॥ श्री गणेशाय नमः ॥
॥ श्री कमलापति नम: ॥
॥ श्री जानकीवल्लभो विजयते ॥
॥ श्री वाल्मीकि रामायण ॥
(भावार्थ सहित)
सब एक ही स्थान पर
अरण्यकाण्ड सर्ग- ४५-५५
अरण्यकाण्डम्
पञ्चचत्वारिंशः सर्गः (सर्ग 45)
( सीता के मार्मिक वचनों से प्रेरित होकर लक्ष्मण का श्रीराम के पास जाना )
श्लोक:
आर्तस्वरं तु तं भर्तुर्विज्ञाय सदृशं वने।
उवाच लक्ष्मणं सीता गच्छ जानीहि राघवम्॥१॥
भावार्थ :-
उस समय वन में जो आर्तनाद हुआ, उसे अपने पति के स्वर से मिलता-जुलता जान श्रीसीताजी लक्ष्मण से बोलीं- ’भैया! जाओ, श्रीरघुनाथजी की सुधि लो- उनका समाचार जानो॥१॥
श्लोक:
नहि मे जीवितं स्थाने हृदयं वावतिष्ठते।
क्रोशतः परमार्तस्य श्रुतः शब्दो मया भृशम्॥२॥
भावार्थ :-
‘उन्होंने बड़े आर्तस्वर से हमलोगों को पुकारा है। मैंने उनका वह शब्द सुना है। वह बहुत उच्च स्वर से बोला गया था। उसे सुनकर मेरे प्राण और मन अपने स्थान पर नहीं रह गये हैं- मैं घबरा उठी हूँ॥२॥
श्लोक:
आक्रन्दमानं तु वने भ्रातरं त्रातुमर्हसि।
तंक्षिप्रमभिधाव त्वं भ्रातरं शरणैषिणम्॥३॥
रक्षसां वशमापन्नं सिंहानामिव गोवृषम्।
न जगाम तथोक्तस्तु भ्रातुराज्ञाय शासनम्॥४॥
भावार्थ :-
‘तुम्हारे भाई वन में आर्तनाद कर रहे हैं। वे कोई शरण-रक्षा का सहारा चाहते हैं। तुम उन्हें बचाओ। ङ्के जल्दी ही अपने भाई के पास दौड़े हुए जाओ। जैसे कोई साँड सिंहों के पंजे में फँस गया हो, उसी प्रकार वे राक्षसों के वश में पड़ गये हैं, अतः जाओ।’ सीताके ऐसा कहने पर भी भाई के आदेश का विचार करके लक्ष्मण नहीं गये॥३-४॥
श्लोक:
तमुवाच ततस्तत्र क्षुभिता जनकात्मजा।
सौमित्रे मित्ररूपेण भ्रातुस्त्वमसि शत्रुवत्॥५॥
यस्त्वमस्यामवस्थायां भ्रातरं नाभिपद्यसे।
इच्छसि त्वं विनश्यन्तं रामं लक्ष्मण मत्कृते॥६॥
भावार्थ :-
उनके इस व्यवहार से वहाँ जनककिशोरी सीता क्षुब्ध हो उठीं और उनसे इस प्रकार बोलीं- ’सुमित्राकुमार! तुम मित्र रूप में अपने भाई के शत्रु ही जान पड़ते हो, इसीलिये तुम इस संकट की अवस्था में भी भाई के पास नहीं पहुंच रहे हो। लक्ष्मण! मैं जानती हूँ, तुम मुझ पर अधिकार करने के लिये इस समय श्रीराम का विनाश ही चाहते हो॥५-६॥
वाल्मीकि रामायण- अरण्यकाण्ड सर्ग- ४६
अरण्यकाण्डम्
षट्चत्वारिंशः सर्गः (सर्ग 46)
( रावण का साधुवेष में सीता के पास जाकर उनका परिचय पूछना और सीता का आतिथ्य के लिये उसे आमन्त्रित करना )
श्लोक:
तया परुषमुक्तस्तु कुपितो राघवानुजः।
स विकांक्षन भृशं रामं प्रतस्थे नचिरादिव॥१॥
