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वाल्मीकि रामायण- अयोध्याकाण्ड सर्ग- ६५

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॥ श्री गणेशाय नमः ॥
॥ श्री कमलापति नम: ॥
॥ श्री जानकीवल्लभो विजयते ॥
॥ श्री वाल्मीकि रामायण ॥
अयोध्याकाण्ड सर्ग- ६५

वाल्मीकि रामायण
(भावार्थ सहित)
सब एक ही स्थान पर

अयोध्याकाण्ड सर्ग- ६५

अयोध्याकाण्डम्
पञ्चषष्टितमः सर्गः (सर्ग 65)

( वन्दीजनों का स्तुतिपाठ, राजा दशरथ को दिवंगत हुआ जान उनकी रानियों का करुण-विलाप )

श्लोक:
अथ रात्र्यां व्यतीतायां प्रातरेवापरेऽहनि।
वन्दिनः पर्युपातिष्ठस्तत्पार्थिवनिवेशनम्॥१॥

भावार्थ :-
तदनन्तर रात बीतने पर दूसरे दिन सबेरे ही वन्दीजन (महाराज की स्तुति करने के लिये) राजमहल में उपस्थित हुए॥१॥

श्लोक:
सूताः परमसंस्कारा मागधाश्चोत्तमश्रुताः।
गायकाः श्रुतिशीलाश्च निगदन्तः पृथक्पृथक्॥२॥

भावार्थ :-
व्याकरण-ज्ञान से सम्पन्न (अथवा उत्तम अलङ्कारों से विभूषित) सूत, उत्तम रूप से वंशपरम्परा का श्रवण कराने वाले मागध और सङ्गीतशास्त्र का अनुशीलन करने वाले गायक अपने अपने मार्ग के अनुसार पृथक्-पृथक् यशोगान करते हुए वहाँ आये॥२॥

श्लोक:
राजानं स्तुवतां तेषामुदात्ताभिहिताशिषाम्।
प्रासादाभोगविस्तीर्णः स्तुतिशब्दो ह्यवर्तत॥३॥

भावार्थ :-
उच्चस्वर से आशीर्वाद देते हुए राजा की स्तुति करने वाले उन सूत-मागध आदि का शब्द राजमहलों के भीतरी भाग में फैलकर गूंजने लगा॥३॥

श्लोक:
ततस्तु स्तुवतां तेषां सूतानां पाणिवादकाः।
अपदानान्युदाहृत्य पाणिवादान्यवादयन्॥४॥

भावार्थ :-
वे सूतगण स्तुति कर रहे थे; इतने ही में पाणिवादक (हाथों से ताल देकर गाने वाले) वहाँ आये और राजाओं के बीते हुए अद्भुत कर्मों का बखान करते हुए तालगति के अनुसार तालियाँ बजाने लगे॥४॥

श्लोक:
तेन शब्देन विहगाः प्रतिबुद्धाश्च सस्वनुः।
शाखास्थाः पञ्जरस्थाश्च ये राजकुलगोचराः॥५॥

भावार्थ :-
उस शब्द से वृक्षों की शाखाओं पर बैठे हुए तथा राजकुल में ही विचरने वाले पिंजड़े में बंद शुक आदि पक्षी जागकर चहचहाने लगे॥५॥

श्लोक:
व्याहृताःपुण्यशब्दाश्च वीणानां चापि निःस्वनाः।
आशीर्गेयं च गाथानां पूरयामास वेश्म तत्॥६॥

भावार्थ :-
शुक आदि पक्षियों तथा ब्राह्मणों के मुख से निकले हुए पवित्र शब्द, वीणाओं के मधुर नाद तथा गाथाओं के आशीर्वादयुक्त गान से वह सारा भवन गूंज उठा॥६॥

श्लोक:
ततः शुचिसमाचाराः पर्युपस्थानकोविदाः।
स्त्रीवर्षवरभूयिष्ठा उपतस्थुर्यथापुरा॥७॥

