वाल्मीकि रामायण- AI बालकाण्ड सर्ग- ३३

बालकाण्ड सर्ग- ३३

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बालकाण्ड सर्ग- ३३

॥ श्री गणेशाय नमः ॥
॥ श्री कमलापति नम: ॥
॥ श्री जानकीवल्लभो विजयते ॥
॥ श्री वाल्मीकि रामायण ॥
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बालकाण्ड सर्ग- ३३

AI वाल्मीकि रामायण
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बालकाण्ड सर्ग- ३३

AI बालकाण्ड सर्ग- ३३



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बालकाण्डम्
त्रयस्त्रिंशः सर्गः (सर्ग 33)

( राजा कुशनाभद्वारा कन्याओं के धैर्य एवं क्षमाशीलता की प्रशंसा, ब्रह्मदत्त की उत्पत्ति तथा उनके साथ कुशनाभ की कन्याओं का विवाह )

श्लोक:
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा कुशनाभस्य धीमतः।
शिरोभिश्चरणौ स्पृष्ट्वा कन्याशतमभाषत॥१॥

भावार्थ :-
बुद्धिमान् महाराज कुशनाभ का वह वचन सुनकर उन सौ कन्याओंने पिता के चरणों में सिर रखकर प्रणाम किया और इस प्रकार कहा-॥१॥

श्लोक:
वायुः सर्वात्मको राजन् प्रधर्षयितुमिच्छति।
अशुभं मार्गमास्थाय न धर्मं प्रत्यवेक्षते॥२॥

भावार्थ :-
राजन्! सर्वत्र संचार करने वाले वायुदेव अशुभ मार्गका अवलम्बन करके हमपर बलात्कार करना चाहते थे धर्मपर उनकी दृष्टि नहीं थी॥२॥

श्लोक:
पितृमत्यः स्म भद्रं ते स्वच्छन्दे न वयं स्थिताः।
पितरं नो वृणीष्व त्वं यदि नो दास्यते तव॥३॥

भावार्थ :-
हमने उनसे कहा- ’देव! आपका कल्याण हो, हमारे पिता विद्यमान हैं; हम स्वच्छन्द नहीं हैं। आप पिताजी के पास जाकर हमारा वरण कीजिये यदि वे हमें आपको सौंप देंगे तो हम आपकी हो जायँगी’॥३॥

श्लोक:
तेन पापानुबन्धेन वचनं न प्रतीच्छता।
एवं ब्रुवन्त्यः सर्वाः स्म वायुनाभिहता भृशम्॥४॥

भावार्थ :-
परंतु उनका मन तो पापसे बँधा हुआ था उन्होंने हमारी बात नहीं मानी। हम सब बहिनें ये ही धर्मसंगत बातें कह रही थीं, तो भी उन्होंने हमें गहरी चोट पहुँचायी और बिना अपराध के ही हमें पीडा दी॥४॥

श्लोक:
तासां तु वचनं श्रुत्वा राजा परमधार्मिकः।
प्रत्युवाच महातेजाः कन्याशतमनुत्तमम्॥५॥

भावार्थ :-
उनकी बात सुनकर परम धर्मात्मा महातेजस्वी राजाने उन अपनी परम उत्तम सौ कन्याओंको इस प्रकार उत्तर दिया-॥५॥

श्लोक:
क्षान्तं क्षमावतां पुत्र्यः कर्तव्यं सुमहत् कृतम्।
ऐकमत्यमुपागम्य कुलं चावेक्षितं मम॥६॥

भावार्थ :-
‘पुत्रियो! क्षमाशील महापुरुष ही जिसे कर सकते हैं, वही क्षमा तुमने भी की है। यह तुमलोगोंके द्वारा महान् कार्य सम्पन्न हुआ है। तुम सबने एकमत होकर जो मेरे कुलकी मर्यादा पर ही दृष्टि रखी है कामभाव को अपने मन में स्थान नहीं दिया है- यह भी तुमने बहुत बड़ा काम किया है॥६॥

श्लोक:
अलंकारो हि नारीणां क्षमा तु पुरुषस्य वा।
दुष्करं तच्च वै क्षान्तं त्रिदशेषु विशेषतः॥७॥
यादृशी वः क्षमा पुत्र्यः सर्वासामविशेषतः।

भावार्थ :-
‘स्त्री हो या पुरुष, उसके लिये क्षमा ही आभूषण है। पुत्रियो! तुम सब लोगों में समानरूप से जैसी क्षमा या सहिष्णुता है, वह विशेषतः देवताओंके लिये भी दुष्कर ही है॥७ १/२॥

श्लोक:
क्षमा दानं क्षमा सत्यं क्षमा यज्ञाश्च पुत्रिकाः॥८॥
क्षमा यशः क्षमा धर्मः क्षमायां विष्ठितं जगत्।

भावार्थ :-
‘पुत्रियो! क्षमा दान है, क्षमा सत्य है, क्षमा यज्ञ है, क्षमा यश है और क्षमा धर्म है, क्षमा पर भी यह सम्पूर्ण जगत् टिका हुआ है’॥८ १/२॥

