वाल्मीकि रामायण- अयोध्याकाण्ड सर्ग- ३०
॥ श्री गणेशाय नमः ॥
॥ श्री कमलापति नम: ॥
॥ श्री जानकीवल्लभो विजयते ॥
॥ श्री वाल्मीकि रामायण ॥
वाल्मीकि रामायण
(भावार्थ सहित)
सब एक ही स्थान पर
अयोध्याकाण्ड सर्ग- ३०
अयोध्याकाण्डम्
त्रिंशः सर्गः (सर्ग 30)
( सीता का वन में चलने के लिये अधिकआग्रह, विलाप और घबराहट देखकर श्रीराम का उन्हें साथ ले चलने की स्वीकृति देना )
श्लोक:
सान्त्व्यमाना तु रामेण मैथिली जनकात्मजा।
वनवासनिमित्तार्थं भर्तारमिदमब्रवीत्॥१॥
भावार्थ :-
श्रीराम के समझाने पर मिथिलेशकुमारी जानकी वनवास की आज्ञा प्राप्त करने के लिये अपने पति से फिर इस प्रकार बोलीं॥१॥
श्लोक:
सा तमुत्तमसंविग्ना सीता विपुलवक्षसम्।
प्रणयाच्चाभिमानाच्च परिचिक्षेप राघवम्॥२॥
भावार्थ :-
सीता अत्यन्त डरी हुई थीं। वे प्रेम और स्वाभिमान के कारण विशाल वक्षःस्थलवाले श्रीरामचन्द्रजी पर आक्षेप-सा करती हुई कहने लगीं-॥२॥
श्लोक:
किं त्वामन्यत वैदेहः पिता मे मिथिलाधिपः।
राम जामातरं प्राप्य स्त्रियं पुरुषविग्रहम्॥३॥
भावार्थ :-
‘श्रीराम! क्या मेरे पिता मिथिलानरेश विदेहराज जनक ने आपको जामाता के रूप में पाकर कभी यह भी समझा था कि आप केवल शरीर से ही पुरुष हैं; कार्यकलाप से तो स्त्री ही हैं॥३॥
श्लोक:
अनृतं बत लोकोऽयमज्ञानाद् यदि वक्ष्यति।
तेजो नास्ति परं रामे तपतीव दिवाकरे॥४॥
भावार्थ :-
‘नाथ! आपके मुझे छोड़कर चले जानेपर संसारके लोग अज्ञानवश यदि यह कहने लगें कि सूर्यके समान तपनेवाले श्रीरामचन्द्रमें तेज और पराक्रमका अभाव है तो उनकी यह असत्य धारणा मेरे लिये कितने दुःखकी बात होगी॥४॥
श्लोक:
किं हि कृत्वा विषण्णस्त्वं कुतो वा भयमस्ति ते।
यत् परित्यक्तुकामस्त्वं मामनन्यपरायणाम्॥५॥
भावार्थ :-
‘आप क्या सोचकर विषादमें पड़े हुए हैं अथवा किससे आपको भय हो रहा है, जिसके कारण आप अपनी पत्नी मुझ सीताका, जो एकमात्र आपके ही आश्रित है, परित्याग करना चाहते हैं॥५॥
श्लोक:
धुमत्सेनसुतं वीरं सत्यवन्तमनुव्रताम्।
सावित्रीमिव मां विद्धि त्वमात्मवशवर्तिनीम्॥६॥
भावार्थ :-
‘जैसे सावित्री धुमत्सेनकुमार वीरवर सत्यवान् की ही अनुगामिनी थी, उसी प्रकार आप मुझे भी अपनी ही आज्ञा के अधीन समझिये॥६॥
श्लोक:
न त्वहं मनसा त्वन्यं द्रष्टास्मि त्वदृतेऽनघ।
त्वया राघव गच्छेयं यथान्या कुलपांसनी॥७॥
भावार्थ :-
‘निष्पाप रघुनन्दन! जैसी दूसरी कोई कुलकलङ्किनी स्त्री परपुरुष पर दृष्टि रखती है, वैसी मैं नहीं हूँ। मैं तो आपके सिवा किसी दूसरे पुरुष को मन से भी नहीं देख सकती। इसलिये आपके साथ ही चलूँगी (आपके बिना अकेली यहाँ नहीं रहूँगी)॥७॥
श्लोक:
स्वयं तु भार्यां कौमारी चिरमध्युषितां सतीम्।
