॥ श्री गणेशाय नमः ॥
॥ श्री कमलापति नम: ॥
॥ श्री जानकीवल्लभो विजयते ॥
॥ श्री वाल्मीकि रामायण ॥
(भावार्थ सहित)
सब एक ही स्थान पर
अरण्यकाण्ड सर्ग- २३-३३
अरण्यकाण्डम्
त्रयोविंशः सर्गः (सर्ग 23)
( भयंकर उत्पातों को देखकर भी खर का उनकी परवा नहीं करना तथा राक्षस सेना का श्रीराम के आश्रम के समीप पहुँचना )
श्लोक:
तत्प्रयातं बलं घोरमशिवं शोणितोदकम्।
अभ्यवर्षन्महाघोरस्तुमलो गर्दभारुणः॥१॥
भावार्थ :-
उस सेना के प्रस्थान करते समय आकाश में गधे के समान धूसर रंग वाले बादलों की महाभयंकर घटा घिरआयी। उसकी तुमुल गर्जना होने लगी तथा सैनिकों के ऊपर घोर अमङ्गल सूचक रक्तमय जल की वर्षा आरम्भ हो गयी॥१॥
श्लोक:
निपेतुस्तुरगास्तस्य रथयुक्ता महाजवाः।
समे पुष्पचिते देशे राजमार्गे यदृच्छया॥२॥
भावार्थ :-
खर के रथ में जुते हुए महान् वेगशाली घोड़े फूल बिछे हुए समतल स्थान में सड़क पर चलते-चलते अकस्मात् गिर पड़े॥२॥
श्लोक:
श्यामं रुधिरपर्यन्तं बभूव परिवेषणम्।
अलातचक्रप्रतिमं प्रतिगृह्य दिवाकरम्॥३॥
भावार्थ :-
सूर्यमण्डल के चारों ओर अलात चक्र के समान गोलाकार घेरा दिखायी देने लगा, जिसका रंग काला और किनारे का रंग लाल था॥३॥
श्लोक:
ततो ध्वजमुपागम्य हेमदण्डं समुच्छ्रितम्।
समाक्रम्य महाकायस्तस्थौ गृध्रः सुदारुणः॥४॥
भावार्थ :-
तदनन्तर खर के रथ की सुवर्णमय दण्डवाली ऊँची ध्वजा पर एक विशालकाय गीध आकर बैठ गया, जो देखने में बड़ा ही भयंकर था॥४॥
वाल्मीकि रामायण- अरण्यकाण्ड सर्ग- २४
अरण्यकाण्डम्
चतुर्विंशः सर्गः (सर्ग 24)
( श्रीराम का तात्कालिक शकुनों द्वारा राक्षसों के विनाश और अपनी विजय की सम्भावना करके सीतासहित लक्ष्मण को पर्वत की गुफा में भेजना और युद्ध के लिये उद्यत होना )
श्लोक:
आश्रमं प्रतियाते तु खरे खरपराक्रमे।
तानेवौत्पातिकान् रामः सह भ्रात्रा ददर्श ह॥१॥
भावार्थ :-
प्रचण्ड पराक्रमी खर जब श्रीराम के आश्रम की ओर चला, तब भाईसहित श्रीराम ने भी उन्हीं उत्पातसूचक लक्षणों को देखा॥१॥
श्लोक:
तानुत्पातान् महाघोरान् रामो दृष्ट्वात्यमर्षणः।
प्रजानामहितान् दृष्ट्वा वाक्यं लक्ष्मणमब्रवीत्॥२॥
भावार्थ :-
प्रजा के अहित की सूचना देने वाले उन महाभयंकर उत्पातों को देखकर श्रीरामचन्द्रजी राक्षसों के उपद्रव का विचार करके अत्यन्त अमर्ष में भर गये और लक्ष्मण से इस प्रकार बोले-॥२॥
श्लोक:
इमान् पश्य महाबाहो सर्वभूतापहारिणः।
समुत्थितान् महोत्पातान् संहर्तुं सर्वराक्षसान्॥३॥
भावार्थ :-
