वाल्मीकि रामायण- अयोध्याकाण्ड सर्ग- ३१-४५

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॥ श्री गणेशाय नमः ॥
॥ श्री कमलापति नम: ॥
॥ श्री जानकीवल्लभो विजयते ॥
॥ श्री वाल्मीकि रामायण ॥
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वाल्मीकि रामायण
(भावार्थ सहित)
सब एक ही स्थान पर

अयोध्याकाण्ड सर्ग- ३१-४५

अयोध्याकाण्डम्
एकत्रिंशः सर्गः (सर्ग 31)

( श्रीराम और लक्ष्मण का संवाद, श्रीराम की आज्ञा से लक्ष्मण का सुहृदों से पूछकर और दिव्य आयुध लाकर वनगमन के लिये तैयार होना )

श्लोक:
एवं श्रुत्वा स संवादं लक्ष्मणः पूर्वमागतः।
बाष्पपर्याकुलमुखः शोकं सोढुमशक्नुवन्॥१॥

भावार्थ :-
जिस समय श्रीराम और सीता में बातचीत हो रही थी, लक्ष्मण वहाँ पहले से ही आ गये थे। उन दोनों का ऐसा संवाद सुनकर उनका मुखमण्डल आँसुओं से भींग गया। भाई के विरह का शोक अब उनके लिये भी असह्य हो उठा॥१॥

श्लोक:
स भ्रातुश्चरणौ गाढं निपीड्य रघुनन्दनः।
सीतामुवाचातियशां राघवं च महाव्रतम्॥२॥

भावार्थ :-
रघुकुल को आनन्दित करने वाले लक्ष्मण ने ज्येष्ठ भ्राता श्रीरामचन्द्रजी के दोनों पैर जोर से पकड़ लिये और अत्यन्त यशस्विनी सीता तथा महान् व्रतधारी श्रीरघुनाथजी से कहा-॥२॥

श्लोक:
यदि गन्तुं कृता बुद्धिर्वनं मृगगजायुतम्।
अहं त्वानुगमिष्यामि वनमग्रे धनुर्धरः॥३॥

भावार्थ :-
‘आर्य! यदि आपने सहस्रों वन्य पशुओं तथा हाथियों से भरे हुए वन में जाने का निश्चय कर ही लिया है तो मैं भी आपका अनुसरण करूँगा। धनुष हाथ में लेकर आगे-आगे चलूँगा॥३॥

श्लोक:
मया समेतोऽरण्यानि रम्याणि विचरिष्यसि।
पक्षिभिर्मंगयूथैश्च संघुष्टानि समन्ततः॥४॥

भावार्थ :-
‘आप मेरे साथ पक्षियों के कलरव और भ्रमरसमूहों के गुञ्जारव से गूंजते हुए रमणीय वनों में सब ओर विचरण कीजियेगा॥४॥

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वाल्मीकि रामायण- अयोध्याकाण्ड सर्ग- ३२

अयोध्याकाण्डम्
द्वात्रिंशः सर्गः (सर्ग 32)

( लक्ष्मण सहित श्रीराम द्वारा ब्राह्मणों, ब्रह्मचारियों, सेवकों, त्रिजट ब्राह्मण और सुहृज्जनों को धन का वितरण )

श्लोक:
ततः शासनमाज्ञाय भ्रातुः प्रियकरं हितम्।
गत्वा स प्रविवेशाशु सुयज्ञस्य निवेशनम्॥१॥

भावार्थ :-
तदनन्तर अपने भाई श्रीराम की प्रियकारक एवं हितकर आज्ञा पाकर लक्ष्मण वहाँ से चल दिये। उन्होंने शीघ्र ही गुरुपुत्र सुयज्ञ के घर में प्रवेश किया॥१॥

श्लोक:
तं विप्रमग्न्यगारस्थं वन्दित्वा लक्ष्मणोऽब्रवीत्।
सखेऽभ्यागच्छ पश्य त्वं वेश्म दुष्करकारिणः॥२॥

भावार्थ :-
” उस समय विप्रवर सुयज्ञ अग्निशाला में बैठे हए थे। लक्ष्मण ने उन्हें प्रणाम करके कहा—’सखे! दुष्कर कर्म करने वाले श्रीरामचन्द्रजी के घर पर आओ और उनका कार्य देखो’॥२॥

श्लोक:
ततः संध्यामुपास्थाय गत्वा सौमित्रिणा सह।
ऋष्टुं स प्राविशल्लक्ष्या रम्यं रामनिवेशनम्॥३॥

भावार्थ :-
सुयज्ञ ने मध्याह्नकाल की संध्योपासना पूरी करके लक्ष्मण के साथ जाकर श्रीराम के रमणीय भवन में प्रवेश किया, जो लक्ष्मी से सम्पन्न था॥३॥

श्लोक:
तमागतं वेदविदं प्राञ्जलिः सीतया सह।
सुयज्ञमभिचक्राम राघवोऽग्निमिवार्चितम्॥४॥

भावार्थ :-
होमकाल में पूजित अग्नि के समान तेजस्वी वेदवेत्ता सुयज्ञ को आया जान सीतासहित श्रीराम ने हाथ जोड़कर उनकी अगवानी की॥४॥

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वाल्मीकि रामायण- अयोध्याकाण्ड सर्ग- ३३

अयोध्याकाण्डम्
त्रयस्त्रिंशः सर्गः (सर्ग 33)

( सीता और लक्ष्मणसहित श्रीराम का दुःखी नगरवासियों के मुख से तरह की बातें सुनते हुए पिता के दर्शन के लिये कैकेयी के महल में जाना )

श्लोक:
दत्त्वा तु सह वैदेह्या ब्राह्मणेभ्यो धनं बहु
जग्मतुः पितरं द्रष्टं सीतया सह राघवौ॥१॥

भावार्थ :-
विदेहकुमारी सीता के साथ श्रीराम और लक्ष्मण ब्राह्मणों को बहुत-सा धन दान करके वन जाने के लिये उद्यत हो पिता का दर्शन करने के लिये गये॥१॥

श्लोक:
ततो गृहीते प्रेष्याभ्यामशोभेतां तदायुधे
मालादामभिरासक्ते सीतया समलंकृते॥२॥

भावार्थ :-
उनके साथ दो सेवक श्रीराम और लक्ष्मण के वे धनुष आदि आयुध लेकर चले, जिन्हें फूल की मालाओं से सजाया गया था और सीताजी ने पूजा के लिये चढ़ाये हुए चन्दन आदि से अलंकृत किया था। उन दोनों के आयुधों की उस समय बड़ी शोभा हो रही थी॥२॥

श्लोक:
ततः प्रासादहाणि विमानशिखराणि च।
अभिरुह्य जनः श्रीमानुदासीनो व्यलोकयत्॥३॥

भावार्थ :-
उस अवसरपर धनी लोग प्रासादों (तिमंजिले महलों), हर्म्यगृहों (राजभवनों) तथा विमानों (सात मंजिले महलों) की ऊपरी छतों पर चढ़कर उदासीन भाव से उन तीनों की ओर देखने लगे॥३॥

श्लोक:
न हि रथ्याः सुशक्यन्ते गन्तुं बहुजनाकुलाः
आरुह्य तस्मात् प्रासादाद् दीनाः पश्यन्ति राघवम्॥४॥

भावार्थ :-
उस समय सड़कें मनुष्यों की भीड़ से भरी थीं इसलिये उनपर सुगमतापूर्वक चलना कठिन हो गया था। अतः अधिकांश मनुष्य प्रासादों (तिमंजिले मकानों) पर चढ़कर वहीं से दुःखी होकर श्रीरामचन्द्रजी की ओर देख रहे थे॥४॥

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वाल्मीकि रामायण- अयोध्याकाण्ड सर्ग- ३४

अयोध्याकाण्डम्
चतुस्त्रिंशः सर्गः (सर्ग 34)

( सीता और लक्ष्मण सहित श्रीराम का रानियों सहित राजा दशरथ के पास जाकर वनवास के लिये विदा माँगना, राजा का शोक और मूर्छा )

श्लोक:
ततः कमलपत्राक्षः श्यामो निरुपमो महान्।
उवाच रामस्तं सूतं पितुराख्याहि मामिति॥१॥
स रामप्रेषितः क्षिप्रं संतापकलुषेन्द्रियम्।
प्रविश्य नृपतिं सूतो निःश्वसन्तं ददर्श ह॥२॥

भावार्थ :-
जब कमलनयन श्यामसुन्दर उपमारहित महापुरुष श्रीराम ने सूत सुमन्त्र से कहा—’आप पिताजी को मेरे आगमन की सूचना दे दीजिये’ तब श्रीराम की प्रेरणा से शीघ्र ही भीतर जाकर सारथि सुमन्त्र ने राजा का दर्शन किया। उनकी सारी इन्द्रियाँ संताप से कलुषित हो रही थीं। वे लम्बी साँस खींच रहे थे॥१-२॥

श्लोक:
उपरक्तमिवादित्यं भस्मच्छन्नमिवानलम्।
तटाकमिव निस्तोयमपश्यज्जगतीपतिम्॥३॥
आबोध्य च महाप्राज्ञः परमाकुलचेतनम्।
राममेवानुशोचन्तं सूतः प्राञ्जलिरब्रवीत्॥४॥

भावार्थ :-
सुमन्त्र ने देखा, पृथ्वीपति महाराज दशरथ राहुग्रस्त सूर्य, राख से ढकी हुई आग तथा जलशून्य तालाब के समान श्रीहीन हो रहे हैं। उनका चित्त अत्यन्त व्याकुल है और वे श्रीराम का ही चिन्तन कर रहे हैं। तब महाप्राज्ञ सूत ने महाराज को सम्बोधित करके हाथ जोड़कर कहा॥३-४॥

श्लोक:
तं वर्धयित्वा राजानं पूर्वं सूतो जयाशिषा।
भयविक्लवया वाचा मन्दया श्लक्ष्णयाब्रवीत्॥५॥

भावार्थ :-
पहले तो सूत सुमन्त्र ने विजयसूचक आशीर्वाद देते हुए महाराज की अभ्युदय-कामना की; फिर भय से व्याकुल मन्द-मधुर वाणी द्वारा यह बात कही—॥५॥

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वाल्मीकि रामायण- अयोध्याकाण्ड सर्ग- ३५

अयोध्याकाण्डम्
पञ्चत्रिंशः सर्गः (सर्ग 35)

( सुमन्त्र के समझाने और फटकारने पर भी कैकेयी का टस-से-मस न होना )

श्लोक:
ततो निधूय सहसा शिरो निःश्वस्य चासकृत्।
पाणिं पाणौ विनिष्पिष्य दन्तान् कटकटाय्य च॥१॥
लोचने कोपसंरक्ते वर्णं पूर्वोचितं जहत्।
कोपाभिभूतः सहसा संतापमशुभं गतः॥२॥
मनः समीक्षमाणश्च सूतो दशरथस्य च।
कम्पयन्निव कैकेय्या हृदयं वाक्शरैः शितैः॥३॥

भावार्थ :-
तदनन्तर होश में आने पर सारथि सुमन्त्र सहसा उठकर खड़े हो गये। उनके मन में बड़ा संताप हुआ, जो अमङ्गलकारी था। वे क्रोध के मारे काँपने लगे। उनके शरीर और मुख की पहली स्वाभाविक कान्ति बदल गयी। वे क्रोध से आँखें लाल करके दोनों हाथों से सिर पीटने लगे और बारम्बार लम्बी साँस खींचकर, हाथ-से-हाथ मलकर, दाँत कटकटाकर राजा दशरथ के मन की वास्तविक अवस्था देखते हुए अपने वचनरूपी तीखे बाणों से कैकेयी के हृदय को कम्पित-सा करने लगे॥१-३॥

श्लोक:
वाक्यवज्ररनुपमैर्निर्भिन्दन्निव चाशुभैः।
कैकेय्याः सर्वमर्माणि सुमन्त्रः प्रत्यभाषत॥४॥

भावार्थ :-
अपने अशुभ एवं अनुपम वचनरूपी वज्र से कैकेयी के सारे मर्मस्थानों को विदीर्ण-से करते हुए सुमन्त्र ने उससे इस प्रकार कहना आरम्भ किया-॥४॥

