वाल्मीकि रामायण- अयोध्याकाण्ड सर्ग- १६-३०

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॥ श्री गणेशाय नमः ॥
॥ श्री कमलापति नम: ॥
॥ श्री जानकीवल्लभो विजयते ॥
॥ श्री वाल्मीकि रामायण ॥
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वाल्मीकि रामायण
(भावार्थ सहित)
सब एक ही स्थान पर

अयोध्याकाण्ड सर्ग- १६-३०

वाल्मीकि रामायण- अयोध्याकाण्ड सर्ग- १६

अयोध्याकाण्डम्
षोडशः सर्गः (सर्ग 16)

( सुमन्त्र का श्रीराम को महाराज का संदेश सुनाना,श्रीराम का मार्ग में स्त्री पुरुषों की बातें सुनते हुए जाना )

श्लोक:
स तदन्तःपुरद्वारं समतीत्य जनाकुलम्।
प्रविविक्तां ततः कक्ष्यामाससाद पुराणवित्॥१॥

भावार्थ :-
पुरातन वृत्तान्तों के ज्ञाता सूत सुमन्त्र मनुष्यों की भीड़ से भरे हुए उस अन्तःपुर के द्वार को लाँघकर महल की एकान्त कक्षा में जा पहुँचे, जहाँ भीड़ बिलकुल नहीं थी॥१॥

श्लोक:
प्रासकार्मुकबिभ्रद्भिर्युवभिम॒ष्टकुण्डलैः।
अप्रमादिभिरेकाग्रैः स्वानुरक्तैरधिष्ठिताम्॥२॥

भावार्थ :-
वहाँ श्रीराम के चरणों में अनुराग रखने वाले एकाग्रचित्त एवं सावधान युवक प्रास और धनुष आदि लिये डटे हुए थे। उनके कानों में शुद्ध सुवर्ण के बने हुए कुण्डल झलमला रहे थे॥२॥

श्लोक:
तत्र काषायिणो वृद्धान् वेत्रपाणीन् स्वलंकृतान्।
ददर्श विष्ठितान् द्वारि स्त्र्यध्यक्षान् सुसमाहितान्॥३॥

भावार्थ :-
उस ड्योढ़ी में सुमन्त्र को गेरुआ वस्त्र पहने और हाथ में छड़ी लिये वस्त्राभूषणों से अलंकृत बहुत-से वृद्ध पुरुष बड़ी सावधानी के साथ द्वार पर बैठे दिखायी दिये, जो अन्तःपुर की स्त्रियों के अध्यक्ष (संरक्षक) थे॥३॥

श्लोक:
ते समीक्ष्य समायान्तं रामप्रियचिकीर्षवः।
सहसोत्पतिताः सर्वे ह्यासनेभ्यः ससम्भ्रमाः॥४॥

भावार्थ :-
सुमन्त्र को आते देख श्रीराम का प्रिय करने की इच्छा वाले वे सभी पुरुष सहसा वेगपूर्वक आसनों से उठकर खड़े हो गये॥४॥

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वाल्मीकि रामायण- अयोध्याकाण्ड सर्ग- १७

अयोध्याकाण्डम्
सप्तदशः सर्गः (सर्ग 17)

( श्रीराम का राजपथ की शोभा देखते और सुहृदों की बातें सुनते हुए पिता के भवन में प्रवेश )

श्लोक:
स रामो रथमास्थाय सम्प्रहृष्टसुहृज्जनः।
पताकाध्वजसम्पन्नं महागुरुधूपितम्॥१॥
अपश्यन्नगरं श्रीमान् नानाजनसमन्वितम्।
स गृहैरभ्रसंकाशैः पाण्डुरैरुपशोभितम्॥२॥
राजमार्ग ययौ रामो मध्येनागुरुधूपितम्।

भावार्थ :-
इस प्रकार श्रीमान् रामचन्द्रजी अपने सुहृदों को आनन्द प्रदान करते हुए रथ पर बैठे राजमार्ग के बीच से चले जा रहे थे; उन्होंने देखा-सारा नगर ध्वजा और पताकाओं से सुशोभित हो रहा है, चारों ओर बहुमूल्य अगुरु नामक धूप की सुगन्ध छा रही है और सब ओर असंख्य मनुष्यों की भीड़ दिखायी देती है। वह राजमार्ग श्वेत बादलों के समान उज्ज्वल भव्य भवनों से सुशोभित तथा अगुरु की सुगन्ध से व्याप्त हो रहा था॥१-२ १/२॥

