संध्यावंदन | Sandhyavandan

संध्यावंदन- संध्या, का अर्थ “मिलन” और वंदन का “पूजन” से होता है।

संध्यावंदन
॥ 卐 ॥
॥ श्री गणेशाय नमः ॥
॥ श्री कमलापति नम: ॥
॥ श्री जानकीवल्लभो विजयते ॥
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यह स्वंय शिवजी द्वारा माता जगदम्बा से कही गई एक पवित्र कथा है। आप भी विस्तार पूर्वक पढ़े:
शिव-शक्ति श्रीराम मिलन (संपूर्ण भाग) 🌞

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संध्यावंदन और इसकी महत्ता

Sandhya Vandana Vidhi संध्या वंदना करने की विधि

संध्यावंदन (संध्यावंदनम्) या संध्योपासन (संध्योपासनम्) उपनयन संस्कार द्वारा धार्मिक अनुष्ठान के लिए संस्कारित हिन्दू धर्म में गुरू द्वारा उसके निष्पादन हेतु दिए गए निदेशानुसार की जाने वाली महत्वपूर्ण नित्य क्रिया है। संध्यावंदन में महान वेदों से उद्धरण शामिल हैं जिनका दिन में तीन बार पाठ किया जाता है। एक सूर्योदय के दौरान (जब रात्रि से दिन निकलता है), अगला दोपहर के दौरान (जब आरोही सूर्य से अवरोही सूर्य में संक्रमण होता है) और सूर्यास्त के दौरान (जब दिन के बाद रात आती है)।

प्रत्येक समय इसे एक अलग नाम से जाना जाता है – प्रातःकाल में प्रातःसंध्या, दोपहर में मध्याह्निक और सायंकाल में सायंसंध्या। शिवप्रसाद भट्टाचार्य इसे “हिन्दुओं की पूजन पद्धति संबंधी संहिता” के रूप में परिभाषित करते हैं।

यह शब्द संस्कृत का एक संयुक्त शब्द है जिसमें संध्या, का अर्थ है “मिलन”। जिसका दिन और रात की संधि या मिलन किंवा संगम से आशय है और वंदन का अर्थ पूजन से होता है। प्रातःकाल और सायंकाल के अलावा, दोपहर को दिन का तीसरा संगम माना जाता है। इसलिए उन सभी समयों में दैनिक ध्यान और प्रार्थना की जाती है।

स्वयं शब्द संध्या का उपयोग दैनिक अनुष्ठान के अर्थ में भी प्रयुक्त होता है जिसका आशय दिन के आरंभ और अस्त के समय इन अर्चनाओं का किया जाना है।

वेदों की ऋचाओं तथा श्लोकों के आधार पर आवाहन आदि करके गायत्री मंत्र का २८, ३२, ५४ या १०८ बार जाप करना संध्योपासन का अभिन्न अंग है (यह संध्यावंदन कर रहे व्यक्ति पर निर्भर करता है। वह किसी भी संख्या में मंत्र का जाप कर सकता है। “यथाशक्ति गायत्री मंत्र जपमहं करिष्ये।” ऐसा संध्यावन्दन के संकल्प में जोड़कर वह यथाशक्ति मंत्र का जाप कर सकता है।) मंत्र के अलावा संध्या अनुष्ठान में विचारों को भटकने से रोकने तथा ध्यान को केंद्रित करने के लिए कुछ अन्य शुद्धिकारक तथा प्रारंभिक अनुष्ठान हैं। इनमें से कुछ में ग्रहों और हिन्दू पंचांग के महीनों के देवताओं को संध्यावंदन न कर पाने तथा पिछली संध्या के बाद से किए गए पापों के प्रायश्चित स्वरूप में जल अर्पित किया जाता है। इसके अतिरिक्त एक संध्यावंदन के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण अनुष्ठानों में प्रातः सूर्य की तथा सायं वरुण की मित्रदेव के रूप में पूजा की जाती है।

इसके अलावा, ब्रह्मचारियों के लिए सांध्यवंदन की समाप्ति पर हवन करना और समिधादान करना आवश्यक होता है।

पूजा के अन्य पहलुओं में जो कि मुख्यतः संध्यावंदना में शामिल नहीं है, जिनमें ध्यान मंत्रों का उच्चारण तथा आराधक द्वारा देवी-देवताओं की पूजा शामिल है। ध्यान-योग से संबंध के बारे में मोनियर-विलियम्स लिखते हैं कि यदि इसे ध्यान की क्रिया माना जाए तो संध्या शब्द की उत्पत्ति का संबंध सन-ध्याई के साथ हो सकता है

महत्व

संध्याकर्म का हिन्दू धर्म में विशेष स्थान है क्योंकि इससे मानसिक शुद्धि होती है। वैज्ञानिक दृष्टि से प्राणायाम जो संध्या का अभिन्न अंग है, इससे कई रोग समाप्त हो जाते हैं। इस समस्त संसार में जो द्विज (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य) अपने कर्म (स्वकर्म) से भटक गए हैं, उनके हेतु संध्या की आवश्यकता है। संध्या करने वाले पापरहित हो जाते हैं। संन्ध्योपासन से अज्ञानवश किये गए पाप समाप्त हो जाते हैं। संध्या को ब्राह्मण का मूल कहा गया है। अगर मूल नहीं तो शाखा आदि सब समाप्त हो जाता है। अतः संध्या महत्वपूर्ण है।

विप्रोवृक्षोमूलकान्यत्रसंध्यावेदाः शाखा धर्मकर्माणिपत्रम्। तस्मान्मूलं यत्नतोरक्षणीयं छिन्नेमूलेनैववृक्षो न शाखा।।

जो ब्राह्मण, क्षत्रीय, वैश्यादि संध्या नहीं करते हैं वह अपवित्र कहे गए हैं। उनके समस्त पूण्यकर्म समाप्त हो जाते हैं।

विधि

सर्वप्रथम तो शास्त्रोक्त विधि से स्नानशौचाचार कर, तिलक, भष्म, पवित्रीधारण, कुशोत्पाटन आदि करके प्रातः की पहली संध्या करना चाहिये।

संध्याकाल

शास्त्रों में संध्याकाल का निर्धारण भी हुआ है जिसके अनुसार ही संध्योपासन फलित होता है। अकाल की संध्या वन्ध्या स्त्री जैसी होती है। मुनियों के अनुसार जो सूर्य और तारों से रहित दैनिक संधि है वही संध्याकाल है।

अहोरात्रस्य या संधिः सूर्यनक्षत्रवर्जिता। सा तु संन्ध्यासमाख्याता मुनिभिस्तत्वदर्शिभिः।।

तथा प्रातःकाल में तारों के रहते हुए, मध्याह्न काल में जब सूर्य आकाश के केन्द्र में हो तथा सायं सूर्यास्त से पूर्व संध्या करणीय है। प्रातः का जप सूर्योदय तक (पूर्वाभिमुख) तथा सायं का जप नक्षत्रों (तारों) के उदय तक (पश्चिमाभिमुख) करनी चाहिये।