‘महाबाहो! ये जो बड़े-बड़े उत्पात प्रकट हो रहे हैं, इनकी ओर दृष्टिपात करो। समस्त भूतों के संहार की सूचना देने वाले ये महान् उत्पात इस समय इन सारे राक्षसों का संहार करने के लिये उत्पन्न हुए हैं॥३॥
श्लोक:
अमी रुधिरधारास्तु विसृजन्ते खरस्वनाः।
व्योम्नि मेघा निवर्तन्ते परुषा गर्दभारुणाः॥४॥
भावार्थ :-
‘आकाश में जो गधों के समान धूसर वर्णवाले बादल इधर-उधर विचर रहे हैं, ये प्रचण्ड गर्जना करते हुए खून की धाराएँ बरसा रहे हैं॥४॥
वाल्मीकि रामायण- अरण्यकाण्ड सर्ग- २५
अरण्यकाण्डम्
पञ्चविंशः सर्गः (सर्ग 25)
( राक्षसों का श्रीराम पर आक्रमण और श्रीरामचन्द्रजी के द्वारा राक्षसों का संहार )
श्लोक:
अवष्टब्धधनु रामं क्रुद्धं तं रिपुघातिनम्।
ददर्शाश्रममागम्य खरः सह पुरःसरैः॥१॥
तं दृष्ट्वा सगुणं चापमुद्यम्य खरनिःस्वनम्।
रामस्याभिमुखं सूतं चोद्यतामित्यचोदयत्॥२॥
भावार्थ :-
खर ने अपने अग्रगामी सैनिकों के साथ आश्रम के पास पहुँचकर क्रोध में भरे हुए शत्रुघाती श्रीराम को देखा, जो हाथ में धनुष लिये खड़े थे। उन्हें देखते ही अपने तीव्र टंकार करने वाले प्रत्यञ्चासहित धनुष को उठाकर सूत को आज्ञा दी—’मेरा रथ राम के सामने ले चलो’॥१-२॥
श्लोक:
स खरस्याज्ञया सूतस्तुरगान् समचोदयत्।
यत्र रामो महाबाहुरेको धुन्वन् धनुः स्थितः॥३॥
भावार्थ :-
खर की आज्ञा से सारथि ने घोड़ों को उधर ही बढ़ाया, जहाँ महाबाहु श्रीराम अकेले खड़े होकर अपने धनुष की टंकार कर रहे थे॥३॥
श्लोक:
तं तु निष्पतितं दृष्ट्वा सर्वतो रजनीचराः।
मुञ्चमाना महानादं सचिवाः पर्यवारयन्॥४॥
भावार्थ :-
खर को श्रीराम के समीप पहुँचा देख श्येनगामी आदि उसके निशाचर मन्त्री भी बड़े जोर से सिंहनाद करके उसे चारों ओर से घेरकर खड़े हो गये॥४॥
श्लोक:
स तेषां यातुधानानां मध्ये रथगतः खरः।
बभूव मध्ये ताराणां लोहिताङ्ग इवोदितः॥५॥
भावार्थ :-
उन राक्षसों के बीच में रथ पर बैठा हुआ खर तारों के मध्यभाग में उगे हुए मङ्गल की भाँति शोभा पा रहा था।॥५॥
वाल्मीकि रामायण- अरण्यकाण्ड सर्ग- २६
अरण्यकाण्डम्
षड्विंशः सर्गः (सर्ग 26)
( श्रीराम के द्वारा दूषणसहित चौदह सहस्र राक्षसों का वध )
श्लोक:
दूषणस्तु स्वकं सैन्यं हन्यमानं विलोक्य च।
संदिदेश महाबाहुर्भीमवेगान् दुरासदान्॥१॥
राक्षसान् पञ्चसाहस्रान् समरेष्वनिवर्तिनः।
भावार्थ :-
महाबाहु दूषण ने जब देखा कि मेरी सेना बुरी तरह से मारी जा रही है, तब उसने युद्ध से पीछे पैर न हटाने वाले भयंकर वेगशाली पाँच हजार राक्षसों को, जिन्हें जीतना बड़ा ही कठिन था, आगे बढ़ने की आज्ञा दी॥१ १/२॥
