वाल्मीकि रामायण- अरण्यकाण्ड सर्ग- १-११

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॥ श्री गणेशाय नमः ॥
॥ श्री कमलापति नम: ॥
॥ श्री जानकीवल्लभो विजयते ॥
॥ श्री वाल्मीकि रामायण ॥
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वाल्मीकि रामायण
(भावार्थ सहित)
सब एक ही स्थान पर

अरण्यकाण्ड सर्ग- १-११

अरण्यकाण्डम्
प्रथमः सर्गः (सर्ग 1)

( श्रीराम, लक्ष्मण और सीता का तापसों के आश्रम मण्डल में सत्कार )

श्लोक:
प्रविश्य तु महारण्यं दण्डकारण्यमात्मवान्।
रामो ददर्श दुर्धर्षस्तापसाश्रममण्डलम्॥१॥

भावार्थ :-
दण्डकारण्य नामक महान् वन में प्रवेश करके मन को वश में रखने वाले दुर्जय वीर श्रीराम ने तपस्वी मुनियों के बहुत-से आश्रम देखे॥१॥

श्लोक:
कुशचीरपरिक्षिप्तं ब्राह्मया लक्ष्या समावृतम्।
यथा प्रदीप्तं दुर्दर्श गगने सूर्यमण्डलम्॥२॥

भावार्थ :-
वहाँ कुश और वल्कल वस्त्र फैले हुए थे। वह आश्रम मण्डल ऋषियों की ब्रह्मविद्या के अभ्यास से प्रकट हुए विलक्षण तेज से व्याप्त था, इसलिये आकाश में प्रकाशित होने वाले दुर्दर्श सूर्य-मण्डल की भाँति वह भूतल पर उद्दीप्त हो रहा था। राक्षस आदि के लिये उसकी ओर देखना भी कठिन था॥२॥

श्लोक:
शरण्यं सर्वभूतानां सुसम्मृष्टाजिरं सदा।
मृगैर्बहुभिराकीर्णं पक्षिसंघैः समावृतम्॥३॥

भावार्थ :-
वह आश्रमसमुदाय सभी प्राणियों को शरण देने वाला था। उसका आँगन सदा झाड़ने-बुहारने से स्वच्छ बना रहता था। वहाँ बहुत-से वन्य पशु भरे रहते थे और पक्षियों के समुदाय भी उसे सब ओर से घेरे रहते थे॥३॥

श्लोक:
पूजितं चोपनृत्तं च नित्यमप्सरसां गणैः ।
विशालैरग्निशरणैः स्रग्भाण्डैरजिनैः कुशैः॥४॥
समिद्भिस्तोयकलशैः फलमूलैश्च शोभितम्।
आरण्यैश्च महावृक्षैः पुण्यैः स्वादुफलैर्वृतम्॥५॥

भावार्थ :-
वहाँ का प्रदेश इतना मनोरम था कि वहाँ अप्सराएँ प्रतिदिन आकर नृत्य करती थीं। उस स्थान के प्रति उनके मन में बड़े आदर का भाव था। बड़ी-बड़ी अग्निशालाएँ, सुवा आदि यज्ञपात्र, मृगचर्म, कुश,
समिधा, जलपूर्ण कलश तथा फल-मूल उसकी शोभा बढ़ाते थे। स्वादिष्ट फल देने वाले परम पवित्र तथा बड़े-बड़े वन्य वृक्षों से वह आश्रममण्डल घिरा हुआ था॥४-५॥

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वाल्मीकि रामायण- अरण्यकाण्ड सर्ग- २

अरण्यकाण्डम्
द्वितीयः सर्गः (सर्ग 2)

( वन के भीतर श्रीराम, लक्ष्मण और सीता पर विराध का आक्रमण )

श्लोक:
कृतातिथ्योऽथ रामस्तु सूर्यस्योदयनं प्रति।
आमन्त्र्य स मुनीन् सर्वान् वनमेवान्वगाहत॥१॥

भावार्थ :-
रात्रि में उन महर्षियों का आतिथ्य ग्रहण करके सबेरे सूर्योदय होने पर समस्त मुनियों से विदा ले श्रीरामचन्द्रजी पुनः वन में ही आगे बढ़ने लगे॥१॥

