वाल्मीकि रामायण- अयोध्याकाण्ड सर्ग- ८८
॥ श्री गणेशाय नमः ॥
॥ श्री कमलापति नम: ॥
॥ श्री जानकीवल्लभो विजयते ॥
॥ श्री वाल्मीकि रामायण ॥
वाल्मीकि रामायण
(भावार्थ सहित)
सब एक ही स्थान पर
अयोध्याकाण्ड सर्ग- ८८
अयोध्याकाण्डम्
अष्टाशीतितमः सर्गः (सर्ग 88)
( श्रीराम की कुश-शय्या देखकर भरत का स्वयं भी वल्कल और जटाधारण करके वन में रहने का विचार प्रकट करना )
श्लोक:
तच्छ्रुत्वा निपुणं सर्वं भरतः सह मन्त्रिभिः।
इङ्गदीमूलमागम्य रामशय्यामवैक्षत॥१॥
भावार्थ :-
निषादराज की सारी बातें ध्यान से सुनकर मन्त्रियों सहित भरत ने इंगुदी-वृक्ष की जड़ के पास आकर श्रीरामचन्द्रजी की शय्या का निरीक्षण किया॥१॥
श्लोक:
अब्रवीज्जननीः सर्वा इह तस्य महात्मनः।
शर्वरी शयिता भूमाविदमस्य विमर्दितम्॥२॥
भावार्थ :-
फिर उन्होंने समस्त माताओं से कहा- ’यहीं महात्मा श्रीराम ने भूमि पर शयन करके रात्रि व्यतीत की थी। यही वह कुशसमूह है, जो उनके अङ्गों से विमर्दित हुआ था॥२॥
श्लोक:
महाराजकुलीनेन महाभागेन धीमता।
जातो दशरथेनोवा न रामः स्वप्तमर्हति॥३॥
भावार्थ :-
‘महाराजों के कुल में उत्पन्न हुए परम बुद्धिमान् महाभाग राजा दशरथ ने जिन्हें जन्म दिया है, वे श्रीराम इस तरह भूमि पर शयन करने के योग्य नहीं हैं॥३॥
श्लोक:
अजिनोत्तरसंस्तीर्णे वरास्तरणसंचये।
शयित्वा पुरुषव्याघ्रः कथं शेते महीतले॥४॥
भावार्थ :-
‘जो पुरुषसिंह श्रीराम मुलायम मृगचर्म की विशेष चादर से ढके हुए तथा अच्छे-अच्छे बिछौनों के समूह से सजे हुए पलंग पर सदा सोते आये हैं, वे इस समय पृथ्वी पर कैसे शयन करते होंगे?॥४॥
श्लोक:
प्रासादाग्रविमानेषु वलभीषु च सर्वदा।
हैमराजतभौमेषु वरास्तरणशालिषु॥५॥
पुष्पसंचयचित्रेषु चन्दनागुरुगन्धिषु।
पाण्डुराभ्रप्रकाशेषु शुकसंघरुतेषु च॥६॥
प्रासादवरवर्येषु शीतवत्सु सुगन्धिषु।
उषित्वा मेरुकल्पेषु कृतकाञ्चनभित्तिषु॥७॥
भावार्थ :-
‘जो सदा विमानाकार प्रासादों के श्रेष्ठ भवनों और अट्टालिकाओं में सोते आये हैं तथा जिनकी फर्श सोने और चाँदी की बनी हई है, जो अच्छे बिछौनों से सुशोभित हैं, पुष्पराशि से विभूषित होने के कारण जिनकी विचित्र शोभा होती है, जिनमें चन्दन और अगुरु की सुगन्ध फैली रहती है, जो श्वेत बादलों के समान उज्ज्वल कान्ति धारण करते हैं, जिनमें शुकसमूहों का कलरव होता रहता है, जो शीतल हैं एवं कपूर आदि की सुगन्ध से व्याप्त होते हैं, जिनकी दीवारों पर सुवर्ण का काम किया गया है तथा जो ऊँचाई में मेरु पर्वत के समान जान पड़ते हैं, ऐसे सर्वोत्तम राजमहलों में जो निवास कर चुके हैं, वे श्रीराम वन में पृथ्वी पर कैसे सोते होंगे?॥५–७॥
