श्री महाकाली षोड़शोपचार पूजन विधि एवं साधना मंत्र
श्री महाकाली साधना
श्री जगदम्बा महाकाली की सिद्धि करने वाले साधको! “आद्या शक्ति” महाकाली ही “परमात्मा” हैं, जो विभिन्न रूपों में विविध लीलाएँ करती हैं। आप ही अंशावतार के भाव से “ब्रह्मा” और पालन कर्त्ता के रूप में “विष्णु” तथा संहार कर्त्ता के रूप में “रूद्र” बन जाती हैं। यही महादेवी दस महाविद्या रूप में सृष्टि के कण-कण में संचार करती हैं। यही आदि के तीन जोड़े उत्पन्न करने वाली “महालक्ष्मी” हैं।
शास्त्रों में वर्णित है कि “महाकाली शक्ति के बिना शिव शव के समान होते हैं।” यही परमेश्वरि राजाओं की राज लक्ष्मी, वणिकों की सौभाग्य लक्ष्मी, सज्जनों की शोभा लक्ष्मी हैं। सारांश यह है कि जगत में तमाम जगह परमात्मा रूप महाशक्ति काली ही विविध शक्तियों के रूप में खेल रही हैं।
मातेश्वरी महाकाली के अनेकों रूप हैं, इनमें से किसी भी रूप की सिद्धि यदि मनुष्य कर लेता है तो संसार के श्रेष्ठतम शिखर पर पहुँच जाता है। परन्तु इन महाशक्ति की सिद्धि प्राप्त करना आसान नहीं, भगवती को प्रसन्न करना भी आसान नहीं। फिर साधक उन्हें प्रसन्न करने हेतु मार्ग ढूंढता है, तब उसे-शक्तियों की सिद्धि साधना की आवश्यकता पड़ती है, और वही सिद्धि रहस्य हम MNSGranth के माध्यम से आप तक पहुंचा रहे हैं।
श्री महाकाली षोड़शोपचार पूजन विधि एवं साधना मंत्र
श्री महाकाली की साधना समस्त साधनावों में से सर्वोत्तम साधना है और अति जटिल व कठिन साधना है, यह महान साधना करने के पश्चात् साधक समस्त कामनावों की पूर्ति करने में सक्षम हो जाता है। साथ ही शत्रुवों पर विजय, मुकद्दमें में जीत धन की प्राप्ति, प्रगति, व प्रसन्नता के साथ अन्त काल में मोक्ष की प्राप्ति होती है।
महाकाली की साधना के लिए सर्वोत्तम स्थान श्मशान भूमि है। श्मशान भूमि एक ऐसा स्थान है, जहां जाते ही संसार की नश्वरता का आभास होता है और वैराग्य की भावना जागृत होती है। शास्त्रों का मत है-
भोजनांते मैथुनांते श्मशानांते च या मते।
सामते सर्वदा चेतसात् नरो नारायण भवेत॥
हिन्दी अनुवाद- “भोजन के पश्चात् पेट भर जाने पर जिस प्रकार भोजन से जीव उपरांत हो जाता है, जिस प्रकार स्त्री सम्भोग के पश्चात् कुछ समय सम्भोग से मन हट जाता है, उसी प्रकार श्मशान में किसी दाह कर्म में जाने के पश्चात् कुछ समय संसार से वैराग्य हो जाता है। मस्तिष्क का यह विचार थोड़ी देर के लिए होता है। यदि ऐसा विचार सदैव रह जाये तो नरसाक्षात नारायण हो जाये।”
वास्तविकता यह है कि श्मशान भूमि में साधना करने से जातक का मन माया मोह से बाहर होकर साधना में पूर्ण नियंत्रित हो जाता है। यह साधना दिवाली की रात्रि में, अमावस्या की रात्रि में या किसी भी शनिवार की रात्रि में बारह बजे आरम्भ करनी चाहिए। साधना आरम्भ करने के लिए तिथि, मुहुर्त आदि का शुभ लग्न पंडित से निकलवा लेना चाहिए और यह महान साधना का प्रारम्भिक पूजन किसी योग्य वैदिक पंड़ित द्वारा ही सम्पन्न करावें। ये साधना 40 दिन की है। प्रथम रात्रि पूजन का शुभारम्भ पंडित से सम्पन्न करावे, फिर दूसरे दिन से स्वयं मंत्र जप करें। फिर अन्तिम दिन पंडित को बुलवा कर हवन कर्म, बिसर्जन आदि सम्पन्न करावें। बिसर्जन के बाद ब्राह्मण भोजन व कुमारी कन्यावों को भोजन करावें। ब्राह्मण की संख्या 5 और कुमारी कन्यावों की संख्या 11 होनी चाहिए।
यदि श्मशान भूमि में साधना करना मुश्किल लगे तो शिव मंदिर, काली मंदिर अथवा अपने घर के पवित्र कमरे में ही यह साधना सम्पन्न कर सकते हैं।
उपरोक्त दिन रात्रि के बारह बजे स्नानादि से पवित्र हो जावें। पूजा स्थल पर गंगाजल छिड़कर आम लकड़ी से बना, काले रंग से रंगा हुआ सिंहासन स्थापित करें। समस्त पूजन सामग्री अपने पास कर लें। सिंहासन उत्तर दिशा में स्थापित करें। स्वयं उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठे। सिंहासन उत्तर दिशा से दक्षिण तरफ रूख होगा अर्थात् आपके सामने होना चाहिए। वैदिक पंडित पश्चिम के तरफ मुख करके बैठे। बैठने हेतु साधक व पंडित दोनों ही कम्बल के आसन का प्रयोग करें। इसके बाद सिंहासन पर काला वस्त्र बिछाकर माता काली की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें। इसके पश्चात् स्वयं नवीन काला वस्त्र धारण कर, पवित्र तन मन से धूप, गाय का घी और रूई की बाती का चौमुखी दीपक प्रज्जवलित करें। दीपक प्रज्जवलित कर माता जी सिंहासन के सामने पास में दाहिनी ओर अक्षत पूंज पर (चावल छिड़क कर) रख दें। पूजन आरम्भ से पहले सिर पे काला रूमाल या काला तौलिया अवश्य रख लें।
याद रखें- कोई भी साधना गुरू के बिना सम्पन्न नहीं हो सकती। गुरू भी वंही होना चाहिए जिसने महाकाली की साधना पूर्व सम्पन्न किए हुए हों। साधना काल में गुरू का होना भी जरूरी है। यदि गुरू स्वयं उपस्थित नहीं हो सकें तो उनके द्वारा सिद्ध किया हुआ- “सिद्ध गुरू कवच यंत्र” पूर्व ही प्राप्त कर लें। पूजन (साधना) आरम्भ से पूर्व गुरू द्वारा प्राप्त यंत्र को पवित्र जल या गंगाजल से धोकर, माता काली सिंहासन पर तांबे के प्लेट में स्थापित करें।
इसके बाद साधना का प्रथम चरण षोड़शोपचार पूजन आरम्भ करें।
षोड़शोपचार पूजन आरम्भ
नोट- पूजन आरम्भ से पूर्व दाहिने हाथ में अंगूठे से चौथी उँगली में सोने, चांदी, तांबे या कुशा की बनी पवित्री धारण करें और पवित्री धारण करते समय निम्नलिखित मंत्र का उच्चारण करें-
पवित्री धारण मंत्र
ॐ पवित्रे स्थौ वैष्णब्यौ सवितुर्वः प्रसव उत्पुणाम्याच्छिद्रेण पवित्रेण सूर्यस्य रशिमभिः।
तस्यते पवित्रपते पूतरस्य यत्कामः पुणे तच्छकेंयम॥
नोट- पवित्री धारण करने के बाद दाहिने हाथ की अंजुली में गंगाजल लेकर निम्न मंत्र पढ़े और मंत्र समाप्ति के पश्चात् अंजुली का जल अपने शरीर पर छिड़क लें।
शरीर पवित्र करने का मंत्र
ॐ अपिवत्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपिवा।
यः स्मरते पुण्डरी काक्षं स बाह्यभ्यंतरः शुचिः॥
ॐ पुण्डरी काक्षं पुनातु॥
