वाल्मीकि रामायण- AI अयोध्याकाण्ड सर्ग- १-१५

अयोध्याकाण्ड सर्ग- १-१५

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॥ श्री गणेशाय नमः ॥
॥ श्री कमलापति नम: ॥
॥ श्री जानकीवल्लभो विजयते ॥
॥ श्री वाल्मीकि रामायण ॥
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AI अयोध्याकाण्ड सर्ग- १-१५

वाल्मीकि रामायण- AI अयोध्याकाण्ड सर्ग- १



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अयोध्याकाण्डम्
प्रथमः सर्गः (सर्ग 1)

( श्रीराम के सद्गुणों का वर्णन, राजा दशरथ का श्रीराम को युवराज बनाने का विचार )

श्लोक:
गच्छता मातुलकुलं भरतेन तदानघः।
शत्रुघ्नो नित्यशत्रुघ्नो नीतः प्रीतिपुरस्कृतः॥१॥

भावार्थ :-
(पहले यह बताया जा चुका है कि) भरत अपने मामा के यहाँ जाते समय काम आदि शत्रुओं को सदा के लिये नष्ट कर देने वाले निष्पाप शत्रुघ्न को भी प्रेमवश अपने साथ लेते गये थे॥१॥

श्लोक:
स तत्र न्यवसद् भ्रात्रा सह सत्कारसत्कृतः।
मातुलेनाश्वपतिना पुत्रस्नेहेन लालितः॥२॥

भावार्थ :-
वहाँ भाई सहित उनका बड़ा आदर-सत्कार हुआ और वे वहाँ सुखपूर्वक रहने लगे। उनके मामा युधाजित् , जो अश्वयूथ के अधिपति थे, उन दोनों पर पुत्र से भी अधिक स्नेह रखते और बड़ा लाड़-प्यार करते थे॥२॥

श्लोक:
तत्रापि निवसन्तौ तौ तर्प्यमाणौ च कामतः।
भ्रातरौ स्मरतां वीरौ वृद्धं दशरथं नृपम्॥३॥

भावार्थ :-
यद्यपि मामा के यहाँ उन दोनों वीर भाइयों की सभी इच्छाएँ पूर्ण करके उन्हें पूर्णतः तृप्त किया जाता था,तथापि वहाँ रहते हुए भी उन्हें अपने वृद्ध पिता महाराज दशरथ की याद कभी नहीं भूलती थी॥३॥

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वाल्मीकि रामायण- AI अयोध्याकाण्ड सर्ग- २

अयोध्याकाण्डम्
द्वितीयः सर्गः (सर्ग 2)

( राजा दशरथ द्वारा श्रीराम के राज्याभिषेक का प्रस्ताव तथा सभासदों द्वारा उक्त प्रस्ताव का सहर्ष युक्तियुक्त समर्थन )

श्लोक:
ततः परिषदं सर्वामामन्त्र्य वसुधाधिपः।
हितमुद्धर्षणं चैवमुवाच प्रथितं वचः॥१॥
दुन्दुभिस्वरकल्पेन गम्भीरेणानुनादिना।
स्वरेण महता राजा जीमूत इव नादयन्॥२॥

भावार्थ :-
उस समय राजसभा में बैठे हुए सब लोगों को सम्बोधित करके महाराज दशरथ ने मेघ के समान शब्द करते हुए दुन्दुभि की ध्वनि के सदृश अत्यन्त गम्भीर एवं गूंजते हुए उच्च स्वर से सबके आनन्द को बढ़ाने वाली यह हितकारक बात कही॥१-२॥

श्लोक:
राजलक्षणयुक्तेन कान्तेनानुपमेन च।
उवाच रसयुक्तेन स्वरेण नृपतिर्नुपान्॥३॥

भावार्थ :-
राजा दशरथ का स्वर राजोचित स्निग्धता और गम्भीरता आदि गुणों से युक्त था, अत्यन्त कमनीय और अनुपम था। वे उस अद्भुत रसमय स्वर से समस्त नरेशों को सम्बोधित करके बोले-॥३॥

