॥ श्री गणेशाय नमः ॥
॥ श्री कमलापति नम: ॥
॥ श्री जानकीवल्लभो विजयते ॥
॥ श्री वाल्मीकि रामायण ॥
दान करें 🗳
Pay By UPI
Name:- Manish Kumar ChaturvediMobile:- +919554988808
Click On UPI Id:-
9554988808@hdfcbank
mnspandit@ybl
mnskumar@axisbank
9554988808@ybl
Pay In Account
AI वाल्मीकि रामायण
(भावार्थ सहित)
सब एक ही स्थान पर
ध्यान दें 👉 मित्र हम शीघ्र ही यहॉं पर AI के साथ वाल्मीकि रामायण को आप तक पहुंचाने जा रहें हैं। जो AI द्वारा शुद्ध, सटीक उच्चारण और मधुर स्वर के साथ सुसज्जित होगा। जिससे आपके पाठ करने का आनंद 2 गुना अधिक हो जाएगा। संभवतः AI श्रीरामचरितमानस के जैसे यह भी आपको पसंद आयेगा।
👉कृपया परीक्षण के लिए नीचे पारायण विधि के अंदर जाकर [AI का उपयोग करें] बटन पर क्लिक करें। और यदि संभव हो तब कमेंट बॉक्स में अपना विचार भी व्यक्त कर सकते हैं। धन्यवाद.
अखंड रामायण
⫷। । अंग्रेज़ी मे । । ⫸
यदि आप अखंड रामायण को अंग्रेज़ी मे पढ़ना चाहते है तब कृपया दिए गये लिंक पर क्लिक कीजिए।
📕 • तुलसीदास द्वारा रचित अंग्रेज़ी मे:- ₹50 ₹25
– AI बालकाण्ड
– AI अयोध्याकाण्ड
– AI अरण्यकाण्ड
– AI किष्किन्धाकाण्ड
– AI सुन्दरकाण्ड
– AI युद्धकाण्ड
– AI उत्तरकाण्ड
पारायण विधि
कथन समय समाप्त होगा: 00:00
तुलसीक नमस्तुभ्यमिहागच्छ शुचिव्रत।
नैर्ऋत्य उपविश्येदं पूजनं प्रतिगृह्यताम्॥१॥
ॐ तुलसीदासाय नमः
श्रीवाल्मीक नमस्तुभ्यमिहागच्छ शुभप्रद।
उत्तरपूर्वयोर्मध्ये तिष्ठ गृह्णीष्व मेऽर्चनम्॥२॥
ॐ वाल्मीकाय नमः
गौरीपते नमस्तुभ्यमिहागच्छ महेश्वर।
पूर्वदक्षिणयोर्मध्ये तिष्ठ पूजां गृहाण मे॥३॥
ॐ गौरीपतये नमः
श्रीलक्ष्मण नमस्तुभ्यमिहागच्छ सहप्रियः।
याम्यभागे समातिष्ठ पूजनं संगृहाण मे॥४॥
ॐ श्रीसपत्नीकाय लक्ष्मणाय नमः
श्रीशत्रुघ्न नमस्तुभ्यमिहागच्छ सहप्रियः।
पीठस्य पश्चिमे भागे पूजनं स्वीकुरुष्व मे॥५॥
ॐ श्रीसपत्नीकाय शत्रुघ्नाय नमः
श्रीभरत नमस्तुभ्यमिहागच्छ सहप्रियः।
पीठकस्योत्तरे भागे तिष्ठ पूजां गृहाण मे॥६॥
ॐ श्रीसपत्नीकाय भरताय नमः
श्रीहनुमन्नमस्तुभ्यमिहागच्छ कृपानिधे।
पूर्वभागे समातिष्ठ पूजनं स्वीकुरु प्रभो॥७॥
ॐ हनुमते नमः
अथ प्रधानपूजा च कर्तव्या विधिपूर्वकम्।
पुष्पाञ्जलिं गृहीत्वा तु ध्यानं कुर्यात्परस्य च॥८॥
रक्ताम्भोजदलाभिरामनयनं पीताम्बरालंकृतं
श्यामांगं द्विभुजं प्रसन्नवदनं श्रीसीतया शोभितम्।
कारुण्यामृतसागरं प्रियगणैर्भ्रात्रादिभिर्भावितं
वन्दे विष्णुशिवादिसेव्यमनिशं भक्तेष्टसिद्धिप्रदम्॥९॥
आगच्छ जानकीनाथ जानक्या सह राघव।
गृहाण मम पूजां च वायुपुत्रादिभिर्युतः॥१०॥
इत्यावाहनम्
सुवर्णरचितं राम दिव्यास्तरणशोभितम्।
आसनं हि मया दत्तं गृहाण मणिचित्रितम्॥११॥
॥ इति षोडशोपचारैः पूजयेत् ॥