हिन्दी अनुवाद- कोई पवित्र हो, अपवित्र हो अथवा किसी भी अवस्था में क्यों न हों, जो “पुण्डरी काक्ष” का स्मरण करता है, वह बाहर और भीतर से भी परम पवित्र हो जाता है। अतः हे ॐ रूप पुण्डरी काक्ष हमें पवित्र करें।
नोट- अब दीपक की पूजा करें।
प्रज्जवलित दीप पूजन मंत्र
“ॐ ज्योतिषे नमः”
उपरोक्त मंत्र मुख से बोलकर-दीपक के पास जल, अक्षत, पुष्प, चन्दन, बिल्वपत्र, नैवेद्य चढ़ावें। फिर उस दीप में माता काली रूप की भावना करते हुए हाथ जोड़कर यह श्लोक बोलें-
“भो दीप देवी रूपस्त्वं कर्म साक्षी हृविघ्न कृत।
यावत् कर्म समाप्तिः स्यात् तावत् त्वं सुस्थिरो भव॥”
हिन्दी अनुवाद- “हे दीप! आप माता काली के रूप हैं, कर्म के साक्षी तथा विघ्न के निवारक हैं। जब तक पूजन कर्म पूर्ण न हो जाये, तब तक आप सुस्थिर भाव से सन्निकट रहें।”
शिखा बन्धन मंत्र
नोट- अब निम्न मंत्र पढ़कर शिखा (टीक) बांधें-
ॐ मानस्तोके तनये मानङ्ग आयुषि मानौ गोषु मानोऊ अश्वेषु रीरिषः।
मानो वीरान रूद्र भामिनो वीर्ह है विष्मन्तः सदमित्वा हवामहे॥
नोट- अब “आचमन” करें। आचमन क्रिया में दाहिने हाथ की अंजुली में मख में लें। जल लेवें और मंत्र पढ़कर वह जल अपने होंठ से लगाकर एक बूंद मुख में आचमन का जल कंठ से नीचे नहीं उतरना चाहिए। यह क्रिया नीचे लिखित मंत्र द्वारा क्रमशः तीन बार करें।
आचमन मंत्र
ॐ केशावय नमः। ॐ नाराणाय नमः। ॐ माधवाय नमः।
तत्पश्चात् –
“ॐ हषिकेषवाय नमः” मंत्र पढ़कर हाथ धो लें। इसके पश्चात् मस्तक पे त्रिपुण्ड चन्दन अथवा तिलक के समान लाल चन्दन निम्न मंत्र पढ़कर धारण करें।
मस्तक चन्दन लेपन मंत्र
ॐ चन्दनस्य महत्वपुण्यं पवित्र पाप नाशनम्।
आपदं हरते नित्यं लक्ष्मी स्तिस्थि सर्वदा॥
नोट- अब वैदिक पुरोहित यजमान के हाथ में निम्न मंत्र पढ़कर मौली (रक्षा सूत्र) बांधें।
रक्षा सूत्र बन्धन मंत्र
ॐ मंगलम् भगवान विष्णु मंगलम गरुड़ ऽध्वजः।
मंगलम् पुण्डरी काक्षं मंगलायच तनो हरिः॥
नोट- अब दोनों हाथ जोड़कर नीचे लिखित “विनियोग मंत्र” का जप करें अर्थात् पढ़े-
विनियोग मंत्र
अस्य श्री महाकाली मन्त्रस्य भैख ऋषिः, उष्णिक-छन्दः, महाकाली देवता, ह्रीं बीजं हूं शक्ति, क्रीं कीलकं मम अभिष्ठ सिद्धि यर्थे जपे बिनियोगः॥
नोट- अब “न्यास” करें। न्यास कई प्रकार के होते हैं, किन्तु महाकाली के किसी भी रूप की साधना हो या दस महाविद्याओं की साधना, इनमें ऋष्यादि न्यास, हृदयादि न्यास अंगन्यास, करन्यास मुख्य हैं। न्यास विधि में दाहिने हाथ की पांचों उँगलियों द्वारा अंगों का क्रमशः स्पर्श करने का विधान है।
ऋष्यादि न्यास
सर्वप्रथम ऋष्यादि न्यास सम्पन्न करें-
“ॐ भैरव ऋषये नम शिरसि” दाहिने हाथ की पाँचों उँगलियों से सिर का स्पर्श करें।
“ॐ उष्णिक छन्दसे नमः मुखे” मुख स्पर्श करें।
“ॐ महाकालिका देवतायै नमः हृदि” हृदय का स्पर्श करें।
“ॐ ह्रीं बीजाय नमः गुह्ये” मल निकाश मार्ग का स्पर्श करें।
“ॐ शक्तये नमः पादयोः” दोनों घुटनों एवं पैर के दोनों पंजों को स्पर्श करें।
“ॐ क्रीं कीलकाय नमः नाभौः” नाभिस्थल का स्पर्श करें।
“ॐ विनियोगाय नमः सर्वांगे” इस क्रिया में दोनों हाथों की पाँचों उँगलियों से दोनों भुजाओं एवं समस्त बाकी अंगों का स्पर्श करें।
नोट- अब “करन्यास” क्रिया सम्पन्न करें। पद्मासन की मुद्रा में दोनों हाथ दोनों घुटनों पर रखकर यह न्यास सम्पन्न किया जाता है। यह क्रिया दोनों हाथों की हथेलियों एवं उँगलियों से की जाती है।
करन्यास मंत्र और विधि
“ॐ क्रां अंगुष्ठाभ्यां नमः” मंत्र बोलकर तर्जनी को मोड़कर अंगूठे की जड़ से जहां मंगल का क्षेत्र है, वहां लगावें।
“ॐ क्रीं तर्जनीभ्यां नमः” मंत्र उच्चारण करते हुए अंगूठे की नोक से तर्जनी के छोर का स्पर्श करें।
“ॐ कुं मध्यमाभ्यां नमः” मंत्र उच्चारण करते हुए अंगूठे से मध्यमा के अन्तिम भाग का स्पर्श करें।
“ॐ अनामिकाभ्यां नमः” मंत्रोच्चारण करते हुए अनामिका का स्पर्श
“ॐ क्रौं कनिष्ठकाभ्यां नमः” मंत्रोच्चारण करते हुए कनिष्ठका उँगली के अंतिम भाग के साथ अंगूठे की नोक का स्पर्श करें।
“ॐ क्रः करतल पृष्टाभ्यां नमः” यह मंत्र पढ़कर दोनों हाथों की हथेलियों को एक दूसरे के ऊपर नीचे दो बार घुमाईये।
नोट- अब “हृदययादि न्यास” क्रिया सम्पन्न करें। पद्मासन की मुद्रा में बांया हाथ घुटनों पर रखे हुए दाहिने हाथ की पाँचों उँगलियों से निम्नलिखत अंगों का स्पर्श करें-
हृद्यादि न्यास मंत्र और विधि
“ॐ क्रां हृदयाय नमः”– दाएँ हाथ की पाँचों उँगलियों से हृदय का स्पर्श करें।
“ॐ क्रीं शिरसे स्वाहा”– मस्तक का स्पर्श करें।
“ॐ कुं शिखायै वषट्”– शिखा स्थान का स्पर्श करें।
“ॐ ॐ कवचाय हुम” दोनों हाथों से दोनों भुजावों का स्पर्श करें।
“ॐ क्रौं नेत्रयाय वौषट” सीधे हाथ से तीनों नेत्रों का स्पर्श करें। तीसरा नेत्र मस्तक के मध्य में माना जाता है।
“ॐ क्रः फट् स्वाहा” बाएँ हाथ पर दाहिने हाथ का सीधा पंजा मारकर “फट्” की ध्वनि करें, अर्थात् एक ताली बजाएँ।
नोट- इसके पश्चात् पूजन कराने वाले आचार्य का वरण करें। इस क्रम में अपने दोनों हाथों पर वैदिक पंड़ित के लिए लाए गये वस्त्र, वस्त्र के ऊपर पान का पत्ता, सूपारी (5-5) यज्ञोपवीत तथा द्रव्य रखकर निम्न मंत्र का उच्चारण करें। मंत्र समाप्ति के पश्चात् हाथ की वस्तुएँ आचार्य के हाथों में प्रदान करें।
आचार्य वरण मंत्र
ॐ अद्य अमुक गोत्रोत्पन्न अमुक प्रवरान्वितः अमुक नाम शर्माऽहं अमुक गोत्रोत्पन्नं अमुक प्रवरान्वितं शुक् ल यजुर्वेदान्तर्गत वाजसनेय माध्यन्दिनी यशाखाध्या यितं अमुक शर्माणं ब्राह्मणं अस्मिन् महाकाली सिद्धि कर्मणि एमिः वरण वस्त्र द्रव्यैः आचार्य त्वेन त्वां अंह वृणे।
नोट- वरण सामग्री लेते समय आचार्य को “वृतोस्मि” शब्द का उच्चारण करना चाहिए। अब साधक हाथ जोड़कर आचार्य की वन्दना करें।
आचार्य प्रार्थना मंत्र
आचार्यस्तु यथा स्वर्गे शक्रादीनां वृहस्पतिः।
तथा त्वं मम यज्ञेस्मिन्नाचार्यो भव सुव्रत॥
नोट- अब आचार्य साधक द्वारा प्रदत्त नवीन वस्त्र धारण करें, तत्पश्चात् साधक गोल सुपारी में मोली लपेट कर, महाकाली सिंहासन के सामने केले के पत्ते पर रखें और उनपर भगवान गणेश के रूप का ध्यान कर पूजन करें। किसी भी उपासना या तांत्रिक सिद्धि साधना आरम्भ में सर्वप्रथम भगवान श्री गणेश की पूजा की जाती है, तभी साधक को उपासना या सिद्धि साधना में सफलता मिलती है।
