वाल्मीकि रामायण- AI बालकाण्ड सर्ग- ७

मुख पृष्ठAI वाल्मीकि रामायणAI बालकाण्ड सर्ग- ७


॥ श्री गणेशाय नमः ॥
॥ श्री कमलापति नम: ॥
॥ श्री जानकीवल्लभो विजयते ॥
॥ श्री वाल्मीकि रामायण ॥
दान करें 🗳
Pay By UPIName:- Manish Kumar Chaturvedi
Mobile:- +919554988808
Click On UPI Id:-
9554988808@hdfcbank
mnspandit@ybl
mnskumar@axisbank
9554988808@ybl
Pay By App
Pay In Account



बालकाण्ड सर्ग- ७

AI वाल्मीकि रामायण
(भावार्थ सहित)
सब एक ही स्थान पर

👉 कृपया [AI का उपयोग करें] बटन पर क्लिक करें!

AI बालकाण्ड सर्ग- ७



कथन समय समाप्त होगा: 00:00

बालकाण्डम्
सप्तमः सर्गः (सर्ग 7)

( राजमन्त्रियों के गुण और नीति का वर्णन )

श्लोक:
तस्यामात्या गुणैरासन्निक्ष्वाकोः सुमहात्मनः।
मन्त्रज्ञाश्चेङ्गितज्ञाश्च नित्यं प्रियहिते रताः॥१॥

भावार्थ :-
इक्ष्वाकुवंशी वीर महामना महाराज दशरथ के मन्त्रि जनोचित गुणों से सम्पन्न आठ मन्त्री थे, जो मन्त्र के तत्त्व को जानने वाले और बाहरी चेष्टा देखकर ही मन के भाव को समझ लेने वाले थे। वे सदा ही राजा के प्रिय एवं हित में लगे रहते थे॥१॥

श्लोक:
अष्टौ बभूवुर्वीरस्य तस्यामात्या यशस्विनः।
शुचयश्चानुरक्ताश्च राजकृत्येषु नित्यशः॥२॥

भावार्थ :-
इसीलिये उनका यश बहुत फैला हुआ था। वे सभी शुद्ध आचार-विचार से युक्त थे और राजकीय कार्यों में निरन्तर संलग्न रहते थे॥२॥

धृष्टिर्जयन्तो विजयः सुराष्ट्रो राष्ट्रवर्धनः।
अकोपो धर्मपालश्च सुमन्त्रश्चाष्टमोऽर्थवित्॥३॥

भावार्थ :-
उनके नाम इस प्रकार हैं- धृष्टि, जयन्त, विजय, सुराष्ट्र, राष्ट्रवर्धन, अकोप, धर्मपाल और आठवें सुमन्त्र। जो अर्थशास्त्र के ज्ञाता थे॥३॥

श्लोक:
ऋत्विजौ द्वावभिमतौ तस्यास्तामृषिसत्तमौ।
वसिष्ठो वामदेवश्च मन्त्रिणश्च तथापरे॥४॥

भावार्थ :-
ऋषियों में श्रेष्ठतम वसिष्ठ और वामदेव- ये दो महर्षि राजा के माननीय ऋत्विज् (पुरोहित) थे॥४॥

श्लोक:
सुयज्ञोऽप्यथ जाबालिः काश्यपोऽप्यथ गौतमः।
मार्कण्डेयस्तु दीर्घायुस्तथा कात्यायनो द्विजः॥५॥

भावार्थ :-
इनके सिवा सुयज्ञ, जाबालि, काश्यप, गौतम, दीर्घायु मार्कण्डेय और विप्रवर कात्यायन भी महाराज के मन्त्री थे॥५॥

श्लोक:
एतैर्ब्रह्मर्षिभिर्नित्यमृत्विजस्तस्य पौर्वकाः।
विद्याविनीता हीमन्तः कुशला नियतेन्द्रियाः॥६॥

भावार्थ :-
इन ब्रह्मर्षियों के साथ राजा के पूर्व परम्परागत ऋत्विज् भी सदा मन्त्री का कार्य करते थे। वे सब-के-सब विद्वान् होने के कारण विनयशील, सलज्ज, कार्यकुशल, जितेन्द्रिय,-॥६॥

श्लोक:
श्रीमन्तश्च महात्मानः शस्त्रज्ञा दृढविक्रमाः।
कीर्तिमन्तः प्रणिहिता यथावचनकारिणः॥७॥

भावार्थ :-
श्रीसम्पन्न, महात्मा, शस्त्रविद्या के ज्ञाता, सुदृढ़ पराक्रमी, यशस्वी, समस्त राजकार्यों में सावधान, राजा की आज्ञा के अनुसार कार्य करने वाले,॥७॥

श्लोक:
तेजःक्षमायशःप्राप्ताः स्मितपूर्वाभिभाषिणः।
क्रोधात् कामार्थहेतोर्वा न ब्रूयुरनृतं वचः॥८॥