भावार्थ :-
तदनन्तर सदाचारी तथा परिचर्याकुशल सेवक, जिनमें स्त्रियों और खोजों की संख्या अधिक थी, पहले की भाँति उस दिन भी राजभवन में उपस्थित हुए॥७॥

श्लोक:
हरिचन्दनसम्पृक्तमुदकं काञ्चनैर्घटैः।
आनिन्युः स्नानशिक्षाज्ञा यथाकालं यथाविधि॥८॥

भावार्थ :-
स्नानविधि के ज्ञाता भृत्यजन विधि पूर्वक सोने के घड़ों में चन्दनमिश्रित जल लेकर ठीक समय पर आये॥८॥

श्लोक:
मङ्गलालम्भनीयानि प्राशनीयान्युपस्करान्।
उपानिन्युस्तथा पुण्याः कुमारीबहुलाः स्त्रियः॥९॥

भावार्थ :-
पवित्र आचार-विचार वाली स्त्रियाँ, जिनमें कुमारी कन्याओं की संख्या अधिक थी, मङ्गल के लिये स्पर्श करने योग्य गौ आदि, पीने योग्य गङ्गाजल आदि तथा अन्य उपकरण-दर्पण, आभूषण और वस्त्र आदि ले आयीं॥९॥

श्लोक:
सर्वलक्षणसम्पन्नं सर्वं विधिवदर्चितम्।
सर्वं सुगुणलक्ष्मीवत् तदभूदाभिहारिकम्॥१०॥

भावार्थ :-
प्रातःकाल राजाओं के मङ्गल के लिये जो-जो वस्तुएँ लायी जाती हैं, उनका नाम आभिहारिक है। वहाँ लायी गयी सारी आभिहारिक सामग्री समस्त शुभ लक्षणों से सम्पन्न, विधि के अनुरूप, आदर और प्रशंसा के योग्य उत्तम गुण से युक्त तथा शोभायमान थी॥१०॥

श्लोक:
ततः सूर्योदयं यावत् सर्वं परिसमुत्सुकम्।
तस्थावनुपसम्प्राप्तं किंस्विदित्युपशङ्कितम्॥११॥

भावार्थ :-
सूर्योदय होने तक राजा की सेवा के लिये उत्सुक हआ सारा परिजन वर्ग वहाँ आकर खड़ा हो गया। जब उस समय तक राजा बाहर नहीं निकले, तब सबके मन में यह शङ्का हो गयी कि महाराज के न आने का क्या कारण हो सकता है?॥११॥

श्लोक:
अथ याः कोसलेन्द्रस्य शयनं प्रत्यनन्तराः।
ताः स्त्रियस्तु समागम्य भर्तारं प्रत्यबोधयन्॥१२॥

भावार्थ :-
तदनन्तर जो कोसलनरेश दशरथके समीप रहने वाली स्त्रियाँ थीं, वे उनकी शय्या के पास जाकर अपने स्वामी को जगाने लगीं॥१२॥

श्लोक:
अथाप्युचितवृत्तास्ता विनयेन नयेन च।
नह्यस्य शयनं स्पृष्ट्वा किंचिदप्युपलेभिरे॥१३॥

भावार्थ :-
वे स्त्रियाँ उनका स्पर्श आदि करने के योग्य थीं; अतः विनीतभाव से युक्तिपूर्वक उन्होंने उनकी शय्या का स्पर्श किया। स्पर्श करके भी वे उनमें जीवन का कोई चिह्न नहीं पा सकीं॥१३॥

श्लोक:
ताः स्त्रियः स्वप्नशीलज्ञाश्चेष्टां संचलनादिषु।
ता वेपथुपरीताश्च राज्ञः प्राणेषु शङ्किताः॥१४॥

भावार्थ :-
सोये हुए पुरुष की जैसी स्थिति होती है, उसको भी वे स्त्रियाँ अच्छी तरह समझती थीं; अतः उन्होंने हृदय एवं हाथ के मूलभाग में चलने वाली नाड़ियों की भी परीक्षा की, किंतु वहाँ भी कोई चेष्टा नहीं प्रतीत हुई फिर तो वे काँप उठीं। उनके मन में राजा के प्राणों के निकल जाने की आशङ्का हो गयी॥१४॥