श्लोक:
ते शूलैः पट्टिशैः खड्गैः शिलावधैं मैरपि॥२॥
शरवर्षैरविच्छिन्नं ववर्षुस्तं समन्ततः।
भावार्थ :-
वे श्रीराम पर चारों ओर से शूल, पट्टिश, तलवार, पत्थर, वृक्ष और बाणों की लगातार वर्षा करने लगे॥२ १/२॥
श्लोक:
तद् द्रुमाणां शिलानां च वर्षं प्राणहरं महत्॥३॥
प्रतिजग्राह धर्मात्मा राघवस्तीक्ष्णसायकैः।
भावार्थ :-
यह देख धर्मात्मा श्रीरघुनाथजी ने वृक्षों और शिलाओं की उस प्राणहारिणी महावृष्टि को अपने तीखे सायकों द्वारा रोका॥३ १/२॥
श्लोक:
प्रतिगृह्य च तद् वर्षं निमीलित इवर्षभः॥४॥
रामः क्रोधं परं लेभे वधार्थं सर्वरक्षसाम्।
भावार्थ :-
उस सारी वर्षा को रोककर आँख मूंदे हुए साँड़ की भाँति अविचल भाव से खड़े हुए श्रीराम ने समस्त राक्षसों के वध के लिये महान् क्रोध धारण किया॥४ १/२॥
वाल्मीकि रामायण- अरण्यकाण्ड सर्ग- २७
अरण्यकाण्डम्
सप्तविंशः सर्गः (सर्ग 27)
( त्रिशिरा का वध )
श्लोक:
खरं तु रामाभिमुखं प्रयान्तं वाहिनीपतिः।
राक्षसस्त्रिशिरा नाम संनिपत्येदमब्रवीत्॥१॥
भावार्थ :-
खर को भगवान् श्रीराम के सम्मुख जाते देख सेनापति राक्षस त्रिशिरा तुरंत उसके पास आ पहुँचा और इस प्रकार बोला-॥१॥
श्लोक:
मां नियोजय विक्रान्तं त्वं निवर्तस्व साहसात्।
पश्य रामं महाबाहं संयुगे विनिपातितम्॥२॥
भावार्थ :-
‘राक्षसराज! मुझ पराक्रमी वीर को इस युद्ध में लगाइये और स्वयं इस साहसपूर्ण कार्य से अलग रहिये। देखिये, मैं अभी महाबाहु राम को युद्ध में मार गिराता हूँ॥२॥
श्लोक:
प्रतिजानामि ते सत्यमायुधं चाहमालभे।
यथा रामं वधिष्यामि वधार्ह सर्वरक्षसाम्॥३॥
भावार्थ :-
‘आपके सामने मैं सच्ची प्रतिज्ञा करता हूँ और अपने हथियार छूकर शपथ खाता हूँ कि जो समस्त राक्षसों के लिये वध के योग्य हैं, उन राम का मैं अवश्य वध करूँगा॥३॥
श्लोक:
अहं वास्य रणे मृत्युरेष वा समरे मम।
विनिवर्त्य रणोत्साहं मुहूर्तं प्राश्निको भव॥४॥
भावार्थ :-
‘इस युद्ध में या तो मैं इनकी मृत्यु बनूंगा, या ये ही समराङ्गण में मेरी मृत्यु का कारण होंगे। आप इस समय अपने युद्धविषयक उत्साह को रोककर एक मुहूर्त के लिये जय-पराजय का निर्णय करने वाले साक्षी बन जाइये॥४॥
वाल्मीकि रामायण- अरण्यकाण्ड सर्ग- २८
अरण्यकाण्डम्
अष्टाविंशः सर्गः (सर्ग 28)
( खर के साथ श्रीराम का घोर युद्ध )
श्लोक:
निहतं दूषणं दृष्ट्वा रणे त्रिशिरसा सह।
खरस्याप्यभवत् त्रासो दृष्ट्वा रामस्य विक्रमम्॥१॥
