वाल्मीकि रामायण- AI बालकाण्ड सर्ग- ६१-७०

बालकाण्ड सर्ग- ६१-७०

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बालकाण्ड सर्ग- ६१-७०

॥ श्री गणेशाय नमः ॥
॥ श्री कमलापति नम: ॥
॥ श्री जानकीवल्लभो विजयते ॥
॥ श्री वाल्मीकि रामायण ॥
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बालकाण्ड सर्ग- ६१-७०

AI बालकाण्ड सर्ग- ६१-७०

वाल्मीकि रामायण- AI बालकाण्ड सर्ग- ६१



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बालकाण्डम्
एकषष्टितमः सर्गः (सर्ग 61)

( विश्वामित्र की पुष्कर तीर्थ में तपस्या तथा राजर्षि अम्बरीष का ऋचीक के मध्यम पुत्र शुनःशेप को यज्ञ-पशु बनाने के लिये खरीदकर लाना )

श्लोक:
विश्वामित्रो महातेजाः प्रस्थितान् वीक्ष्य तानृषीन्।
अब्रवीन्नरशार्दूल सर्वांस्तान् वनवासिनः॥१॥

भावार्थ :-
[शतानन्दजी कहते हैं-] पुरुषसिंह श्रीराम! यज्ञ में आये हुए उन सब वनवासी ऋषियों को वहाँ से जाते देख महातेजस्वी विश्वामित्र ने उनसे कहा-॥१॥

श्लोक:
महाविघ्नः प्रवृत्तोऽयं दक्षिणामास्थितो दिशम्।
दिशमन्यां प्रपत्स्यामस्तत्र तप्स्यामहे तपः॥२॥

भावार्थ :-
‘महर्षियो! इस दक्षिण दिशामें रहने से हमारी तपस्या में महान् विघ्न आ पड़ा है; अतः अब हम दूसरी दिशा में चले जायँगे और वहीं रहकर तपस्या करेंगे॥२॥

श्लोक:
पश्चिमायां विशालायां पुष्करेषु महात्मनः।
सुखं तपश्चरिष्यामः सुखं तद्धि तपोवनम्॥३॥

भावार्थ :-
‘विशाल पश्चिम दिशा में जो महात्मा ब्रह्माजी के तीन पुष्कर हैं, उन्हीं के पास रहकर हम सुखपूर्वक तपस्या करेंगे; क्योंकि वह तपोवन बहुत ही सुखद है’॥३॥

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वाल्मीकि रामायण- AI बालकाण्ड सर्ग- ६२

बालकाण्डम्
द्विषष्टितमः सर्गः (सर्ग 62)

( विश्वामित्र द्वारा शुनःशेप की रक्षा का सफल प्रयत्न और तपस्या )

श्लोक:
शुनःशेपं नरश्रेष्ठ गृहीत्वा तु महायशाः।
व्यश्रमत् पुष्करे राजा मध्याह्ने रघुनन्दन॥१॥

भावार्थ :-
[ शतानन्दजी बोले-] नरश्रेष्ठ रघुनन्दन! महायशस्वी राजा अम्बरीष शुनःशेप को साथ लेकर दोपहर के समय पुष्कर तीर्थ में आये और वहाँ विश्राम करने लगे॥१॥

श्लोक:
तस्य विश्रममाणस्य शुनःशेपो महायशाः।
पुष्करं ज्येष्ठमागम्य विश्वामित्रं ददर्श ह॥२॥
तप्यन्तमृषिभिः सार्धं मातुलं परमातुरः।
विषण्णवदनो दीनस्तृष्णया च श्रमेण च॥३॥
पपाताड़े मुने राम वाक्यं चेदमुवाच ह।

भावार्थ :-
श्रीराम! जब वे विश्राम करने लगे, उस समय महायशस्वी शुनःशेप ज्येष्ठ पुष्कर में आकर ऋषियों के साथ तपस्या करते हुए अपने मामा विश्वामित्र से मिला। वह अत्यन्त आतुर एवं दीन हो रहा था। उसके मुख पर विषाद छा गया था। वह भूख-प्यास और परिश्रम से दीन हो मुनि की गोद में गिर पड़ा और इस प्रकार बोला-॥२-३ १/२॥

