लड्डू गोपाल श्री कृष्ण के बाल स्वरूप की कथा, सेवा और आरती
लड्डू गोपाल
लड्डू गोपाल भगवान विष्णु के पूर्णावतार श्री कृष्ण का बाल रूप है। श्री कृष्ण के भक्त उनके अनेक रूपों की पूजा करते हैं। उनका बाल रूप लड्डू गोपाल भक्तों को सबसे अधिक प्रिय है। भक्त अपने घरों में भगवान कृष्ण के बाल रूप को स्थापित करते हैं और उनकी सेवा और पूजा करके परम सुख प्राप्त करते हैं।
भक्त लड्डू गोपाल का ख्याल एक बच्चे की तरह रखते हैं। उन्हें समय पर जगाते हैं और सुलाते हैं। समय-समय पर उन्हें भोजन भी कराते हैं। अगर आप भी लड्डू गोपाल को घर ला रहे हैं तो उनकी सेवा के कुछ नियम जरूर जान लें। आइए जानते हैं भगवान कृष्ण के बाल स्वरूप लड्डू गोपाल की सेवा करते समय किन बातों का ध्यान रखना आवश्यक है।
प्रतिदिन स्नान
लड्डू गोपाल की सेवा करने से भक्तों को बहुत खुशी मिलती है। प्रतिदिन सुबह लड्डू गोपाल को स्नान कराना जरूरी है। उनकी सेवा और देखभाल बच्चों की तरह करनी चाहिए। उन्हें नहलाते समय शंख का इस्तेमाल करना चाहिए। माना जाता है कि शंख में देवी लक्ष्मी का वास होता है, इसलिए शंख से लड्डू गोपाल को नहलाना शुभ होता है।
स्वच्छ वस्त्र
लड्डू गोपाल को प्रतिदिन स्नान कराने के बाद साफ कपड़े पहनाएं। उन्हें मौसम के हिसाब से कपड़े पहनाएं। गर्मियों में सूती कपड़े और सर्दियों में ऊनी कपड़े पहनाएं।
श्रृंगार करना
लड्डू गोपाल को कपड़े पहनाने के बाद उनका श्रृंगार करना चाहिए। उन्हें चंदन का तिलक लगाएं। उन्हें आभूषण पहनाएं और उनके हाथ में बांसुरी रखें।
दिन में चार बार भोग लगाना
लड्डू गोपाल की सेवा में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उन्हें दिन में चार बार भोग लगाना चाहिए। हर बार समय के अनुसार भोग लगाएं। सुबह दूध चढ़ाएं। दोपहर में सात्विक भोजन जैसे पूरी सब्जी का भोग लगाएं। शाम को मिश्री मक्खन और रात में पूरी सब्जी का भोग लगाएं। भोग हमेशा शाकाहारी और सात्विक होना चाहिए। भोग लगाते समय हर बार आरती करें।
उन्हें अकेला न छोड़ें
बाल गोपाल को कभी भी घर में अकेला नहीं छोड़ना चाहिए। अगर घर के सभी सदस्य कहीं जा रहे हैं तो बाल गोपाल को अपने साथ ले जाएं।
सपने में लड्डू गोपाल का दिखाई देना
- सपने में लड्डू गोपाल का दर्शन होना बहुत शुभ माना जाता है।
- सपने में बाल गोपाल का दिखाई देने का अर्थ है कि आपके घर में कोई बड़ी खुशी आने वाली है।
- यह भी हो सकता है कि जल्द भी आपके घर में बच्चे की किलकारी गूंजने वाली है।
- सपने में लड्डू गोपाल झूले में झूला झूलते हुए नजर आए तो समझो की आने वाले समय में किसी भी प्रकार की सफलता मिलने वाली है।
- सपने में लड्डू गोपाल हंसते हुए नजर आए तो इसका अर्थ है कि सभी शत्रुओं का नाश होने वाला है।
- सपने में लड्डू गोपाल गुस्से में नजर आए तो समझो की उन्हें समय पर भोग नहीं लगाया गया है।
- यदि आप बीमार है और सपने में लड्डू गोपाल नजर आए तो समझो स्वस्थ होने वाले हैं।
लड्डू गोपाल पूजा के फायदे
- जिस भी घर में लड्डू गोपाल की मूर्ति है वह घर उन्हीं लड्डू गोपाल का होता है।