संध्या करने का उचित स्थान

संध्या घर, गोशाला, नदीतट तथा ईश्वर की मूर्ति के समक्ष (पूजाकक्ष या मंदिर) में किया जा सकता है परंतु इसके फल शास्त्रों में भिन्न भिन्न बताए गए हैं। अपने घर में संध्या करने से एक, गोशाला में करने से सौ, नदी के तट पर लाख तथा ईश्वर के मूर्ति के समीप करने से अनन्त गुणा फल मिलता है।

संध्या में आवश्यक वस्तुएं

एक प्रधान जलपात्र, एक संध्या का विशेष जलपात्र, चंदन, फूल, चंदनपुष्पादि के रखने हेतु स्थालिका (थाली), घंटी, पंचपात्र, पवित्री, आचमनी, अर्घ्य हेतु अर्घा, जल गिराने के लिये लघुस्थालिका, बैठने के लिये आसन।

मुख्यविधि

आसन को भूमि पर बिछाकर (गांठ उत्तरदक्षिण की ओर हो) तुलसी या रुद्राक्ष की माला धारण कर दोनो हाथों की अनामिकाओं में कुश से बनी पवित्री धारण कर लें और प्रारंभ करें।

  • आचमन – भगवान के नाम से तीन बार आचमनी से जल को मुख में डालने की विधि आचमन कहलाती है।
  • मार्जन – शरीर, आसन तथा सभी आवश्यक वस्तुओं पर जल छिड़कना मार्जन कहलाता है।
  • संकल्प – संध्या कर रहा हूँ ऐसा विचार करना इसका संकल्प है जिसे संस्कृत में उच्चारण करते हैं और जल छोड़ते हैं।
  • अघमर्षण – दाये हाथ में जल ले बाये हाथ से ढककर गायत्री से अभिमंत्रित कर चारो दिशाओं में छोड़ना ही अघमर्षण कहलाता है।
  • प्राणायाम – संध्या में प्राणायाम का महत्वपूर्ण स्थान है। पूरक अर्थात् अंगूठे से दाहिने नासिकाछिद्र को बंद कर बाये से श्वास धीरेधीरे खीचना, कुम्भक अनामिका कनिष्ठिका अंगुलियों से नाक को दबाकर सामर्थ्य के अनुसार श्वास का रोधन, रेचक दाहिने छिद्र से श्वास धीरेधीरे छोड़ना, ये तीन प्राणायाम की मुख्य विधि है। ये अष्टांगयोग का अंग है।
  • सूर्यार्घ्य – सूर्य को जल देना ही सूर्यार्घ्य कहलाता है।
  • सूर्योपस्थान – सूर्यदेव हेतु मानसिक स्थान देना सूर्योपस्थान है।
  • षडंगन्यास – हृदय, मस्तक, शिखा, दोनो कंधों, दोनो नेत्रों तथा दाये हाथ को सिर पर घुमाकर बायी हथेली पर मध्यमा तर्जनी की ताली को षडंगन्यास कहत हैं।
  • गायत्री आवाहन, उपस्थान – गायत्री मंत्र को बुलाना उसका आवाहन कहलाता है और प्रणाम करना ही उपस्थान है।
  • गायत्रीशापविमोचन – गायत्री मंत्र को शाप से छुड़ाना ही शापविमोचन कहलाता है।
  • मुद्रा – हाथों से जपपूर्व २४ मुद्राओं का निर्माण ही मुद्रा कहलाती है। जप के पूर्व की चौबीस मुद्रा है।

सुमुखं सम्पुटं चैव विततं विस्तृतं तथा। द्विमुखं त्रिमुखं चैव चतुष्पंचमुखं तथा।।
षण्मुखाऽधोमुखं चैव व्यापकांजलिकं तथा। शकटं यमपाशं च ग्रथितं चोन्मुखोन्मुखम्।।
प्रलम्बं मुष्टिकं चैव मत्स्यः कूर्मोवराहकम्। सिंहाक्रान्तं महाक्रान्तं मुद्गरं पल्लवं तथा। एता मुद्राश्चतुर्विंशज्जपादौ परिकीर्तिताः।।

  • गायत्रीजप – गायत्री मंत्र की १०८ बार माला या करमाला से आवृत्ति ही गायत्रीजप है। (पश्चात् आठ मुद्राएं गायत्री कवच, तर्पण का विधान है परंतु आवश्यक नहीं।)
  • सूर्यप्रदक्षिणा – सूर्य की मानसिक परिक्रमा तथा जप का अर्पण ही सूर्यप्रदक्षिणा कहलाती है।
  • गायत्रीविसर्जन – गायत्री मंत्र को सादर उनके स्थान में भेजने को गायत्रीविसर्जन कहते हैं।
  • समर्पण – श्रीब्रह्मार्पणमस्तु कहकर संध्याकर्म को ब्रह्म को समर्पित करना ही समर्पण है।

इसप्रकार संध्योंपासन की विधि है जिसका विस्तार नित्यक्रियाप्रकरण की पुस्तकों में प्राप्य है।

वर्जना

संध्योपासन पुलस्त्य मुनि के अनुसार जनन अशुद्धि तथा मरण अशुद्धि में भी वर्जनीय नहीं है। लेकिन विधि भिन्न हो जाती है। ऐसी अवस्था में भी मानसिक संध्या करणीय है। बिना उपस्थान के यह सूर्यार्घ्य तक पूर्ण हो जाती है। दस बार मंत्रजाप का मत है तथा कहीं कहीं कुशा और जल की वर्जना है। विना मंत्रोच्चार के प्राणायाम तथा मार्जनादि हेतु मानसिक मत्रोच्चार बताया गया है। आपत्ति काल, असमर्थता तथा रास्ते आदि में भी मानसिक संध्या करने की विधि है।

संध्या वंदना विधि

॥ॐ श्री गणेशाय नमः॥

*१* नवीन यज्ञोपवीत धारण करने के लिए स्नान करके आसन पर बैठ जाएँ फिर आचमन कर के, नौ तन्तुओं में क्रमशः ॐकार, अग्नि, सर्प, सोम, पितर, प्रजापति, वायु, यम और विश्वदेव की तथा तीन ग्रन्थियों में क्रमशः ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र की भावना करके विनियोग मंत्र पढ़े–

ॐ यज्ञोपवीतमिति परमेष्ठी ऋषिः, त्रिष्टुप् छन्दः, लिङ्गोक्ता देवता, श्रोतस्मार्त कर्मानुष्ठानाधिकारसिद्धये यज्ञोपवीतपरिधाने विनियोगः।

