48 घंटों से अधिक व्रत-उपवास रखने के हानि लाभ
व्रत-उपवास
दोस्तों किसी ने कहा है कि “भूखे भजन न होय गोपाला, लै लो तुम्हरी कंठी माला” अर्थात- भूखे पेट भजन नहीं होता। भूखे पेट भगवान के भजन में ध्यान नहीं लगता। फिर हम तो बात करने जा रहे हैं व्रत-उपवास की, जिसे तो भूखे पेट ही रखा जाता हैं। कुछ व्रत-उपवास तो ऐसे होते हैं जो निराजल रखे जाते हैं।
दोस्तों, भारतीय संस्कृति और संस्कार में सदियों से व्रत-उपवास रखने की परंपरा रही है। हमारे ऋषि, मुनि, साधु और संत सदियों से एक दिन के लिए नियम-संयम से भोजन करने या फिर पूर्ण रूप से उपवास रखने के नियमों का पालन करते आ रहे हैं। उपवास केवल भोजन छोड़ना नहीं है एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है और यह पारंपरिक और आयुर्वेदिक प्रथाओं से गहराई से जुड़ा हुआ है।
वैसे वर्ष भर में कई ऐसे त्यौहार भी आते हैं, जब व्रत-उपवास रखा जाता है। कई लोग व्रत को केवल एक धार्मिक कृत्य मानते हैं, जबकि वैज्ञानिकों ने भी माना है कि व्रत-उपवास रखने से शरीर में कई अनोखे बदलाव देखने को मिलते हैं। व्रत-उपवास एक ऐसी स्थिति है, जब शरीर को लंबे समय तक भोजन नहीं मिलता। जैसे-जैसे यह समय बढ़ता है, शरीर में कई महत्वपूर्ण जैविक और अपरूपांतरण प्रक्रियाएं शुरू हो जाती हैं। 48 घंटे तक व्रत रखने पर शरीर में अलग-अलग चरणों में बदलाव होते हैं, जो ऊर्जा स्रोतों के इस्तेमाल, मांसपेशियों की मरम्मत और हार्मोनल बदलावों से जुड़े होते हैं। आइए आपको बताते हैं कि अगर आप 48 घंटे तक व्रत-उपवास रखते हैं तो आपके शरीर में क्या-क्या बदलाव होते हैं।
धार्मिक दृष्टि से हानि व लाभ:
व्रत-उपवास के लाभ:
- शारीरिक स्वास्थ्य में सुधार
- पाचन तंत्र को आराम मिलता है।
- शरीर से विषाक्त पदार्थ बाहर निकलते हैं।
- वज़न घटाने में सहायक होता है।
- मानसिक स्वास्थ्य को लाभ
- आत्म-नियंत्रण और धैर्य बढ़ता है।
- मानसिक शांति और ध्यान की क्षमता में सुधार।
- तनाव और चिंता में कमी।
- आध्यात्मिक लाभ
- ईश्वर के प्रति आस्था और समर्पण की भावना बढ़ती है।
- आत्म-अनुशासन और संयम की प्रवृत्ति विकसित होती है।
- मन की शुद्धि और सकारात्मक ऊर्जा का संचार।
- सामाजिक और सांस्कृतिक लाभ
- धार्मिक परंपराओं और संस्कृति से जुड़ाव।
- परिवार और समाज में एकता और समर्पण की भावना बढ़ती है।
व्रत-उपवास के हानि:
- शारीरिक कमजोरी
- लंबे समय तक भूखे रहने से कमजोरी, चक्कर आना और थकान महसूस हो सकती है।
- इम्यून सिस्टम कमजोर हो सकता है।
- पाचन संबंधी समस्याएँ
- उपवास के बाद अधिक खाने से पाचन तंत्र पर दबाव बढ़ सकता है।
- गैस, एसिडिटी और अपच जैसी समस्याएँ हो सकती हैं।
- मानसिक थकान
- ऊर्जा की कमी से चिड़चिड़ापन और एकाग्रता में कमी हो सकती है।