श्लोक:
नानामृगगणाकीर्णमृक्षशार्दूलसेवितम्।
ध्वस्तवृक्षलतागुल्मं दुर्दर्शसलिलाशयम्॥२॥
निष्कूजमानशकुनिं झिल्लिकागणनादितम्।
लक्ष्मणानुचरो रामो वनमध्यं ददर्श ह॥३॥

भावार्थ :-
जाते-जाते लक्ष्मणसहित श्रीराम ने वन के मध्यभाग में एक ऐसे स्थान को देखा, जो नाना प्रकार के मृगों से व्याप्त था। वहाँ बहुत-से रीछ और बाघ रहा करते थे। वहाँ के वृक्ष, लता और झाड़ियाँ नष्ट-भ्रष्ट हो गयी । थीं। उस वनप्रान्त में किसी जलाशय का दर्शन होना कठिन था। वहाँ के पक्षी वहीं चहक रहे थे। झींगरों की झंकार गूंज रही थी॥२-३॥

श्लोक:
सीतया सह काकुत्स्थस्तस्मिन् घोरमृगायुते।
ददर्श गिरिशृङ्गाभं पुरुषादं महास्वनम्॥४॥

भावार्थ :-
भयंकर जंगली पशुओं से भरे हुए उस दुर्गम वन में सीता के साथ श्रीरामचन्द्रजी ने एक नरभक्षी राक्षस देखा, जो पर्वतशिखर के समान ऊँचा था और उच्चस्वर से गर्जना कर रहा था॥४॥

श्लोक:
गभीराक्षं महावक्त्रं विकटं विकटोदरम्।
बीभत्सं विषमं दीर्घ विकृतं घोरदर्शनम्॥५॥

भावार्थ :-
उसकी आँखें गहरी, मुँह बहुत बड़ा, आकार विकट, और पेट विकराल था। वह देखने में बड़ा भयंकर, घृणित, बेडौल, बहुत बड़ा और विकृत वेश से युक्त था॥५॥

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वाल्मीकि रामायण- अरण्यकाण्ड सर्ग- ३

अरण्यकाण्डम्
तृतीयः सर्गः (सर्ग 3)

( विराध और श्रीराम की बातचीत, श्रीराम और लक्ष्मण के द्वारा विराध पर प्रहार तथा विराध का इन दोनों भाइयों को साथ लेकर दूसरे वन में जाना )

श्लोक:
अथोवाच पुनर्वाक्यं विराधः पूरयन् वनम्।
पृच्छतो मम हि ब्रूतं कौ युवां क्व गमिष्यथः॥१॥

भावार्थ :-
तदनन्तर विराध ने उस वन को [जाते हुए कहा- ’अरे! मैं पूछता हूँ, मुझे बताओ। तुम दोनों कौन हो और कहाँ जाओगे?’॥१॥

श्लोक:
तमुवाच ततो रामो राक्षसं ज्वलिताननम्।
पृच्छन्तं सुमहातेजा इक्ष्वाकुकुलमात्मनः॥२॥
क्षत्रियौ वृत्तसम्पन्नौ विद्धि नौ वनगोचरौ।
त्वां तु वेदितुमिच्छावः कस्त्वं चरसि दण्डकान्॥३॥

भावार्थ :-
तब महातेजस्वी श्रीराम ने अपना परिचय पूछते हुए प्रज्वलित मुख वाले उस राक्षस से इस प्रकार कहा– ’तुझे मालूम होना चाहिये कि महाराज इक्ष्वाकु का कुल ही मेरा कुल है। हम दोनों भाई सदाचार का पालन करने वाले क्षत्रिय हैं और कारण वश इस समय वन में निवास करते हैं। अब हम तेरा परिचय जानना चाहते हैं। तु कौन है, जो दण्डक वन में स्वेच्छा से विचर रहा है?’॥२-३॥

श्लोक:
तमुवाच विराधस्तु रामं सत्यपराक्रमम्।
हन्त वक्ष्यामि ते राजन् निबोध मम राघव॥४॥

