण ने विपरीत बुद्धि के कारण अपने को कृतकृत्य माना॥१॥
स चिन्तयानो वैदेहीं कामबाणैः प्रपीडितः।
प्रविवेश गृहं रम्यं सीतां द्रष्टमभित्वरन्॥२॥
वह विदेहकुमारी सीता का स्मरण करके कामबाणों से अत्यन्त पीड़ित हो रहा था; अतः उन्हें देखने के लिये उसने बड़ी उतावली के साथ अपने रमणीय अन्तःपुर में प्रवेश किया॥२॥
स प्रविश्य तु तद्देश्म रावणो राक्षसाधिपः।
अपश्यद् राक्षसीमध्ये सीतां दुःखपरायणाम्॥
अश्रुपूर्णमुखीं दीनां शोकभारावपीडिताम्।
वायुवेगैरिवाक्रान्तां मज्जन्तीं नावमर्णवे॥४॥
मृगयूथपरिभ्रष्टां मृगी श्वभिरिवावृताम्।
उस भवन में प्रवेश करके राक्षसों के राजा रावण ने देखा कि सीता राक्षसियों के बीच में बैठकर दुःख में डूबी हुई हैं। उनके मुख पर आँसुओं की धारा बह रही है और वे शोक के दुस्सह भार से अत्यन्त पीड़ित एवं दीन हो वायु के वेग से आक्रान्त हो समुद्र में डूबती हुई नौका के समान जान पड़ती हैं। मृगों के यूथ से बिछुड़कर कुत्तों से घिरी हुई अकेली हरिणी के समान दिखायी देती हैं। ३-४ १/२॥
अधोगतमुखीं सीतां तामभ्येत्य निशाचरः॥५॥
तां तु शोकवशाद् दीनामवशां राक्षसाधिपः।
सबलाद् दर्शयामास गृहं देवगृहोपमम्॥६॥
शोकवश दीन और विवश हो नीचे मुँह किये बैठी हुई सीता के पास पहुँचकर राक्षसों के राजा निशाचर रावण ने उन्हें जबर्दस्ती अपने देवगृह के समान सुन्दर भवन का दर्शन कराया॥ ५-६॥
हर्म्यप्रासादसम्बाधं स्त्रीसहस्रनिषेवितम्।
नानापक्षिगणैर्जुष्टं नानारत्नसमन्वितम्॥७॥
वह ऊँचे-ऊँचे महलों और सातमंजिले मकानों से भरा हुआ था। उसमें सहस्रों स्त्रियाँ निवास करती थीं। झुंड-के-झुंड नाना जाति के पक्षी वहाँ कलरव करते थे। नाना प्रकार के रत्न उस अन्तःपुर की शोभा बढ़ाते थे॥७॥
दान्तकैस्तापनीयैश्च स्फाटिकै राजतैस्तथा।
वज्रवैदूर्यचित्रैश्च स्तम्भैदृष्टिमनोरमैः॥८॥
उसमें बहुत-से मनोहर खंभे लगे थे, जो हाथीदाँत, पक्के सोने, स्फटिकमणि, चाँदी, हीरा और वैदूर्यमणि (नीलम) से जटित होने के कारण बड़े विचित्र दिखायी देते थे॥८॥
दिव्यदुन्दुभिनिर्घोषं तप्तकाञ्चनभूषणम्।
सोपानं काञ्चनं चित्रमारुरोह तया सह ॥९॥
उस महल में दिव्य दुन्दुभियों का मधुर घोष होता रहता था। उस अन्तःपुर को तपाये हुए सुवर्ण के आभूषणों से सजाया गया था। रावण सीता को साथ लेकर सोने की बनी हुई विचित्र सीढ़ीपर चढ़ा॥९॥
दान्तका राजताश्चैव गवाक्षाः प्रियदर्शनाः।
हेमजालावृताश्चासंस्तत्र प्रासादपङ्क्तयः॥१०॥
वहाँ हाथीदाँत और चाँदी की बनी हुई खिड़कियाँ थीं, जो बड़ी सुहावनी दिखायी देती थीं। सोने की जालियों से ढकी हुई प्रासादमालाएँ भी दृष्टिगोचर होती थीं॥ १०॥
सुधामणिविचित्राणि भूमिभागानि सर्वशः।
दशग्रीवः स्वभवने प्रादर्शयत मैथिलीम्॥११॥
