श्री भगवद् गीता | Shri Bhagavad Geeta

मुख पृष्ठश्री भगवद् गीता


॥ श्री गणेशाय नमः ॥
॥ श्री कमलापति नम: ॥
॥ श्री मद् भगवद् गीता ॥
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श्रीभगवद्गीता

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श्री भगवद् गीता

हिन्दू धर्म में श्री भगवद गीता को हमेशा से ही पूजा जाता रहा है। अगर आप इसे अच्छे से पढ़ेंगे, जानेंगे और समझेंगे, तभी आप इसके गुणों और उपदेशों को महत्व देंगे और उन्हें अपने जीवन में उतारेंगे। इसमें व्यक्ति के जन्म से लेकर मृत्यु तक और उसके बाद के चक्र के विषय में स्पष्ट वर्णन मिलता है। चलिए श्री गणेश करते हैं।

महाभारत युद्ध शुरू होने से ठीक पहले भगवान कृष्ण द्वारा अर्जुन को दिया गया उपदेश श्रीमद्भगवद्गीता के नाम से प्रसिद्ध है। यह महाभारत के भीष्मपर्व- (छठा अध्याय) का एक हिस्सा है। गीता में 18 अध्याय और 700 श्लोक हैं। गीता जी का ज्ञान आज से (सन 2025) लगभग 5563 वर्ष पूर्व बोला गया था। गीता की गणना प्रस्थानत्रयी में की जाती है, जिसमें उपनिषद और ब्रह्मसूत्र भी सम्मिलित हैं। इसलिए भारतीय परंपरा के अनुसार गीता का स्थान उपनिषद और धर्मसूत्र के समान ही है।

मित्रो श्री भगवद् गीता का पाठ आरंभ करने से पूर्व निम्न श्लोक को भावार्थ सहित पढ़कर श्रीहरिविष्णु का ध्यान करें-

श्लोक:
ॐ शान्ताकारं भुजगशयनं पद्यनाभं सुरेशं
विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम्।
लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं
वन्दे विष्णु भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्॥1॥

भावार्थ:- जिनकी आकृति अतिशय शांत है, जो शेषनाग की शैया पर शयन किए हुए हैं, जिनकी नाभि में कमल है, जो ‍देवताओं के भी ईश्वर और संपूर्ण जगत के आधार हैं, जो आकाश के सदृश सर्वत्र व्याप्त हैं, नीलमेघ के समान जिनका वर्ण है, अतिशय सुंदर जिनके संपूर्ण अंग हैं, जो योगियों द्वारा ध्यान करके प्राप्त किए जाते हैं, जो संपूर्ण लोकों के स्वामी हैं, जो जन्म-मरण रूप भय का नाश करने वाले हैं, ऐसे लक्ष्मीपति, कमलनेत्र भगवान श्रीविष्णु को मैं प्रणाम करता हूँ॥1॥

श्लोक:
यं ब्रह्मा वरुणेन्द्ररुद्रमरुत: स्तुन्वन्ति दिव्यै: स्तवै- र्वेदै: साङ्गपदक्रमोपनिषदैर्गायन्ति यं सामगा:।
ध्यानावस्थिततद्गतेन मनसा पश्यन्ति यं योगिनो- यस्तानं न विदु: सुरासुरगणा देवाय तस्मै नम:॥2॥

भावार्थ:- ब्रह्मा, वरुण, इन्द्र, रुद्र और मरुद्‍गण दिव्य स्तोत्रों द्वारा जिनकी स्तुति करते हैं, सामवेद के गाने वाले अंग, पद, क्रम और उपनिषदों के सहित वेदों द्वारा जिनका गान करते हैं, योगीजन ध्यान में स्थित तद्‍गत हुए मन से जिनका दर्शन करते हैं, देवता और असुर गण (कोई भी) जिनके अन्त को नहीं जानते, उन (परमपुरुष नारायण) देव के लिए मेरा नमस्कार है॥2॥

श्री भगवद् गीता पाठ

आप जिस किसी भी अध्याय के बिषय में पढ़ना या विस्तार पूर्वक जानना चाहते हैं तब कृपया दिए गए लिंक पर क्लिक कीजिए।

पहला अध्याय
दूसरा अध्याय
तीसरा अध्याय
चौथा अध्याय
पॉंचवा अध्याय
छठा अध्याय
सातवॉं अध्याय
आठवॉं अध्याय
नौवॉं अध्याय
दसवॉं अध्याय
ग्यारहवॉं अध्याय
बारहवॉं अध्याय
तेरहवॉं अध्याय
चौदहवॉं अध्याय
पंद्रहवॉं अध्याय
सोलहवॉं अध्याय
सत्रहवॉं अध्याय
अठारहवॉं अध्याय

कल्याण की इच्छा वाले मनुष्यों को उचित है कि मोह का त्याग कर अतिशय श्रद्धा-भक्तिपूर्वक किसी भी धार्मिक ग्रंथ का पाठ करना चाहिए और अपने बच्चों को भी अर्थ और भाव के साथ अखंड रामायण का अध्ययन नियमित रूप से कराएँ।

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  AI श्रीरामचरितमानस पाठ  ≣≣≣ 

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