श्लोक:
विसृज्य कन्याः काकुत्स्थ राजा त्रिदशविक्रमः॥९॥
मन्त्रज्ञो मन्त्रयामास प्रदानं सह मन्त्रिभिः।
देशे काले च कर्तव्यं सदृशे प्रतिपादनम्॥१०॥

भावार्थ :-
ककुत्स्थकुलनन्दन श्रीराम! देवतुल्य पराक्रमी राजा कुशनाभ ने कन्याओं से ऐसा कहकर उन्हें अन्तःपुर में जाने की आज्ञा दे दी और मन्त्रणा के तत्त्व को जानने वाले उन नरेश ने स्वयं मन्त्रियों के साथ बैठकर कन्याओं के विवाह के विषय में विचार आरम्भ किया। विचारणीय विषय यह था कि ‘किस देशमें किस समय और किस सुयोग्य वरके साथ उनका विवाह किया जाय?’॥९-१०॥

श्लोक:
एतस्मिन्नेव काले तु चूली नाम महाद्युतिः।
ऊर्ध्वरेताः शुभाचारो ब्राह्म तप उपागमत्॥११॥

भावार्थ :-
उन्हीं दिनों चूली नाम से प्रसिद्ध एक महातेजस्वी, सदाचारी एवं ऊर्ध्वरेता (नैष्ठिक ब्रह्मचारी) मुनि वेदोक्त तपका अनुष्ठान कर रहे थे (अथवा ब्रह्मचिन्तनरूप तपस्यामें संलग्न थे)॥११॥

श्लोक:
तपस्यन्तमृषिं तत्र गन्धर्वी पर्युपासते।
सोमदा नाम भद्रं ते ऊर्मिलातनया तदा॥१२॥

भावार्थ :-
श्रीराम! तुम्हारा भला हो, उस समय एक गन्धर्वकुमारी वहाँ रहकर उन तपस्वी मुनि की उपासना (अनुग्रहकी इच्छा से सेवा) करती थी। उसका नाम था सोमदा, वह ऊर्मिला की पुत्री थी॥१२॥

श्लोक:
सा च तं प्रणता भूत्वा शुश्रूषणपरायणा।
उवास काले धर्मिष्ठा तस्यास्तुष्टोऽभवद् गुरुः॥१३॥

भावार्थ :-
वह प्रतिदिन मुनि को प्रणाम करके उनकी सेवा में लगी रहती थी तथा धर्म में स्थित रहकर समय-समय पर सेवा के लिये उपस्थित होती थी; इससे उसके ऊपर वे गौरवशाली मुनि बहुत संतुष्ट हुए॥१३॥

श्लोक:
स च तां कालयोगेन प्रोवाच रघुनन्दन।
परितुष्टोऽस्मि भद्रं ते किं करोमि तव प्रियम्॥१४॥

भावार्थ :-
रघुनन्दन! शुभ समय आने पर चूली ने उस गन्धर्व कन्या से कहा- ’शुभे! तुम्हारा कल्याण हो, मैं तुम पर बहुत संतुष्ट हूँ बोलो, तुम्हारा कौन-सा प्रिय कार्य सिद्ध करूँ’॥१४॥

श्लोक:
परितुष्टं मुनिं ज्ञात्वा गन्धर्वी मधुरस्वरम्।
उवाच परमप्रीता वाक्यज्ञा वाक्यकोविदम्॥ १५॥

भावार्थ :-
मुनि को संतुष्ट जानकर गन्धर्व-कन्या बहुत प्रसन्न हुई वह बोलने की कला जानती थी; उसने वाणी के मर्मज्ञ मुनि से मधुर स्वर में इस प्रकार कहा-॥१५॥

श्लोक:
लक्ष्म्या समुदितो ब्राह्मया ब्रह्मभूतो महातपाः।
ब्राह्मण तपसा युक्तं पुत्रमिच्छामि धार्मिकम्॥१६॥

भावार्थ :-
‘महर्षे! आप ब्राह्मी सम्पत्ति (ब्रह्मतेज) से सम्पन्न होकर ब्रह्मस्वरूप हो गये हैं, अतएव आप महान् तपस्वी हैं मैं आपसे ब्राह्म तप (ब्रह्म-ज्ञान एवं वेदोक्त तप) से युक्त धर्मात्मा पुत्र प्राप्त करना चाहती हूँ॥१६॥

श्लोक:
अपतिश्चास्मि भद्रं ते भार्या चास्मि न कस्यचित्।
ब्राह्मणोपगतायाश्च दातुमर्हसि मे सुतम्॥१७॥

भावार्थ :-
‘मुने! आपका भला हो मेरे कोई पति नहीं है मैं न तो किसी की पत्नी हुई हूँ और न आगे होऊँगी, आपकी सेवामें आयी हूँ; आप अपने ब्राह्म बल (तपःशक्ति) से मुझे पुत्र प्रदान करें’॥१७॥