- अत्यधिक उपवास से मानसिक तनाव बढ़ सकता है।
- स्वास्थ्य जोखिम
- गर्भवती महिलाओं, मधुमेह, हृदय रोगियों और बुजुर्गों के लिए जोखिम भरा हो सकता है।
- आवश्यक पोषक तत्वों की कमी से स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
वैज्ञानिक दृष्टि से हानि व लाभ:
पहले 6-12 घंटे: ग्लूकोज पर निर्भरता
- व्रत-उपवास प्रारंभ होने के उपरांत पहले कुछ घंटों तक शरीर प्राथमिक ऊर्जा स्रोत ग्लूकोज का उपयोग करता है।
- भोजन पचने के उपरांत ब्लड में शुगर का स्तर धीरे-धीरे कम होना प्रारम्भ होने लगता हैं।
- इस अवधि में हमारा शरीर ग्लाइकोजन नामक संग्रहीत कार्बोहाइड्रेट को तोड़कर ग्लूकोज में परिवर्तित करता है, जो शरीर को ऊर्जा प्रदान करने में सहयोग करता है।
- अग्न्याशय इंसुलिन का उत्पादन कम कर देता है, जिससे शरीर फैट-बर्निंग मोड में आना शुरू करता है।
12-24 घंटे: शरीर में ग्लाइकोजन की कमी एवं फैट बर्निंग शुरू
- लगभग 12 घंटे के उपरांत शरीर के ग्लाइकोजन स्टोर्स खत्म होने लगते हैं।
- हमारा शरीर अब ऊर्जा के लिए फैट ब्रेकडाउन की प्रक्रिया शुरू करता है।
- यह प्रक्रिया केटोसिस की ओर ले जाती है, जिसमें फैट से केटोन बॉडीज़ बनने लगती हैं, जो दिमाग और मांसपेशियों के लिए वैकल्पिक ईंधन का काम करती हैं।
- जिससे आपके शरीर का फैट बर्न होने लगता है और आपका शरीर उसी से ऊर्जा लेने लगता है।
- अब हमारे शरीर में ऑटोफैगी की प्रक्रिया शुरू होती है, जिसमें क्षतिग्रस्त कोशिकाओं और बेकार प्रोटीन को हटाकर नई कोशिकाओं का निर्माण होता है।
24-36 घंटे: ऑटोफैगी बढ़ती है, हॉर्मोनल बदलाव होते हैं
- अब हमारे शरीर में ऑटोफैगी तेज़ हो जाती है, जिससे शरीर पुरानी और क्षतिग्रस्त कोशिकाओं को हटाकर नई कोशिकाओं का निर्माण करने लगता है।
- कई वैज्ञानिकों का तो यहां तक मानना है कि ऑटोफैगी की प्रक्रिया में शरीर के कैंसर फैलाने वाले सेल तक खत्म हो जाते हैं।
- अब हमारे शरीर में ह्यूमन ग्रोथ हॉर्मोन का स्तर 3 से 5 गुना तक बढ़ जाता है, जिससे हमारे शरीर में मांसपेशियों की मरम्मत और चर्बी जलने की प्रक्रिया तेज़ होती है।
- अब हमारे शरीर में एड्रेनालाईन और नॉरएड्रेनालाईन हॉर्मोन का स्तर बढ़ जाता है, जिससे शरीर अधिक फैट बर्न करता है।
- अब हमारा शरीर इंसुलिन सेंसिटिविटी बढ़ा देता है, जिससे भविष्य में ब्लड शुगर नियंत्रित रखने में मदद मिलती है।
36-48 घंटे: गहरे उपवास के प्रभाव
- अब हमारे शरीर में ग्लूकोज का उत्पादन मुख्य रूप से ग्लूकोनियोजेनेसिस से होने लगता है, जिसमें शरीर एमिनो एसिड और लैक्टिक एसिड से ग्लूकोज बनाता है।
- जिससे हमारा शरीर कैलोरी खपत को अधिक कुशलता से नियंत्रित करता है, जिससे मेटाबॉलिक रेट गिरने के बजाय 10-15% तक बढ़ सकता है।