श्लोक:
गीतवादित्रनिर्घोषैर्वराभरणनिःस्वनैः।
मृदङ्गवरशब्दैश्च सततं प्रतिबोधितः॥८॥
बन्दिभिर्वन्दितः काले बहुभिः सूतमागधैः।
गाथाभिरनुरूपाभिः स्तुतिभिश्च परंतपः॥९॥
भावार्थ :-
‘जो गीतों और वाद्यों की ध्वनियों से, श्रेष्ठ आभूषणों की झनकारों से तथा मृदङ्गों के उत्तम शब्दों से सदा जगाये जाते थे, बहुत से वन्दीगण समय-समय पर जिनकी वन्दना करते थे, सूत और मागध अनुरूप गाथाओं और स्तुतियों से जिनको जगाते थे, वे शत्रुसंतापी श्रीराम अब भूमि पर कैसे शयन करते होंगे?॥८-९॥
श्लोक:
अश्रद्धेयमिदं लोके न सत्यं प्रतिभाति मा।
मुह्यते खलु मे भावः स्वप्नोऽयमिति मे मतिः॥१०॥
भावार्थ :-
‘यह बात जगत् में विश्वास के योग्य नहीं है मुझे यह सत्य नहीं प्रतीत होती। मेरा अन्तःकरण अवश्य ही मोहित हो रहा है। मुझे तो ऐसा मालूम होता है कि यह कोई स्वप्न है॥१०॥
श्लोक:
न नूनं दैवतं किंचित् कालेन बलवत्तरम्।
यत्र दाशरथी रामो भूमावेवमशेत सः॥११॥
भावार्थ :-
‘निश्चय ही काल के समान प्रबल कोई दूसरा देवता नहीं है, जिसके प्रभाव से दशरथनन्दन श्रीराम को भी इस प्रकार भूमि पर सोना पड़ा॥११॥
श्लोक:
यस्मिन् विदेहराजस्य सुता च प्रियदर्शना।
दयिता शयिता भूमौ स्नुषा दशरथस्य च॥१२॥
भावार्थ :-
‘उस काल के ही प्रभाव से विदेहराज की परम सुन्दरी पुत्री और महाराज दशरथ की प्यारी पुत्रवधू सीता भी पृथ्वी पर शयन करती हैं॥१२॥
श्लोक:
इयं शय्या मम भ्रातुरिदमावर्तितं शुभम्।
स्थण्डिले कठिने सर्वं गात्रैर्विमृदितं तृणम्॥१३॥
भावार्थ :-
‘यही मेरे बड़े भाई की शय्या है। यहीं उन्होंने करवटें बदली थीं। इस कठोर वेदी पर उनका शुभ शयन हुआ था, जहाँ उनके अङ्गों से कुचला गया सारा तृण अभी तक पड़ा है॥१३॥
श्लोक:
मन्ये साभरणा सुप्ता सीतास्मिन्शयने शुभा।
तत्र तत्र हि दृश्यन्ते सक्ताः कनकबिन्दवः॥१४॥
भावार्थ :-
‘जान पड़ता है, शुभलक्षणा सीता शय्यापर आभूषण पहने ही सोयी थीं; क्योंकि यहाँ यत्र-तत्र सुवर्ण के कण सटे दिखायी देते हैं॥१४॥
श्लोक:
उत्तरीयमिहासक्तं सुव्यक्तं सीतया तदा।
तथा ह्येते प्रकाशन्ते सक्ताः कौशेयतन्तवः॥१५॥
भावार्थ :-
‘यहाँ उस समय सीता की चादर उलझ गयी थी, यह साफ दिखायी दे रहा है; क्योंकि यहाँ सटे हुए ये रेशम के तागे चमक रहे हैं॥१५॥
श्लोक:
मन्ये भर्तुः सुखा शय्या येन बाला तपस्विनी।
सुकुमारी सती दुःखं न विजानाति मैथिली॥१६॥