श्लोक:
प्रतिस्रोतस्तृणाग्राणां सदृशं संचकाशिरे।
अथ संदेहमानानां स्त्रीणां दृष्ट्वा च पार्थिवम्।
यत् तदाशङ्कितं पापं तदा जज्ञे विनिश्चयः॥१५॥

भावार्थ :-
वे जल के प्रवाह के सम्मुख पड़े हुए तिनकों के अग्रभाग की भाँति काँपती हुई प्रतीत होने लगीं। संशय में पड़ी हुई उन स्त्रियों को राजा की ओर देखकर उनकी मृत्यु के विषय में जो शङ्का हुई थी, उसका उस समय उन्हें पूरा निश्चय हो गया॥१५॥

श्लोक:
कौसल्या च सुमित्रा च पुत्रशोकपराजिते।
प्रसुप्ते न प्रबुध्येते यथा कालसमन्विते॥१६॥

भावार्थ :-
पुत्र शोक से आक्रान्त हुई कौसल्या और सुमित्रा उस समय मरी हुई के समान सो गयी थीं और उस समय तक उनकी नींद नहीं खुल पायी थी॥१६॥

श्लोक:
निष्प्रभासा विवर्णा च सन्ना शोकेन संनता।
न व्यराजत कौसल्या तारेव तिमिरावृता॥१७॥

भावार्थ :-
सोयी हुई कौसल्या श्रीहीन हो गयी थीं। उनके शरीर का रंग बदल गया था। वे शोक से पराजित एवं पीड़ित हो अन्धकार से आच्छादित हुई तारिका के समान शोभा नहीं पा रही थीं॥१७॥

श्लोक:
कौसल्यानन्तरं राज्ञः सुमित्रा तदनन्तरम्।
न स्म विभ्राजते देवी शोकाश्रुलुलितानना॥१८॥

भावार्थ :-
राजा के पास कौसल्या थीं और कौसल्या के समीप देवी सुमित्रा थीं। दोनों ही निद्रामग्न हो जाने के कारण शोभाहीन प्रतीत होती थीं। उन दोनों के मुख पर शोक के आँसू फैले हुए थे॥१८॥

श्लोक:
ते च दृष्ट्वा तदा सुप्ते उभे देव्यौ च तं नृपम्।
सुप्तमेवोद्गतप्राणमन्तःपुरममन्यत॥१९॥

भावार्थ :-
उस समय उन दोनों देवियों को निद्रामग्न देख अन्तःपुर की अन्य स्त्रियों ने यही समझा कि सोते अवस्था में ही महाराज के प्राण निकल गये हैं॥१९॥

श्लोक:
ततः प्रचुक्रुशुर्दीनाः सस्वरं ता वराङ्गनाः।
करेणेव इवारण्ये स्थानप्रच्युतयूथपाः॥२०॥

भावार्थ :-
फिर तो जैसे जंगल में यूथपति गजराज के अपने वासस्थान से अन्यत्र चले जाने पर हथिनियाँ करुणचीत्कार करने लगती हैं, उसी प्रकार वे अन्तःपुर की सुन्दरी रानियाँ अत्यन्त दुःखी हो उच्चस्वर से आर्तनाद करने लगीं॥२०॥

श्लोक:
तासामाक्रन्दशब्देन सहसोद्गतचेतने।
कौसल्या च सुमित्रा च त्यक्तनिद्रे बभूवतुः॥२१॥

भावार्थ :-
उनके रोने की आवाज से कौसल्या और सुमित्रा की भी नींद टूट गयी और वे दोनों सहसा जाग उठीं॥२१॥

श्लोक:
कौसल्या च सुमित्रा च दृष्ट्वा स्पृष्ट्वा च पार्थिवम्।
हा नाथेति परिक्रुश्य पेततुर्धरणीतले॥२२॥