श्लोक:
चन्दनानां च मुख्यानामगुरूणां च संचयैः॥३॥
उत्तमानां च गन्धानां क्षौमकौशाम्बरस्य च।
अविद्धाभिश्च मुक्ताभिरुत्तमैः स्फाटिकैरपि॥४॥
शोभमानमसम्बाधं तं राजपथमुत्तमम्।
संवृतं विविधैः पुष्पैर्भक्ष्यैरुच्चावचैरपि॥५॥
ददर्श तं राजपथं दिवि देवपतिर्यथा।
दध्यक्षतहविर्लाजैबूंपैरगुरुचन्दनैः॥६॥
नानामाल्योपगन्धैश्च सदाभ्यर्चितचत्वरम्।

भावार्थ :-
अच्छी श्रेणी के चन्दनों, अगुरु नामक धूपों, उत्तम गन्धद्रव्यों, अलसी या सन आदि के रेशों से बने हुए कपड़ों तथा रेशमी वस्त्रों के ढेर, अनबिंधे मोती और उत्तमोत्तम स्फटिक रत्न उस विस्तृत एवं उत्तम राजमार्ग की शोभा बढ़ा रहे थे। वह नाना प्रकार के पुष्पों तथा भाँति-भाँति के भक्ष्य पदार्थों से भरा हुआ था। उसके चौराहों की दही, अक्षत, हविष्य, लावा, धूप, अगर, चन्दन, नाना प्रकार के पुष्पहार और गन्धद्रव्यों से सदा पूजा की जाती थी। स्वर्गलोक में बैठे हुए देवराज इन्द्र की भाँति रथारूढ़ श्रीराम ने उस राजमार्ग को देखा॥३–६ १/२॥

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वाल्मीकि रामायण- अयोध्याकाण्ड सर्ग- १८

अयोध्याकाण्डम्
अष्टादशः सर्गः (सर्ग 18)

( श्रीराम का कैकेयी से पिता के चिन्तित होने का कारण पूछना,कैकेयी का कठोरतापूर्वक अपने माँगे हुए वरों का वृत्तान्त बताना )

श्लोक:
स ददर्शासने रामो विषण्णं पितरं शुभे
कैकेय्या सहितं दीनं मुखेन परिशुष्यता॥१॥

भावार्थ :-
महल में जाकर श्रीराम ने पिता को कैकेयी के साथ एक सुन्दर आसन पर बैठे देखा। वे विषाद में डूबे हुए थे, उनका मुँह सूख गया था और वे बड़े दयनीय दिखायी देते थे॥१॥

श्लोक:
स पितुश्चरणौ पूर्वमभिवाद्य विनीतवत
ततो ववन्दे चरणौ कैकेय्याः सुसमाहितः॥२॥

भावार्थ :-
निकट पहुँचने पर श्रीराम ने विनीत भाव से पहले अपने पिता के चरणों में प्रणाम किया; उसके बाद बड़ी सावधानी के साथ उन्होंने कैकेयी के चरणों में भी मस्तक झुकाया॥२॥

श्लोक:
रामेत्युक्त्वा तु वचनं बाष्पपर्याकुलेक्षणः
शशाक नृपतिर्दीनो नेक्षितुं नाभिभाषितुम्॥३॥

भावार्थ :-
उस समय दीनदशा में पड़े हुए राजा दशरथ एक बार ‘राम!’ ऐसा कहकर चुप हो गये (इससे आगे उनसे बोला नहीं गया)। उनके नेत्रों में आँसू भर आये, अतः वे श्रीराम की ओर न तो देख सके और न उनसे कोई बात ही कर सके॥३॥

श्लोक:
तदपूर्वं नरपतेर्दृष्ट्वा रूपं भयावहम्
रामोऽपि भयमापन्नः पदा स्पृष्ट्वेव पन्नगम्॥४॥

भावार्थ :-
राजा का वह अभूतपूर्व भयंकर रूप देखकर श्रीराम को भी भय हो गया, मानो उन्होंने पैर से किसी सर्प को छू दिया हो॥४॥

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वाल्मीकि रामायण- अयोध्याकाण्ड सर्ग- १९

अयोध्याकाण्डम्
एकोनविंशः सर्गः (सर्ग 19)

( श्रीराम का वन में जाना स्वीकार करके उनका माता कौसल्या के पास आज्ञा लेने के लिये जाना )

श्लोक:
तदप्रियममित्रघ्नो वचनं मरणोपमम।
श्रुत्वा न विव्यथे रामः कैकेयीं चेदमब्रवीत्॥१॥