भावार्थ :-
यह सुनकर विराध ने सत्यपराक्रमी श्रीराम से कहा- ‘रघुवंशी नरेश! मैं प्रसन्नतापूर्वक अपना परिचय देता हूँ। तुम मेरे विषय में सुनो॥४॥

श्लोक:
पुत्रः किल जवस्याहं माता मम शतहदा।
विराध इति मामाहुः पृथिव्यां सर्वराक्षसाः॥५॥

भावार्थ :-
‘मैं ‘जव’ नामक राक्षस का पुत्र हूँ, मेरी माता का नाम ‘शतह्रदा’ है। भूमण्डल के समस्त राक्षस मुझे विराध के नाम से पुकारते हैं॥५॥

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वाल्मीकि रामायण- अरण्यकाण्ड सर्ग- ४

अरण्यकाण्डम्
चतुर्थः सर्गः (सर्ग 4)

( श्रीराम और लक्ष्मण के द्वारा विराध का वध )

श्लोक:
ह्रियमाणौ तु काकुत्स्थौ दृष्ट्वा सीता रघूत्तमौ।
उच्चैः स्वरेण चुक्रोश प्रगृह्य सुमहाभुजौ॥१॥

भावार्थ :-
रघुकुल के श्रेष्ठ वीर ककुत्स्थकुलभूषण श्रीराम और लक्ष्मण को राक्षस लिये जा रहा है यह देखकर सीता अपनी दोनों बाहें ऊपर उठाकर जोर-जोर से रोने-चिल्लाने लगीं-॥१॥

श्लोक:
एष दाशरथी रामः सत्यवाञ्छीलवान् शुचिः।
रक्षसा रौद्ररूपेण ह्रियते सहलक्ष्मणः॥२॥

भावार्थ :-
‘हाय! इन सत्यवादी, शीलवान् और शुद्ध आचार विचार वाले दशरथनन्दन श्रीराम और लक्ष्मण को यह रौद्ररूपधारी राक्षस लिये जा रहा है॥२॥

श्लोक:
मामृक्षा भक्षयिष्यन्ति शार्दूलद्वीपिनस्तथा।
मां हरोत्सृज काकुत्स्थौ नमस्ते राक्षसोत्तम॥३॥

भावार्थ :-
‘राक्षसशिरोमणे! तुम्हें नमस्कार है। इस वन में रीछ, व्याघ्र और चीते मुझे खा जायँगे, इसलिये तुम मुझे ही ले चलो, किंतु इन दोनों ककुत्स्थवंशी वीरों को छोड़ दो’॥३॥

श्लोक:
तस्यास्तद् वचनं श्रुत्वा वैदेह्या रामलक्ष्मणौ।
वेगं प्रचक्रतुर्वीरौ वधे तस्य दुरात्मनः॥४॥

भावार्थ :-
विदेहनन्दिनी सीता की यह बात सुनकर वे दोनों वीर श्रीराम और लक्ष्मण उस दुरात्मा राक्षस का वध करने में शीघ्रता करने लगे॥४॥

श्लोक:
तस्य रौद्रस्य सौमित्रिः सव्यं बाहुं बभञ्ज ह।
रामस्तु दक्षिणं बाहं तरसा तस्य रक्षसः॥५॥

भावार्थ :-
सुमित्राकुमार लक्ष्मण ने उस राक्षस की बायीं और श्रीराम ने उसकी दाहिनी बाँह बड़े वेग से तोड़ डाली॥५॥

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वाल्मीकि रामायण- अरण्यकाण्ड सर्ग- ५

अरण्यकाण्डम्
पञ्चमः सर्गः (सर्ग 5)

( श्रीराम, लक्ष्मण और सीता का शरभङ्ग मुनि के आश्रम पर जाना, देवताओं का दर्शन करना और मुनि से सम्मानित होना तथा शरभङ्ग मुनि का ब्रह्मलोक-गमन )