ॐ अस्य श्रीमन्मानसरामायणश्रीरामचरितस्य श्रीशिवकाकभुशुण्डियाज्ञवल्क्यगोस्वामीतुलसीदासा ऋषयः श्रीसीतरामो देवता श्रीरामनाम बीजं भवरोगहरी भक्तिः शक्तिः मम नियन्त्रिताशेषविघ्नतया श्रीसीतारामप्रीतिपूर्वकसकलमनोरथसिद्धयर्थं पाठे विनियोगः।
अथाचमनम्
श्रीसीतारामाभ्यां नमः।
श्रीरामचन्द्राय नमः।
श्रीरामभद्राय नमः।
इति मन्त्रत्रितयेन आचमनं कुर्यात्।
श्रीयुगलबीजमन्त्रेण प्राणायामं कुर्यात्॥
अथ करन्यासः
जग मंगल गुन ग्राम राम के। दानि मुकुति धन धरम धाम के॥
अगुंष्ठाभ्यां नमः
राम राम कहि जे जमुहाहीं। तिन्हहि न पापपुंज समुहाहीं॥
तर्जनीभ्यां नमः
राम सकल नामन्ह ते अधिका। होउ नाथ अघ खग गन बधिका॥
मध्यमाभ्यां नमः
उमा दारु जोषित की नाईं। सबहि नचावत रामु गोसाईं॥
अनामिकाभ्यां नमः
सन्मुख होइ जीव मोहि जबहीं। जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं॥
कनिष्ठिकाभ्यां नमः
मामभिरक्षय रघुकुल नायक। धृत बर चाप रुचिर कर सायक॥
करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः
॥ इति करन्यासः ॥
॥ अथ ह्रदयादिन्यासः ॥
जग मंगल गुन ग्राम राम के। दानि मुकुति धन धरम धाम के॥
ह्रदयाय नमः।
राम राम कहि जे जमुहाहीं। तिन्हहि न पापपुंज समुहाहीं॥
शिरसे स्वाहा।
राम सकल नामन्ह ते अधिका। होउ नाथ अघ खग गन बधिका॥
शिखायै वषट्।
उमा दारु जोषित की नाईं। सबहि नचावत रामु गोसाईं॥
कवचाय हुम्
सन्मुख होइ जीव मोहि जबहीं। जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं॥
नेत्राभ्यां वौषट्
मामभिरक्षय रघुकुल नायक। धृत बर चाप रुचिर कर सायक॥
अस्त्राय फट्
॥ इति ह्रदयादिन्यासः ॥
॥ अथ ध्यानम् ॥
मामवलोकय पंकजलोचन। कृपा बिलोकनि सोच बिमोचन॥
नील तामरस स्याम काम अरि। ह्रदय कंज मकरंद मधुप हरि॥
जातुधान बरुथ बल भंजन। मुनि सज्जन रंजन अघ गंजन॥
भूसुर ससि नव बृंद बलाहक। असरन सरन दीन जन गाहक॥
भुजबल बिपुल भार महि खंडित। खर दूषन बिराध बध पंडित॥
रावनारि सुखरुप भूपबर। जय दसरथ कुल कुमुद सुधाकर॥
सुजस पुरान बिदित निगमागम। गावत सुर मुनि संत समागम॥
कारुनीक ब्यलीक मद खंडन। सब विधि कुसल कोसला मंडन॥
कलि मल मथन नाम ममताहन। तुलसिदास प्रभु पाहि प्रनत जन॥
॥ इति ध्यान: ॥
श्लोक :
रामराज्यवासी त्वम्, प्रोच्छ्रयस्व ते शिरम्, न्यायार्थ युद्धस्व, सर्वेषु सम चर।
परिपालय दुर्बलम्, विद्धि धर्मं वरम्प्रोच्छ्रयस्व ते शिरम्, रामराज्यवासी त्वम्॥
भावार्थ :-
तुम रामराज्य वासी, अपना मस्तक उँचा रखो, न्याय के लिए लडो, सबको समान मानो। कमजोर की रक्षा करो, धर्म को सबसे उँचा जानो अपना मस्तक उँचा रखो, तुम रामराज्य के वासी हो॥
AI वाल्मीकि रामायण
AI बालकाण्ड