भावार्थ :-
त्रिशिरासहित दूषण को रणभूमि में मारा गया देख श्रीराम के पराक्रमपर दृष्टिपात करके खर को भी बड़ा भय हुआ॥१॥
श्लोक:
स दृष्ट्वा राक्षसं सैन्यमविषह्यं महाबलम्।
हतमेकेन रामेण दूषणस्त्रिशिरा अपि॥२॥
तबलं हतभूयिष्ठं विमनाः प्रेक्ष्य राक्षसः।
आससाद खरो रामं नमुचिर्वासवं यथा॥३॥
भावार्थ :-
एकमात्र श्रीराम ने महान् बलशाली और असह्य राक्षस-सेना का वध कर डाला। दूषण और त्रिशिरा को भी मार गिराया तथा मेरी सेना के अधिकांश (चौदह हजार) प्रमुख वीरों को काल के गाल में भेज दिया यह सब देख और सोचकर राक्षस खर उदास हो गया। उसने श्रीराम पर उसी तरह आक्रमण किया, जैसे नमुचि ने इन्द्र पर किया था॥२-३॥
श्लोक:
विकृष्य बलवच्चापं नाराचान् रक्तभोजनान्।
खरश्चिक्षेप रामाय क्रुद्धानाशीविषानिव॥४॥
भावार्थ :-
खर ने एक प्रबल धनुष को खींचकर श्रीराम के प्रति बहुत-से नाराच चलाये, जो रक्त पीने वाले थे। वे समस्त नाराच रोष में भरे हुए विषधर सर्पो के समान प्रतीत होते थे॥४॥
श्लोक:
ज्यां विधुन्वन् सुबहुशः शिक्षयास्त्राणि दर्शयन्।
चचार समरे मार्गान् शरै रथगतः खरः॥५॥
भावार्थ :-
धनुर्विद्या के अभ्यास से प्रत्यञ्चा को हिलाता और नाना प्रकार के अस्त्रों का प्रदर्शन करता हुआ रथारूढ़ खर समराङ्गण में युद्ध के अनेक पैंतरे दिखाता हुआ विचरने लगा॥५॥
वाल्मीकि रामायण- अरण्यकाण्ड सर्ग- २९
अरण्यकाण्डम्
एकोनत्रिंशः सर्गः (सर्ग 29)
( श्रीराम का खर को फटकारना तथा खर का भी उन्हें कठोर उत्तर देकर उनके ऊपर गदा का प्रहार करना और श्रीराम द्वारा उस गदा का खण्डन )
श्लोक:
खरं तु विरथं रामो गदापाणिमवस्थितम्।
मृदुपूर्वं महातेजाः परुषं वाक्यमब्रवीत्॥१॥
भावार्थ :-
खर को रथहीन होकर गदा हाथ में लिये सामने उपस्थित देख महातेजस्वी भगवान् श्रीराम पहले कोमल और फिर कठोर वाणी में बोले-॥१॥
श्लोक:
गजाश्वरथसम्बाधे बले महति तिष्ठता।
कृतं ते दारुणं कर्म सर्वलोकजुगुप्सितम्॥२॥
उद्वेजनीयो भूतानां नृशंसः पापकर्मकृत् ।
त्रयाणामपि लोकानामीश्वरोऽपि न तिष्ठति॥३॥
कर्म लोकविरुद्धं तु कुर्वाणं क्षणदाचर।
तीक्ष्णं सर्वजनो हन्ति सष दुष्टमिवागतम्॥४॥
भावार्थ :-
‘निशाचर! हाथी, घोड़े और रथों से भरी हुई विशाल सेना के बीच में खड़े रहकर (असंख्य राक्षसों के स्वामित्व का अभिमान लेकर) तूने सदा जो क्रूरतापूर्ण कर्म किया है, उसकी समस्त लोकों द्वारा निन्दा हुई है। जो समस्त प्राणियों को उद्वेग में डालने वाला, क्रूर और पापाचारी है, वह तीनों लोकों का ईश्वर हो तो भी अधिक काल तक टिक नहीं सकता। जो लोकविरोधी कठोर कर्म करने वाला है, उसे सब लोग सामने आये हुए दुष्ट सर्प की भाँति मारते हैं॥२-४॥