भावार्थ :-
सीता के कठोर वचन कहने पर कुपित हुए लक्ष्मण श्रीराम से मिलने की विशेष इच्छा रखकर शीघ्र ही वहाँ से चल दिये॥१॥
श्लोक:
तदासाद्य दशग्रीवः क्षिप्रमन्तरमास्थितः।
अभिचक्राम वैदेही परिव्राजकरूपधृक्॥२॥
भावार्थ :-
लक्ष्मण के चले जाने पर रावण को मौका मिल गया, अतः वह संन्यासी का वेष धारण करके शीघ्र ही विदेहकुमारी सीता के समीप गया॥२॥
श्लोक:
श्लक्ष्णकाषायसंवीतः शिखी छत्री उपानही।
वामे चांसेऽवसज्याथ शुभे यष्टिकमण्डलू॥३॥
भावार्थ :-
वह शरीर पर साफ-सुथरा गेरुए रंग का वस्त्र लपेटे हुए था। उसके मस्तक पर शिखा, हाथ में छाता और पैरों में जूते थे। उसने बायें कंधे पर डंडा रखकर उसमें कमण्डलु लटका रखा था॥३॥
श्लोक:
परिव्राजकरूपेण वैदेहीमन्ववर्तत।
तामाससादातिबलो भ्रातृभ्यां रहितां वने॥४॥
भावार्थ :-
अत्यन्त बलवान् रावण उस वन में परिव्राजक का रूप धारण करके श्रीराम और लक्ष्मण दोनों बन्धुओं से रहित हुई अकेली विदेहकुमारी सीता के पास गया॥४॥
वाल्मीकि रामायण- अरण्यकाण्ड सर्ग- ४७
अरण्यकाण्डम्
सप्तचत्वारिंशः सर्गः (सर्ग 47)
( सीता का रावण को अपना और पति का परिचय देकर वन में आने का कारण बताना, रावण का उन्हें अपनी पटरानी बनाने की इच्छा प्रकट करना और सीता का उसे फटकारना )
श्लोक:
रावणेन तु वैदेही तदा पृष्टा जिहीर्षुणा।
परिव्राजकरूपेण शशंसात्मानमात्मना॥१॥
भावार्थ :-
सीता को हरने की इच्छा से परिव्राजक (संन्यासी)का रूप धारण करके आये हुए रावण ने उस समय जब विदेहराजकुमारी से इस प्रकार पूछा, तब उन्होंने स्वयं ही अपना परिचय दिया॥१॥
श्लोक:
ब्राह्मणश्चातिथिश्चैष अनुक्तो हि शपेत माम्।
इति ध्यात्वा मुहूर्तं तु सीता वचनमब्रवीत्॥२॥
भावार्थ :-
वे दो घड़ी तक इस विचार में पड़ी रहीं कि ये ब्राह्मण और अतिथि हैं, यदि इनकी बात का उत्तर न दिया जाय तो ये मुझे शाप दे देंगे। यह सोचकर सीता ने इस प्रकार कहना आरम्भ किया-॥२॥
श्लोक:
दुहिता जनकस्याहं मैथिलस्य महात्मनः।
सीता नाम्नास्मि भद्रं ते रामस्य महिषी प्रिया॥३॥
भावार्थ :-
‘ब्रह्मन्! आपका भला हो। मैं मिथिलानरेश महात्मा जनक की पुत्री और अवधनरेश श्रीरामचन्द्रजी की प्यारी रानी हूँ। मेरा नाम सीता है॥३॥
श्लोक:
उषित्वा द्वादश समा इक्ष्वाकूणां निवेशने।
भुजाना मानुषान् भोगान् सर्वकामसमृद्धिनी॥४॥
भावार्थ :-
‘विवाह के बाद बारह वर्षों तक इक्ष्वाकुवंशी महाराज दशरथ के महल में रहकर मैंने अपने पति के साथ सभी मानवोचित भोग भोगे हैं। मैं वहाँ सदा मनोवाञ्छित सुख-सुविधाओं से सम्पन्न रही हूँ॥४॥