श्री गणेश पंचोपचार पूजन
[ आवाहन मंत्र ]
गदा बीज बीज पूरे धनुः शूल चक्रे सरोजोत्पले पाशधान्या ग्रदंतान्।
करैः संदधानं स्वशुंडा ग्रराजन मणीकुंभ मंकाधि रूढं स्वपत्न्या॥
सरोजन्मा भूषणानाम्भ रेणोजचलं ह्रस्तन्वया समालिंगिताम्।
करीद्राननं चंद्रचूड़े त्रिनेत्र जगन्मोहनं रक्तकांतिं भजेत्तमम्॥
भावार्थ – “अपने दाएँ हाथों में गदा, शूल, बीजपूर, चक्र, पद्म व बाएं हाथों में धनुष, कमल और पाश, धान्य मंजरी एवं दन्तधारी, मणि कलश से सुशोभित, सूंड के के अग्र भाग वाले, अंक में अपनी पत्नी को बैठाए हुए तीन त नेत्रों वाले, गजमुखी, चंद्रकला धारी, त्रैलोक्य को मोह लेने वाले, रक्तवणी कांति से शोभायमान भगवान गणपति मेरे पूजन स्थल में सिद्धि साधना में सफलता देने हेतु दयाकर पधारने की कृपा करें। मैं आपका ध्यान करता हूँ।”
नोट- अब मोली लिपटे सुपारी के ऊपर क्रमशः जल, अक्षत, मोली, चन्दन, बिल्वपत्र पुष्प और नैवेद्य से क्रमशः भगवान गणेश का पूजन करें।
ॐ गंगाजले स्नानियम् समर्पयामि श्री गणेशाय नमः।
ॐ अक्षतम् समर्पयामि भगवते श्री गणपति नमः।
ॐ वस्त्रम समर्पयामि भगवान श्री गणपति नमः।
ॐ चन्दनम् समर्पयामि भगवन गणपति यहा गच्छ इहतिष्ठ।
ॐ बिल्वपत्रम समर्पयामि भगवते श्री गणपति नमः।
ॐ पुष्पम् समर्पयामि भगवन श्री गणेशाय नमः।
ॐ नैवेद्यं समर्पयामि भगवान गणपति यहा गच्छ इहतिष्ठ।
नोट- अब दोनों हाथ जोड़कर भगवान श्री गणेश की अराधना करें।
श्री गणेश अराधना मंत्र
विश्वेश माधवं दुन्दि दण्डपाणि।
बंदे काशी गुह्या गंगा भवानी मणिक कीर्णकाम्॥
क्रतुण्डं महाकाव्य कोटि सूर्य सम प्रभ।
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥
सुमश्वश्यैव दन्तस्य कपिलो गर्जकर्ण कः।
लम्बोदरस्य विकटो विघ्ननासो विनायकः॥
धूम्रकेतु र्गणाध्यक्ष तो भालचन्द्रो गजाननः।
द्वादशैतानि नमामि च पठेच्छणु यादपि॥
विद्यारम्भे विवाहे च प्रवेशे निर्गमे तथा।
संग्रामे संकटे चैव विघ्नस्तस्य न जायते॥
शुक्लां वर धरं देवं शशि वर्ण चतुर्भुजम्।
प्रसन्न वदनं ध्यायेत सर्वविघ्नोप शान्तये॥
अभित्सितार्थ सिद्धयर्थ पूजितो य सुरासुरैः।
सर्व विघ्नच्छेद तस्मै गणाधिपते नमः॥
हिन्दी अनुवाद – “हे विश्वनाथ, माधव दुण्डिराज गणेश, दण्डपाणि, भैरव, काशी, गुह्या, गंगा तथा भवानी कर्णिका का मैं वन्दना करता हूँ। टेढ़ी सूंड वाले गणपति देव। आप सर्वदा सदैव समस्त कार्यों में मेरे विघ्नों का निवारण करें।
सुमुख, एकदन्त, कपिल, गजकर्ण, लम्बोदर, विकट, विघ्ननाशक, विनायक, धूम्रकेतु, गणाध्यक्ष, भालचन्द्र और गजानन न-ये ये विवाह, गृह प्रवेश, यात्रा, संग्राम तथा संकट के अवसर पर इन बारह नामों का पाठ और श्रवण करता है, उसके कार्य में विघ्न उत्पन्न नहीं होता हैं।
शक्ल धारण करने वाले चन्द्रमा के समान और गोरे, चार भुजाधारी और प्रसन्न मुख वाले गणपति देव, मैं आपका ध्यान करता हूँ। हमारे सम्पूर्ण विघ्नों को शान्त करें।
देवताओं और असुरों ने भी अभिष्ट मनोरथ सिद्धि के लिए जिनकी पूजा की है, जो विघ्न बाधाओं को हरने वाले हैं, उन गणपति जी को नमस्कार है।”
नोट- साधको! साधना में सफलता के लिए श्री गणेश पूजन के पश्चात् “सिद्ध गुरू” का पूजन करें। साधना काल के आरम्भ में यदि गुरूदेव स्वयं उपस्थित हों तो उन्हें पीले रंग का वस्त्र (धोती 1 जोड़ा, चादर-1, बनियान-कुर्ता-11, जनेऊ और द्रव्यादि) प्रदान कर, उन्हें कारण कराकर, उनके चरणों की पूजा करें। यदि गुरूदेव उप्नस्थित न हों तो उनके द्वारा प्रदत्त “सिद्ध गुरू कवच यंत्र” तांबे के प्लेट में सिंहासन पर स्थापित कर, उन्हें गुरू स्वरूप समझकर पूजन करें। गुरू पूजन के बिना और श्री गणेश अराधना के बिना कोई भी साधक सिद्धि साधना में सफल हो ही नहीं सकता, अतः अवश्य ही गुरू पूजन करें।
इस पूजन के क्रम में सर्वप्रथम गुरू का “आवाहन” करें। गुरू यदि पूजन स्थल पर मौजूद हों तो गुरू में दिव्य शक्ति का आवाहन करें। यूं तो गुरू साधारण मानव दिखलाई पड़ते हैं, परन्तु जब गुरूदेव अपने आसन पर विराजमान होते हैं तो उनमें शक्ति का आवाहन होता है, तब वे साधारण इन्सान ही नहीं होते बल्कि उनमें ब्रह्मा, विष्णु और महेश से भी बढ़कर शक्ति आ जाती है। यदि गुरू उपस्थित न हों तो “गुरू कवच यंत्र” में गुरू स्वरूप का आवाहन करें।
श्री गुरुदेव आवाहन मंत्र
संहस्त्रदल पद्मस्थ मंतरात्मा नमुज्जवलम्।
तस्योपरि नादविंदो र्मध्ये सिंहासनोजवले॥
चिंतयेन्निज गुरूं नित्यं रजता चल सन्निभम्।
वीरासन समासीनं मुद्रा भरण भूषितम॥
शुभ्रमाल्यां बरधरं वरदा भय पाणिनम्।
वामोरूशक्ति सहितं कारुण्येना वलंकितम्॥
प्रियया सब्यहस्तेन धृत चारू कलेवरम्।
वामेनोत्पल समायुक्तं स्मरेतन्नाम पूर्वकम्॥
भावार्थ- हजार दल (पंखुड़ियों) युक्त कमल के बीच में ज्योतिस्वरूपा अंतरात्मा का निवास है। उसके ऊपरी भाग पर नाद व बिंदु के मध्य में उज्जवल सिंहासन पर श्री गुरू विराजमान हैं। चांदी के पर्वत समशुभ्र निजगुरू का सदैव स्मरण करता हूँ। हे गुरू देव! आप सदैव वीरासन मुद्रा में स्थित रहते हैं। आप मुद्रा भरणादि से विभूषित हैं। आप श्वेत माला धारण करते हैं और वस्त्र भी श्वेत हैं। आपके हाथ वर और अभय मुद्रा में उठे हैं। वाम उरू (बांईं जांघ) पर शक्ति है तथा आप करूणापूरित नेत्रों से देख रहे हैं। लाल वस्त्रों से सुशोभित व हाथ में कमल लिये प्रिया (लक्ष्मी) अपने दांए हाथ से कलेश्वर धारण किए हैं व लाल वस्त्रों से सुशोभित व ज्ञान शक्ति’ से आप सुशोभित हैं। ऐसे गुरूदेव का मैं आवाहन करता हूँ।
नोट- इसके पश्चात्-सिद्ध गुरू कवच यंत्र पर जल, अक्षत, चन्दन, पुष्प, बिल्वपत्र, नैवेद्य आदि से पूजन करें। यह “पंचोपचार पूजन” उसी प्रकार करें, जिस प्रकार “गणेश पूजन” में पंचोपचार पूजन सम्पन्न किए हैं। पूजन में श्री गणेशायः नमः के बदले “श्री गुरूवे नमः” बोले। इसके पश्चात् गुरू देव का ध्यान करें।
श्री गुरुदेव ध्यान मंत्र