भावार्थ :-
‘मैं समझता हूँ कि पति की शय्या कोमल हो या कठोर, साध्वी स्त्रियों के लिये वही सुखदायिनी होती है, तभी तो वह तपस्विनी एवं सुकुमारी बाला सतीसाध्वी मिथिलेशकुमारी सीता यहाँ दुःख का अनुभव नहीं कर रही हैं॥१६॥
श्लोक:
हा हतोऽस्मि नृशंसोऽस्मि यत् सभार्यः कृते मम।
ईदृशीं राघवः शय्यामधिशेते ह्यनाथवत्॥१७॥
भावार्थ :-
‘हाय! मैं मर गया- मेरा जीवन व्यर्थ है। मैं बड़ा क्रूर हूँ, जिसके कारण सीतासहित श्रीराम को अनाथ की भाँति ऐसी शय्या पर सोना पड़ता है॥१७॥
श्लोक:
सार्वभौमकुले जातः सर्वलोकसुखावहः।।
सर्वप्रियकरस्त्यक्त्वा राज्यं प्रियमनुत्तमम्॥१८॥
कथमिन्दीवरश्यामो रक्ताक्षः प्रियदर्शनः।
सुखभागी न दुःखार्हः शयितो भुवि राघवः॥१९॥
भावार्थ :-
‘जो चक्रवर्ती सम्राट् के कुल में उत्पन्न हुए हैं, समस्त लोकों को सुख देने वाले हैं तथा सबका प्रिय करने में तत्पर रहते हैं, जिनका शरीर नीले कमल के समान श्याम, आँखें लाल और दर्शन सबको प्रिय लगने वाला है तथा जो सुख भोगने के ही योग्य हैं, दुःख भोगने के कदापि योग्य नहीं हैं, वे ही श्रीरघुनाथ जी परम उत्तम प्रिय राज्य का परित्याग करके इस समय पृथ्वी पर शयन करते हैं॥१८-१९॥
श्लोक:
धन्यः खलु महाभागो लक्ष्मणः शुभलक्षणः।
भ्रातरं विषमे काले यो राममनुवर्तते॥२०॥
भावार्थ :-
‘उत्तम लक्षणों वाले लक्ष्मण ही धन्य एवं बड़भागी हैं, जो संकट के समय बड़े भाई श्रीराम के साथ रहकर उनकी सेवा करते हैं॥२०॥
श्लोक:
सिद्धार्था खलु वैदेही पतिं यानुगता वनम्।
वयं संशयिताः सर्वे हीनास्तेन महात्मना॥२१॥
भावार्थ :-
‘निश्चय ही विदेहनन्दिनी सीता भी कृतार्थ हो गयीं, जिन्होंने पति के साथ वन का अनुसरण किया है। हम सब लोग उन महात्मा श्रीराम से बिछुड़कर संशय में पड़ गये हैं (हमें यह संदेह होने लगा है कि श्रीराम हमारी सेवा स्वीकार करेंगे या नहीं)॥२१॥
श्लोक:
अकर्णधारा पृथिवी शून्येव प्रतिभाति मे।
गते दशरथे स्वर्गं रामे चारण्यमाश्रिते॥२२॥
भावार्थ :-
‘महाराज दशरथ स्वर्गलोक को गये और श्रीराम वनवासी हो गये, ऐसी दशा में यह पृथ्वी बिना नाविक की नौका के समान मुझे सूनी-सी प्रतीत हो रही है॥२२॥
श्लोक:
न च प्रार्थयते कश्चिन्मनसापि वसुंधराम्।
वने निवसतस्तस्य बाहवीर्याभिरक्षिताम्॥२३॥
भावार्थ :-
‘वन में निवास करने पर भी उन्हीं श्रीराम के बाहुबल से सुरक्षित हुई इस वसुन्धरा को कोई शत्रु मन से भी नहीं लेना चाहता है॥२३॥
श्लोक:
शून्यसंवरणारक्षामयन्त्रितहयद्विपाम्।
अनावृतपुरद्वारां राजधानीमरक्षिताम्॥२४॥
