॥ श्री गणेशाय नमः ॥
॥ श्री कमलापति नम: ॥
॥ श्री जानकीवल्लभो विजयते ॥
॥ श्री वाल्मीकि रामायण ॥
(भावार्थ सहित)
सब एक ही स्थान पर
अयोध्याकाण्ड सर्ग- ३१-४५
अयोध्याकाण्डम्
एकत्रिंशः सर्गः (सर्ग 31)
( श्रीराम और लक्ष्मण का संवाद, श्रीराम की आज्ञा से लक्ष्मण का सुहृदों से पूछकर और दिव्य आयुध लाकर वनगमन के लिये तैयार होना )
श्लोक:
एवं श्रुत्वा स संवादं लक्ष्मणः पूर्वमागतः।
बाष्पपर्याकुलमुखः शोकं सोढुमशक्नुवन्॥१॥
भावार्थ :-
जिस समय श्रीराम और सीता में बातचीत हो रही थी, लक्ष्मण वहाँ पहले से ही आ गये थे। उन दोनों का ऐसा संवाद सुनकर उनका मुखमण्डल आँसुओं से भींग गया। भाई के विरह का शोक अब उनके लिये भी असह्य हो उठा॥१॥
श्लोक:
स भ्रातुश्चरणौ गाढं निपीड्य रघुनन्दनः।
सीतामुवाचातियशां राघवं च महाव्रतम्॥२॥
भावार्थ :-
रघुकुल को आनन्दित करने वाले लक्ष्मण ने ज्येष्ठ भ्राता श्रीरामचन्द्रजी के दोनों पैर जोर से पकड़ लिये और अत्यन्त यशस्विनी सीता तथा महान् व्रतधारी श्रीरघुनाथजी से कहा-॥२॥
श्लोक:
यदि गन्तुं कृता बुद्धिर्वनं मृगगजायुतम्।
अहं त्वानुगमिष्यामि वनमग्रे धनुर्धरः॥३॥
भावार्थ :-
‘आर्य! यदि आपने सहस्रों वन्य पशुओं तथा हाथियों से भरे हुए वन में जाने का निश्चय कर ही लिया है तो मैं भी आपका अनुसरण करूँगा। धनुष हाथ में लेकर आगे-आगे चलूँगा॥३॥
श्लोक:
मया समेतोऽरण्यानि रम्याणि विचरिष्यसि।
पक्षिभिर्मंगयूथैश्च संघुष्टानि समन्ततः॥४॥
भावार्थ :-
‘आप मेरे साथ पक्षियों के कलरव और भ्रमरसमूहों के गुञ्जारव से गूंजते हुए रमणीय वनों में सब ओर विचरण कीजियेगा॥४॥
वाल्मीकि रामायण- अयोध्याकाण्ड सर्ग- ३२
अयोध्याकाण्डम्
द्वात्रिंशः सर्गः (सर्ग 32)
( लक्ष्मण सहित श्रीराम द्वारा ब्राह्मणों, ब्रह्मचारियों, सेवकों, त्रिजट ब्राह्मण और सुहृज्जनों को धन का वितरण )
श्लोक:
ततः शासनमाज्ञाय भ्रातुः प्रियकरं हितम्।
गत्वा स प्रविवेशाशु सुयज्ञस्य निवेशनम्॥१॥
भावार्थ :-
तदनन्तर अपने भाई श्रीराम की प्रियकारक एवं हितकर आज्ञा पाकर लक्ष्मण वहाँ से चल दिये। उन्होंने शीघ्र ही गुरुपुत्र सुयज्ञ के घर में प्रवेश किया॥१॥
श्लोक:
तं विप्रमग्न्यगारस्थं वन्दित्वा लक्ष्मणोऽब्रवीत्।
सखेऽभ्यागच्छ पश्य त्वं वेश्म दुष्करकारिणः॥२॥
भावार्थ :-
” उस समय विप्रवर सुयज्ञ अग्निशाला में बैठे हए थे। लक्ष्मण ने उन्हें प्रणाम करके कहा—’सखे! दुष्कर कर्म करने वाले श्रीरामचन्द्रजी के घर पर आओ और उनका कार्य देखो’॥२॥
श्लोक:
ततः संध्यामुपास्थाय गत्वा सौमित्रिणा सह।
ऋष्टुं स प्राविशल्लक्ष्या रम्यं रामनिवेशनम्॥३॥
भावार्थ :-
सुयज्ञ ने मध्याह्नकाल की संध्योपासना पूरी करके लक्ष्मण के साथ जाकर श्रीराम के रमणीय भवन में प्रवेश किया, जो लक्ष्मी से सम्पन्न था॥३॥
श्लोक:
तमागतं वेदविदं प्राञ्जलिः सीतया सह।
सुयज्ञमभिचक्राम राघवोऽग्निमिवार्चितम्॥४॥
भावार्थ :-