यज्ञोपवीत धारण का मंत्र –

ॐ यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं प्रजापतेर्यत् सहजं पुरस्तात्।
आयुष्यमग्र्यं प्रतिमुञ्च शुभ्रं यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः॥
ॐ यज्ञोपवीतमसि यज्ञस्य त्वा यज्ञोपवीतेनोपनह्यामि।

इस मंत्र को पढ़कर एक जोड़ा यज्ञोपवीत पहन ले। फिर कम-से-कम बीस बार गायत्री-मंत्र का जप करे। इसके बाद पुराने जनेऊ को ऊतार कर “समुद्रं गच्छ स्वाहा” या (एतावद्दिनपर्यन्तं ब्रह्म त्वं धारितं मया। जीर्णत्वात् त्वत्वपरित्यागो गच्छ सूत्र यथासुखम्॥) – बोल कर जलाशय में फेंक दे।

*२* आचमन के समय हाथ धुटनो के भीतर हों। ब्राह्मण इतना जल पीये कि हृदय तक पहुँच सके, क्षत्रिय इतना जल पीये कि कण्ठ तक पहुँच सके और वैश्य इतना जल पीये कि तालु तक पहुँच सके। आचमन का जल पीते समय ओठ बहुत न खोले। अंगुलियाँ आपस में सटी हुई हों। जल मणिबंध की ओर से पीये। आचमन सदैव बैठ कर ही करना चाहिए, इसलिए द्वार पर आचमन में केवल कान स्पर्श करते हैं, जल नहीं पीते।

प्रातःकाल की संध्या तारे छिपने के बाद तथा सूर्योदय पूर्व करनी चाहिए।

प्रथम जानिए नित्य क्रिया की विधि

साधक को सफलता प्राप्त करने के लिए योग के साथ शांत चित होकर ध्यान लगाना आवश्यक है। प्रत्येक मंत्र साधक को अपने जीवन-यापन में ही नहीं, अपितु दैनिक दिनचर्या में भी कुछ विशेष बातों का ध्यान रखना बहुत आवश्यक होता है। वैसे भी जो व्यक्ति जिस मार्ग का अनुसरण करता है, उसे उस मार्ग में सफलतापूर्वक चलकर लक्ष्य तक पहुंचने के सभी नियमों को जान लेना तथा उनका पूरी तरह से पालन करना चाहिए। साधक को सफलता प्राप्त करने के लिए स्नान-संध्याशील होना अत्यावश्यक है।
प्रातः कृत्य- सूर्योदय से प्रायः दो घण्टे पूर्व ब्रह्म – मुहूर्त्त होता है । इस समय सोना (निद्रालीन होना) सर्वथा निषिद्ध है । इस कारण ब्रह्म – मुहूर्त्त में उठकर निम्न मंत्र को बोलते हुए अपने हाथों (हथेलियों) को देखना चाहिए।

कराग्रे वसते लक्ष्मी करमध्ये सरस्वती।
करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते कर-दर्शनम्॥

हाथों के अग्रभाग में लक्ष्मी, मध्य में सरस्वती और मूल में ब्रह्मा स्थित हैं (ऐसा शास्त्रों में कहा गया है)। इसलिए प्रातः उठते ही हाथों का दर्शन करना चाहिए। उसके पश्चात् नीचे लिखी प्रार्थना को बोलकर भूमि पर पैर रखें।

समुद्रवसने देवी ! पर्वतस्तनमण्डले।
विष्णुपत्नि ! नमस्तुभ्यं पादस्पर्श क्षमस्व मे॥

हे विष्णु पत्नी ! हे समुद्ररुपी वस्त्रों को धारण करने वाली तथा पर्वतरुप स्तनों से युक्त पृथ्वी देवी ! तुम्हें नमस्कार है , तुम मेरे पादस्पर्श को क्षमा करो। इस कृत्य के पश्चात् मुख को धोएं, कुल्ला करें और फिर प्रातः स्मरण तथा भजन आदि करके श्री गणेश, लक्ष्मी, सूर्य, तुलसी, गाय, गुरु, माता, पिता , इष्टदेव एवं (घर के) वृद्धों को सादर प्रणाम करें।

प्रातः स्मरण-

उमा उषा च वैदेही रमा गंगेति पंचकम्।
प्रातरेव स्मरेन्नित्यं सौभाग्यं वर्द्धते सदा॥
सर्वमंगल मांगल्ये ! शिवे ! सर्वार्थसाधिके ।
शरण्ये ! त्र्यंबक ! गौरि नारायणि ! नमोऽस्तुते ॥
हे जिह्वेरससराज्ञे ! सर्वदा मधुरप्रिये !।
नारायणाख्यपीयूषं पिब जिह्वे ! निरंतरम्॥

शौच विधि –

यज्ञोपवीत को कंठी कर दाएं कर्ण में लपेटकर वस्त्र या आधी धोती से सिर ढांप लें। वस्त्राभाव में जनेऊ को सिर के ऊपर से लेकर बाएं कर्ण से पीछे करें। जल के पात्र को बाएं रख, दिन में उत्तर तथा रात्रि में दक्षिण की ओर मुख कर निम्नलिखित मंत्र बोलकर एवं मौनता बनाए रखकर मल-मूत्र का त्याग करें।

गच्छंतु ऋषयो देवाः पिशाचा ये च गुह्यकाः।
पितृभूतगणाः सर्वे करिष्ये मलमोचनम्॥

पात्र से जल लें , बाएं हाथ से गुदा धोकर लिंग में एक बार , गुदा में तीन बार मिट्टी लगाकर जल से शुद्ध करें। बाएं हाथ को अलग रखते हुए दाएं हाथ से लांग टांगकर उसी हाथ में पात्र लें । मिट्टी के तीन हिस्से करें। पहले से बायां हाथ दस बार , दूसरे ( हिस्से ) से दोनों हाथ सात बार और तीसरे से पात्र को तीन बार शुद्ध करें।

उसी पात्र से बारह से सोलह बार कुल्ले करें। अब दोनों पैरों को ( पहले बायां और फिर दायां ) तीन – तीन बार धोकर बची हुई मिट्टी धो दें। सूर्योदय से पूर्व एवं पश्चात् उत्तर की ओर मुख कर बारह बार कुल्ला करें।

दिन से रात्रि में आधी, यात्रा में चौथाई तथा आतुरकाल में यथाशक्ति शुद्धि करनी आवश्यक है। मल – त्याग के पश्चात् बारह बार, मूत्र – त्याग के बाद चार बार तथा भोजनोपरांत सोलह बार कुल्ला करें।

दंतधावन  विधि-

मुखशुद्धि किए बिना कोई भी मंत्र कभी फलदायक नहीं होता। अतः सूर्योदय से पहले और बाद में उत्तर अथवा दोनों समय पूर्वोत्तर कोण ( ईशान ) में मुंह करके दतुअन करें । मध्यमा , अनामिका अथवा अंगुष्ठ से दांत साफ करें । तर्जनी उंगली का कभी प्रयोग न करें । तत्पश्चात् प्रार्थना करें –