श्लोक:
यस्यास्तव पतिस्त्यक्तो राजा दशरथः स्वयम्।
भर्ता सर्वस्य जगतः स्थावरस्य चरस्य च॥५॥
नह्यकार्यतमं किंचित्तव देवीह विद्यते।
पतिघ्नीं त्वामहं मन्ये कुलनीमपि चान्ततः॥६॥

भावार्थ :-
‘देवि! जब तुमने सम्पूर्ण चराचर जगत् के स्वामी स्वयं अपने पति महाराज दशरथ का ही त्याग कर दिया, तब इस जगत् में कोई ऐसा कुकर्म नहीं है, जिसे तुम न कर सको; मैं तो समझता हूँ कि तुम पति की हत्या करने वाली तो हो ही; अन्ततः कुलघातिनी भी हो॥५-६॥

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वाल्मीकि रामायण- अयोध्याकाण्ड सर्ग- ३६

अयोध्याकाण्डम्
षट्त्रिंशः सर्गः (सर्ग 36)

( दशरथ का श्रीराम के साथ सेना और खजाना भेजने का आदेश, कैकेयी द्वारा इसका विरोध, राजा का श्रीराम के साथ जाने की इच्छा प्रकट करना )

श्लोक:
ततः समन्त्रमैक्ष्वाकः पीडितोऽत्र प्रतिज्ञया।
सबाष्पमतिनिःश्वस्य जगादेदं पुनर्वचः॥१॥

भावार्थ :-
तब इक्ष्वाकु कुलनन्दन राजा दशरथ वहाँ अपनी प्रतिज्ञा से पीड़ित हो आँसू बहाते हुए लम्बी साँस खींचकर सुमन्त्र से फिर इस प्रकार बोले-॥१॥

श्लोक:
सूत रत्नसुसम्पूर्णा चतुर्विधबला चमूः।
राघवस्यानुयात्रार्थं क्षिप्रं प्रतिविधीयताम्॥२॥

भावार्थ :-
‘सूत! तुम शीघ्र ही रत्नों से भरी-पूरी चतुरङ्गिणी सेनाको श्रीराम के पीछे-पीछे जाने की आज्ञा दो॥२॥

श्लोक:
रूपाजीवाश्च वादिन्यो वणिजश्च महाधनाः।
शोभयन्तु कुमारस्य वाहिनीः सुप्रसारिताः॥३॥

भावार्थ :-
‘रूपसे आजीविका चलाने और सरस वचन बोलने वाली स्त्रियाँ तथा महाधनी एवं विक्रययोग्य द्रव्यों का प्रसारण करने में कुशल वैश्य राजकुमार श्रीराम की सेनाओं को सुशोभित करें॥३॥

श्लोक:
ये चैनमुपजीवन्ति रमते यैश्च वीर्यतः।
तेषां बहविधं दत्त्वा तानप्यत्र नियोजय॥४॥

भावार्थ :-
‘जो श्रीराम के पास रहकर जीवन-निर्वाह करते हैं तथा जिन मल्लों से ये उनका पराक्रम देखकर प्रसन्न रहते हैं, उन सबको अनेक प्रकार का धन देकर उन्हें भी इनके साथ जाने की आज्ञा दे दो॥४॥

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वाल्मीकि रामायण- अयोध्याकाण्ड सर्ग- ३७

अयोध्याकाण्डम्
सप्तत्रिंशः सर्गः (सर्ग 37)

( श्रीराम आदि का वल्कल-वस्त्र-धारण, गुरु वसिष्ठ का कैकेयी को फटकारते हुए सीता के वल्कलधारण का अनौचित्य बताना )

श्लोक:
महामात्रवचः श्रुत्वा रामो दशरथं तदा।
अभ्यभाषत वाक्यं तु विनयज्ञो विनीतवत्॥१॥

भावार्थ :-
प्रधान मन्त्री की पूर्वोक्त बात सुनकर विनय के ज्ञाता श्रीराम ने उस समय राजा दशरथ से विनीत होकर कहा-॥१॥

श्लोक:
त्यक्तभोगस्य मे राजन् वने वन्येन जीवतः।
किं कार्यमनुयात्रेण त्यक्तसङ्गस्य सर्वतः॥२॥

भावार्थ :-
‘राजन्! मैं भोगों का परित्याग कर चुका हूँ। मुझे जंगल के फल-मूलों से जीवन-निर्वाह करना है। जब मैं सब ओर से आसक्ति छोड़ चुका हूँ, तब मुझे सेना से क्या प्रयोजन है?॥२॥

श्लोक:
यो हि दत्त्वा द्विपश्रेष्ठं कक्ष्यायां कुरुते मनः।
रज्जुस्नेहेन किं तस्य त्यजतः कुञ्जरोत्तमम्॥३॥

भावार्थ :-
‘जो श्रेष्ठ गजराज का दान करके उसके रस्से में मन लगाता है—लोभवश रस्से को रख लेना चाहता है, वह अच्छा नहीं करता; क्योंकि उत्तम हाथी का त्याग करने वाले पुरुष को उसके रस्से में आसक्ति रखने की क्या आवश्यकता है?॥३॥

श्लोक:
तथा मम सतां श्रेष्ठ किं ध्वजिन्या जगत्पते।
सर्वाण्येवानुजानामि चीराण्येवानयन्तु मे॥४॥

भावार्थ :-
‘सत्पुरुषों में श्रेष्ठ महाराज! इसी तरह मुझे सेना लेकर क्या करना है? मैं ये सारी वस्तुएँ भरत को अर्पित करने की अनुमति देता हूँ। मेरे लिये तो (माता कैकेयी की दासियाँ) चीर (चिथड़े या वल्कलवस्त्र) ला दें॥४॥

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वाल्मीकि रामायण- अयोध्याकाण्ड सर्ग- ३८

अयोध्याकाण्डम्
अष्टात्रिंशः सर्गः (सर्ग 38)

( राजा दशरथ का सीता को वल्कल धारण कराना अनुचित बताकर कैकेयी को फटकारना और श्रीराम का उनसे कौसल्या पर कृपादृष्टि रखने के लिये अनुरोध करना )

श्लोक:
तस्यां चीरं वसानायां नाथवत्यामनाथवत्।
प्रचुक्रोश जनः सर्वो धिक् त्वां दशरथं त्विति॥१॥

भावार्थ :-
सीताजी सनाथ होकर भी जब अनाथ की भाँति चीर-वस्त्र धारण करने लगी, तब सब लोग चिल्लाचिल्लाकर कहने लगे—’राजा दशरथ! तुम्हें धिक्कार है!’॥१॥

श्लोक:
तेन तत्र प्रणादेन दुःखितः स महीपतिः।
चिच्छेद जीविते श्रद्धां धर्मे यशसि चात्मनः॥२॥
स निःश्वस्योष्णमैक्ष्वाकस्तां भार्यामिदमब्रवीत्।
कैकेयि कुशचीरेण न सीता गन्तुमर्हति॥३॥

भावार्थ :-
वहाँ होने वाले उस कोलाहल से दुःखी हो इक्ष्वाकुवंशी महाराज दशरथ ने अपने जीवन, धर्म और यश की उत्कट इच्छा त्याग दी। फिर वे गरम साँस खींचकर अपनी भार्या कैकेयी से इस प्रकार बोले—’कैकेयि! सीता कुश-चीर (वल्कल-वस्त्र) पहनकर वन में जाने के योग्य नहीं है॥२-३॥

श्लोक:
सुकुमारी च बाला च सततं च सुखोचिता।
नेयं वनस्य योग्येति सत्यमाह गुरुर्मम॥४॥

भावार्थ :-
‘यह सुकुमारी है, बालिका है और सदा सुखों में ही पली है। मेरे गुरुजी ठीक कहते हैं कि यह सीता वन में जाने योग्य नहीं है॥४॥

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वाल्मीकि रामायण- अयोध्याकाण्ड सर्ग- ३९

अयोध्याकाण्डम्
एकोनचत्वारिंशः सर्गः (सर्ग 39)

( राजा दशरथ का विलाप,कौसल्या का सीता को पतिसेवा का उपदेश, सीता के द्वारा उसकी स्वीकृति )

श्लोक:
रामस्य तु वचः श्रुत्वा मुनिवेषधरं च तम्।
समीक्ष्य सह भार्याभी राजा विगतचेतनः॥१॥

भावार्थ :-
श्रीराम की बात सुनकर और उन्हें मुनिवेष धारण किये देख स्त्रियोंसहित राजा दशरथ शोक से अचेत हो गये॥१॥

श्लोक:
नैनं दुःखेन संतप्तः प्रत्यवैक्षत राघवम्।
न चैनमभिसम्प्रेक्ष्य प्रत्यभाषत दुर्मनाः॥२॥

भावार्थ :-
दुःख से संतप्त होने के कारण वे श्रीराम की ओर भर आँख देख भी न सके और देखकर भी मन में दुःख होने के कारण उन्हें कुछ उत्तर न दे सके॥२॥

श्लोक:
स मुहूर्तमिवासंज्ञो दुःखितश्च महीपतिः।
विललाप महाबाहू राममेवानुचिन्तयन्॥३॥

भावार्थ :-
दो घड़ी तक अचेत-सा रहने के बाद जब उन्हें होश हुआ, तब वे महाबाहु नरेश श्रीराम का ही चिन्तन करते हुए दुःखी होकर विलाप करने लगे-॥३॥

श्लोक:
मन्ये खल मया पूर्वं विवत्सा बहवः कृताः।
प्राणिनो हिंसिता वापि तन्मामिदमुपस्थितम्॥४॥

भावार्थ :-
‘मालूम होता है, मैंने पूर्वजन्म में अवश्य ही बहुत सी गौओं का उनके बछड़ों से विछोह कराया है अथवा अनेक प्राणियों की हिंसा की है, इसी से आज मेरे ऊपर यह संकट आ पड़ा है॥४॥

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वाल्मीकि रामायण- अयोध्याकाण्ड सर्ग- ४०

अयोध्याकाण्डम्
चत्वारिंशः सर्गः (सर्ग 40)

( सीता, राम और लक्ष्मण का दशरथ की परिक्रमा करके कौसल्या आदि को प्रणाम करना, सीतासहित श्रीराम और लक्ष्मण का रथमें बैठकर वन की ओर प्रस्थान )

श्लोक:
अथ रामश्च सीता च लक्ष्मणश्च कृताञ्जलिः।
उपसंगृह्य राजानं चक्रुर्दीनाः प्रदक्षिणम्॥१॥

भावार्थ :-
तदनन्तर राम, लक्ष्मण और सीता ने हाथ जोड़कर दीनभाव से राजा दशरथ के चरणों का स्पर्श करके उनकी दक्षिणावर्त परिक्रमा की॥१॥

श्लोक:
तं चापि समनुज्ञाप्य धर्मज्ञः सह सीतया।
राघवः शोकसम्मूढो जननीमभ्यवादयत्॥२॥

भावार्थ :-
उनसे विदा लेकर सीतासहित धर्मज्ञ रघुनाथजी ने माता का कष्ट देखकर शोक से व्याकुल हो उनके चरणों में प्रणाम किया॥२॥

श्लोक:
अन्वक्षं लक्ष्मणो भ्रातुः कौसल्यामभ्यवादयत्।
अपि मातुः सुमित्राया जग्राह चरणौ पुनः॥३॥

भावार्थ :-
श्रीराम के बाद लक्ष्मण ने भी पहले माता कौसल्या को प्रणाम किया, फिर अपनी माता सुमित्रा के भी दोनों पैर पकड़े॥३॥

श्लोक:
तं वन्दमानं रुदती माता सौमित्रिमब्रवीत्।।
हितकामा महाबाहं मूर्युपाघ्राय लक्ष्मणम्॥४॥

भावार्थ :-
अपने पुत्र महाबाहु लक्ष्मण को प्रणाम करते देख उनका हित चाहने वाली माता सुमित्रा ने बेटे का मस्तक सूंघकर कहा-॥४॥