उस महल में जो भूभाग (फर्श) थे, वे सुर्थी चूना के पक्के बनाये गये थे और उनमें मणियाँ जड़ी गयी थीं, जिनसे वे सब-के-सब विचित्र दिखायी देते थे। दशग्रीव ने अपने महल की वे सारी वस्तुएँ मैथिलीको दिखायीं॥ ११॥
दीर्घिकाः पुष्करिण्यश्च नानापुष्पसमावृताः।
रावणो दर्शयामास सीतां शोकपरायणाम्॥ १२॥
रावण ने बहुत-सी बावड़ियाँ और भाँति-भाँति के फूलों से आच्छादित बहुत-सी पोखरियाँ भी सीता को दिखायीं। सीता वह सब देखकर शोक में डूब गयीं। १२॥
दर्शयित्वा तु वैदेहीं कृत्स्नं तद्भवनोत्तमम्।
उवाच वाक्यं पापात्मा सीतां लोभितुमिच्छया॥ १३॥
वह पापात्मा निशाचर विदेहनन्दिनी सीता को अपना सारा सुन्दर भवन दिखाकर उन्हें लुभाने की इच्छा से इस प्रकार बोला— ॥१३॥
दश राक्षसकोट्यश्च द्वाविंशतिरथापराः।
वर्जयित्वा जरावृद्धान् बालांश्च रजनीचरान्॥ १४॥
तेषां प्रभुरहं सीते सर्वेषां भीमकर्मणाम्।
सहस्रमेकमेकस्य मम कार्यपुरःसरम्॥१५॥
‘सीते! मेरे अधीन बत्तीस करोड़ राक्षस हैं। यह संख्या बूढ़े और बालक निशाचरों को छोड़कर बतायी गयी है। भयंकर कर्म करने वाले इन सभी राक्षसों का मैं ही स्वामी हूँ। अकेले मेरी सेवा में एक हजार राक्षस रहते हैं ॥ १४-१५ ॥
यदिदं राज्यतन्त्रं मे त्वयि सर्वं प्रतिष्ठितम्।
जीवितं च विशालाक्षि त्वं मे प्राणैर्गरीयसी॥ १६॥
‘विशाललोचने! मेरा यह सारा राज्य और जीवन तुम पर ही अवलम्बित है (अथवा यह सब कुछ तुम्हारे चरणों में समर्पित है)। तुम मुझे प्राणों से भी अधिक प्रिय हो॥१६॥
बह्वीनामुत्तमस्त्रीणां मम योऽसौ परिग्रहः।
तासां त्वमीश्वरी सीते मम भार्या भव प्रिये॥ १७॥
‘सीते! मेरा अन्तःपुर मेरी बहुत-सी सुन्दरी भार्याओं से भरा हुआ है, तुम उन सबकी स्वामिनी बनो—प्रिये! मेरी भार्या बन जाओ॥ १७ ॥
साधु किं तेऽन्यथाबुद्ध्या रोचयस्व वचो मम।
भजस्व माभितप्तस्य प्रसादं कर्तुमर्हसि ॥१८॥
‘मेरे इस हितकर वचन को मान लो—इसे पसंद करो; इससे विपरीत विचार को मन में लाने से तुम्हें क्या लाभ होगा? मुझे अङ्गीकार करो। मैं पीड़ित हूँ, मुझपर कृपा करो॥ १८॥
परिक्षिप्ता समुद्रेण लङ्केयं शतयोजना।
नेयं धर्षयितुं शक्या सेन्ट्रैरपि सुरासुरैः॥१९॥
‘समुद्र से घिरी हुई इस लङ्का के राज्य का विस्तार सौ योजन है। इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवता और असुर मिलकर भी इसे ध्वस्त नहीं कर सकते॥१९॥
न देवेषु न यक्षेषु न गन्धर्वेषु नर्षिषु।
अहं पश्यामि लोकेषु यो मे वीर्यसमो भवेत्॥ २०॥
‘देवताओं, यक्षों, गन्धर्वो तथा ऋषियों में भी मैं किसी को ऐसा नहीं देखता, जो पराक्रम में मेरी समानता कर सके॥ २० ॥
राज्यभ्रष्टेन दीनेन तापसेन पदातिना।
किं करिष्यसि रामेण मानुषेणाल्पतेजसा॥२१॥