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वाल्मीकि रामायण- AI अयोध्याकाण्ड सर्ग- ३

अयोध्याकाण्डम्
तृतीयः सर्गः (सर्ग 3)

( राज्याभिषेक की तैयारी, राजा दशरथ का श्रीराम को राजनीति की बातें बताना )

श्लोक:
तेषामञ्जलिपद्मानि प्रगृहीतानि सर्वशः।
प्रतिगृह्याब्रवीद राजा तेभ्यः प्रियहितं वचः॥१॥

भावार्थ :-
सभासदों ने कमलपुष्प की-सी आकृति वाली अपनी अञ्जलियों को सिर से लगाकर सब प्रकार से महाराज के प्रस्ताव का समर्थन किया; उनकी वह पद्माञ्जलि स्वीकार करके राजा दशरथ उन सबसे प्रिय और हितकारी वचन बोले-॥१॥

श्लोक:
अहोऽस्मि परमप्रीतः प्रभावश्चातुलो मम।
यन्मे ज्येष्ठं प्रियं पुत्रं यौवराज्यस्थमिच्छथ॥२॥

भावार्थ :-
‘अहो! आप लोग जो मेरे परमप्रिय ज्येष्ठ पुत्र श्रीराम को युवराज के पदपर प्रतिष्ठित देखना चाहते हैं इससे मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई है तथा मेरा प्रभाव अनुपम हो गया है’॥२॥

श्लोक:
इति प्रत्यर्चितान् राजा ब्राह्मणानिदमब्रवीत्।
वसिष्ठं वामदेवं च तेषामेवोपशृण्वताम्॥३॥

भावार्थ :-
इस प्रकार की बातों से पुरवासी तथा अन्यान्य सभासदों का सत्कार करके राजा ने उनके सुनते हुए ही वामदेव और वसिष्ठ आदि ब्राह्मणों से इस प्रकार कहा-॥३॥

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वाल्मीकि रामायण- AI अयोध्याकाण्ड सर्ग- ४

अयोध्याकाण्डम्
चतुर्थः सर्गः (सर्ग 4)

( श्रीराम का माता को समाचार बताना और माता से आशीर्वाद पाकर लक्ष्मण से प्रेमपूर्वक वार्तालाप करना )

श्लोक:
गतेष्वथ नृपो भूयः पौरेषु सह मन्त्रिभिः।
मन्त्रयित्वा ततश्चक्रे निश्चयज्ञः स निश्चयम्॥१॥
श्व एव पुष्यो भविता श्वोऽभिषेच्यस्तु मे सुतः।
रामो राजीवपत्राक्षो युवराज इति प्रभुः॥२॥

भावार्थ :-
राजसभा से पुरवासियों के चले जानेपर कार्य सिद्धि के योग्य देश-काल के नियम को जानने वाले प्रभावशाली नरेश ने पुनः मन्त्रियों के साथ सलाह करके यह निश्चय किया कि ‘कल ही पुष्य नक्षत्र होगा, अतःकल ही मुझे अपने पुत्र कमलनयन श्रीराम का युवराज के पदपर अभिषेक कर देना चाहिये’॥१-२॥

श्लोक:
अथान्तर्गृहमाविश्य राजा दशरथस्तदा।
सूतमामन्त्रयामास रामं पुनरिहानय॥३॥

भावार्थ :-
तदनन्तर अन्तःपुर में जाकर महाराज दशरथ ने सूत को बुलाया और आज्ञा दी ’जाओ, श्रीराम को एक बार फिर यहाँ बुला लाओ’॥३॥

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वाल्मीकि रामायण- AI अयोध्याकाण्ड सर्ग- ५

अयोध्याकाण्डम्
पञ्चमः सर्गः (सर्ग 5)