भावार्थ :-
तेजस्वी, क्षमाशील, कीर्तिमान् तथा मुसकराकर बात करने वाले थे। वे कभी काम, क्रोध या स्वार्थ के वशीभूत होकर झूठ नहीं बोलते थे॥८॥

श्लोक:
तेषामविदितं किंचित् स्वेषु नास्ति परेषु वा।
क्रियमाणं कृतं वापि चारेणापि चिकीर्षितम्॥९॥

भावार्थ :-
अपने या शत्रुपक्ष के राजाओं की कोई भी बात उनसे छिपी नहीं रहती थी। दूसरे राजा क्या करते हैं, क्या कर चुके हैं और क्या करना चाहते हैं ये सभी बातें गुप्तचरों द्वारा उन्हें मालूम रहती थीं॥९॥

श्लोक:
कुशला व्यवहारेषु सौहृदेषु परीक्षिताः।
प्राप्तकालं यथा दण्डं धारयेयुः सुतेष्वपि॥१०॥

भावार्थ :-
वे सभी व्यवहार कुशल थे। उनके सौहार्द की अनेक अवसरों पर परीक्षा ली जा चुकी थी। वे मौका पड़ने पर अपने पुत्र को भी उचित दण्ड देने में भी नहीं हिचकते थे॥१०॥

श्लोक:
कोशसंग्रहणे युक्ता बलस्य च परिग्रहे।
अहितं चापि पुरुषं न हिंस्युरविदूषकम्॥११॥

भावार्थ :-
कोष के संचय तथा चतुरंगिणी सेना के संग्रह में सदा लगे रहते थे। शत्रु ने भी यदि अपराध न किया हो तो वे उसकी हिंसा नहीं करते थे॥११॥

श्लोक:
वीराश्च नियतोत्साहा राजशास्त्रमनुष्ठिताः।
शुचीनां रक्षितारश्च नित्यं विषयवासिनाम्॥१२॥

भावार्थ :-
उन सब में सदा शौर्य एवं उत्साह भरा रहता था। वे राजनीति के अनुसार कार्य करते तथा अपने राज्य के भीतर रहने वाले सत्पुरुषों की सदा रक्षा करते थे॥१२॥

श्लोक:
ब्रह्मक्षत्रमहिंसन्तस्ते कोशं समपूरयन्।
सुतीक्ष्णदण्डाः सम्प्रेक्ष्य पुरुषस्य बलाबलम्॥१३॥

भावार्थ :-
ब्राह्मणों और क्षत्रियों को कष्ट न पहुँचाकर न्यायोचित धन से राजा का खजाना भरते थे। वे अपराधी पुरुष के बलाबल को देखकर उसके प्रति तीक्ष्ण अथवा मृदु दण्ड का प्रयोग करते थे॥१३॥

श्लोक:
शुचीनामेकबुद्धीनां सर्वेषां सम्प्रजानताम्।
नासीत्पुरे वा राष्ट्र वा मृषावादी नरः क्वचित्॥१४॥

भावार्थ :-
उन सबके भाव शुद्ध और विचार एक थे। उनकी जानकारी में अयोध्यापुरी अथवा कोसलराज्य के भीतर कहीं एक भी मनुष्य ऐसा नहीं था, जो मिथ्यावादी,-॥१४॥

श्लोक:
क्वचिन्न दुष्टस्तत्रासीत् परदाररतिर्नरः।
प्रशान्तं सर्वमेवासीद् राष्ट्र पुरवरं च तत्॥१५॥

भावार्थ :-
दुष्ट और परस्त्रीलम्पट (ऐसा कोई मनुष्य नहीं था जो दूसरे की पत्नी के प्रति आकर्षित हो)। सम्पूर्ण राष्ट्र और नगर में पूर्ण शान्ति छायी रहती थी॥१५॥

श्लोक:
सुवाससः सुवेषाश्च ते च सर्वे शुचिव्रताः।
हितार्थाश्च नरेन्द्रस्य जाग्रतो नयचक्षुषा॥१६॥

भावार्थ :-
उन मन्त्रियों के वस्त्र और वेष स्वच्छ एवं सुन्दर होते थे। वे उत्तम व्रत का पालन करने वाले तथा राजा के हितैषी थे। नीति रूपी नेत्रों से देखते हुए सदा सजग रहते थे॥१६॥

श्लोक:
गुरोर्गुणगृहीताश्च प्रख्याताश्च पराक्रमैः।
विदेशेष्वपि विज्ञाताः सर्वतो बुद्धिनिश्चयाः॥१७॥

भावार्थ :-
अपने गुणों के कारण वे सभी मन्त्री गुरुतुल्य समादरणीय राजा के अनुग्रह पात्र थे। अपने पराक्रमों के कारण उनकी सर्वत्र ख्याति थी। विदेशों में भी सब लोग उन्हें जानते थे। वे सभी बातों में बुद्धि द्वारा भली-भाँति विचार करके किसी निश्चय पर पहुँचते थे॥१७॥