श्लोक:
हत्वा तु तं भीमबलं विराधं राक्षसं वने।
ततः सीतां परिष्वज्य समाश्वास्य च वीर्यवान्॥१॥
अब्रवीद् भ्रातरं रामो लक्ष्मणं दीप्ततेजसम्।
कष्टं वनमिदं दुर्गं न च स्मो वनगोचराः॥२॥
अभिगच्छामहे शीघ्रं शरभङ्गं तपोधनम्।
आश्रमं शरभङ्गस्य राघवोऽभिजगाम ह॥३॥

भावार्थ :-
वन में उस भयंकर बलशाली राक्षस विराध का वध करके पराक्रमी श्रीराम ने सीता को हृदय से लगाकर सान्त्वना दी और उद्दीप्त तेज वाले भाई लक्ष्मण से इस प्रकार कहा—’सुमित्रानन्दन! यह दुर्गम वन बड़ा कष्टप्रद है,हमलोग इसके पहले कभी ऐसे वनों में नहीं रहे हैं (अतः यहाँ के कष्टों का न तो अनुभव है और न अभ्यास ही है)। अच्छा! हमलोग अब शीघ्र ही तपोधन शरभङ्गजी के पास चलें’- ऐसा कहकर श्रीरामचन्द्रजी शरभङ्ग मुनि के आश्रमपर गये॥१-३॥

श्लोक:
तस्य देवप्रभावस्य तपसा भावितात्मनः।
समीपे शरभङ्गस्य ददर्श महदद्भुतम्॥४॥

भावार्थ :-
देवताओं के तुल्य प्रभावशाली तथा तपस्या से शुद्ध अन्तःकरणवाले (अथवा तप के द्वारा परब्रह्म परमात्मा का साक्षात्कार करने वाले) शरभङ्ग मुनि के समीप जाने पर श्रीराम ने एक बड़ा अद्भुत दृश्य देखा॥४॥

श्लोक:
विभ्राजमानं वपुषा सूर्यवैश्वानरप्रभम्।
रथप्रवरमारूढमाकाशे विबुधानुगम्॥५॥
असंस्पृशन्तं वसुधां ददर्श विबुधेश्वरम्।
सम्प्रभाभरणं देवं विरजोऽम्बरधारिणम्॥६॥

भावार्थ :-
वहाँ उन्होंने आकाश में एक श्रेष्ठ रथ पर बैठे हुए देवताओं के स्वामी इन्द्रदेव का दर्शन किया, जो पृथ्वी का स्पर्श नहीं कर रहे थे। उनकी अङ्गकान्ति सूर्य और अग्नि के समान प्रकाशित होती थी। वे अपने तेजस्वी शरीर से देदीप्यमान हो रहे थे। उनके पीछे और भी बहुत-से देवता थे। उनके दीप्तिमान् आभूषण चमक रहे थे तथा उन्होंने निर्मल वस्त्र धारण कर रखा था॥५-६॥

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वाल्मीकि रामायण- अरण्यकाण्ड सर्ग- ६

अरण्यकाण्डम्
षष्ठः सर्गः (सर्ग 6)

( वानप्रस्थ मुनियों का राक्षसों के अत्याचार से अपनी रक्षा के लिये श्रीरामचन्द्रजी से प्रार्थना करना और श्रीराम का उन्हें आश्वासन देना )

श्लोक:
शरभङ्गे दिवं प्राप्ते मुनिसङ्घाः समागताः।
अभ्यगच्छन्त काकुत्स्थं रामं ज्वलिततेजसम्॥१॥

भावार्थ :-
शरभङ्ग मुनि के ब्रह्मलोक चले जाने पर प्रज्वलित तेज वाले ककुत्स्थवंशी श्रीरामचन्द्रजी के पास बहुत-से मुनियों के समुदाय पधारे॥१॥

श्लोक:
वैखानसा वालखिल्याः सम्प्रक्षाला मरीचिपाः।
अश्मकुट्टाश्च बहवः पत्राहाराश्च तापसाः॥२॥
दन्तोलूखलिनश्चैव तथैवोन्मज्जकाः परे।
गात्रशय्या अशय्याश्च तथैवानवकाशिकाः॥३॥
मुनयः सलिलाहारा वायुभक्षास्तथापरे।
आकाशनिलयाश्चैव तथा स्थण्डिलशायिनः॥४॥
तथोर्ध्ववासिनो दान्तास्तथाऽऽर्द्रपटवाससः।
सजपाश्च तपोनिष्ठास्तथा पञ्चतपोऽन्विताः॥५॥