आयुर्बलं यशो वर्चः प्रजाः पशुवसूनि च। ब्रह्म प्रज्ञां च मेधां च त्वन्नो देहि वनस्पते॥

दुग्धवाले वृक्ष का बारह अंगुल का दतुअन (दातौन) धोकर उपर्युक्त प्रार्थना करें। फिर दतुअन को चीरकर जीभी करें और धोकर बायीं ओर फेंक दें।

स्नान विधि-

मानव – शरीर में नौ छिद्र प्रमुख होते हैं। रात्रि में शयन करने से वे अपवित्र हो जाते हैं । अतः प्रातः स्नान अवश्य करना चाहिए । गंगा आदि नदी में कभी दतुअन नहीं करना चाहिए। स्नानोपरांत गंगा आदि जलाशय में भीगे वस्त्र बदलने अथवा निचोड़ने नहीं चाहिए। निम्नलिखित मंत्र से वरुण की प्रार्थना करें –

अपामधिपतिस्त्वं च तीर्थेषु वसतिस्तव ।
वरुणाय नमस्तुभ्यं स्नानानुज्ञां प्रयच्छ मे ॥

पवित्र होकर एवं स्नानार्थ संकल्प करके निम्नलिखित मंत्र से मृत्तिका लगाएं। कटि (कमर)के नीचे , दाहिने हाथ तथा मंत्र से न लगाएं।

अश्वक्रांते रथक्रांते ! विष्णुक्रांते ! वसुंधरे ! ।
मृत्तिके ! हर मे पापं यन्मया दुष्कृतां कृतम् ॥

तीर्थावाहन –

पुष्कराद्यानि तीर्थानि गंगाद्या सरितस्तथा ।
आगच्छन्तु पवित्राणि स्नानकालं सदा मम् ॥

भागीरथी की प्रार्थना –

विष्णुपादाब्ज संभूते ! गंगे ! त्रिपथगामिनी ।
धर्मद्रवेति विख्याते ! पापं मे हर जाह्नवि ॥

नाभि तक जल में उतरकर सूर्य की ओर मुख करके (जल के ऊपर ब्रह्महत्या रहती है , इसलिए) जल हिलाकर एवं तीन गोते लगाकर स्नान करें। अच्छी तरह स्नान कर लेने पर निम्न मंत्र से जल के बाहर एक अंजलि दें।

यन्मया दूषितं तोयं मलैः शरीरसंभवेः ।
तस्य पापस्य शुद्धयर्थं यक्ष्माणं तर्पमाम्यहम् ॥

यदि घर में स्नान करें तो पूर्वाभिमुख हो पात्र से जल लेकर वरुण और गंगा आदि तीर्थो का आवाहन कर पांव तथा मुख धोकर स्नान करें । असमर्थ अवस्था में निम्न क्रिया करने से भी स्नान का फल होता ( मिलता ) है ।
मणिबंध , हाथ तथा घुटनों तक पैर धोकर एवं पवित्र होकर दोनों घुटनो के भीतर हाथ करके आचमन करने से स्नान के समान फल होता है ।

नूतन यज्ञोपवीत धारण विधि-
यज्ञोपवीत धारण करें । यदि मल – मूत्र का त्याग करते समय यज्ञोपवीत कान में टांगना भूल जाएं तो नया बदल लें। नए यज्ञोपवीत को जल द्वारा शुद्ध करके , दस बार गायत्री मंत्र से अभिमंत्रित कर निम्न मंत्रों से देवताओं का आवाहन करें –

प्रथमतंतौ – ॐ कारमावाहयामि
द्वितीयतंतौ – ॐ अग्निमावाहयामि
तृतीयतंतौ – ॐ सर्पानावाहयामि
चतुर्थतंतौ – ॐ सोममावाहयामि
पंचमतंतौ – ॐ पितृनावाहयामि
षष्ठतंतौ – ॐ प्रजापतिमावाहयामि
सप्तमतंतौ – ॐअनिलमावाहयामि
अष्टमतंतौ – ॐ सूर्यमावाहयामि
नवमतंतौ – ॐ विश्वान्देवानावाहयामि

ग्रंथिमध्ये – ॐ ब्रह्मणे नमः ब्रह्माणमावाहयामि
ॐ विष्णवे नमः विष्णुमावाहयामि
ॐ रुद्राय नमः रुद्रमावाहयामि

इस प्रकार आवाहन करके गंध और अक्षत से आवाहित देवताओं की पूजा करें तथा निम्नलिखित मंत्र से यज्ञोपवीत धारण का विनियोग करें –

विनियोग –

ॐ यज्ञोपवीतमिति मंत्रस्य परमेष्ठी ऋषिः, लिंगोक्ता देवता, त्रिष्टुपछन्दो यज्ञोपवीत धारणे विनियोगः।

तदनन्तर जनेऊ धोकर प्रत्येक बार निम्न मंत्र बोलते हुए एकेक कर धारण करें –

ॐ यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं प्रजापतेर्यत्सहजं पुरस्तात् ।
आयुष्मग्रयं प्रतिमुंच शुभ्रं यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः ॥

पुराने जनेऊ को कंठीकर सिर पर से पीठ की ओर निकालकर यथा – संख्य गायत्री मंत्र का जप करें –

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि। धियो यो नः प्रचोदयात्।

एतावददिन –

पर्यन्तं ब्रह्मत्वं धारितं मया ।
जीर्णत्वात् त्वत्परित्यागी गच्छ सूत्र ! यथासुखं ॥

अब आसनादि बिछाकर आचमन आदि क्रिया करें –

केशवाय ॐ नमः, ॐ नारायणाय नमः, ॐ माधवाय नमः

उपर्युक्त मंत्र बोलते हुए तीन बार आचमन करें । इसके पश्चात् अंगूठे के मूल से दो बार होंठों को पोंछकर ॐ गोविंदाय नमः। बोलकर हाथ धो लें। फिर दाएं हाथ की हथेली में जल लेकर कुशा से अथवा कुशा के अभाव में अनामिका और मध्यमा से , मस्तक पर जल छिड़कते हुए यह मंत्र पढ़ें –

ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपिवा ।
यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यंतरः शुचिः ॥

तदनन्तर निम्नलिखित मंत्र से आसन पर जल छिड़ककर दाएं हाथ से उसका स्पर्श करें –

ॐ पृथ्वि ! त्वया धृता लोका देवि त्वं विष्णुना धृता ।
त्वं च धारय मां देवि पवित्रं कुरु चासनम् ॥