वाल्मीकि रामायण- अरण्यकाण्ड सर्ग- ४८
अरण्यकाण्डम्
अष्टचत्वारिंशः सर्गः (सर्ग 48)
( रावण के द्वारा अपने पराक्रम का वर्णन और सीता द्वारा उसको कड़ी फटकार )
श्लोक:
एवं ब्रुवत्यां सीतायां संरब्धः परुषं वचः।
ललाटे भ्रकुटिं कृत्वा रावणः प्रत्युवाच ह॥१॥
भावार्थ :-
सीता के ऐसा कहने पर रावण रोष में भर गया और ललाट में भौहें टेढ़ी करके वह कठोर वाणी में बोला–॥१॥
श्लोक:
भ्राता वैश्रवणस्याहं सापत्नो वरवर्णिनि।
रावणो नाम भद्रं ते दशग्रीवः प्रतापवान्॥२॥
भावार्थ :-
‘सुन्दरि! मैं कुबेर का सौतेला भाई परम प्रतापी दशग्रीव रावण हूँ। तुम्हारा भला हो॥२॥
श्लोक:
यस्य देवाः सगन्धर्वाः पिशाचपतगोरगाः।
विद्रवन्ति सदा भीता मृत्योरिव सदा प्रजाः॥३॥
येन वैश्रवणो भ्राता वैमात्राः कारणान्तरे।
द्वन्द्वमासादितः क्रोधाद् रणे विक्रम्य निर्जितः॥४॥
भावार्थ :-
‘जैसे प्रजा मौत के भय से सदा डरती रहती है, उसी प्रकार देवता, गन्धर्व, पिशाच, पक्षी और नाग सदा जिससे भयभीत होकर भागते हैं, जिसने किसी कारणवश अपने सौतेले भाई कुबेर के साथ द्वन्द्वयुद्ध किया और क्रोधपूर्वक पराक्रम करके रणभूमि में उन्हें परास्त कर दिया था, वही रावण मैं हूँ॥३-४॥
श्लोक:
मद्भयार्तः परित्यज्य स्वमधिष्ठानमृद्धिमत्।
कैलास पर्वतश्रेष्ठमध्यास्ते नरवाहनः॥५॥
भावार्थ :-
‘मेरे ही भय से पीड़ित हो नरवाहन कुबेर ने अपनी समृद्धिशालिनी पुरी लङ्का का परित्याग करके इस समय पर्वतश्रेष्ठ कैलास की शरण ली है॥५॥
वाल्मीकि रामायण- अरण्यकाण्ड सर्ग- ४९
अरण्यकाण्डम्
एकोनपञ्चाशः सर्गः (सर्ग 49)
( रावण द्वारा सीता का अपहरण, सीता का विलाप और उनके द्वारा जटायु का दर्शन )
श्लोक:
सीताया वचनं श्रुत्वा दशग्रीवः प्रतापवान्।
हस्ते हस्तं समाहत्य चकार सुमहद् वपुः॥१॥
भावार्थ :-
सीता के इस वचन को सुनकर प्रतापी दशमुखरावण ने अपने हाथ पर हाथ मारकर शरीर को बहुत बड़ा बना लिया॥१॥
श्लोक:
स मैथिली पुनर्वाक्यं बभाषे वाक्यकोविदः।
नोन्मत्तया श्रुतौ मन्ये मम वीर्यपराक्रमौ॥२॥
भावार्थ :-
वह बातचीत करने की कला जानता था। उसने मिथिलेशकुमारी सीता से फिर इस प्रकार कहना आरम्भ किया—’मेरी समझ में तुम पागल हो गयी हो, इसीलिये तुमने मेरे बल और पराक्रम की बातें अनसुनी कर दी हैं॥२॥
श्लोक:
उदहेयं भुजाभ्यां तु मेदिनीमम्बरे स्थितः।
आपिबेयं समुद्रं च मृत्युं हन्यां रणे स्थितः॥३॥
भावार्थ :-