भावार्थ :-
उनमें वैखानस’, वालखिल्य, सम्प्रक्षाल, मरीचिप, बहुसंख्यक अश्मकुट्ट’, पत्राहार, दन्तोलूखली’, उन्मज्जक, गात्रशय्य, अशय्य’, अनवकाशिक, सलिलाहार, वायुभक्ष१२, आकाशनिलय, स्थण्डिलशायी’५, ऊर्ध्ववासी, दान्त, आर्द्रपटवासा, सजप, तपोनिष्ठ° और पञ्चाग्निसेवी२१–इन सभी श्रेणियों के तपस्वी मुनि थे॥२-५॥
१.ऋषियों का एक समुदाय जो ब्रह्माजी के नख से उत्पन्न हुआ है। २.ब्रह्माजी के बाल (रोम) से प्रकट हुए महर्षियों का समूह ३.जो भोजन के बाद अपने बर्तन धो-पोंछकर रख देते हैं, दूसरे समय के लिये कुछ नहीं बचाते। ४.सूर्य अथवा चन्द्रमा की किरणों का पान करके रहने वाले। ५.कच्चे अन्न को पत्थर से कूटकर खाने वाले। ६.पत्तों का आहार करने वाले। ७. दाँतों से ही ऊखल का काम लेने वाले। ८. कण्ठतक पानी में डूबकर तपस्या करने वाले। ९.शरीर से ही शय्या का काम लेने वाले अर्थात् बिनाबिछौने के ही भुजा पर सिर रखकर सोने वाले। १०. शय्या के साधनों से रहित। ११. निरन्तर सत्कर्म में लगे रहने के कारण कभी अवकाश न पाने वाले। १२. जल पीकर रहने वाले। १३. हवा पीकर जीवननिर्वाह करने वाले। १४. खुले मैदान में रहने वाले। १५. वेदी पर सोने वाले। १६. पर्वत शिखर आदि ऊँचे स्थानों में निवास करने वाले। १७. मन और इन्द्रियों को वश में रखने वाले। १८. सदा भीगे कपड़े पहनने वाले। १९. निरन्तर जप करने वाले। २०. तपस्या अथवा परमात्मतत्त्व के विचार में स्थित रहने वाले। २१. गर्मी के मौसम में ऊपर से सूर्य का और चारों ओर से अग्नि का ताप सहन करने वाले।

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वाल्मीकि रामायण- अरण्यकाण्ड सर्ग- ७

अरण्यकाण्डम्
सप्तमः सर्गः (सर्ग 7)

( सीता और भ्रातासहित श्रीराम का सुतीक्ष्ण के आश्रम पर जाकर उनसे बातचीत करना तथा उनसे सत्कृत हो रात में वहीं ठहरना )

श्लोक:
रामस्तु सहितो भ्रात्रा सीतया च परंतपः।
सुतीक्ष्णस्याश्रमपदं जगाम सह तैर्द्विजैः॥१॥

भावार्थ :-
शत्रुओं को संताप देने वाले श्रीरामचन्द्रजी लक्ष्मण, सीता तथा उन ब्राह्मणों के साथ सुतीक्ष्ण मुनि के आश्रम की ओर चले॥१॥

श्लोक:
स गत्वा दूरमध्वानं नदीस्तीर्वा बहूदकाः।
ददर्श विमलं शैलं महामेरुमिवोन्नतम्॥२॥

भावार्थ :-
वे दूर तक का मार्ग तै करके अगाध जल से भरी हुई बहुत-सी नदियों को पार करते हुए जब आगे गये, तब उन्हें महान् मेरुगिरि के समान एक अत्यन्त ऊँचा पर्वत दिखायी दिया, जो बड़ा ही निर्मल था॥२॥

श्लोक:
ततस्तदिक्ष्वाकुवरौ सततं विविधैर्दुमैः ।
काननं तौ विविशतुः सीतया सह राघवौ॥३॥