शैलूष इव मां राम परेभ्यो दातुमिच्छसि॥८॥
भावार्थ :-
‘श्रीराम! जिसका कुमारावस्था में ही आपके साथ विवाह हुआ है और जो चिरकाल तक आपके साथ रह चुकी है, उसी मुझ अपनी सती-साध्वी पत्नी को आप औरत की कमाई खाने वाले नट की भाँति दूसरों के हाथ में सौंपना चाहते हैं?॥८॥
श्लोक:
यस्य पथ्यंचरामात्थ यस्य चार्थेऽवरुध्यसे।
त्वं तस्य भव वश्यश्च विधेयश्च सदानघ॥९॥
भावार्थ :-
‘निष्पाप रघुनन्दन! आप मुझे जिसके अनुकूल चलने की शिक्षा दे रहे हैं और जिसके लिये आपका राज्याभिषेक रोक दिया गया है, उस भरत के सदा ही वशवर्ती और आज्ञापालक बनकर आप ही रहिये, मैं नहीं रहूँगी॥९॥
श्लोक:
स मामनादाय वनं न त्वं प्रस्थितमर्हसि।
तपो वा यदि वारण्यं स्वर्गो वा स्यात् त्वया सह॥१०॥
भावार्थ :-
‘इसलिये आपका मुझे अपने साथ लिये बिना वन की ओर प्रस्थान करना उचित नहीं है। यदि तपस्या करनी हो, वन में रहना हो अथवा स्वर्ग में जाना हो तो सभी जगह मैं आपके साथ रहना चाहती हूँ॥१०॥
श्लोक:
न च मे भविता तत्र कश्चित् पथि परिश्रमः।
पृष्ठतस्तव गच्छन्त्या विहारशयनेष्विव॥११॥
भावार्थ :-
‘जैसे बगीचे में घूमने और पलंग पर सोने में कोई कष्ट नहीं होता, उसी प्रकार आपके पीछे-पीछे वन के मार्ग पर चलने में भी मुझे कोई परिश्रम नहीं जान पड़ेगा॥११॥
श्लोक:
कुशकाशशरेषीका ये च कण्टकिनो द्रुमाः।
तूलाजिनसमस्पर्शा मार्गे मम सह त्वया॥१२॥
भावार्थ :-
‘रास्ते में जो कुश-कास, सरकंडे, सींक और काँटेदार वृक्ष मिलेंगे, उनका स्पर्श मुझे आपके साथ रहने से रूई और मृगचर्म के समान सुखद प्रतीत होगा॥१२॥
श्लोक:
महावातसमुद्भूतं यन्मामवकरिष्यति।
रजो रमण तन्मन्ये परार्घ्यमिव चन्दनम्॥१३॥
भावार्थ :-
‘प्राणवल्लभ! प्रचण्ड आँधी से उड़कर मेरे शरीर पर जो धूल पड़ेगी, उसे मैं उत्तम चन्दन के समान समशृंगी॥१३॥
श्लोक:
शाद्रलेषु यदा शिश्ये वनान्तर्वनगोचरा।
कुथास्तरणयुक्तेषु किं स्यात् सुखतरं ततः॥१४॥
भावार्थ :-
‘जब वन के भीतर रहँगी, तब आपके साथ घासों पर भी सो लूँगी। रंग-बिरंगे कालीनों और मुलायम बिछौनों से युक्त पलंगों पर क्या उससे अधिक सुख हो सकता है?॥१४॥
श्लोक:
पत्रं मूलं फलं यत्तु अल्पं वा यदि वा बहु।
दास्यसे स्वयमाहृत्य तन्मेऽमृतरसोपमम्॥१५॥
भावार्थ :-
‘आप अपने हाथ से लाकर थोड़ा या बहुत फल, मूल या पत्ता, जो कुछ दे देंगे, वही मेरे लिये अमृत रस के समान होगा॥१५॥
श्लोक:
न मातुर्न पितुस्तत्र स्मरिष्यामि न वेश्मनः।
आर्तवान्युपभुजाना पुष्पाणि च फलानि च॥१६॥
भावार्थ :-
‘ऋतु के अनुकूल जो भी फल-फूल प्राप्त होंगे, उन्हें खाकर रहँगी और माता-पिता अथवा महल को कभी याद नहीं करूँगी॥१६॥
श्लोक:
न च तत्र ततः किंचिद् द्रष्टमर्हसि विप्रियम्।
मत्कृते न च ते शोको न भविष्यामि दुर्भरा॥१७॥
भावार्थ :-
‘वहाँ रहते समय मेरा कोई भी प्रतिकूल व्यवहार आप नहीं देख सकेंगे। मेरे लिये आपको कोई कष्ट नहीं उठाना पड़ेगा। मेरा निर्वाह आपके लिये दूभर नहीं होगा॥१७॥
श्लोक:
यस्त्वया सह स स्वर्गो निरयो यस्त्वया विना।
इति जानन् परां प्रीतिं गच्छ राम मया सह॥१८॥
भावार्थ :-
‘आपके साथ जहाँ भी रहना पड़े, वही मेरे लिये स्वर्ग है और आपके बिना जो कोई भी स्थान हो, वह मेरे लिये नरक के समान है। श्रीराम! मेरे इस निश्चय को जानकर आप मेरे साथ अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक वनको चलें॥१८॥
श्लोक:
अथ मामेवमव्यग्रां वनं नैव नयिष्यसे।
विषमद्यैव पास्यामि मा वशं द्विषतां गमम्॥१९॥
भावार्थ :-
‘मुझे वनवास के कष्ट से कोई घबराहट नहीं है। यदि इस दशा में भी आप अपने साथ मुझे वन में नहीं ले चलेंगे तो मैं आज ही विष पी लूँगी, परंतु शत्रुओं के अधीन होकर नहीं रहूँगी॥१९॥
श्लोक:
पश्चादपि हि दुःखेन मम नैवास्ति जीवितम्।
उज्झितायास्त्वया नाथ तदैव मरणं वरम्॥२०॥
भावार्थ :-
नाथ! यदि आप मुझे त्यागकर वन को चले जायँगे तो पीछे भी इस भारी दुःख के कारण मेरा जीवित रहना सम्भव नहीं है; ऐसी दशा में मैं इसी समय आपके जाते ही अपना प्राण त्याग देना अच्छा समझती हूँ॥२०॥
श्लोक:
इमं हि सहितुं शोकं मुहूर्तमपि नोत्सहे।
किं पुनर्दश वर्षाणि त्रीणि चैकं च दुःखिता॥२१॥
भावार्थ :-
‘आपके विरह का यह शोक मैं दो घड़ी भी नहीं सह सकूँगी। फिर मुझ दुःखिया से यह चौदह वर्षों तक कैसे सहा जायगा?’॥२१॥
श्लोक:
इति सा शोकसंतप्ता विलप्य करुणं बह।
चुक्रोश पतिमायस्ता भृशमालिङ्ग्य सस्वरम्॥२२॥
भावार्थ :-
इस प्रकार बहुत देरतक करुणाजनक विलाप करके शोक से संतप्त हुई सीता शिथिल हो अपने पति को जोर से पकड़कर उनका गाढ़ आलिङ्गन करके फूट-फूटकर रोने लगीं॥२२॥
श्लोक:
सा विद्धा बहुभिर्वाक्यैर्दिग्धैरिव गजाङ्गना।
चिरसंनियतं बाष्पं मुमोचाग्निमिवारणिः॥२३॥
भावार्थ :-
जैसे कोई हथिनी विष में बुझे हुए बहुसंख्यक बाणों द्वारा घायल कर दी गयी हो, उसी प्रकार सीता श्रीरामचन्द्रजी के पूर्वोक्त अनेकानेक वचनों द्वारा मर्माहत हो उठी थीं; अतः जैसे अरणी आग प्रकट करती है, उसी प्रकार वे बहुत देर से रोके हुए आँसुओं को बरसाने लगीं॥२३॥
श्लोक:
तस्याः स्फटिकसंकाशं वारि संतापसम्भवम्।
नेत्राभ्यां परिसुस्राव पङ्कजाभ्यामिवोदकम्॥२४॥
भावार्थ :-
उनके दोनों नेत्रों से स्फटिक के समान निर्मल संतापजनित अश्रुजल झर रहा था, मानो दो कमलों से जलकी धारा गिर रही हो॥२४॥
श्लोक:
तत्सितामलचन्द्राभं मुखमायतलोचनम्।