( वसिष्ठजी का सीता सहित श्रीराम को उपवास व्रत की दीक्षा देना,राजा दशरथ का अन्तःपुर में प्रवेश )

श्लोक:
संदिश्य रामं नृपतिः श्वोभाविन्यभिषेचने।
पुरोहितं समाहूय वसिष्ठमिदमब्रवीत्॥१॥

भावार्थ :-
उधर महाराज दशरथ जब श्रीरामचन्द्रजी को दूसरे दिन होने वाले अभिषेक के विषय में आवश्यक संदेश दे चुके, तब अपने पुरोहित वसिष्ठ जीको बुलाकर बोले-॥१॥

श्लोक:
गच्छोपवासं काकुत्स्थं कारयाद्य तपोधन।
श्रेयसे राज्यलाभाय वध्वा सह यतव्रत॥२॥

भावार्थ :-
‘नियमपूर्वक व्रत का पालन करने वाले तपोधन! आप जाइये और विघ्न निवारण रूप कल्याण की सिद्धि तथा राज्य की प्राप्ति के लिये बहू सहित श्रीराम से उपवास व्रत का पालन कराइये॥२॥

श्लोक:
तथेति च स राजानमुक्त्वा वेदविदां वरः।
स्वयं वसिष्ठो भगवान् ययौ रामनिवेशनम्॥३॥
उपवासयितुं वीरं मन्त्रविन्मन्त्रकोविदम्।
ब्राह्मं रथवरं युक्तमास्थाय सुधृतव्रतः॥४॥

भावार्थ :-
तब राजा से ‘तथास्तु’ कहकर वेदवेत्ता विद्वानों में श्रेष्ठ तथा उत्तम व्रतधारी स्वयं भगवान् वसिष्ठ मन्त्रवेत्ता वीर श्रीराम को उपवास-व्रत की दीक्षा देने के लिये ब्राह्मण के चढ़ने योग्य जुते-जुताये श्रेष्ठ रथ पर आरूढ़ हो श्रीराम के महल की ओर चल दिये॥३-४॥

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वाल्मीकि रामायण- AI अयोध्याकाण्ड सर्ग- ६

अयोध्याकाण्डम्
षष्ठः सर्गः (सर्ग 6)

( सीता सहित श्रीराम का नियम परायण होना, हर्ष में भरे पुरवासियों द्वारा नगर की सजावट )

श्लोक:
गते पुरोहिते रामः स्नातो नियतमानसः।
सह पत्न्या विशालाक्ष्या नारायणमुपागमत्॥१॥

भावार्थ :-
पुरोहितजी के चले जाने पर मन को संयम में रखने वाले श्रीराम ने स्नान करके अपनी विशाललोचना पत्नी के साथ श्रीनारायण की* उपासना आरम्भ की॥१॥
* ऐसा माना जाता है कि यहाँ नारायण शब्द से श्रीरङ्गनाथजी की वह अर्चा-मूर्ति अभिप्रेत है; जो कि पूर्वजों के समय से ही दीर्घकाल तक अयोध्या में उपास्य देवता के रूपमें रही। बाद में श्रीरामजी ने वह मूर्ति विभीषण को दे दी थी, जिससे वह वर्तमान श्रीरंगक्षेत्र में पहुँची। इसकी विस्तृत कथा पद्मपुराणमें है।

श्लोक:
प्रगृह्य शिरसा पात्री हविषो विधिवत् ततः।
महते दैवतायाज्यं जुहाव ज्वलितानले॥२॥

भावार्थ :-
उन्होंने हविष्य-पात्रको सिर झुकाकर नमस्कार किया और प्रज्वलित अग्निमें महान् देवता (शेषशायी नारायण) की प्रसन्नताके लिये विधिपूर्वक उस हविष्यकी आहुति दी॥२॥