शिखा की महत्ता –

मंत्र प्रयोगादि सभी कर्म शिखा बांधकर करने चाहिए । शास्त्रकारों ने भी शिखा ( चोटी ) को आवश्यक माना है । संस्कार भास्कर में शिखा के न होने पर कुश की शिखा बनाने की आज्ञा देकर उसे अनिवार्य बताया गया है । इसे इन्द्रयोनि भी कहते हैं । योगी लोग इसे सुषुम्ना का मूल स्थान कहते हैं । वैद्यादि इसे मस्तुमस्तिष्क कहते हैं । योगविद्या विशारद इसे ब्रह्मरन्ध्र कहते हैं । यह विषय कृत्रिम नहीं हैं , किन्तु सत्यता से युक्त प्राकृतिक है । अतः शिखा की महत्ता सर्वोपरि है ।

तिलक लगाना –

अंगुली द्वारा तिलक लगाने का विधान है । चंदनादि के अभाव में गंगाजल से तिलक करें । तिलक करने में अनामिका उंगली शांति देने वाली , मध्यमा आयु की वृद्धि करने वाली , अंगूठा पुष्टि देने वाला तथा तर्जनी मोक्ष प्रदान करने वाली है अतः पित्र कर्म में प्रधान मानी गयी है । वस्तुतः चकले पर घिसा चंदन नहीं लगाना , कुछ विद्वानों का ऐसा विचार है । निम्न मंत्र के द्वारा चंदन लगाने की क्रिया करें –

चंदनस्य महत् पुण्यं पाप – नाशनम् ।
आपदं हरते नित्यं लक्ष्मीस्तिष्ठति सर्वदा ॥

तिलक – धारण के संबंध में बतलाया गया है कि ललाट में केशव , कंठ में पुरुषोत्तम , हदय में बैकुंठ , नाभि में नारायण , पीठ में पदमनाभ , बाएं पार्श्व में विष्णु , दाएं पार्श्व में वामन , बाएं कर्ण में यमुना , दाएं कर्ण में गंगा , बायीं भुजा में कृष्ण , दायीं भुजा में हरि , मस्तक में ऋषिकेश एवं ग्रीवा में दामोदर का स्मरण करते हुए चंदन का तिलक लगाएं ।

भस्म धारण विधि –

प्रातः जल मिश्रित , मध्याह्न में चंदन मिश्रित और सायंकाल में सुखी भस्म लगाएं । बाएं हाथ में भस्म ले और दाएं हाथ से ढककर निम्न मंत्र से भस्म को अभिमंत्रित करें –

ॐ अग्निरिति भस्म
ॐ वायुरिति भस्म
ॐ जलमिति भस्म
ॐ स्थलमिति भस्म
ॐ व्योमेति भस्म
ॐ ह वा इदम् भस्म
ॐ मन एतानि चक्षूंषि भस्मानीति

अब निम्नलिखित मंत्र से सूचित स्थानों में भस्म लगाएं –

ललाट में – ॐ त्र्यायुषं जमदग्नेः
कंठ में – ॐ कश्यपस्य त्र्यायुषं
भुजाओं में – ॐ येवेषु त्र्यायुषं
हदय में – ॐ तन्नो अस्तु त्र्यायुषं

इसके पश्चात् संध्या – वंदना करें । यदि संध्या न आती हो तो गायत्री मंत्र द्वारा सूर्यनारायण को प्रातः सूर्योदय से पूर्व तीन , सूर्योदय के पश्चात् चार, मध्याह्न में यथा समय एक, बाद में दो और सायं यथासमय बाद तीन और बाद में चार अर्घ्य प्रदान करें।

तदनन्तर नीचे लिखे श्लोक से क्षमा – प्रार्थना करें –

गुह्यातिगुह्यगोप्त्री त्वं गृहाणामस्त्कृतं जपम् ।
सिद्धिर्भवतु मे देवि ! त्वत्प्रासादात् सुरेश्वरि ॥

इस प्रकार दैनिक प्रारंभिक नित्यकर्म करने के पश्चात् मंत्र साधना एवं प्रयोग में प्रवृत्त होना चाहिए।

शौच एवं स्नान के बाद शुद्ध वस्त्र पहन कर, पूजा के कमरे या मन्दिर में प्रवेश से पहले द्वार पर इन तीनों मंत्रों से तीन बार अपने कान स्पर्श करे –
ॐ केशवाय नमः, ॐ नारायणाय नमः, ॐ माधवाय नमः।
फिर बायें हाथ पर दायें हाथ से ताली बजा कर नम्रता से प्रवेश करे।

साधक एक जोड़ा शुद्ध यज्ञोपवीत*१* धारण किये हुए हो। बायें कंधे पर एक गमछा या उसके आभाव में एक और जनेऊ अर्थात् कुल तीन यज्ञोपवीत हों। पूर्व, उत्तर या पूर्वोत्तर दिशा की ओर मुख कर के आसन पर बैठ कर सर्वप्रथम जल मे सभी नदियों का आवाहन करे-

हरि ॐ गंगे च यमुने चैव गोदावरी सरस्वती। नर्मदे सिन्धु कावेरी जले अस्मिन् सन्निधिम् कुरु॥
सर्वाणि तीर्थानि अश्विन पात्रे शु संनि दोऊ भव:।

मार्जन करे मार्जन के विनियोग का मन्त्र पढ़कर जल छोड़े (विनियोग का जल छोटी-चम्मच से छोड़े जिसे आचमनी कहते हैं) –

ॐ अपवित्रः पवित्रो वेत्यस्य वामदेव ऋषिः, विष्णुर्देवता, गायत्रीच्छन्दः, हृदि पवित्रकरणे विनियोगः।

मार्जन का मन्त्र पढ़कर अपने शरीर एवं सामग्री पर जल छिड़के (तीन कुश या तीन अँगुलियों से) –

ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा।
यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः॥

आसन पवित्र करने के मंत्र का विनियोग पढ़कर जल गिराए –

ॐ पृथ्वीति मन्त्रस्य मेरुपृष्ठ ऋषिः, सुतलं छन्दः, कूर्मो देवता, आसन पवित्रकरणे विनियोगः।

अब आसन पर जल छिड़क कर दायें हाथ से उसका स्पर्श करते हुए आसन पवित्र करने का मंत्र पढ़े –

ॐ पृथ्वि! त्वया धृता लोका देवि! त्वं विष्णुना धृता।
त्वं च धारय मां देवि! पवित्रं कुरु चासनम्॥

अब अपनी सम्प्रदाय की मर्यादा के अनुसार साधक तिलक करे, अन्यथा

“त्र्युषं जमदग्नेः”
कह कर ललाट में तिलक करे (कश्यपस्य त्र्यायुषम् इस मंत्र से गले में, यद्देवेषु त्र्यायुषम् इस मंत्र से दोनों भुजाओं के मूल में और तन्नोऽस्तु त्र्यायुषम् इस मंत्र से हृदय में भस्म लगाए)।