भावार्थ :-
कौसल्या और सुमित्रा ने राजा को देखा, उनके शरीर का स्पर्श किया और ‘हा नाथ!’ की पुकार मचाती हुई वे दोनों रानियाँ पृथ्वी पर गिर पड़ीं॥२२॥

श्लोक:
सा कोसलेन्द्रदुहिता चेष्टमाना महीतले।
न भ्राजते रजोध्वस्ता तारेव गगनच्युता॥२३॥

भावार्थ :-
कोसलराजकुमारी कौसल्या धरती पर लोटने और छटपटाने लगीं। उनका धूलि-धूसरित शरीर शोभाहीन दिखायी देने लगा, मानो आकाश से टूटकर गिरी हुई कोई तारा धूल में लोट रही हो॥२३॥

श्लोक:
नृपे शान्तगुणे जाते कौसल्यां पतितां भुवि।
अपश्यंस्ताः स्त्रियः सर्वा हतां नागवधूमिव॥२४॥

भावार्थ :-
राजा दशरथके शरीरकी उष्णता शान्त हो गयी थी। इस प्रकार उनका जीवन शान्त हो जानेपर भूमिपर अचेत पड़ी हुई कौसल्याको अन्तःपुरकी उन सारी स्त्रियोंने मरी हुई नागिनके समान देखा॥२४॥

श्लोक:
ततः सर्वा नरेन्द्रस्य कैकेयीप्रमुखाः स्त्रियः।
रुदन्त्यः शोकसंतप्ता निपेतुर्गतचेतनाः॥२५॥

भावार्थ :-
तदनन्तर पीछे आयी हुई महाराज की कैकेयी आदि सारी रानियाँ शोक से संतप्त होकर रोने लगी औरअचेत होकर गिर पड़ीं॥२५॥

श्लोक:
ताभिः स बलवान् नादः क्रोशन्तीभिरनुद्रुतः।
येन स्फीतीकृतो भूयस्तद् गृहं समनादयत्॥२६॥

भावार्थ :-
उन क्रन्दन करती हुई रानियों ने वहाँ पहले से होने वाले प्रबल आर्तनाद को और भी बढ़ा दिया। उस बढ़े हुए आर्तनाद से वह सारा राजमहल पुनः बड़े जोर से गूंज उठा॥२६॥

श्लोक:
तत् परित्रस्तसम्भ्रान्तपर्युत्सुकजनाकुलम्।
सर्वतस्तुमुलाक्रन्दं परितापार्तबान्धवम्॥२७॥
सद्योनिपतितानन्दं दीनं विक्लवदर्शनम्।
बभूव नरदेवस्य सद्म दिष्टान्तमीयुषः॥२८॥

भावार्थ :-
कालधर्म को प्राप्त हुए राजा दशरथ का वह भवन डरे, घबराये और अत्यन्त उत्सुक हुए मनुष्यों से भर गया। सब ओर रोने-चिल्लाने का भयंकर शब्द होने लगा। वहाँ राजा के सभी बन्धु-बान्धव शोक-संताप से पीड़ित होकर जुट गये। वह सारा भवन तत्काल आनन्दशून्य हो दीन-दुःखी एवं व्याकुल दिखायी देने लगा॥२७-२८॥

श्लोक:
अतीतमाज्ञाय तु पार्थिवर्षभं यशस्विनं तं परिवार्य पत्नयः।
भृशं रुदन्त्यः करुणं सुदुःखिताः प्रगृह्य बाहू व्यलपन्ननाथवत्॥२९॥

भावार्थ :-
उन यशस्वी भूपालशिरोमणि को दिवङ्गत हुआ जान उनकी सारी पत्नियाँ उन्हें चारों ओर से घेरकर अत्यन्त दुःखी हो जोर-जोर से रोने लगी और उनकी दोनों बाँहें पकड़कर अनाथ की भाँति करुण-विलाप करने लगीं॥२९॥

इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे पञ्चषष्टितमः सर्गः॥६५॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में पैंसठवाँ सर्ग पूरा हुआ।६५॥

🏹 अयोध्याकाण्ड सर्ग- ६६ 

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