श्लोक:
शेषं च हविषस्तस्य प्राश्याशास्यात्मनः प्रियम्।
ध्यायन्नारायणं देवं स्वास्तीर्णे कुशसंस्तरे॥३॥
वाग्यतः सह वैदेह्या भूत्वा नियतमानसः।
श्रीमत्यायतने विष्णोः शिश्ये नरवरात्मजः॥४॥

भावार्थ :-
तत्पश्चात् अपने प्रिय मनोरथ की सिद्धिका संकल्प लेकर उन्होंने उस यज्ञशेष हविष्य का भक्षण किया और मन को संयम में रखकर मौन हो वे राजकुमार श्रीराम विदेहनन्दिनी सीता के साथ भगवान् विष्णु के सुन्दर मन्दिर में श्रीनारायण देव का ध्यान करते हुए वहाँ अच्छी तरह बिछी हुई कुश की चटाईपर सोये॥३-४॥

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वाल्मीकि रामायण- AI अयोध्याकाण्ड सर्ग- ७

अयोध्याकाण्डम्
सप्तमः सर्गः (सर्ग 7)

( मन्थरा का कैकेयी को उभाड़ना, कैकेयी का उसे पुरस्कार  में आभूषण देना और वर माँगने के लिये प्रेरित करना )

श्लोक:
ज्ञातिदासी यतो जाता कैकेय्या तु सहोषिता।
प्रासादं चन्द्रसंकाशमारुरोह यदृच्छया॥१॥

भावार्थ :-
रानी कैकेयी के पास एक दासी थी, जो उसके मायके से आयी हुई थी। वह सदा कैकेयी के ही साथ रहा करती थी। उसका जन्म कहाँ हुआ था? उसके देश और माता-पिता कौन थे? इसका पता किसी को नहीं था। अभिषेक से एक दिन पहले वह स्वेच्छा से ही कैकेयी के चन्द्रमा के समान कान्तिमान् महल की छत पर जा चढ़ी॥१॥

श्लोक:
सिक्तराजपथां कृत्स्ना प्रकीर्णकमलोत्पलाम्।
अयोध्यां मन्थरा तस्मात् प्रासादादन्ववैक्षत॥२॥

भावार्थ :-
उस दासी का नाम था-मन्थरा। उसने उस महल की छत से देखा-अयोध्या की सड़कों पर छिड़काव किया गया है और सारी पुरी में यत्र-तत्र खिले हुए कमल और उत्पल बिखेरे गये हैं॥२॥

श्लोक:
पताकाभिर्वरारंभिर्ध्वजैश्च समलंकृताम्।
सिक्तां चन्दनतोयैश्च शिरःस्नातजनैर्युताम्॥३॥

भावार्थ :-
सब ओर बहुमूल्य पताकाएँ फहरा रही हैं। ध्वजाओं से इस पुरी की अपूर्व शोभा हो रही है। राज मार्गों पर चन्दन मिश्रित जल का छिड़काव किया गया है तथा अयोध्यापुरी के सब लोग उबटन लगाकर सिर के ऊपर से स्नान किये हुए हैं॥३॥

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वाल्मीकि रामायण- AI अयोध्याकाण्ड सर्ग- ८

अयोध्याकाण्डम्
अष्टमः सर्गः (सर्ग 8)

( मन्थरा का पुनः राज्याभिषेक को कैकेयी के लिये अनिष्टकारी बताना, कुब्जा का पुनः श्रीराम राज्य को भरत के लिये भयजनक बताकर कैकेयी को भड़काना )

श्लोक:
मन्थरा त्वभ्यसूय्यैनामुत्सृज्याभरणं हि तत्।
उवाचेदं ततो वाक्यं कोपदुःखसमन्विता॥१॥

भावार्थ :-
यह सुनकर मन्थरा ने कैकेयी की निन्दा करके उसके दिये हुए आभूषण को उठाकर फेंक दिया और कोप तथा दुःख से भरकर वह इस प्रकार बोली-॥१॥