गुरुः ब्रह्मा गुरुः विष्णुः गुरु र्देवो महेश्वरः।
गुरुः साक्षात पर ब्रह्म तस्मै श्री गुखे नमः॥
ध्यानमूल गुरोः मूर्तिः पूजा मूलं गुरोः पदम्।
मन्त्रमूलं गुरोर्वाक्यं मोक्षमूलं गुरो कृपा॥
न गुरोरधिकं तत्वं न गुरोरधिकं तपः।
गुरोः परतरं नास्ति तस्मात्सम्पूज्यते गुरुः॥
नमामि सद्गुरूं शान्तं प्रत्तक्षं शिवं रूपणिम्।
शिख्सा यज्ञपीठस्थं तस्मै श्री गुरूवे नमः॥
त्वं पिता त्वं च मे माता त्वं बन्धु त्वं च देवता।
त्वं मोक्ष प्राप्ति हेतुश्चे तस्मै श्री गुरवे नमः॥
पृथ्वी शुद्धि मंत्र
ॐ अपर्षन्तु ये भूता ये भूता भूवि संस्थिता।
ये भूता विघ्नकर्ता रश्ते नश्यन्तु शिवाज्ञया॥
नोट- अब पूजन का “संकल्प” करें-
इस संदर्भ में दाहिने हाथ की अंजुली पर पान, सूपारी द्रव्य, गंगाजल, अक्षत, पुष्प, तिल लेकर निम्नलिखित मंत्र का उच्चारण करें। संकल्प मंत्र के मध्य जहां-जहां भी “अमुक” शब्द का उच्चारण किया गया है, वहां क्रमशः मास, तिथि, नक्षत्र, करण, राशि, निवास स्थान आदि उच्चारण करें।
महाकाली पूजन “संकल्प” मंत्र
👉 ध्यान दें:- संकल्प लेने या संकल्प मंत्र पढ़ने से पूर्व उपर दिए गये बटन को दबा कर संकल्प लेख्यांकित अवस्य करें, अन्यथा यह संकल्प मंत्र अशुद्ध होगा। साथ ही यह संकल्प मंत्र केवल हिन्दुस्तान मे जन्में व्यक्ति विषेश के लिए ही मान्य है।
अपने दाहिने हाथ में जल, पुष्प, अक्षत व द्रव्य लेकर श्री महालक्ष्मी आदि के पूजन का संकल्प करें।
ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णु:, ॐ तत्सदद्य श्री पुराणपुरुषोत्तमस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य ब्रह्मणोऽह्नि द्वितीय पराद्र्धे श्री श्वेतवाराहकल्पे सप्तमे वैवस्वतमन्वन्तरे, अष्टाविंशतितमे कलियुगे, कलिप्रथम चरणे जम्बुद्वीपे भरतखण्डे आर्यावर्तान्तर्गत ब्रह्मवर्तैकदेशे पुण्य क्षेत्रे बौद्धावतारे वीर विक्रमादित्यनृपते : , तमेऽब्दे प्लवंग नाम संवत्सरे दक्षिणायने ऋतो महामंगल्यप्रदे मासानां मासोत्तमे मासे पक्षे तिथौ वासरे गोत्रोत्पन्नोऽहं अमुकनामा सकलपापक्षयपूर्वकं सर्वारिष्ट शांतिनिमित्तं सर्वमंगलकामनया– श्रुतिस्मृत्योक्तफलप्राप्त्यर्थं मनेप्सित कार्य सिद्धयर्थं प्रचर्चापरि आयुरारोग्यैश्वर्याधभिवृद्धयर्थम् मनोकामना पूर्ति, धन, जन, सुख सम्पदा प्रसन्नता परिवार सुख शान्ति, ग्राम सुख शान्ति हेतु, सफलता हेतु श्री पूजन-कलश स्थापन-हवन-कर्म-आरती कर्म अहम् करिष्ये।
“स्वस्ति वाचन” के ग्यारह मंत्र पढ़ें। इस मंत्र का उच्चारण करते समय उपासक नोट-हथेली की वस्तुएं माता जी के सिंहासन पर समर्पित कर दें। अब आप हाथ में चावल लेकर-दो चार दाने कर पूजा स्थल के सिंहासन पर छिडकते जाएं, यह चावल तब तक छिडकते रहें जब तक सम्पूर्ण (ग्यारह) मंत्र पढ़कर पूर्ण न कर लें।
“स्वस्ति वाचनम” के पांच मंत्र
(पहला मंत्र)
ॐ स्वस्तिनः इन्द्रो पढश्रवा स्वस्तिनः पूषा विश्ववेदाः।
स्वस्तिन स्ताक्षर्यो अरिष्टनेमिः स्वस्तिनो बृहस्पतिर्दधातु॥
हिन्दी अनुवाद- अत्यन्त यशस्वी इन्द्र हमारा कल्याण करने वाले हों। जिनके संकट नाशक चक्र को कोई रोक नहीं सकता वह परमात्मा गरुड़ और बृहस्पति हमारा कल्याण करें।
(यं० वे० २५/१९/ से प्राप्त)
(दूसरा मंत्र)
पचः पृथिव्यां पचः ओषधिषु पयो दिव्यन्त।
रिले पयोधाः पश्यवति प्रदिशाः सन्तु मह्यम॥
हिन्दी अनुवाद- हे अग्ने तुम पृथ्वी में रस को धारण करो, औषधि में रस की स्थापना करो, स्वर्ग में और अन्तरिक्ष में भी रस को स्थापित करें। मेरे लिए दिशा-प्रदिशा सभी रस देने वाले हो।
(य० वे० १८/३९/ से प्राप्त)
(तीसरा मंत्र)
ॐ द्यौः शान्ति रन्तरिक्षग्वं शान्तिः पृथिवी शान्तिः रापः शान्तिः रोषधयः शान्तिर्वनस्पतयः शान्तिः विश्व देवाः शान्ति ब्रह्म शान्तिः स्वग्वं शान्तिः शान्ति रेव शान्तिः सामा शान्तिः शान्ति रेधि। सुशान्ति-र्भवतु॥
हिन्दी अनुवाद- स्वर्ग, अन्तरिक्ष और पृथ्वी शान्त रूप हो। जल औषधि, वनस्पति, विश्व देवता, ब्रह्म रूप ईश्वर, सब संसार शान्ति रूप हो, जो साक्षात शान्ति है, वह भी मेरे लिए शान्ति देने वाली हो।
(य० बे० ३६/१७/ से प्राप्त)
(चौथा मंत्र)
इमा रुद्राय तवसे कपर्दिने क्षयद्विराय प्रभरामहे मतीः।
यथा शमशादि द्विपदे चतुष्पदे विश्वं पुष्टं ग्रामे अस्मिन नातुरम॥
हिन्दी अनुवाद- पुत्रादि मनुष्यों और गादि मनुष्यों में जैसे कल्याण की प्राप्ति हो और इस ग्राम के मनुष्य उपद्रव से रहित हों, उसी प्रकार मैं अपनी श्रेष्ठ मतियों को जटाधारी रूद्र के निमित्त अर्पित करता हूं।
(य० बे० १६/४८/ से प्राप्त)
(पांचवां मंत्र)
ॐ गणानात्वा गणपति ग्वं हवामहे प्रिया नांत्वा प्रियपति ग्वंहवामहे निधिनांत्वा निधिपति ग्वं हवामहे वसो नम।
आहम जानि गर्भध मात्व मजासि गर्भधम्॥
हिन्दी अनुवाद- हे गणपति! तुम सब गणों के स्वामी हो, हम तुम्हें आहुत करते हैं। प्रियों के मध्य निवास करने वाले प्रियों के स्वामी हम तुम्हें आहुत करते हैं। हे निधियों के मध्य निवास करने वाले निधिपते! हम तुम्हें आहुत करते हैं। तुम श्रेष्ठ निवास करने वाले रक्षक होओ। मैं गर्भधारण जल को सब प्रकार से आकर्षित करते हैं, तुम गर्भधारण करने वाले को अभिमुख करते हो। तुम सब पदार्थों के रचयिता होते हुए सब प्रकार से अभिमुख होते हो।
(य० ब० २३/१९/ से प्राप्त)
नोट- उपासको! इसके पश्चात् भगवान विष्णु का पूजन करें। किसी भी पूजन में गणपति पूजन के बाद भगवान विष्णु एवं पंच देवता की पूजा की जाती है। इस संदर्भ में केले के पत्ते पर सिंहासन के दाहिने तरफ पांच पान के पत्ते, पांच सुपारी और नैवेद्य रखें और उसी पर भगवान विष्णु एवं पंचदेवता की पूजा करें। इस क्रम में सर्वप्रथम दाहिने हाथ की अंजुली में जल लेकर निम्न मंत्र पढ़ें, मंत्र समाप्ति के बाद जल पान पत्ते पर रख दें। इसी प्रकार क्रमशः अक्षत, तिल, चन्दन, बिल्वपत्र, पुष्प, तुलसी दल, नैवेद्य और पुनः जल से पूजन करें।
भगवान विष्णु एवं पंचदेवता का पूजन
गंगा जल से- ॐ गंगाजले स्नानियम् भगवते श्री विष्णवे नमः।
अक्षत से- इदम् अक्षदम् समर्पयामि भगवते श्री विष्णवे नमः।