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वाल्मीकि रामायण- अयोध्याकाण्ड सर्ग- ४१

अयोध्याकाण्डम्
एकचत्वारिंशः सर्गः (सर्ग 41)

( श्रीराम के वनगमन से रनवास की स्त्रियों का विलाप तथा नगरनिवासियों की शोकाकुल अवस्था )

श्लोक:
तस्मिंस्तु पुरुषव्याघ्र निष्क्रामति कृताञ्जलौ।
आर्तशब्दो हि संजज्ञे स्त्रीणामन्तःपुरे महान्॥१॥

भावार्थ :-
पुरुषसिंह श्रीराम ने माताओं सहित पिता के लिये दूर से ही हाथ जोड़ रखे थे, उसी अवस्था में जब वे रथ द्वारा नगर से बाहर निकलने लगे, उस समय रनवास की रानियों में बड़ा हाहाकार मच गया॥१॥

श्लोक:
अनाथस्य जनस्यास्य दुर्बलस्य तपस्विनः।
यो गतिः शरणं चासीत् स नाथः क्व नु गच्छति॥२॥

भावार्थ :-
वे रोती हुई कहने लगीं—’हाय! जो हम अनाथ, दुर्बल और शोचनीय जनों की गति (सब सुखों की प्राप्ति कराने वाले) और शरण (समस्त आपत्तियों से रक्षा करने वाले) थे, वे हमारे नाथ (मनोरथ पूर्ण करने वाले) श्रीराम कहाँ चले जा रहे हैं?॥२॥

श्लोक:
न क्रुध्यत्यभिशस्तोऽपि क्रोधनीयानि वर्जयन्।
क्रुद्वान् प्रसादयन् सर्वान् समदुःखः क्व गच्छति॥३॥

भावार्थ :-
‘जो किसी के द्वारा झूठा कलंक लगाये जाने पर भी क्रोध नहीं करते थे, क्रोध दिलाने वाली बातें नहीं कहते थे और रूठे हुए सभी लोगों को मनाकर प्रसन्न कर लेते थे, वे दूसरों के दुःख में समवेदना प्रकट करने वाले राम कहाँ जा रहे हैं?॥३॥

श्लोक:
कौसल्यायां महातेजा यथा मातरि वर्तते।
तथा यो वर्ततेऽस्मासु महात्मा क्व नु गच्छति॥४॥

भावार्थ :-
‘जो महातेजस्वी महात्मा श्रीराम अपनी माता कौसल्याके साथ जैसा बर्ताव करते थे, वैसा ही बर्ताव हमारे साथ भी करते थे, वे कहाँ चले जा रहे हैं?॥४॥

श्लोक:
कैकेय्या क्लिश्यमानेन राज्ञा संचोदितो वनम्।
परित्राता जनस्यास्य जगतः क्व नु गच्छति॥५॥

भावार्थ :-
‘कैकेयी के द्वारा क्लेश में डाले गये महाराज के वन जाने के लिये कहने पर हमलोगों की अथवा समस्त जगत् की रक्षा करने वाले श्रीरघुवीर कहाँ चले जा रहे हैं?॥५॥

श्लोक:
अहो निश्चेतनो राजा जीवलोकस्य संक्षयम्।
धर्म्यं सत्यव्रतं रामं वनवासे प्रवत्स्यति॥६॥

भावार्थ :-
‘अहो! ये राजा बड़े बुद्धिहीन हैं, जो कि जीवजगत् के आश्रयभूत, धर्मपरायण, सत्यव्रती श्रीराम को वनवास के लिये देश निकाला दे रहे हैं॥६॥

श्लोक:
इति सर्वा महिष्यस्ता विवत्सा इव धेनवः।
रुरुदुश्चैव दुःखार्ताः सस्वरं च विचुक्रुशुः॥७॥

भावार्थ :-
इस प्रकार वे सब-की-सब रानियाँ बछड़ों से बिछुड़ी हुई गौओं की तरह दुःख से आर्त होकर रोने और उच्चस्वर से क्रन्दन करने लगीं॥७॥

श्लोक:
स तमन्तःपुरे घोरमार्तशब्दं महीपतिः।
पुत्रशोकाभिसंतप्तः श्रुत्वा चासीत् सुदुःखितः॥८॥

भावार्थ :-
अन्तःपुर में वह घोर आर्तनाद सुनकर पुत्रशोक से संतप्त हुए महाराज दशरथ बहुत दुःखी हो गये॥८॥

श्लोक:
नाग्निहोत्राण्यहूयन्त नापचन् गृहमेधिनः।
अकुर्वन् न प्रजाः कार्यं सूर्यश्चान्तरधीयत॥९॥
व्यसृजन् कवलान् नागा गावो वत्सान् न पाययन्।
पुत्रां प्रथमजं लब्ध्वा जननी नाभ्यनन्दत॥१०॥

भावार्थ :-
उस दिन अग्निहोत्र बंद हो गया, गृहस्थों के घर भोजन नहीं बना, प्रजाओं ने कोई काम नहीं किया, सूर्यदेव अस्ताचल को चले गये, हाथियों ने मुँह में लिया हुआ चारा छोड़ दिया, गौओं ने बछड़ों को दूध नहीं पिलाया और पहले-पहल पुत्र को जन्म देकर भी कोई माता प्रसन्न नहीं हुई॥९-१०॥

श्लोक:
त्रिशङ्कर्लोहिताङ्गश्च बृहस्पतिबुधावपि।
दारुणाः सोममभ्येत्य ग्रहाः सर्वे व्यवस्थिताः॥११॥

भावार्थ :-
त्रिशंकु, मङ्गल, गुरु, बुध तथा अन्य समस्त ग्रह शुक्र, शनि आदि रात में वक्रगति से चन्द्रमा के पास पहुँचकर दारुण (क्रूरकान्तियुक्त) होकर स्थित हो गये॥११॥

श्लोक:
नक्षत्राणि गता षि ग्रहाश्च गततेजसः।
विशाखाश्च सधमाश्च नभसि प्रचकाशिरे॥१२॥

भावार्थ :-
नक्षत्रों की कान्ति फीकी पड़ गयी और ग्रह निस्तेज हो गये। वे सब-के-सब आकाश में विपरीत मार्गपर स्थित हो धूमाच्छन्न प्रतीत हो रहे थे॥१२॥

श्लोक:
कालिकानिलवेगेन महोदधिरिवोत्थितः।
रामे वनं प्रव्रजिते नगरं प्रचचाल तत्॥१३॥

भावार्थ :-
आकाश में छायी हुई मेघमाला वायु के वेग से उमड़े हुए समुद्र के समान प्रतीत होती थी। श्रीराम के वन को जाते समय वह सारा नगर जोर-जोर से हिलने लगा (वहाँ भूकम्प आ गया)॥१३॥

श्लोक:
दिशः पर्याकुलाः सर्वास्तिमिरेणेव संवृताः।
न ग्रहो नापि नक्षत्रं प्रचकाशे न किंचन॥१४॥

भावार्थ :-
समस्त दिशाएँ व्याकुल हो उठीं, उनमें अन्धकार सा छा गया। न कोई ग्रह प्रकाशित होता था, न नक्षत्र॥१४॥

श्लोक:
अकस्मान्नागरः सर्वो जनो दैन्यमुपागमत्।
आहारे वा विहारे वा न कश्चिदकरोन्मनः॥१५॥

भावार्थ :-
सहसा सारे नागरिक दीन-दशा को प्राप्त हो गये। किसी ने भी आहार या विहार में मन नहीं लगाया॥१५॥

श्लोक:
शोकपर्यायसंतप्तः सततं दीर्घमुच्छ्वसन्।
अयोध्यायां जनः सर्वश्चुक्रोश जगतीपतिम्॥१६॥

भावार्थ :-
अयोध्यावासी सब लोग शोकपरम्परा से संतप्त हो निरन्तर लंबी साँस खींचते हुए राजा दशरथ को कोसने लगे॥१६॥

श्लोक:
बाष्पपर्याकुलमुखो राजमार्गगतो जनः।
न हृष्टो लभ्यते कश्चित् सर्वः शोकपरायणः॥१७॥

भावार्थ :-
सड़क पर निकला हुआ कोई भी मनुष्य प्रसन्न नहीं दिखायी देता था। सबका मुख आँसुओं से भीगा हुआ था और सभी शोकमग्न हो रहे थे॥१७॥

श्लोक:
न वाति पवनः शीतो न शशी सौम्यदर्शनः।
न सूर्यस्तपते लोकं सर्वं पर्याकुलं जगत्॥१८॥

भावार्थ :-
शीतल वायु नहीं चलती थी। चन्द्रमा सौम्य नहीं दिखायी देता था। सूर्य भी जगत् को उचित मात्रा में ताप या प्रकाश नहीं दे रहा था। सारा संसार ही व्याकुल हो उठा था॥१८॥

श्लोक:
अनर्थिनः सुताः स्त्रीणां भर्तारो भ्रातरस्तथा।
सर्वे सर्वं परित्यज्य राममेवान्वचिन्तयन्॥१९॥

भावार्थ :-
बालक माँ-बाप को भूल गये। पतियों को स्त्रियों की याद नहीं आती थी और भाई भाई का स्मरण नहीं करते थे- सभी सब कुछ छोड़कर केवल श्रीराम का ही चिन्तन करने लगे॥१९॥

श्लोक:
ये तु रामस्य सुहृदः सर्वे ते मूढचेतसः।
शोकभारेण चाक्रान्ताः शयनं नैव भेजिरे॥२०॥

भावार्थ :-
जो श्रीराम के मित्र थे, वे सब तो और भी अपनी सुध-बुध खो बैठे थे। शोक के भार से आक्रान्त होने के कारण वे रात में सोये तक नहीं॥२०॥

श्लोक:
ततस्त्वयोध्या रहिता महात्मना पुरन्दरेणेव मही सपर्वता।
चचाल घोरं भयशोकदीपिता सनागयोधाश्वगणा ननाद च॥२१॥

भावार्थ :-
इस प्रकार सारी अयोध्यापुरी श्रीराम से रहित होकर भय और शोक से प्रज्वलित-सी होकर उसी प्रकार घोर हलचल में पड़ गयी, जैसे देवराज इन्द्र से रहित हुई मेरु-पर्वतसहित यह पृथ्वी डगमगाने लगती है। हाथी, घोड़े और सैनिकों सहित उस नगरी में भयंकर आर्तनाद होने लगा॥२१॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे एकचत्वारिंशः सर्गः॥४१॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में इकतालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥४१॥

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वाल्मीकि रामायण- अयोध्याकाण्ड सर्ग- ४२

अयोध्याकाण्डम्
द्विचत्वारिंशः सर्गः (सर्ग 42)

( राजा दशरथ का पृथ्वी पर गिरना, श्रीराम के लिये विलाप करना, कैकेयी को अपने पास आने से मना करना और उसे त्याग देना )

श्लोक:
यावत् तु निर्यतस्तस्य रजोरूपमदृश्यत।
नैवेक्ष्वाकुवरस्तावत् संजहारात्मचक्षुषी॥१॥

भावार्थ :-
वन की ओर जाते हुए श्रीराम के रथ की धूल जबतक दिखायी देती रही, तब तक इक्ष्वाकुवंश के स्वामी राजा दशरथ ने उधर से अपनी आँखें नहीं हटायीं॥१॥

श्लोक:
यावद् राजा प्रियं पुत्रं पश्यत्यत्यन्तधार्मिकम्।
तावद् व्यवर्धतेवास्य धरण्यां पुत्रदर्शने॥२॥

भावार्थ :-
वे महाराज अपने अत्यन्त धार्मिक प्रिय पुत्र को जबतक देखते रहे, तबतक पुत्र को देखने के लिये उनका शरीर मानो पृथ्वी पर बढ़ रहा था- वे ऊँचे उठ-उठकर उनकी ओर निहार रहे थे॥२॥

श्लोक:
न पश्यति रजोऽप्यस्य यदा रामस्य भूमिपः।
तदार्तश्च निषण्णश्च पपात धरणीतले॥३॥