श्लोक:
हर्षं किमर्थमस्थाने कृतवत्यसि बालिशे।
शोकसागरमध्यस्थं नात्मानमवबुध्यसे॥२॥

भावार्थ :-
‘रानी! तुम बड़ी नादान हो। अहो! तुमने यह बेमौके हर्ष किसलिये प्रकट किया? तुम्हें शोक के स्थान पर प्रसन्नता कैसे हो रही है? अरी! तुम शोक के समुद्रमें डूबी हुई हो, तो भी तुम्हें अपनी इस विपन्नावस्था का बोध नहीं हो रहा है॥२॥

श्लोक:
मनसा प्रसहामि त्वां देवि दुःखार्दिता सती।
यच्छोचितव्ये हृष्टासि प्राप्य त्वं व्यसनं महत्॥३॥

भावार्थ :-
‘देवि! महान् संकट में पड़ने पर जहाँ तुम्हें शोक होना चाहिये, वहीं हर्ष हो रहा है। तुम्हारी यह अवस्था देखकर मुझे मन-ही-मन बड़ा क्लेश सहन करना पड़ता है, मैं दुःख से व्याकुल हुई जाती हूँ॥३॥

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वाल्मीकि रामायण- AI अयोध्याकाण्ड सर्ग- ९

अयोध्याकाण्डम्
नवमः सर्गः (सर्ग 9)

( कुब्जा के कुचक्र से कैकेयी का कोप भवन में प्रवेश )

श्लोक:
एवमुक्ता तु कैकेयी क्रोधेन ज्वलितानना।
दीर्घमुष्णं विनिःश्वस्य मन्थरामिदमब्रवीत्॥१॥

भावार्थ :-
मन्थरा के ऐसा कहने पर कैकेयी का मुख क्रोध से तमतमा उठा। वह लंबी और गरम साँस खींचकर उससे इस प्रकार बोली-॥१॥

श्लोक:
अद्य राममितः क्षिप्रं वनं प्रस्थापयाम्यहम्।
यौवराज्येन भरतं क्षिप्रमद्याभिषेचये॥२॥

भावार्थ :-
‘कुब्जे! मैं श्रीराम को शीघ्र ही यहाँ से वन में भेजूंगी और तुरंत ही युवराज के पदपर भरत का अभिषेक कराऊँगी॥२॥

श्लोक:
इदं त्विदानीं सम्पश्य केनोपायेन साधये।
भरतः प्राप्नुयाद् राज्यं न तु रामः कथंचन॥३॥

भावार्थ :-
‘परंतु इस समय यह तो सोचो कि किस उपाय से अपना अभीष्ट साधन करूँ? भरत को राज्य प्राप्त हो जाय और श्रीराम उसे किसी तरह भी न पा सकें यह काम कैसे बने?’॥३॥

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वाल्मीकि रामायण- AI अयोध्याकाण्ड सर्ग- १०

अयोध्याकाण्डम्
दशमः सर्गः (सर्ग 10)

( राजा दशरथ का कैकेयी के भवन में जाना, उसे कोपभवन में स्थित देखकर दुःखी होना और उसको अनेक प्रकार से सान्त्वना देना )

श्लोक:
 विदर्शिता यदा देवी कुब्जया पापया भृशम्।
तदा शेते स्म सा भूमौ दिग्धविद्धेव किंनरी॥१॥

भावार्थ :-
पापिनी कुब्जा ने जब देवी कैकेयी को बहुत उलटी बातें समझा दीं, तब वह विषाक्त बाण से विद्ध हुई किन्नरी के समान धरती पर लोटने लगी॥१॥

श्लोक:
निश्चित्य मनसा कृत्यं सा सम्यगिति भामिनी।
मन्थरायै शनैः सर्वमाचचक्षे विचक्षणा॥२॥

भावार्थ :-
मन्थरा के बताये हुए समस्त कार्य को यह बहुत उत्तम है। ऐसा मन-ही-मन निश्चय करके बातचीत में कुशल भामिनी कैकेयी ने मन्थरा से धीरे-धीरे अपना सारा मन्तव्य बता दिया॥२॥