तिल से- एते तिला समर्पयामि भगवते श्री विष्णवे नमः।
चन्दन से- इदम् चन्दनम लेपनम समर्पयामि भगवते श्री विष्णवे नमः।
बिल्वपत्र से- इदम बिल्व पत्राणियम समर्पयामि भगवते श्री विष्णवे नमः।
पुष्प से- इदम् पुष्पम् समर्पयामि भगवते श्री विष्णवे नमः।
नैवेद्य से- इदम नैवेद्यं समर्पयामि भगवते श्री विष्णवे नमः।
पुनः गंगाजल से- एतानि गंध पुष्प धूप दीप ताम्बूल यथा भाग नैवेद्यानि भगवते श्री विष्णेव नमः।
नोट- उपरोक्त विधि और मंत्र से ही “पंचदेवता” का पूजन उसी स्थान पर करें। पूजन के अन्तर्गत जहां “विष्णवे नमः” शब्द कहा गया है उस स्थान पर “पंचदेवता नमः” शब्द उच्चारण करें।
पंचदेवता पूजन समाप्त होने के पश्चात् माता काली जी के “कलश” की स्थापना करें।
माता काली कलश स्थापना विधि और कलश पूजन
नोट- सर्वप्रथम सतंरगे गुलाल से अष्टदल कमल पूजा स्थल पर माता काली सिंहासन के आगे बनावें। पश्चात् शुद्ध मिट्टी या जौ का थड़ा बनावें। उस थड़ा के मध्य सिन्दूर से पांच तिलक किया हुआ जल हुआ जल से भरा घड़ा रखें। तत्पश्चात् कलश के पेंदे के पास हाथ रखकर यह मंत्र पढ़ें-
कलश भूमि स्पर्श मंत्र
ॐ भूरसि भूमिरस्य दितिरसि विश्वछाया विश्वस्य भुवनश्य धत्रीं पृथिवीं दुर्खाहं पृथिवीं मां हिसी।
नोट- इसके पश्चात् कलश के मुख को दाहिनी हथेली से बन्द करके निम्नलिखित मंत्र पढ़े-
ॐ वरुणस्योत्तम्भ वरुणस्य स्कम्भ सर्जनी स्थां वरुणस्य ऋतसदन्यसि वरुणस्य ऋतसदनमीस वरुणस्य ऋतसदनमासीद्।
नोट- अब कलश में सर्वोसधि डालें।
कलश सर्वोसधि समर्पण मंत्र
ॐ या औषधि पूर्वाजाता देवेभ्य स्वियुगम्पुरा।
मनैनुवभ्रणामहग्वं शतन्धामणि सप्त च॥
नोट- कलश में दुर्वा डालें।
कलश दुर्वादल समर्पण मंत्र
ॐ काण्डात-काण्डात प्ररोहन्ति पुरुषः परुषस्परि।
एवानो दुर्वेप्रतनु सहस्त्रेण शतेन च॥
नोट- कलश में पुंगीफल (सुपारी) डालें-
कलश पुंगीफल समर्पण मंत्र
ॐ या फलिनीयां अफलां अपुष्पा यास्य पुविषणीः।
बृहस्पतिः प्रसूतास्तानो मुञ्चनत्वग्वं हसः॥
नोट- अब कलश में पंचतत्न डालें-
कलश पंचरत्न समर्पण मंत्र
ॐ परिवाज पतिः कविग्नि र्हव्यान्य क्रमी दधद्रत्नानि दाशुषे।
अब कलश में सुवर्ण या द्रव्य डालें-
कलश द्रव्य समर्पण मंत्र
ॐ हिरण्यगर्भः समवर्त्ततार्गे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत्।
स दाधार पृथिवीद्या मुतोमाङ्ङ्ग कस्मै देवाय हविषा विधेम॥
अब कलश में आम का पल्लव डालें-
आम्र पल्लव समर्पण मंत्र
ॐ अम्बे अम्बिके अम्बालिके नमानयंति कस्यद्।
किंजिद वासिनं कलशं दद्यात॥
नोट- अब कलश पे पानी वाला नारियल रखें-
कलश श्री फल समर्पण मंत्र
ॐ श्रीश्चते लक्ष्मीश्य पत्न्या बहोरात्रो पार्श्वे नक्षत्राणि रूप मश्विनो व्याप्तम।
इष्पान्नि षाणां मुम्म इषाण सर्व लोकम्प ईषाण॥
नोट- कलश में लाल वस्त्र एवं मौली लपेटें।
कलश वस्त्र समर्पण मंत्र
ॐ वस्त्रो पवित्रमसि शतधारं वसो पवित्र मसि सहस्त्र धारम।
देवस्त्वा सविता पुनातु वसोः पवित्रेण शतधारेण सुत्वा काम धुक्षः॥
नोट- अब कलश के साथ गाय का गोबर स्पर्श करावें।
कलश में गाय का गोबर स्पर्श मंत्र
ॐ मानस्तोषे तनयेमान आयुष्मान व्यर्दिवृविषः सदमित्वा हवामहे इति गोमयेन कलश स्पर्शयेत।
नोट- अब हाथ जोड़कर वरुण देव का आवाहन करें-
श्री वरूण देव आवाहन मंत्र
ॐ तत्वा यामि ब्रह्मणा वन्दमानस्त यजमानो हविर्भिः।
अहेऊ मानो वरूणेह बोध्युषग्वं आयुः प्रमोषि॥
ॐ भूर्भुवः स्वः भो वरूण इहतिष्ठ। स्थापयामि पूजयामि।
नोट- इसके पश्चात् सम्पूर्ण तीर्थ एवं नदियों का कलश पे आवाहन करें-
सम्पूर्ण तीथों एवं नदियों का आवाहन
ॐ सर्वे समुद्रा सरितसंतिर्थानी जलदाः नदाः आयान्तु देविः पूजार्थ दुरितक्ष्कारकाः।
कलशस्य मुखे विष्णुः कण्ठे रूद्रः समाश्रितः॥
कलश प्राण प्रतिष्ठा मंत्र
नोट- निम्न मंत्र पढ़ते हुए कलश पर अक्षत छिड़कें-
ॐ मनोजूतिर्जुषताभाज्यस्य बृहस्पति र्यज्ञामिवं तनोत्व रिष्टं यज्ञ सीममं दधातु।
विश्व देवास इह महाकाली महाकाल सर्व देव सवेदेवि मादयन्तामे इह प्रतिष्ठ॥
नोट- अब कलश पर वरूण देव, नवग्रह, इष्टदेव लक्ष्मी, सरस्वती, नवदुर्गा, राम, लक्ष्मण, सीता, हनुमान, राधा-कृष्ण, ग्राम देवता, कुदेवता, भगवान शिव, गौरी, आदि समस्त देवि-देवताओं की पूजा इस प्रकार करें जैसे पीछे भगवान विष्णु का पूजन किए हैं। तत्पश्चात् माता काली का आवाहन करें।
माता काली आवाहन मंत्र
आगच्छ वरदे देवि दैत्यदर्प निषूदिनि।
पूजां गृहाण सुमुखि नमस्त शंकर प्रिये॥
नोट- सिंहासन पर बिछे वस्त्र का स्पर्श करते हुए यह मंत्रोच्चारण करें-
महाकाली आसन समर्पण मंत्र
ॐ विचित्र रत्न खचितं दिव्यास्तरण संयुक्तम्।
स्वर्ण सिंहासन चारू गृहीष्व महाकाली पूजितः॥
हिन्दी अनुवाद- हे मातेश्वरी काली माता! यह सुन्दर स्वर्णमय सिंहासन ग्रहण कीजिए, इसमें विचित्र रत्न जड़े गये हैं, तथा इस पर दिव्य बिस्तर बिछा हुआ है।
नोट- अब हाथ की अंजुली में जल लेकर निम्न मंत्र पढ़े, मंत्र समाप्त होते ही जल सिंहासन पर छोड़ दें।
पाद्य जल समर्पण मंत्र
ॐ सर्वतीर्थ समूद भूतं पाद्यं गन्धदिभिर्युतम।
अनिष्ट हर्त्ता गृहाणेदं भगवति भक्त वत्सला॥
ॐ श्री दक्षिणा काली नमः। पादयोः पाद्यं समर्पयामि॥
हिन्दी अनुवाद- हे भक्त वत्सला माता काली! यह सारे तीर्थों के जल से तैयार किया गया तथा गंध (चन्दन) आदि से मिश्रित पाद्य जल, पैर पखारने हेतु ग्रहण करे।
नोट- पुनः अरघी से चन्दन युक्त जल सिंहासन पर निम्न मंत्र उच्चारण कर समर्पित करें।
माता काली को अर्घ्य समर्पण मंत्र
ॐ श्री मातेश्वरी दक्षिणा कालिकाय नमस्तेस्तु गृहाण करूणाकारी।
अध्यं च फलं संयुक्तं गंधमाल्याक्षतै-युतम्॥
हिन्दी अनुवाद- हे माता दक्षिणा काली! आपको नमस्कार है। आप गन्ध, पुष्प अक्षत और फल आदि रसों से युक्त यह अर्ध्य जल स्वीकार करें।
नोट- अब निम्न मंत्र उच्चारण करते हुए अरघी से तीन बार जल सिंहासन पर छोड़ें।
माता काली को आचमन कराने का मंत्र
मातेश्वरी दक्षिणा कालिका नमस्तुभ्यं त्रिदेशेरेभिवन्ति।
गंगोदकेन देवेशि कुरुष्वा चमनं भगवतिः॥
श्री माता काली नमः। आचमनीयं जलं समर्पयामि॥
हिन्दी अनुवाद- हे शिव महाशक्ति भगवती काली मां! आपको नमस्कार है। आप गंगाजल से आचमन करें।
