॥ 卐 ॥ ॥ श्री गणेशाय नमः ॥ ॥ श्री कमलापति नम: ॥ ॥ श्री जानकीवल्लभो विजयते ॥ ॥ श्री वाल्मीकि रामायण ॥दानकरें 🗳Pay ByUPIName:- Manish Kumar Chaturvedi Mobile:- +919554988808 Click On UPI Id:- 9554988808@hdfcbank mnspandit@ybl mnskumar@axisbank 9554988808@yblPay ByApp
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AI बालकाण्ड सर्ग- ४१-५०
वाल्मीकि रामायण- AI बालकाण्ड सर्ग- ४१
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बालकाण्डम् एकचत्वारिंशः सर्गः (सर्ग 41)
( सगर की आज्ञा से अंशुमान् का रसातल में जाकर घोड़े को ले आना और अपने चाचाओं के निधन का समाचार सुनाना )
श्लोक: पुत्रांश्चिरगतान् ज्ञात्वा सगरो रघुनन्दन। नप्तारमब्रवीद राजा दीप्यमानं स्वतेजसा॥१॥
भावार्थ :- रघुनन्दन! ‘पुत्रों को गये बहुत दिन हो गये’- ऐसा जानकर राजा सगरने अपने पौत्र अंशुमान् से, जो अपने तेज से देदीप्यमान हो रहा था, इस प्रकार कहा-॥१॥
भावार्थ :- ‘वत्स! तुम शूरवीर, विद्वान् तथा अपने पूर्वजों के तुल्य तेजस्वी हो तुम भी अपने चाचाओं के पथ का अनुसरण करो और उस चोर का पता लगाओ, जिसने मेरे यज्ञ-सम्बन्धी अश्व का अपहरण कर लिया है॥२॥
( भगीरथ की तपस्या, भगवान् शङ्कर का गंगा को अपने सिर पर धारण करना, भगीरथ के पितरों का उद्धार )
श्लोक: देवदेवे गते तस्मिन् सोऽङ्गुष्ठाग्रनिपीडिताम्। कृत्वा वसुमतीं राम वत्सरं समुपासत॥१॥
भावार्थ :- श्रीराम! देवाधिदेव ब्रह्माजी के चले जाने पर राजा भगीरथ पृथ्वी पर केवल अँगूठे के अग्रभाग को टिकाये हुए खड़े हो एक वर्ष तक भगवान् शङ्कर की उपासना में लगे रहे॥१॥
( ब्रह्माजी का भगीरथ को पितरों के तर्पण की आज्ञा देना, गंगावतरण के उपाख्यान की महिमा )
श्लोक: स गत्वा सागरं राजा गंगयानुगतस्तदा। प्रविवेश तलं भूमेर्यत्र ते भस्मसात्कृताः॥१॥ भस्मन्यथाप्लुते राम गंगायाः सलिलेन वै। सर्वलोकप्रभुर्ब्रह्मा राजानमिदमब्रवीत्॥२॥
भावार्थ :- श्रीराम! इस प्रकार गंगाजी को साथ लिये राजा भगीरथ ने समुद्र तक जाकर रसातल में, जहाँ उनके पूर्वज भस्म हुए थे, प्रवेश किया वह भस्मराशि जब गंगाजी के जलसे आप्लावित हो गयी, तब सम्पूर्ण लोकों के स्वामी भगवान् ब्रह्मा ने वहाँ पधार कर राजा से इस प्रकार कहा-॥१-२॥
भावार्थ :- ‘काम-क्रोधादि शत्रुओं को संताप देने वाले महर्षे! आपकी कही हुई इस सम्पूर्ण कथा पर पूर्ण रूप से विचार करते हुए हम दोनों भाइयों की यह रात्रि एक क्षण के समान बीत गयी है॥३॥
भावार्थ :- ‘भगवन्! आपके महाबली पुत्र देवताओं ने मेरे पुत्रों को मार डाला; अतः मैं दीर्घकाल की तपस्या से उपार्जित एक ऐसा पुत्र चाहती हूँ जो इन्द्र का वध करने में समर्थ हो॥२॥