भावार्थ :-
वह अप्रिय तथा मृत्यु के समान कष्टदायक वचन सुनकर भी शत्रुसूदन श्रीराम व्यथित नहीं हुए उन्होंने कैकेयी से इस प्रकार कहा-॥१॥

श्लोक:
एवमस्तु गमिष्यामि वनं वस्तुमहं त्वितः।
जटाचीरधरो राज्ञः प्रतिज्ञामनुपालयन्॥२॥

भावार्थ :-
‘मा! बहुत अच्छा! ऐसा ही हो। मैं महाराज की प्रतिज्ञा का पालन करने के लिये जटा और चीर धारण करके वन में रहने के निमित्त अवश्य यहाँ से चला जाऊँगा॥२॥

श्लोक:
इदं तु ज्ञातुमिच्छामि किमर्थं मां महीपतिः।
नाभिनन्दति दर्धर्षो यथापूर्वमरिंदमः॥३॥

भावार्थ :-
‘परंतु मैं यह जानना चाहता हूँ कि आज दुर्जय तथा शत्रुओं का दमन करने वाले महाराज मुझसे पहले की तरह प्रसन्नतापूर्वक बोलते क्यों नहीं हैं?॥३॥

श्लोक:
मन्युर्न च त्वया कार्यो देवि ब्रूमि तवाग्रतः।
यास्यामि भव सुप्रीता वनं चीरजटाधरः॥४॥

भावार्थ :-
‘देवि! मैं तुम्हारे सामने ऐसी बात पूछ रहा हूँ, इसलिये तुम्हें क्रोध नहीं करना चाहिये। निश्चय चीर और जटा धारण करके मैं वन को चला जाऊँगा, तुम प्रसन्न रहो॥४॥

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वाल्मीकि रामायण- अयोध्याकाण्ड सर्ग- २०

अयोध्याकाण्डम्
विंशः सर्गः (सर्ग 20)

( राजा दशरथ की अन्य रानियों का विलाप, श्रीराम का कौसल्याजी को अपने वनवास की बात बताना )

श्लोक:
तस्मिंस्तु पुरुषव्याघ्र निष्क्रामति कृताञ्जलौ।
आर्तशब्दो महान् जज्ञे स्त्रीणामन्तःपुरे तदा॥१॥

भावार्थ :-
उधर पुरुष सिंह श्रीराम हाथ जोड़े हुए ज्यों ही कैकेयी के महल से बाहर निकलने लगे, त्यों ही अन्तःपुर में रहने वाली राजमहिलाओं का महान् आर्तनाद प्रकट हुआ॥१॥

श्लोक:
कृत्येष्वचोदितः पित्रा सर्वस्यान्तःपुरस्य च।
गतिश्च शरणं चासीत् स रामोऽद्य प्रवत्स्यति॥२॥

भावार्थ :-
वे कह रही थीं- ’हाय! जो पिता के आज्ञा न देने पर भी समस्त अन्तःपुर के आवश्यक कार्यों में स्वतः संलग्न रहते थे, जो हमलोगों के सहारे और रक्षक थे, वे श्रीराम आज वन को चले जायेंगे॥२॥

श्लोक:
कौसल्यायां यथा युक्तो जनन्यां वर्तते सदा।
तथैव वर्ततेऽस्मासु जन्मप्रभृति राघवः॥३॥

भावार्थ :-
‘वे रघुनाथजी जन्मसे ही अपनी माता कौसल्याके प्रति सदा जैसा बर्ताव करते थे, वैसा ही हमारे साथ भी करते थे॥३॥

श्लोक:
न क्रुध्यत्यभिशप्तोऽपि क्रोधनीयानि वर्जयन्।
क्रुद्धान् प्रसादयन् सर्वान् स इतोऽद्य प्रवत्स्यति॥४॥

भावार्थ :-
‘जो कठोर बात कह देने पर भी कुपित नहीं होते थे, दूसरों के मन में क्रोध उत्पन्न करने वाली बातें नहीं बोलते थे तथा जो सभी रूठे हुए व्यक्तियों को मना लिया करते थे, वे ही श्रीराम आज यहाँ से वन को चले जायँगे॥४॥

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वाल्मीकि रामायण- अयोध्याकाण्ड सर्ग- २१

अयोध्याकाण्डम्
एकविंशः सर्गः (सर्ग 21)

( लक्ष्मण का श्रीराम को बलपूर्वक राज्य पर अधिकार कर लेने के लिये प्रेरित करना तथा श्रीराम का पिता की आज्ञा के पालन को ही धर्म बताना )

श्लोक:
तथा त विलपन्तीं तां कौसल्यां राममातरम्।
उवाच लक्ष्मणो दीनस्तत्कालसदृशं वचः॥१॥