नोट- इसके पश्चात् अरघी में दूध भरकर माता काली की प्रतिमा को स्नान करावें।
माता काली को दूध से स्नान कराने का मंत्र
भगवति कामधेनु समुदभूतं सर्वेषां जीवन परम्।
पावनं यज्ञाहेतुश्य पयः स्नानार्थं समर्पितम्॥
हिन्दी अनुवाद- हे भगवती! काम धेन के थन से निकला, सबके लिए पवित्र, जीवन दायी तथा यज्ञ के हेतु यह दुग्ध आपके स्नान हेत समर्पित है।
नोट- अब अरघी में दही लेकर माता काली को स्नान करावें।
दधि स्नान मंत्र
शिवा भवानी पयस्तु समुदभुतं मधुराम्लं शशिप्रभम्।
ध्यानीतं मया देवि स्नानार्थ प्रतिगृहयन्ताम्॥
हिन्दी अनुवाद- हे शिवा भवानी महेश्वरी काली जी! यह दूध से निर्मित खट्टा-मीठा चन्द्र के समान उजला दही ले आया हूँ। आप इससे स्नान कीजिए।
नोट- इसके पश्चात् अरघी में गाय का घी लेकर माता काली को स्नान कराईये।
माता काली को घृत से स्नान कराने का मंत्र
भो भगवती नवनीत समुत्पन्नं सर्वसंतोष कारकम्।
धृतं तुभ्यं प्रदास्यामि स्नानार्थं प्रतिगृहयन्ताम्॥
हिन्दी अनुवाद- हे खड़ग वाली माँ! मक्खन से उत्पन्न तथा सबको संतुष्ट करने वाला यह गाय का घृत आपको अर्पित करता हूँ। आप इससे स्नान कीजिए।
नोट- अब अरघी में शहद भरकर माता काली को स्नान करावें।
माता काली को शहद से स्नान कराने का मंत्र
मधु। भो खप्पड़वाली मातुः पुष्प रेणु समुद भूतं सुस्वादु मधुरं।
तेज पुष्टि करं दिव्यं स्नानार्थं प्रतिगृहयन्ताम॥
हिन्दी अनुवाद- हे खप्पड़वाली माता जी! पुष्प के पराग से उत्पन्न, तेज की पुष्टि करने वाला दिव्य स्वादिष्ट मधु आपके समक्ष प्रस्तुत है, इसे स्नान के लिए ग्रहण करें।
नोट- इसके पश्चात् शक्कर घोले रस से माता काली को स्नान करावें।
शुभा। शर्करा रस से स्नान कराने का मंत्र
मुण्डमालिनी मातेश्वरी इक्षुसार समुद भुतं शर्करा पुष्टिवा।
मलाप हारिका दिव्यं स्नानार्थं प्रतिगृहयन्ताम्॥
हिन्दी अनुवाद- हे मुण्डमालिनी मातेश्वरी काली माँ! ईख के सार तत्व से यह शर्करा रस निर्मित है, जो पुष्टि कारक, शुभ तथा मैल को दूर करने वाली है, यह दिव्य शर्करा रस आपकी सेवा में प्रस्तुत है।
नोट- अब माता काली की प्रतिमा को पुनः गंगा जल से स्नान करावें।
शुद्धोदक स्नान मंत्र
गंगा च यमुनाचैव गोदावरी सरस्वती।
नर्वदा सिन्धु कावेरी स्नानार्थं प्रतिगृहयन्ताम्॥
हिन्दी अनुवाद- हे दयामयी अम्बे! यह शुद्ध जल के रूप में गंगा, यमुना, गोदावरी, नर्वदा, सिन्धु और कावेरी यहां विद्यमान हैं। शुद्धोदक स्नान के लिए यह जल ग्रहण करें।
नोट- अब माता जी के उपर सुगन्धित इत्र छिड़कें।
सुवासित स्नान मंत्र
चम्पा काशोक सकुल मालती मोगरादिर्भिः।
वासित स्निग्धता हेतु तैल चारू प्रतिगृहयन्ताम्॥
हिन्दी अनुवाद- हे भक्त रक्षिका काली माता जी! चम्पा, अशोक, मौलसरी, मालती और मोगरा आदि से वासित तथा चिकनाहट के हेतु यह तेल और इत्र आप ग्रहण करें।
माता काली को वस्त्र समर्पण मंत्र
भो भक्तप्रिया मातुः शीतवातोष्ण संत्राणं।
लज्जाया रक्षणं परम देव लंकारणं वस्त्रभतः शान्ति प्रयच्छ मे॥
हिन्दी अनुवाद- हे भक्तप्रिया मातेश्वरी यह वस्त्र आपकी सेवा में समर्पित है। यह सर्दी गर्मी, हवा से बचाने वाला, लज्जा का उत्तम रक्षक तथा शरीर का अलंकार है, इसे ग्रहण कर हमें शान्ति प्रदान करें।
नोट- अब प्रतिमा के मस्तक में चन्दन लगावें।
चन्दन समर्पण मंत्र
श्री खण्ड चन्दनं दिव्यं गंधादयं सुमनोहरम्।
विलेपन दक्षिणा कालीः चन्दनं प्रतिगृहयन्ताम्॥
हिन्दी अनुवाद- हे करुणामयी दक्षिणा काली माँ! यह दिव्य श्री खण्ड रक्त चन्दन सुगंध से पूर्ण तथा मनोहर है। विलेपन के लिए यह चन्दन स्वीकार करें।
नोट- अब माता काली जी के ऊपर अक्षत छिड़कें।
माता काली जी को अक्षत समर्पण मंत्र
अक्षतास्य भगवतिः कंकु भाक्त सुशोभिताः।
मया निवेदिता भक्त्त्या गृहाण परमेश्वरि॥
हिन्दी अनुवाद- हे परमेश्वरी! ये कुंकुम (लाल गुलाल) में रंगे हुए सुन्दर अक्षत हैं, आपकी सेवा में समर्पित करता हूँ, इन्हें ग्रहण कीजिए।
नोट- अब माता काली को बिल्वपत्र एवं पुष्प चढ़ाइये।
बिल्वपत्र एवं पुष्प समर्पण मंत्र
बन्दारूज नाम्बदार मन्दार प्रिये धीमहि।
मन्दार जानि रक्त पुष्पाणि स्वेताकार्दीन्मुपेहि भो॥
हिन्दी अनुवाद- वन्दना करने वाले भक्तों के लिए मन्दार कल्प वृक्ष के समान कामना पूरक है। हे मन्दार प्रिये माहेश्वरी काली जी. मन्दार तथा लाल पुष्प आप कृपया ग्रहण करें।
माता काली जी को पुष्प माला अर्पण मंत्र
भगवतिः माल्यादीनि सुगन्धिनि माल्यादीनि वै देविः।
मयाहृतानि पुष्पाणि गृहायन्ता पूजनाय भो॥
हिन्दी अनुवाद- हे भगवती! लाल पुष्प मालती इत्यादि पुष्पों की मालाएं और पुष्प आपके लिए लाया हूँ, आप इन्हें पूजा के लिए ग्रहण करें।
माता काली जी को सिन्दूर समर्पण मंत्र
सिन्दूरं शोभनं रक्तं सौभाग्यं सुख वर्द्धनम्।
शुभदं कामदं चैव सिन्दूरं प्रति गृह यन्ताम्॥
हिन्दी अनुवाद- हे मातेश्वरी चण्डिक! सुन्दर लाल, सौभाग्य सूचक, सुखवर्द्धन, शुभद, तथा काम पूरक सिन्दूर आपकी सेवा में अर्पित है। इसे स्वीकार करें।
नोट- इसके पश्चात् माता जी के चरणों में लाल गुलाल समर्पित करें।
लाल गुलाल अर्पण मंत्र नाना परिमले र्दव्यौ निर्मितं चूर्णमुत्तमम्।
गुलाल नामकं चूर्ण गन्धाढ्यं चारू प्रति गृह यन्ताम॥
हिन्दी अनुवाद- हे मंगला काली माँ! तरह-तरह के सुगन्धित द्रव्यों से निर्मित यह गन्ध युक्त गुलाल नामक उत्तम चूर्ण ग्रहण कीजिए।
नोट- अब माता काली को सुगन्धित धूप या अगरबत्ती दिखावें।
सुगन्धित धूप अर्पण मंत्र
वनस्पति, रुसोद, भूतो गन्धाढ्यो गन्ध उत्तमः।
आधेयः सर्वदेवानां धूपोढ्यं प्रतिगृह यन्ताम्॥
हिन्दी अनुवाद- हे भक्तवत्सला भगवती! वनस्पतियों के रस से निर्मित सुगन्दित उत्तम गन्ध रूप और समस्त देवि-देवताओं के सूंघने योग्य यह धूप आपकी सेवा में अर्पित है, इसे ग्रहण करें।
नोट- अब माता जी को प्रज्जवलित दीप दिखावें।
माता काली जी का दीप दर्शन मंत्र
साज्यं य वर्तिसंयुक्त वहिनां योजितं मया।
दीप गृहाण त्रैलोक्य तिमिरापहम्॥
भक्त्या दीपं प्रयच्छामि देवि महेश्वरी।