भावार्थ :-
वहाँ से आगे बढ़कर वे दोनों इक्ष्वाकुकुल के श्रेष्ठ वीर रघुवंशी बन्धु सीता के साथ नाना प्रकार के वृक्षों से भरे हुए एक वन में पहुँचे॥३॥

श्लोक:
प्रविष्टस्तु वनं घोरं बहुपुष्पफलद्रुमम्।
ददर्शाश्रममेकान्ते चीरमालापरिष्कृतम्॥४॥

भावार्थ :-
उस घोर वन में प्रविष्ट हो श्रीरघुनाथजी ने एकान्त स्थान में एक आश्रम देखा, जहाँ के वृक्ष प्रचुर फलफूलों से लदे हुए थे। इधर-उधर टँगे हुए चीर वस्त्रों के समुदाय उस आश्रम की शोभा बढ़ाते थे॥४॥

श्लोक:
तत्र तापसमासीनं मलपङ्कजधारिणम्।
रामः सुतीक्ष्णं विधिवत् तपोधनमभाषत॥५॥

भावार्थ :-
वहाँ आन्तरिक मल की शुद्धि के लिये पद्मासन धारण किये सुतीक्ष्ण मुनि ध्यान मग्न होकर बैठे थे। श्रीराम ने उन तपोधन मुनि के पास विधिवत् जाकर उनसे इस प्रकार कहा-॥५॥

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वाल्मीकि रामायण- अरण्यकाण्ड सर्ग- ८

अरण्यकाण्डम्
अष्टमः सर्गः (सर्ग 8)

( प्रातःकाल सुतीक्ष्ण से विदा ले श्रीराम,लक्ष्मण, सीता का वहाँ से प्रस्थान )

श्लोक:
रामस्तु सहसौमित्रिः सुतीक्ष्णेनाभिपूजितः।
परिणाम्य निशां तत्र प्रभाते प्रत्यबुध्यत॥१॥

भावार्थ :-
सुतीक्ष्ण के द्वारा भलीभाँति पूजित हो लक्ष्मणसहित श्रीराम उनके आश्रम में ही रात बिताकर प्रातःकाल जाग उठे॥१॥

श्लोक:
उत्थाय च यथाकालं राघवः सह सीतया।
उपस्पश्य सशीतेन तोयेनोत्पलगन्धिना॥२॥
अथ तेऽग्निं सुरांश्चैव वैदेही रामलक्ष्मणौ।
काल्यं विधिवदभ्यर्च्य तपस्विशरणे वने॥३॥
उदयन्तं दिनकरं दृष्ट्वा विगतकल्मषाः।
सुतीक्ष्णमभिगम्येदं श्लक्ष्णं वचनमब्रुवन्॥४॥

भावार्थ :-
सीतासहित श्रीराम और लक्ष्मण ने ठीक समय से उठकर कमल की सुगन्ध से सुवासित परम शीतल जल के द्वारा स्नान किया। तदनन्तर उन तीनों ने ही मिलकर विधिपूर्वक अग्नि और देवताओं की प्रातःकालिक पूजा की। इसके बाद तपस्वीजनों के आश्रयभूत वन में उदित हुए सूर्यदेव का दर्शन करके वे तीनों निष्पाप पथिक सुतीक्ष्ण मुनि के पास गये और यह मधुर वचन बोले-॥२-४॥

श्लोक:
सुखोषिताः स्म भगवंस्त्वया पूज्येन पूजिताः।
आपृच्छामः प्रयास्यामो मुनयस्त्वरयन्ति नः॥५॥

भावार्थ :-
‘भगवन्! आपने पूजनीय होकर भी हमलोगों की पूजा की है। हम आपके आश्रम में बड़े सुख से रहे हैं। अब हम यहाँ से जायँगे, इसके लिये आपकी आज्ञा चाहते हैं। ये मुनि हमें चलने के लिये जल्दी मचा रहे हैं॥५॥

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वाल्मीकि रामायण- अरण्यकाण्ड सर्ग- ९

अरण्यकाण्डम्
नवमः सर्गः (सर्ग 9)