भावार्थ :-
इस प्रकार विलाप करती हुई श्रीराम माता कौसल्या से अत्यन्त दुःखी हुए लक्ष्मण ने उस समय के योग्य बात कही-॥१॥

श्लोक:
न रोचते ममाप्येतदार्ये यद् राघवो वनम्।
त्यक्त्वा राज्यश्रियं गच्छेत् स्त्रिया वाक्यवशंगतः॥२॥
विपरीतश्च वृद्धश्च विषयैश्च प्रधर्षितः।
नृपः किमिव न ब्रूयाच्चोद्यमानः समन्मथः॥३॥

भावार्थ :-
‘बड़ी माँ! मुझे भी यह अच्छा नहीं लगता कि श्रीराम राज्यलक्ष्मी का परित्याग करके वन में जायँ। महाराज तो इस समय स्त्री की बात में आ गये हैं, इसलिये उनकी प्रकृति विपरीत हो गयी है। एक तो वे बूढ़े हैं, दूसरे विषयों ने उन्हें वश में कर लिया है; अतः कामदेव के वशीभूत हुए वे नरेश कैकेयी-जैसी स्त्री की प्रेरणा से क्या नहीं कह सकते हैं?॥२-३॥

श्लोक:
नास्यापराधं पश्यामि नापि दोषं तथाविधम्।
येन निर्वास्यते राष्ट्राद् वनवासाय राघवः॥४॥

भावार्थ :-
‘मैं श्रीरघुनाथजी का ऐसा कोई अपराध या दोष नहीं देखता, जिससे इन्हें राज्य से निकाला जाय और वन में रहने के लिये विवश किया जाय॥४॥

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वाल्मीकि रामायण- अयोध्याकाण्ड सर्ग- २२

अयोध्याकाण्डम्
द्वाविंशः सर्गः (सर्ग 22)

( श्रीराम का लक्ष्मण को समझाते हुए अपने वनवास में दैव को ही कारण बताना और अभिषेक की सामग्री को हटा लेने का आदेश देना )

श्लोक:
अथ तं व्यथया दीनं सविशेषममर्षितम्।
सरोषमिव नागेन्द्रं रोषविस्फारितेक्षणम्॥१॥
आसाद्य रामः सौमित्रिं सुहृदं भ्रातरं प्रियम्।
उवाचेदं स धैर्येण धारयन् सत्त्वमात्मवान्॥२॥

भावार्थ :-
(श्रीराम के राज्याभिषेक में विघ्न पड़ने के कारण) सुमित्राकुमार लक्ष्मण मानसिक व्यथा से बहुत दुःखी थे। उनके मन में विशेष अमर्ष भरा हुआ था। वे रोष से भरे हए गजराज की भाँति क्रोध से आँखें फाड़फाड़कर देख रहे थे। अपने मन को वश में रखने वाले श्रीराम धैर्यपूर्वक चित्त को निर्विकाररूप से काबू में रखते हुए अपने हितैषी सुहृद् प्रिय भाई लक्ष्मण के पास जाकर इस प्रकार बोले-॥१-२॥

श्लोक:
निगृह्य रोषं शोकं च धैर्यमाश्रित्य केवलम्।
अवमानं निरस्यैनं गृहीत्वा हर्षमुत्तमम्॥३॥
उपक्लुप्तं यदैतन्मे अभिषेकार्थमुत्तमम्।
सर्वं निवर्तय क्षिप्रं कुरु कार्यं निरव्ययम्॥४॥

भावार्थ :-
‘लक्ष्मण! केवल धैर्य का आश्रय लेकर अपने मन के क्रोध और शोक को दूर करो, चित्त से अपमान की भावना निकाल दो और हृदय में भलीभाँति हर्ष भरकर मेरे अभिषेक के लिये यह जो उत्तम सामग्री एकत्र की गयी है, इसे शीघ्र हटा दो और ऐसा कार्य करो, जिससे मेरे वनगमन में बाधा उपस्थित न हो॥३-४॥

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वाल्मीकि रामायण- अयोध्याकाण्ड सर्ग- २३

अयोध्याकाण्डम्
त्रयोविंशः सर्गः (सर्ग 23)

( लक्ष्मण की ओज भरी बातें, उनके द्वारा दैव का खण्डन और पुरुषार्थ का प्रतिपादन )

श्लोक:
इति ब्रुवति रामे तु लक्ष्मणोऽवाक् शिरा इव।
ध्यात्वा मध्यं जगामाशु सहसा दैन्यहर्षयोः॥१॥