- अत: उनकी पूजा घर के मुख्य सदस्य के रूप में करने से घर की रक्षा होती है।
- लड्डू गोपाल की पूजा करने से मनोकामना पूर्ण होत है और व्यक्ति सुखी जीवन जीता है।
- लड्डू गोपाल की पूजा करने से संतान की इच्छा पूर्ण होती है।
- लड्डू गोपाल की पूजा करने से घर में सुख और समृद्धि बढ़ती रहती है।
- लड्डू गोपाल की पूजा करने से घर में पॉजिटीविटी फैलती है।
- लड्डू गोपाल की पूजा करने से आध्यात्मिकता का विकास होता है और मन मस्तिष्क हमेशा शांत बना रहता है।
- लड्डू गोपाल की पूजा करने से मन में आत्मविश्वास बढ़ता है
- लड्डू गोपाल की पूजा करने से व्यक्ति मनचाही सफलता प्राप्त करता है।
- लड्डू गोपाल की पूजा करने से घर में कभी भी रोग और शोक नहीं रहता है।
लड्डू गोपाल की कथा
कुंभनदास हमेशा भगवान श्री कृष्ण की भक्ति में लीन रहते थे और पूरी नियमनिष्ठा से भगवान की सेवा करते थे। वे भगवान को छोड़कर कभी कहीं नहीं जाते थे, ताकि उनकी सेवा में कोई बाधा न आए। एक दिन उन्हें वृंदावन से भागवत कथा सुनाने का निमंत्रण मिला। पहले तो उन्होंने मना कर दिया, लेकिन लोगों के आग्रह पर वे कथा में जाने के लिए तैयार हो गए।
उन्होंने सोचा कि भगवान की सेवा की तैयारी करने के बाद वे प्रतिदिन कथा सुनाकर लौट आएंगे, ताकि भगवान की सेवा का नियम न छूटे। उन्होंने अपने बेटे को समझाया कि उन्होंने भोग तैयार कर लिया है, बस तुम्हें समय पर ठाकुर जी को भोग लगाना है। कुंभनदास ने अपने बेटे रघुनंदन को समझाया और वहां से चले गए। रघुनंदन ने भोजन की थाली ठाकुर जी के सामने रखी और सरल मन से ठाकुर जी से आग्रह किया कि वे आकर भोग लगाएं।
उनके बाल मन में यह छवि थी कि ठाकुर जी स्वयं आकर अपने हाथों से भोजन करेंगे, जैसे हम सब करते हैं। उन्होंने ठाकुर जी से बार-बार आग्रह किया, लेकिन भोजन वैसा ही रहा। अब रघुनंदन दुखी हो गए और रोते हुए आवाज लगाई कि ठाकुर जी आकर भोजन ग्रहण करें। जिसके बाद ठाकुर जी ने बालक का रूप धारण किया और भोजन करने बैठ गए।
यह दृश्य देखकर रघुनंदन भी प्रसन्न हो गए। रात को जब कुंभनदास जी वापस लौटे और पूछा- बेटा, क्या तुमने ठाकुर जी को भोग लगाया? रघुनंदन ने कहा- हां। जब उन्होंने प्रसाद मांगा तो बेटे ने कहा कि ठाकुर जी ने सारा भोजन खा लिया। उसने सोचा कि बालक को भूख लगी होगी इसलिए उसने सारा भोजन खा लिया होगा।
अब यह रोज की दिनचर्या हो गई कि कुंभनदास जी भोजन की थाली लेकर जाते और रघुनंदन ठाकुर जी को भोग लगाते और जब वापस आकर प्रसाद मांगते तो उन्हें एक ही उत्तर मिलता कि ठाकुर जी ने सारा भोजन खा लिया। कुंभनदास जी को अब लगने लगा था कि उनका पुत्र झूठ बोलने लगा है। एक दिन कुंभनदास ने लड्डू बनाकर थाली सजाई और छिपकर देखने लगे कि बालक क्या करता है।
रघुनंदन ने हमेशा की तरह ठाकुर जी को पुकारा तो ठाकुर जी बालक रूप में प्रकट हुए और लड्डू खाने लगे। यह देखकर कुंभनदास जी दौड़े-दौड़े आए और प्रभु के चरणों में गिरकर विनती करने लगे। उस समय ठाकुर जी के एक हाथ में लड्डू था और दूसरे हाथ का लड्डू उनके मुँह में जाने ही वाला था कि वे स्थिर हो गए। तब से उनकी इसी रूप में पूजा की जाती है और वे ‘लड्डू गोपाल’ कहलाने लगे।