भावार्थ :-
जब राजा को श्रीराम के रथ की धूल भी नहीं दिखायी देने लगी, तब वे अत्यन्त आर्त और विषादग्रस्त हो पृथ्वी पर गिर पड़े॥३॥

श्लोक:
तस्य दक्षिणमन्वागात् कौसल्या बाहुमङ्गना।
परं चास्यान्वगात् पार्वं कैकेयी सा सुमध्यमा॥४॥

भावार्थ :-
उस समय उन्हें सहारा देने के लिये उनकी धर्मपत्नी कौसल्या देवी दाहिनी बाँह के पास आयीं और सुन्दरी कैकेयी उनके वामभाग में जा पहुँचीं॥४॥

श्लोक:
तां नयेन च सम्पन्नो धर्मेण विनयेन च।
उवाच राजा कैकेयीं समीक्ष्य व्यथितेन्द्रियः॥५॥

भावार्थ :-
कैकेयी को देखते ही नय, विनय और धर्म से सम्पन्न राजा दशरथ की समस्त इन्द्रियाँ व्यथित हो उठीं; वे बोल उठे-॥५॥

श्लोक:
कैकेयि मामकाङ्गानि मा स्पाक्षीः पापनिश्चये।
नहि त्वां द्रष्टुमिच्छामि न भार्या न च बान्धवी॥६॥

भावार्थ :-
‘पापपूर्ण विचार रखने वाली कैकेयि! तू मेरे अङ्गों का स्पर्श न कर मैं तुझे देखना नहीं चाहता। तू न तो मेरी भार्या है और न बान्धवी॥६॥

श्लोक:
ये च त्वामनुजीवन्ति नाहं तेषां न ते मम।
केवलार्थपरां हि त्वां त्यक्तधर्मां त्यजाम्यहम्॥७॥

भावार्थ :-
‘जो तेरा आश्रय लेकर जीवन-निर्वाह करते हैं, मैं उनका स्वामी नहीं हूँ और वे मेरे परिजन नहीं हैं। तूने केवल धन में आसक्त होकर धर्मका त्याग किया है, इसलिये मैं तेरा परित्याग करता हूँ॥७॥

श्लोक:
अगृह्णां यच्च ते पाणिमग्निं पर्यणयं च यत्।
अनुजानामि तत् सर्वमस्मिंल्लोके परत्र च॥८॥

भावार्थ :-
‘मैंने जो तेरा पाणिग्रहण किया है और तुझे साथ लेकर अग्निकी परिक्रमा की है, तेरे साथ का वह सारा सम्बन्ध इस लोक और परलोक के लिये भी त्याग देता हूँ॥८॥

श्लोक:
भरतश्चेत् प्रतीतः स्याद् राज्यं प्राप्यैतदव्ययम्।
यन्मे स दद्यात् पित्रर्थं मा मां तद्दत्तमागमत्॥९॥

भावार्थ :-
‘तेरा पुत्र भरत भी यदि इस विघ्न-बाधा से रहित राज्य को पाकर प्रसन्न हो तो वह मेरे लिये श्राद्ध में जो कुछ पिण्ड या जल आदि दान करे, वह मुझे प्राप्त न हो’॥९॥

श्लोक:
अथ रेणुसमुद्ध्वस्तं समुत्थाप्य नराधिपम्।
न्यवर्तत तदा देवी कौसल्या शोककर्शिता॥१०॥

भावार्थ :-
तदनन्तर शोक से कातर हुई कौसल्या देवी उस समय धरती पर लोटने के कारण धूल से व्याप्त हुए महाराज को उठाकर उनके साथ राजभवन की ओर लौटीं॥१०॥

श्लोक:
हत्वेव ब्राह्मणं कामात् स्पृष्ट्वाग्निमिव पाणिना।
अन्वतप्यत धर्मात्मा पुत्रं संचिन्त्य राघवम्॥११॥

भावार्थ :-
जैसे कोई जान-बूझकर स्वेच्छापूर्वक ब्राह्मण की हत्या कर डाले अथवा हाथ से प्रज्वलित अग्नि का स्पर्श कर ले और ऐसा करके संतप्त होता रहे, उसी प्रकार धर्मात्मा राजा दशरथ अपने ही दिये हुए वरदान के कारण वन में गये हुए श्रीराम का चिन्तन करके अनुतप्त हो रहे थे॥११॥

श्लोक:
निवृत्यैव निवृत्यैव सीदतो रथवर्त्मसु।
राज्ञो नातिबभौ रूपं ग्रस्तस्यांशुमतो यथा॥१२॥

भावार्थ :-
राजा दशरथ बारंबार पीछे लौटकर रथ के मार्गो पर देखने का कष्ट उठाते थे। उस समय उनका रूप राहुग्रस्त सूर्य की भाँति अधिक शोभा नहीं पाता था॥१२॥

श्लोक:
विललाप स दुःखार्तः प्रियं पुत्रमनुस्मरन्।
नगरान्तमनुप्राप्तं बुद्ध्वा पुत्रमथाब्रवीत्॥१३॥

भावार्थ :-
वे अपने प्रिय पुत्र का बारंबार स्मरण करके दुःख से आतुर हो विलाप करने लगे। वे बेटे को नगर की सीमा पर पहुँचा हुआ समझकर इस प्रकार कहने लगे–॥१३॥

श्लोक:
वाहनानां च मुख्यानां वहतां तं ममात्मजम्।
पदानि पथि दृश्यन्ते स महात्मा न दृश्यते॥१४॥

भावार्थ :-
‘हाय! मेरे पुत्र को वन की ओर ले जाते हुए श्रेष्ठ वाहनों (घोड़ों) के पदचिह्न तो मार्ग में दिखायी देते हैं; परंतु उन महात्मा श्रीराम का दर्शन नहीं हो रहा है॥१४॥

श्लोक:
यः सुखेनोपधानेषु शेते चन्दनरूषितः।
वीज्यमानो महार्हाभिः स्त्रीभिर्मम सतोत्तमः॥१५॥
स नूनं क्वचिदेवाद्य वृक्षमूलमुपाश्रितः।
काष्ठं वा यदि वाश्मानमुपधाय शयिष्यते॥१६॥

भावार्थ :-
‘जो मेरे श्रेष्ठ पुत्र श्रीराम चन्दन से चर्चित हो तकियों का सहारा लेकर उत्तम शय्याओं पर सुख से सोते थे और उत्तम अलंकारों से विभूषित सुन्दरी स्त्रियाँ जिन्हें व्यजन डुलाती थीं, वे निश्चय ही आज कहीं वृक्ष की जड़का आश्रय ले अथवा किसी काठ या पत्थर को सिर के नीचे रखकर भूमिपर ही शयन करेंगे॥१५-१६॥

श्लोक:
उत्थास्यति च मेदिन्याः कृपणः पांसुगुण्ठितः।
विनिःश्वसन प्रस्रवणात् करेणूनामिवर्षभः॥१७॥

भावार्थ :-
‘फिर अङ्गों में धूल लपेटे दीन की भाँति लंबी साँस खींचते हुए वे उस शयन-भूमि से उसी प्रकार उठेंगे, जैसे किसी झरने के पास से गजराज उठता है॥१७॥

श्लोक:
द्रक्ष्यन्ति नूनं पुरुषा दीर्घबाहं वनेचराः।
राममुत्थाय गच्छन्तं लोकनाथमनाथवत्॥१८॥

भावार्थ :-
‘निश्चय ही वन में रहने वाले मनुष्य लोकनाथ महाबाहु श्रीराम को वहाँ से अनाथ की भाँति उठकर जाते हुए देखेंगे॥१८॥

श्लोक:
सा नूनं जनकस्येष्टा सुता सुखसदोचिता।
कण्टकाक्रमणक्लान्ता वनमद्य गमिष्यति॥१९॥

भावार्थ :-
‘जो सदा सुख भोगने के ही योग्य है, वह जनक की प्यारी पुत्री सीता आज अवश्य ही काँटों पर पैर पड़ने से व्यथा का अनुभव करती हुई वन को जायगी॥१९॥

श्लोक:
अनभिज्ञा वनानां सा नूनं भयमुपैष्यति।
श्वपदानर्दितं श्रुत्वा गम्भीरं रोमहर्षणम्॥२०॥

भावार्थ :-
‘वह वन के कष्टों से अनभिज्ञ है। वहाँ व्याघ्र आदि हिंसक जन्तुओं का गम्भीर तथा रोमाञ्चकारी गर्जनतर्जन सुनकर निश्चय ही भयभीत हो जायगी॥२०॥

श्लोक:
सकामा भव कैकेयि विधवा राज्यमावस।
नहि तं पुरुषव्याघ्रं विना जीवितुमुत्सहे॥२१॥

भावार्थ :-
‘अरी कैकेयी! तू अपनी कामना सफल कर ले और विधवा होकर राज्य भोग। मैं पुरुषसिंह श्रीराम के बिना जीवित नहीं रह सकता’॥२१॥

श्लोक:
इत्येवं विलपन् राजा जनौघेनाभिसंवृतः।
अपस्नात इवारिष्टं प्रविवेश गृहोत्तमम्॥२२॥

भावार्थ :-
इस प्रकार विलाप करते हुए राजा दशरथ ने मरघट से नहाकर आये हुए पुरुष की भाँति मनुष्यों की भारी भीड़ से घिरकर अपने शोकपूर्ण उत्तम भवन में प्रवेश किया॥२२॥

श्लोक:
शून्यचत्वरवेश्मान्तां संवृतापणवेदिकाम्।
क्लान्तदुर्बलदुःखार्ती नात्याकीर्णमहापथाम्॥२३॥
तामवेक्ष्य पुरीं सर्वां राममेवानुचिन्तयन्।
विलपन् प्राविशद् राजा गृहं सूर्य इवाम्बुदम्॥२४॥

भावार्थ :-
उन्होंने देखा, अयोध्यापुरी के प्रत्येक घर का बाहरी चबूतरा और भीतरी भाग भी सूना हो रहा है। (क्योंकि उन घरों के सब लोग श्रीराम के पीछे चले गये थे।) बाजार-हाट बंद है। जो लोग नगर में हैं, वे भी अत्यन्त क्लान्त, दुर्बल और दुःख से आतुर हो रहे हैं तथा बड़ी-बड़ी सड़कों पर भी अधिक आदमी जाते-आते नहीं दिखायी देते हैं। सारे नगर की यह अवस्था देखकर श्रीराम के लिये ही चिन्ता और विलाप करते हुए राजा उसी तरह महल के भीतर गये,जैसे सूर्य मेघों की घटा में छिप जाते हैं॥२३-२४॥

श्लोक:
महाह्रदमिवाक्षोभ्यं सुपर्णेन हृतोरगम्।
रामेण रहितं वेश्म वैदेह्या लक्ष्मणेन च॥२५॥

भावार्थ :-
श्रीराम, लक्ष्मण और सीता से रहित वह राजभवन उस महान् अक्षोभ्य जलाशय के समान जान पड़ता था, जिसके भीतर के नाग को गरुड़ उठा ले गये हों॥२५॥

श्लोक:
अथ गद्गदशब्दस्तु विलपन् वसुधाधिपः।
उवाच मृदु मन्दार्थं वचनं दीनमस्वरम्॥२६॥

भावार्थ :-
उस समय विलाप करते हुए राजा दशरथ ने गद्गद वाणी में द्वारपालों से यह मधुर, अस्पष्ट, दीनतायुक्त और स्वाभाविक स्वर से रहित बात कही-॥२६॥

श्लोक:
कौसल्याया गृहं शीघ्रं राममातुर्नयन्तु माम्।
नह्यन्यत्र ममाश्वासो हृदयस्य भविष्यति॥२७॥

भावार्थ :-
‘मुझे शीघ्र ही श्रीराम-माता कौसल्या के घरमें पहुँचा दो; क्योंकि मेरे हृदय को और कहीं शान्ति नहीं मिल सकती’॥२७॥

श्लोक:
इति ब्रुवन्तं राजानमनयन् द्वारदर्शिनः।
कौसल्याया गृहं तत्र न्यवेस्यत विनीतवत्॥२८॥