श्लोक:
सा दीना निश्चयं कृत्वा मन्थरावाक्यमोहिता।
नागकन्येव निःश्वस्य दीर्घमुष्णं च भामिनी॥३॥
मुहूर्तं चिन्तयामास मार्गमात्मसुखावहम्।

भावार्थ :-
मन्थरा के वचनों से मोहित एवं दीन हुई भामिनी कैकेयी पूर्वोक्त निश्चय करके नागकन्या की भाँति गरम और लंबी साँस खींचने लगी और दो घड़ी तक अपने लिये सुखदायक मार्ग का विचार करती रही॥३ १/२॥

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वाल्मीकि रामायण- AI अयोध्याकाण्ड सर्ग- ११

अयोध्याकाण्डम्
एकादशः सर्गः (सर्ग 11)

( कैकेयी का राजा को दो वरों का स्मरण दिलाकर भरत के लिये अभिषेक और राम के लिये चौदह वर्षों का वनवास माँगना )

श्लोक:
तं मन्मथशरैर्विद्धं कामवेगवशानुगम्।
उवाच पृथिवीपालं कैकेयी दारुणं वचः॥१॥

भावार्थ :-
भूपाल दशरथ कामदेव के बाणों से पीड़ित तथा कामवेग के वशीभूत हो उसी का अनुसरण कर रहे थे। उनसे कैकेयी ने यह कठोर वचन कहा-॥१॥

श्लोक:
नास्मि विप्रकृता देव केनचिन्नावमानिता।
अभिप्रायस्तु मे कश्चित् तमिच्छामि त्वया कृतम्॥२॥

भावार्थ :-
‘देव! न तो किसी ने मेरा अपकार किया है और न किसी के द्वारा मैं अपमानित या निन्दित ही हुई हूँ। मेरा कोई एक अभिप्राय (मनोरथ) है और मैं आपके द्वारा उसकी पूर्ति चाहती हूँ॥२॥

श्लोक:
प्रतिज्ञा प्रतिजानीष्व यदि त्वं कर्तुमिच्छसि।
अथ ते व्याहरिष्यामि यथाभिप्रार्थितं मया॥३॥

भावार्थ :-
‘यदि आप उसे पूर्ण करना चाहते हों तो प्रतिज्ञा कीजिये। इसके बाद मैं अपना वास्तविक अभिप्राय आपसे कहूँगी’॥३॥

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वाल्मीकि रामायण- AI अयोध्याकाण्ड सर्ग- १२

अयोध्याकाण्डम्
दादशः सर्गः (सर्ग 12)

( महाराज दशरथ की चिन्ता, विलाप, कैकेयी को फटकारना, समझाना और उससे वैसा वर न माँगने के लिये अनुरोध करना )

श्लोक:
ततः श्रुत्वा महाराजः कैकेय्या दारुणं वचः।
चिन्तामभिसमापेदे मुहर्तं प्रतताप च॥१॥

भावार्थ :-
कैकेयी का यह कठोर वचन सुनकर महाराज दशरथ को बड़ी चिन्ता हुई वे एक मुहूर्त तक अत्यन्त संताप करते रहे॥१॥

श्लोक:
किं नु मेऽयं दिवास्वप्नश्चित्तमोहोऽपि वा मम।
अनुभूतोपसर्गो वा मनसो वाप्युपद्रवः॥२॥

भावार्थ :-
उन्होंने सोचा–’क्या दिन में ही यह मुझे स्वप्न दिखायी दे रहा है ? अथवा मेरे चित्त का मोह है ? या किसी भूत (ग्रह आदि) के आवेश से चित्त में विकलता आ गयी है? या आधि-व्याधि के कारण यह कोई मन का ही उपद्रव है’॥२॥