श्लोक:
लोभात् पापानि कुर्वाणः कामाद् वा यो न बुध्यते।
हृष्टः पश्यति तस्यान्तं ब्राह्मणी करकादिव॥५॥
भावार्थ :-
‘जो वस्तु प्राप्त नहीं हुई है, उसकी इच्छा को ‘काम’ कहते हैं और प्राप्त हुई वस्तु को अधिक-से अधिक संख्या में पाने की इच्छा का नाम ‘लोभ’ है। जो काम अथवा लोभ से प्रेरित हो पाप करता है और उसके (विनाशकारी) परिणाम को नहीं समझता है, उलटे उस पाप में हर्ष का अनुभव करता है, वह उसी प्रकार अपना विनाशरूप परिणाम देखता है जैसे वर्षा के साथ गिरे हुए ओले को खाकर ब्राह्मणी (रक्तपुच्छिका) नाम वाली कीड़ी अपना विनाश देखती है *॥५॥
* लाल पूँछवाली एक कीड़ी होती है, जो ओला खा लेने पर मर जाती है। वह उसके लिये विष का काम करता है—यह बात लोक में प्रसिद्ध है।
वाल्मीकि रामायण- अरण्यकाण्ड सर्ग- ३०
अरण्यकाण्डम्
त्रिंशः सर्गः (सर्ग 30)
( श्रीराम के व्यङ्ग करने पर खर का उनके ऊपर साल वृक्ष का प्रहार करना, श्रीराम का तेजस्वी बाण से खर को मार गिराना )
श्लोक:
भित्त्वा तु तां गदां बाणै राघवो धर्मवत्सलः।
स्मयमान इदं वाक्यं संरब्धमिदमब्रवीत्॥१॥
भावार्थ :-
धर्म प्रेमी भगवान् श्रीराम ने अपने बाणों द्वारा खर की उस गदा को विदीर्ण करके मुसकराते हुए यह रोषसूचक बात कही—॥१॥
श्लोक:
एतत् ते बलसर्वस्वं दर्शितं राक्षसाधम।
शक्तिहीनतरो मत्तो वृथा त्वमुपगर्जसि॥२॥
भावार्थ :-
‘राक्षसाधम! यही तेरा सारा बल है, जिसे तूने इस गदा के साथ दिखाया है। अब सिद्ध हो गया कि तू मुझसे अत्यन्त शक्तिहीन है व्यर्थ ही अपने बल की डींग हाँक रहा था॥२॥
श्लोक:
एषा बाणविनिर्भिन्ना गदा भूमितलं गता।
अभिधानप्रगल्भस्य तव प्रत्ययघातिनी॥३॥
भावार्थ :-
‘मेरे बाणों से छिन्न-भिन्न होकर तेरी यह गदा पृथ्वी पर पड़ी हुई है। तेरे मन में जो यह विश्वास था कि मैं इस गदा से शत्रु का वध कर डालूँगा, इसका खण्डन तेरी इस गदा ने ही कर दिया। अब यह स्पष्ट हो गया कि तू केवल बातें बनाने में ढीठ है (तुझसे कोई पराक्रम नहीं हो सकता)॥३॥
श्लोक:
यत् त्वयोक्तं विनष्टानामिदमश्रुप्रमार्जनम्।
राक्षसानां करोमीति मिथ्या तदपि ते वचः॥४॥
भावार्थ :-
‘तूने जो यह कहा था कि मैं तुम्हारा वध करके तुम्हारे हाथ से मारे गये राक्षसों का अभी आँसू पोछूगा, तेरी वह बात भी झूठी हो गयी॥४॥