भावार्थ :-
श्रीरामचन्द्रजी जब इस प्रकार कह रहे थे, उस समय लक्ष्मण सिर झुकाये कुछ सोचते रहे; फिर सहसा शीघ्रतापूर्वक वे दुःख और हर्ष के बीच की स्थिति में आ गये (श्रीराम के राज्याभिषेक में विघ्न पड़ने के कारण उन्हें दुःख हुआ और उनकी धर्म में दृढ़ता देखकर प्रसन्नता हुई)॥१॥

श्लोक:
तदा तु बद्ध्वा भ्रुकुटी ध्रुवोर्मध्ये नरर्षभः।
निशश्वास महासर्पो बिलस्थ इव रोषितः॥२॥

भावार्थ :-
नरश्रेष्ठ लक्ष्मण ने उस समय ललाट में भौंहों को चढ़ाकर लंबी साँस खींचना आरम्भ किया, मानो बिल में बैठा हुआ महान् सर्प रोष में भरकर फुकार मार रहा हो॥२॥

श्लोक:
तस्य दुष्प्रतिवीक्ष्यं तद् भृकुटीसहितं तदा।
बभौ क्रुद्धस्य सिंहस्य मुखस्य सदृशं मुखम्॥३॥

भावार्थ :-
तनी हुई भौंहों के साथ उस समय उनका मुख कुपित हुए सिंह के मुख के समान जान पड़ता था, उसकी ओर देखना कठिन हो रहा था॥३॥

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वाल्मीकि रामायण- अयोध्याकाण्ड सर्ग- २४

अयोध्याकाण्डम्
चतुर्विंशः सर्गः (सर्ग 24)

( कौसल्या का श्रीराम से अपने को भी साथ ले चलने के लिये आग्रह करना, श्रीराम का उन्हें रोकना और वन जाने के लिये उनकी अनुमति प्राप्त करना )

श्लोक:
तं समीक्ष्य व्यवसितं पितुर्निर्देशपालने।
कौसल्या बाष्पसंरुद्धा वचो धर्मिष्ठमब्रवीत्॥१॥

भावार्थ :-
कौसल्या ने जब देखा कि श्रीराम ने पिता की आज्ञा के पालन का ही दृढ़ निश्चय कर लिया है, तब वे आँसुओं से सैंधी हुई गद्गद वाणी में धर्मात्मा श्रीराम से इस प्रकार बोलीं-॥१॥

श्लोक:
अदृष्टदुःखो धर्मात्मा सर्वभूतप्रियंवदः।
मयि जातो दशरथात् कथमुञ्छेन वर्तयेत्॥२॥

भावार्थ :-
‘हाय! जिसने जीवन में कभी दुःख नहीं देखा है, जो समस्त प्राणियों से सदा प्रिय वचन बोलता है, जिसका जन्म महाराज दशरथ से मेरे द्वारा हुआ है,वह मेरा धर्मात्मा पुत्र उञ्छवृत्ति से-खेत में गिरे हुए अनाज के एक-एक दाने को बीनकर कैसे जीवन निर्वाह कर सकेगा?॥२॥

श्लोक:
यस्य भृत्याश्च दासाश्च मृष्टान्यन्नानि भुञ्जते।
कथं स भोक्ष्यते रामो वने मूलफलान्ययम्॥३॥

भावार्थ :-
‘जिनके भृत्य और दास भी शुद्ध, स्वादिष्ट अन्न खाते हैं, वे ही श्रीराम वन में फल-मूल का आहार कैसे करेंगे?॥३॥

श्लोक:
क एतच्छ्रद्दधेच्छ्रत्वा कस्य वा न भवेद् भयम्।
गुणवान् दयितो राज्ञः काकुत्स्थो यद् विवास्यते॥४॥

भावार्थ :-
‘जो सद्गुणसम्पन्न और महाराज दशरथ के प्रिय हैं, उन्हीं ककुत्स्थ-कुल-भूषण श्रीराम को जो वनवास दिया जा रहा है, इसे सुनकर कौन इस पर विश्वास करेगा? अथवा ऐसी बात सुनकर किसको भय नहीं होगा?॥४॥

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वाल्मीकि रामायण- अयोध्याकाण्ड सर्ग- २५

अयोध्याकाण्डम्
पञ्चविंशः सर्गः (सर्ग 25)

( कौसल्या का श्रीराम की वनयात्रा के लिये मङ्गलकामनापूर्वक स्वस्तिवाचन करना और श्रीराम का उन्हें प्रणाम करके सीता के भवन की ओर जाना )