‘अरी! मैं आकाश में खड़ा हो इन दोनों भुजाओं से ही सारी पृथ्वी को उठा ले जा सकता हूँ। समुद्र को पी सकता हूँ और युद्ध में स्थित हो मौत को भी मार सकता हूँ॥३॥
श्लोक:
अर्कं तुद्यां शरैस्तीक्ष्णैर्विभिन्द्यां हि महीतलम्।
कामरूपेण उन्मत्ते पश्य मां कामरूपिणम्॥४॥
भावार्थ :-
‘काम तथा रूप से उन्मत्त रहने वाली नारी! यदि चाहूँ तो अपने तीखे बाणों से सूर्य को भी व्यथित कर दूँ और इस भूतल को भी विदीर्ण कर डालूँ। मैं इच्छानुसार रूप धारण करने में समर्थ हूँ तुम मेरी ओर देखो’॥४॥
वाल्मीकि रामायण- अरण्यकाण्ड सर्ग- ५०
अरण्यकाण्डम्
पञ्चाशः सर्गः (सर्ग 50)
( जटायु का रावण को सीताहरण के दुष्कर्म से निवृत्त होने के लिये समझाना और अन्त में युद्ध के लिये ललकारना )
श्लोक:
तं शब्दमवसुप्तस्तु जटायुरथ शुश्रुवे।
निरैक्षद् रावणं क्षिप्रं वैदेहीं च ददर्श सः॥१॥
भावार्थ :-
जटायु उस समय सो रहे थे। उसी अवस्था में उन्होंने सीता की वह करुण पुकार सुनी। सुनते ही तुरंत आँख खोलकर उन्होंने विदेहनन्दिनी सीता तथा रावण को देखा॥१॥
श्लोक:
ततः पर्वतशृङ्गाभस्तीक्ष्णतुण्डः खगोत्तमः।
वनस्पतिगतः श्रीमान् व्याजहार शुभां गिरम्॥२॥
भावार्थ :-
पक्षियों में श्रेष्ठ श्रीमान् जटायु का शरीर पर्वतशिखर के समान ऊँचा था और उनकी चोंच बड़ी ही तीखी थी। वे पेड़ पर बैठे-ही-बैठे रावण को लक्ष्य करके यह शुभ वचन बोले-॥२॥
श्लोक:
दशग्रीव स्थितो धर्मे पुराणे सत्यसंश्रयः।
भ्रातस्त्वं निन्दितं कर्म कर्तुं नार्हसि साम्प्रतम्॥३॥
जटायुर्नाम नाम्नाहं गृध्रराजो महाबलः।
भावार्थ :-
‘दशमुख रावण! मैं प्राचीन (सनातन) धर्म में स्थित, सत्यप्रतिज्ञ और महाबलवान् गृध्रराज हूँ। मेरा नाम जटायु है। भैया! इस समय मेरे सामने तुम्हें ऐसा निन्दित कर्म नहीं करना चाहिये॥३ १/२॥
श्लोक:
राजा सर्वस्य लोकस्य महेन्द्रवरुणोपमः॥४॥
लोकानां च हिते युक्तो रामो दशरथात्मजः।
भावार्थ :-
‘दशरथनन्दन श्रीरामचन्द्रजी सम्पूर्ण जगत् के स्वामी, इन्द्र और वरुण के समान पराक्रमी तथा सब लोगों के हित में संलग्न रहने वाले हैं॥४ १/२॥
वाल्मीकि रामायण- अरण्यकाण्ड सर्ग- ५१
अरण्यकाण्डम्
एकपञ्चाशः सर्गः (सर्ग 51)
( जटायु तथा रावण का घोर युद्ध और रावण के द्वारा जटायु का वध )
श्लोक:
इत्युक्तः क्रोधताम्राक्षस्तप्तकाञ्चनकुण्डलः।
राक्षसेन्द्रोऽभिदुद्राव पतगेन्द्रममर्षणः॥१॥
भावार्थ :-
जटायु के ऐसा कहने पर राक्षसराज रावण क्रोध से आँखें लाल किये अमर्ष में भरकर उन पक्षिराज की ओर दौड़ा। उस समय उसके कानों में तपाये हुए सोने के कुण्डल झलमला रहे थे॥१॥