‘राम तो राज्य से भ्रष्ट, दीन, तपस्वी, पैदल चलने वाले और मनुष्य होने के कारण अल्प तेजवाले हैं, उन्हें लेकर क्या करोगी? ॥ २१॥
भजस्व सीते मामेव भर्ताहं सदृशस्तव।
यौवनं त्वध्रुवं भीरु रमस्वेह मया सह ॥ २२॥
‘सीते! मुझको ही अपनाओ ! मैं तुम्हारे योग्य पति हूँ। भीरु ! जवानी सदा रहने वाली नहीं है, अतः यहाँ रहकर मेरे साथ रमण करो॥ २२ ॥
दर्शने मा कृथा बुद्धिं राघवस्य वरानने।
कास्य शक्तिरिहागन्तुमपि सीते मनोरथैः॥२३॥
‘वरानने! सीते! अब तुम राम के दर्शन का विचार छोड़ दो। इस राम में इतनी शक्ति कहाँ है कि यहाँ तक आने का मनोरथ भी कर सके॥ २३॥
न शक्यो वायुराकाशे पाशैर्बद्धु महाजवः।
दीप्यमानस्य वाप्यग्नेर्ग्रहीतुं विमलाः शिखाः॥ २४॥
‘आकाश में महान् वेग से बहने वाली वायु को रस्सियों में नहीं बाँधा जा सकता अथवा प्रज्वलित अग्नि की निर्मल ज्वालाओं को हाथों से नहीं पकड़ा जा सकता॥ २४॥
त्रयाणामपि लोकानां न तं पश्यामि शोभने।
विक्रमेण नयेद् यस्त्वां मद्बाहुपरिपालिताम्॥ २५॥
‘शोभने ! मैं तीनों लोकों में किसी ऐसे वीर को नहीं देखता, जो मेरी भुजाओं से सुरक्षित तुमको पराक्रम करके यहाँ से ले जा सके॥ २५ ॥
लङ्कायाः सुमहद्राज्यमिदं त्वमनुपालय।
त्वत्प्रेष्या मद्विधाश्चैव देवाश्चापि चराचरम्॥ २६॥
‘लङ्का के इस विशाल राज्य का तुम्ही पालन करो। मुझ-जैसे राक्षस, देवता तथा सम्पूर्ण चराचर जगत् तुम्हारे सेवक बनकर रहेंगे॥ २६ ॥
अभिषेकजलक्लिन्ना तुष्टा च रमयस्व च।
दुष्कृतं यत्पुरा कर्म वनवासेन तद्गतम्॥२७॥
यच्च ते सुकृतं कर्म तस्येह फलमाप्नहि।
‘स्नान के जल से आर्द्र (अथवा लङ्का के राज्यपर अपना अभिषेक कराकर उसके जल से आर्द्र) होकर संतुष्ट हो तुम अपने-आपको क्रीड़ाविनोद में लगाओ। तुम्हारा पहले का जो दुष्कर्म था, वह वनवास का कष्ट देकर समाप्त हो गया। अब जो तुम्हारा पुण्यकर्म शेष है, उसका फल यहाँ भोगो॥ २७॥
इह सर्वाणि माल्यानि दिव्यगन्धानि मैथिलि। २८॥
भूषणानि च मुख्यानि तानि सेव मया सह।
‘मिथिलेशकुमारी! तुम मेरे साथ यहाँ रहकर सब प्रकार के पुष्पहार, दिव्य गन्ध और श्रेष्ठ आभूषण आदि का सेवन करो॥ २८ १/२ ॥
पुष्पकं नाम सुश्रोणि भ्रातुर्वैश्रवणस्य मे॥२९॥
विमानं सूर्यसंकाशं तरसा निर्जितं रणे।
विशालं रमणीयं च तद्विमानं मनोजवम्॥३०॥
तत्र सीते मया सार्धं विहरस्व यथासुखम्।
‘सुन्दर कटिप्रदेशवाली सुन्दरि! वह सूर्य के समान प्रकाशित होने वाला पुष्पकविमान मेरे भाई कुबेर का था। उसे मैंने बलपूर्वक जीता है। यह अत्यन्त रमणीय, विशाल तथा मन के समान वेग से चलने वाला है। सीते! तुम उसके ऊपर मेरे साथ बैठकर सुखपूर्वक विहार करो॥ २९-३० १/२ ॥
वदनं पद्मसंकाशं विमलं चारुदर्शनम्॥३१॥
शोकार्तं तु वरारोहे न भ्राजति वरानने।