होमकाल में पूजित अग्नि के समान तेजस्वी वेदवेत्ता सुयज्ञ को आया जान सीतासहित श्रीराम ने हाथ जोड़कर उनकी अगवानी की॥४॥
वाल्मीकि रामायण- अयोध्याकाण्ड सर्ग- ३३
अयोध्याकाण्डम्
त्रयस्त्रिंशः सर्गः (सर्ग 33)
( सीता और लक्ष्मणसहित श्रीराम का दुःखी नगरवासियों के मुख से तरह की बातें सुनते हुए पिता के दर्शन के लिये कैकेयी के महल में जाना )
श्लोक:
दत्त्वा तु सह वैदेह्या ब्राह्मणेभ्यो धनं बहु
जग्मतुः पितरं द्रष्टं सीतया सह राघवौ॥१॥
भावार्थ :-
विदेहकुमारी सीता के साथ श्रीराम और लक्ष्मण ब्राह्मणों को बहुत-सा धन दान करके वन जाने के लिये उद्यत हो पिता का दर्शन करने के लिये गये॥१॥
श्लोक:
ततो गृहीते प्रेष्याभ्यामशोभेतां तदायुधे
मालादामभिरासक्ते सीतया समलंकृते॥२॥
भावार्थ :-
उनके साथ दो सेवक श्रीराम और लक्ष्मण के वे धनुष आदि आयुध लेकर चले, जिन्हें फूल की मालाओं से सजाया गया था और सीताजी ने पूजा के लिये चढ़ाये हुए चन्दन आदि से अलंकृत किया था। उन दोनों के आयुधों की उस समय बड़ी शोभा हो रही थी॥२॥
श्लोक:
ततः प्रासादहाणि विमानशिखराणि च।
अभिरुह्य जनः श्रीमानुदासीनो व्यलोकयत्॥३॥
भावार्थ :-
उस अवसरपर धनी लोग प्रासादों (तिमंजिले महलों), हर्म्यगृहों (राजभवनों) तथा विमानों (सात मंजिले महलों) की ऊपरी छतों पर चढ़कर उदासीन भाव से उन तीनों की ओर देखने लगे॥३॥
श्लोक:
न हि रथ्याः सुशक्यन्ते गन्तुं बहुजनाकुलाः
आरुह्य तस्मात् प्रासादाद् दीनाः पश्यन्ति राघवम्॥४॥
भावार्थ :-
उस समय सड़कें मनुष्यों की भीड़ से भरी थीं इसलिये उनपर सुगमतापूर्वक चलना कठिन हो गया था। अतः अधिकांश मनुष्य प्रासादों (तिमंजिले मकानों) पर चढ़कर वहीं से दुःखी होकर श्रीरामचन्द्रजी की ओर देख रहे थे॥४॥
वाल्मीकि रामायण- अयोध्याकाण्ड सर्ग- ३४
अयोध्याकाण्डम्
चतुस्त्रिंशः सर्गः (सर्ग 34)
( सीता और लक्ष्मण सहित श्रीराम का रानियों सहित राजा दशरथ के पास जाकर वनवास के लिये विदा माँगना, राजा का शोक और मूर्छा )
श्लोक:
ततः कमलपत्राक्षः श्यामो निरुपमो महान्।
उवाच रामस्तं सूतं पितुराख्याहि मामिति॥१॥
स रामप्रेषितः क्षिप्रं संतापकलुषेन्द्रियम्।
प्रविश्य नृपतिं सूतो निःश्वसन्तं ददर्श ह॥२॥
भावार्थ :-
जब कमलनयन श्यामसुन्दर उपमारहित महापुरुष श्रीराम ने सूत सुमन्त्र से कहा—’आप पिताजी को मेरे आगमन की सूचना दे दीजिये’ तब श्रीराम की प्रेरणा से शीघ्र ही भीतर जाकर सारथि सुमन्त्र ने राजा का दर्शन किया। उनकी सारी इन्द्रियाँ संताप से कलुषित हो रही थीं। वे लम्बी साँस खींच रहे थे॥१-२॥
श्लोक:
उपरक्तमिवादित्यं भस्मच्छन्नमिवानलम्।
तटाकमिव निस्तोयमपश्यज्जगतीपतिम्॥३॥
आबोध्य च महाप्राज्ञः परमाकुलचेतनम्।
राममेवानुशोचन्तं सूतः प्राञ्जलिरब्रवीत्॥४॥
भावार्थ :-
सुमन्त्र ने देखा, पृथ्वीपति महाराज दशरथ राहुग्रस्त सूर्य, राख से ढकी हुई आग तथा जलशून्य तालाब के समान श्रीहीन हो रहे हैं। उनका चित्त अत्यन्त व्याकुल है और वे श्रीराम का ही चिन्तन कर रहे हैं। तब महाप्राज्ञ सूत ने महाराज को सम्बोधित करके हाथ जोड़कर कहा॥३-४॥