बालकाण्ड में 77 सर्ग और कुल 2,280 श्लोक प्राप्त होते हैं। वाल्मीकि रामायण के बालकाण्ड में प्रथम सर्ग ‘मूलरामायण’ के नाम से प्रख्यात है। इसमें नारद से वाल्मीकि संक्षेप में सम्पूर्ण रामकथा का श्रवण करते हैं। द्वितीय सर्ग में क्रौञ्चमिथुन का प्रसंग और प्रथम आदिकाव्य की पक्तियाँ ‘मा निषाद’ का वर्णन है। तृतीय सर्ग में रामायण के विषय तथा चतुर्थ में रामायण की रचना तथा लव कुश के गान हेतु आज्ञापित करने का प्रसंग वर्णित है। इसके पश्चात् रामायण की मुख्य विषयवस्तु का प्रारम्भ अयोध्या के वर्णन से होता है। जहां दशरथ का यज्ञ, तीन रानियों से चार पुत्रों का जन्म, विश्वामित्र का राम-लक्ष्मण को ले जाकर बला तथा अतिबला विद्याएँ प्रदान करना, राक्षसों का वध, जनक के धनुष यज्ञ में जाकर सीता का विवाह आदि वृत्तांत वर्णित हैं।
अयोध्याकाण्ड
अयोध्याकाण्ड में 119 सर्ग और कुल 4,286 श्लोक प्राप्त होते हैं। वाल्मीकि रामायण के अयोध्याकाण्ड में राजा दशरथ द्वारा राम को युवराज बनाने का विचार, राम के राज्याभिषेक की तैयारियाँ, राम को राजनीति का उपदेश, श्रीराम का अभिषेक सुनकर मन्थरा का कैकेयी को उकसाना, कैकेयी का कोपभवन में प्रवेश, राजा दशरथ से कैकेयी का वरदान माँगना, राजा दशरथ की चिन्ता, भरत को राज्यभिषेक तथा राम को चौदह वर्ष का वनवास। श्रीराम का कौशल्या, दशरथ तथा माताओं से अनुज्ञा लेकर लक्ष्मण तथा सीता के साथ वनगमन, कौसल्या तथा सुमित्रा के निकट विलाप करते हुए दशरथ का प्राणत्याग, भरत का आगमन तथा राम को लेने चित्रकूट गमन, राम-भरत-संवाद, जाबालि-राम-संवाद, राम-वसिष्ठ-संवाद, भरत का लौटना, राम का अत्रि के आश्रम गमन तथा अनुसूया का सीता को पातिव्रत धर्म का उपदेश आदि कथानक वर्णित है।
अरण्यकाण्ड
अरण्यकाण्ड में 75 सर्ग और कुल 2,440 श्लोक प्राप्त होते हैं। वाल्मीकि रामायण के अरण्यकाण्ड में राम, सीता तथा लक्ष्मण दण्डकारण्य में प्रवेश करते हैं। जंगल में तपस्वी जनों की करुण-गाथा सुनते हैं। इसके पश्चात् राम पञ्चवटी में आकर आश्रम में रहते हैं, वहीं शूर्पणखा से मिलन होता है। शूर्पणखा के प्रसंग में उसका नाक-कान विहीन करना तथा उसके भाई खर दूषण तथा त्रिशिरा से युद्ध और उनका संहार वर्णित है। इसके बाद रावण-मारीच संवाद, मारीच का स्वर्णमय, कपटमृग बनना, मारीच वध, सीता का रावण द्वारा अपहरण, सीता को छुड़ाने के लिए जटायु का युद्ध, गृध्रराज जटायु का रावण के द्वारा घायल किया जाना, अशोकवाटिका में सीता को रखना, श्रीराम का विलाप, सीता का अन्वेषण, राम-जटायु-संवाद तथा जटायु को मोक्ष प्राप्ति, कबन्ध की आत्मकथा, उसका वध तथा दिव्यरूप प्राप्ति, शबरी के आश्रम में राम का गमन, ऋष्यमूक पर्वत तथा पम्पा सरोवर के तट पर राम का गमन आदि प्रसंग अरण्यकाण्ड में उल्लिखित हैं।
किष्किन्धाकाण्ड