श्लोक:
इति संचिन्त्य तद् राजा नाध्यगच्छत् तदासुखम्।
प्रतिलभ्य ततः संज्ञां कैकेयीवाक्यतापितः॥३॥

भावार्थ :-
यही सोचते हुए उन्हें अपने भ्रम के कारण का पता नहीं लगा। उस समय राजा को मूर्च्छित कर देने वाला महान् दुःख प्राप्त हुआ। तत्पश्चात् होश में आने पर कैकेयी की बात को याद करके उन्हें पुनः संताप होने लगा॥३॥

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वाल्मीकि रामायण- AI अयोध्याकाण्ड सर्ग- १३

अयोध्याकाण्डम्
त्रयोदशः सर्गः (सर्ग 13)

( राजा का विलाप और कैकेयी से अनुनय-विनय )

श्लोक:
अतदर्ह महाराजं शयानमतथोचितम्।
ययातिमिव पुण्यान्ते देवलोकात् परिच्युतम्॥१॥
अनर्थरूपासिद्धार्था ह्यभीता भयदर्शिनी।
पुनराकारयामास तमेव वरमङ्गना॥२॥

भावार्थ :-
महाराज दशरथ उस अयोग्य और अनुचित अवस्था में पृथ्वी पर पड़े थे। उस समय वे पुण्य समाप्त होने पर देवलोक से भ्रष्ट हुए राजा ययाति के समान जान पड़ते थे। उनकी वैसी दशा देख अनर्थ की साक्षात् मूर्ति कैकेयी, जिसका प्रयोजन अभी तक सिद्ध नहीं हुआ था, जो लोकापवाद का भय छोड़ चुकी थी और श्रीराम से भरत के लिये भय देखती थी, पुनः उसी वर के लिये राजा को सम्बोधित करके कहने लगी-॥१-२॥

श्लोक:
त्वं कत्थसे महाराज सत्यवादी दृढव्रतः।
मम चेदं वरं कस्माद् विधारयितुमिच्छसि॥३॥

भावार्थ :-
‘महाराज! आप तो डींग मारा करते थे कि मैं बड़ा सत्यवादी और दृढ़प्रतिज्ञ हूँ, फिर आप मेरे इस वरदान को क्यों हजम कर जाना चाहते हैं ?’॥३॥

श्लोक:
एवमुक्तस्तु कैकेय्या राजा दशरथस्तदा।
प्रत्युवाच ततः क्रुद्धो मुहूर्तं विह्वलन्निव॥४॥

भावार्थ :-
कैकेयी के ऐसा कहने पर राजा दशरथ दो घड़ी तक व्याकुलकी-सी अवस्था में रहे। तत्पश्चात् कुपित होकर उसे इस प्रकार उत्तर देने लगे॥४॥

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वाल्मीकि रामायण- AI अयोध्याकाण्ड सर्ग- १४

अयोध्याकाण्डम्
चतुर्दशःसर्गः (सर्ग 14)

( कैकेयी का राजा को अपने वरों की पूर्ति के लिये दुराग्रह दिखाना, राजा की आज्ञा से सुमन्त्रका श्रीराम को बुलाना )

श्लोक:
पुत्रशोकार्दितं पापा विसंज्ञं पतितं भुवि।
विचेष्टमानमुत्प्रेक्ष्य ऐक्ष्वाकमिदमब्रवीत्॥१॥

भावार्थ :-
इक्ष्वाकुनन्दन राजा दशरथ पुत्रशोक से पीड़ित हो पृथ्वी पर अचेत पड़े थे और वेदना से छटपटा रहे थे, उन्हें इस अवस्था में देखकर पापिनी कैकेयी इस प्रकार बोली-॥१॥

श्लोक:
पापं कृत्वेव किमिदं मम संश्रुत्य संश्रवम्।
शेषे क्षितितले सन्नः स्थित्यां स्थातुं त्वमर्हसि॥२॥