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वाल्मीकि रामायण- AI बालकाण्ड सर्ग- ६३

बालकाण्डम्
त्रिषष्टितमः सर्गः (सर्ग 63)

( विश्वामित्र को ऋषि एवं महर्षिपद की प्राप्ति, मेनका द्वारा उनका तपोभंग तथा ब्रह्मर्षिपद की प्राप्ति के लिये उनकी घोर तपस्या )

श्लोक:
पूर्णे वर्षसहस्रे तु व्रतस्नातं महामुनिम्।
अभ्यगच्छन् सुराः सर्वे तपः फलचिकीर्षवः॥१॥

भावार्थ :-
[शतानन्दजी कहते हैं- श्रीराम!] जब एक हजार वर्ष पूरे हो गये, तब उन्होंने व्रत की समाप्ति का स्नान किया। स्नान कर लेने पर महामुनि विश्वामित्र के पास सम्पूर्ण देवता उन्हें तपस्या का फल देने की इच्छा से आये॥१॥

श्लोक:
अब्रवीत् सुमहातेजा ब्रह्मा सुरुचिरं वचः।
ऋषिस्त्वमसि भद्रं ते स्वार्जितैः कर्मभिः शुभैः॥२॥

भावार्थ :-
उस समय महातेजस्वी ब्रह्माजी ने मधुर वाणीमें कहा- ‘मुने! तुम्हारा कल्याण हो। अब तुम अपने द्वारा उपार्जित शुभ कर्मों के प्रभाव से ऋषि हो गये’॥२॥

श्लोक:
तमेवमुक्त्वा देवेशस्त्रिदिवं पुनरभ्यगात्।
विश्वामित्रो महातेजा भूयस्तेपे महत् तपः॥३॥

भावार्थ :-
उनसे ऐसा कहकर देवेश्वर ब्रह्माजी पुनः स्वर्ग को चले गये। इधर महातेजस्वी विश्वामित्र पुनः बड़ी भारी तपस्या में लग गये॥३॥

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वाल्मीकि रामायण- AI बालकाण्ड सर्ग- ६४

बालकाण्डम्
चतुःषष्टितमः सर्गः (सर्ग 64)

( विश्वामित्र का रम्भा को शाप देकर पुनः घोर तपस्या के लिये दीक्षा लेना )

श्लोक:
सुरकार्यमिदं रम्भे कर्तव्यं सुमहत् त्वया।
लोभनं कौशिकस्येह काममोहसमन्वितम्॥१॥

भावार्थ :-
(इन्द्र बोले-) रम्भे! देवताओं का एक बहुत बड़ा कार्य उपस्थित हुआ है। इसे तुम्हें ही पूरा करना है। तू महर्षि विश्वामित्र को इस प्रकार लुभा, जिससे वे काम और मोह के वशीभूत हो जायँ॥१॥

श्लोक:
तथोक्ता साप्सरा राम सहस्राक्षेण धीमता।
वीडिता प्राञ्जलिर्वाक्यं प्रत्युवाच सुरेश्वरम्॥२॥

भावार्थ :-
श्रीराम! बुद्धिमान् इन्द्र के ऐसा कहनेपर वह अप्सरा लज्जित हो हाथ जोड़कर देवेश्वर इन्द्र से बोली-॥२॥

श्लोक:
अयं सुरपते घोरो विश्वामित्रो महामुनिः।
क्रोधमत्स्रक्ष्यते घोरं मयि देव न संशयः॥३॥

भावार्थ :-
‘सुरपते! ये महामुनि विश्वामित्र बड़े भयंकर हैं। देव! इसमें संदेह नहीं कि ये मुझपर भयानक क्रोध का प्रयोग करेंगे॥३॥

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वाल्मीकि रामायण- AI बालकाण्ड सर्ग- ६५