किष्किन्धाकाण्ड में 67 सर्ग और कुल 2,455 श्लोक प्राप्त होते हैं। वाल्मीकि रामायण के इस काण्ड का पाठ मित्रलाभ तथा खोए वस्तु (नष्टद्रव्य) को पाने हेतु करना उचित होता है। इस काण्ड में पम्पासरोवर पर स्थित राम से हनुमान का मिलन, सुग्रीव से मित्रता, सुग्रीव द्वारा बालि का वृत्तान्त-कथन, सीता की खोज के लिए सुग्रीव की प्रतिज्ञा, बालि-सुग्रीव युद्ध, राम के द्वारा बालि का वध, सुग्रीव का राज्याभिषेक तथा बालिपुत्र अंगद को युवराज पद, वर्षा ऋतु वर्णन, शरद ऋतु वर्णन, सुग्रीव तथा हनुमान के द्वारा वानर सेना का संगठन, सीतान्वेषण हेतु चारों दिशाओं में वानरों का गमन, हनुमान का लंका गमन, सम्पाति वृत्तान्त, जामवन्त का हनुमान को समुद्र-लंघन हेतु प्रेरित करना तथा हनुमान जी का महेन्द्र पर्वत पर आरोहण आदि विषयों का प्रतिपादन किया गया है।
सुन्दरकाण्ड
वाल्मीकि रामायण के इस सर्वाधिक लोकप्रिय काण्ड में 68 सर्ग हैं जो कुल 2,855 श्लोकों का संग्रह है। धार्मिक दृष्टि से काण्ड का पारायण समाज में बहुधा प्रचलित है। श्राद्ध तथा देवकार्य में इसके पाठ का विधान है। सुन्दरकाण्ड में हनुमान द्वारा समुद्रलंघन करके लंका पहुँचना, अशोक वाटिका में प्रवेश तथा हनुमान के द्वारा सीता का दर्शन, सीता तथा रावण संवाद, सीता को राक्षसियों के तर्जन की प्राप्ति, सीता-त्रिजटा-संवाद, हनुमान का राम की अंगूठी सीता को दिखाना, सीता के द्वारा हनुमान को सन्देश देना, लंका के चैत्य-प्रासादों को उखाड़ना तथा राक्षसों को मारना, लंका-दहन, आदि हनुमान कृत्य वर्णित हैं। हनुमान का सीता-दर्शन के पश्चात् प्रत्यावर्तन, समाचार-कथन, दधिमुख-वृत्तान्त, हनुमान के द्वारा सीता से ली गई काञ्चनमणि राम को समर्पित करना, तथा सीता की दशा आदि का वर्णन किया गया है।
युद्धकाण्ड
युद्धकाण्ड में 128 सर्ग तथा सबसे अधिक 5,692 श्लोक प्राप्त होते हैं। वाल्मीकि रामायण के युद्धकाण्ड में वानर सेना का पराक्रम, रावण-कुम्भकर्णादि राक्षसों का अपना पराक्रम-वर्णन, विभीषण-तिरस्कार, विभीषण का राम के पास गमन, विभीषण-शरणागति, समुद्र के प्रति क्रोध, नलादि की सहायता से सेतुबन्धन, शुक-सारण-प्रसंग, सरमावृत्तान्त, रावण-अंगद-संवाद, मेघनाद-पराजय, कुम्भकर्ण आदि राक्षसों का राम के साथ युद्ध-वर्णन, कुम्भकर्णादि राक्षसों का वध, मेघनाद वध, राम-रावण युद्ध, रावण वध, मंदोदरी विलाप, विभीषण का शोक, राम के द्वारा विभीषण का राज्याभिषेक, लंका से सीता का आनयन, सीता की शुद्धि हेतु अग्नि-प्रवेश, हनुमान, सुग्रीव, अंगद आदि के साथ राम, लक्ष्मण तथा सीता का अयोध्या प्रत्यावर्तन, राम का राज्याभिषेक तथा भरत का युवराज पद पर आसीन होना, सुग्रीवादि वानरों का किष्किन्धा तथा विभीषण का लंका को लौटना, रामराज्य वर्णन और रामायण पाठ श्रवणफल कथन आदि का निरूपण किया गया है।
उत्तरकाण्ड
