नवदुर्गा- संपूर्ण कथा प्रथम शैलपुत्री | Navadurga

प्रथम शैलपुत्री

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प्रथम शैलपुत्री

नवदुर्गा- प्रथम शैलपुत्री

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सनातन संस्कृति मे पौराणिक कथाओं के साथ-साथ मंत्र, आरती और पुजा-पाठ का विधि-विधान पूर्वक वर्णन किया गया है। यहाँ पढ़े:-

दुर्गाजी पहले स्वरूप में ‘शैलपुत्री‘ के नाम से ही जानी जाती हैं। यह ही नवदुर्गाओं में प्रथम दुर्गा हैं। शैलराज हिमालय के घर पुत्री रूप में उत्पन्न होने के कारण ही इनका नाम ‘शैलपुत्री’ पड़ा। नवरात्र पूजन में प्रथम दिन इन्हीं देवी की पूजा और उपासना की जाती है। इनका वाहन वृषभ है, इसलिए यह देवी जगत में वृषारूढ़ा के नाम से भी जानी जाती हैं। इस देवी ने अपने दाएँ हाथ में त्रिशूल धारण कर रखा है और इनके बाएँ हाथ में कमल सुशोभित है। पूर्व जन्म मे यह सती के नाम से जानी जाती थी।

मन्त्र:

वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम्‌।
वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्‌ ॥


शैलपुत्री मां बैल असवार।
करें देवता जय जयकार॥

शिव शंकर की प्रिय भवानी।
तेरी महिमा किसी ने ना जानी॥

पार्वती तू उमा कहलावे। ‌
जो तुझे सिमरे सो सुख पावे॥

ऋद्धि-सिद्धि परवान करे तू।
दया करे धनवान करे तू॥

सोमवार को शिव संग प्यारी।
आरती तेरी जिसने उतारी॥

उसकी सगरी आस पुजा दो।
सगरे दुख तकलीफ मिला दो॥

घी का सुंदर दीप जला‌ के।
गोला गरी का भोग लगा के॥

श्रद्धा भाव से मंत्र गाएं।
प्रेम सहित फिर शीश झुकाएं॥

जय गिरिराज किशोरी अंबे।
शिव मुख चंद्र चकोरी अंबे॥

मनोकामना पूर्ण कर दो।
भक्त सदा सुख संपत्ति भर दो॥

॥ इति मां शैलपुत्री आरती संपूर्णम् ॥

Maa Shailputri Aarti In English


Shailputri Maa Bail Aswaar.
Kare Devta Jay Jaykaar.

Shiv Shankar Ki Priya Bhwani.
Teri Mahima Kisi Ne Na Jaani.

Parvati Tu Uma Kahlaave.
Jo Tujhe Simre So Sukh Paave.

Ridhi Sidhi Parvaan Kare Tu.
Daya Kare Dhanvaan Kare Tu.

Somvaar Ko Shiv Sang Pyaari.
Aarti Teri Jisne Utaari.

Uski Sagri Aas Puja Do.
Sagre Dukh Takleef Mila Do.

Ghee Ka Sundar Deep Jla Ke.
Gola Gari Ka Bhog Lga Ke.

Shrdha Bhaav Se Mantr Gaaye.
Prem Sahit Fir Seesh Jhukaaye.

Jay Giriraaj Kishori Ambe.
Shiv Mukh Chandr Chakori Ambe.

Manokamna Purn Kar Do.
Bhakt Sda Sukh Sampati Bhar Do.

!! Iti Maa Shailputri Aarti !!

कहानी:

पौराणिक कथाओं और शास्त्रों के अनुसार एक बार जब देवी सती के पिता प्रजापति दक्ष ने यज्ञ किया तो उन्होंने सभी देवताओ और ऋषियों सहित अपने सभी मित्र और सगे संबंधीयो को निमन्त्रित किया, पर अहंकार वस अपने दामाद भगवान शंकर को निमंत्रण नहीं भेजा। उधर जब सती को अपने पिता द्वारा विसाल यज्ञ करवाने की सुचना मिली तो सती अपने पिता के यज्ञ में जाने के लिए विकल हो उठीं।

तब शंकरजी ने कहा कि प्रजापति दक्ष ने सारे देवताओं को निमन्त्रित किया गया है, परन्तु उन्हें निमन्त्रित नहीं किया। ऐसे में वहाँ जाना उचित नहीं है। परन्तु सती शिव जी के वचनों से सन्तुष्ट नहीं हुईं। और वहॉं जाने का हठ कर बैठी। पिता का यज्ञ देखने, वहाँ जाकर माता और बहनों से मिलने की उनकी व्यग्रता किसी प्रकार भी कम न हो सकी।

