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वाल्मीकि रामायण- अयोध्याकाण्ड सर्ग- ४९

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॥ श्री गणेशाय नमः ॥
॥ श्री कमलापति नम: ॥
॥ श्री जानकीवल्लभो विजयते ॥
॥ श्री वाल्मीकि रामायण ॥
अयोध्याकाण्ड सर्ग- ४९

वाल्मीकि रामायण
(भावार्थ सहित)
सब एक ही स्थान पर

अयोध्याकाण्ड सर्ग- ४९

अयोध्याकाण्डम्
एकोनपञ्चाशः सर्गः (सर्ग 49)

( ग्रामवासियों की बातें सुनते हुए श्रीराम का कोसल जनपद को लाँघते हुए आगे जाना और वेदश्रुति, गोमती एवं स्यन्दि का नदियों को पार करके सुमन्त्र से कुछ कहना )

श्लोक:
रामोऽपि रात्रिशेषेण तेनैव महदन्तरम्।
जगाम पुरुषव्याघ्रः पितुराज्ञामनुस्मरन्॥१॥

भावार्थ :-
उधर पुरुषसिंह श्रीराम भी पिता की आज्ञा का बारंबार स्मरण करते हुए उस शेष रात्रि में ही बहुत दूर निकल गये॥१॥

श्लोक:
तथैव गच्छतस्तस्य व्यपायाद रजनी शिवा।
उपास्य तु शिवां संध्यां विषयानत्यगाहत॥२॥

भावार्थ :-
उसी तरह चलते-चलते उनकी वह कल्याणमयी रजनी भी व्यतीत हो गयी। सबेरा होने पर मङ्गलमयी संध्योपासना करके वे विभिन्न जनपदों को लाँघते हुए चल दिये॥२॥

श्लोक:
ग्रामान् विकृष्टसीमान्तान् पुष्पितानि वनानि च।
पश्यन्नतिययौ शीघ्रं शनैरिव हयोत्तमैः॥३॥

भावार्थ :-
जिनकी सीमा के पास की भूमि जोत दी गयी थी, उन ग्रामों तथा फूलों से सुशोभित वनों को देखते हुए वे उन उत्तम घोड़ों द्वारा शीघ्रतापूर्वक आगे बढ़े जा रहे थे तथापि सुन्दर दृश्यों के देखने में तन्मय रहने के कारण उन्हें उस रथ की गति धीमी-सी ही जान पड़ती थी॥३॥

श्लोक:
शृण्वन् वाचो मनुष्याणां ग्रामसंवासवासिनाम्।
राजानं धिग् दशरथं कामस्य वशमास्थितम्॥४॥

भावार्थ :-
मार्ग में जो बड़े और छोटे गाँव मिलते थे, उनमें निवास करने वाले मनुष्यों की निम्नाङ्कित बातें उनके कानों में पड़ रही थीं—’अहो! काम के वश में पड़े हुए राजा दशरथ को धिक्कार है॥४॥

श्लोक:
हा नृशंसाद्य कैकेयी पापा पापानुबन्धिनी।
तीक्ष्णा सम्भिन्नमर्यादा तीक्ष्णकर्मणि वर्तते॥५॥

भावार्थ :-
हाय! हाय! पापशीला, पापासक्त, क्रूर तथा धर्ममर्यादा का त्याग करने वाली कैकेयी को तो दया छू भी नहीं गयी है, वह क्रूर अब निष्ठुर कर् ममें ही लगी रहती है॥५॥

श्लोक:
या पुत्रमीदृशं राज्ञः प्रवासयति धार्मिकम।
वनवासे महाप्राज्ञं सानुक्रोशं जितेन्द्रियम्॥६॥

भावार्थ :-
जिसने महाराज के ऐसे धर्मात्मा, महाज्ञानी, दयालु और जितेन्द्रिय पुत्र को वनवास के लिये घर से निकलवा दिया है॥६॥

श्लोक:
कथं नाम महाभागा सीता जनकनन्दिनी।
सदा सुखेष्वभिरता दुःखान्यनुभविष्यति॥७॥

भावार्थ :-
जनकनन्दिनी महाभागा सीता, जो सदा सुखों में ही रत रहती थीं, अब वनवास के दुःख कैसे भोग सकेंगी?