उत्तरकाण्ड में 111 सर्ग तथा सबसे अधिक 3,432 श्लोक प्राप्त होते हैं। वाल्मीकि रामायण के उत्तरकाण्ड में राम के राज्याभिषेक के अनन्तर कौशिकादि महर्षियों का आगमन, महर्षियों के द्वारा राम को रावण का जन्मादि वृत्तान्त सुनाना, उसके बाद सीता-परित्याग, सीता का वाल्मीकि आश्रम में निवास, शत्रुघ्न द्वारा लवणासुर वध, शंबूक वध तथा ब्राह्मण पुत्र को जीवन प्राप्ति, राम का अश्वमेध यज्ञ, वाल्मीकि के साथ राम के पुत्र लव कुश का रामायण गाते हुए अश्वमेध यज्ञ में प्रवेश, राम की आज्ञा से वाल्मीकि के साथ आयी सीता का राम से मिलन, सीता का रसातल में प्रवेश, भरत, लक्ष्मण तथा शत्रुघ्न के पुत्रों का पराक्रम वर्णन, दुर्वासा-राम संवाद, राम का सशरीर स्वर्गगमन, राम के भ्राताओं का स्वर्गगमन, तथा देवताओं का राम का पूजन विशेष आदि वर्णित है।
रामायण की सीख
स्क्रॉल ऊपर और नीचे करें:-↕
• राम एक आदर्श पुत्र हैं। पिता की आज्ञा उनके लिये सर्वोपरि है। पति के रूप में राम ने सदैव एकपत्नीव्रत का पालन किया। राजा के रूप में प्रजा के हित के लिये स्वयं के हित को हेय समझते हैं। विलक्षण व्यक्तित्व है उनका। वे अत्यन्त वीर्यवान, तेजस्वी, विद्वान, धैर्यशील, जितेन्द्रिय, बुद्धिमान, सुंदर, पराक्रमी, दुष्टों का दमन करने वाले, युद्ध एवं नीतिकुशल, धर्मात्मा, मर्यादापुरुषोत्तम, प्रजावत्सल, शरणागत को शरण देने वाले, सर्वशास्त्रों के ज्ञाता एवं प्रतिभा सम्पन्न हैं।
• सीता का पातिव्रत महान है। सारे वैभव और ऐश्ववर्य को ठुकरा कर वे पति के साथ वन चली गईं।
• रामायण भातृ-प्रेम का भी उत्कृष्ट उदाहरण है। जहाँ बड़े भाई के प्रेम के कारण लक्ष्मण उनके साथ वन चले जाते हैं वहीं भरत अयोध्या की राज गद्दी पर, बड़े भाई का अधिकार होने के कारण, स्वयं न बैठ कर राम की पादुका को प्रतिष्ठित कर देते हैं।
• कौशल्या एक आदर्श माता हैं। अपने पुत्र राम पर कैकेयी के द्वारा किये गये अन्याय को भुला कर वे कैकेयी के पुत्र भरत पर उतनी ही ममता रखती हैं जितनी कि अपने पुत्र राम पर।
• हनुमान एक आदर्श भक्त हैं, वे राम की सेवा के लिये अनुचर के समान सदैव तत्पर रहते हैं। शक्तिबाण से मूर्छित लक्ष्मण को उनकी सेवा के कारण ही प्राणदान प्राप्त होता है।
• रावण के चरित्र से सीख मिलती है कि अहंकार नाश का कारण होता है।
• रामायण के चरित्रों से सीख लेकर मनुष्य अपने जीवन को सार्थक बना सकता है।
प्रिय मित्रो #अखंडरामायण आप सभी का ह्रदय से अभिनंदन करता है। हिन्दु (सनातन) संस्कृति और संस्कार को जीवित रखने मे हमारा प्रयास सदैव जारी रहेगा, कृपया आप भी हमारा सहयोग करे।
Tweet
⫷
- शीर्ष 10 दृश्य:
- श्री दुर्गा सप्तशती | Shri Durga Saptashati
- श्रीमद्भगवद् गीता I ShriBhagavadGeeta
- श्रीरामचरितमानस भावार्थ सहित- बालकाण्ड- 201-225
- बालकाण्ड | Balkanda
- सुन्दरकाण्ड | Sundarkanda
- श्री सत्यनारायण व्रत कथा संस्कृत में हिन्दी भावार्थ सहित
- लंकाकाण्ड | Lankakanda
- उत्तरकाण्ड | Uttarakhanda
- अरण्यकाण्ड | Aranyakanda
- किष्किन्धाकाण्ड | Kishkindhakanda