वाल्मीकि रामायण- अरण्यकाण्ड सर्ग- ३१
अरण्यकाण्डम्
एकत्रिंशः सर्गः (सर्ग 31)
( रावण का अकम्पन की सलाह से सीता का अपहरण करने के लिये जाना और मारीच के कहने से लङ्का को लौट आना )
श्लोक:
त्वरमाणस्ततो गत्वा जनस्थानादकम्पनः।
प्रविश्य लङ्कां वेगेन रावणं वाक्यमब्रवीत्॥१॥
भावार्थ :-
तदनन्तर जनस्थान से अकम्पन नामक राक्षस बड़ी उतावली के साथ लङ्का की ओर गया और शीघ्र ही उस पुरी में प्रवेश करके रावण से इस प्रकार बोला–॥१॥
श्लोक:
जनस्थानस्थिता राजन् राक्षसा बहवो हताः।
खरश्च निहतः संख्ये कथंचिदहमागतः॥२॥
भावार्थ :-
‘राजन् ! जनस्थान में जो बहुत-से राक्षस रहते थे, वे मार डाले गये। खर युद्ध में मारा गया। मैं किसी तरह जान बचाकर यहाँ आया हूँ’॥२॥
श्लोक:
एवमुक्तो दशग्रीवः क्रुद्धः संरक्तलोचनः।
अकम्पनमुवाचेदं निर्दहन्निव तेजसा॥३॥
भावार्थ :-
अकम्पन के ऐसा कहते ही दशमुख रावण क्रोध से जल उठा और लाल आँखें करके उससे इस तरह बोला, मानो उसे अपने तेज से जलाकर भस्म कर डालेगा॥३॥
श्लोक:
केन भीमं जनस्थानं हतं मम परासुना।
को हि सर्वेषु लोकेषु गतिं नाधिगमिष्यति॥४॥
भावार्थ :-
वह बोला—’कौन मौत के मुख में जाना चाहता है, जिसने मेरे भयंकर जनस्थान का विनाश किया है? कौन वह दुःसाहसी है, जिसे समस्त लोकों में कहीं भी ठौर-ठिकाना नहीं मिलने वाला है?॥४॥
वाल्मीकि रामायण- अरण्यकाण्ड सर्ग- ३२
अरण्यकाण्डम्
द्वात्रिंशः सर्गः (सर्ग 32)
( शूर्पणखा का लंका में रावण के पास जाना )
श्लोक:
ङ्के ततः शार्पणखा दृष्ट्या सहस्राणि चातुर्दशा ।
हतान्येकेन रामेण रक्षसां भीमकर्मणाम्॥१॥
दूषणं च खरं चैव हतं त्रिशिरसं रणे।
दृष्ट्वा पुनर्महानादान् ननाद जलदोपमा॥२॥
भावार्थ :-
उधर शूर्पणखा ने जब देखा कि श्रीराम ने भयंकर कर्म करने वाले चौदह हजार राक्षसों को अकेले ही मार गिराया तथा युद्ध के मैदान में दूषण, खर और त्रिशिरा को भी मौत के घाट उतार दिया, तब वह शोक के कारण मेघ गर्जना के समान पुनः बड़े जोर-जोर से घोर चीत्कार करने लगी॥१-२॥
श्लोक:
सा दृष्ट्वा कर्म रामस्य कृतमन्यैः सुदुष्करम्।
जगाम परमोद्विग्ना लङ्कां रावणपालिताम्॥३॥
भावार्थ :-
श्रीराम ने वह कर्म कर दिखाया, जो दूसरों के लिये अत्यन्त दुष्कर है; यह अपनी आँखों देखकर वहअत्यन्त उद्विग्न हो उठी और रावण द्वारा सुरक्षित लंकापुरी को गयी॥३॥
श्लोक:
सा ददर्श विमानाग्रे रावणं दीप्ततेजसम्।
उपोपविष्टं सचिवैर्मरुद्भिरिव वासवम्॥४॥
भावार्थ :-