आचमन –

ॐ केशवाय नमः, ॐ नारायणाय नमः, ॐ माधवाय नमः

इन तीनों मंत्रो को पढ़कर प्रत्येक मंत्र से एक बार, कुल तीन बार जल से आचमन करे*२*।
ॐ गोविन्दाय नमः बोलते हुए हाथ धो ले।
ॐ हृषीकेशाय नमः बोल कर दायें हाथ के अँगूठे से मूल भाग से दो बार ओठ पोंछ ले। तत्पश्चात् भीगी हुई अंगुलियों से मुख आदि का स्पर्श करे। मध्यमा-अनामिका से मुख, तर्जनी-अंगुष्ठ से नासिका, मध्यमा-अंगुष्ठ से नेत्र, अनामिका-अंगुष्ठ से कान, कनिष्ठका-अंगुष्ठ से नाभि, दाहिने हाथ से हृदय, पाँचों अंगुलियों से सिर, पाँचों अंगुलियों से दाहिनी बाँह और बायीं बाँह का स्पर्श करे।

दोनों हाथों में कुशों की पवित्री या सोने या चाँदी या ताम्बे की अँगूठी पहने। अँगूठी यदि पहले से पहनी हुई हो तो उसका स्पर्श करते हुए इस मंत्र को पढ़े –

ॐ पवित्रे स्थो वैष्णव्यौ सवितुर्वः प्रसव उत्पुनाम्यच्छिद्रेण पवित्रेण सूर्यस्य रश्मिभिः।
तस्य ते पवित्रपते पवित्रपूतस्य यत्कामः पुने तच्छकेयम्॥

अब ॐ के साथ गायत्री मंत्र या इस –

चिद्’रूपिणि महामाये! दिव्यतेजःसमन्विते।
तिष्ठ देवि! शिखामध्ये तेजोवृद्धिं कुरुष्व मे॥

मंत्र से शिखा बाँध ले, यदि शिखा पहले से बँधी हो तो उसका स्पर्श कर ले। ईशान दिशा की ओर मुख करके आचमन करे।

नीचे लिखा संकल्प पढ़कर दल भूमि पर गिरा दे –

हरिः ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः अद्यब्रह्मणोऽह्नि द्वितीयपरार्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे जम्बूद्वीपे भरतखण्डे आर्यावर्तैकदेशान्तर्गते पुण्यक्षेत्रे कलियुगे कलिप्रथमचरणे अमुकसंवत्सरे अमुकमासे अमुकपक्षे अमुकतिथौ अमुकवासरे अमुकगोत्रोत्पन्नः अमुक शर्मा(ब्राह्मण)/वर्मा(क्षत्रिय)/गुप्ता(वैश्य) अहं ममोपात्तदुरितक्षयपूर्वकं श्रीपरमेश्वरप्रीत्यर्थं प्रातः संध्योपासनं करिष्ये।

नीचे लिखा विनियोग पढ़कर पृथ्वी पर जल छोड़े –

ऋतं चेति त्र्यृचस्य माधुच्छन्दसोऽघर्षण ऋषिः अनुष्टुप् छन्दो भाववृत्तं दैवतमपामुपस्पर्शने विनियोगः॥

नीचे लिखा मंत्र पढ़कर आचमन करे –

ॐ ऋतं च सत्यं चाभीद्धात्तपसोऽध्यजायत। ततो रात्र्यजायत। ततः समुद्रो अर्णवः। समुद्रादर्णवादधिसंवत्सरो अजायत। अहोरात्रणि विदधद् विश्वस्य मिषतो वशी। सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वकल्पयत्। दिवं च पृथिवीं चान्तरिक्षमथो स्वः॥

अब ॐ के साथ गायत्री मन्त्र पढ़कर रक्षा के लिए अपने चारों ओर जल छिड़के।

नीचे लिखा विनियोग पढ़कर पृथ्वी पर जल छोड़े –

ॐकारस्य ब्रह्मा ऋषिः गायत्री छन्दोऽग्निर्देवता शुक्लो वर्णः सर्वकर्मारम्भे विनियोगः॥

नीचे लिखा विनियोग पढ़कर पृथ्वी पर जल छोड़े –

सप्तव्याहृतीनां विश्वामित्रजमदग्निभरद्वाजगौतमात्रिवसिष्ठकश्यपाऋषयो गायत्र्युष्णिगनुष्टुब्बृहती-पङ्क्तित्रिष्टुब्जगत्यश्छन्दांस्यग्निवाय्वादित्य-बृहस्पतिवरुणेन्द्रविश्वेदेवा देवता अनादिष्टप्रायश्चित्ते प्राणायामे विनियोगः॥

नीचे लिखा विनियोग पढ़कर पृथ्वी पर जल छोड़े –

गायत्र्या विश्वामित्र ऋषिः गायत्री छन्दः सविता देवता अग्निर्मुखमुपनयने प्राणायामे विनियोगः॥

नीचे लिखा विनियोग पढ़कर पृथ्वी पर जल छोड़े –

शिरसः प्रजापतिः ऋषिस्त्रिपदा गायत्री छन्दो ब्रह्माग्निवायुसूर्या देवता यजुः प्राणायामेविनियोगः॥

अब नीचे लिखे मंत्र से तीन बार प्राणायाम करे। पूरक में नीलवर्ण विष्णु का ध्यान (नाभी देश में) करे। कुम्भक में रक्तवर्ण ब्रह्मा (हृदय में) का ध्यान करे। रेचक में श्वेतवर्ण शंकर का (ललाट में) ध्यान करे। प्रत्येक भगवान् के लिए तीन या एक बार प्राणायाम मंत्र पढ़े।

प्राणायाम मंत्र –

ॐ भूः ॐ भुवः ॐ स्वः ॐ महः ॐ जनः ॐ तपः ॐ सत्यम् ॐ तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्। ॐ आपो ज्योती रसोऽमृतं ब्रह्म भूर्भुवः स्वरोम्॥

प्रातःकाल का विनियोग और मंत्र –
नीचे लिखा विनियोग पढ़कर पृथ्वी पर जल छोड़े –

सूर्यश्च मेति ब्रह्मा ऋषिः प्रकृतिश्छन्दः सूर्यो देवता अपामुपस्पर्शने विनियोगः॥

नीचे लिखा मंत्र पढ़कर आचमन करे –

ॐ सूर्यश्च मा मन्युश्च मन्युपतयश्च मन्युकृतेभ्यः पापेभ्यो रक्षन्ताम्। यद्रात्र्या पापमकार्षं मनसा वाचा हस्ताभ्यां पद्भ्यामुदरेण शिश्ना रात्रिस्तदवलुम्पतु। यत्किञ्च दुरितं मयि इदमहं माममृतयोनौ सूर्ये ज्योतिषि जुहोमि स्वाहा॥

नीचे लिखा विनियोग पढ़कर पृथ्वी पर जल छोड़े –

आपो हि ष्ठेत्यादित्र्यृचस्य सिन्धुद्वीप ऋषिर्गायत्री छन्द आपो देवता मार्जने विनियोगः॥