भावार्थ :-
ऐसी बात कहते हुए राजा दशरथ को द्वारपालों ने बड़ी विनय के साथ रानी कौसल्या के भवन में पहुँचाया और पलंगपर सुला दिया॥२८॥

श्लोक:
ततस्तत्र प्रविष्टस्य कौसल्याया निवेशनम्।
अधिरुह्यापि शयनं बभूव लुलितं मनः॥२९॥

भावार्थ :-
वहाँ कौसल्या के भवन में प्रवेश करके पलंगपर आरूढ़ हो जाने पर भी राजा दशरथ का मन चञ्चल एवं मलिन ही रहा॥२९॥

श्लोक:
पुत्रद्वयविहीनं च स्नुषया च विवर्जितम्।
अपश्यद् भवनं राजा नष्टचन्द्रमिवाम्बरम्॥३०॥

भावार्थ :-
दोनों पुत्र और पुत्रवधू सीता से रहित वह भवन राजा को चन्द्रहीन आकाश की भाँति श्रीहीन दिखायी देने लगा॥३०॥

श्लोक:
तच्च दृष्ट्वा महाराजो भुजमुद्यम्य वीर्यवान्।
उच्चैःस्वरेण प्राक्रोशद्धा राम विजहासि नौ॥३१॥
सुखिता बत तं कालं जीविष्यन्ति नरोत्तमाः।
परिष्वजन्तो ये रामं द्रक्ष्यन्ति पुनरागतम्॥३२॥

भावार्थ :-
उसे देखकर पराक्रमी महाराज ने एक बाँह ऊपर उठाकर उच्चस्वर से विलाप करते हुए कहा- ’हा राम! तुम हम दोनों माता-पिता को त्याग दे रहे हो। जो नरश्रेष्ठ चौदह वर्षों की अवधितक जीवित रहेंगे और अयोध्या में पुनः लौटे हुए श्रीराम को हृदय से लगाकर देखेंगे, वे ही वास्तव में सुखी होंगे’॥३१-३२॥

श्लोक:
अथ रात्र्यां प्रपन्नायां कालरात्र्यामिवात्मनः।
अर्धरात्रे दशरथः कौसल्यामिदमब्रवीत्॥३३॥

भावार्थ :-
तदनन्तर अपनी कालरात्रि के समान वह रात्रि आने पर राजा दशरथ ने आधी रात होने पर कौसल्या से इस प्रकार कहा-॥३३॥

श्लोक:
न त्वां पश्यामि कौसल्ये साधु मां पाणिना स्पृश।
रामं मेऽनुगता दृष्टिरद्यापि न निवर्तते॥३४॥

भावार्थ :-
‘कौसल्ये! मेरी दृष्टि श्रीराम के ही साथ चली गयी और वह अब तक नहीं लौटी है; अतः मैं तुम्हें देख नहीं पाता हूँ। एक बार अपने हाथ से मेरे शरीर का स्पर्श तो करो’॥३४॥

श्लोक:
तं राममेवानुविचिन्तयन्तं समीक्ष्य देवी शयने नरेन्द्रम्।
उपोपविश्याधिकमार्तरूपा विनिश्वसन्तं विललाप कृच्छ्रम्॥३५॥

भावार्थ :-
शय्यापर पड़े हुए महाराज दशरथ को श्रीराम का ही चिन्तन करते और लंबी साँस खींचते देख देवी कौसल्या अत्यन्त व्यथित हो उनके पास आ बैठी और बड़े कष्ट से विलाप करने लगीं॥३५॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे द्विचत्वारिंशः सर्गः॥४२॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में बयालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥४२॥

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वाल्मीकि रामायण- अयोध्याकाण्ड सर्ग- ४३

अयोध्याकाण्डम्
त्रिचत्वारिंशः सर्गः (सर्ग 43)

( महारानी कौसल्या का विलाप )

श्लोक:
ततः समीक्ष्य शयने सन्नं शोकेन पार्थिवम्।
कौसल्या पुत्रशोकार्ता तमुवाच महीपतिम्॥१॥

भावार्थ :-
शय्या पर पड़े हुए राजा को पुत्रशोक से व्याकुल देख पुत्र के ही शोक से पीड़ित हुई कौसल्या ने उन महाराज से कहा-॥१॥

श्लोक:
राघवे नरशार्दूले विषं मुक्त्वाहिजिह्मगा।
विचरिष्यति कैकेयी निर्मुक्तेव हि पन्नगी॥२॥

भावार्थ :-
‘नरश्रेष्ठ श्रीराम पर अपना विष उँडेलकर टेढ़ी चाल से चलने वाली कैकेयी केंचुल छोड़कर नूतन शरीर से प्रकट हुई सर्पिणी की भाँति अब स्वच्छन्द विचरेगी॥२॥

श्लोक:
विवास्य रामं सुभगा लब्धकामा समाहिता।
त्रासयिष्यति मां भूयो दुष्टाहिरिव वेश्मनि॥३॥

भावार्थ :-
‘जैसे घर में रहने वाला दुष्ट सर्प बारंबार भय देता रहता है, उसी प्रकार श्रीरामचन्द्र को वनवास देकर सफलमनोरथ हुई सुभगा कैकेयी सदा सावधान होकर मुझे त्रास देती रहेगी॥३॥

श्लोक:
अथास्मिन् नगरे रामश्चरन् भैक्षं गृहे वसेत्।
कामकारो वरं दातुमपि दासं ममात्मजम्॥४॥

भावार्थ :-
‘यदि श्रीराम इस नगर में भीख माँगते हुए भी घर में रहते अथवा मेरे पुत्र को कैकेयी का दास भी बना दिया गया होता तो वैसा वरदान मुझे भी अभीष्ट होता (क्योंकि उस दशा में मुझे भी श्रीराम का दर्शन होता रहता। श्रीराम के वनवास का वरदान तो कैकेयी ने मुझे दुःख देने के लिये ही माँगा है।)॥४॥

श्लोक:
पातयित्वा तु कैकेय्या रामं स्थानाद् यथेष्टतः।
प्रविद्धो रक्षसां भागः पर्वणीवाहिताग्निना॥५॥

भावार्थ :-
‘कैकेयी ने अपनी इच्छा के अनुसार श्रीराम को उनके स्थान से भ्रष्ट करके वैसा ही किया है, जैसे किसी अग्निहोत्री ने पर्व के दिन देवताओं को उनके भाग से वञ्चित करके राक्षसों को वह भाग अर्पित कर दिया हो॥५॥

श्लोक:
नागराजगतिर्वीरो महाबाहुर्धनुर्धरः।
वनमाविशते नूनं सभार्यः सहलक्ष्मणः॥६॥

भावार्थ :-
‘गजराज के समान मन्द गति से चलने वाले वीर महाबाहु धनुर्धर श्रीराम निश्चय ही अपनी पत्नी और लक्ष्मण के साथ वन में प्रवेश कर रहे होंगे॥६॥

श्लोक:
वने त्वदृष्टदुःखानां कैकेय्यनुमते त्वया।
त्यक्तानां वनवासाय कान्यावस्था भविष्यति॥७॥

भावार्थ :-
‘महाराज! जिन्होंने जीवन में कभी दुःख नहीं देखे थे, उन श्रीराम, लक्ष्मण और सीता को आपने कैकेयी की बातों में आकर वन में भेज दिया। अब उन बेचारों की वनवास के कष्ट भोगने के सिवा और क्या अवस्था होगी?॥७॥

श्लोक:
ते रत्नहीनास्तरुणाः फलकाले विवासिताः।
कथं वत्स्यन्ति कृपणाः फलमूलैः कृताशनाः॥८॥

भावार्थ :-
‘रत्नतुल्य उत्तम वस्तुओं से वञ्चित वे तीनों तरुण सुखरूप फल भोगने के समय घर से निकाल दिये गये। अब वे बेचारे फल-मूल का भोजन करके कैसे रह सकेंगे?॥८॥

श्लोक:
अपीदानीं स कालः स्यान्मम शोकक्षयः शिवः।
सहभार्यं सह भ्रात्रा पश्येयमिह राघवम्॥९॥

भावार्थ :-
क्या अब फिर मेरे शोक को नष्ट करने वाला वह शुभ समय आयेगा, जब मैं सीता और लक्ष्मण के साथ वन से लौटे हुए श्रीराम को देखूगी?॥९॥

श्लोक:
श्रुत्वैवोपस्थितौ वीरौ कदायोध्या भविष्यति।
यशस्विनी हृष्टजना सूच्छ्रितध्वजमालिनी॥१०॥

भावार्थ :-
‘कब वह शुभ अवसर प्राप्त होगा जब कि ‘वीर श्रीराम और लक्ष्मण वन से लौट आये’ यह सुनते ही यशस्विनी अयोध्यापुरी के सब लोग हर्ष से उल्लसित हो उठेगे और घर-घर फहराये गये ऊँचे-ऊँचे ध्वजसमूह पुरी की शोभा बढ़ाने लगेंगे॥१०॥

श्लोक:
कदा प्रेक्ष्य नरव्याघ्रावरण्यात् पुनरागतौ।
भविष्यति पुरी हृष्टा समुद्र इव पर्वणि॥११॥

भावार्थ :-
‘नरश्रेष्ठ श्रीराम और लक्ष्मण को पुनः वन से आया हुआ देख यह अयोध्यापुरी पूर्णिमा के उमड़ते हुए समुद्र की भाँति कब हर्षोल्लास से परिपूर्ण होगी?॥११॥

श्लोक:
कदायोध्यां महाबाहुः पुरीं वीरः प्रवेक्ष्यति।
पुरस्कृत्य रथे सीतां वृषभो गोवधूमिव॥१२॥

भावार्थ :-
‘जैसे साँड़ गाय को आगे करके चलता है, उसी प्रकार वीर महाबाहु श्रीराम रथ पर सीता को आगे करके कब अयोध्यापुरी में प्रवेश करेंगे?॥१२॥

श्लोक:
कदा प्राणिसहस्राणि राजमार्गे ममात्मजौ।
लाजैरवकरिष्यन्ति प्रविशन्तावरिंदमौ॥१३॥

भावार्थ :-
‘कब यहाँ के सहस्रों मनुष्य पुरी में प्रवेश करते और राजमार्ग पर चलते हुए मेरे दोनों शत्रुदमन पुत्रों पर लावा (खील)-की वर्षा करेंगे?॥१३॥

श्लोक:
प्रविशन्तौ कदायोध्यां द्रक्ष्यामि शुभकुण्डलौ।
उदग्रायुधनिस्त्रिंशौ सशृङ्गाविव पर्वतौ॥१४॥

भावार्थ :-
‘उत्तम आयुध एवं खड्ग लिये शिखरयुक्त पर्वतों के समान प्रतीत होने वाले श्रीराम और लक्ष्मण सुन्दर कुण्डलों से अलंकृत हो कब अयोध्यापुरी में  प्रवेश करते हुए मेरे नेत्रों के समक्ष प्रकट होंगे?॥१४॥
१४॥

श्लोक:
कदा सुमनसः कन्या द्विजातीनां फलानि च।
प्रदिशन्त्यः पुरीं हृष्टाः करिष्यन्ति प्रदक्षिणम्॥१५॥

भावार्थ :-
‘कब ब्राह्मणों की कन्याएँ हर्षपूर्वक फूल और फल अर्पण करती हुई अयोध्यापुरी की परिक्रमा करेंगी?॥१५॥

श्लोक:
कदा परिणतो बुद्धया वयसा चामरप्रभाः।
अभ्युपैष्यति धर्मात्मा सुवर्ष इव लालयन्॥१६॥

भावार्थ :-
‘कब ज्ञान में बढ़े-चढ़े और अवस्था में देवताओं के समान तेजस्वी धर्मात्मा श्रीराम उत्तम वर्षा की भाँति जनसमुदाय का लालन करते हुए यहाँ पधारेंगे?॥१६॥

श्लोक:
निःसंशयं मया मन्ये पुरा वीर कदर्यया।
पातुकामेषु वत्सेषु मातृणां शातिताः स्तनाः॥१७॥

भावार्थ :-
‘वीर! इसमें संदेह नहीं कि पूर्व जन्म में मुझ नीच आचार-विचारवाली नारी ने बछड़ों के दूध पीने के लिये उद्यत होते ही उनकी माताओं के स्तन काट दिये होंगे॥१७॥