श्लोक:
तस्याः प्रसन्नो ब्रह्मर्षिर्ददौ ब्राह्ममनुत्तमम्।
ब्रह्मदत्त इति ख्यातं मानसं चूलिनः सुतम्॥१८॥

भावार्थ :-
उस गन्धर्व कन्या की सेवा से संतुष्ट हुए ब्रह्मर्षि चूली ने उसे परम उत्तम ब्राह्म तप से सम्पन्न पुत्र प्रदान किया। वह उनके मानसिक संकल्पसे प्रकट हुआ मानस पुत्र था। उसका नाम ‘ब्रह्मदत्त’ हुआ॥१८॥

श्लोक:
स राजा ब्रह्मदत्तस्तु पुरीमध्यवसत् तदा।
काम्पिल्यां परया लक्षया देवराजो यथा दिवम्॥१९॥

भावार्थ :-
(कुशनाभके यहाँ जब कन्याओंके विवाहका विचार चल रहा था) उस समय राजा ब्रह्मदत्त उत्तम लक्ष्मीसे सम्पन्न हो ‘काम्पिल्या’ नामक नगरी में उसी तरह निवास करते थे, जैसे स्वर्ग की अमरावतीपुरी में देवराज इन्द्र॥१९॥

श्लोक:
स बुद्धिं कृतवान् राजा कुशनाभः सुधार्मिकः।
ब्रह्मदत्ताय काकुत्स्थ दातुं कन्याशतं तदा॥२०॥

भावार्थ :-
ककुत्स्थकुलभूषण श्रीराम! तब परम धर्मात्मा राजा कुशनाभ ने ब्रह्मदत्त के साथ अपनी सौ कन्याओं को ब्याह देनेका निश्चय किया॥२०॥

श्लोक:
तमाहय महातेजा ब्रह्मदत्तं महीपतिः।
ददौ कन्याशतं राजा सुप्रीतेनान्तरात्मना॥२१॥

भावार्थ :-
महातेजस्वी भूपाल राजा कुशनाभ ने ब्रह्मदत्त को बुलाकर अत्यन्त प्रसन्न चित्त से उन्हें अपनी सौ कन्याएँ सौंप दीं॥२१॥

श्लोक:
यथाक्रमं तदा पाणिं जग्राह रघुनन्दन।
ब्रह्मदत्तो महीपालस्तासां देवपतिर्यथा॥२२॥

भावार्थ :-
रघुनन्दन! उस समय देवराज इन्द्र के समान तेजस्वी पृथ्वीपति ब्रह्मदत्त ने क्रमशः उन सभी कन्याओं का पाणिग्रहण किया॥२२॥

श्लोक:
स्पृष्टमात्रे तदा पाणौ विकुब्जा विगतज्वराः।
युक्तं परमया लक्ष्म्या बभौ कन्याशतं तदा॥२३॥

भावार्थ :-
विवाहकाल में उन कन्याओं के हाथों का ब्रह्मदत्त के हाथ से स्पर्श होते ही वे सब-की-सब कन्याएँ कुब्जत्वदोष से रहित, नीरोग तथा उत्तम शोभा से सम्पन्न प्रतीत होने लगीं॥२३॥

श्लोक:
स दृष्ट्वा वायुना मुक्ताः कुशनाभो महीपतिः।
बभूव परमप्रीतो हर्षं लेभे पुनः पुनः॥२४॥

भावार्थ :-
वातरोग के रूपमें आये हुए वायुदेव ने उन कन्याओं को छोड़ दिया- यह देख पृथ्वीपति राजा कुशनाभ बड़े प्रसन्न हुए और बारम्बार हर्ष का अनुभव करने लगे॥२४॥

श्लोक:
कृतोद्वाहं तु राजानं ब्रह्मदत्तं महीपतिम्।
सदारं प्रेषयामास सोपाध्यायगणं तदा॥२५॥

भावार्थ :-
भूपाल राजा ब्रह्मदत्त का विवाह-कार्य सम्पन्न हो जाने पर महाराज कुशनाभ ने उन्हें पत्नियों तथा पुरोहितों सहित आदरपूर्वक विदा किया॥२५॥

श्लोक:
सोमदापि सुतं दृष्ट्वा पुत्रस्य सदृशीं क्रियाम्।
यथान्यायं च गन्धर्वी स्नुषास्ताः प्रत्यनन्दत।
स्पृष्ट्वा स्पृष्ट्वा च ताः कन्याः कुशनाभं प्रशस्य च॥२६॥

भावार्थ :-
गन्धर्वी सोमदाने अपने पुत्र को तथा उसके योग्य विवाह-सम्बन्ध को देखकर अपनी उन पुत्रवधुओं का यथोचितरूप से अभिनन्दन किया। उसने एक-एक करके उन सभी राजकन्याओं को हृदयसे लगाया और महाराज कुशनाभ की सराहना करके वहाँ से प्रस्थान किया॥२६॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे त्रयस्त्रिंशः सर्गः॥३३॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में तैंतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥३३॥

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