लड्डू गोपाल चालीसा
दोहा:
श्री राधापद कमल (कमल के उपाय) रज, सिर धरि यमुना कूल।
वरणो चालीसा सरस, सकल सुमंगल मूल॥
चौपाई:
जय जय पूरण ब्रह्म बिहारी, दुष्ट दलन लीला अवतारी।
जो कोई तुम्हरी लीला गावै, बिन श्रम सकल पदारथ पावै॥
श्री वसुदेव देवकी माता, प्रकट भये संग हलधर भ्राता।
मथुरा सों प्रभु गोकुल आये, नन्द भवन मे बजत बधाये॥
जो विष देन पूतना आई, सो मुक्ति दै धाम पठाई।
तृणावर्त राक्षस संहारयौ, पग बढ़ाय सकटासुर मार्यौ॥
खेल खेल में माटी खाई, मुख मे सब जग दियो दिखाई।
गोपिन घर घर माखन खायो, जसुमति बाल केलि सुख पायो॥
ऊखल सों निज अंग बँधाई, यमलार्जुन जड़ योनि छुड़ाई।
बका असुर की चोंच विदारी, विकट अघासुर दियो सँहारी॥
ब्रह्मा बालक वत्स चुराये, मोहन को मोहन हित आये।
बाल वत्स सब बने मुरारी, ब्रह्मा विनय करी तब भारी॥
काली नाग नाथि भगवाना, दावानल को कीन्हों पाना।
सखन संग खेलत सुख पायो, श्रीदामा निज कन्ध चढ़ायो॥
चीर हरन करि सीख सिखाई, नख पर गिरवर लियो उठाई।
दरश यज्ञ पत्निन को दीन्हों, राधा प्रेम सुधा सुख लीन्हों॥
नन्दहिं वरुण लोक सों लाये, ग्वालन को निज लोक दिखाये।
शरद चन्द्र लखि वेणु बजाई, अति सुख दीन्हों रास रचाई॥
अजगर सों पितु चरण छुड़ायो, शंखचूड़ को मूड़ गिरायो।
हने अरिष्टा सुर अरु केशी, व्योमासुर मार्यो छल वेषी॥
व्याकुल ब्रज तजि मथुरा आये, मारि कंस यदुवंश बसाये।
मात पिता की बन्दि छुड़ाई, सान्दीपन गृह विघा पाई॥
पुनि पठयौ ब्रज ऊधौ ज्ञानी, पे्रम देखि सुधि सकल भुलानी।
कीन्हीं कुबरी सुन्दर नारी, हरि लाये रुक्मिणि सुकुमारी॥
भौमासुर हनि भक्त छुड़ाये, सुरन जीति सुरतरु महि लाये।
दन्तवक्र शिशुपाल संहारे, खग मृग नृग अरु बधिक उधारे॥
दीन सुदामा धनपति कीन्हों, पारथ रथ सारथि यश लीन्हों।
गीता ज्ञान सिखावन हारे, अर्जुन मोह मिटावन हारे॥
केला भक्त बिदुर घर पायो, युद्ध महाभारत रचवायो।
द्रुपद सुता को चीर बढ़ायो, गर्भ परीक्षित जरत बचायो॥
कच्छ मच्छ वाराह अहीशा, बावन कल्की बुद्धि मुनीशा।
ह्वै नृसिंह प्रह्लाद उबार्यो, राम रुप धरि रावण मार्यो॥
जय मधु कैटभ दैत्य हनैया, अम्बरीय प्रिय चक्र धरैया।
ब्याध अजामिल दीन्हें तारी, शबरी अरु गणिका सी नारी॥
गरुड़ासन गज फन्द निकन्दन, देहु दरश धु्रव नयनानन्दन।
देहु शुद्ध सन्तन कर सग्ड़ा, बाढ़ै प्रेम भक्ति रस रग्ड़ा॥
देहु दिव्य वृन्दावन बासा, छूटै मृग तृष्णा जग आशा।
तुम्हरो ध्यान धरत शिव नारद, शुक सनकादिक ब्रह्म विशारद॥
जय जय राधारमण कृपाला, हरण सकल संकट भ्रम जाला।
बिनसैं बिघन रोग दुःख भारी, जो सुमरैं जगपति गिरधारी।
जो सत बार पढ़ै चालीसा, देहि सकल बाँछित फल शीशा॥
छन्द:
गोपाल चालीसा पढ़ै नित, नेम सों चित्त लावई।
सो दिव्य तन धरि अन्त महँ, गोलोक धाम सिधावई॥
संसार सुख सम्पत्ति सकल, जो भक्तजन सन महँ चहैं।
ट्टजयरामदेव’ सदैव सो, गुरुदेव दाया सों लहैं॥
दोहा:
प्रणत पाल अशरण शरण, करुणा-सिन्धु ब्रजेश।
चालीसा के संग मोहि, अपनावहु प्राणेश॥
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