श्लोक:
सा विनीय तमायासमुपस्पृश्य जलं शुचि।
चकार माता रामस्य मङ्गलानि मनस्विनी॥१॥

भावार्थ :-
तदनन्तर उस क्लेशजनक शोक को मन से निकालकर श्रीराम की मनस्विनी माता कौसल्या ने पवित्र जल से आचमन किया, फिर वे यात्राकालिक मङ्गलकृत्यों का अनुष्ठान करने लगीं॥१॥

श्लोक:
न शक्यसे वारयितुं गच्छेदानीं रघूत्तम।
शीघ्रं च विनिवर्तस्व वर्तस्व च सतां क्रमे॥२॥

भावार्थ :-
(इसके बाद वे आशीर्वाद देती हुई बोलीं-) ‘रघुकुलभूषण! अब मैं तुम्हें रोक नहीं सकती, इस समय जाओ, सत्पुरुषों के मार्ग पर स्थिर रहो और शीघ्र ही वन से लौट आओ॥२॥

श्लोक:
यं पालयसि धर्मं त्वं प्रीत्या च नियमेन च।
स वै राघवशार्दूल धर्मस्त्वामभिरक्षतु॥३॥

भावार्थ :-
‘रघुकुलसिंह! तुम नियमपूर्वक प्रसन्नता के साथ जिस धर्म का पालन करते हो, वही सब ओर से तुम्हारी रक्षा करे॥३॥

श्लोक:
येभ्यः प्रणमसे पुत्र देवेष्वायतनेषु च।
ते च त्वामभिरक्षन्तु वने सह महर्षिभिः॥४॥

भावार्थ :-
‘बेटा! देवस्थानों और मन्दिरों में जाकर तुम जिनको प्रणाम करते हो, वे सब देवता महर्षियों के साथ वन में तुम्हारी रक्षा करें॥४॥

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वाल्मीकि रामायण- अयोध्याकाण्ड सर्ग- २६

अयोध्याकाण्डम्
षड्विंशः सर्गः (सर्ग 26)

( श्रीराम को उदास देखकर सीता का उनसे इसका कारण पूछना और श्रीराम का वन में जाने का निश्चय बताते हुए सीता को घर में रहने के लिये समझाना )

श्लोक:
अभिवाद्य तु कौसल्यां रामः सम्प्रस्थितो वनम्।
कृतस्वस्त्ययनो मात्रा धर्मिष्ठे वर्त्मनि स्थितः॥१॥

भावार्थ :-
धर्मिष्ठ मार्ग पर स्थित हुए श्रीराम माता द्वारा स्वस्तिवाचन-कर्म सम्पन्न हो जाने पर कौसल्या को प्रणाम करके वहाँ से वन के लिये प्रस्थित हुए॥१॥

श्लोक:
विराजयन् राजसुतो राजमार्ग नरैर्वृतम्।
हृदयान्याममन्थेव जनस्य गुणवत्तया॥२॥

भावार्थ :-
उस समय मनुष्यों की भीड़ से भरे हुए राजमार्ग को प्रकाशित करते हुए राजकुमार श्रीराम अपने सद्गुणों के कारण लोगों के मन को मथने-से लगे (ऐसे गुणवान् श्रीराम को वनवास दिया जा रहा है, यह सोचकर वहाँ के लोगों का जी कचोटने लगा)॥२॥

श्लोक:
वैदेही चापि तत् सर्वं न शुश्राव तपस्विनी।
तदेव हृदि तस्याश्च यौवराज्याभिषेचनम्॥३॥

भावार्थ :-
तपस्विनी विदेहनन्दिनी सीता ने अभी तक वह सारा हाल नहीं सुना था। उनके हृदय में यही बात समायी हुई थी कि मेरे पति का युवराज पद पर अभिषेक हो रहा होगा॥३॥

श्लोक:
देवकार्यं स्म सा कृत्वा कृतज्ञा हृष्टचेतना।
अभिज्ञा राजधर्माणां राजपुत्री प्रतीक्षति॥४॥

भावार्थ :-
विदेहराजकुमारी सीता सामयिक कर्तव्यों तथा राजधर्मो को जानती थीं, अतः देवताओं की पूजा करके प्रसन्नचित्त से श्रीराम के आगमन की प्रतीक्षा कर रही थीं॥४॥

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वाल्मीकि रामायण- अयोध्याकाण्ड सर्ग- २७

अयोध्याकाण्डम्
सप्तविंशः सर्गः (सर्ग 27)

( सीता की श्रीराम से अपने को भी साथ ले चलने के लिये प्रार्थना )