श्लोक: साहं तपश्चरिष्यामि गर्भं मे दातुमर्हसि। ईश्वरं शक्रहन्तारं त्वमनुज्ञातुमर्हसि॥३॥
भावार्थ :- ‘मैं तपस्या करूँगी, आप इसके लिये मुझे आज्ञा दें और मेरे गर्भ में ऐसा पुत्र प्रदान करें जो सब कुछ करने में समर्थ तथा इन्द्र का वध करने वाला हो’॥३॥
भावार्थ :- इन्द्र द्वारा अपने गर्भ के सात टुकड़े कर दिये जाने पर देवी दिति को बड़ा दुःख हुआ वे दुर्द्धर्ष वीर सहस्राक्ष इन्द्र से अनुनयपूर्वक बोलीं-॥१॥
श्लोक: ममापराधाद् गर्भोऽयं सप्तधा शकलीकृतः। नापराधो हि देवेश तवात्र बलसूदन॥२॥
भावार्थ :- ‘देवेश! बलसूदन! मेरे ही अपराध से इस गर्भ के सात टुकड़े हुए हैं इसमें तुम्हारा कोई दोष नहीं है॥२॥
भावार्थ :- ‘इस गर्भ को नष्ट करनेके निमित्त तुमने जो क्रूरतापूर्ण कर्म किया है, वह तुम्हारे और मेरे लिये भी जिस तरह प्रिय हो जाय जैसे भी उसका परिणाम तुम्हारे और मेरे लिये सुखद हो जाय, वैसा उपाय मैं करना चाहती हूँ। मेरे गर्भ के वे सातों खण्ड सात व्यक्ति होकर सातों मरुद्गणों के स्थानों का पालन करने वाले हो जायँ॥३॥
भावार्थ :- वहाँ परस्पर समागम के समय एक-दूसरे का कुशल-मंगल पूछकर बातचीत के अन्त में राजा सुमति ने महामुनि विश्वामित्र से कहा-॥१॥
श्लोक: इमौ कुमारौ भद्रं ते देवतुल्यपराक्रमौ। गजसिंहगती वीरौ शार्दूलवृषभोपमौ॥२॥
भावार्थ :- ‘ब्रह्मन्! आपका कल्याण हो ये दोनों कुमारदेवताओं के तुल्य पराक्रमी जान पड़ते हैं। इनकी चाल-ढाल हाथी और सिंह की गति के समान है। ये दोनों वीर सिंह और साँड़ के समान प्रतीत होते हैं॥२॥
भावार्थ :- इनके बड़े-बड़े नेत्र विकसित कमलदल के समान शोभा पाते हैं। ये दोनों तलवार, तरकस और धनुषधारण किये हुए हैं। अपने सुन्दर रूप के द्वारा दोनों अश्विनीकुमारों को लज्जित करते हैं तथा युवावस्था के निकट आ पहुँचे हैं॥३॥
( पितृ देवताओं द्वारा इन्द्र को भेड़े के अण्डकोष से युक्त करना तथा भगवान् श्रीराम के द्वारा अहल्या का उद्धार एवं उन दोनों दम्पति के द्वारा इनका सत्कार )
भावार्थ :- तदनन्तर इन्द्र अण्डकोष से रहित होकर बहुत डर गये। उनके नेत्रों में त्रास छा गया। वे अग्नि आदि देवताओं, सिद्धों, गन्धर्वो और चारणों से इस प्रकार बोले-॥१॥
भावार्थ :- ‘देवताओ! महात्मा गौतम की तपस्या में विघ्न डालने के लिये मैंने उन्हें क्रोध दिलाया है। ऐसा करके मैंने यह देवताओं का कार्य ही सिद्ध किया है॥२॥
भावार्थ :- ‘मनि ने क्रोधपूर्वक भारी शाप देकर मुझे अण्डकोष से रहित कर दिया और अपनी पत्नी का भी परित्याग कर दिया। इससे मेरे द्वारा उनकी तपस्या का अपहरण हुआ है॥३॥
भावार्थ :- तदनन्तर लक्ष्मण सहित श्रीराम विश्वामित्रजी को – आगे करके महर्षि गौतम के आश्रम से ईशान कोण की ओर चले और मिथिला नरेश के यज्ञमण्डप में जा पहुँचे॥१॥