श्लोक:
तं वर्धयित्वा राजानं पूर्वं सूतो जयाशिषा।
भयविक्लवया वाचा मन्दया श्लक्ष्णयाब्रवीत्॥५॥
भावार्थ :-
पहले तो सूत सुमन्त्र ने विजयसूचक आशीर्वाद देते हुए महाराज की अभ्युदय-कामना की; फिर भय से व्याकुल मन्द-मधुर वाणी द्वारा यह बात कही—॥५॥
वाल्मीकि रामायण- अयोध्याकाण्ड सर्ग- ३५
अयोध्याकाण्डम्
पञ्चत्रिंशः सर्गः (सर्ग 35)
( सुमन्त्र के समझाने और फटकारने पर भी कैकेयी का टस-से-मस न होना )
श्लोक:
ततो निधूय सहसा शिरो निःश्वस्य चासकृत्।
पाणिं पाणौ विनिष्पिष्य दन्तान् कटकटाय्य च॥१॥
लोचने कोपसंरक्ते वर्णं पूर्वोचितं जहत्।
कोपाभिभूतः सहसा संतापमशुभं गतः॥२॥
मनः समीक्षमाणश्च सूतो दशरथस्य च।
कम्पयन्निव कैकेय्या हृदयं वाक्शरैः शितैः॥३॥
भावार्थ :-
तदनन्तर होश में आने पर सारथि सुमन्त्र सहसा उठकर खड़े हो गये। उनके मन में बड़ा संताप हुआ, जो अमङ्गलकारी था। वे क्रोध के मारे काँपने लगे। उनके शरीर और मुख की पहली स्वाभाविक कान्ति बदल गयी। वे क्रोध से आँखें लाल करके दोनों हाथों से सिर पीटने लगे और बारम्बार लम्बी साँस खींचकर, हाथ-से-हाथ मलकर, दाँत कटकटाकर राजा दशरथ के मन की वास्तविक अवस्था देखते हुए अपने वचनरूपी तीखे बाणों से कैकेयी के हृदय को कम्पित-सा करने लगे॥१-३॥
श्लोक:
वाक्यवज्ररनुपमैर्निर्भिन्दन्निव चाशुभैः।
कैकेय्याः सर्वमर्माणि सुमन्त्रः प्रत्यभाषत॥४॥
भावार्थ :-
अपने अशुभ एवं अनुपम वचनरूपी वज्र से कैकेयी के सारे मर्मस्थानों को विदीर्ण-से करते हुए सुमन्त्र ने उससे इस प्रकार कहना आरम्भ किया-॥४॥
श्लोक:
यस्यास्तव पतिस्त्यक्तो राजा दशरथः स्वयम्।
भर्ता सर्वस्य जगतः स्थावरस्य चरस्य च॥५॥
नह्यकार्यतमं किंचित्तव देवीह विद्यते।
पतिघ्नीं त्वामहं मन्ये कुलनीमपि चान्ततः॥६॥
भावार्थ :-
‘देवि! जब तुमने सम्पूर्ण चराचर जगत् के स्वामी स्वयं अपने पति महाराज दशरथ का ही त्याग कर दिया, तब इस जगत् में कोई ऐसा कुकर्म नहीं है, जिसे तुम न कर सको; मैं तो समझता हूँ कि तुम पति की हत्या करने वाली तो हो ही; अन्ततः कुलघातिनी भी हो॥५-६॥
वाल्मीकि रामायण- अयोध्याकाण्ड सर्ग- ३६
अयोध्याकाण्डम्
षट्त्रिंशः सर्गः (सर्ग 36)
( दशरथ का श्रीराम के साथ सेना और खजाना भेजने का आदेश, कैकेयी द्वारा इसका विरोध, राजा का श्रीराम के साथ जाने की इच्छा प्रकट करना )
श्लोक:
ततः समन्त्रमैक्ष्वाकः पीडितोऽत्र प्रतिज्ञया।
सबाष्पमतिनिःश्वस्य जगादेदं पुनर्वचः॥१॥
भावार्थ :-
तब इक्ष्वाकु कुलनन्दन राजा दशरथ वहाँ अपनी प्रतिज्ञा से पीड़ित हो आँसू बहाते हुए लम्बी साँस खींचकर सुमन्त्र से फिर इस प्रकार बोले-॥१॥
श्लोक:
सूत रत्नसुसम्पूर्णा चतुर्विधबला चमूः।
राघवस्यानुयात्रार्थं क्षिप्रं प्रतिविधीयताम्॥२॥
भावार्थ :-