श्लोक:
स सम्प्रहारस्तुमुलस्तयोस्तस्मिन् महामृधे।
बभूव वातो तयोर्मेघयोर्गगने यथा॥२॥
भावार्थ :-
उस महासमर में उन दोनों का एक-दूसरे पर भयंकर प्रहार होने लगा, मानो आकाश में वायु से उड़ाये गये दो मेघखण्ड आपस में टकरा गये हों॥२॥
श्लोक:
तद् बभूवाद्भुतं युद्धं गृध्रराक्षसयोस्तदा।
सपक्षयोर्माल्यवतोर्महापर्वतयोरिव॥३॥
भावार्थ :-
उस समय गृध्र और राक्षस में वह बड़ा अद्भुत युद्ध होने लगा, मानो दो पंखधारी माल्यवान् * पर्वत एक दूसरे से भिड़ गये हों॥३॥
* माल्यवान् पर्वत दो माने गये हैं, एक तो दण्डकारण्य में किष्किन्धा के समीप है और दूसरा मेरुपर्वत के निकट बताया गया है। ये दोनों पर्वत परस्पर इतने दूर हैं कि इनमें संघर्ष की कोई सम्भावना नहीं हो सकती। इसलिये ‘सपक्ष’ (पंखधारी) विशेषण दिया गया है। पाँखवाले पर्वत कदाचित् उड़कर एक-दूसरे के समीप पहुँच सकते हैं।
श्लोक:
ततो नालीकनाराचैस्तीक्ष्णाग्रैश्च विकर्णिभिः ।
अभ्यवर्षन्महाघोरैर्गृध्रराजं महाबलम्॥४॥
भावार्थ :-
रावण ने महाबली गृध्रराज जटायुपर नालीक, नाराच तथा तीखे अग्रभागवाले विकर्णी नामक महाभयंकर अस्त्रों की वर्षा आरम्भ कर दी॥४॥
वाल्मीकि रामायण- अरण्यकाण्ड सर्ग- ५२
अरण्यकाण्डम्
द्विपञ्चाशः सर्गः (सर्ग 52)
( रावण द्वारा सीता का अपहरण )
श्लोक:
सा तु ताराधिपमुखी रावणेन निरीक्ष्य तम्।
गृध्रराजं विनिहतं विललाप सुदुःखिता॥१॥
भावार्थ :-
रावण के द्वारा मारे गये गृध्रराज की ओर देखकर चन्द्रमुखी सीता अत्यन्त दुःखी होकर विलाप करने लगीं-॥१॥
श्लोक:
निमित्तं लक्षणं स्वप्नं शकुनिस्वरदर्शनम्।
अवश्यं सुखदुःखेषु नराणां परिदृश्यते॥२॥
भावार्थ :-
‘मनुष्यों को सुख-दुःख की प्राप्ति के सूचक लक्षण, स्वप्न, पक्षियों के स्वर तथा उनके दायें-बायें दर्शन आदि शुभाशुभ निमित्त अवश्य दिखायी देते हैं॥२॥
श्लोक:
न नूनं राम जानासि महद्व्यसनमात्मनः।।
धावन्ति नूनं काकुत्स्थ मदर्थं मृगपक्षिणः॥३॥
भावार्थ :-
‘ककुत्स्थकुलभूषण श्रीराम! मेरे अपहरण की सूचना देने के लिये निश्चय ही ये मृग और पक्षी अशुभसूचक मार्ग से दौड़ रहे हैं, परंतु उनके द्वारा सूचित होने पर भी अपने इस महान् संकट को अवश्य ही आप नहीं जानते हैं (क्योंकि जानने पर आप इसकी उपेक्षा नहीं कर सकते थे)॥३॥
श्लोक:
अयं हि कृपया राम मां त्रातुमिह संगतः।
शेते विनिहतो भूमौ ममाभाग्याद् विहंगमः॥४॥
भावार्थ :-