‘वरारोहे सुमुखि! तुम्हारा यह कमल के समान सुन्दर निर्मल और मनोहर दिखायी देने वाला मुख शोक से पीड़ित होने के कारण शोभा नहीं पा रहा है’। ३१ १/२॥
एवं वदति तस्मिन् सा वस्त्रान्तेन वराङ्गना॥ ३२॥
पिधायेन्दुनिभं सीता मन्दमश्रूण्यवर्तयत्।
जब रावण ऐसी बातें कहने लगा, तब परमसुन्दरी सीता देवी चन्द्रमा के समान मनोहर अपने मुख को आँचल से ढककर धीरे-धीरे आँसू बहाने लगीं॥ ३२ १/२॥
ध्यायन्ती तामिवास्वस्थां सीतां चिन्ताहतप्रभाम्॥ ३३॥
उवाच वचनं वीरो रावणो रजनीचरः।
सीता शोक से अस्वस्थ-सी हो रही थीं, चिन्ता से उनकी कान्ति नष्ट-सी हो गयी थी और वे भगवान राम का ध्यान करने लगी थीं। उस अवस्था में उनसे वह वीर निशाचर रावण इस प्रकार बोला— ॥ ३३ १/२॥
अलं व्रीडेन वैदेहि धर्मलोपकृतेन ते॥३४॥
आर्षोऽयं देवि निष्पन्दो यस्त्वामभिभविष्यति।
‘विदेहनन्दिनि ! अपने पति के त्याग और परपुरुष के अङ्गीकार से जो धर्मलोप की आशङ्का होती है, उसके कारण तुम्हें यहाँ लज्जा नहीं होनी चाहिये, इस तरहकी लाज व्यर्थ है। देवि! तुम्हारे साथ जो मेरा स्नेह सम्बन्ध होगा, यह आर्ष धर्मशास्त्रोंद् वारा* समर्थित है॥ ३४ १/२॥
* ऐसा कहकर रावण देवी सीता को धोखा देना चाहता है। वास्तव में ऐसे पापपूर्ण कृत्यों का समर्थन धर्मशास्त्रों में कहीं नहीं है। कमारी कन्या का बलपर्वक अपहरण शास्त्रों में राक्षसविवाह कहा गया है; किंतु वह भी निन्द्य ही माना गया है, यहाँ तो वह भी नहीं है। विवाहिता सती साध्वी का अपहरण घोर पाप माना गया है। इसी पाप से सोने की लङ्का मिट्टी में मिल गयी और रावण दल-बल-कुल-परिवारसहित नष्ट हो गया।
एतौ पादौ मया स्निग्धौ शिरोभिः परिपीडितौ॥ ३५॥
प्रसादं कुरु मे क्षिप्रं वश्यो दासोऽहमस्मि ते।
‘तुम्हारे इन कोमल एवं चिकने चरणों पर मैं अपने ये दसों मस्तक रख रहा हूँ। अब शीघ्र मुझपर कृपा करो। मैं सदा तुम्हारे अधीन रहनेवाला दास हूँ॥ ३५ १/२॥
इमाः शून्या मया वाचः शुष्यमाणेन भाषिताः॥३६॥
न चापि रावणः कांचिन्मूर्ना स्त्री प्रणमेत ह।
‘मैंने कामाग्नि से संतप्त होकर ये बातें कही हैं। ये शून्य (निष्फल) न हों, ऐसी कृपा करो; क्योंकि रावण किसी स्त्री को सिर झुकाकर प्रणाम नहीं करता, (केवल) तुम्हारे सामने इसका मस्तक झुका है’॥ ३६ १/२॥
एवमुक्त्वा दशग्रीवो मैथिली जनकात्मजाम्।
कृतान्तवशमापन्नो ममेयमिति मन्यते॥ ३७॥
मिथिलेशकुमारी जानकी से ऐसा कहकर काल के वशीभूत हुआ रावण मन-ही-मन मानने लगा कि ‘यह अब मेरे अधीन हो गयी’ ॥ ३७॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे पञ्चपञ्चाशः सर्गः॥५५॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अरण्यकाण्ड में पचपनवाँ सर्ग पूरा हुआ।५५॥
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