श्लोक:
साहं गौरिव सिंहेन विवत्सा वत्सला कृता।
कैकेय्या पुरुषव्याघ्र बालवत्सेव गौर्बलात्॥ १८॥

भावार्थ :-
‘पुरुषसिंह ! जैसे किसी सिंह ने छोटे-से बछड़े वालीवत्सला गौ को बलपूर्वक बछड़े से हीन कर दिया हो, उसी प्रकार कैकेयी ने मुझे बलात् अपने बेटे से विलग कर दिया है॥१८॥

श्लोक:
नहि तावद्गुणैर्जुष्टं सर्वशास्त्रविशारदम्।
एकपुत्रा विना पुत्रमहं जीवितुमुत्सहे ॥१९॥

भावार्थ :-
‘जो उत्तम गुणों से युक्त और सम्पूर्ण शास्त्रों में प्रवीण हैं, उन अपने पुत्र श्रीराम के बिना मैं इकलौते बेटेवाली माँ जीवित नहीं रह सकती॥१९॥

श्लोक:
न हि मे जीविते किंचित् सामर्थ्यमिह कल्प्यते।
अपश्यन्त्याः प्रियं पुत्रं लक्ष्मणं च महाबलम्॥२०॥

भावार्थ :-
‘अब प्यारे पुत्र श्रीराम और महाबली लक्ष्मण को देखे बिना मुझमें जीवित रहने की कुछ भी शक्ति नहीं है॥२०॥

श्लोक:
अयं हि मां दीपयतेऽद्य वह्निस्तनूजशोकप्रभवो महाहितः।
महीमिमां रश्मिभिरुत्तमप्रभो यथा निदाघे भगवान् दिवाकरः॥२१॥

भावार्थ :-
‘जैसे ग्रीष्म ऋतु में उत्कृष्ट प्रभावाले भगवान् सूर्य अपनी किरणों द्वारा इस पृथ्वी को अधिक ताप देते हैं, उसी प्रकार यह पुत्रशोकजनित महान् अहितकारक अग्नि आज मुझे जलाये दे रही है’॥२१॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे त्रिचत्वारिंशः सर्गः॥४३॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में तैंतालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥४३॥

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वाल्मीकि रामायण- अयोध्याकाण्ड सर्ग- ४४

अयोध्याकाण्डम्
चतुश्चत्वारिंशः सर्गः (सर्ग 44)

( सुमित्रा का कौसल्या को आश्वासन देना )

श्लोक:
विलपन्ती तथा तां तु कौसल्यां प्रमदोत्तमाम्।
इदं धर्मे स्थिता धन॑ सुमित्रा वाक्यमब्रवीत्॥१॥

भावार्थ :-
नारियों में श्रेष्ठ कौसल्या को इस प्रकार विलाप करती देख धर्मपरायणा सुमित्रा यह धर्मयुक्त बात बोली-॥१॥

श्लोक:
तवार्ये सद्गुणैर्युक्तः स पुत्रः पुरुषोत्तमः।
किं ते विलपितेनैवं कृपणं रुदितेन वा॥२॥

भावार्थ :-
‘आर्ये! तुम्हारे पुत्र श्रीराम उत्तम गुणों से युक्त और पुरुषों में श्रेष्ठ हैं। उनके लिये इस प्रकार विलाप करना और दीनतापूर्वक रोना व्यर्थ है, इस तरह रोने-धोने से क्या लाभ?॥२॥

श्लोक:
यस्तवार्ये गतः पुत्रस्त्यक्त्वा राज्यं महाबलः।
साधु कुर्वन् महात्मानं पितरं सत्यवादिनम्॥३॥
शिष्टैराचरिते सम्यक्शश्वत् प्रेत्य फलोदये।
रामो धर्मे स्थितः श्रेष्ठो न स शोच्यः कदाचन॥४॥

भावार्थ :-
‘बहिन! जो राज्य छोड़कर अपने महात्मा पिता को भलीभाँति सत्यवादी बनाने के लिये वन में चले गये हैं, वे तुम्हारे महाबली श्रेष्ठ पुत्र श्रीराम उस उत्तम धर्म में स्थित हैं, जिसका सत्पुरुषों ने सर्वदा और सम्यक् प्रकार से पालन किया है तथा जो परलोक में भी सुखमय फल प्रदान करने वाला है। ऐसे धर्मात्मा के लिये कदापि शोक नहीं करना चाहिये॥३-४॥

श्लोक:
वर्तते चोत्तमां वृत्तिं लक्ष्मणोऽस्मिन् सदानघः।
दयावान् सर्वभूतेषु लाभस्तस्य महात्मनः॥५॥

भावार्थ :-
‘निष्पाप लक्ष्मण समस्त प्राणियों के प्रति दयालु हैं। वे सदा श्रीराम के प्रति उत्तम बर्ताव करते हैं, अतः उन महात्मा लक्ष्मण के लिये यह लाभ की ही बात है॥५॥

श्लोक:
अरण्यवासे यद् दुःखं जानन्त्येव सुखोचिता।
अनुगच्छति वैदेही धर्मात्मानं तवात्मजम्॥६॥

भावार्थ :-
‘विदेहनन्दिनी सीता भी जो सुख भोगने के ही योग्य है, वनवास के दुःखों को भलीभाँति सोच-समझकर ही तुम्हारे धर्मात्मा पुत्र का अनुसरण करती है॥६॥

श्लोक:
कीर्तिभूतां पताकां यो लोके भ्रमयति प्रभुः।
धर्मः सत्यव्रतपरः किं न प्राप्तस्तवात्मजः॥७॥

भावार्थ :-
‘जो प्रभु संसार में अपनी कीर्तिमयी पताका फहरा रहे हैं और सदा सत्यव्रत के पालन में तत्पर रहते हैं, उन धर्मस्वरूप तुम्हारे पुत्र श्रीराम को कौन-सा श्रेय प्राप्त नहीं हुआ है॥७॥

श्लोक:
व्यक्तं रामस्य विज्ञाय शौचं माहात्म्यमुत्तमम्।
न गात्रमंशुभिः सूर्यः संतापयितुमर्हति॥८॥

भावार्थ :-
‘श्रीराम की पवित्रता और उत्तम माहात्म्य को जानकर निश्चय ही सूर्य अपनी किरणों द्वारा उनके शरीर को संतप्त नहीं कर सकते॥८॥

श्लोक:
शिवः सर्वेषु कालेषु काननेभ्यो विनिःसृतः।
राघवं युक्तशीतोष्णः सेविष्यति सुखोऽनिलः॥९॥

भावार्थ :-
‘सभी समयों में वनों से निकली हई उचित सरदी और गरमी से युक्त सुखद एवं मङ्गलमय वायु श्रीरघुनाथजी की सेवा करेगी॥९॥

श्लोक:
शयानमनघं रात्रौ पितेवाभिपरिष्वजन्।
घर्मघ्नः संस्पृशन् शीतश्चन्द्रमा ह्लादयिष्यति॥१०॥

भावार्थ :-
‘रात्रिकाल में धूप का कष्ट दूर करने वाले शीतल चन्द्रमा सोते हुए निष्पाप श्रीराम का अपने किरणरूपी करों से आलिङ्गन और स्पर्श करके उन्हें आह्लाद प्रदान करेंगे॥१०॥

श्लोक:
ददौ चास्त्राणि दिव्यानि यस्मै ब्रह्मा महौजसे।
दानवेन्द्रं हतं दृष्ट्वा तिमिध्वजसुतं रणे॥११॥

भावार्थ :-
‘श्रीराम के द्वारा रणभूमि में तिमिध्वज (शम्बर)-के पुत्र दानवराज सुबाहु को मारा गया देख विश्वामित्रजी ने उन महातेजस्वी वीरको बहुत-से दिव्यास्त्र प्रदान किये थे॥११॥

श्लोक:
स शूरः पुरुषव्याघ्रः स्वबाहुबलमाश्रितः।
असंत्रस्तो शरण्येऽसौ वेश्मनीव निवत्स्यते॥१२॥

भावार्थ :-
‘वे पुरुषसिंह श्रीराम बड़े शूरवीर हैं। वे अपने ही बाहुबल का आश्रय लेकर जैसे महल में रहते थे, उसी तरह वन में भी निडर होकर रहेंगे॥१२॥

श्लोक:
यस्येषुपथमासाद्य विनाशं यान्ति शत्रवः।
कथं न पृथिवी तस्य शासने स्थातुमर्हति॥१३॥

भावार्थ :-
‘जिनके बाणों का लक्ष्य बनकर सभी शत्रु विनाशको प्राप्त होते हैं, उनके शासन में यह पृथ्वी और यहाँ के प्राणी कैसे नहीं रहेंगे?॥१३॥

श्लोक:
या श्रीः शौर्यं च रामस्य या च कल्याणसत्त्वता।
निवृत्तारण्यवासः स्वं क्षिप्रं राज्यमवाप्स्यति॥१४॥

भावार्थ :-
‘श्रीराम की जैसी शारीरिक शोभा है, जैसा पराक्रम है और जैसी कल्याणकारिणी शक्ति है, उससे जान पड़ता है कि वे वनवास से लौटकर शीघ्र ही अपना राज्य प्राप्त कर लेंगे॥१४॥

श्लोक:
सूर्यस्यापि भवेत् सूर्यो ह्यग्नेरग्नः प्रभोः प्रभुः।
श्रियाः श्रीश्च भवेदग्र्या कीर्त्याः कीर्तिः क्षमाक्षमा॥१५॥
दैवतं देवतानां च भूतानां भूतसत्तमः।
तस्य के ह्यगुणा देवि वने वाप्यथवा पुरे॥१६॥

भावार्थ :-
‘देवि! श्रीराम सूर्य के भी सूर्य (प्रकाशक) और अग्नि के भी अग्नि (दाहक) हैं। वे प्रभु के भी प्रभु, लक्ष्मी की भी उत्तम लक्ष्मी और क्षमा की भी क्षमा हैं। इतना ही नहीं वे देवताओं के भी देवता तथा भूतों के भी उत्तम भूत हैं। वे वन में रहें या नगर में, उनके लिये कौन-से चराचर प्राणी दोषावह हो सकते हैं॥१५-१६॥

श्लोक:
पृथिव्या सह वैदेह्या श्रिया च पुरुषर्षभः।
क्षिप्रं तिसृभिरेताभिः सह रामोऽभिषेक्ष्यते॥१७॥

भावार्थ :-
‘पुरुषशिरोमणि श्रीराम शीघ्र ही पृथ्वी, सीता और लक्ष्मी- इन तीनों के साथ राज्य पर अभिषिक्त होंगे॥१७॥

श्लोक:
दुःख विसृजत्यश्रु निष्क्रामन्तमुदीक्ष्य यम्।
अयोध्यायां जनः सर्वः शोकवेगसमाहतः॥१८॥
कुशचीरधरं वीरं गच्छन्तमपराजितम्।
सीतेवानुगता लक्ष्मीस्तस्य किं नाम दुर्लभम्॥१९॥

भावार्थ :-
जिनको नगर से निकलते देख अयोध्या का सारा जनसमुदाय शोक के वेग से आहत हो नेत्रों से दुःखके आँसू बहा रहा है, कुश और चीर धारण करके वन को जाते हुए जिन अपराजित नित्यविजयी वीर के पीछे-पीछे सीता के रूप में साक्षात् लक्ष्मी ही गयी है, उनके लिये क्या दुर्लभ है?॥१८-१९॥

श्लोक:
धनुर्ग्रहवरो यस्य बाणखड्गास्त्रभृत् स्वयम्।
लक्ष्मणो व्रजति ह्यग्रे तस्य किं नाम दुर्लभम्॥२०॥

भावार्थ :-
‘जिनके आगे धनुर्धारियों में श्रेष्ठ लक्ष्मण स्वयं बाण और खड्ग आदि अस्त्र लिये जा रहे हैं, उनके लिये जगत् में कौन-सी वस्तु दुर्लभ है?॥२०॥