बालकाण्डम्
पञ्चषष्टितमः सर्गः (सर्ग 65)

( विश्वामित्र की घोर तपस्या, उन्हें ब्राह्मणत्व की प्राप्ति तथा राजा जनक का उनकी प्रशंसा करके उनसे विदा ले राजभवन को लौटना )

श्लोक:
अथ हैमवतीं राम दिशं त्यक्त्वा महामुनिः।
पूर्वां दिशमनुप्राप्य तपस्तेपे सुदारुणम्॥१॥

भावार्थ :-
(शतानन्दजी कहते हैं)- श्रीराम! पूर्वोक्त प्रतिज्ञा के अनन्तर महामुनि विश्वामित्र उत्तर दिशा को त्यागकर पूर्व दिशा में चले गये और वहीं रहकर अत्यन्त कठोर तपस्या करने लगे॥१॥

श्लोक:
मौनं वर्षसहस्रस्य कृत्वा व्रतमनुत्तमम्।
चकाराप्रतिमं राम तपः परमदुष्करम्॥२॥

भावार्थ :-
रघुनन्दन! एक सहस्र वर्षों तक परम उत्तम मौनव्रत धारण करके वे परम दुष्कर तपस्या में लगे रहे। उनके उस तप की कहीं तुलना न थी॥२॥

श्लोक:
पूर्णे वर्षसहस्रे तु काष्ठभूतं महामुनिम्।
विनर्बहुभिराधूतं क्रोधो नान्तरमाविशत्॥३॥

भावार्थ :-
एक हजार वर्ष पूर्ण होने तक वे महामुनि काष्ठ की भाँति निश्चेष्ट बने रहे। बीच-बीच में उन पर बहुत-से विघ्नों का आक्रमण हुआ, परंतु क्रोध उनके भीतर नहीं घुसने पाया॥३॥

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वाल्मीकि रामायण- AI बालकाण्ड सर्ग- ६६

बालकाण्डम्
षट्षष्टितमः सर्गः (सर्ग 66)

( राजा जनक का विश्वामित्र और राम लक्ष्मण का सत्कार, धनुष का परिचय देना और धनुष चढ़ा देने पर श्रीराम के साथ ब्याह का निश्चय प्रकट करना )

श्लोक:
ततः प्रभाते विमले कृतकर्मा नराधिपः।
विश्वामित्रं महात्मानमाजुहाव सराघवम्॥१॥
तमर्चयित्वा धर्मात्मा शास्त्रदृष्टेन कर्मणा।
राघवौ च महात्मानौ तदा वाक्यमुवाच ह॥२॥

भावार्थ :-
तदनन्तर दूसरे दिन निर्मल प्रभातकाल आने पर धर्मात्मा राजा जनक ने अपना नित्य नियम पूरा करके श्रीराम और लक्ष्मण सहित महात्मा विश्वामित्रजी को बुलाया और शास्त्रीय विधि के अनुसार मुनि तथा उन दोनों महामनस्वी राजकुमारों का पूजन करके इस प्रकार कहा-॥१-२॥

श्लोक:
भगवन् स्वागतं तेऽस्तु किं करोमि तवानघ।
भवानाज्ञापयतु मामाज्ञाप्यो भवता ह्यहम्॥३॥

भावार्थ :-
‘भगवन्! आपका स्वागत है निष्पाप महर्षे! आप मुझे आज्ञा दीजिये, मैं आपकी क्या सेवा करूँ; क्योंकि मैं आपका आज्ञापालक हूँ’॥३॥

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वाल्मीकि रामायण- AI बालकाण्ड सर्ग- ६७

बालकाण्डम्
सप्तषष्टितमः सर्गः (सर्ग 67)

( श्रीराम के द्वारा धनुर्भंग तथा राजा जनक का विश्वामित्र की आज्ञा से राजा दशरथ को बुलाने के लिये मन्त्रियों को भेजना )

श्लोक:
जनकस्य वचः श्रुत्वा विश्वामित्रो महामुनिः।
धनुर्दर्शय रामाय इति होवाच पार्थिवम्॥१॥

