॥ श्री गणेशाय नमः ॥
॥ श्री कमलापति नम: ॥
॥ श्री जानकीवल्लभो विजयते ॥
॥ ॐ नमः शिवाय ॥
दान करें 🗳
Pay By UPI
Name:- Manish Kumar ChaturvediMobile:- +919554988808
Click On UPI Id:-
9554988808@hdfcbank
mnspandit@ybl
mnskumar@axisbank
9554988808@ybl
Pay In Account
शिवताण्डव स्तोत्र कथा
शिवताण्डव स्तोत्र स्तोत्रकाव्य में अत्यन्त ही लोकप्रिय है। यह पंचचामर छन्द में आबद्ध है। इसकी अनुप्रास और समास बहुल भाषा एवं संगीतमय ध्वनि तथा प्रवाह के कारण शिवभक्तों में प्रचलित ही है। सुन्दर भाषा एवं काव्य-शैली के कारण ही यह स्तोत्र विशेषकर शिवस्तोत्रों में अत्यंत ही विशिष्ट स्थान रखता है।
मान्यता है कि एक बार शिवभक्त रावण को अपनी शक्ति पर घमंड हो गया था जिस कारण बस उसने कैलाश पर्वत ही उठा लिया था और जब वह पूरे पर्वत को ही लंका ले चलने को उद्यत हुआ तो उस समय वह अपनी शक्ति पर पूर्ण अहंकार भाव में था। परन्तु महादेव को उसका यह अहंकार पसंद नही आया तो भगवान् शिव ने रावण का घमंड तोड़ने के लिए अपने पैर के अंगूठे से तनिक सा जो दबाया तो कैलाश पर्वत फिर जहाँ था वहीं अवस्थित हो गया।
परन्तु शिव के अनन्य भक्त रावण का हाथ कैलाश पर्वत के नीचे दब गया और वह आर्त्तनाद कर उठा- “शंकर शंकर” – अर्थात क्षमा करिए, क्षमा करिए, और भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए स्तुति करने लग गया; जो कालांतर में शिव तांडव स्तोत्र कहलाया। शिव ताण्डव स्तोत्र से शिव जी इतना खुश हुए की आशुतोष भगवान भोलेनाथ ने ना केवल रावण को सकल समृद्धि और सिद्धि से युक्त सोने की लंका ही वरदान के रूप में दी अपितु सम्पूर्ण ज्ञान, विज्ञान तथा अमर होने का वरदान भी दिया। शास्त्रों मे कहा जाता है की शिव ताण्डव स्तोत्र सुनने मात्र से ही व्यक्ति सम्पत्ति, समृद्धि अथवा सन्तादि प्राप्त करता है।
इस स्रोत की भाषा अनुपम और जटिल है, पर महाविद्वान रावण ने इसे कुछ पलो में ही बना दिया था। शिव स्तुति और प्रसन्नता में यह स्तोत्र राम बाण है।
शिवताण्डव स्तोत्र
- शीर्ष 10 दृश्य:
- श्री दुर्गा सप्तशती | Shri Durga Saptashati
- श्रीमद्भगवद् गीता I ShriBhagavadGeeta
- श्रीरामचरितमानस भावार्थ सहित- बालकाण्ड- 201-225
- बालकाण्ड | Balkanda
- सुन्दरकाण्ड | Sundarkanda
- श्री सत्यनारायण व्रत कथा संस्कृत में हिन्दी भावार्थ सहित
- लंकाकाण्ड | Lankakanda
- उत्तरकाण्ड | Uttarakhanda
- अरण्यकाण्ड | Aranyakanda
- किष्किन्धाकाण्ड | Kishkindhakanda