पर्यशुष्यत बाष्पेण जलोद्धृतमिवाम्बुजम्॥२५॥
भावार्थ :-
बड़े-बड़े नेत्रों से सुशोभित और पूर्णिमा के निर्मल चन्द्रमा के समान कान्तिमान् उनका वह मनोहर मुख संतापजनित ताप के कारण पानी से बाहर निकाले हुए कमल के समान सूख-सा गया था॥२५॥
श्लोक:
तां परिष्वज्य बाहुभ्यां विसंज्ञामिव दुःखिताम्।
उवाच वचनं रामः परिविश्वासयंस्तदा॥२६॥
भावार्थ :-
सीताजी दुःख के मारे अचेत-सी हो रही थीं। श्रीरामचन्द्रजी ने उन्हें दोनों हाथों से सँभालकर हृदय से लगा लिया और उस समय उन्हें सान्त्वना देते हुए कहा-॥२६॥
श्लोक:
न देवि बत दुःखेन स्वर्गमप्यभिरोचये।
नहि मेऽस्ति भयं किंचित् स्वयम्भोरिव सर्वतः॥२७॥
भावार्थ :-
‘देवि! तुम्हें दुःख देकर मुझे स्वर्ग का सुख मिलताहो तो मैं उसे भी लेना नहीं चाहूँगा। स्वयम्भू ब्रह्माजी की भाँति मुझे किसी से किञ्चित् भी भय नहीं है॥२७॥
श्लोक:
तव सर्वमभिप्रायमविज्ञाय शुभानने।
वासं न रोचयेऽरण्ये शक्तिमानपि रक्षणे॥२८॥
भावार्थ :-
‘शुभानने! यद्यपि वन में तुम्हारी रक्षा करने के लिये मैं सर्वथा समर्थ हूँ तो भी तुम्हारे हार्दिक अभिप्राय को पूर्णरूप से जाने बिना तुमको वनवासिनी बनाना मैं उचित नहीं समझता था॥२८॥
श्लोक:
यत् सृष्टासि मया सार्धं वनवासाय मैथिलि।
न विहातुं मया शक्या प्रीतिरात्मवता यथा॥२९॥
भावार्थ :-
‘मिथिलेशकुमारी! जब तुम मेरे साथ वन में रहने के लिये ही उत्पन्न हुई हो तो मैं तुम्हें छोड़ नहीं सकता, ठीक उसी तरह जैसे आत्मज्ञानी पुरुष अपनी स्वाभाविक प्रसन्नता का त्याग नहीं करते॥२९॥
श्लोक:
धर्मस्तु गजनासोरु सद्भिराचरितः पुरा।
तं चाहमनुवर्तिष्ये यथा सूर्यं सुवर्चला॥३०॥
भावार्थ :-
‘हाथी की ढूँड़ के समान जाँघ वाली जनककिशोरी! पूर्वकाल के सत्पुरुषों ने अपनी पत्नी के साथ रहकर जिस धर्म का आचरण किया था, उसीका मैं भी तुम्हारे साथ रहकर अनुसरण करूँगा तथा जैसे सुवर्चला (संज्ञा) अपने पति सूर्य का अनुगमन करती है, उसी प्रकार तुम भी मेरा अनुसरण करो॥३०॥
श्लोक:
न खल्वहं न गच्छेयं वनं जनकनन्दिनि।
वचनं तन्नयति मां पितुः सत्योपबृंहितम्॥३१॥
भावार्थ :-
‘जनकनन्दिनि! यह तो किसी प्रकार सम्भव ही नहीं है कि मैं वन को न जाऊँ; क्योंकि पिताजी का वह सत्ययुक्त वचन ही मुझे वन की ओर ले जा रहा है॥३१॥
श्लोक:
एष धर्मश्च सुश्रोणि पितुर्मातुश्च वश्यता।
आज्ञां चाहं व्यतिक्रम्य नाहं जीवितुमुत्सहे॥३२॥
भावार्थ :-
‘सुश्रोणि! पिता और माता की आज्ञा के अधीन रहना पुत् रका धर्म है, इसलिये मैं उनकी आज्ञाका उल्लङ्घन करके जीवित नहीं रह सकता॥३२॥
श्लोक:
अस्वाधीनं कथं दैवं प्रकारैरभिराध्यते।
स्वाधीनं समतिक्रम्य मातरं पितरं गुरुम्॥३३॥
भावार्थ :-