श्लोक:
निवृत्तवनवासं तं द्रष्टासि पुनरागतम्।
जहि शोकं च मोहं च देवि सत्यं ब्रवीमि ते॥२१॥

भावार्थ :-
‘देवि! मैं तुमसे सत्य कहती हूँ। तुम वनवास की अवधि पूर्ण होने पर यहाँ लौटे हुए श्रीराम को फिर देखोगी, इसलिये तुम शोक और मोह छोड़ दो॥२१॥

श्लोक:
शिरसा चरणावेतौ वन्दमानमनिन्दिते।
पुनर्द्रक्ष्यसि कल्याणि पुत्रं चन्द्रमिवोदितम्॥२२॥

भावार्थ :-
‘कल्याणि! अनिन्दिते! तुम नवोदित चन्द्रमा के समान अपने पुत्र को पुनः अपने चरणों में मस्तक रखकर प्रणाम करते देखोगी॥२२॥

श्लोक:
पुनः प्रविष्टं दृष्ट्वा तमभिषिक्तं महाश्रियम्।
समुत्स्रक्ष्यसि नेत्राभ्यां शीघ्रमानन्दजं जलम्॥ २३॥

भावार्थ :-
‘राजभवन में प्रविष्ट होकर पुनः राजपद पर अभिषिक्त हुए अपने पुत्र को बड़ी भारी राजलक्ष्मी से सम्पन्न देखकर तुम शीघ्र ही अपने नेत्रों से आनन्द के आँसू बहाओगी॥२३॥

श्लोक:
मा शोको देवि दुःखं वा न रामे दृष्यतेऽशिवम्।
क्षिप्रं द्रक्ष्यसि पुत्रं त्वं ससीतं सहलक्ष्मणम्॥२४॥

भावार्थ :-
‘देवि! श्रीराम के लिये तुम्हारे मन में शोक और दुःख नहीं होना चाहिये; क्योंकि उनमें कोई अशुभ बात नहीं दिखायी देती। तुम सीता और लक्ष्मण के साथ अपने पुत्र श्रीराम को शीघ्र ही यहाँ उपस्थित देखोगी॥२४॥

श्लोक:
त्वयाऽशेषो जनश्चायं समाश्वास्यो यतोऽनघे।
कमिदानीमिदं देवि करोषि हृदि विक्लवम्॥२५॥

भावार्थ :-
‘पापरहित देवि! तुम्हें तो इन सब लोगों को धैर्य बँधाना चाहिये, फिर स्वयं ही इस समय अपने हृदय में इतना दुःख क्यों करती हो?॥२५॥

श्लोक:
नार्हा त्वं शोचितुं देवि यस्यास्ते राघवः सुतः।
नहि रामात् परो लोके विद्यते सत्पथे स्थितः॥२६॥

भावार्थ :-
‘देवि! तुम्हें शोक नहीं करना चाहिये; क्योंकि तुम्हें रघुकुलनन्दन राम-जैसा बेटा मिला है। श्रीराम से बढ़कर सन्मार्ग में स्थिर रहने वाला मनुष्य संसार में दूसरा कोई नहीं है॥२६॥

श्लोक:
अभिवादयमानं तं दृष्ट्वा ससुहृदं सुतम्।
मृदाश्र मोक्ष्यसे क्षिप्रं मेघरेखेव वार्षिकी॥२७॥

भावार्थ :-
‘जैसे वर्षाकाल के मेघों की घटा जल की वृष्टि करती है, उसी प्रकार तुम सुहृदोंसहित अपने पुत्र श्रीराम को अपने चरणों में प्रणाम करते देख शीघ्र ही आनन्दपूर्वक आँसुओं की वर्षा करोगी॥२७॥

श्लोक:
पुत्रस्ते वरदः क्षिप्रमयोध्यां पुनरागतः।
कराभ्यां मृदुपीनाभ्यां चरणौ पीडयिष्यति॥२८॥

भावार्थ :-
‘तुम्हारे वरदायक पुत्र पुनः शीघ्र ही अयोध्या में आकर अपने मोटे-मोटे कोमल हाथों द्वारा तुम्हारे दोनों पैरों को दबायँगे॥२८॥

श्लोक:
अभिवाद्य नमस्यन्तं शूरं ससुहृदं सुतम्।
मुदाझैः प्रोक्षसे पुत्रं मेघराजिरिवाचलम्॥२९॥

भावार्थ :-
‘जैसे मेघमाला पर्वत को नहलाती है, उसी प्रकार तुम अभिवादन करके नमस्कार करते हुए सुहृदोंसहित अपने शूरवीर पुत् रका आनन्द के आँसुओं से अभिषेक करोगी’॥२९॥

श्लोक:
आश्वासयन्ती विविधैश्च वाक्यैः क्योपचारे कुशलानवद्या।
रामस्य तां मातरमेवमुक्त्वा देवी सुमित्रा विरराम रामा॥३०॥

भावार्थ :-
बातचीत करने में कुशल, दोषरहित तथा रमणीय रूपवाली देवी सुमित्रा इस प्रकार तरह-तरह की बातों से श्रीराम माता कौसल्या को आश्वासन देती हुई उपर्युक्त बातें कहकर चुप हो गयीं॥३०॥

श्लोक:
निशम्य तल्लक्ष्मणमातृवाक्यं रामस्य मातुर्नरदेवपत्न्याः।
सद्यः शरीरे विननाश शोकः शरद्गतो मेघ इवाल्पतोयः॥३१॥

भावार्थ :-
लक्ष्मण की माता का वह वचन सुनकर महाराज दशरथ की पत्नी तथा श्रीराम की माता कौसल्या का सारा शोक उनके शरीर (मन) में ही तत्काल विलीन हो गया। ठीक उसी तरह, जैसे शरद् ऋतु का थोड़े जलवाला बादल शीघ्र ही छिन्न-भिन्न हो जाता है॥३१॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे चतुश्चत्वारिंशः सर्गः॥४४॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में चौवालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥४४॥

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वाल्मीकि रामायण- अयोध्याकाण्ड सर्ग- ४५

अयोध्याकाण्डम्
पञ्चचत्वारिंशः सर्गः (सर्ग 45)

( नगर के वृद्ध ब्राह्मणों का श्रीराम से लौट चलने के लिये आग्रह करना तथा उन सबके साथ श्रीराम का तमसा तट पर पहुँचना )

श्लोक:
अनुरक्ता महात्मानं रामं सत्यपराक्रमम्।
अनुजग्मुः प्रयान्तं तं वनवासाय मानवाः॥१॥

भावार्थ :-
उधर सत्यपराक्रमी महात्मा श्रीराम जब वन की ओर जाने लगे, उस समय उनके प्रति अनुराग रखने वाले बहुत-से अयोध्यावासी मनुष्य वन में निवास करने के लिये उनके पीछे-पीछे चल दिये॥१॥

श्लोक:
निवर्तितेऽतीव बलात् सुहृद्धर्मेण राजनि।
नैव ते संन्यवर्तन्त रामस्यानुगता रथम्॥२॥

भावार्थ :-
जिसके जल्दी लौटने की कामना की जाय, उस स्वजन को दूर तक नहीं पहुँचाना चाहिये’–इत्यादि रूप से बताये गये सुहृद्धर्म के अनुसार जब राजा दशरथ बलपूर्वक लौटा दिये गये, तब भी जो श्रीरामजी के रथ के पीछे-पीछे लगे हुए थे, वे अयोध्यावासी अपने घर की ओर नहीं लौटे॥२॥

श्लोक:
अयोध्यानिलयानां हि पुरुषाणां महायशाः।
बभूव गुणसम्पन्नः पूर्णचन्द्र इव प्रियः॥३॥

भावार्थ :-
क्योंकि अयोध्यावासी पुरुषों के लिये सद्गुणसम्पन्न महायशस्वी श्रीराम पूर्ण चन्द्रमा के समान प्रिय हो गये थे॥३॥

श्लोक:
स याच्यमानः काकुत्स्थस्ताभिः प्रकृतिभिस्तदा।
कुर्वाणः पितरं सत्यं वनमेवान्वपद्यत॥४॥

भावार्थ :-
उन प्रजाजनों ने श्रीराम से घर लौट चलने के लिये बहुत प्रार्थना की; किंतु वे पिता के सत्य की रक्षा करने के लिये वन की ओर ही बढ़ते गये॥४॥

श्लोक:
अवेक्षमाणः सस्नेहं चक्षुषा प्रपिबन्निव।
उवाच रामः सस्नेहं ताः प्रजाः स्वाः प्रजा इव॥५॥

भावार्थ :-
वे प्रजाजनों को इस प्रकार स्नेहभरी दृष्टि से देख रहे थे मानो नेत्रों से उन्हें पी रहे हों। उस समय श्रीराम ने अपनी संतान के समान प्रिय उन प्रजाजनों से स्नेहपूर्वक कहा-॥५॥

श्लोक:
या प्रीतिर्बहुमानश्च मय्ययोध्यानिवासिनाम्।
मत्प्रियार्थं विशेषेण भरते सा विधीयताम्॥६॥

भावार्थ :-
‘अयोध्यानिवासियों का मेरे प्रति जो प्रेम और आदर है, वह मेरी ही प्रसन्नता के लिये भरत के प्रति और अधिक रूप में होना चाहिये॥६॥

श्लोक:
स हि कल्याणचारित्रः कैकेय्यानन्दवर्धनः।
करिष्यति यथावद् वः प्रियाणि च हितानि च॥७॥

भावार्थ :-
‘उनका चरित्र बड़ा ही सुन्दर और सबका कल्याण करने वाला है। कैकेयी का आनन्द बढ़ाने वाले भरत आप लोगों का यथावत् प्रिय और हित करेंगे॥७॥

श्लोक:
ज्ञानवृद्धो वयोबालो मृदुर्वीर्यगुणान्वितः।
अनुरूपः स वो भर्ता भविष्यति भयापहः॥८॥

भावार्थ :-
‘वे अवस्था में छोटे होने पर भी ज्ञान में बड़े हैं। पराक्रमोचित गुणों से सम्पन्न होने पर भी स्वभाव के बड़े कोमल हैं। वे आपलोगों के लिये योग्य राजा होंगे और प्रजा के भय का निवारण करेंगे॥८॥

श्लोक:
स हि राजगुणैर्युक्तो युवराजः समीक्षितः।
अपि चापि मया शिष्टैः कार्यं वो भर्तृशासनम्॥९॥

भावार्थ :-
‘वे मुझसे भी अधिक राजोचित गुणों से युक्त हैं, इसीलिये महाराज ने उन्हें युवराज बनाने का निश्चय किया है; अतः आपलोगों को अपने स्वामी भरत की आज्ञा का सदा पालन करना चाहिये॥९॥

श्लोक:
न संतप्येद् यथा चासौ वनवासं गते मयि।
महाराजस्तथा कार्यो मम प्रियचिकीर्षया॥१०॥

भावार्थ :-
‘मेरे वन में चले जाने पर महाराज दशरथ जिस प्रकार भी शोक से संतप्त न होने पायें, इस बात के लिये आपलोग सदा चेष्टा रखें। मेरा प्रिय करने की इच्छा से आपको मेरी इस प्रार्थना पर अवश्य ध्यान देना चाहिये’॥१०॥

श्लोक:
यथा यथा दाशरथिर्धर्ममेवाश्रितो भवेत।
तथा तथा प्रकृतयो रामं पतिमकामयन्॥११॥

भावार्थ :-
दशरथनन्दन श्रीराम ने ज्यों-ज्यों धर्म का आश्रय लेने के लिये ही दृढ़ता दिखायी, त्यों-ही-त्यों प्रजाजनों के मन में उन्हीं को अपना स्वामी बनाने की इच्छा प्रबल होती गयी॥११॥

श्लोक:
बाष्पेण पिहितं दीनं रामः सौमित्रिणा सह।
चकर्षेव गुणैर्बद्धं जनं पुरनिवासिनम्॥१२॥

भावार्थ :-
समस्त पुरवासी अत्यन्त दीन होकर आँसू बहा रहे थे और लक्ष्मणसहित श्रीराम मानो अपने गुणों में बाँधकर उन्हें खींचे लिये जा रहे थे॥१२॥