त्राहि मां निरयाद् घोरा हो पञ्चोतिर्न भोस्तुतते॥
हिन्दी अनुवाद- हे मातेश्वरी! घी में डुबोई रूई की बत्ती को अग्नि से प्रज्जवलित करके दीपक आपकी सेवा में अर्पित कर रहा हूँ। इसे ग्रहण कीजिए। यह दीप त्रिभुवन के अन्धकार को मिटाने वाला है। मैं अपनी माता श्री दक्षिणा काली को यह दीप अर्पित करता हूँ। हे देवि! आप हमें घोर नरक से बचाइये।
नोट- इसके पश्चात् विभिन्न प्रकार की मिठाईयां व नाना प्रकार के फल नैवेद्य समर्पित करें।
नैवेद्य समर्पण करने का मंत्र
नैवेद्य गृह यन्ताम देविः भक्ति में हृाचलं कुरू।
इप्सित में वरं देहि परत्र च परां गतिम्॥
शर्करा खण्ड खाद्यानि दीव्यक्षीर घृताणि च।
आहारं भक्ष्य भोज्यं च नैवेद्यं प्रति गृहयन्ताम्॥
हिन्दी अनुवाद- हे भक्तवत्सला माहेश्वरि! आप यह नैवेद्य ग्रहण करें तथा मेरी भक्ति को अविचल करें। मुझे वांछित वर दीजिए और परलोक में परम गति प्रदान कीजिए। शक्कर व चीनी से तैयार किए गये खाद्य पदार्थ दही, दूध, घी, एवं भक्ष्य भोज्य विभिन्न फल आहार नैवेद्य के रूप में अर्पित है, इसे स्वीकार कीजिए।
नोट- अब सिंहासन पर पान बीड़ा चढ़ावें।
पान बीड़ा समर्पण मंत्र
ॐ पूंगीफल मर्यादव्यं नागवल्ली दलैर्युतम्।
एला चूर्णादि संयुक्तं ताम्बूलं प्रतिगृहयन्ताम्॥
हिन्दी अनुवाद- हे दया सिन्धु मातेश्वरी काली! महान दिव्य पूंगीफल, इलायची, और चूना आदि से युक्त पान का बीड़ा आपकी सेवा में अर्पित है, इसे ग्रहण करें।
नोट- इसके पश्चात् माता जी को नारियल फल सिंहासन पर भेंट करें।
नारियल फल अर्पण मंत्र
इदं फलं मया भगवति स्थापित पुरतस्तव।
तेन मे सफलावाति र्भवेज्जन्मनि जन्मनि॥
हिन्दी अनुवाद- हे सर्व सुख दात्री माता काली जी! यह नारियल फल मैंने आपके समक्ष समर्पित किया है, जिससे हमें जन्म-जन्मांतर तक आप हमें सफलता प्रदान करें।
नोट- इसके बाद द्रव्य आदि दक्षिणा सिंहासन पर समर्पित करें।
माता काली को दक्षिणा अर्पण मंत्र
हिरण्यगर्भ गर्भस्यं हेम बीजं विभावसोः।
अनंत पुण्यं फल दमतः शान्ति प्रयच्छमे॥
हिन्दी अनुवाद- हे दयालु माता! सुवर्ण हिरण्य गर्भ ब्रह्मा के गर्भ से स्थित अग्नि का बीज है। यह अनन्त पुण्य फलदायक है। परमेश्वरि! यह आपकी सेवा में अर्पित है। इसे ग्रहण कर हमें शान्ति प्रदान करें।
नोट- इसके पश्चात् दोनों हथेलियों में पुष्प भरकर, मंत्र पढ़ने के पश्चात् माता की पुष्पांजलि समर्पित खड़े होकर करें।
पुष्पांजलि समर्पण मंत्र
नाना सुगन्धि पुष्पाणि यथा कलोद् भवा च।
पुष्पांजलि र्मया दत्तौ गृहाण परमेश्वरिः॥
हिन्दी अनुवाद- हे परमेश्वरि! यथा समय पर उत्पन्न होने वाले तरह-तरह के सुगन्धित पुष्प मैं पुष्पांजलि के रूप में अर्पित कर रहा हूँ, इन्हें स्वीकार कीजिए।
नोट- अब हाथ जोड़कर खड़े होकर माता काली जी के सिंहासन या प्रतिमा के चारों ओर घूम-घूम कर पांच बार “प्रदक्षिणा” करें और निम्नलिखित मंत्र उच्चारण करते रहें।
प्रदक्षिणा मंत्र
यानि कानि च पापानि च ज्ञाताज्ञात कृताणि च।
तानि सर्वाणि नश्यन्ति प्रदक्षिणा पदे-पदे॥
हिन्दी अनुवाद- हे कृपालु माता जी! मनुष्यों से जाने-अनजाने में जो पाप हो जाते हैं, वे पाप आपकी परिक्रमा करते समय पद-पद पर नष्ट हो जाते हैं।
नोट- इसके पश्चात् गड़वी में जल भरकर बूंद-बूंद सिंहासन के पास गिरावें और निम्न मंत्र का उच्चारण करें।
माता काली को विशेष अर्घ्य अर्पण मंत्र
रक्ष रक्ष भक्तवत्सला रक्ष त्रिलोक्य रक्षिकाः।
भक्तानां भयं कर्त्ता त्राता भाव भवार्णवात्॥
हिन्दी अनुवाद- हे त्रिलोक की रक्षा करने वाली माँ काली जी! रक्षा कीजिए रक्षा कीजिए रक्षा कीजिए। आप भक्तों को अभय देने वाली और भव सागर से उनकी रक्षा करने वाली हैं।
नोट- इसके पश्चात् माता काली के 108 नामों का पाठ करें।
माता काली के 108 नामों की जप माला
(धन, वैभव, समृद्धि, सम्मान एवं यश प्राप्ति हेतु)
(भैरव उवाच)
शतनाम प्रवक्ष्यामि कालिकाया वरानने।
यस्य प्रपठनाद् वाग्मी सर्वत्र विजयी भवेत॥
काली कपालिनी कान्ता कामदा काम सुन्दरी।
कालरात्रिः कालिका च काल भैख पूजिता॥
कुरूकुल्ला कामिनी च कमनीय स्वभाविनी।
कुलीनाकुलकत्री च कुलवत्र्म प्रकाशिनी॥
कस्तुरी रस नीला च काम्या कामस्वरूपिणी।
ककार वर्णा निलया कामधेनुः करालिका॥
कुलकान्ता करालास्या कार्मात्ता च कलावती।
कुशोदरी च कामाख्या कौमारी कुलपालिनी॥
कुलजा कुलकन्या च कलहा कुलपूजिता।
कामेश्वरी काम कान्ता कुञ्जरेश्वर गामिनी॥
कामदात्री कामही कृष्णा च कपर्दिनी।
काश्यपी कृष्ण माता च कुलिशांगी कला तथा।
क्रीं रूपा कुलगम्या च कमला कृष्णपूजिता॥
कृशांगी किन्नरी कत्रीं कलकण्ठी च कार्तिकी।
कुमुदा कृष्णदेहा च कालिन्दी कुलपूजिता॥
कम्बुकण्ठी कौलिनी च कुमुदा काम जीविनी॥
कुलस्त्री कीर्तिका कृत्या कीर्तिश्च कुल पालिका।
कामदेव कला कल्पलता कामांग वर्द्धिनी॥
कुन्ती च कुमुदप्रीता कदम्ब कुसुमोत्सुका।
कादम्बिनी कमलिनी कृष्णा नन्द प्रदायिनी॥
कुमारी पूजनरता कुमारी गण शोभिता।
कुमारीञ्चनरता कुमारी व्रत धारिणी॥
कंकाली कमनीया च काम शास्त्र विशारदा।
कपाल खटवाङ्गधरा कलि भैरव रूपिणी॥
कोटरी कोटराक्षी च काशी कैलाश वासिनी।
कात्यायिनी कार्यकरी काब्य शास्त्र प्रमोदिनी॥
कामाकर्षण रूपा च कामपीठ निवासिनी।
कंगिनी काकिनी कुत्सिता कलह प्रिया॥
कुण्ड गोलोद् भवप्राणा कौशिकी कीर्तिवर्द्धिनी।
कुम्भस्तनी कटाक्षा च काव्या कोकनद प्रिया॥
कान्तार वासिनी कान्तिः कठिना कृष्ण वल्लभा।
इति ते कथितं देवि। गुह्याद गुह्यतरं परम्॥
प्रपठेद य इदं नित्यं कालीनाम शताष्टकम्।
त्रिषु लोकेषु देवेशि? तस्याऽसाध्यं न विद्यते॥
प्रातः काले च मध्याह्न सायले च सदा निशि।
यः पठेत परया भक्त्या कालीनाम शताष्टकम्॥
कालिका तस्य गेहे च संस्थानं कुरुते सदा।
शून्या गारे श्मशाने वा प्रान्तरे जलमध्यतः॥
वह्नि मध्ये च संग्रामे तथा प्राणस्य संशये।
शताष्टकं जपन् मन्त्र लभते क्षेममुत्तमम॥