‘हा राम! मेरा कैसा अभाग्य है कि जो कृपा करके मुझे बचाने के लिये यहाँ आये थे, वे पक्षिप्रवर जटायु इस निशाचर द्वारा मारे जाकर पृथ्वी पर पड़े हैं॥४॥
वाल्मीकि रामायण- अरण्यकाण्ड सर्ग- ५३
अरण्यकाण्डम्
त्रिपञ्चाशः सर्गः (सर्ग 53)
( सीता का रावण को धिक्कारना )
श्लोक:
खमुत्पतन्तं तं दृष्ट्वा मैथिली जनकात्मजा।
दुःखिता परमोद्विग्ना भये महति वर्तिनी॥१॥
भावार्थ :-
रावण को आकाश में उड़ते देख मिथिलेशकुमारी जानकी दुःखमग्न हो अत्यन्त उद्विग्न हो रही थीं। वे बहुत बड़े भय में पड़ गयी थीं॥१॥
श्लोक:
रोषरोदनताम्राक्षी भीमाक्षं राक्षसाधिपम्।
रुदती करुणं सीता ह्रियमाणा तमब्रवीत्॥२॥
भावार्थ :-
रोष और रोदन के कारण उनकी आँखें लाल हो गयी थीं। हरी जाती हुई सीता करुणाजनक स्वर में रोती हुई उस भयंकर नेत्रवाले राक्षसराज से इस प्रकार बोलीं॥२॥
श्लोक:
न व्यपत्रपसे नीच कर्मणानेन रावण।
ज्ञात्वा विरहितां यो मां चोरयित्वा पलायसे॥३॥
भावार्थ :-
‘ओ नीच रावण! क्या तुझे अपने इस कुकर्म से लज्जा नहीं आती है, जो मुझे स्वामी से रहित अकेली और असहाय जानकर चुराये लिये भागा जाता है?॥३॥
श्लोक:
त्वयैव नूनं दुष्टात्मन् भीरुणा हर्तुमिच्छता।
ममापवाहितो भर्ता मृगरूपेण मायया॥४॥
भावार्थ :-
‘दुष्टात्मन्! तू बड़ा कायर और डरपोक है। निश्चय ही मुझे हर ले जाने की इच्छा से तूने ही माया द्वारा मृगरूप में उपस्थित हो मेरे स्वामी को आश्रम से दूर हटा दिया था॥४॥
वाल्मीकि रामायण- अरण्यकाण्ड सर्ग- ५४
अरण्यकाण्डम्
चतुष्पञ्चाशः सर्गः (सर्ग 54)
( सीता का पाँच वानरों के बीच अपने भूषण और वस्त्र को गिराना, रावण का सीता को अन्तःपुर में रखना )
श्लोक:
ह्रियमाणा तु वैदेही कंचिन्नाथमपश्यती।
ददर्श गिरिशृङ्गस्थान् पञ्च वानरपुङ्गवान्॥१॥
भावार्थ :-
रावण के द्वारा हरी जाती हुई विदेहनन्दिनी सीता को उस समय कोई भी अपना सहायक नहीं दिखायी देता था। मार्ग में उन्होंने एक पर्वत के शिखर पर पाँच श्रेष्ठ वानरों को बैठे देखा॥१॥
श्लोक:
तेषां मध्ये विशालाक्षी कौशेयं कनकप्रभम्।
उत्तरीयं वरारोहा शुभान्याभरणानि च॥२॥
मुमोच यदि रामाय शंसेयुरिति भामिनी।
वस्त्रमुत्सृज्य तन्मध्ये निक्षिप्तं सहभूषणम्॥३॥
भावार्थ :-
तब सुन्दर अङ्गोंवाली विशाललोचना भामिनी सीता ने यह सोचकर कि शायद ये भगवान् श्रीराम को कुछ समाचार कह सकें, अपने सुनहरे रंग की रेशमी चादर उतारी और उसमें वस्त्र और आभूषण रखकर उसे उनके बीच में फेंक दिया॥२-३॥
श्लोक:
सम्भ्रमात् तु दशग्रीवस्तत्कर्म च न बुद्धवान्।