भावार्थ :-
महाराज! आपने मुझे दो वर देने की प्रतिज्ञा की थी और जब मैंने उन्हें माँगा, तब आप इस प्रकार सन्न होकर पृथ्वी पर गिर पड़े, मानो कोई पाप करके पछता रहे हों, यह क्या बात है? आपको सत्पुरुषों की मर्यादा में स्थिर रहना चाहिये॥२॥

श्लोक:
आहुः सत्यं हि परमं धर्मं धर्मविदो जनाः।
सत्यमाश्रित्य च मया त्वं धर्मं प्रतिचोदितः॥३॥

भावार्थ :-
धर्मज्ञ पुरुष सत्य को ही सबसे श्रेष्ठ धर्म बतलाते हैं, उस सत्य का सहारा लेकर मैंने आपको धर्म का पालन करने के लिये ही प्रेरित किया है॥३॥

श्लोक:
संश्रुत्य शैब्यः श्येनाय स्वां तनुं जगतीपतिः।
प्रदाय पक्षिणे राजा जगाम गतिमुत्तमाम्॥४॥

भावार्थ :-
पृथ्वीपति राजा शैब्य ने बाज पक्षी को अपना शरीर देने की प्रतिज्ञा करके उसे दे ही दिया और देकर उत्तम गति प्राप्त कर ली॥४॥

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वाल्मीकि रामायण- AI अयोध्याकाण्ड सर्ग- १५

अयोध्याकाण्डम्
पञ्चदशः सर्गः (सर्ग 15)

( सुमन्त्र का राजा की आज्ञा से श्रीराम को बुलाने के लिये उनके महल में जाना )

श्लोक:
ते तु तां रजनीमुष्य ब्राह्मणा वेदपारगाः।
उपतस्थुरुपस्थानं सह राजपुरोहिताः॥१॥

भावार्थ :-
वे वेदों के पारङ्गत ब्राह्मण तथा राजपुरोहित वह रात बिताकर प्रातःकाल (राजा की प्रेरणा के अनुसार) राजद्वार पर उपस्थित हुए थे॥१॥

श्लोक:
अमात्या बलमुख्याश्च मुख्या ये निगमस्य च।
राघवस्याभिषेकार्थे प्रीयमाणाः सुसंगताः॥२॥

भावार्थ :-
मन्त्री, सेना के मुख्य-मुख्य अधिकारी और बड़े बड़े सेठ-साहूकार श्रीरामचन्द्रजी के अभिषेक के लिये बड़ी प्रसन्नता के साथ वहाँ एकत्र हुए थे॥२॥

श्लोक:
उदिते विमले सूर्ये पुष्ये चाभ्यागतेऽहनि।
लग्ने कर्कटके प्राप्ते जन्म रामस्य च स्थिते॥३॥
अभिषेकाय रामस्य द्विजेन्द्रैरुपकल्पितम्।
काञ्चना जलकुम्भाश्च भद्रपीठं स्वलंकृतम्॥४॥
रथश्च सम्यगास्तीर्णो भास्वता व्याघ्रचर्मणा।
गङ्गायमुनयोः पुण्यात् संगमादाहृतं जलम्॥५॥

भावार्थ :-
निर्मल सूर्योदय होने पर दिन में जब पुष्यनक्षत्र का योग आया तथा श्रीराम के जन्म का कर्क लग्न उपस्थित हुआ, उस समय श्रेष्ठ ब्राह्मणों ने श्रीराम के अभिषेक के लिये सारी सामग्री एकत्र करके उसे अँचाकर रख दिया। जल से भरे हुए सोने के कलश, भलीभाँति सजाया हुआ भद्रपीठ, चमकीलेव्याघ्र चर्म से अच्छी तरह आवृत रथ, गङ्गा-यमुनाके पवित्र सङ्गम से लाया हुआ जल-ये सब वस्तुएँ एकत्र कर ली गयी थीं॥३–५॥

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अयोध्याकाण्ड सर्ग- १-१५

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