वहाँ पहुँचकर उसने देखा, रावण पुष्पक विमान (या सतमहले मकान) के ऊपरी भाग में बैठा हुआ है। उसका राजोचित तेज उद्दीप्त हो रहा है तथा मरुद्गणों से घिरे हुए इन्द्र की भाँति वह आस-पास बैठे हुए मन्त्रियों से घिरा है॥४॥
श्लोक:
आसीनं सूर्यसंकाशे काञ्चने परमासने।
रुक्मवेदिगतं प्राज्यं ज्वलन्तमिव पावकम्॥५॥
भावार्थ :-
रावण जिस उत्तम सुवर्णमय सिंहासन पर विराजमान था, वह सूर्य के समान जगमगा रहा था। जैसे सोने की ईंटों से बनी हुई वेदी पर स्थापित अग्निदेव घी की अधिक आहुति पाकर प्रज्वलित हो उठे हों, उसी प्रकार उस स्वर्णसिंहासन पर रावण शोभा पा रहा था॥५॥
वाल्मीकि रामायण- अरण्यकाण्ड सर्ग- ३३
अरण्यकाण्डम्
त्रयस्त्रिंशः सर्गः (सर्ग 33)
( शूर्पणखा का रावण को फटकारना )
श्लोक:
ततः शूर्पणखा दीना रावणं लोकरावणम्।
अमात्यमध्ये संक्रुद्धा परुषं वाक्यमब्रवीत्॥१॥
भावार्थ :-
उस समय शूर्पणखा श्रीराम से तिरस्कृत होने के कारण बहुत दुःखी थी। उसने मन्त्रियों के बीच में बैठे हुए समस्त लोकों को रुलाने वाले रावण से अत्यन्त कुपित होकर कठोर वाणी में कहा-॥१॥
श्लोक:
प्रमत्तः कामभोगेषु स्वैरवृत्तो निरङ्कशः।
समुत्पन्नं भयं घोरं बोद्धव्यं नावबुध्यसे॥२॥
भावार्थ :-
‘राक्षसराज! तुम स्वेच्छाचारी और निरङ्कश होकर विषय-भोगों में मतवाले हो रहे हो। तुम्हारे लिये घोरभय उत्पन्न हो गया है। तुम्हें इसकी जानकारी होनी चाहिये थी, किंतु तुम इसके विषय में कुछ नहीं जानते हो॥२॥
श्लोक:
सक्तं ग्राम्येषु भोगेषु कामवृत्तं महीपतिम्।
लुब्धं न बहु मन्यन्ते श्मशानाग्निमिव प्रजाः॥३॥
भावार्थ :-
‘जो राजा निम्न श्रेणी के भोगों में आसक्त हो स्वेच्छाचारी और लोभी हो जाता है, उसे मरघट की आग के समान हेय मानकर प्रजा उसका अधिक आदर नहीं करती है॥३॥
श्लोक:
स्वयं कार्याणि यः काले नानुतिष्ठति पार्थिवः।
स तु वै सह राज्येन तैश्च कार्यैर्विनश्यति॥४॥
भावार्थ :-
‘जो राजा ठीक समय पर स्वयं ही अपने कार्यों का सम्पादन नहीं करता है, वह राज्य और उन कार्यों के साथ ही नष्ट हो जाता है॥४॥
- शीर्ष 10 दृश्य:
- श्री दुर्गा सप्तशती | Shri Durga Saptashati
- श्रीमद्भगवद् गीता I ShriBhagavadGeeta
- श्रीरामचरितमानस भावार्थ सहित- बालकाण्ड- 201-225
- बालकाण्ड | Balkanda
- सुन्दरकाण्ड | Sundarkanda
- श्री सत्यनारायण व्रत कथा संस्कृत में हिन्दी भावार्थ सहित
- लंकाकाण्ड | Lankakanda
- उत्तरकाण्ड | Uttarakhanda
- अरण्यकाण्ड | Aranyakanda
- किष्किन्धाकाण्ड | Kishkindhakanda