श्लोक:
अहो दशरथो राजा निःस्नेहः स्वसुतं प्रति।
प्रजानामनघं रामं परित्यक्तुमिहेच्छति॥८॥

भावार्थ :-
अहो! क्या राजा दशरथ अपने पुत्र के प्रति इतने स्नेहहीन हो गये, जो प्रजाओं के प्रति कोई अपराध न करने वाले श्रीरामचन्द्रजी का यहाँ परित्याग कर देना चाहते हैं’॥८॥

श्लोक:
एता वाचो मनुष्याणां ग्रामसंवासवासिनाम्।
शृण्वन्नतिययौ वीरः कोसलान् कोसलेश्वरः॥९॥

भावार्थ :-
छोटे-बड़े गाँवों में रहने वाले मनुष्यों की ये बातें सुनते हुए वीर कोसलपति श्रीराम कोसल जनपद की सीमा लाँघकर आगे बढ़ गये॥९॥

श्लोक:
ततो वेदश्रुतिं नाम शिववारिवहां नदीम्।
उत्तीर्याभिमुखः प्रायादगस्त्याध्युषितां दिशम्॥१०॥

भावार्थ :-
तदनन्तर शीतल एवं सुखद जल बहाने वाली वेदश्रुति नामक नदी को पार करके श्रीरामचन्द्रजी अगस्त्यसेवित दक्षिण दिशा की ओर बढ़ गये॥१०॥

श्लोक:
गत्वा तु सुचिरं कालं ततः शीतवहां नदीम्।
गोमतीं गोयुतानूपामतरत् सागरङ्गमाम्॥११॥

भावार्थ :-
दीर्घकाल तक चलकर उन्होंने समुद्रगामिनी गोमती नदी को पार किया, जो शीतल जल का स्रोत बहाती थी। उसके कछार में बहुत-सी गौएँ विचरती थीं॥११॥

श्लोक:
गोमतीं चाप्यतिक्रम्य राघवः शीघ्रगैर्हयैः।
मयूरहंसाभिरुतां ततार स्यन्दिकां नदीम्॥१२॥

भावार्थ :-
शीघ्रगामी घोड़ों द्वारा गोमती नदी को लाँघ करके श्रीरघुनाथजी ने मोरों और हंसों के कलरवों से व्याप्त स्यन्दि का नामक नदी को भी पार किया॥१२॥

श्लोक:
स महीं मनुना राज्ञा दत्तामिक्ष्वाकवे पुरा।
स्फीतां राष्ट्रवृतां रामो वैदेहीमन्वदर्शयत्॥१३॥

भावार्थ :-
वहाँ जाकर श्रीराम ने धन-धान्य से सम्पन्न और अनेक अवान्तर जनपदों से घिरी हुई भूमिका सीता को दर्शन कराया, जिसे पूर्वकाल में राजा मनु ने इक्ष्वाकु को दिया था॥१३॥

श्लोक:
सूत इत्येव चाभाष्य सारथिं तमभीक्ष्णशः।
हंसमत्तस्वरः श्रीमानुवाच पुरुषोत्तमः॥१४॥

भावार्थ :-
फिर श्रीमान् पुरुषोत्तम श्रीराम ने ‘सूत!’ कहकर सारथि को बारंबार सम्बोधित किया और मदमत्त हंस के समान मधुर स्वर में इस प्रकार कहा—॥१४॥

श्लोक:
कदाहं पुनरागम्य सरय्वाः पुष्पिते वने।
मृगयां पर्यटिष्यामि मात्रा पित्रा च संगतः॥१५॥

भावार्थ :-
सूत ! मैं कब पुनः लौटकर माता-पिता से मिलूँगा और सरयू के पार्श्ववर्ती पुष्पित वन में मृगया के लिये भ्रमण करूँगा?॥१५॥

श्लोक:
नात्यर्थमभिकांक्षामि मृगयां सरयूवने।
रतिद्देषातुला लोके राजर्षिगणसम्मता॥१६॥

भावार्थ :-
मैं सरयू के वन में शिकार खेलने की बहुत अधिक अभिलाषा नहीं रखता। यह लोक में एक प्रकार की अनुपम क्रीड़ा है, जो राजर्षियों के समुदाय को अभिमत है॥१६॥

श्लोक:
राजर्षीणां हि लोकेऽस्मिन् रत्यर्थं मृगया वने।
काले कृतां तां मनुजैर्धन्विनामभिकांक्षिताम्॥१७॥

भावार्थ :-
इस लोक में वन में जाकर शिकार खेलना राजर्षियों की क्रीड़ा के लिये प्रचलित हुआ था। अतः मनुपुत्रों द्वारा उस समय की गयी यह क्रीड़ा अन्य धनुर्धरों को भी अभीष्ट हुई’॥१७॥

श्लोक:
स तमध्वानमैक्ष्वाकः सूतं मधुरया गिरा।
तं तमर्थमभिप्रेत्य ययौ वाक्यमुदीरयन्॥१८॥

भावार्थ :-
इक्ष्वाकुनन्दन श्रीरामचन्द्रजी विभिन्न विषयों को लेकर सूत से मधुर वाणी में उपयुक्त बातें कहते हुए उस मार्ग पर बढ़ते चले गये॥१८॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे एकोनपञ्चाशः सर्गः॥४९॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में उनचासवाँ सर्ग पूरा हुआ॥४९॥

🏹 अयोध्याकाण्ड सर्ग- ५० 

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