‘सूत! तुम शीघ्र ही रत्नों से भरी-पूरी चतुरङ्गिणी सेनाको श्रीराम के पीछे-पीछे जाने की आज्ञा दो॥२॥
श्लोक:
रूपाजीवाश्च वादिन्यो वणिजश्च महाधनाः।
शोभयन्तु कुमारस्य वाहिनीः सुप्रसारिताः॥३॥
भावार्थ :-
‘रूपसे आजीविका चलाने और सरस वचन बोलने वाली स्त्रियाँ तथा महाधनी एवं विक्रययोग्य द्रव्यों का प्रसारण करने में कुशल वैश्य राजकुमार श्रीराम की सेनाओं को सुशोभित करें॥३॥
श्लोक:
ये चैनमुपजीवन्ति रमते यैश्च वीर्यतः।
तेषां बहविधं दत्त्वा तानप्यत्र नियोजय॥४॥
भावार्थ :-
‘जो श्रीराम के पास रहकर जीवन-निर्वाह करते हैं तथा जिन मल्लों से ये उनका पराक्रम देखकर प्रसन्न रहते हैं, उन सबको अनेक प्रकार का धन देकर उन्हें भी इनके साथ जाने की आज्ञा दे दो॥४॥
वाल्मीकि रामायण- अयोध्याकाण्ड सर्ग- ३७
अयोध्याकाण्डम्
सप्तत्रिंशः सर्गः (सर्ग 37)
( श्रीराम आदि का वल्कल-वस्त्र-धारण, गुरु वसिष्ठ का कैकेयी को फटकारते हुए सीता के वल्कलधारण का अनौचित्य बताना )
श्लोक:
महामात्रवचः श्रुत्वा रामो दशरथं तदा।
अभ्यभाषत वाक्यं तु विनयज्ञो विनीतवत्॥१॥
भावार्थ :-
प्रधान मन्त्री की पूर्वोक्त बात सुनकर विनय के ज्ञाता श्रीराम ने उस समय राजा दशरथ से विनीत होकर कहा-॥१॥
श्लोक:
त्यक्तभोगस्य मे राजन् वने वन्येन जीवतः।
किं कार्यमनुयात्रेण त्यक्तसङ्गस्य सर्वतः॥२॥
भावार्थ :-
‘राजन्! मैं भोगों का परित्याग कर चुका हूँ। मुझे जंगल के फल-मूलों से जीवन-निर्वाह करना है। जब मैं सब ओर से आसक्ति छोड़ चुका हूँ, तब मुझे सेना से क्या प्रयोजन है?॥२॥
श्लोक:
यो हि दत्त्वा द्विपश्रेष्ठं कक्ष्यायां कुरुते मनः।
रज्जुस्नेहेन किं तस्य त्यजतः कुञ्जरोत्तमम्॥३॥
भावार्थ :-
‘जो श्रेष्ठ गजराज का दान करके उसके रस्से में मन लगाता है—लोभवश रस्से को रख लेना चाहता है, वह अच्छा नहीं करता; क्योंकि उत्तम हाथी का त्याग करने वाले पुरुष को उसके रस्से में आसक्ति रखने की क्या आवश्यकता है?॥३॥
श्लोक:
तथा मम सतां श्रेष्ठ किं ध्वजिन्या जगत्पते।
सर्वाण्येवानुजानामि चीराण्येवानयन्तु मे॥४॥
भावार्थ :-
‘सत्पुरुषों में श्रेष्ठ महाराज! इसी तरह मुझे सेना लेकर क्या करना है? मैं ये सारी वस्तुएँ भरत को अर्पित करने की अनुमति देता हूँ। मेरे लिये तो (माता कैकेयी की दासियाँ) चीर (चिथड़े या वल्कलवस्त्र) ला दें॥४॥
वाल्मीकि रामायण- अयोध्याकाण्ड सर्ग- ३८
अयोध्याकाण्डम्
अष्टात्रिंशः सर्गः (सर्ग 38)
( राजा दशरथ का सीता को वल्कल धारण कराना अनुचित बताकर कैकेयी को फटकारना और श्रीराम का उनसे कौसल्या पर कृपादृष्टि रखने के लिये अनुरोध करना )
श्लोक:
तस्यां चीरं वसानायां नाथवत्यामनाथवत्।
प्रचुक्रोश जनः सर्वो धिक् त्वां दशरथं त्विति॥१॥
भावार्थ :-
सीताजी सनाथ होकर भी जब अनाथ की भाँति चीर-वस्त्र धारण करने लगी, तब सब लोग चिल्लाचिल्लाकर कहने लगे—’राजा दशरथ! तुम्हें धिक्कार है!’॥१॥
श्लोक:
तेन तत्र प्रणादेन दुःखितः स महीपतिः।