( सीता का श्रीराम से निरपराध प्राणियों को न मारने और अहिंसा-धर्म का पालन करने के लिये अनुरोध )

श्लोक:
सुतीक्ष्णेनाभ्यनुज्ञातं प्रस्थितं रघुनन्दनम्।
हृद्यया स्निग्धया वाचा भर्तारमिदमब्रवीत्॥१॥

भावार्थ :-
सुतीक्ष्ण की आज्ञा लेकर वन की ओर प्रस्थित हुए अपने स्वामी रघुकुलनन्दन श्रीराम से सीता ने स्नेहभरी मनोहर वाणी में इस प्रकार कहा-॥१॥

श्लोक:
अधर्मं तु सुसूक्ष्मेण विधिना प्राप्यते महान्।
निवृत्तेन च शक्योऽयं व्यसनात् कामजादिह॥२॥

भावार्थ :-
‘आर्यपुत्र! यद्यपि आप महान् पुरुष हैं तथापि अत्यन्त सूक्ष्म विधि से विचार करने पर आप अधर्म को प्राप्त हो रहे हैं। जब कामजनित व्यसन से आप सर्वथा निवृत्त हैं, तब यहाँ इस अधर्म से भी बच सकते हैं॥२॥

श्लोक:
त्रीण्येव व्यसनान्यत्र कामजानि भवन्त्युत।
मिथ्यावाक्यं तु परमं तस्माद् गुरुतरावुभौ॥३॥
परदाराभिगमनं विना वैरं च रौद्रता।
मिथ्यावाक्यं न ते भूतं न भविष्यति राघव॥४॥

भावार्थ :-
‘इस जगत् में काम से उत्पन्न होने वाले तीन ही व्यसन होते हैं। मिथ्याभाषण बहुत बड़ा व्यसन है, किंतु उससे भी भारी दो व्यसन और हैं-परस्त्रीगमन और बिना वैर के ही दूसरों के प्रति क्रूरतापूर्ण बर्ताव। रघुनन्दन! इनमें से मिथ्याभाषणरूप व्यसन तो न आप में कभी हुआ है और न आगे होगा ही॥३-४॥

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वाल्मीकि रामायण- अरण्यकाण्ड सर्ग- १०

अरण्यकाण्डम्
दशमः सर्गः (सर्ग 10)

( श्रीराम का ऋषियों की रक्षा के लिये राक्षसों के वध के निमित्त की हुई प्रतिज्ञा के पालन पर दृढ़ रहने का विचार प्रकट करना )

श्लोक:
वाक्यमेतत् तु वैदेह्या व्याहृतं भर्तृभक्तया।
श्रुत्वा धर्मे स्थितो रामः प्रत्युवाचाथ जानकीम्॥१॥

भावार्थ :-
अपने स्वामी के प्रति भक्ति रखने वाली विदेहकुमारी सीता की कही हुई यह बात सुनकर सदा धर्म में स्थित रहने वाले श्रीरामचन्द्रजी ने जानकी को इस प्रकार उत्तर दिया॥१॥

श्लोक:
हितमुक्तं त्वया देवि स्निग्धया सदृशं वचः।
कुलं व्यपदिशन्त्या च धर्मज्ञे जनकात्मजे॥२॥

भावार्थ :-
‘देवि! धर्म को जानने वाली जनककिशोरी! तुम्हारा मेरे ऊपर स्नेह है, इसलिये तुमने मेरे हित की बात कही है। क्षत्रियों के कुलधर्म का उपदेश करती हुई तुमने जो कुछ कहा है, वह तुम्हारे ही योग्य है॥२॥

श्लोक:
किं नु वक्ष्याम्यहं देवि त्वयैवोक्तमिदं वचः।
क्षत्रियैर्धार्यते चापो नार्तशब्दो भवेदिति॥३॥

भावार्थ :-
‘देवि! मैं तुम्हें क्या उत्तर दूँ, तुमने ही पहले यह बात कही है कि क्षत्रिय लोग इसलिये धनुष धारण करते हैं कि किसी को दुःखी होकर हाहाकार न करना पड़े (यदि कोई दुःख या संकटमें पड़ा हो तो उसकी रक्षा की जाय)॥३॥