- इससे हमारे शरीर में सूजन कम हो जाती है, जिससे हृदय रोग, कैंसर और न्यूरोडिजेनेरेटिव बीमारियों का खतरा कम हो सकता है।
- अब हमारे शरीर में बॉडी फैट का तेजी से उपयोग होने लगता है, जिससे वजन घटता है।
- इसके प्रभाव से आंतरिक कोशिकीय मरम्मत की प्रक्रिया तेज़ हो जाती है, जिससे पुरानी और कमजोर कोशिकाओं को हटाकर नई कोशिकाओं का विकास होता है।
दुनिया भर में हुए हैं ऑटोफैगी पर रिसर्च
दोस्तों, 48 घंटे का उपवास शरीर में ऑटोफैगी की प्रक्रिया को शुरू कर सकता है। जापानी वैज्ञानिक योशिनोरी ओसुमी को ऑटोफैगी पर अपने शोध के लिए नोबेल पुरस्कार मिला था। उन्होंने दिखाया कि ऑटोफैगी एंटी-एजिंग, एंटी-कैंसर प्रभाव और न्यूरोडीजेनेरेटिव बीमारियों (जैसे अल्जाइमर और पार्किंसंस) की रोकथाम में मददगार हो सकती है। 2019 में किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि 24 घंटे से अधिक समय तक उपवास करने से ऑटोफैगी प्रक्रिया शुरू हो सकती है। वहीं, 2018 में सेल मेटाबॉलिज्म जर्नल में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, 48 घंटे का उपवास स्टेम सेल पुनर्जनन को बढ़ा सकता है, जिससे प्रतिरक्षा प्रणाली मजबूत होती है।
48 घंटे उपवास से ये हो सकते हैं शरीर में फायदे
1. वजन घटाने में मदद: फैट बर्निंग प्रक्रिया तेज़ होती है।
2. इंसुलिन सेंसिटिविटी बढ़ती है: जिससे टाइप 2 डायबिटीज का खतरा कम होता है।
3. ऑटोफैगी से कोशिकीय सफाई: पुरानी और खराब कोशिकाएं हटती हैं।
4. सूजन कम होती है: जिससे गठिया, हृदय रोग और अन्य पुरानी बीमारियों का खतरा कम होता है।
5. मस्तिष्क स्वास्थ्य बेहतर होता है: केटोन बॉडीज़ मस्तिष्क के लिए ऊर्जा स्रोत बनती हैं, जिससे मानसिक स्पष्टता बढ़ती है।
6. पाचन तंत्र को आराम मिलता है: जिससे आंतों की कार्यक्षमता में सुधार होता है।
7. जीवनकाल बढ़ सकता है: चूहों पर किए गए अध्ययनों में उपवास से जीवनकाल लंबा होने के संकेत मिले हैं।
इन लोगों को 48 घंटे का उपवास नहीं करना चाहिए
- – गर्भवती या स्तनपान कराने वाली महिलाओं को।
- – टाइप 1 डायबिटीज या कम रक्त शर्करा से पीड़ित लोगों को।
- – गंभीर हृदय रोगीयों को।
- – बहुत कमजोर या पहले से ही बहुत कम वजन वाले लोगों को।
- – जिन लोगों को उपवास के दौरान चक्कर, थकान, कमजोरी या बेहोशी महसूस होती हो।
निष्कर्ष:
दोस्तों व्रत-उपवास का पालन हमें सावधानी पूर्वक करना चाहिए। यह शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक रूप से लाभकारी हो सकता है, लेकिन स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से बचने के लिए संतुलन बनाए रखना अति आवश्यक है।
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