चिच्छेद जीविते श्रद्धां धर्मे यशसि चात्मनः॥२॥
स निःश्वस्योष्णमैक्ष्वाकस्तां भार्यामिदमब्रवीत्।
कैकेयि कुशचीरेण न सीता गन्तुमर्हति॥३॥
भावार्थ :-
वहाँ होने वाले उस कोलाहल से दुःखी हो इक्ष्वाकुवंशी महाराज दशरथ ने अपने जीवन, धर्म और यश की उत्कट इच्छा त्याग दी। फिर वे गरम साँस खींचकर अपनी भार्या कैकेयी से इस प्रकार बोले—’कैकेयि! सीता कुश-चीर (वल्कल-वस्त्र) पहनकर वन में जाने के योग्य नहीं है॥२-३॥
श्लोक:
सुकुमारी च बाला च सततं च सुखोचिता।
नेयं वनस्य योग्येति सत्यमाह गुरुर्मम॥४॥
भावार्थ :-
‘यह सुकुमारी है, बालिका है और सदा सुखों में ही पली है। मेरे गुरुजी ठीक कहते हैं कि यह सीता वन में जाने योग्य नहीं है॥४॥
वाल्मीकि रामायण- अयोध्याकाण्ड सर्ग- ३९
अयोध्याकाण्डम्
एकोनचत्वारिंशः सर्गः (सर्ग 39)
( राजा दशरथ का विलाप,कौसल्या का सीता को पतिसेवा का उपदेश, सीता के द्वारा उसकी स्वीकृति )
श्लोक:
रामस्य तु वचः श्रुत्वा मुनिवेषधरं च तम्।
समीक्ष्य सह भार्याभी राजा विगतचेतनः॥१॥
भावार्थ :-
श्रीराम की बात सुनकर और उन्हें मुनिवेष धारण किये देख स्त्रियोंसहित राजा दशरथ शोक से अचेत हो गये॥१॥
श्लोक:
नैनं दुःखेन संतप्तः प्रत्यवैक्षत राघवम्।
न चैनमभिसम्प्रेक्ष्य प्रत्यभाषत दुर्मनाः॥२॥
भावार्थ :-
दुःख से संतप्त होने के कारण वे श्रीराम की ओर भर आँख देख भी न सके और देखकर भी मन में दुःख होने के कारण उन्हें कुछ उत्तर न दे सके॥२॥
श्लोक:
स मुहूर्तमिवासंज्ञो दुःखितश्च महीपतिः।
विललाप महाबाहू राममेवानुचिन्तयन्॥३॥
भावार्थ :-
दो घड़ी तक अचेत-सा रहने के बाद जब उन्हें होश हुआ, तब वे महाबाहु नरेश श्रीराम का ही चिन्तन करते हुए दुःखी होकर विलाप करने लगे-॥३॥
श्लोक:
मन्ये खल मया पूर्वं विवत्सा बहवः कृताः।
प्राणिनो हिंसिता वापि तन्मामिदमुपस्थितम्॥४॥
भावार्थ :-
‘मालूम होता है, मैंने पूर्वजन्म में अवश्य ही बहुत सी गौओं का उनके बछड़ों से विछोह कराया है अथवा अनेक प्राणियों की हिंसा की है, इसी से आज मेरे ऊपर यह संकट आ पड़ा है॥४॥
वाल्मीकि रामायण- अयोध्याकाण्ड सर्ग- ४०
अयोध्याकाण्डम्
चत्वारिंशः सर्गः (सर्ग 40)
( सीता, राम और लक्ष्मण का दशरथ की परिक्रमा करके कौसल्या आदि को प्रणाम करना, सीतासहित श्रीराम और लक्ष्मण का रथमें बैठकर वन की ओर प्रस्थान )
श्लोक:
अथ रामश्च सीता च लक्ष्मणश्च कृताञ्जलिः।
उपसंगृह्य राजानं चक्रुर्दीनाः प्रदक्षिणम्॥१॥
भावार्थ :-
तदनन्तर राम, लक्ष्मण और सीता ने हाथ जोड़कर दीनभाव से राजा दशरथ के चरणों का स्पर्श करके उनकी दक्षिणावर्त परिक्रमा की॥१॥
श्लोक:
तं चापि समनुज्ञाप्य धर्मज्ञः सह सीतया।
राघवः शोकसम्मूढो जननीमभ्यवादयत्॥२॥
भावार्थ :-
उनसे विदा लेकर सीतासहित धर्मज्ञ रघुनाथजी ने माता का कष्ट देखकर शोक से व्याकुल हो उनके चरणों में प्रणाम किया॥२॥
श्लोक:
अन्वक्षं लक्ष्मणो भ्रातुः कौसल्यामभ्यवादयत्।