श्लोक:
ते चार्ता दण्डकारण्ये मुनयः संशितव्रताः।
मां सीते स्वयमागम्य शरण्यं शरणं गताः॥४॥

भावार्थ :-
‘सीते! दण्डकारण्य में रहकर कठोर व्रत का पालन करने वाले वे मुनि बहुत दुःखी हैं, इसीलिये मुझे शरणागतवत्सल जानकर वे स्वयं मेरे पास आये और शरणागत हुए॥४॥

श्लोक:
वसन्तः कालकालेषु वने मूलफलाशनाः।
न लभन्ते सुखं भीरु राक्षसैः क्रूरकर्मभिः॥५॥
भक्ष्यन्ते राक्षसैीमैर्नरमांसोपजीविभिः।

भावार्थ :-
‘भीरु! सदा ही वन में रहकर फल-मूल का आहार करने वाले वे मुनि इन क्रूरकर्मा राक्षसों के कारण कभी सुख नहीं पाते हैं। मनुष्यों के मांस से जीवननिर्वाह करने वाले ये भयानक राक्षस उन्हें मारकर खा जाते हैं॥५ १/२॥

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वाल्मीकि रामायण- अरण्यकाण्ड सर्ग- ११

अरण्यकाण्डम्
एकादशः सर्गः (सर्ग 11)

( पञ्चाप्सर तीर्थ एवं माण्डकर्णि मुनि की कथा, विभिन्न आश्रमों में घूमकर श्रीराम आदि का सुतीक्ष्ण के आश्रम में आना तथा अगस्त्य के प्रभाव का वर्णन )

श्लोक:
अग्रतः प्रययौ रामः सीता मध्ये सुशोभना।
पृष्ठतस्तु धनुष्पाणिर्लक्ष्मणोऽनुजगाम ह॥१॥

भावार्थ :-
तदनन्तर आगे-आगे श्रीराम चले, बीच में परम सुन्दरी सीता चल रही थीं और उनके पीछे हाथ में धनुष लिये लक्ष्मण चलने लगे॥१॥

श्लोक:
तौ पश्यमानौ विविधान् शैलप्रस्थान् वनानि च।
नदीश्च विविधा रम्या जग्मतुः सह सीतया॥२॥

भावार्थ :-
सीता के साथ वे दोनों भाई भाँति-भाँति के पर्वतीय शिखरों, वनों तथा नाना प्रकार की रमणीय नदियों को देखते हुए अग्रसर होने लगे॥२॥

श्लोक:
सारसांश्चक्रवाकांश्च नदीपुलिनचारिणः।
सरांसि च सपद्मानि युतानि जलजैः खगैः॥३॥

भावार्थ :-
उन्होंने देखा, कहीं नदियों के तटों पर सारस और चक्रवाक विचर रहे हैं और कहीं खिले हुए कमलों और जलचर पक्षियों से युक्त सरोवर शोभा पाते हैं॥३॥

श्लोक:
यूथबद्धांश्च पृषतान् मदोन्मत्तान् विषाणिनः।
महिषांश्च वराहांश्च गजांश्च द्रुमवैरिणः॥४॥

भावार्थ :-
कहीं चितकबरे मृग यूथ बाँधे चले जा रहे थे, कहीं बड़े-बड़े सींगवाले मदमत्त भैंसे तथा बढ़े हुए दाँत वाले जंगली सूअर और वृक्षों के वैरी दन्तार हाथी दिखायी देते थे॥४॥

श्लोक:
ते गत्वा दूरमध्वानं लम्बमाने दिवाकरे।
ददृशुः सहिता रम्यं तटाकं योजनायुतम्॥५॥

भावार्थ :-
दूरतक यात्रा तै करने के बाद जब सूर्य अस्ताचल को जाने लगे, तब उन तीनों ने एक साथ देखा-सामने एक बड़ा ही सुन्दर तालाब है, जिसकी लम्बाई-चौड़ाई एक-एक योजन की जान पड़ती है॥५॥

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