अब नीचे लिखे ९ मंत्रों से मार्जन करे। ७ पदों से सिर पर जल छोड़े, ८वें से भूमि पर और ९वें पद से फिर सिर पर तीन कुशों अथवा तीन अंगुलियों से मार्जन करे –

ॐ आपो हि ष्ठा मयो भुवः।
ॐ ता न ऊर्जे दधातन।
ॐ महे रणाय चक्षसे।
ॐ यो वः शिवतमो रसः।
ॐ तस्य भाजयतेह नः।
ॐ उशतीरिव मातरः।
ॐ तस्मा अरं गमाम वः।
ॐ यस्य क्षयाय जिन्वथ।
ॐ आपो जनयथा च नः॥

नीचे लिखा विनियोग पढ़कर पृथ्वी पर जल छोड़े –

द्रुपदादिवेत्यस्य कोकिलो राजपुत्र ऋषिः अनुष्टुप् छन्द आपो देवता सौत्रामण्यवभृथे विनियोगः॥

अब बायें हाथ में जल लेकर दाहिने हाथ से उसे ढक कर, नीचे लिखे मन्त्र को तीन बार पढ़े, फिर उस जल को सिर पर छिड़क ले –

ॐ द्रुपदादिव मुमुचानः स्विन्नः स्नातो मलदिव। पूतं पवित्रेणेवाज्यमापः शुन्धन्तु मैनसः॥

नीचे लिखा विनियोग पढ़कर पृथ्वी पर जल छोड़े –

झऋतञ्चेति त्र्यृचस्य माधुच्छन्दसोऽघमर्षण ऋषिः अनुष्टुप् छन्दो भाववृत्तं दैवतमघमर्षणे विनियोगः॥

अब दाहिने हाथ में जल लेकर नाक से लगाकर, नीचे लिखे मन्त्र को तीन या एक बार पढ़े, फिर अपनी बाईं ओर जल पृथ्वी पर छोड़ दे। (मन में यह भावना करे कि यह जल नासिका के बायें छिद्र से भीतर घुसकर अन्तःकरण के पापको दायें छिद्र से निकाल रहा है, फिर उस जल की ओर दृष्टि न डालकर अपनी बायीं ओर शिला की भावना करके उस पर पाप को पटक कर नष्ट कर देने की भावना से जल उस पर फेंक दे।)

ॐ ऋतं च सत्यं चाभीद्धात्तसोऽध्यजायत। ततो रात्र्यजायत। ततः समुद्रो अर्णवः। समुद्रादर्णवादधिसंवत्सरो अजायत। अहोरात्राणि विदधद्विश्वस्य मिषतो वशी। सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत्। दिवं च पृथिवीं चान्तरिक्षमथो स्वः॥

नीचे लिखा विनियोग पढ़कर पृथ्वी पर जल छोड़े –

अन्तश्चरसीति तिरश्चिन ऋषिः अनुष्टुप् छन्द आपो देवता अपामुपस्पर्शने विनियोगः॥

नीचे लिखा मंत्र पढ़कर एक बार आचमन करे –

ॐ अन्तश्चरसि भूतेषु गुहायां विश्वतोमुखः।
त्वं यज्ञस्त्वं वषट्कार आपो ज्योती रसोऽमृतम्॥

नीचे लिखा विनियोग केवल पढ़े जल न छोड़े –

ॐकारस्य ब्रह्म ऋषिः देवी गायत्री छन्दः परमात्मा देवता, तिसृणां महाव्याहृतीनां प्रजापतिर्ऋषिः गायत्र्युष्णिगनुष्टुभश्छन्दांस्यग्निवायुसूर्या देवताः, तत्सवितुरिति विश्वामित्र ऋषिर्गायत्री छन्दः सविता देवता सूर्यार्घ्यदाने विनियोगः॥

अब प्रातःकाल की संध्या में सूर्य के सामने खड़ा हो जाए। एक पैर की एड़ी उठाकर तीन बार गायत्री मंत्र का जप करके पुष्प मिले हुए जल से सूर्य को तीन अंजलि जल दे। प्रातःकाल का अर्घ्य जल में देना चाहिए यदि जल न हो तो स्थल को अच्छी तरह जल से धो कर उस पर अर्घ्य का जल गिराए।

गायत्री मन्त्र –
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि। धियो यो नः प्रचोदयात्।

इस मंत्र को पढ़कर ब्रह्मस्वरूपिणे सूर्यनारायणाय इदमर्घ्यं दत्तं न मम कह कर प्रातःकाल अर्घ्य समर्पण करे।

अब नीचे लिखा विनियोग पढ़कर पृथ्वी पर जल छोड़े –

उद्वयमित्यस्य प्रस्कण्व ऋषिः अनुष्टुप् छन्दः सूर्यो देवता सूर्योपस्थाने विनियोगः॥

नीचे लिखा विनियोग पढ़कर पृथ्वी पर जल छोड़े –

उदुत्यमिति प्रस्कण्व ऋषिर्निचृद्गायत्री छन्दः सूर्यो देवता सूर्योपस्थाने विनियोगः॥

नीचे लिखा विनियोग पढ़कर पृथ्वी पर जल छोड़े –

चित्रमिति कुत्साङ्गिरस ऋषिस्त्रिष्टुप् छन्दः सूर्यो देवता सूर्योपस्थाने विनियोगः॥

नीचे लिखा विनियोग पढ़कर पृथ्वी पर जल छोड़े-

तच्चक्षुरिति दध्यङ्ङाथर्वण ऋषिरेकाधिका ब्राह्मी त्रिष्टुप् छन्दः सूर्यो देवता सूर्योपस्थाने विनियोगः॥

प्रातःकाल की संध्या में अंजलि बाँधकर यदि संभव हो तो सूर्य को खड़े होकर देखते हुए प्रणाम करे-

ॐ उद्वयं तमसस्परि स्वः पश्यन्त उत्तरम्। देवं देवत्रा सूर्यमगन्म ज्योतिरुत्तमम्॥
ॐ उदुत्यं जातवेदसं देवं वहन्ति केतवः। दृशे विश्वाय सूर्यम्॥
ॐ चित्रं देवानामुदगादनीकं चक्षुर्मित्रस्य वरुणस्याग्नेः। आप्रा द्यावापृथिवी अन्तरिक्ष ग्वँग् सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च॥
ॐ तच्चक्षुर्देवहितं पुरस्ताच्छुक्रमुच्चरत्। पश्येम शरदः शतं जीवेम शरदः शतं ग्वँग् शृणुयाम शरदः शतं प्रब्रवाम शरदः शतमदीनाः स्याम शरदः शतं भूयश्च शरदः शतात्॥