सती का प्रबल आग्रह देखकर शंकरजी ने उन्हें यज्ञ में जाने की अनुमति तो दे दी परन्तु सती के प्रति चिन्तित भी होने लगें। उधर सती जब पिता के घर पहुँचीं तो उन्होंन देखा कि कोई भी उनसे आदर और प्रेम के साथ बातचीत नहीं कर रहा है। सारे लोग मुँह फेरे हुए हैं। सिर्फ माँ ने ही उन्हें स्नेह दिया। साथ ही सभी बहनों की बातों में भी व्यंग्य और उपहास के भाव थे। और भगवान शंकर के प्रति भी तिरस्कार का भाव था।

उधर पिता दक्ष ने भी भगवान शंकर प्रति अपमानजनक वचन कहे। इससे सती को अत्यन्त क्लेश पहुँचा। यह सब देखकर सती का हृदय क्षोभ, ग्लानि और क्रोध से संतप्त हो उठा। उन्होंने सोचा भगवान शंकरजी की बात न मान, यहाँ आकर मैंने बहुत बड़ी गलती की है। वे अपने पति का वहॉं इतना अपमान न सह सकीं और योगाग्नि द्वारा अपने-आप को उसी यज्ञ कुण्ड में जलाकर भस्म कर लिया। तभी वहॉं एक विशाल विस्फोट हुआ और सती के अंग के टुकड़े इधर-उधर फैल गये।
[इससे संबंधित हमारा अन्य लेख पढ़े:- देवी शक्तिपीठ]

वज्रपात के समान इस दारुण-दुःखद घटना की सुचना जव भगवान शंकर को लगी। तब इस दारुण दुख से व्यथित होकर शंकर भगवान ने ताण्डव करते हुये अत्यंत क्रुद्ध हो अपने गणों को भेजकर दक्ष के उस यज्ञ का पूर्णतः विध्वंस करा दिया। यही सती अगले जन्म में शैलराज हिमालय की पुत्री के रूप में जन्मी और शैलपुत्री कहलाईं। शैलपुत्री का विवाह भी फिर से भगवान शंकर से हुआ। शैलपुत्री शिव की अर्द्धांगिनी बनीं। इनका महत्व और शक्ति अनन्त है।

अन्य नाम: सती, पार्वती, वृषारूढ़ा, हेमवती और भवानी भी इन्ही देवी के अन्य नाम हैं।

प्रथम शैलपुत्री

Navadurga- First Shailputri

हिन्दीEnglish

Durgaji is known in the first form by the name of ‘Shailputri’. She is the first Durga among the Navadurgas. She was named ‘Shailputri’ because of being born as a daughter in the house of Shailraj Himalaya. This goddess is worshiped and worshiped on the first day of Navratri Puja. Her vehicle is Taurus, hence she is also known as Vrisharudha in the goddess world. This goddess holds a trident in her right hand and a lotus is adorned in her left hand. In her previous birth she was known as Sati.

Mantra:

Vande Vanchitlabhai Chandradhakritshekharam.
Vrisharudhan Shooldharan Shailputrin Yashaswinim.

Story:

According to mythology and scriptures, once when Sati’s father Prajapati Daksha performed a yagna, he invited all his friends and relatives including all the gods and sages, but arrogantly did not send the invitation to his son-in-law Lord Shankar. On the other hand, when Sati got the information of her father to perform a huge yagya, Sati was determined to go to her father’s yagya.

Then Shankarji said that Prajapati Daksha has invited all the gods, but did not invite them. So it is not advisable to go there. But Sati was not satisfied with the words of Shiva. And she insisted on going there. His eagerness to see his father’s yajna, go there and meet his mother and sisters could not be reduced in any way.

Seeing the strong request of Sati, Shankarji gave her permission to go to the yagya but also started worrying about Sati. On the other hand, when Sati reached her father’s house, she saw that no one was talking to her with respect and love. All the people are turned away. Only mother gave him affection. Indeed, there was a sense of sarcasm and ridicule in the words of all the sisters. And there was also a feeling of contempt for Lord Shankar.

On the other hand, father Daksha also said derogatory words towards Lord Shankar. This caused great distress to Sati. Seeing all this, Sati’s heart was filled with anger, guilt and anger. He thought that do not listen to Lord Shankarji, I have made a big mistake by coming here. She could not bear the humiliation of her husband there and burnt herself to ashes in the same yajna kund with the help of Yogagni. Then there was a huge explosion and the pieces of Sati’s body were spread here and there.
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Like a thunderbolt, when Lord Shankar came to know about this sad and tragic incident. Then, being distressed by this terrible misery, Lord Shankar became very angry while doing a tandava and sent his ganas and completely destroyed that yajna of Daksha. This Sati was born in the next life as the daughter of Shailraj Himalaya and was called Shailputri. Shailputri also got married again to Lord Shankar. Shailputri became the consort of Shiva. Their importance and power is infinite.

Other names: Sati, Parvati, Vrisharuda, Hemavati and Bhavani are also other names of this goddess.

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