अप्रहृष्टबलां शून्यां विषमस्थामनावृताम्।
शत्रवो नाभिमन्यन्ते भक्ष्यान् विषकृतानिव॥२५॥
भावार्थ :-
‘इस समय अयोध्या की चहारदीवारी की सब ओर से रक्षा का कोई प्रबन्ध नहीं है, हाथी और घोड़े बँधे नहीं रहते हैं- खुले विचरते हैं, नगर द्वार का फाटक खुला ही रहता है, सारी राजधानी अरक्षित है, सेना में हर्ष और उत्साह का अभाव है, समस्त नगरी रक्षकों से सूनी-सी जान पड़ती है, सङ्कट में पड़ी हुई है, रक्षकों के अभाव से आवरणरहित हो गयी है. तो भी शत्रु विषमिश्रित भोजन की भाँति इसे ग्रहण करने की इच्छा नहीं करते हैं। श्रीराम के बाहुबल से ही इसकी रक्षा हो रही है॥२४-२५॥
श्लोक:
अद्यप्रभृति भूमौ तु शयिष्येऽहं तृणेषु वा।
फलमूलाशनो नित्यं जटाचीराणि धारयन्॥२६॥
भावार्थ :-
‘आज से मैं भी पृथ्वी पर अथवा तिनकों पर ही सोऊँगा, फल-मूल का ही भोजन करूँगा और सदा वल्कल वस्त्र तथा जटा धारण किये रहूँगा॥२६॥
श्लोक:
तस्याहमुत्तरं कालं निवत्स्यामि सुखं वने।
तत् प्रतिश्रुतमार्यस्य नैव मिथ्या भविष्यति॥२७॥
भावार्थ :-
‘वनवास के जितने दिन बाकी हैं, उतने दिनों तक मैं ही वहाँ सुखपूर्वक निवास करूँगा, ऐसा होने से आर्य श्रीराम की की हुई प्रतिज्ञा झूठी नहीं होगी॥२७॥
श्लोक:
वसन्तं भ्रातुरर्थाय शत्रुनो मानुवत्स्यति।
लक्ष्मणेन सहायोध्यामार्यो मे पालयिष्यति॥२८॥
भावार्थ :-
‘भाई के लिये वन में निवास करते समय शत्रुघ्न मेरे साथ रहेंगे और मेरे बड़े भाई श्रीराम लक्ष्मण को साथ लेकर अयोध्या का पालन करेंगे॥२८॥
श्लोक:
अभिषेक्ष्यन्ति काकुत्स्थमयोध्यायां द्विजातयः।
अपि मे देवताः कुर्युरिमं सत्यं मनोरथम्॥२९॥
भावार्थ :-
‘अयोध्या में ब्राह्मणलोग ककुत्स्थकुलभूषण श्रीराम का अभिषेक करेंगे। क्या देवता मेरे इस मनोरथ को सत्य (सफल) करेंगे?॥२९॥
श्लोक:
प्रसाद्यमानः शिरसा मया स्वयं बहुप्रकारं यदि न प्रपत्स्यते।
ततोऽनुवत्स्यामि चिराय राघवं वनेचरं नार्हति मामुपेक्षितुम्॥३०॥
भावार्थ :-
‘मैं उनके चरणों पर मस्तक रखकर उन्हें मनाने की चेष्टा करूँगा। यदि मेरे बहुत कहने पर भी वे लौटने को राजी न होंगे तो उन वनवासी श्रीराम के साथ मैं भी दीर्घकाल तक वहीं निवास करूँगा वे मेरी उपेक्षा नहीं करेंगे’॥३०॥
इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डेऽष्टाशीतितमः सर्गः॥८८॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्डमें अट्ठासीवाँ सर्ग पूरा हुआ॥८८॥
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