अब बैठ कर अंगन्यास करे, दाहिने हाथ की पाँचों अंगुलियों से “हृदय” आदि का स्पर्श करे –
ॐ हृदयाय नमः। (हृदय का स्पर्श)
ॐ भूः शिरसे स्वाहा। (मस्तक का स्पर्श)
ॐ भुवः शिखायै वषट्। (शिखा का स्पर्श)
ॐ स्वः कवचाय हुम्। (दाहिने हाथ की उँगलियों से बायें कंधे का और बायें हाथ की उँगलियों से दायें कंधे एक साथ स्पर्श करे)
ॐ भूर्भुवः नेत्राभ्यां वौषट्। (दोनों नेत्रों और ललाट के मध्य भाग का स्पर्श)
ॐ भूर्भुवः स्वः अस्त्राय फट्। (यह मंत्र पढ़कर दाहिने हाथ को सिर के ऊपर से बायीं ओर से पीछे की ओर ले जाकर दाहिनी ओर से आगे की ओर ले आये और तर्जनी तथा मध्यमा उँगलियों से बायें हाथ की हथेली पर ताली बजाये।)

नीचे लिखा विनियोग पढ़कर पृथ्वी पर जल छोड़े –

ॐकारस्य ब्रह्मा ऋषिः गायत्री छन्दो अग्निर्देवता शुक्लो वर्णो जपे विनियोगः॥

नीचे लिखा विनियोग पढ़कर पृथ्वी पर जल छोड़े –

त्रिव्याहृतीनां प्रजापति ऋषिः गायत्र्युष्णिगनुष्टुभश्छन्दांस्यग्निवाय्वादित्या देवता जपे विनियोगः॥

नीचे लिखा विनियोग पढ़कर पृथ्वी पर जल छोड़े –

गायत्र्या विश्वामित्र ऋषिः गायत्री छन्दः सविता देवता जपे विनियोगः॥

नीचे लिखे मंत्र को पढ़कर इसके अनुसार गायत्री देवी का ध्यान करे–

ॐ श्वेतवर्णा समुद्दिष्टा कौशेयवसना तथा।
श्वेतैर्तिलेपनैः पुष्पैरलंकारैश्च भूषिता॥
आदित्यमण्डलस्था च ब्रह्मलोकगताथवा।
अक्षसूत्रधरा देवी पद्मासनगता शुभा॥

नीचे लिखा विनियोग पढ़कर पृथ्वी पर जल छोड़े –

ॐ तेजोऽसीति धामनामासीत्यस्य च परमेष्ठी प्रजापतिर्ऋषिर्यजुस्त्रिष्टुबृगुष्णिहौ छन्दसी सविता देवता गायत्र्यावाहने विनियोगः॥

नीचे लिखे मंत्र से विनयपूर्वक गायत्री देवी का आवाहन करे –

ॐ तेजोऽसि शुक्रमस्यमृतमसि। धामनामासि प्रियं देवानामनाधृष्टं देवयजनमसि॥

नीचे लिखा विनियोग पढ़कर पृथ्वी पर जल छोड़े –

ॐ गायत्र्यसीति विवस्वान् ऋषिः स्वराण्महापङ्क्तिश्छन्दः परमात्मा देवता गायत्र्युपस्थाने विनियोगः॥

अब नीचे लिखे मंत्र से गायत्री देवी को प्रणाम करे –

ॐ गायत्र्यस्येकपदी द्विपदी त्रिपदी चतुष्पद्यपदसि। न हि पद्यसे नमस्ते तुरीयाय दर्शताय पदाय परोरजसेऽसावदो मा प्रापत्॥

नीचे लिखा विनियोग पढ़कर पृथ्वी पर जल छोड़े –

ॐकारस्य ब्रह्म ऋषिः देवी गायत्री छन्दः परमात्मा देवता, तिसृणां महाव्याहृतीनां प्रजापतिर्ऋषिः गायत्र्युष्णिगनुष्टुभश्छन्दांस्यग्निवायुसूर्या देवताः, तत्सवितुरिति विश्वामित्र ऋषिर्गायत्री छन्दः सविता देवता जपे विनियोगः॥

फिर सूर्य की ओर मुख करके, कम-से-कम १०८ बार गायत्री-मंत्र का जप करे–

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि। धियो यो नः प्रचोदयात् ॐ।

नीचे लिखा विनियोग पढ़कर पृथ्वी पर जल छोड़े –

विश्वतश्चक्षुरिति भौवन ऋषिस्त्रिष्टुप् छन्दो विश्वकर्मा देवता सूर्यप्रदक्षिणायां विनियागः।

अब नीचे लिखे मन्त्र से अपने स्थान पर खड़े होकर सूर्य देव की एक प्रदक्षिणा करे –

ॐ विश्वतश्चक्षुरुत विश्वतोमुखो विश्वतोबाहुरुत विश्वतस्पात्।
सम्बाहुभ्यां धमति सम्पतत्रैर्द्यावाभूसी जनयन् देव एकः॥

नीचे लिखा विनियोग पढ़कर पृथ्वी पर जल छोड़े –

ॐ देवा गातुविद इति मनसस्पतिर्ऋषिर्विराडनुष्टुप् छन्दो वातो देवता जपनिवेदन विनियोगः।

अब नमस्कार करे –

ॐ देवा गातुविदो गातुं वित्त्वा गातुमित मनसस्पत इमं देव यज्ञ ग्वँग् स्वाहा व्वाते धाः।

अब नीचे लिखा मंत्र पढ़े –

अनेन यथाशक्तिकृतेन गायत्रीजपाख्येन कर्मणा भगवान् सूर्यनारायणः प्रीयतां न मम।

अब विसर्जन के विनियोग का मंत्र पढ़े –

उत्तमे शिखरे इति वामदेव ऋषिः अनुष्टुप् छन्दः गायत्री देवता गायत्रीविसर्जने विनियोगः।

विसर्जन मंत्र –

ॐ उत्तमे शिखरे देवी भूम्यां पर्वतमूर्धनि।
ब्रह्मणेभ्योऽभ्यनुज्ञाता गच्छ देवि यथासुखम॥

अब नीचे लिखा वाक्य पढ़कर संध्योपासन कर्म परमेश्वर को समर्पित करे-

अनेन संध्योपासनाख्येन कर्मणा श्रीपरमेश्वरः प्रीयतां न मम। ॐ तत्सत् श्रीब्रह्मार्पणमस्तु।

अब भगवान् का स्मरण करे-

यस्य स्मृत्या च नामोक्त्या तपोयज्ञक्रियादिषु।
न्यूनं सम्पूर्णतां याति सद्यो वन्दे तमच्युतम्॥

ॐ श्रीविष्णवे नमः॥ ॐ श्रीविष्णवे नमः॥ ॐ श्रीविष्णवे नमः॥
॥ श्रीविष्णुस्मरणात् परिपूर्णतास्तु॥

॥इति॥

Sandhya Vandana Vidhi संध्या वंदना करने की विधि

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