भावार्थ :-
जनक की यह बात सुनकर महामुनि विश्वामित्र बोले- ’राजन्! आप श्रीराम को अपना धनुष दिखाइये॥१॥

श्लोक:
ततः स राजा जनकः सचिवान् व्यादिदेश ह।
धनुरानीयतां दिव्यं गन्धमाल्यानुलेपितम्॥२॥

भावार्थ :-
तब राजा जनक ने मन्त्रियों को आज्ञा दी- ’चन्दन और मालाओं से सुशोभित वह दिव्य धनुष यहाँ ले आओ’॥२॥

श्लोक:
जनकेन समादिष्टाः सचिवाः प्राविशन् पुरम्।
तद्धनुः पुरतः कृत्वा निर्जग्मुरमितौजसः॥३॥

भावार्थ :-
राजा जनक की आज्ञा पाकर वे अमित तेजस्वी मन्त्री नगर में गये और उस धनुष को आगे करके पुरी से बाहर निकले॥३॥

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वाल्मीकि रामायण- AI बालकाण्ड सर्ग- ६८

बालकाण्डम्
अष्टषष्टितमः सर्गः (सर्ग 68)

( राजा जनक का संदेश पाकर मन्त्रियों सहित महाराज दशरथ का मिथिला जाने के लिये उद्यत होना )

श्लोक:
जनकेन समादिष्टा दूतास्ते क्लान्तवाहनाः।
त्रिरात्रमुषिता मार्गे तेऽयोध्यां प्राविशन् पुरीम्॥१॥

भावार्थ :-
राजा जनक की आज्ञा पाकर उनके दूत अयोध्या के लिये प्रस्थित हुए। रास्ते में वाहनों के थक जाने के कारण तीन रात विश्राम करके चौथे दिन वे अयोध्यापुरी में जा पहुँचे॥१॥

श्लोक:
ते राजवचनाद् गत्वा राजवेश्म प्रवेशिताः।
ददृशुर्देवसंकाशं वृद्धं दशरथं नृपम्॥२॥

भावार्थ :-
राजा की आज्ञा से उनका राजमहल में प्रवेश हुआ,वहाँ जाकर उन्होंने देवतुल्य तेजस्वी बूढ़े महाराज दशरथ का दर्शन किया॥२॥

श्लोक:
बद्धाञ्जलिपुटाः सर्वे दूता विगतसाध्वसाः।
राजानं प्रश्रितं वाक्यमब्रुवन् मधुराक्षरम्॥३॥
मैथिलो जनको राजा साग्निहोत्रपुरस्कृतः।
मुहुर्मुहुर्मधुरया स्नेहसंरक्तया गिरा॥४॥
कुशलं चाव्ययं चैव सोपाध्यायपुरोहितम्।
जनकस्त्वां महाराज पृच्छते सपुरःसरम्॥५॥

भावार्थ :-
उन सभी दूतों ने दोनों हाथ जोड़ निर्भय हो राजा से मधुर वाणी में यह विनययुक्त बात कही- ’महाराज! मिथिलापति राजा जनक ने अग्निहोत्र की अग्नि को सामने रखकर स्नेहयुक्त मधुर वाणी में सेवकों सहित आपका तथा आपके उपाध्याय और पुरोहितों का बारम्बार कुशल-मंगल पूछा है॥३–५॥

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बालकाण्ड सर्ग- ६१-७०

वाल्मीकि रामायण- AI बालकाण्ड सर्ग- ६९

बालकाण्डम्
एकोनसप्ततितमः सर्गः (सर्ग 69)

( दल-बलसहित राजा दशरथ की मिथिला-यात्रा और वहाँ राजा जनक के द्वारा उनका स्वागत-सत्कार )

श्लोक:
ततो रात्र्यां व्यतीतायां सोपाध्यायः सबान्धवः।
राजा दशरथो हृष्टः सुमन्त्रमिदमब्रवीत्॥१॥