अपि मातुः सुमित्राया जग्राह चरणौ पुनः॥३॥
भावार्थ :-
श्रीराम के बाद लक्ष्मण ने भी पहले माता कौसल्या को प्रणाम किया, फिर अपनी माता सुमित्रा के भी दोनों पैर पकड़े॥३॥
श्लोक:
तं वन्दमानं रुदती माता सौमित्रिमब्रवीत्।।
हितकामा महाबाहं मूर्युपाघ्राय लक्ष्मणम्॥४॥
भावार्थ :-
अपने पुत्र महाबाहु लक्ष्मण को प्रणाम करते देख उनका हित चाहने वाली माता सुमित्रा ने बेटे का मस्तक सूंघकर कहा-॥४॥
वाल्मीकि रामायण- अयोध्याकाण्ड सर्ग- ४१
अयोध्याकाण्डम्
एकचत्वारिंशः सर्गः (सर्ग 41)
( श्रीराम के वनगमन से रनवास की स्त्रियों का विलाप तथा नगरनिवासियों की शोकाकुल अवस्था )
श्लोक:
तस्मिंस्तु पुरुषव्याघ्र निष्क्रामति कृताञ्जलौ।
आर्तशब्दो हि संजज्ञे स्त्रीणामन्तःपुरे महान्॥१॥
भावार्थ :-
पुरुषसिंह श्रीराम ने माताओं सहित पिता के लिये दूर से ही हाथ जोड़ रखे थे, उसी अवस्था में जब वे रथ द्वारा नगर से बाहर निकलने लगे, उस समय रनवास की रानियों में बड़ा हाहाकार मच गया॥१॥
श्लोक:
अनाथस्य जनस्यास्य दुर्बलस्य तपस्विनः।
यो गतिः शरणं चासीत् स नाथः क्व नु गच्छति॥२॥
भावार्थ :-
वे रोती हुई कहने लगीं—’हाय! जो हम अनाथ, दुर्बल और शोचनीय जनों की गति (सब सुखों की प्राप्ति कराने वाले) और शरण (समस्त आपत्तियों से रक्षा करने वाले) थे, वे हमारे नाथ (मनोरथ पूर्ण करने वाले) श्रीराम कहाँ चले जा रहे हैं?॥२॥
श्लोक:
न क्रुध्यत्यभिशस्तोऽपि क्रोधनीयानि वर्जयन्।
क्रुद्वान् प्रसादयन् सर्वान् समदुःखः क्व गच्छति॥३॥
भावार्थ :-
‘जो किसी के द्वारा झूठा कलंक लगाये जाने पर भी क्रोध नहीं करते थे, क्रोध दिलाने वाली बातें नहीं कहते थे और रूठे हुए सभी लोगों को मनाकर प्रसन्न कर लेते थे, वे दूसरों के दुःख में समवेदना प्रकट करने वाले राम कहाँ जा रहे हैं?॥३॥
श्लोक:
कौसल्यायां महातेजा यथा मातरि वर्तते।
तथा यो वर्ततेऽस्मासु महात्मा क्व नु गच्छति॥४॥
भावार्थ :-
‘जो महातेजस्वी महात्मा श्रीराम अपनी माता कौसल्याके साथ जैसा बर्ताव करते थे, वैसा ही बर्ताव हमारे साथ भी करते थे, वे कहाँ चले जा रहे हैं?॥४॥
वाल्मीकि रामायण- अयोध्याकाण्ड सर्ग- ४२
अयोध्याकाण्डम्
द्विचत्वारिंशः सर्गः (सर्ग 42)
( राजा दशरथ का पृथ्वी पर गिरना, श्रीराम के लिये विलाप करना, कैकेयी को अपने पास आने से मना करना और उसे त्याग देना )
श्लोक:
यावत् तु निर्यतस्तस्य रजोरूपमदृश्यत।
नैवेक्ष्वाकुवरस्तावत् संजहारात्मचक्षुषी॥१॥
भावार्थ :-
वन की ओर जाते हुए श्रीराम के रथ की धूल जबतक दिखायी देती रही, तब तक इक्ष्वाकुवंश के स्वामी राजा दशरथ ने उधर से अपनी आँखें नहीं हटायीं॥१॥
श्लोक:
यावद् राजा प्रियं पुत्रं पश्यत्यत्यन्तधार्मिकम्।
तावद् व्यवर्धतेवास्य धरण्यां पुत्रदर्शने॥२॥
भावार्थ :-
वे महाराज अपने अत्यन्त धार्मिक प्रिय पुत्र को जबतक देखते रहे, तबतक पुत्र को देखने के लिये उनका शरीर मानो पृथ्वी पर बढ़ रहा था- वे ऊँचे उठ-उठकर उनकी ओर निहार रहे थे॥२॥