पिङ्गाक्षास्तां विशालाक्षी नेत्रैरनिमिषैरिव॥४॥
विक्रोशन्तीं तदा सीतां ददृशुर्वानरोत्तमाः।
भावार्थ :-
रावण बड़ी घबराहट में था, इसलिये सीता के इस कार्य को वह न जान सका। वे भूरी आँखों वाले श्रेष्ठ वानर उस समय उच्च स्वर से विलाप करती हुई विशाल-लोचना सीता की ओर एकटक नेत्रों से देखने लगे॥४ १/२॥
श्लोक:
स च पम्पामतिक्रम्य लङ्कामभिमुखः पुरीम्॥५॥
जगाम मैथिलीं गृह्य रुदतीं राक्षसेश्वरः।
भावार्थ :-
राक्षसराज रावण पम्पासरोवर को लाँघकर रोती हुई मैथिली सीता को साथ लिये लङ्कापुरी की ओर चल दिया॥५ १/२॥
वाल्मीकि रामायण- अरण्यकाण्ड सर्ग- ५५
अरण्यकाण्डम्
पञ्चपञ्चाशः सर्गः (सर्ग 55)
( रावण का सीता को अपने अन्तःपुर का दर्शन कराना और अपनी भार्या बन जाने के लिये समझाना )
श्लोक:
संदिश्य राक्षसान् घोरान् रावणोऽष्टौ महाबलान्।
आत्मानं बुद्धिवैक्लव्यात् कृत्कृत्यममन्यत॥१॥
भावार्थ :-
इस प्रकार आठ महाबली भयंकर राक्षसों को जनस्थान में जाने की आज्ञा दे रावण ने विपरीत बुद्धि के कारण अपने को कृतकृत्य माना॥१॥
श्लोक:
स चिन्तयानो वैदेहीं कामबाणैः प्रपीडितः।
प्रविवेश गृहं रम्यं सीतां द्रष्टमभित्वरन्॥२॥
भावार्थ :-
वह विदेहकुमारी सीता का स्मरण करके कामबाणों से अत्यन्त पीड़ित हो रहा था; अतः उन्हें देखने के लिये उसने बड़ी उतावली के साथ अपने रमणीय अन्तःपुर में प्रवेश किया॥२॥
श्लोक:
स प्रविश्य तु तद्देश्म रावणो राक्षसाधिपः।
अपश्यद् राक्षसीमध्ये सीतां दुःखपरायणाम्॥३॥
अश्रुपूर्णमुखीं दीनां शोकभारावपीडिताम्।
वायुवेगैरिवाक्रान्तां मज्जन्तीं नावमर्णवे॥४॥
मृगयूथपरिभ्रष्टां मृगी श्वभिरिवावृताम्।
भावार्थ :-
उस भवन में प्रवेश करके राक्षसों के राजा रावण ने देखा कि सीता राक्षसियों के बीच में बैठकर दुःख में डूबी हुई हैं। उनके मुख पर आँसुओं की धारा बह रही है और वे शोक के दुस्सह भार से अत्यन्त पीड़ित एवं दीन हो वायु के वेग से आक्रान्त हो समुद्र में डूबती हुई नौका के समान जान पड़ती हैं। मृगों के यूथ से बिछुड़कर कुत्तों से घिरी हुई अकेली हरिणी के समान दिखायी देती हैं॥३-४ १/२॥
श्लोक:
अधोगतमुखीं सीतां तामभ्येत्य निशाचरः॥५॥
तां तु शोकवशाद् दीनामवशां राक्षसाधिपः।
सबलाद् दर्शयामास गृहं देवगृहोपमम्॥६॥
भावार्थ :-
शोकवश दीन और विवश हो नीचे मुँह किये बैठी हुई सीता के पास पहुँचकर राक्षसों के राजा निशाचर रावण ने उन्हें जबर्दस्ती अपने देवगृह के समान सुन्दर भवन का दर्शन कराया॥५-६॥