श्लोक:
एवमुक्ता तु वैदेही प्रियाय प्रियवादिनी।
प्रणयादेव संक्रुद्धा भर्तारमिदमब्रवीत्॥१॥

भावार्थ :-
श्रीराम के ऐसा कहने पर प्रियवादिनी विदेहकुमारी सीताजी, जो सब प्रकार से अपने स्वामी का प्यार पाने योग्य थीं, प्रेम से ही कुछ कुपित होकर पति से इस प्रकार बोलीं-॥१॥

श्लोक:
किमिदं भाषसे राम वाक्यं लघुतया ध्रुवम्।
त्वया यदपहास्यं मे श्रुत्वा नरवरोत्तम॥२॥

भावार्थ :-
‘नरश्रेष्ठ श्रीराम! आप मुझे ओछी समझकर यह क्या कह रहे हैं? आपकी ये बातें सुनकर मुझे बहुत हँसी आती है॥२॥

श्लोक:
वीराणां राजपुत्राणां शस्त्रास्त्रविदुषां नृप।
अनर्हमयशस्यं च न श्रोतव्यं त्वयेरितम्॥३॥

भावार्थ :-
‘नरेश्वर! आपने जो कुछ कहा है, वह अस्त्रशस्त्रों के ज्ञाता वीर राजकुमारों के योग्य नहीं है। वह अपयश का टीका लगानेवाला होने के कारण सुनने योग्य भी नहीं है॥३॥

श्लोक:
आर्यपुत्र पिता माता भ्राता पुत्रस्तथा स्नुषा।
स्वानि पुण्यानि भुञ्जानाः स्वं स्वं भाग्यमुपासते॥४॥

भावार्थ :-
‘आर्यपुत्र! पिता, माता, भाई, पुत्र और पुत्रवधू-ये सब पुण्यादि कर्मों का फल भोगते हुए अपने-अपने भाग्य (शुभाशुभ कर्म) के अनुसार जीवन-निर्वाह करते हैं॥४॥

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वाल्मीकि रामायण- अयोध्याकाण्ड सर्ग- २८

अयोध्याकाण्डम्
अष्टाविंशः सर्गः (सर्ग 28)

( श्रीराम का वनवास के कष्ट का वर्णन करते हुए सीता को वहाँ चलने से मना करना )

श्लोक:
स एवं ब्रुवतीं सीतां धर्मज्ञां धर्मवत्सलः।
न नेतुं कुरुते बुद्धिं वने दुःखानि चिन्तयन्॥१॥

भावार्थ :-
धर्म को जानने वाली सीता के इस प्रकार कहने पर भी धर्मवत्सल श्रीराम ने वन में होने वाले दुःखों को सोचकर उन्हें साथ ले जाने का विचार नहीं किया॥१॥

श्लोक:
सान्त्वयित्वा ततस्तां तु बाष्पदूषितलोचनाम्।
निवर्तनार्थे धर्मात्मा वाक्यमेतदुवाच ह॥२॥

भावार्थ :-
सीता के नेत्रों में आँसू भरे हुए थे। धर्मात्मा श्रीराम उन्हें वनवास के विचार से निवृत्त करने के लिये सान्त्वना देते हुए इस प्रकार बोले-॥२॥

श्लोक:
सीते महाकुलीनासि धर्मे च निरता सदा।
इहाचरस्व धर्मं त्वं यथा मे मनसः सुखम्॥३॥

भावार्थ :-
‘सीते! तुम अत्यन्त उत्तम कुल में उत्पन्न हुई हो और सदा धर्म के आचरण में ही लगी रहती हो; अतःयहीं रहकर धर्म का पालन करो, जिससे मेरे मन को संतोष हो॥३॥

श्लोक:
सीते यथा त्वां वक्ष्यामि तथा कार्यं त्वयाबले।
वने दोषा हि बहवो वसतस्तान् निबोध मे॥४॥

भावार्थ :-
‘सीते! मैं तुमसे जैसा कहूँ, वैसा ही करना तुम्हारा कर्तव्य है। तुम अबला हो, वन में निवास करने वाले मनुष्य को बहुत-से दोष प्राप्त होते हैं; उन्हें बता रहा हूँ, मुझसे सुनो॥४॥

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वाल्मीकि रामायण- अयोध्याकाण्ड सर्ग- २९

अयोध्याकाण्डम्
एकोनत्रिंशः सर्गः (सर्ग 29)

( सीता का श्रीराम के समक्ष उनके साथ अपने वनगमन का औचित्य बताना )