श्लोक:
अभितो गुणवन्तश्च न चासन् गुणवर्जिताः।
संधिविग्रहतत्त्वज्ञाः प्रकृत्या सम्पदान्विताः॥१८॥

भावार्थ :-
समस्त देशों और कालों में वे गुणवान् ही सिद्ध होते थे, गुणहीन नहीं। संधि और विग्रह के उपयोग और अवसर का उन्हें अच्छी तरह ज्ञान था। वे स्वभाव से ही सम्पत्तिशाली (दैवी सम्पत्ति से युक्त) थे॥१८॥

श्लोक:
मन्त्रसंवरणे शक्ताः शक्ताः सूक्ष्मासु बुद्धिषु।
नीतिशास्त्रविशेषज्ञाः सततं प्रियवादिनः॥१९॥

भावार्थ :-
उनमें राजकीय मन्त्रणा को गुप्त रखने की पूर्ण शक्ति थी। वे सूक्ष्मविषय का विचार करने में कुशल थे। नीतिशास्त्र में उनकी विशेष जानकारी थी तथा वे सदा ही प्रिय लगने वाली बात बोलते थे॥१९॥

श्लोक:
ईदृशैस्तैरमात्यैश्च राजा दशरथोऽनघः।
उपपन्नो गुणोपेतैरन्वशासद् वसुन्धराम्॥२०॥

भावार्थ :-
ऐसे गुणवान् मन्त्रियों के साथ रहकर निष्पाप राजा दशरथ उस भूमण्डल का शासन करते थे॥२०॥

श्लोक:
अवेक्ष्यमाणश्चारेण प्रजा धर्मेण रक्षयन्।
प्रजानां पालनं कुर्वन्नधर्म परिवर्जयन्॥२१॥

भावार्थ :-
वे गुप्तचरों के द्वारा अपने और शत्रु-राज्य के वृत्तान्तों पर दृष्टि रखते थे, प्रजा का धर्मपूर्वक पालन करते थे तथा प्रजापालन करते हुए अधर्म से दूर ही रहते थे॥२१॥

श्लोक:
विश्रुतस्त्रिषु लोकेषु वदान्यः सत्यसंगरः।
स तत्र पुरुषव्याघ्रः शशास पृथिवीमिमाम्॥२२॥

भावार्थ :-
उनकी तीनों लोकों में प्रसिद्धि थी। वे उदार और सत्यप्रतिज्ञ थे। पुरुषसिंह राजा दशरथ अयोध्या में ही रहकर इस पृथ्वी का शासन करते थे॥२२॥

श्लोक:
नाध्यगच्छद्विशिष्टं वा तुल्यं वा शत्रुमात्मनः।
मित्रवान्नतसामन्तः प्रतापहतकण्टकः।
स शशास जगद् राजा दिवि देवपतिर्यथा॥२३॥

भावार्थ :-
उन्हें कभी अपने से बड़ा अथवा अपने समान भी कोई शत्रु नहीं मिला। उनके मित्रों की संख्या बहुत थी। सभी सामन्त उनके चरणों में मस्तक झुकाते थे। उनके प्रताप से राज्य के सारे कण्टक (शत्रु एवं चोर आदि) नष्ट हो गये थे। जैसे देवराज इन्द्र स्वर्ग में रहकर तीनों लोकों का पालन करते हैं, उसी प्रकार राजा दशरथ अयोध्या में रहकर सम्पूर्ण जगत् पर शासन करते थे॥२३॥

श्लोक:
तैर्मन्त्रिभिर्मन्त्रहिते निविष्टैवृतोऽनुरक्तैः कुशलैः समर्थैः।
स पार्थिवो दीप्तिमवाप युक्तस्तेजोमयैर्गोभिरिवोदितोऽर्कः॥२४॥

भावार्थ :-
उनके मन्त्री मन्त्रणा को गुप्त रखने तथा राज्य के हित-साधन में संलग्न रहते थे। वे राजा के प्रति अनुरक्त, कार्यकुशल और शक्तिशाली थे। जैसे सूर्य अपनी तेजोमयी किरणों के साथ उदित होकर प्रकाशित होते हैं, उसी प्रकार राजा दशरथ उन तेजस्वी मन्त्रियों से घिरे रहकर बड़ी शोभा पाते थे॥२४॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे सप्तमः सर्गः॥७॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आपरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें सातवाँ सर्ग पूरा हुआ॥७॥

AI बालकाण्ड सर्ग- ८ 

MNSGranth

We Are Prepare You For The Future.

अपना बिचार व्यक्त करें।

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

0%
 📖 आगे पढ़ें 
 SHORTS

Discover more from 𝕄ℕ𝕊𝔾𝕣𝕒𝕟𝕥𝕙

Subscribe now to keep reading and get access to the full archive.

Continue reading

Trishul