‘जो अपनी सेवा के अधीन हैं, उन प्रत्यक्ष देवता माता, पिता एवं गुरु का उल्लङ्घन करके जो सेवा के अधीन नहीं है, उस अप्रत्यक्ष देवता दैव की विभिन्न प्रकार से किस तरह आराधना की जा सकती है॥३३॥
श्लोक:
यत्र त्रयं त्रयो लोकाः पवित्रं तत्समं भुवि।
नान्यदस्ति शुभापाले तेनेदमभिराध्यते॥३४॥
भावार्थ :-
‘सुन्दर नेत्रप्रान्तवाली सीते! जिनकी आराधना करने पर धर्म, अर्थ और काम तीनों प्राप्त होते हैं तथा तीनों लोकों की आराधना सम्पन्न हो जाती है, उन माता, पिता और गुरु के समान दूसरा कोई पवित्र देवता इस भूतल पर नहीं है। इसीलिये भूतल के निवासी इन तीनों देवताओं की आराधना करते हैं॥३४॥
श्लोक:
न सत्यं दानमानौ वा यज्ञो वाप्याप्तदक्षिणाः।
तथा बलकराः सीते यथा सेवा पितुर्मता॥३५॥
भावार्थ :-
‘सीते! पिताकी सेवा करना कल्याण की प्राप्ति का जैसा प्रबल साधन माना गया है, वैसा न सत्य है, न दान है, न मान है और न पर्याप्त दक्षिणा वाले यज्ञ ही हैं॥३५॥
श्लोक:
स्वर्गो धनं वा धान्यं वा विद्या पुत्राः सुखानि च।
गुरुवृत्त्यनुरोधेन न किंचिदपि दुर्लभम्॥३६॥
भावार्थ :-
‘गुरुजनों की सेवा का अनुसरण करने से स्वर्ग, धनधान्य, विद्या, पुत्र और सुख-कुछ भी दुर्लभ नहीं है॥३६॥
श्लोक:
देवगन्धर्वगोलोकान् ब्रह्मलोकांस्तथापरान्।
प्राप्नुवन्ति महात्मानो मातापितृपरायणाः॥३७॥
भावार्थ :-
‘माता-पिता की सेवा में लगे रहने वाले महात्मा पुरुष देवलोक, गन्धर्वलोक, ब्रह्मलोक, गोलोक तथा अन्य लोकों को भी प्राप्त कर लेते हैं॥३७॥
श्लोक:
स मा पिता यथा शास्ति सत्यधर्मपथे स्थितः।
तथा वर्तितुमिच्छामि स हि धर्मः सनातनः॥३८॥
भावार्थ :-
‘इसीलिये सत्य और धर्म के मार्ग पर स्थित रहने वाले पूज्य पिताजी मुझे जैसी आज्ञा दे रहे हैं, मैं वैसा ही बर्ताव करना चाहता हूँ; क्योंकि वह सनातन धर्म है॥३८॥
श्लोक:
मम सन्ना मतिः सीते नेतुं त्वां दण्डकावनम्।
वसिष्यामीति सा त्वं मामनुयातुं सुनिश्चिता॥ ३९॥
भावार्थ :-
‘सीते! ‘मैं आपके साथ वन में निवास करूँगी’ऐसा कहकर तुमने मेरे साथ चलने का दृढ़ निश्चय कर लिया है, इसलिये तुम्हें दण्डकारण्य ले चलने के सम्बन्ध में जो मेरा पहला विचार था, वह अब बदल गया है॥३९॥
श्लोक:
सा हि दिष्टानवद्याङ्गि वनाय मदिरेक्षणे।
अनुगच्छस्व मां भीरु सहधर्मचरी भव॥४०॥
भावार्थ :-
‘मदभरे नेत्रोंवाली सुन्दरी! अब मैं तुम्हें वन में चलने के लिये आज्ञा देता हूँ। भीरु! तुम मेरी अनुगामिनी बनो और मेरे साथ रहकर धर्म का आचरण करो॥४०॥
श्लोक:
सर्वथा सदृशं सीते मम स्वस्य कुलस्य च।
व्यवसायमनुक्रान्ता कान्ते त्वमतिशोभनम्॥४१॥
भावार्थ :-
‘प्राणवल्लभे सीते! तुमने मेरे साथ चलने का जो यह परम सुन्दर निश्चय किया है, यह तुम्हारे और मेरे कुल के सर्वथा योग्य ही है॥४१॥