श्लोक:
न पश्यति रजोऽप्यस्य यदा रामस्य भूमिपः।
तदार्तश्च निषण्णश्च पपात धरणीतले॥३॥
भावार्थ :-
जब राजा को श्रीराम के रथ की धूल भी नहीं दिखायी देने लगी, तब वे अत्यन्त आर्त और विषादग्रस्त हो पृथ्वी पर गिर पड़े॥३॥
श्लोक:
तस्य दक्षिणमन्वागात् कौसल्या बाहुमङ्गना।
परं चास्यान्वगात् पार्वं कैकेयी सा सुमध्यमा॥४॥
भावार्थ :-
उस समय उन्हें सहारा देने के लिये उनकी धर्मपत्नी कौसल्या देवी दाहिनी बाँह के पास आयीं और सुन्दरी कैकेयी उनके वामभाग में जा पहुँचीं॥४॥
वाल्मीकि रामायण- अयोध्याकाण्ड सर्ग- ४३
अयोध्याकाण्डम्
त्रिचत्वारिंशः सर्गः (सर्ग 43)
( महारानी कौसल्या का विलाप )
श्लोक:
ततः समीक्ष्य शयने सन्नं शोकेन पार्थिवम्।
कौसल्या पुत्रशोकार्ता तमुवाच महीपतिम्॥१॥
भावार्थ :-
शय्या पर पड़े हुए राजा को पुत्रशोक से व्याकुल देख पुत्र के ही शोक से पीड़ित हुई कौसल्या ने उन महाराज से कहा-॥१॥
श्लोक:
राघवे नरशार्दूले विषं मुक्त्वाहिजिह्मगा।
विचरिष्यति कैकेयी निर्मुक्तेव हि पन्नगी॥२॥
भावार्थ :-
‘नरश्रेष्ठ श्रीराम पर अपना विष उँडेलकर टेढ़ी चाल से चलने वाली कैकेयी केंचुल छोड़कर नूतन शरीर से प्रकट हुई सर्पिणी की भाँति अब स्वच्छन्द विचरेगी॥२॥
श्लोक:
विवास्य रामं सुभगा लब्धकामा समाहिता।
त्रासयिष्यति मां भूयो दुष्टाहिरिव वेश्मनि॥३॥
भावार्थ :-
‘जैसे घर में रहने वाला दुष्ट सर्प बारंबार भय देता रहता है, उसी प्रकार श्रीरामचन्द्र को वनवास देकर सफलमनोरथ हुई सुभगा कैकेयी सदा सावधान होकर मुझे त्रास देती रहेगी॥३॥
श्लोक:
अथास्मिन् नगरे रामश्चरन् भैक्षं गृहे वसेत्।
कामकारो वरं दातुमपि दासं ममात्मजम्॥४॥
भावार्थ :-
‘यदि श्रीराम इस नगर में भीख माँगते हुए भी घर में रहते अथवा मेरे पुत्र को कैकेयी का दास भी बना दिया गया होता तो वैसा वरदान मुझे भी अभीष्ट होता (क्योंकि उस दशा में मुझे भी श्रीराम का दर्शन होता रहता। श्रीराम के वनवास का वरदान तो कैकेयी ने मुझे दुःख देने के लिये ही माँगा है।)॥४॥
वाल्मीकि रामायण- अयोध्याकाण्ड सर्ग- ४४
अयोध्याकाण्डम्
चतुश्चत्वारिंशः सर्गः (सर्ग 44)
( सुमित्रा का कौसल्या को आश्वासन देना )
श्लोक:
विलपन्ती तथा तां तु कौसल्यां प्रमदोत्तमाम्।
इदं धर्मे स्थिता धन॑ सुमित्रा वाक्यमब्रवीत्॥१॥
भावार्थ :-
नारियों में श्रेष्ठ कौसल्या को इस प्रकार विलाप करती देख धर्मपरायणा सुमित्रा यह धर्मयुक्त बात बोली-॥१॥
श्लोक:
तवार्ये सद्गुणैर्युक्तः स पुत्रः पुरुषोत्तमः।
किं ते विलपितेनैवं कृपणं रुदितेन वा॥२॥
भावार्थ :-
‘आर्ये! तुम्हारे पुत्र श्रीराम उत्तम गुणों से युक्त और पुरुषों में श्रेष्ठ हैं। उनके लिये इस प्रकार विलाप करना और दीनतापूर्वक रोना व्यर्थ है, इस तरह रोने-धोने से क्या लाभ?॥२॥
श्लोक:
यस्तवार्ये गतः पुत्रस्त्यक्त्वा राज्यं महाबलः।
साधु कुर्वन् महात्मानं पितरं सत्यवादिनम्॥३॥