श्लोक:
एतत् तु वचनं श्रुत्वा सीता रामस्य दुःखिता।
प्रसक्ताश्रुमुखी मन्दमिदं वचनमब्रवीत्॥१॥

भावार्थ :-
श्रीरामचन्द्रजी की यह बात सुनकर सीता को बड़ा दुःख हुआ, उनके मुख पर आँसुओं की धारा बह चली और वे धीरे-धीरे इस प्रकार कहने लगीं-॥१॥

श्लोक:
ये त्वया कीर्तिता दोषा वने वस्तव्यतां प्रति।
गुणानित्येव तान् विद्धि तव स्नेहपुरस्कृता॥२॥

भावार्थ :-
‘प्राणनाथ! आपने वन में रहने के जो-जो दोष बताये हैं, वे सब आपका स्नेह पाकर मेरे लिये गुणरूप हो जायँगे। इस बात को आप अच्छी तरह समझ लें॥२॥

श्लोक:
मृगाः सिंहा गजाश्चैव शार्दूलाः शरभास्तथा।
चमराः सृमराश्चैव ये चान्ये वनचारिणः॥३॥
अदृष्टपूर्वरूपत्वात् सर्वे ते तव राघव।
रूपं दृष्ट्वापसपैयुस्तव सर्वे हि बिभ्यति॥४॥

भावार्थ :-
‘रघुनन्दन! मृग, सिंह, हाथी, शेर, शरभ. चमरी गाय, नीलगाय तथा जो अन्य जंगली जीव हैं, वे सब-के-सब आपका रूप देखकर भाग जायँगे; क्योंकि ऐसा प्रभावशाली स्वरूप उन्होंने पहले कभी नहीं देखा होगा। आपसे तो सभी डरते हैं; फिर वे पशु क्यों नहीं डरेंगे?॥३-४॥

श्लोक:
त्वया च सह गन्तव्यं मया गुरुजनाज्ञया।
त्वद्वियोगेन मे राम त्यक्तव्यमिह जीवितम्॥५॥

भावार्थ :-
‘श्रीराम! मुझे गुरुजनों की आज्ञा से निश्चय ही आपके साथ चलना है; क्योंकि आपका वियोग हो जाने पर मैं यहाँ अपने जीवन का परित्याग कर दूँगी॥५॥

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वाल्मीकि रामायण- अयोध्याकाण्ड सर्ग- ३०

अयोध्याकाण्डम्
त्रिंशः सर्गः (सर्ग 30)

( सीता का वन में चलने के लिये अधिकआग्रह, विलाप और घबराहट देखकर श्रीराम का उन्हें साथ ले चलने की स्वीकृति देना )

श्लोक:
सान्त्व्यमाना तु रामेण मैथिली जनकात्मजा।
वनवासनिमित्तार्थं भर्तारमिदमब्रवीत्॥१॥

भावार्थ :-
श्रीराम के समझाने पर मिथिलेशकुमारी जानकी वनवास की आज्ञा प्राप्त करने के लिये अपने पति से फिर इस प्रकार बोलीं॥१॥

श्लोक:
सा तमुत्तमसंविग्ना सीता विपुलवक्षसम्।
प्रणयाच्चाभिमानाच्च परिचिक्षेप राघवम्॥२॥

भावार्थ :-
सीता अत्यन्त डरी हुई थीं। वे प्रेम और स्वाभिमान के कारण विशाल वक्षःस्थलवाले श्रीरामचन्द्रजी पर आक्षेप-सा करती हुई कहने लगीं – ॥२॥

श्लोक:
किं त्वामन्यत वैदेहः पिता मे मिथिलाधिपः।
राम जामातरं प्राप्य स्त्रियं पुरुषविग्रहम्॥३॥

भावार्थ :-
‘श्रीराम! क्या मेरे पिता मिथिलानरेश विदेहराज जनक ने आपको जामाता के रूप में पाकर कभी यह भी समझा था कि आप केवल शरीर से ही पुरुष हैं; कार्यकलाप से तो स्त्री ही हैं॥३॥

श्लोक:
अनृतं बत लोकोऽयमज्ञानाद् यदि वक्ष्यति।
तेजो नास्ति परं रामे तपतीव दिवाकरे॥४॥

भावार्थ :-
‘नाथ! आपके मुझे छोड़कर चले जानेपर संसारके लोग अज्ञानवश यदि यह कहने लगें कि सूर्यके समान तपनेवाले श्रीरामचन्द्रमें तेज और पराक्रमका अभाव है तो उनकी यह असत्य धारणा मेरे लिये कितने दुःखकी बात होगी॥४॥

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