श्लोक:
आरभस्व शुभश्रोणि वनवासक्षमाः क्रियाः।
नेदानीं त्वदते सीते स्वर्गोऽपि मम रोचते॥४२॥
भावार्थ :-
‘सुश्रोणि! अब तुम वनवास के योग्य दान आदि कर्म प्रारम्भ करो। सीते! इस समय तुम्हारे इस प्रकार दृढ़ निश्चय कर लेने पर तुम्हारे बिना स्वर्ग भी मुझे अच्छा नहीं लगता है॥४२॥
श्लोक:
ब्राह्मणेभ्यश्च रत्नानि भिक्षुकेभ्यश्च भोजनम्।
देहि चाशंसमानेभ्यः संत्वरस्व च मा चिरम्॥४३॥
भावार्थ :-
‘ब्राह्मणों को रत्नस्वरूप उत्तम वस्तुएँ दान करो और भोजन माँगने वाले भिक्षकों को भोजन दो। शीघ्रता करो, विलम्ब नहीं होना चाहिये॥४३॥
श्लोक:
भूषणानि महार्हाणि वरवस्त्राणि यानि च।
रमणीयाश्च ये केचित् क्रीडार्थाश्चाप्युपस्कराः॥४४॥
शयनीयानि यानानि मम चान्यानि यानि च।
देहि स्वभृत्यवर्गस्य ब्राह्मणानामनन्तरम्॥४५॥
भावार्थ :-
तुम्हारे पास जितने बहुमूल्य आभूषण हों, जो-जो अच्छे-अच्छे वस्त्र हों, जो कोई भी रमणीय पदार्थ हों तथा मनोरञ्जनकी जो-जो सुन्दर सामग्रियाँ हों, मेरे और तुम्हारे उपयोग में आने वाली जो उत्तमोत्तम शय्याएँ, सवारियाँ तथा अन्य वस्तुएँ हों, उनमें से ब्राह्मणों को दान करनेके पश्चात् जो बचें उन सबको अपने सेवकों को बाँट दो’॥४४-४५॥
श्लोक:
अनुकूलं तु सा भर्तुर्ज्ञात्वा गमनमात्मनः।
क्षिप्रं प्रमुदिता देवी दातुमेव प्रचक्रमे॥४६॥
भावार्थ :-
‘स्वामी ने वन में मेरा जाना स्वीकार कर लिया मेरा वनगमन उनके मन के अनुकूल हो गया’ यह जानकर देवी सीता बहुत प्रसन्न हुईं और शीघ्रतापूर्वक सब वस्तुओं का दान करने में जुट गयीं॥४६॥
श्लोक:
ततः प्रहृष्टा प्रतिपूर्णमानसा यशस्विनी भर्तुरवेक्ष्य भाषितम्।
धनानि रत्नानि च दातुमङ्गना प्रचक्रमे धर्मभृतां मनस्विनी॥४७॥
भावार्थ :-
तदनन्तर अपना मनोरथ पूर्ण हो जाने से अत्यन्त हर्ष में भरी हुई यशस्विनी एवं मनस्विनी सीता देवी स्वामी के आदेश पर विचार करके धर्मात्मा ब्राह्मणों को धन और रत्नों का दान करने के लिये उद्यत हो गयीं॥४७॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे त्रिंशः सर्गः॥३०॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥३०॥
- शीर्ष 10 दृश्य:
- श्री दुर्गा सप्तशती | Shri Durga Saptashati
- श्रीमद्भगवद् गीता I ShriBhagavadGeeta
- श्रीरामचरितमानस भावार्थ सहित- बालकाण्ड- 201-225
- बालकाण्ड | Balkanda
- सुन्दरकाण्ड | Sundarkanda
- श्री सत्यनारायण व्रत कथा संस्कृत में हिन्दी भावार्थ सहित
- लंकाकाण्ड | Lankakanda
- उत्तरकाण्ड | Uttarakhanda
- अरण्यकाण्ड | Aranyakanda
- किष्किन्धाकाण्ड | Kishkindhakanda