हिन्दी अनुवाद- 1. काली 2. कपालिनी 3. कान्ता 4. कामदा 5. काम सुन्दरी 6. कालरात्रि 7. कालिका 8. काल भैरव पूजिता 9. कुरूकुल्ला 10.कामिनी 11. कमनीय स्वभाविनी 12. कुलीना 13. कुलकर्णी 14. कुलवर्त्म प्रकाशिनी 15. कस्तुरी रस के समान नीले रंग वाली, 16. काम्या 17. काम स्वरूपिणी 18. ककार वर्णा, 19. कामधेनु 20. करालिका 21. कुल कान्ता 22. करालास्या 23. कामार्त्ता 24. कलावती 25. कृशोदरी 26. कामाख्या 27. कौमारी 28. कुलपालिनी 29. कुलजा 30. कुल कन्या 31. कलहा 32. कुल पूजिता 33. कामेश्वरी 34. काम कान्ता 35. कुब्ज रेश्वर गामिनी 36. काम दात्री 37. कामहर्ती 38. कृष्णा 39. कपर्दिनी 40. कुद 41. कृष्ण देहा 42. कालिन्दी 43. कुलपूजिता 44. काश्यपी 45. कृष्ण माता 46. कुलिशांगी 47. कला 48. क्रीं रूपा 49. कुलराम्या 50. कमला 51. कृष्ण पूजिता 52. कृशांगी 53. किन्नरी 54. कर्जी 55. कलकण्ठी 56. कार्तिकी 57. कम्बूकण्ठी 58. क्रौलिनी 59. कुमुदा 60. कामेजीविनी 61 61. कुलस्त्री 62. कार्तिकी 63. कृत्या 64. कीर्ति 65. कुल पालिका 66. कामदेव कला 67. कल्पलता 68. कामांग वर्द्धिनी 69. कुन्ती 70. कुमुद प्रीता 71. कदम्ब कुसुमोत्सुका 72. कादम्बिनी 73. कमलिनी 74. कृष्णनंद प्रदायिनी 75. कुमारी पूजन रता 76. कुमारी गण शोभिता 77. कुमारी रञ्जन रता 78. कुमारी व्रता धारिणी 79. कंकाली 80. कमनीया 81. कोटरी 82. काम शास्त्र विशारदा 83. कपाल खटवाङ्ङ्गधरा 84. काल भैरव रूपिणी 85. कोटराक्षी 86. काशी 87. कैलाश वासिनी 88. कात्यायिनी 89. कार्यकरी 90. काव्य शास्त्र प्रमोदिनी 91. काम कर्षण रूपा 92. कामपीठ निवासिनी 93. कंगिनी 94. काकिनी 95. क्रीड़ा 96. कीर्ति वर्द्धिनी 97. कलह प्रिया 98. कुण्डगोलोद भवप्राण 99. कौशिकी 100. कीर्ति 101. कुम्भस्तनी 102. कटाक्षा 103. काव्या 104. कोकन प्रिया 105. कान्तार वासिनी 106. कान्ति 107. कठिना 108. कृष्ण वल्लबा। अष्टोत्तरशत् महाकाली नमस्कार-नमस्कार, बारंबार नमस्कार!
इसके पश्चात् रूद्राक्ष की माला से नीचे लिखित मंत्र का 11 माला 40 दिन नित्य ही जप करें-
“ॐ क्रीं हूं ह्रीं फट् स्वाहा।”
नोट- 40 वें दिन की रात्रि में जप समाप्त होने के पश्चात् हवन करें।
हवन मंत्र
ॐ प्रजापत्ये स्वाहा, इदं प्रजापतये।
ॐ इन्द्राय स्वाहा, इदम इन्द्राय इत्यायाधारो।
ॐ अगन्ये स्वाहा, इदमग्न्ये।
ॐ सोमाय स्वाहा, इदं सोमाय न मम इत्याज्य भागौ।
ॐ भूः स्वाहा, इदं वायवे।
ॐ स्वः स्वाहा, इदं सूर्याय।
ॐ मंगलाय नमः, इदम् मंगलाय स्वाहा।
ॐ बुधाय नमः स्वाहा, इदं बुधाय।
ॐ बृहस्पतये नमः स्वाहा, इदं बृहस्पतये।
ॐ शुक्राय नमः स्वाहा, इदं शुक्राय।
ॐ शनये नमः स्वाहा, इदं शनये।
ॐ राहवे नमः स्वाहा, इदं राहवे।
ॐ केतवे नमः स्वाहा, इदं केतवे।
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिम् पुष्टि वर्धनम्।
उर्वारुक मिव बन्धनान्मृत्यो र्मुक्षीय मामृतात्। स्वाहा॥
ॐ तत्सवितर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियोयोनः प्रचोदयात् स्वाहा।
ॐ सर्व मंगल मंगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरी नारायण नमोऽस्तुते स्वाहा।
ॐ मंगलम् भगवान विष्णु, मंगलम गरुड़ध्वज, मंगलम् पुण्डरी काक्ष, मंगलाय तनो हरिः स्वाहा।
ॐ क्रीं” नमः स्वाहा।
ॐ ह्रीं” नमः स्वाहा।
ॐ हौं कालि महाकालि किलि किलि फट् स्वाहा।
“ॐ क्रीं नमः स्वाहा” -मंत्र का कमसे कम (1100) ग्यारह सौ आहुतियां डालें।
नोट- उपास को! हवन के बाद “मूर्द्धान” करें।
मूर्द्धान मंत्र
नोट- इस क्रम में पान, सुपारी, सूखे खड़कते नारियल और बची हुई हवन सामग्री, गुड़द्रव्य सहित दोनों हथेलियों पर रखकर खड़े होकर निम्न मंत्र उच्चारण कर हवन कुंड में डालें।
ॐ मूछान दिवो अरति पृथिव्या वैश्वानर मृत मजात्।
मग्नि कविग्वं सम्भ्राजम तिथि जनानाम सन्ना पात्रं जयन्तु देवाः स्वाहा॥
अग्नि प्रार्थना मंत्र
हाथ जोड़कर-
ॐ श्रद्धां मेघां यशः प्रज्ञां विद्यां पुष्टि श्रियं बलम।
तेजः आयुष्य मारोग्यं देहि मेहब्य वाहन॥
ततः उपविश्य श्रवेण भस्म मानीय दक्षिणा नामिकया गृहीत भस्मना।
हवन भस्म शरीर के विभिन्न अंगों में लगाने का मंत्र
ॐ ऋयायुषं जमदग्ने, इति ललाटे, (मस्तक में लगावे)
ॐ कश्य पश्य त्र्यायुषं ग्रीवायाम्। (कंठ में लगावे)
ॐ यदेवेषुत्रया युषं हृदिः (हृदय में लगावे)
ॐ तते अस्तु त्र्यायुषं, दक्षिणा वाहमले (दोनों वाहु में लगावें)
नोट- अब खड़े होकर निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुए माता काली हवन कुंड सहित स्थानों के चारों तरफ पांच बार “परिक्रमा” करें।
प्रदक्षिणा मंत्र
यानि कानि च पापानि जन्मांतर कृताणि च।
तानि-तानि प्रणशयन्ति प्रदक्षिणा पदे-पदे॥
नोट- उपास को! प्रदक्षिणा समाप्ति के बाद कांशे की थाली पर पान का पत्ता रखकर कर्पूर जलाकर माँ को “आरती” दिखावें और इस पुस्तक के अन्तिम पृष्ट पर लिखी हुयी “आरती वन्दना” गावें। आरती वन्दना समाप्त होने के पश्चात् “पूजन विसर्जन” करें।
पूजन विसर्जन मंत्र
नोट- दोनों हाथ से गंगाजल की गड़वी पकड़कर खड़े होकर माता काली को अन्तिम पूजन अर्घ्य प्रदान करें, साथ-साथ निम्न मंत्र का उच्चारण करें-
यान्तु देवगणाः सर्वे पूजमादाय मामकीम।
यजमान हितार्थाय पनराग भनाय च॥
नोट- इसके पश्चात् माता महाकाली को प्रणाम करें, फिर प्रसाद वितरण करें, ब्राह्मण एवं कुमारी 11 कन्याओं को भोजन करावें। कन्याओं को एवं खासकर वैदिक पंडित को पूर्ण सन्तुष्ट कर विदा करें। तत्पश्चात् स्वयं भोजन ग्रहण करें।
माता काली की पूजा में “बकरे की बलि या भैसे की बलि” भूल से भी न चढ़ावें। बलि चढ़ाने से माता क्रोधित हो जाती हैं, इसलिए यह भूल न करें।
साधको! उपरोक्त सम्पूर्ण नियमानुसार पूजन, जप सम्पन्न करने के पश्चात् आपके द्वारा की गई महाकाली साधना सम्पन्न हुई। इसी साधना काल के मध्य माता महाकाली की स्वप्न में अथवा साक्षात् दर्शन भी आपको प्राप्त होंगे और आप निहाल हो जायेंगे। तत्पश्चात् आप अपने कार्य हेतु या अन्य परमार्थ दुखी लोगों के कार्य हेतु शनिवार के दिन भोजपत्र पर मंत्र लिखकर, सोने, चांदी या तांबे के ताबीज में भरकर, पंचोपचार पूजन कर, 1 माला मंत्र जप कर किसी को प्रदान करेंगे तो उनका कार्य चमत्कारिक रूप से सफल हो जायेगा।
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