शिष्टैराचरिते सम्यक्शश्वत् प्रेत्य फलोदये।
रामो धर्मे स्थितः श्रेष्ठो न स शोच्यः कदाचन॥४॥
भावार्थ :-
‘बहिन! जो राज्य छोड़कर अपने महात्मा पिता को भलीभाँति सत्यवादी बनाने के लिये वन में चले गये हैं, वे तुम्हारे महाबली श्रेष्ठ पुत्र श्रीराम उस उत्तम धर्म में स्थित हैं, जिसका सत्पुरुषों ने सर्वदा और सम्यक् प्रकार से पालन किया है तथा जो परलोक में भी सुखमय फल प्रदान करने वाला है। ऐसे धर्मात्मा के लिये कदापि शोक नहीं करना चाहिये॥३-४॥
श्लोक:
वर्तते चोत्तमां वृत्तिं लक्ष्मणोऽस्मिन् सदानघः।
दयावान् सर्वभूतेषु लाभस्तस्य महात्मनः॥५॥
भावार्थ :-
‘निष्पाप लक्ष्मण समस्त प्राणियों के प्रति दयालु हैं। वे सदा श्रीराम के प्रति उत्तम बर्ताव करते हैं, अतः उन महात्मा लक्ष्मण के लिये यह लाभ की ही बात है॥५॥
वाल्मीकि रामायण- अयोध्याकाण्ड सर्ग- ४५
अयोध्याकाण्डम्
पञ्चचत्वारिंशः सर्गः (सर्ग 45)
( नगर के वृद्ध ब्राह्मणों का श्रीराम से लौट चलने के लिये आग्रह करना तथा उन सबके साथ श्रीराम का तमसा तट पर पहुँचना )
श्लोक:
अनुरक्ता महात्मानं रामं सत्यपराक्रमम्।
अनुजग्मुः प्रयान्तं तं वनवासाय मानवाः॥१॥
भावार्थ :-
उधर सत्यपराक्रमी महात्मा श्रीराम जब वन की ओर जाने लगे, उस समय उनके प्रति अनुराग रखने वाले बहुत-से अयोध्यावासी मनुष्य वन में निवास करने के लिये उनके पीछे-पीछे चल दिये॥१॥
श्लोक:
निवर्तितेऽतीव बलात् सुहृद्धर्मेण राजनि।
नैव ते संन्यवर्तन्त रामस्यानुगता रथम्॥२॥
भावार्थ :-
जिसके जल्दी लौटने की कामना की जाय, उस स्वजन को दूर तक नहीं पहुँचाना चाहिये’–इत्यादि रूप से बताये गये सुहृद्धर्म के अनुसार जब राजा दशरथ बलपूर्वक लौटा दिये गये, तब भी जो श्रीरामजी के रथ के पीछे-पीछे लगे हुए थे, वे अयोध्यावासी अपने घर की ओर नहीं लौटे॥२॥
श्लोक:
अयोध्यानिलयानां हि पुरुषाणां महायशाः।
बभूव गुणसम्पन्नः पूर्णचन्द्र इव प्रियः॥३॥
भावार्थ :-
क्योंकि अयोध्यावासी पुरुषों के लिये सद्गुणसम्पन्न महायशस्वी श्रीराम पूर्ण चन्द्रमा के समान प्रिय हो गये थे॥३॥
श्लोक:
स याच्यमानः काकुत्स्थस्ताभिः प्रकृतिभिस्तदा।
कुर्वाणः पितरं सत्यं वनमेवान्वपद्यत॥४॥
भावार्थ :-
उन प्रजाजनों ने श्रीराम से घर लौट चलने के लिये बहुत प्रार्थना की; किंतु वे पिता के सत्य की रक्षा करने के लिये वन की ओर ही बढ़ते गये॥४॥
🏠 मुख पृष्ठ / वाल्मीकि रामायण / अयोध्याकाण्ड सर्ग ४६-६० =》
- शीर्ष 10 दृश्य:
- श्री दुर्गा सप्तशती | Shri Durga Saptashati
- श्रीमद्भगवद् गीता I ShriBhagavadGeeta
- श्रीरामचरितमानस भावार्थ सहित- बालकाण्ड- 201-225
- बालकाण्ड | Balkanda
- सुन्दरकाण्ड | Sundarkanda
- श्री सत्यनारायण व्रत कथा संस्कृत में हिन्दी भावार्थ सहित
- लंकाकाण्ड | Lankakanda
- उत्तरकाण्ड | Uttarakhanda
- अरण्यकाण्ड | Aranyakanda
- किष्किन्धाकाण्ड | Kishkindhakanda