भावार्थ :-
तदनन्तर रात्रि व्यतीत होने पर उपाध्याय और बन्धुबान्धवों सहित राजा दशरथ हर्ष में भरकर सुमन्त्र से इस प्रकार बोले-॥१॥

श्लोक:
अद्य सर्वे धनाध्यक्षा धनमादाय पुष्कलम्।
व्रजन्त्वग्रे सुविहिता नानारत्नसमन्विताः॥२॥

भावार्थ :-
‘आज हमारे सभी धनाध्यक्ष (खजांची) बहुत-सा धन लेकर नाना प्रकार के रत्नों से सम्पन्न हो सबसे आगे चलें। उनकी रक्षाके लिये हर तरह की सुव्यवस्था होनी चाहिये॥२॥

श्लोक:
चतुरंगबलं चापि शीघ्रं निर्यातु सर्वशः।
ममाज्ञासमकालं च यानं युग्यमनुत्तमम्॥३॥

भावार्थ :-
‘सारी चतुरंगिणी सेना भी यहाँ से शीघ्र ही कूचकर दे। अभी मेरी आज्ञा सुनते ही सुन्दर-सुन्दर पालकियाँ और अच्छे-अच्छे घोड़े आदि वाहन तैयार होकर चल दें॥३॥

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बालकाण्ड सर्ग- ६१-७०

वाल्मीकि रामायण- AI बालकाण्ड सर्ग- ७०

बालकाण्डम्
सप्ततितमः सर्गः (सर्ग 70)

( राजा जनक का अपने भाई कुशध्वज को सांकाश्या नगरी से बुलवाना,वसिष्ठजी का श्रीराम और लक्ष्मण के लिये सीता तथा ऊर्मिला को वरण करना )

श्लोक:
ततः प्रभाते जनकः कृतकर्मा महर्षिभिः।
उवाच वाक्यं वाक्यज्ञः शतानन्दं पुरोहितम्॥१॥

भावार्थ :-
तदनन्तर जब सबेरा हुआ और राजा जनक महर्षियों के सहयोग से अपना यज्ञ-कार्य सम्पन्न कर चुके, तब वे वाक्यमर्मज्ञ नरेश अपने पुरोहित शतानन्दजी से इस प्रकार बोले-॥१॥

श्लोक:
भ्राता मम महातेजा वीर्यवानतिधार्मिकः।
कुशध्वज इति ख्यातः पुरीमध्यवसच्छुभाम्॥२॥
वार्याफलकपर्यन्तां पिबन्निक्षुमती नदीम्।
सांकाश्यां पुण्यसंकाशां विमानमिव पुष्पकम्॥३॥

भावार्थ :-
‘ब्रह्मन्! मेरे महातेजस्वी और पराक्रमी भाई कुशध्वज जो अत्यन्त धर्मात्मा हैं, इस समय इक्षुमती नदी का जल पीते हुए उसके किनारे बसी हुई कल्याणमयी सांकाश्या नगरी में निवास करते हैं। उसके चारों ओर के परकोटों की रक्षा के लिये शत्रुओं के निवारण में समर्थ बड़े-बड़े यन्त्र लगाये गये हैं। वह पुरी पुष्पक विमान के समान विस्तृत तथा पुण्य से उपलब्ध होने वाले स्वर्गलोक के सदृश सुन्दर है॥२-३॥

श्लोक:
तमहं द्रष्टुमिच्छामि यज्ञगोप्ता स मे मतः।
प्रीतिं सोऽपि महातेजा इमां भोक्ता मया सह॥४॥

भावार्थ :-
‘वहाँ रहने वाले अपने भाई को इस शुभ अवसरपर मैं यहाँ उपस्थित देखना चाहता हूँ; क्योंकि मेरी दृष्टि में वे मेरे इस यज्ञ के संरक्षक हैं। महातेजस्वी कुशध्वज भी मेरे साथ श्रीसीताराम के विवाह सम्बन्धी इस मंगल समारोह का सुख उठावेंगे’॥४॥

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बालकाण्ड सर्ग- ६१-७०

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