श्लोक:
ते द्विजास्त्रिविधं वृद्धा ज्ञानेन वयसौजसा।
वयःप्रकम्पशिरसो दूरादूचुरिदं वचः॥१३॥

भावार्थ :-
उनमें बहुत-से ब्राह्मण थे, जो ज्ञान, अवस्था और तपोबल–तीनों ही दृष्टियों से बड़े थे। वृद्धावस्था के कारण कितनों के तो सिर काँप रहे थे। वे दूर से ही इस प्रकार बोले-॥१३॥

श्लोक:
वहन्तो जवना रामं भो भो जात्यास्तुरंगमाः।
निवर्तध्वं न गन्तव्यं हिता भवत भर्तरि॥१४॥

भावार्थ :-
‘अरे! ओ तेज चलने वाले अच्छी जाति के घोड़ो!तुम बड़े वेगशाली हो और श्रीराम को वन की ओर लिये जा रहे हो, लौटो! अपने स्वामी के हितैषी बनो! तुम्हें वन में नहीं जाना चाहिये॥१४॥

श्लोक:
कर्णवन्ति हि भूतानि विशेषेण तुरङ्गमाः।
यूयं तस्मान्निवर्तध्वं याचनां प्रतिवेदिताः॥१५॥

भावार्थ :-
‘यों तो सभी प्राणियों के कान होते हैं, परंतु घोड़ों के कान बड़े होते हैं; अतः तुम्हें हमारी याचना का ज्ञान तो हो ही गया होगा; इसलिये घर की ओर लौट चलो॥१५॥

श्लोक:
धर्मतः स विशुद्धात्मा वीरः शुभदृढव्रतः।
उपवाह्यस्तु वो भर्ता नापवाह्यः पुराद् वनम्॥१६॥

भावार्थ :-
‘तुम्हारे स्वामी श्रीराम विशुद्धात्मा, वीर और उत्तम व्रत का दृढ़ता से पालन करने वाले हैं, अतः तुम्हें इनका उपवहन करना चाहिये- इन्हें बाहर से नगर के समीप ले चलना चाहिये। नगर से वन की ओर इनका अपवहन करना—इन्हें ले जाना तुम्हारे लिये कदापि उचित नहीं है’॥१६॥

श्लोक:
एवमार्तप्रलापांस्तान् वृद्धान् प्रलपतो द्विजान्।
अवेक्ष्य सहसा रामो रथादवततार ह॥१७॥

भावार्थ :-
वृद्ध ब्राह्मणों को इस प्रकार आर्तभाव से प्रलाप करते देख श्रीरामचन्द्रजी सहसा रथ से नीचे उतर गये॥१७॥

श्लोक:
पद्भ्यामेव जगामाथ ससीतः सहलक्ष्मणः।
संनिकृष्टपदन्यासो रामो वनपरायणः॥१८॥

भावार्थ :-
वे सीता और लक्ष्मण के साथ पैदल ही चलने लगे। ब्राह्मणों का साथ न छूटे, इसके लिये वे अपना पैर बहुत निकट रखते थे-लंबे डग से नहीं चलते थे। वन में पहुँचना ही उनकी यात्रा का परम लक्ष्य था॥१८॥

श्लोक:
द्विजातीन् हि पदातींस्तान् रामश्चारित्रवत्सलः।
न शशाक घृणाचक्षुः परिमोक्तुं रथेन सः॥१९॥

भावार्थ :-
श्रीरामचन्द्रजी के चरित्र में वात्सल्य-गुण की प्रधानता थी। उनकी दृष्टि में दया भरी हुई थी; इसलिये वे रथ के द्वारा चलकर उन पैदल चलने वाले ब्राह्मणों को पीछे छोड़ने का साहस न कर सके॥१९॥

श्लोक:
गच्छन्तमेव तं दृष्ट्वा रामं सम्भ्रान्तमानसाः।
ऊचुः परमसंतप्ता रामं वाक्यमिदं द्विजाः॥२०॥

भावार्थ :-
श्रीराम को अब भी वन की ओर ही जाते देख वे ब्राह्मण मन-ही-मन घबरा उठे और अत्यन्त संतप्त होकर उनसे इस प्रकार बोले-॥२०॥

श्लोक:
ब्राह्मण्यं कृत्स्नमेतत् त्वां ब्रह्मण्यमनुगच्छति।
द्विजस्कन्धाधिरूढास्त्वामग्नयोऽप्यनुयान्त्वमी॥२१॥

भावार्थ :-
‘रघुनन्दन! तुम ब्राह्मणों के हितैषी हो, इसीसे यह सारा ब्राह्मण-समाज तुम्हारे पीछे-पीछे चल रहा है। इन ब्राह्मणों के कंधों पर चढ़कर अग्निदेव भी तुम्हारा अनुसरण कर रहे हैं॥२१॥

श्लोक:
वाजपेयसमुत्थानि च्छत्राण्येतानि पश्य नः।
पृष्ठतोऽनुप्रयातानि मेघानिव जलात्यये॥२२॥

भावार्थ :-
‘वर्षा बीतने पर शरद् ऋतु में दिखायी देने वाले सफेद बादलों के समान हमारे इन श्वेत छत्रों की ओर देखो, जो तुम्हारे पीछे-पीछे चल पड़े हैं। ये हमें वाजपेय-यज्ञ में प्राप्त हुए थे॥२२॥

श्लोक:
अनवाप्तातपत्रस्य रश्मिसंतापितस्य ते।
एभिश्छायां करिष्यामः स्वैश्छत्रैर्वाजपेयकैः॥२३॥

भावार्थ :-
‘तुम्हें राजकीय श्वेतच्छत्र नहीं प्राप्त हुआ, अतएव तुम सूर्यदेव की किरणों से संतप्त हो रहे हो। इस अवस्था में हम वाजपेय-यज्ञ में प्राप्त हुए इन अपने छत्रों द्वारा तुम्हारे लिये छाया करेंगे॥२३॥

श्लोक:
या हि नः सततं बुद्धिर्वेदमन्त्रानुसारिणी।
त्वत्कृते सा कृता वत्स वनवासानुसारिणी॥२४॥

भावार्थ :-
‘वत्स! हमारी जो बुद्धि सदा वेदमन्त्रों के पीछे चलती थी—उन्हीं के चिन्तन में लगी रहती थी, वही तुम्हारे लिये वनवास का अनुसरण करने वाली हो गयी है॥२४॥

श्लोक:
हृदयेष्ववतिष्ठन्ते वेदा ये नः परं धनम्।
वत्स्यन्त्यपि गृहेष्वेव दाराश्चारित्ररक्षिताः॥२५॥

भावार्थ :-
‘जो हमारे परम धन वेद हैं, वे हमारे हृदयों में स्थित हैं। हमारी स्त्रियाँ अपने चरित्रबल से सुरक्षित रहकर घरों में ही रहेंगी॥२५॥

श्लोक:
पुनर्न निश्चयः कार्यस्त्वद्गतौ सुकृता मतिः।
त्वयि धर्मव्यपेक्षे तु किं स्याद् धर्मपथे स्थितम्॥२६॥

भावार्थ :-
‘अब हमें अपने कर्तव्य के विषय में पुनः कुछ निश्चय नहीं करना है। हमने तुम्हारे साथ जाने का विचार स्थिर कर लिया है। तो भी हमें इतना अवश्य कहना है कि ‘जब तुम ही ब्राह्मण की आज्ञा के पालनरूपी धर्म की ओर से निरपेक्ष हो जाओगे, तब दूसरा कौन प्राणी धर्ममार्ग पर स्थित रह सकेगा॥२६॥

श्लोक:
याचितो नो निवर्तस्व हंसशुक्लशिरोरुहैः।
शिरोभिर्निभृताचार महीपतनपांसुलैः॥२७॥

भावार्थ :-
‘सदाचार का पोषण करने वाले श्रीराम! हमारे सिर के बाल पककर हंस के समान सफेद हो गये हैं और पृथ्वी पर पड़कर साष्टाङ्ग प्रणाम करने से इनमें धूल भर गयी है। हम अपने ऐसे मस्तकों को झुकाकर तुमसे याचना करते हैं कि तुम घर को लौट चलो (वे तत्त्वज्ञ ब्राह्मण यह जानते थे कि श्रीराम साक्षात् भगवान् विष्णु हैं। इसीलिये उनका श्रीराम के प्रति प्रणाम करना दोष की बात नहीं है)॥२७॥

श्लोक:
बहूनां वितता यज्ञा द्विजानां य इहागताः।
तेषां समाप्तिरायत्ता तव वत्स निवर्तने॥२८॥

भावार्थ :-
(इतने पर भी जब श्रीराम नहीं रुके, तब वे ब्राह्मण । बोले-) वत्स! जो लोग यहाँ आये हैं, इनमें बहुत। से ऐसे ब्राह्मण हैं, जिन्होंने यज्ञ आरम्भ कर दियाहै;अब इनके यज्ञोंकी समाप्ति तुम्हारे लौटनेपर ही निर्भर है॥२८॥

श्लोक:
भक्तिमन्तीह भूतानि जङ्गमाजङ्गमानि च।
याचमानेषु तेषु त्वं भक्तिं भक्तेषु दर्शय॥२९॥

भावार्थ :-
‘संसार के स्थावर और जङ्गम सभी प्राणी तुम्हारे प्रति भक्ति रखते हैं। वे सब तुमसे लौट चलने की प्रार्थना कर रहे हैं। अपने उन भक्तों पर तुम अपना स्नेह दिखाओ॥२९॥

श्लोक:
अनुगन्तुमशक्तास्त्वां मूलैरुद्धतवेगिनः।
उन्नता वायुवेगेन विक्रोशन्तीव पादपाः॥३०॥

भावार्थ :-
‘ये वृक्ष अपनी जड़ों के कारण अत्यन्त वेगहीन हैं, इसी से तुम्हारे पीछे नहीं चल सकते; परंतु वायु के वेग से इनमें जो सनसनाहट पैदा होती है, उनके द्वारा ये ऊँचे वृक्ष मानो तुम्हें पुकार रहे हैं तुमसे लौट चलने की प्रार्थना कर रहे हैं॥३०॥

श्लोक:
निश्चेष्टाहारसंचारा वृक्षकस्थाननिश्चिताः।
पक्षिणोऽपि प्रयाचन्ते सर्वभूतानुकम्पिनम्॥३१॥

भावार्थ :-
‘जो सब प्रकार की चेष्टा छोड़ चुके हैं, चारा चुगने के लिये भी कहीं उड़कर नहीं जाते हैं और निश्चित रूप से वृक्ष के एक स्थान पर ही पड़े रहते हैं, वे पक्षी भी तुमसे लौट चलने के लिये प्रार्थना कर रहे हैं; क्योंकि तुम समस्त प्राणियों पर कृपा करने वाले हो’॥३१॥

श्लोक:
एवं विक्रोशतां तेषां द्विजातीनां निवर्तने।
ददृशे तमसा तत्र वारयन्तीव राघवम्॥३२॥

भावार्थ :-
इस प्रकार श्रीराम से लौटने के लिये पुकार मचाते हुए उन ब्राह्मणों पर मानो कृपा करने के लिये मार्ग में तमसा नदी दिखायी दी, जो अपने तिर्यक्-प्रवाह (तिरछी धारा) से श्रीरघुनाथजी को रोकती हुई-सी प्रतीत होती थी॥३२॥

श्लोक:
ततः सुमन्त्रोऽपि रथाद् विमुच्य श्रान्तान् हयान् सम्परिवर्त्य शीघ्रम्।
पीतोदकांस्तोयपरिप्लुताङ्गानचारयद् वै तमसाविदूरे॥३३॥

भावार्थ :-
वहाँ पहुँचने पर सुमन्त्र ने भी थके हुए घोड़ों को शीघ्र ही रथ से खोलकर उन सबको टहलाया, फिर पानी पिलाया और नहलाया, तत्पश्चात् तमसा के निकट ही चरने के लिये छोड़ दिया॥३३॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे पञ्चचत्वारिंशः सर्गः॥४५॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में पैंतालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥४५॥

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